Lectures of IPC

Lectures of IPC


सामान्य-
1. संहिता की पृष्ठभूमि का अध्ययन निम्न उपषिर्शो के अधीन किया जा सकता है-
2. 1860 से पूर्व तत्कालीन भारत में आपराधिक न्याय प्रशासन
3. प्रथम भारतीय विधि आयोग का गठन
4. भारतीय दंड संहिता का निर्माण
5. भारतीय दंड संहिता का प्रवर्तन
(I) 1860 से पूर्व तत्कालीन भारत में आपराधिक न्याय प्रशासन
a) प्राचीन हिन्दू विधि में अपराधो को दण्डित करना राजा का कर्तव्य समझा जाता था किन्तु उस काल में दांडिक अपकार तथा सिविल अपकार जैसा विभेदन नहीं था कुछ मामलों में अपराधी से क्षतिपूर्ति वसूल ली जाती थी|
b) मुग़ल कालीन भारत में मुस्लिम दंड विधि लागू की गयी मुस्लिम दंड विधि प्रतिशोध तथा कठोर शारीरिक दंड पर आधारित थी
c) ब्रिटिश भारत में मुस्लिम दंड विधि के स्थान पर क्रमश: आंगल दंड विधि में काफी सुधार किया गया| वारेन हेस्टिंग्स तथा लार्ड कोर्नवालिस ने दंड विधि में काफी सुधार किया| बम्बई प्रसिड़ेंसी के गवर्नर एनीक्न्स्टन के निर्देशन में एलीकंस्टन संहिता निर्मित की गयी| यह पहली दंड संहिता थी| इसमें 44 धाराएँ थी| आगे चलकर तत्कालीन पंजाब प्रांत के लिए भी एक संहिता तैयार की गयी|
इन सब के बावजूद ब्रिटिश काल में mofassil क्षेत्रो में मुस्लिम दंड विधि प्रवर्तन में बनी रही| प्रेसिडेंसी नगरो में आंगल दंड विधि-लागू थी| इस प्रकार ब्रिटिश भारत में आपराधिक न्याय प्रशासन समरूप नहीं था|

(II) प्रथम भारतीय विधि आयोग का गठन
a) समरूप दंड विधि की आवश्यकता पर बल देते हुए thomas babirgtoh macauly को समक्ष ब्रिटिश भारत में दंड विधि समरूप की मांग की गई|
b) macauly की मांग के अनुसरण में the charter act-833 किया गया| इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश भारत हेतु एकल विधायिका स्थापित की गई| इस अधिनियम के अंतर्गत -1834 में भारत का प्रथम विधि –आयोग नियुक्त किया गया macauly को इसका अध्यक्ष बनाया गया
(III) भारतीय दंड संहिता का निर्माण
a) प्रथम विधि आयोग ने 1857 में प्रारूप भारतीय दंड संहिता तैयार किया sir B. peacock, sir J.W. colville तथा elliot जैसे विधि शास्त्रियों ने प्रारूप संहिता की समीक्षा 1860 में संहिता का निर्माण पूर्ण हो गया|
b) 6 अक्टूबर, 1860 को भारतीय दंड संहिता पारित हो गयी,1 jan, 1862 से यह प्रवर्तन में आ गयी| गोवा, दमन द्वीप, एवं पांडिचेरी में यह 1 oct.,1963 में प्रवर्तन में आई|
(IV) भारतीय दंड संहिता का प्रवर्तन:
a) संहिता 1 jan, 1862 से प्रवर्तन में आई गोवा, दमन दीव एवं पांडिचेरी में 1 oct 1863 में प्रवर्तन में आई
b) संहिता जम्मू तथा कश्मीर राज्य में प्रवर्तन में नही है जम्मू तथा j&k में ranvir पेनल कोड लागू|
c) ब्रिटिश शासन काल में संहिता निम्नलिखित स्थानों पर भी लागू थी
i) सिंगापूर
II) युगांडा
III) सोमाली लेंड
IV) मलक्का
v) ब्रिटिश बलुसियत आदि

अपराध की प्रकृति और परिभाषा
“अपराध वह है जिस कार्य को समाज आपराधिक विधि के अतिक्रमण के रूप में स्थापित कर अपराध कहे| विधि के बिना अपराध कथापि नहीं हो सकता यधपि रोष हो हो सकता है जिसकी परिणिति विधि के अधिनियम में होती है|
अपराध की अवधारणा सदैव लोकमत पर आधारित होती है जैसा कि हम जानते है कि विधि सदैव अपने समय के लोकमत को दिग्दर्शित करती है, विधि की किसी अन्य शाखा की अपेक्षा आपराधिक विधि लोकमत को यथा तथ्य प्रदर्शित करती है|
अपराध के स्वरुप तथा उसकी अवधारणा को समझने के लिए सर्वप्रथम यह जाना आवश्यक है की विधि क्या है क्योंकि अपराध एवं विधि का इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है कि बिना एक को जाने दुसरे को नहीं समझा जा सकता|
– राजनितिक दृष्टि से श्रेष्ठ तथा प्रभुता संपन्न व्यक्तियों द्वारा अपने अधिनस्थो व्यक्तियों के लिए बनाये गये नियमों का समूह विधि कहलाता है,
– विधि-एक आदेश है जो समाज के सभी सदस्यों द्वारा अनुपाल्नीय व्यवहार का निर्देशन करता है तथा जो दंड द्वारा समर्थित है,
इस प्रकार विधि-समाज के लोगो द्वारा अनुपालनीय व्यवहार के कुछ मानको को निर्धारित करता है| इन मानको को सधारणयता: समाज का अनुमोदन प्राप्त होता है| इन निश्चित मानको से विचलन समाज द्वारा दंडनीय होता है अत: ऐसा आचरण जो निर्धारित मानको के अनुरूप नहीं होता है| अत: ऐसा आचरण जो निर्धारित मानको के अनुरूप नहीं होता अपराध कहलाता है|
इस प्रकार हम कह सकते है की विधि की अवज्ञा अपराध कहा जाता है, परन्तु विधि की प्रत्येक अवज्ञा अपराध नहीं है, क्योकि संविदा विधि, पारिवारिक विधि, का उल्लंघन तब तक अपराध नहीं हो सकता, जब तक कि ऐसा उल्लंघन किसी विधि द्वारा अपराध न घोषित कर दिया जाए|
एक साधारण व्यक्ति के लिए अपराध वह कार्य है “जिसे समाज में लोगन घोर निंदा के योग्य समझते है|
अपराध विधि द्वारा निषिद्ध भी है तथा समाज की नैतिक मान्यताओ के विरुद्ध भी है|
किसी कार्य को अपराध होने के लिए आवश्यक है कि वह विधि के उल्लंघन के रूप में किया गया हो तथा समाज की नैतिक मान्यताओं के विरुद्ध हो| परन्तु हम जानते है की आचार सापेक्ष होते है, जब की नैतिकता परिवर्तनशील अवधारणा है, क्योंकि यह लोकमत में परिवर्तन होने के साथ ही साथ बदलती रहती है| लोकमत स्वयं भी समय समय पर बदलती समाज की आवश्यकताओ पर निर्भर करती है| नैतिक मूल्य एक देश से दुसरे देश, एक ही देश में अलग स्थानों तथा समय समय पर भिन्न भिन्न होता है|
इस बात से स्पष्ट है कि एक ही कार्य विभिन्न देशो में अपराध नहीं घोषित किया गया है|
example: जारता, सती, बहुविवाह इत्यादि को भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध माना गया है| जबकि यूरोप के कुछ भू-भाग में इन्हें अपराध नहीं मानते|


अपराध के निम्नलिखित प्रमुख तत्व है:-
1. एक मानव जिसे एक विशिष्ट ढंग से वैधिक बाध्यता के अधीन कार्य करना है तथा जो दंड आरोपित करने
के लिए उपयुक्त विषय है|
2. ऐसे मानव के मन में एक दुराशय है|
3. ऐसे आशय को पूरा करने के लिए किया गया कोई कार्य और दोषपूर्ण कृत्य|
4. ऐसे कार्य द्वारा किसी दुसरे मानव या सम्पूर्ण समाज की क्षति|

1. मानव:- आधुनिक विधिशास्त्र में मान्य निगम तथा अन्य कृत्रिम व्यक्ति दंड के योग्य नहीं है क्योंकि सामुचित दंड के योग्य नहीं है क्योंकि समुचित दंड का तात्पर्य आर्थिक तथा शारीरिक दोनों से है परन्तु शारीरिक दंड कृत्रिम व्यक्तियों को नही दिया जा सकता|
2. दुराशय:- “मात्र कार्य किसी को अपराधी नहीं बनाता यदि उसका मन अपराधी नही है| यह आपराधिक विधि का एक सुविदित उक्ति है| इसका अर्थ यह है की “कार्य स्वयं किसी को दोषी नहीं बनाता जब कि उसका आशय वैसन रहा हो|”
इस उक्ति से एक दूसरी उक्ति निकलती है मेरे द्वारा मेरी इच्छा के विरुद्ध किया कार्य मेरा नहीं है| तात्पर्य यह है की किसी कार्य को दंडनीय होने के लिए इच्छित होना चाहिये स्वेच्छया से किया गया होगा चाहिये|
अत: अपराध को गठित करने के लिए आशय एवं कार्य दोनों का संगामी होना आवश्य है|
जहाँ किसी अपराध को गठित करने के लिए आवश्यक आपराधिक आशय अनुपस्थित होता है वहां अभियुक्त दण्डित नहीं किया जा सकता जब तक कि कृत्य दोष्कर्ता के आशय के बिना भी विविक्षित या स्पष्ट रूप से दंडनीय न हो|
दुराशय के अपवाद
– bigamy (494-9.p.c)
– पब्लिक न्यूसेंस (sec. 268) लोक न्यूसेंस (उपताप)
– abduction, kidnaping-(व्यपहरण या अपहरण)
– साधारण अपवाद

NOTE: जिन अपराधो में दुराशय आवश्यक तत्व नहीं है वो अपराध कठोर दायित्व वाले अपराध कहे जाते है|
STRICT LIABILITY (कठोर दायित्व) : कभी कभी सामान्य मन: स्थिति से कुछ कम दोषी मस्तिष्क भी अधिनियम द्वारा शायद ही कामन लॉ द्वारा दांडिक दोषों के लिए पर्याप्त मानसिक तत्व बना दिया जाता है ऐसे अपराध के नाम से जाना जाता है|
इस प्रकार हम कह सकते है की दुराशय के निम्न मुख्य बिंदु है-
(i) दुराशय अपराध का मानसिक तत्व है
(ii) यह दोषपूर्ण मानसिक स्थिति है|
(iii) विधि द्वारा निषिद्ध कृत्य या परिणाम उत्पन्न करने की इच्छा इसका मूल तत्व है|
(iv) दुराशय ग्रस्त व्यक्ति के सम्बन्ध में यह प्रकलन की जाती है कि वह अपने कृत्य की प्रकृति तथा उसके स्वाभाविक परिणामों का वास्तविक ज्ञात या अनुमत रखता था|
(v) दुराशय तथा एवं परिस्थितियों से निष्कर्षित किया जा सकता है यह निष्कारण वस्तुपरक नहीं यह व्यक्ति परक होगा|
(vi) दुराशय अभिव्यक्त या घोषित भी हो सकता है
(vii) दुराशय प्रकतिपत भी किया जाता है
(viii) दुराशय सिद्ध करने का भार अभियोजन या परिवादी पर होगा
आपराधिक कृत्यों का वर्गीकरण (दुराशय की सिद्ध-भारिता की दृष्टि से)
1. R. vs Prime-1875 के प्रकरण में न्यायमूर्ति blackburn ने आपराधिक कृत्यों को निम्नत: वर्गीकृत किया है-
a) Malum prohibition (criminal act)
b) Mala-in-sc
a) Mala prohibita :- निर्दोष कृत्य है (यद्धपि विधि द्वारा दंडनीय है) इसमें दुराशय सिद्ध करना अपेक्षित है
b) Malum-in-sc :- स्वयं में एक अनुचित कृत्य है इसमें दुराशय प्रकातिपत कर दिया जाता है|

Case- Queen vs. Tulson 1889 अभियुक्त महिला ने पति tolon को मृत समझते हुए (सद्भावना पूर्वक) पुनर्विवाह कर लिया था विवाह पति के लापता होने के 7 वर्ष के भीतर किया गया था tolson ने अपनी पत्नी के विरुद्ध द्विविवाह का एक वाद संस्थित किया, पत्नी ने स्वयं को निर्दोष बताया|
Held – अभियुक्त महिला का कृत्य Malum Prohibition था अत: दुराशय सिद्ध करना होगा|
2. R vs. Prince 1875- अभियुक्त एक अवयस्क बालिका के अवैध रूप से उसको पिता के संरक्षता से निकाल ले जाने का दोषी था| बालिका ने 18 वर्ष का होने का मिथ्थापदेशन किया था अभियुक्त ने उसको कथन पर विशवास कर लिया था|
Held – अभियुक्त का कृत्य Malo-in-sc था, अत: दुराशय प्रकातिपत कर लिया जाएगा, दुराशय सिद्ध करना आवश्यक नहीं होगा|
भारतीय दंड संहिता में दुराशय का सिद्धांत:
1. शुद्ध तकनिकी अर्थों में दुराशय का सिद्धांत संहिता पर लागू नहीं होता है| संहिता में अपराधों की सूक्ष्म सटीक तथा पूर्ण परिभाषाएं दी गई है इन परिभाषाओं में अपेक्षित दुराशय निर्दिष्ट किया गया है| अत: ऐसी परिभाषाओं को सम्बन्ध में दुराशय का सामान्य सिद्धांत लागू नहीं होगा|
2. भारतीय दंड संहिता में प्रत्येक अपराध को सावधानीपूर्वक परिभाषित किया गया है, ताकि उसमें दुराशय जो एक अपराध के लिए आवश्यक है की निश्चीयत: सम्मिलित किया जा सके| इस तथ्य को स्पष्ट एवं विशिष्ट शब्दों का प्रयोग कर दर्शाया गया है|
Example:- दुराशय सामान्य आशय से (Intentinally)
• जानबूझकर (Knowingly)
• स्वेच्छा से (volountarily)
• घोरते से (Frauldulently)
• बेईमानी से (Dishonestly)
• विदेश्पूर्वक (Maliciously)
• असावधानी से (Recklessly)
• उपेक्षा से (Negligently)
• स्वैरिता (Wantonly)
• भ्रष्टापूर्वक (Malignantly)
• दूषित रीति से (Corruptly) आदि शब्दों द्वारा स्पष्ट किया जाता है|
भारतीय दंड संहिता में कुछ धाराये ऐसी है जिनमें दुराशय को प्रकट करने वाले शब्दों का प्रयोग नहीं हुआ है| ऐसे मामले दो प्रकार के हैं-
(i) कुछ कृत्य तथा उनके परिणाम पूरे समाज अथवा राज्य के लिए इतने हानिकारक है कि उनको कारित करने का आशय के अभाव में भी दंड देना उचित श्रेयस्कर समझा गया जैसे भारत सरकार के विरुद्ध करना, राजद्रोह (sedition) और व्ययहरण एवं अपहरण|
(ii) जहाँ कृत्य अपने आप में इस प्रकार है जिससे एक प्रबल विश्वास उत्पन्न होता है कि जिसने कार्य की इच्छा किया था उसके परिणामों के बारे में अवश्य सोचा होगा| जैसे-सिक्कों एवं स्टैम्पों का कूटकरण|
अपराध का तीसरा तत्व-(दोषपूर्ण कृत्य)
3. दोषपूर्ण कृत्य (Actus reus):-
i) यह अपराध का भौतिक तत्व है
ii) यह विधि द्वारा वर्जित कृत्य है
iii) यह मानवीय आचरण का भौतिक परिणाम है
iv) यह मानवीय आचरण का वह परिणाम है जिसे विधि रोकना चाहती है
v) इसे इच्छित होना चाहिए अनिच्छित दोष पूर्ण कृत्य आपराधिक दाद्विक सृजित नहीं करता है\
यह बात latin Maxim – Actus mc ivito Factus non est mens actus में अंतर्विष्ट है| इसका अर्थ है बाध्यता के अधीन किया गया मेरा कृत्य नहीं है|
अपराध का चौथा तत्व मानव की क्षति (Injury to human being)
4. मानव की क्षति- भारतीय दंड संहिता की धारा 44 द्वारा परिभाषित क्षति शब्द किसी इस प्रकार की हानि की घोतक है जो किसी व्यक्ति के शरीर मन ख्याति या संपत्ति को अविद्ध रूप से कारित हुई हो| क्षति किसी दूसरे व्यक्ति या किसी के शरीर अथवा सम्पूर्ण समाज के अवैध रूप से पहुचाई गयी होनी चाहिए|
Notes- कुछ अपराध ऐसे है जिसमें क्षति आवश्यक तत्व नहीं है उन्हें अपूर्ण अपराध inconate crimes कहते हैं|
वे इस प्रकार है –
1. प्रयत्न (Attempt)
2. दुष्प्रेनण (Abetment)
3. आपराधिक शंयंत्र (Criminal Conspracy)
कुछ ऐसे अपराध है जिनमें न तो कृत्य न ही क्षति आवश्यक है :-
वे इस प्रकार हैं-

1. डकैती करने के लिए तैयारी (s. 399)
2. डाकुओं की टोली का होने के लिए दंड (s. 400)
3. चोरों की टोली का होने के लिए दंड (s.401)
4. डकैती करने के प्रयोजन से एकत्रित होना (402)


यत (whereas) : भारत हेतु एक साधारण दंड संहिता का उपबंध करना समेचीन है, अत: यह निम्नलिखित रूप में अधिनियमित की जाती है:-
प्रस्तावना से स्पष्ट है कि संहिता मात्र एक सामान्य दंड संहिता है| यह सम्पूर्ण नहीं है| संहिता निरसनकारी नहीं है, दूसरे शब्दों में संहिता के पर्वतत में आने से पूर्त की दांडिक विधियाँ निरस्त नहीं हुई|
प्रारंभिक (Preliminary)
1. संहिता में इस समय कुल 26 अध्याय है मूल संहिता में केवल 23 अध्याय दे, अध्याय V-A (आपराधिक षड्यंत्र), अध्याय – IX-A (पति या पति के सम्बन्धियों द्वारा करता) उत्तरवर्ती अत: स्थापत है|
2. संहिता का अध्याय 1 (धारा-1-5) परिचयात्मक या प्रारम्भिक अध्याय 1 के उपबंधों का संक्षेपण निम्नवत है-
i) शीर्षक तथा संहिता के पर्वतत का विस्तार sec.1
ii) भारत में कारित अपराधों हेतु दंड sec. 2
iii) भारत से बाहर कारित किन्तु भारत में विचारणीय अपराधी हेतु दंड sec. 3
iv) क्षेत्रातित अपराधों के प्रति संहिता का विस्तार sec.4
v) कुछ विधियों इस अधिनियम द्वारा प्रभावित नहीं होगी|
Territorial Jurisdiction
प्रादेशिक क्षेत्राधिकार
भारत के आपराधिक न्यायालय अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग इसलिये करते है कि या तो कोई अपराध किसी व्यक्ति देशी या विदेशी द्वारा भारत की सीमा के अंदर किया गया है या तो अपराध भारत की सीमा के बाहर किसी भारतीय द्वारा कारित किया गया है|
पहले वाले को अंत: प्रादेशिक क्षेत्राधिकार (Intra territorial jurisdiction) तथा बाद वाले को बहिप्रादेशिक क्षेत्राधिकार (extra territorial jurisdiction) कहते हैं|
क्षेत्राधिकार मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं:-
1) प्रादेशिक क्षेत्राधिकार (territorial jurisdiction)
2) वैयक्तिक क्षेत्राधिकार (personal jurisdiction)
1) प्रादेशिक क्षेत्राधिकार (territorial jurisdiction):- जहाँ कोई अपराध भारत की सीमा के अंदर घटित होता है| संहिता लागू होगी और न्यायालय इस तथ्य पर ध्यान दिए बिना कि अपराधी भारतीय नागरिक है- या विदेशी, विचारण कर दंड दे सकती है| इसे प्रादेशिक क्षेत्राधिकार कहते हैं क्योंकी इसमें अपराध न्यायालय के सम्मुख इसलिये लाया जाता है क्योँकी वह भारत की परिसीमा के अंदर घटित होता है| जहाँ क्षेत्राधिकार परिसीमा के अंदर घटित होता है, जहाँ क्षेत्राधिकार प्ररिसीमा से जुड़ा रहता है|
प्रादेशिक क्षेत्राधिकार भी दो प्रकार के होते हैं:-
1. अंत: प्रादेशिक क्षेत्राधिकार (Intra territorial jurisdiction)
2. बहिप्रादेशिक क्षेत्राधिकार (extra territorial jurisdiction)
अंत: प्रादेशिक क्षेत्राधिकार:- अंत: प्रादेशिक क्षेत्राधिकार वह है जिसमें किसी व्यक्ति द्वारा भारत की सीमा के भीतर अपराध किया जाता है| धारा-2 अंत: प्रादेशिक क्षेत्राधिकार से सम्बंधित है|
बहिप्रादेशिक क्षेत्राधिकार:- जहाँ किसी भारतीय नागरिक द्वारा भारत की सीमा के बाहर अपराध किया जाता है ऐसा व्यक्ति भारतीय न्यायालय द्वारा विचारिक एवं दण्डित हो सकता है और ऐसे क्षेत्राधिकार को बहिप्रादेशिक क्षेत्राधिकार कहते है| संहिता की धारा 3 और 4 बहिप्रादेशिक क्षेत्राधिकार से सम्बंधित है|
धारा-2 में उपबंध शब्द “प्रत्येक व्यक्ति” का मतलब
प्रत्येक व्यक्ति का अर्थ है भारतीय नागरिक तथा विदेशी| भारतीय दंड संहिता की धारा – 2 उपबंधित करती है कि संहिता के अंतर्गत कोई व्यक्ति राष्ट्रीयता, पद, जाति अथवा वंश के भेदभाव के बिना न्यायालय द्वारा विचारित एवं दंड का भागी होगा बशर्ते यह अपराध जिसका वह अभियुक्त है, भारतीय परिसीमा के अंदर घटित हुआ है|
परन्तु कुछ ऐसे भी व्यक्ति हैं जो संविधान के उपबंधों के कारण या विश्व के सभ्य राष्ट्रों की विधियों के अधीन हैं, उन्मुक्त है|
क्षेत्राधिकार से उन्मुक्त व्यक्ति निम्नलिखित है:-
1) विदेशी राष्ट्राध्यक्ष (Foreign Soureighs)
2) राज्य के उच्च अधिकारी (high dignitaries of the state)
3) राजदूत और राजनयिक अभिकर्ता (Ambossadors and diplomatic agents)
4) विदेशी शत्रु (Alien Enemies)
5) विदेशी सेना (Foreign Army)
6) युद्धपोत (Warships)
7) निगम (Corporation)
धारा-3 तथा 4 बहिप्रादेशिक क्षेत्राधिकार से सम्बंधित है
• भारतीय आपराधिक न्यायालयों का क्षेत्राधिकार इसके नागरिकों पर भारत के भीतर तथा इसके बाहर भी है|
• धारा-3 निर्धारित करता है की यदि कोई कृत्य भारत में अपराध है और वही कृत्य भारत की सीमा के परे घटित होता है तो भी वह अपराध होगा|
• अपराध किसी भी व्यक्ति जो आरोपित अपराध को करते समय भारतीय न्यायालयों को क्षेत्राधिकार में था, द्वारा किया जा सकता है, ऐसा व्यक्ति भारतीय नागरिक हो भी सकता है और नहीं भी|
Case – Mubarak Ali vs. State of Bombay- 1958 Sc.
धारा-4 भारतीय आपराधिक न्यायालयों को निम्नलिखित मामलों में क्षेत्राधिकार प्रदान करती है:-
• भारत से बाहर और परे किसी स्थान में भारत को किसी नागरिक द्वारा,
• भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी पोत या विमान पर चाहे वह कहीं भी हो किसी व्यक्ति द्वारा किये गए अपराधों में|
जब कोई अपराध भारत की सीमा के परे घटित होता है तथा अपराधी भारत की सीमा के अन्दर पाया जाता है तो ऐसी स्थिति में निम्न दो रास्तों में से कोई एक अपनाया जा सकता है|
1) उसे उस देश को विचारण हेतु सौंपा जा सकता है जिस देश में अपराध किया गया है, अर्थात वह दूसरे देश को प्रत्यापित (entradition) किया जा सकता है|
2) उसका विचारण भारत में हो सकता है|


Joint liability – धारा – 34-38
Constructive liability – धारा- 149, 396, 460
संयुक्त दायित्व का सिद्धांत:- जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी अपराधिक उद्देश्य को एक या सभी को शारीरिक चेष्टा द्वारा निष्पादित करने हेतु एक होते हैं या अलग-अलग या एक साथ कार्य करते है, तो प्रत्येक व्यक्ति जिसने अपराध करने में सहयोग किया था विधि के अंतर्गत सम्पूर्ण कार्य के लिए उसी प्रकार उत्तरदायी है जैसे उसने स्वयं हो उस कार्य को किया हो|
प्रलक्षित आपराधिक दायित्व- पलक्षित आपराधिक दायित्व विधि द्वारा विहित परिस्थितियों में किसी एक या कुछ व्यक्तियों के कृत्य हेतु सभी का दायित्व है|
प्रलक्षित आपराधिक दायित्व एवं प्रतिनिधिक आपराधिक दायित्व में अंतर:-
a) प्रतिनिधिक दायित्व वास्तविक कर्ता तथा पलक्षित कर्ता के साध्य विधिक सम्बन्ध आवश्यक है, पलक्षित आपराधिक दायित्व हेतु ऐसा आवश्यक नहीं है|
b) प्रतिनिधिक दायित्व हेतु सामान्य आशय या सामान्य उद्देश्य भाव आवश्यक नहीं है किन्तु प्रलक्षित आपराधिक दायित्व में यह अनिवार्य विधिक अपेक्षा है
c) प्रतिनिधिक दायित्व का सिद्धांत एक अपवाद है इसके विपरीत प्रलक्षित दायित्व विधि का सिद्धांत दंड विधि का सुस्थापित सिद्धांत है|
धारा – 34-38- I.P.C का आधार सूत्र:-
“कुछ परिस्थितियों में किसी सम्पूर्ण कृत्य को उस व्यक्ति पर अधिरोपित कर दिया जाता है जिसने उस कृत्य का मात्र एक अंश ही किया है|”
यह आधार सूत्र ही धारा 34-38 की आधारशिला है|
धारा 35-38 इसी आधार सूत्र की सशयता से भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में आपराधिक दायित्व के अग्रेतर नियम प्रतिपादित करती है| इस आधार सूत्र के बिना धारा 35-38 प्रभावी नहीं होगी|
धारा 34-38 का संक्षेपण:-
i) सामान्य आशय के अग्रसरण में अनेक व्यक्तियों द्वारा किया गया कृत्य ——— sec. 34
ii) जबकि ऐसा कृत्य इस कारण आपराधिक है कि
वह आपराधिक आशय या ज्ञान से किया गया है —————————————– sec. 35
iii) अशित कृत्य तथा लोप द्वारा कारित प्रभाव ——————————————- sec. 36
iv) किसी अपराध का गठन करने वाले अनेक कृत्यों में
से किसी एक को करके सहयोग करना —————————————————— sec. 37
v) आपराधिक कृत्य में सम्प्रक्त व्यक्ति भिन्न
अपराधों के दोषी हो सकते हैं —————————————————————— sec. 38
सामान्य आशय के अग्रसरण में अनेक व्यक्तियों द्वारा किया गया कृत्य ————— sec. 34.
1. धारा 34 को सामान्य प्रकृति (विधिक दर्शन):-
(i) धारा 34 अधिनियम संख्या 27, वर्ष 1870 द्वारा मूल धारा 34 के स्थान पर प्रतिस्थापित की गई है यह धारा R. v/s CRUISE, 1839 के प्रकरण में प्रतिपादित सिद्धांत पर आधारित है|
(ii) धारा 34 सारवान अपराध सृजित नहीं करती है यह प्रक्रियात्मक है यह साक्ष्य का नियम है इस धारा की सहायता से दोषसिद्धि धारा 34 के अंतर्गत आरोप का विरचण आवश्यक नहीं हैं [Yogendra v/s State of Bihar, 1984 sc.] leading case.
(iii) धारा 34 का तार्किक आधार:-
a) कुछ मामलों में अभियुक्तगण के व्यक्तिगत कृत्यों का विभेदन तथा उनकी वास्तविक भूमिकाओं का निर्धारण न केवल कठिन बल्कि अनावश्यक भी होता है|
b) सह-अपराधियों वि सहभागिता उन्हें अधिक खतरनाक बना देती है अत: ऐसे विशिष्ट मामलें के लिए विभिष्ट नियम आवश्यक हो जाता है|
c) जहाँ अभियुक्तगण का मस्तिष्क एक है वहाँ उनका दायित्व भी एवं सामान ही होना चाहिये|
(iv) धारा 34 एक अनुपूरक या सहयोगी धारा है यह बिना किसी दांडिक उपबंध के प्रवर्तित नही हो सकती हैं|
2. धारा 34 के आवश्यक तत्व:-
(i) कोई आपराधिक कृत्य किया गया हो
(ii) ऐसा आपराधिक कृत्य अनेक व्यक्तियों द्वारा किया गया हो, तथा
(iii) ऐसा आपराधिक कृत्य उन सभी व्यक्तियों के सामान्य आशय के अग्रसारण में किया गया हो|
उपरोक्त अपेक्षाओं के संतुष्ट से जाने पर आपराधिक कृत्य हेतु सभी उसी प्रकार दायी होंगे मानो उनमें से प्रत्येक ने उस कृत्य को अकेले ही किया हो|
3. आपराधिक कृत्य:-
(i) आपराधिक कृत्य से तात्पर्य सहित द्वारा निषिद्ध या अवैध लोप से है|
(ii) कृत्य में अवैध लोप शामिल है|
(iii) कृत्यों में कृत्यों की संख्या शामिल है|
(iv) लोप में लोपों की श्रृंखला शामिल है|
4. अनेक व्यक्ति:-
(i) अनेक शब्द बहुलता का संकेत करता है|
(ii) अनेक व्यक्ति से तात्पर्य एक से अधिक व्यक्ति से है|
(iii) अनेक व्यक्ति से तात्पर्य असंख्य व्यक्ति से है|
(iv) अनेक व्यक्ति एक निश्चित व्यक्ति समूह इंगित करता है|
(v) व्यक्तियों की संख्या अवधारणीय होना आवश्यक नहीं है किन्तु व्यक्तियों के निकाय का निश्चित होना आवश्यक है|
(vi) व्यक्ति शब्द धारा 11 i.p.c में परिभाषित है अत: धारा 34 कृत्रिम व्यक्तियों के सम्बन्ध में भी लागू हो सकते हैं|
5. सामान्य आशय:-
(i) सामान्य आशय धारा 34 के अंतर्गत दायित्व का एकल मानक है|
(ii) सामान्य आशय समान या सदृश आशय से भिन्न है|
(iii) सामान्य आशय से अभिप्रेत है-
a) योजनाबद्ध कृत्य
b) पूर्व मानसिक मिलन
c) पूर्व नियोजित योजना
d) आपराधिक आशय का पारस्परिक ज्ञान तथा उसमें सहभागिता
e) आपराधिक व्यवहार का एकत्व
(iv) सामान्य आशय व्यक्ति परक होता है इसे तथ्य एवं परिस्थितियों से निष्कर्षित किया जा सकता है
निष्कर्षण शीघ्रतापूर्ण नहीं होनी चाहिये|
(v) सामान्य आशय, कठोरत: सिद्ध किया जाना चाहिए सिद्ध भारिता अभियोजक या परिवादी पर होता है
(vi) सामान्य आशय, आपराधिक कृत्य से पूर्ववर्ती होना चाहिए, किन्तु सामान्य आशय के निर्मित होने तथा
सामान्य आशय के अग्रसरण में फलित आपराधिक कृत्य के मध्य दीर्घ समय अंतराल आवश्यक नहीं है|
सामान्य आशय ऐन मौके पर भी उत्पन्न हो सकता है Rishi Deo Panday v/s State of U.P, 1955 S.C.
सामान्य आशय लड़ाई के दौरान की उत्पन्न हो सकता है (Amrik singh, 1972 sc.)
(vii) सामान्य आशय से परे तथा आगे जाकर किये गये कृत्य हेतु अन्य अभियुक्तगण दायी नहीं होंगे
(Joginder Ahir, 1971 s.c.)
6. अग्रसरण [Furtherance]:-
(i) अग्रसरण से तात्पर्य सहयोग, भागीदारी तथा भूमिका के निर्वाह से है|
(ii) आपराधिक कार्य में भागीदारी (सामान्य आशय के परिप्रेक्ष में) अग्रसरण का मूल तत्व है|
(iii) अभियुक्तगण की कोई न कोई भूमिका सिद्ध होनी चाहिए यह आवश्यक नहीं है कि भूमिका सामान्य हो निजी भूमिका का अवधारण अपेक्षित नहीं हैं किसी न किसी भूमिका का निर्वाह सिद्ध होना पर्याप्त है|
(iv) सामान्य आशय का अग्रसरण आपराधिक व्यवहार में एकजुटता या एकत्व इंगित करता है|
(v) भागीदारी हेतु घटना स्थल पर भौतिक उपस्थिति अनिवार्य नहीं हैं कुछ अपराधों में भागीदारी घटना स्थल से दूर रह कर भी की जा सकती है|
(vi) सक्रिय भागीदारी आवश्यक नहीं है केवल उपस्थिति से भी भागीदारी का निर्वाह किया जा सकता है (B.K.
(vii) अभियुक्त के साथ चल पड़ने मात्र से को व्यक्ति अनिवार्यतः भागीदारी नही हो जाता है (Dashrath, 1979 S.C.)
जबकि ऐसा कृत्य इस कारण आपराधिक है कि वह आपराधिक आशय या ज्ञान से किया गया है sec. 35
1. धारा 35 पूर्ववर्ती धारा 54 की अनुपूरक है इसे साथ पढ़ा जाना चाहिये धारा 34 सामान्य आशय के अग्रसरण में विप्त व्यक्तियों से सम्बंधित है| धारा 55 अपेक्षित आपराधिक आशय या आपराधिक ज्ञान से किसी कृत्य में सलंग्न व्यक्तियों से सम्बंधित है|
2. धारा 35 वहाँ लागू होगा जहाँ अनेक व्यक्ति अपेक्षित आपराधिक आशय या ज्ञान से किन्तु सामान्य आशय का अनुसरण किये बिना संयुक्तत: आपराधिक कृत्य करते हैं|
3. धारा 35 वहाँ लागू होगी जहाँ अनेक व्यक्तियों द्वारा एक ऐसा कृत्य किया गया हो जो विशेष आशय या ज्ञान से किये जाने पर अपराध गठित करेगा| अपेक्षित आशय या ज्ञान से उस कृत्य में शामिल होने वाला प्रत्येक व्यक्ति एकलकर्ता के रूप में दायी होगा| प्रत्येक व्यक्ति इस प्रकार दायी होगा मानों की उसने वह कृत्य अकेले ही किया हो|
4. Mahboob Shah v/s Emperore 1945 P.C
Held:- “जहाँ पिटाई के कारण मृत्यु हो गई हो तथा अभियुक्तगण को ऐसी पिटाई से मृत्यु हो जाने का ज्ञान रहा हो, वहाँ वे सभी धारा 35 की सहायता से दण्डित होंगे”|
अंशत: कृत्य तथा अंशत: लोप द्वारा कारित परिणाम S. 36 r/w 32
1. धारा 36 धारा 32 का स्वाभाविक परिणाम (Natural Coroblary) है|
2. धारा 36 का मूल भाव यह कि जो अपराध या जिस अपराध का प्रयत्न कृत्य या लोप द्वारा किया जा सकता है, उसे अंशत: कृत्य तथा अंशत: अवैध लोप से भी किया जा सकता है|
3. दृष्टांत:- A अंशत: Z को भोजन देने में अवैध लोप द्वारा तथा अंशत: Z को पीटकर साशय Z की हत्या की है|
अपराध का गठन करने वाले अनेक कृत्यों में से कि सी एक को करके सहयोग करना —— S. 37
1. आपराधिक कृत्य में सहयोगी कृत्य (साशय) की अपराध है| अत: साशय सहयोग कर्ता को सम्पूर्ण कार्यों हेतु दायी ठहराया जा सकता है|
2. अनासयित सहयोग तथा योगदान धारा 37 के परिधि में नहीं है|
3. अपराध के घटक कृत्यों में से किसी एक या अनेक को साशय सहयोग के अधीन करने वाला व्यक्ति सम्पूर्ण| आपराधिक कृत्य के लिए दायी होगा|
4. धारा 37, धारा 35 का आवश्यक निष्कर्ष है ये बात धारा 37 के दृष्टांतों से स्पष्ट है|
5. धारा 37 के आवश्यक तत्व:-
(i) अनेक कृत्यों के माध्यम से कोई अपराध किया गया हो|
(ii) अभियुक्त ने ऐसे कृत्यों में से एक या अधिक कृत्य करते हुए (अकेले या संयुक्तत:) अपराध में साशय सहयोग किया हो|
उपरोक्त अपेक्षाओं के संतुष्ट हो जाने पर अभियुक्त सभी अपराधिक कृत्यों का कर्ता समझा जायेगा भले ही उसके द्वारा किया गया सहयोगी कृत्य स्वयं में पूर्ण अपराध न हो|
6. धारा 37 के अंतर्गत साशय सहयोग के रूप में अपराध का घटक कृत्य करने वाला अभियुक्त अपने
व्यक्तिगत कृत्यों के अतिरिक्त अवशेषी कृत्यों के लिए भी दोषी मान लिया जाता है| अपराध में सहयोग
करने वालों सभी व्यक्ति परस्पर मालिक तथा अभिकर्ता समझतें जाते हैं|
दृष्टांत:-
a) विष वाला
b) जेलर वाला
c) जेलर वाला
आपराधिक कृत्य में संयुक्त संप्रक्त व्यक्ति विभिन्न आपराधों के दोषी हो सकेंगे ——- S. 38
1. किसी आपराधिक कृत्य में संप्रक्त व्यक्ति भिन्न-भिन्न अपराधों के दोषी हो सकते हैं अत: उन्हें भिन्न-भिन्न अपराधों के लिए दण्डित किया जा सकता है|
2. धारा 38 के अनुसार-
“जहाँ कि अनेक व्यक्ति किसी आपराधिक कृत्य में सलंग्न या संपृक्त है, वहाँ वे उस कृत्य के माध्यम से भिन्न-भिन्न अपराधों के दोषी हो सकेंगे|”
3. आपराधिक कृत्य में संपृक्त व्यक्ति भिन्न-भिन्न आशय से सलग्न हो सकते हैं| आशय की भिन्नता, दायित्व की भिन्नता उत्पन्न कर सकती है|
4. दृष्टांत:- a) आपराधिक मानव वद्ध वाला|
सामान्य उद्देश्य के अग्रसरण में कारित अपराध हेतु विधि विरुद्ध जमाव का प्रत्येक सदस्य दोषी होगा ——- S.149
1. अध्याय VIII (s. 141-160) लोक प्रशांति हेतु अपराधों के बारे में है इस अध्याय का नितिगत आधार यह है कि-
“व्यक्तियों की अवैध भीड़ को इतोत्साहित किया जाना चाहिए तथा लोगों को अपराधिक बल के प्रयोग किये जाने से रोका जाना चाहिए|”
2. अध्याय VIII में परिभाषित तथा दंडनीय अपराध “राज्य के विरुद्ध अपराध”, “शारीर तथा संपत्ति के विरुद्ध” अपराध के मध्य में आते हैं|
3. अध्याय VIII में धाराओं की व्यवस्था अवैज्ञानिक है विधि आयोग ने S.149 में संशोधन की संस्तुति की है आज, लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में बंद, धरना, प्रदर्शन, घेराव, हड़ताल, भूक हड़ताल बहुत से सामान्य बात है यह राजनैतिक लोकतंत्र में विरोद्ध प्रदर्शन के रूप है| यह सभी गतिविधियाँ न्यूनाधिक मात्रा में लोक प्रशांति को बाधित या संकटग्रसित करती है कभी – कभी यह बल्वा या दंगा का रूप भी ले सकता है|
4. धारा 149 के आवश्यक तत्व:-
धारा 149 प्रलक्षित आपराधिक दायित्व गठित करती है यह सारवान अपराध सृजित करती है धारा 149 के आवश्यक तत्व निम्न है:-
(i) कोई विधि विरुद्ध जमाव;
(ii) ऐसे जमाव के किसी सदस्य द्वारा उस जमाव के सामान्य उद्देश्य का अग्रसरण किया गया हो;
(iii) सामान्य उद्देश के ऐसे अग्रसरण में, ऐसे सदस्य ने-
a) कोई अपराध किया हो या
b) ऐसा कोई अपराध किया हो जिसके बारे में जमाव के सदस्यगण यह जानते थे कि उसका कारित हो जाना संभाव्य है|
उपरोक्त अपेक्षाओं के संतुष्ट हो जाने पर ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो अपराध कारित किये जाते समय सदस्य रहा है उस अपराध का दोषी होगा|
5. विधि विरुद्ध जमाव —————– S. 141
विधि विरुद्ध जमाव 5 या अधिक व्यक्तियों का संयुक्तीकरण है यह आवश्यक है कि वह धारा 141 में निर्दिष्ट एक या अधिक सामान्य उद्देश्य रखते है धारा 141 में निर्दिष्ट सामान्य उद्देश्य निम्न है:-
(i) आतंकित करना (To ever rule)
(ii) प्रतिरोध करना (To resist)
(iii) कारित करना (To commit)
(iv) कब्जे में लेना (To take possession)
(v) वंचित करना (To deprive)
(vi) प्रवर्तित करना (To enforce)
(vii) बाध्य करना (To Compel)
6. पाँच (5) या अधिक व्यक्ति:-
(i) विधि विरुद्ध जमाव हेतु निम्नत: आवश्यक है आंग्ल विधि में 3 व्यक्ति ही आवश्यक होते हैं|
(ii) Kartar singh v/s State of Punjab, 1961 Sc. इस प्रकरण में 7 व्यक्तियों का विधि विरुद्ध जमाव था 4 निर्दोष घोषित कर दिए गये|
Held:- ‘शेष तीन (3) विधि विरुद्ध जमाव गठित नहीं करेंगे अत: वे बल्वा के दोषी नहीं होंगे|

7. सामान्य उद्देश्य (Common object):-
(i) उद्देश्य से तात्पर्य लक्ष्य से है;
(ii) सामान्य उद्देश्य एक सामान्य लक्ष्य है;
(iii) सामान्य उद्देश्य एक संबंधता इंगित करता है;
(iv) सामान्य उद्देश्य से तात्पर्य एक ही उद्देश से नहीं है;
(v) सामान्य उद्देश एक उत्प्रेरणा देता हैं;
(vi) सामान्य उद्देश को भिन्न – भिन्न मस्तिष्क या भिन्न ढंगों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है;
(vii) सामान्य उद्देश्य महत्वपूर्ण है उसका विस्तार नहीं;
(viii) सामान्य उद्देश्य तथ्य एवं परिस्थितियों का प्रश्न हैं;
(ix) सामान्य उद्देश्य स्पष्ट करार द्वारा निर्मित हो सकता है (यद्धपि करार आवश्यक नहीं है);
(x) सामान्य उद्देश्य निर्मित हो जाने के बाद नये व्यक्ति उसमें शामिल हो सकते हैं;
(xi) सामान्य आशय बाद में संशोधित प्रवर्तित या परिव्यक्त किया जा सकता है;
(xii) सामान्य आशय तथा सामान्य उद्देश्य अतिव्यापित हो सकते हैं;
(xiii) सामान्य उद्देश्य में पूर्व योजना अपेक्षित नहीं हैं;
विधि विरुद्ध उद्देश्य घटनास्थल पर भी उत्पन्न हो सकता है|
8. धारा 34 तथा 149 में अंतर:-
धारा 34 धारा 149
1. यह अपेक्षाकृत संकीर्ण है 1. यह अपेक्षाकृत व्यापक है
2. सामान्य आशय का अग्रसरण इसका 2. विधि विरुद्ध जमाव के किसी सदस्य द्वारा
मूल तत्व है उस सामान्य उद्देश्य का अग्रसरण इसका
मूल तत्व है
3. यह कोई सारवान अपराध सृजित 3. यह सारवान आपराध सृजित नहीं
नहीं करती है यह प्रक्रिया या करती है
साक्ष्य का नियम है
4. न्यूनतम दो व्यक्ति अपेक्षित है 4. विधि विरुद्ध जमाव आवश्यक है अत:
न्यूनतम 5 सदस्य होने चाहिए
5. सामान्य आशय की कोई निधित 5. सामान्य उद्देश्यों की संख्या (प्रकार) धारा
संख्या नहीं है 41 में निर्धारित है
6. अभियुक्तगण की भागीदारी 6. इसमें आवश्यक नहीं है, सदस्यता (विधि
आवश्यक है विरुद्ध जमाव) आवश्यक है
इत्या सहित डकैती ————————————- S. 396
1) संयुक्तत: डकैती कर रहें 5 या अधिक व्यक्तियों में से किसी एक द्वारा डकैती करने में की गई इत्या हेतु वे सभी व्यक्ति दायी होंगे|
2) दंड:-
(i) मृत्यु
(ii) आजीवन कारावास
(iii) 10 वर्ष तक सश्रम कारावास तथा
(iv) अर्थदंड भी
रात्रौ प्रच्छन्न गृह अतिचार या रात्रौ गृह भेदन में संयुक्त व्यक्ति दंडनीय होंगे यदि उनमें से एक मृत्यु या घोर अपहती कारित करता है ———— S. 460
(i) रात्रौ प्रच्छन्न गृह अतिचार या रात्रौ गृह भेदन के समय ऐसे अपराध के दोषी व्यक्ति द्वारा स्वेच्छया किसी व्यक्ति की मृत्यु या किसी व्यक्ति को घोर अपहती कारित करने या उसका प्रयत्न करने पर उसके साथ संयुक्त्त: संप्रक्त प्रत्येक व्यक्ति दायी होगा|
(ii) दंड:-
a) आजीवन कारावास
b) 16 वर्ष का सश्रम कारावास तथा
c) दंड भी (अर्थदंड)|


सामान्य:-
1. अध्याय IV (sec. 76-106) साधारण अपवादों का प्रावधान करता है साधारण अपवाद सामान्य प्रतिरक्षायें यह अदोषिता की शर्तें नियत करता है अत: ऐसा व्यक्ति (अभियुक्त) जिसका प्रकरण अध्याय IV की परिधि में है वह दोषमुति की परिधि में होगा|
2. अध्याय IV साक्ष्य के नियम प्रावधानित करता है वस्तुत: यह खंडनीय / अखंडनीय प्रकाल्पनाओं से प्रेरित है इस अध्याय का आधार निम्न है-
i. दुराशय का अभाव
ii. दुराशय की विद्यमानता किन्तु कृत्य की तुच्छता
iii. दुराशय की विद्यमानता किन्तु कृत्य का औधित्यपूर्ण होना चाहिए
3. अध्याय-IV के उपबंध sec.6 तथा 40 I.P.C एवं धारा 105 I.E.A के साथ पठनीय है
i. संहिता की परिभाषाओ को अपवादों के अधीन समझा जाना चाहिये —————– धारा 6
ii. अध्याय-IV के प्रयोजनों हेतु अपराध की परिभाषा ————————————– धारा 40
iii. यह सिद्ध करने का भार कि अभियुक्त का प्रकरण अपराधों के अंतर्गत आता है — धारा 105 I.E.A
4. धारा 6 I.P.C:-
i. संहिता में डी गई प्रत्येक दांडिक परिभाषा तथा प्रत्येक दांडिक उपबंध तथा ऐसी परिभाषा तथा उपबंधों के प्रत्येक दृष्टांत साधारण अपवादों के अधीन है [यद्धपि साधारण अपवादों को ऐसी परिभाषाओं, उपबंधों को दोहराया नहीं गया है]
ii. धारा 6 I.P.C की प्रकृति:-
a) यह संहिता के निर्वधन की कुंजी है
b) यह संपूर्ण संहिता को नियंत्रण करती है
c) यह आज्ञापक है [Abdul Latif 1981 Guwahati]
d) संभवत: धारा 6 को अनुचित स्थान पर रखा गया है इसे अध्याय-IV में ही समायोजित किया जाना चाहिये [Dhan singh]
5. धारा 40 के उपबंध:-
i. धारा 40 में अपराध शब्द की त्रिस्तरीय परिभाषा दी गई है|
ii. अपराध से अभिप्रेत है संहिता द्वारा दंडनीय कोई कृत्य [संविर्ण परिभाषा]
iii. अपराध से अभिप्रेत है संहिता, विशेष या किसी स्थानीय विधि कृत्य [व्यापकतम परिभाषा]
iv. अपराध से अभिप्रेत है संहिता द्वारा दंडनीय या विशेष या स्थानीय विधि के अंतर्गत 6 माह या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय अपराध, अर्थदंड संहिता या रहित [व्यापक प्ररिभाषा]
अध्याय-IV के प्रयोजनों हेतु अपराध से अभिप्रेत है संहिता या विशेष या किसी स्थानीय विधि के अंतर्गत दंडनीय कृत्य से है अत: अध्याय-IV के प्रयोजनों हेतु अपराध शब्द व्यापक अर्थों में पर्युक्त है दूसरे शब्दों में अध्याय IV की पहुंच विशेष विधि तथा स्थानीय विधि तक है|
6. धारा 105 साक्ष्य अधिनियम:-
i. यह धारा सिद्ध भारिता प्रथा प्रकल्पना [पूर्ण तथा खंडनीय] प्रावधानित करती है
ii. यह धारा केवल दांडिक मामलों में प्रयोज्य है
iii. इस धारा के अनुसार:-
a) उन तथ्यों एवं परिस्थितियों जो प्रकरण को विशेष अपवाद या
b) साधारण अपवाद या परंतुक के अधीन करती है, अभियुक्त पर होगा
c) न्यायालय ऐसे तथ्य एवं परिस्थितियों को अनस्तित्व प्रकल्पित करेगा
iv. धारा 105 द्वारा प्रावधानित प्रकल्पना खंडनीय तथा कमजोर है अत: उपलब्ध साक्ष्य से यह दर्शित होने पर की अभियुक्त का प्रकरण साधारण अपवाद, विशेष अपवाद या पुस्तक में आता है न्यायालय अभियुक्त को दोषमुक्त करने हेतु बाध्य होगा भले ही अभियुक्त ने सिद्ध भारिता का निर्वाह न किया हो [खगेश्वर पुजारी 1984 तथा संध्या रानी 1977]
v. उपरोक्त नियम का औधित्य:-
a) धारा 105 प्रक्रित्यात्मक तथा तकनीकी है, जबकि साधारण अपवाद तथा धारा 6 I.P.C सारवान तथा आज्ञापक है| अत: धारा 105 को इस प्रकार निर्वाचित नहीं किया जा सकता है कि सारवान विधि के प्रक्रियात्मक उपबंध पराजित हो जाए|
b) साधारण अपवाद लाभदायी उपबंध है| अत: इन्हें निर्वाचित करते समय आशयित लाभार्थी को लाभ पहुंचाने का प्रत्येक संभव उपाय किया जाना चाहिये|
साधारण अपवादों की योजना तथा वर्गीकरण:-
1. अध्याय IV (sec. 76-106) के उपबंधों को निम्न दो स्थल वर्गों में विभाजित किया जा सकता है|
i. क्षम्य प्रतिरक्षाये या दुराशय विहीनता के मामले —— sec. 76-94 r/w sec. 95
ii. औधित्यपूर्ण प्रतिरक्षायें ———————————– sec. 96-106
2. क्षम्य प्रतिरक्षायें [Excurable defences, दुराशय विहीनता या कृत्य की तुच्छता]
क्षम्य प्रतिरक्षा [दुराशय विहीनता] के मामले:-
a) तथ्य की मूल ———————————– sec. 76, 79
b) न्यायिक कृत्य ———————————- sec. 77, 78
c) दुर्घटना या दुर्भाग्य —————————– sec. 80
d) आवश्यकता ————————————– sec. 81
e) बालक का कृत्य [मानसिक अपरिपक्वता] —- sec. 82, 83
f) अस्वेच्छिक म्द्त्ता —————————— sec. 85, 56
g) धितविकृत —————————————- sec 84
h) सश्मती ——————————————– sec. 87-91
i) आपात परिस्थितियां [सहमति के बिना] ——- sec. 92, 93, 94
j) कृत्य की तुच्छता ——————————— sec. 95
3. औचित्यपूर्ण प्रतिरक्षायें [आत्मरक्षा का अधिकार]
i. आत्मरक्षा के अधिकार से सम्बंधित सामान्य उपबंध —– s. 96-99
ii. शरीर के आत्मरक्षा के विशेष मामले ———————– s. 100-102 r/w 106
iii. संपत्ति के आत्मरक्षा के मामले —————————- s. 103-105
तथ्य की भूल के कारण विधित: आबद्ध या विधित: औचित्यपूर्ण समझते हुए किया गया कृत्य —s.
1. धारा 76 तथा 79 I.P.C लैटिन सुवित्त Ignorantia facts excusat, Ignorantia Juris non execusat अर्थात तथ्य की भूल क्षम्य हो सकती है, किन्तु विधि की भूल क्षम्य नहीं है, पर आधारित है| तथ्य की भूल एक प्रतिरक्षा है| यह सशर्त प्रतिरक्षा है| अभियुक्त द्वारा किया गया कृत्य सद्भावनापूर्ण विश्वास के अधीन होने पर ही क्षम्य होगा| सद्भावना से तात्पर्य सम्यक सतर्कता तथा सावधानी से है|
2. विधि की भूल कोई (mof) कोई प्रतिरक्षा नहीं है इसका आधार यह प्रकल्पना है कि प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र की विधि से अवगत है यह प्रकल्पना निश्चायक है इसका आधार लोकनीति है| विधि की भूल को एक प्रतिरक्षा मानना विधियों को व्यवहारत: अस्तित्वविहीन बना देगा परिणामत: समाज का संचालन असंभव हो जायेगा|
3. धारा 76 I.P.C के उपबंध:-
i. कोई बात अपराध नहीं है जो किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाए-
a) जो उसे करने हेतु विधि द्वारा आबद्ध है
ii. a) जो तथ्य की भूल के कारण, न की विधि की भूल के कारण किया गया हो
b) सद्भावना पूर्वक यह विश्वास करता है कि वह उसे करने हेतु विधि द्वारा आबद्ध है|
दृष्टांत:-
a) Soldier
b) process- executor (W.D.A)

Superior commercial (fire) Court

Soldier Warrant
Fire अन्धापालन है तो X A
S. 76 का लाभ नहीं B

4. धारा 79 के उपबंध:-
(i) “कोई बात अपराध नहीं है जो किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाये-
a) जो उसे करने के लिए विधि द्वारा न्यायानुमत है,
(ii) a) जो तथ्य की भूल के कारण, न कि विधि की भूल के कारण किया गया हो
b) सद्भावनापूर्वक यह विश्वास करता है कि वह उसे करने हेतु विधि द्वारा न्यायनुमत है|

Illustration:-
a) य एक ऐसा कार्य करता है जो क को प्रथम दृष्टया हत्या प्रतीत होता है| क सद्भावनापूर्वक अपने श्रेष्ट निर्णय के अनुसार उस शक्ति के अधीन कार्य किया जो विधि ने ह्त्याकारियों को पकड़ने के लिए समस्त व्यक्तियों को दे रखा है य को उचित प्राधिकारियों के समक्ष ले जाने के लिए ‘य’ को अभिग्रहित करता है| क ने कोई अपराध नहीं किया|
5. तथ्य की भूल [M.O.F]:-
(i) तथ्य की भूल से तात्पर्य सारवान तथ्य की भूल से है सारवान तथ्य वह है जो अपराध के गठन हेतु आवश्यक है|
(ii) तथ्य की भूल एक सशर्त प्रतिरक्षा है यह पूर्ण प्रतिरक्षा नहीं है तथ्य की भूल सद्भानापूर्ण होना चाहिए
(iii) तथ्य की भूल क्षम्य है यदि-
a) यह सद्भावनापूर्ण है
b) यह सारवान तथ्य के सम्बन्ध में है
(iv) तथ्य की भूल क्षम्य है इसका तार्किक आधार यह है कि-
a) अभियुक्त दुराश्य मुक्त होता है
b) अभियुक्त सतर्क एवं सावधान है
(v) उपेक्षावान या उतावला व्यक्ति तथ्य की भूल की प्रतिरक्षा का अधिकारी नहीं है [भले ही वह व्यक्ति अन्यथा निष्ठावान रहा हो]
6. भूल क्या है?
(i) ‘भूल’ अज्ञानता की एक प्रजाति है दूसरे शब्दों में प्रत्येक भूल अज्ञानता है किन्तु प्रत्येक अज्ञानता अनिवार्यता: भूल नहीं है|
(ii) सामण्ड ने अज्ञानता के दो प्रकार बतायें हैं-
a) साधारण अज्ञानता और
b) भूल
“अज्ञानता साधारण” [Ignorentia sin-plicitor] में व्यक्ति का मस्तिष्क रिक्त होता है, जबकि भूल में व्यक्ति का मस्तिष्क असत्य ज्ञान या सूचना से भरा होता है|
(iii) SANDFORD v/s BEEL 1899:
Held:- “भूल एक त्रुटिपूर्ण मानसिक दशा है| Lord Russel के अनुसार, भूल एक चूक है योजनाबद्ध नहीं, बल्कि संयोगवश [Lord Russel]|”
7. विधि की भूल
(i) विधि की भूल क्षम्य नहीं है| विधि की भूल कोई प्रतिरक्षा नहीं है यह दांडिक दायित्व में रियायत का आधार हो सकती है [Chaman Lal 1940 Lahore]
(ii) “विधि की भूल” तथा “विधि की अज्ञानता” दो भिन्न चीजें हैं इनमें तकनीकी तथा सूक्ष्म भेद है भूल में कार्यशीलता [Action] होता है| अज्ञानता में निष्क्रियता [Inaction] होती है|
(iii) विधि की भूल क्षम्य नहीं है| यह लोकनीति पर आधारित व्यवस्था है यह प्रकल्पित किया जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र की विधि से अवगत है यह प्रकल्पना निश्चायक तथा अखंडनीय है| यह प्रकल्पना इंगित करती है कि विधि सदैव सत्य का अनुसरण नहीं करती है|
8. “विधि द्वारा आबद्ध” तथा विधि द्वारा न्यायनुमत”
(i) विधि द्वारा आबद्ध वैधानिक आभार इंगित करता है|
(ii) विधि द्वारा न्यायनुमत से तात्पर्य विधि द्वारा 3 निशिद्ध से है|
9. सद्भावनापूर्वक [good faith] ————— S. 52 I.P.C
(i) “सद्भावना” पद धारा 52 I.P.C में परिभाषित है यह परिभाषा Cr.P.C पर ही लागू होगी [धारा 2(y) Cr.P.C]
(ii) धारा 52 के अनुसार-
“कोई बात सद्भावनापूर्वक की गई या विश्वासपूर्वक की गई नहीं की जाती है जो किसी सम्यक सतर्कता तथा सावधानी के की गई है या विश्वास से की गई हो|”
(iii) सद्भावना शब्द सामान्य उपखंड अधिनियम की धारा तीन में भी परिभाषित है यह परिभाषित सिविल मामलों में लागू होगी|
(iv) सत्य की अनदेखी करने वाला व्यक्ति धारा 76 या 79 का लाभार्थी नहीं हो सकता है| दूसरे शब्दों में स्वेच्छिक अज्ञानता कोई प्रतिरक्षा नहीं है|
(v) वरिष्ठ के समादेशों का अन्धापालन क्षमा योग्य नहीं होगा|
10. निर्णय:-
(i) Khora Ghasi 1978
(ii) Rajkapoor v/s Laxman 1980 S.c
(iii) S.S Sahay v/s Md. Fazeel Khan 1868

(i) Khora Ghasi- अभियुक्त रात्रि में खेत की रखवाली कर रहा था देर रात उसने खेत में सरसराहट सुना उसने जानवर समझते हुए एक गतिशील वस्तु पर तीर चला दिया वह चीज एक मानव था [जो चोरी के आशय से खेत में घुसा था]|
Held:- ‘अभियुक्त का कृत्य S. 76 या 79 या 80 के अंतर्गत क्षम्य था|’
(ii) Rajkapoor v/s Laxman फिल्म निर्माता राजकपूर ने सत्य शिवम् सुन्दरम के प्रदर्शन हेतु सेंसर बोर्ड से प्रमाण पत्र लिया था उन्हें धारा 292 I.P.C के अंतर्गत आभियोजित किया गया|
(iii) S.S Sahay v/s Md. Fazeel khan, 1868 एक पुलिस अधिकारी के पिता का घोड़ा चौरी चला गया था अभियुक्त पुलिस अधिकारी ने वैसा ही एक घोड़ा एक व्यक्ति के न्यायिक कृत्य —— धारा 77, 78
1. धारा 77 तथा 78 क्रमश: निम्न. से सम्बंधित है:-
(i) न्यायाधीश का कृत्य जबकि वह न्यायिकत: कारित है
(ii) न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कृत्य|
2. धारा 77 के उपबंध:-
“कोई बात अपराध नहीं है, जो-
(i) न्यायिकत: कार्य करते हुए
(ii) न्यायाधीश द्वारा
(iii) “ऐसी शक्ति के प्रयोग में की जाती है हो उसे विधि द्वारा प्रदत्त है या जिसके बारे में उसे सद्भावनापूर्ण विश्वास है कि वह उसे विधि द्वारा प्रदत्त है|”
3. धारा 78 के उपबंध:-
“कोई बात, जो-
(i) (a) न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में की जाए
(b) न्यायालय के निर्णय आदेश द्वारा अधिदिष्ट (Warranted) हो
(ii) यदि वह बात उस निर्णय या आदेश के प्रवृत रहने के दौरान की जाए चाहे न्यायालय को ऐसा निर्णय/आदेश देने की अधिकारिता न रही हो, अपराध नहीं है
(iii) परन्तु यह तब जबकि वह कार्य करने वाला व्यक्ति सद्भावनापूर्वक यह विश्वास करता हो कि उस न्यायालय को वैसी क्षेत्राधिकारिता थी|
4. न्यायाधीश के कौन से कृत्य क्षम्य है?
(i) विधि द्वारा प्रदत्त शक्ति के प्रयोग में न्यायिकत: किया गया कृत्य
(ii) न्यायिकत: किया गया कृत्य जबकि यह सद्भावनापूर्ण रहा हो कि यह विधि द्वारा प्राप्त अधिकार है| क्षेत्राधिकार के अनियमित प्रयोग में न्यायाधीश का किया गया कृत्य क्षम्य है क्षेत्राधिकार के सद्भावनापूर्ण अतिलंघन में किया गया कृत्य की क्षम्य है [मेघराज बनाम जाकिर 1975 इलाहाबाद]
न्यायाधीश द्वारा अधिकारिता कृत्य करने के दौरान की गई मानहानिकारक टिप्पणी संरक्षित नहीं है [कमला पटेल बनाम भगवान दास 1934 नागपुर]
5. धारा 78 के अंतर्गत कौन से कृत्य क्षम्य हैं?
(i) प्रवृत निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कृत्य;
(ii) न्यायालय के प्रवृत निर्णय या आदेश द्वारा अधिदिज्य कृत्य;
(iii) क्षेत्राधिकार विहीनता में कारित आदेश या निर्णय द्वारा अधिदिष्ट या उसके अनुसरण में किया गया कृत्य [यदि अभियुक्त द्वारा किया गया कृत्य इस सद्भावना पूर्ण विश्वास के अधीन हो कि न्यायालय को क्षेत्राधिकार था]
धारा 78, पूर्ववर्ती, धारा 77 का आवश्यक परिणाम है|
दुर्घटना या दुर्भाग्य जनित कृत्य [Defence of accident] ———— धारा 80
1. धारा 80 दुर्घटना की प्रतिरक्षा प्रावधानित करती है दुर्भाग्य या दुर्घटनावश फलित कृत्य दुराशय मुक्त समझे जाते है| विधि इस बात को स्वीकार करती है कि मानवीय जीवन में दुर्घटना तथा दुर्भाग्य अपरिहार्य है|
2. दुर्घटना या दुर्भाग्य की प्रतिरक्षा पूर्ण प्रतिरक्षा नहीं है यह सशर्त प्रतिरक्षा है| शर्तें धारा 80 में प्रावधानित है|
3. धारा 80 के उपबंध:
“कोई बात अपराध नहीं है जो-
(i) दुर्घटना या दुर्भाग्य से हो जाती है,
(ii) किसी आपराधिक आशय या ज्ञान के बिना-
(a) विधिपूर्ण ढंग से
(b) विधिपूर्ण साधनों द्वारा
(c) उचित सतर्कता व सावधानी के साथ
(d) विधिपूर्ण कार्य करने में हो जाती है|
दृष्टांत:
दुर्घटना या दुर्भाग्य:-

1. कोई प्रभाव दुर्घटना जनित कहा जाता है यदि कृत्य उक्त प्रभाव उत्पन्न करने के आशय से न किया गया हो| प्रभाव तब की दुर्घटनाजनित माना जाएगा जबकि वह अभियुक्त के कृत्य से पूर्वानुमान योग्य नहीं था|
2. कोई क्षति दुर्घटनाजनित कहीं जाती है जबकि वह साशय या संज्ञान या उपेक्षापूर्वक न की गई हो|
3. दुर्घटना में कुछ अप्रयाशित या अपूर्वानुमान योग्य बात अंतनिर्हित होती है दुर्घटना, चीजों के सामान्य अनुक्रम से बाहर घटित होती है|
4. दुर्घटना तथा दुर्भाग्य समानार्थी नहीं है प्रत्येक दुर्घटना दुर्भाग्यपूर्ण हो सकती है किन्तु प्रत्येक दुर्भाग्यपूर्ण बात अनिवार्यत: दुर्घटना नहीं है|
दुर्घटना या दुर्भाग्य से फलित क्षति निम्नलिखित शर्तों के अधीन क्षम्य है:-
(i) अभियुक्त का कृत्य आपराधिक आशय या ज्ञान से मुक्त रहा हो
(ii) अभियुक्त विधिसम्मत कार्य विधिपूर्ण ढंग से, विधिपूर्ण साधनों द्वारा तथा उचित सतर्कता तथा सावधानी के साथ कर रहा हो|
CASES:-
(i) Khora Ghasi, 1978
(ii) Ranga swami, 1952
(iii) K.M. Nanawati, 1962 S.C.

(i) Khora Ghasi 1978:
अभियुक्त रात्रि में खेत की रखवाली कर रहा था| देर रात उसने खेत में सरसराहट सुना उसने जानवर समझते हुए एक गतिशील वस्तु पर तीर चला दिया वह चीज एक मानव था [जो चोरी के आशय से खेत में घुसा था]|
Held:-‘अभियुक्त का कृत्य S. 76 या 79 या 80 के अंतर्गत क्षम्य है’|
(ii) Ranga Swami, 1952
अभियुक्त ने बिना लाइसेंस की बन्दूक से गोली चलाया था|
Held:- “मात्र उस कारण अभियुक्त को धारा 80 के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता|”
(iii) K.M. Nanawati, 1962 S.C
Held:- ‘दुर्घटना की प्रतिरक्षा अभिवधित करने वाले व्यक्ति को दुर्घटना सिद्ध करनी होगी न्यायालय दुर्घटना का अभाव प्रकल्पित करेगा प्रकल्पना खंडनीय होगी|’
आवश्यकता की प्रतिरक्षा ————– धारा 81
1. धारा 81 I.P.C आवश्यकता की प्रतिरक्षा प्रावधानित करती है आवश्यकता पूर्ण प्रतिरक्षा नहीं है यह सशर्त प्रतिरक्षा है|
2. धारा 81 I.P.C लैटिन सुक्ति Quod necessitas non habet legem अर्थात विधि आवश्यकता के अधीन किया गये कृत्य को उचित मानती है, पर आपराधिक है|
3. आवश्यकता की प्रतिरक्षा की आलोचना की गई है आलोचना का मुख्य कारण यह है कि इस प्रतिरक्षा की सीमायें नियत करना कठिन है| कुछ विधिक प्रणालियों में इस प्रतिरक्षा का समर्थन किया गया है जबकि कुछ अन्य में इसे उचित नहीं माना गया है|
4. नीतिगत आधार:-
“जहाँ अचानक एवं परम आपात में दो बुराइयों में से एक अपरिहार्य हो, वहां घटनाओं को इस प्रकार निर्देशित करना कि उनमें से छोटी बुराई ही भुगतनी पड़े न केवल युक्ति संगत एवं व्यवहारिक होगा बल्कि विधिसम्मत भी होगा|” [Henerymen]
5. धारा 81 के उपबंध:-
“कोई बात मात्र इस कारण अपराध नहीं है कि वह इस ज्ञान के साथ की गई है कि उससे अपहानि संभाव्य है, यदि-
(i) वह अपहानि कारित करने का आपराधिक आशय नहीं था, तथा
(ii) वह व्यक्ति या संपत्ति को अन्य अपहानि के निवारण या परिवर्जन के प्रयोजनों हेतु,
(iii) सद्भावनापूर्वक की गई है|
स्पष्टीकरण:-
यह तथ्य का प्रश्न होगा कि क्या निवारणीय या परिवर्जनीय अपहानि की प्रकृति तथा आसम्मता के परिप्रेक्ष्य में जानते हुए संभाव्य अपहानि का जोखिम उठाना न्यायानुमत या क्षम्य था|
दृष्टान्त:-
(i) SHIP
(ii) FIRE
आवश्यकता की प्रतिरक्षा का क्षेत्र:-
1. धारा 81 आवश्यकता की प्रतिरक्षा प्रावधानित करती है| दुराशय का आभाव, सद्भावनापूर्ण कृत्य तथा बड़ी अपहानि के निवारण या परिवर्जन का उद्देश्य इस प्रतिरक्षा का मूल तत्व है|
2. Sergant Pollard के अनुसार-
“आवश्यकता के अधीन की गई बातें विधि के शब्दों को भंग करने के बावजूद विधि को भंग नहीं करती है| ऐसे मामलें में विधि के शब्द तो भंग हो सकते हैं किन्तु विधि का आशय भंग नहीं होता| ऐसे मामले विशेषाधिकृत होने के कारण दंडनीय नहीं होते है|”
3. आत्मसंरक्षण की आवश्यकता [Necessity of self- preservation]:-
(i) आत्म संरक्षण एक आवश्यकता है यह एक बहुत बड़ी आवश्यकता हैं, किन्तु यह पूर्ण आवश्यकता नहीं है अत: आत्मसंरक्षण के आधार पर किसी निर्दोष व्यक्ति का वध करने की अनुमति नहीं दी जा सकती [R. v/s dudely and stephen, 1884]|
बालक का कृत्य [Act of a Child] ———– धारा 82, 83
1. धारा 82 तथा 83 बालक के कृत्य से सम्बंधित है धारा 82 7 वर्ष से कम आयु के बालक के कृत्य से सम्बंधित है धारा 83 7 वर्ष से ऊपर किन्तु 12 वर्ष के कम आयु के बालक के कृत्य से सम्बंधित है|
धारा 82 के उपबंध
ऐसी कोई बात अपराध नहीं है जो 7 वर्ष के कम आयु के बच्चे द्वारा की जाती है”
7 वर्ष से कम आयु का बालक आपराधिक सक्षमता नहीं रखता है यह एक निश्चायक प्रकल्प है यह एक
अखंडनीय प्रकल्पना है अभियुक्त बालक 7 वर्ष से कम आयु का है यह अभियोजन के प्रत्येक प्रश्न का पूर्ण उत्तर होगा|
धारा 83 के उपबंध:-
“ऐसी कोई बात अपराध नहीं है जो 7 वर्ष से ऊपर तथा 12 वर्ष से कम आयु के ऐसे बालक के द्वारा की जाती है जिसकी समझ इतनी परिपक्व नहीं है कि वह उस अवसर पर अपने आचरण की प्रकृति तथा परिणामों का निर्णय कर सके|”
धारा 83 I.P.C लैटिन सुक्ति Malitia suppet actatem अर्थात दुर्भावना आयु की न्यूनता को अनुपूरित करती है पर आधारित है| धारा 83 आपवादिक अपरिपक्वता से सम्बंधित है| सामान्यत: 7 वर्ष से अधिक किन्तु 12 वर्ष से कम के बालक के पर्याप्त होने की प्रकल्पना की जाती है| अत: अपरिपक्वता सिद्ध करने का भार बचाव पक्ष पर होगा|
CASES:-
(i) Lakhini Agradanini, 1874
(ii) Mukul Shah, 1866
(iii) Ulla Mahapatra, 1950
(iv) Krishna, 1883
(i) Lakhini Agradanini, 1874
Held:- अभियुक्त बालक 7 वर्ष से कम आयु का है यह अभियोजन के प्रत्येक प्रश्न का पूर्ण उत्तर है| 7 वर्ष से अधिक किन्तु 12 वर्ष से कम आयु का बालक अपने कृत्य की प्रकृति तथा उसके परिणाम को समझने की क्षमता रखता है| यह प्रकल्पना है ऐसे बालक का कृत्य साशय समझा जायेगा|
(ii) Mukul Shah, 1866
छ: वर्षीय बालक ने एक कपड़ा उठा लिया उससे, अभियुक्त ने यह कपड़ा क्रय कर लिया अभियुक्त को धारा 411 I.P.C के अंतर्गत अभियोजित किया|
Held:- चूंकि अभियुक्त का कृत्य चोरी नहीं था अत: प्रश्नगत कपड़ा चोरी का माल नहीं था अत: धारा 411 I.P.C के अंतर्गत दायित्व नहीं होगा अभियुक्त को धारा 403 के अंतर्गत दाई सिद्ध किया गया|
(iii) Ulla Mahapatra, 1950
11 वर्षीय बालक ने एक चाकू उठाया उसने पीड़ित को मार डालने की धमकी दी| बालक ने वास्तव में चाकू घोंपकर पीड़ित को वद्ध कर दिया अभियुक्त दायी ठहराया गया|
(iv) Krishna, 1883
9 वर्षीय बालक ने एक हार चुराया उसने बहुत शीघ्रता से उसे अभियुक्त के हाथ कम दाम में बेच दिया|
Held:- बालक पर्याप्त परिपक्व या वह दोषसिद्धि के योग्य है|
भारतीय तथा आंगल विधि में भेद:-
भारतीय विधि आंगल विधि
1. आयु:- 1. आयु:-
(i) 7 से कम (i) 10 वर्ष से कम
(ii) 7 वर्ष से ऊपर किन्तु 12 वर्ष (ii) 10 वर्ष से ऊपर किन्तु 14
से कम वर्ष के अंदर
2. बालक दायी हो सकता है- 2. बालक दायी नहीं होगा
(i) बलात्कार तथा (i) बलात्कार तथा
(ii) लैंगिक अपराध (ii) लैंगिक अपराध
3. संरक्षण का विस्तार संविर्ण है| 3. संरक्षण का विस्तार अपेक्षाकृत
कम है|

चितविकृति की प्रतिरक्षा —————- धारा 84
1. धारा 84 I.P.C चितविकृति की प्रतिरक्षा प्रावधानित करती है चितविकृति की प्रतिरक्षा कोई पूर्ण प्रतिरक्षा नहीं है यह एक सशर्त प्रतिरक्षा है|
2. धारा 84 I.P.C Mc Naughten’s के प्रकरण, 1843 H.L पर अधारित है इस प्रकरण में निम्न. बिंदु अवधारित किये गये-
(i) प्रत्येक व्यक्ति स्वस्थ्यचित, विवेकपूर्ण तथा तार्किक सामर्थ्य से युक्त समझा जाता है [जब तक अन्यथा सिद्ध न हो जाये]
(ii) चितविकृति विभ्रम [Insane delusion] से ग्रस्त व्यक्ति का कृत्य क्षम्य है|
(iii) अभियुक्त दायी होगा यदि उसे यह ज्ञान था कि वह जो कुछ कर रहा है वह उसे नहीं करना चाहिये था कि उसका कृत्य विधि विरुद्ध है|
(iv) विधिक चितविकृति:-[अर्थात – असमर्थता]
(a) विधिक चितविकृति, चितविकृति जनित असामर्थ्य है
(b) अभियुक्त को यह सिद्ध करना होगा कि परिवादित कृत्य किये जाते समय, चितविकृति के कारण वह
तार्किक दोष से ग्रसित हो गया था|
(c) अभियुक्त यह जानने में असमर्थ हो गया था कि उसके कार्य की प्रकृति क्या है या कि जो कुछ वह कर
रहा है वह अपकारपूर्ण या विधि विरुद्ध है|
(v) ऐसे चिकित्स्य साक्षी की राय नहीं ली जानी चाहिये जिसने अभियुक्त को पहले नहीं देखा है|
3. धारा 84 के उपबंध:-
“कोई बात अपराध नहीं है जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है, जो-
(i) उसे करते समय
(ii) चितविकृति के कारण
(iii) यह जानने में असमर्थ है कि –
(a) उसके कार्य की प्रकृति क्या है या
(b) जो कुछ वह कर रहा है वह या तो अपकारपूर्ण है या विधि विरुद्ध है|”
4. धारा 84 का विश्लेषण:-
(i) “परिवादित कृत्य करते समय”-
(a) बचाव पक्ष को यह सिद्ध करना होगा कि वह परिवादित कृत्य करते समय विधिक चितविकृति से ग्रस्त था|
(b) धारा 84 के प्रयोजनों हेतु सुसंगत समय बिंदु का विशेष महत्व है अत: ऐसा अभियुक्त इस धारा का
लाभार्थी नहीं होगा जो सुसंगत समय बिंदु पर चितविकृत नहीं था|
(c) Nota Ram, 1866
Held:- “अभियुक्त धारा 84 का लाभार्थी नहीं होगा भले ही वह विचारण के समय विधिक चितविकृति से ग्रसित था धारा 84 का लाभ उसे प्राप्त होगा जो परिवादित कृत्य करते समय विधिक चितविकृति से ग्रसित था|”

(ii) “चितविकृति के कारण:-
a) चितविकृति एक व्यापक शब्द है इसमें नैसर्गिक तथा जन्मजात चितविकृतियों के साथ-साथ शारीरिक या
मानसिक असामान्यता [Non compes mentis] अन्य मामले की शामिल है|
b) जड़ता [Idiocy] जन्मजात चितविकृति है यह जन्मजात होती है तथा असाध्य है Archbold and Russel ने
ऐसे व्यक्ति को जड़ माना है जो अपने माता – पिता के नाम, सप्ताह के दिन, वर्ष के माह नहीं बता सकता है
या जो 20 तक गिनती नहीं गिन सकता है|
c) “पागलपन” एक प्रकार की अर्जित चितविकृति है| इसमें पीड़ित की स्थिति में सुधार की संभावना रहती है यह
पाय: साध्य की है| यह जन्मजात न होकर बाद की परिस्थितियों से उत्पन्न होती हैं|
d) असामान्य मानसिक स्थिति [Non compes mentis] अस्थायी मानसिक रुग्णता है|
e) अत्यधिक मदिरापान से “delerium tremens” तथा alcholic dementies जैसे रोग उत्पन्न हो सकते है| इन
रोगों से ग्रस्त व्यक्ति का मस्तिष्क स्थायी रूप से प्रभावित हो सकता है| ऐसे व्यक्ति की Mc Naughtens के
प्रकरण में प्रतिपादित सिद्धांत एक लाभार्थी हो सकते है|
f) Stephen के अनुसात चितविकृति शब्द सारत: पागलपन के समतुल्य है| कुछ दूसरे विधिशास्त्री चितविकृति को
पागलपन से व्यापक शब्द मानते है|
g) मात्र असामान्य विकृत व्यवहार [abnormal or eccentic behaviour] चितविकृति गठित नहीं करता है|
(iii) चितविकृति जनित असमर्थता [legal insanity]
a) विधिक चितविकृति, चितविकृति जनित असामर्थ है|
b) अभियुक्त को यह सिद्ध करना होगा कि परिवादित कृत्य किये जाते समय, चितविकृति के कारण वह तार्किक
दोष से ग्रसित हो गया है|
c) अभियुक्त यह जानने में असमर्थ हो गया था कि उसके कार्य की प्रकृति क्या है या कि जो कुछ वह कर रहा है
वह अपकारपूर्ण या विधि विरुद्ध है|
5. धारा 84 की आलोचना:-
(i) धारा 84 I.P.C विधिक चितविकृति या सामाजिक चितविकृति को मान्यता नहीं देती| यह धारा केवल विधिक चितविकृति से ग्रसित व्यक्ति को दायित्व से मुक्त करती है|
(ii) Mc Naughten’s के प्रकरण में, प्रतिपादित चितविकृति [विधिक] के मानको को समायोजित किया गया है वहाँ The Humicide Act, 1957 पारित किया गया है| इसके अंतर्गत सामाजिक चितविकृति को मान्यता दी गई है| अत: दो मनोरोग विशेषज्ञ द्वारा प्रमाणित कर दिए जाने पर अभियुक्त दांडिक दायित्व में रियायत का अधिकारी होगा|
(iii) धारा 84 I.P.C में की उपरोक्त प्रभाव का समायोजन अपेक्षित है वर्तमान में यह धारा, चिकित्सीय या सामाजिक चितविकृत व्यक्ति के साथ न्याय नहीं करती है|
अस्वैच्छिक मत्तता की प्रतिरक्षा ————— धारा 85 r/w s.86
1) धारा 85 अस्वैच्छिक मत्तता की प्रतिरक्षा प्रावधानित करती है अस्वैच्छिक प्रतिरक्षापूर्ण प्रतिरक्षा नहीं है यह केवल सशर्त प्रतिरक्षा है|
2) स्वैच्छिक मत्तता कोई प्रतिरक्षा नहीं है संभवत: स्वैच्छिक मत्तता दंड में रियायत का आधार हो सकती है|
3) धारा 86 स्वैच्छिक मत्तता से सम्बंधित है व्यवहारत: यह धारा पूर्ववर्ती धारा 85 का परंतुक है धारा 86 विधिक प्रकल्पना से सम्बंधित है स्वैच्छिक मत्त व्यक्ति पर वह ज्ञान आरोपित किया जा सकता है जो उसे होता यदि वह स्वैच्छिक मत्तता के अधीन न होता यह धारा आशय की प्रकल्पना या आशय के अधिरोपन से सम्बंधित नहीं है|
4) धारा 85 का आधार की Mc Naughten के प्रकरण में प्रतिवादित सिद्धांत है| इस सिद्धांत है| इस सिद्धांत के अनुसार अत्यधिक मदिरापान से delerium tremens तथा alcholic dementies जैसा रोग उत्पन्न हो सकते है| इन रोगों से ग्रसित व्यक्ति का मस्तिष्क स्थायी रूप से प्रभावित हो सकता है| ऐसे व्यक्ति की Mc Naughten के प्रकरण में प्रतिपादित सिद्धांत के लाभार्थी हो सकते है|
5) धारा 85 के अंतर्गत स्वैच्छिक मत्तता पतिरक्षा नहीं है कारण यह है कि स्वैच्छिक मत्तता का दुरूपयोग किया जा सकता है स्वैच्छिक मत्तता को प्रतिरक्षा का आधार मानने पर अपराधों की पूर्नावृति तथा अपराधों की संख्या में वृद्धि होगी|
6) 19वीं शताब्दी किए प्रारम्भ तक आंगल सामान्य विधि में मत्तता की प्रतिरक्षा मान्य नहीं थी [Reninger v/s Fuggose] 19वीं शताब्दी के उतरार्ध में अस्वैच्छिक मत्तता जनित पागलपन को प्रतिरक्षा माना गया| ऐसे व्यक्तियों पक्ष में Mc Naughten के प्रकरण में प्रतिपादित सिद्धांत को लागू किया गया| [B case]
7) धारा 85 के अपबंध:-
“कोई बात अपराध नहीं है जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है, जो –
(i) उसे करते समय
(ii) मत्तता (*) के कारण
(iii) यह जानने में असमर्थ है कि –
(a) उसके कार्य की प्रकृति क्या है या
(b) जो कुछ वह कर रहा है वह या तो अपकारपूर्ण है, या विधि विरुद्ध है|
परंतुक:- परन्तु यह तब जबकि मत्तताकारी पदार्थ ज्ञान के बिना या इच्छा के विरुद्ध दिया गया हो|
8) Jethu Ram, 1960
Held:- केवल स्वैच्छिक मत्तता की प्रतिरक्षा है| अस्वैच्छिक से तात्पर्य अज्ञानता या आरोपित बाध्यता के अधीन लिए गये मत्तताकारी पदार्थ से उत्पन्न मत्तता से है|
9) धारा 86, व्यवहारत: धारा 85 का परंतुक है| यह धारा विधिक प्रकल्पना से सम्बंधित है|
10) धारा 86 के अनुसार स्वैच्छिक मत्तता के अधीन किये गये कृत्य के सम्बन्ध में यह प्रकल्पना की जायेगी
की अभियुक्त ने प्रश्नगत कृत्य संज्ञान किया है| अत: अभियुक्त प्रकल्पित ज्ञान के आधार पर दांडिक दायित्व के अधीन होगा|
11) धारा 86 के अंतर्गत आशय की प्रकल्पना नहीं की जा सकती है यह धारा केवल ज्ञान की प्रकल्पना प्रावधानित करती है|
12) Cases:-
(i) NGA SEIN GALE, 1934 RANGOON
(ii) BASUDEO v/s PEPSU, 1956 S.C.

NGA SEIN GALE, 1954 S.C.
अभियुक्त का x के साथ विवाद या अभियुक्त नशे में था| वह घर में से तलवार लेकर सड़क पर भाया उसने चिल्लाकर कहा कि वह x को मार डालेगा एक व्यक्ति y (मृतक) ने अभियुक्त को शांत करने का प्रयास किया| उत्तेजित अभियुक्त ने उसे ही मार दिया 19 की मृत्यु हो गई|
Held:- अभियुक्त पर वह ज्ञान आध्यारोपित किया जायेगा जो उसे होता यदि वह स्वैच्छिक मत्तता के अधीन न होता|
BASUDEO v/s PEPSU, 1956 S.C.
विवाह समारोह चल रहा था| अभियुक्त स्वैच्छिक मत्तता के अहीं ने एक बालक को स्थान छोड़ने को कहा बालक ने मना कर दिया अभियुक्त ने उसपर गोली चला दिया| बालक की मृत्यु हो गई|
Held:- अभियुक्त का कृत्य संज्ञान प्रकल्पित, दिया जाएगा| अत: वह हत्या के लिए दायी होगा|
सहमति की प्रतिरक्षा [Defence of Consent]:-
1. धारा 87, 88, 89, 91 तथा 92 सहमती की प्रतिरक्षा से सम्बंधित है| धारा 90 वैद्ध सहमती की नकारात्मक परिभाषा प्रस्तुत करती है धारा 90 सम्पूर्ण संहिता नियंत्रित करती है|
2. धारा 87 से 92 का वर्गीकरण:-
Classification of provisions as
to “defence of consent”

valid consent consent-when to be consent-when Defence even in
s. 90 a defence s. 87, no defence absence of
88, 89 s. 91 consent s. 92

Exception
वैध सहमति [Valid Consent] ———— धारा 90
1. सहमती वैध न होगी यदि-
(i) यह क्षति के भय के अधीन व्यक्ति द्वारा दी गई है, या
(ii) यदि यह तथ्य के भ्रम से ग्रस्त व्यक्ति द्वारा दी गई है,
(iii) उपरोक्त दोनों परिस्थितियों में दी गई सहमती सभी अवैध होगी जब सहमती के अधीन कार्य करने वाला व्यक्ति यह ज्ञान रखता था या उसके पास ज्ञान करने का कारण था कि सहमती दाता द्वारा दी गई सहमती क्षति के भय के अधीन या तथ्य के भूल के अधीन दी गई है|
(iv) यदि सहमती दाता चितविकृति या मत्तता के कारण उस कृत्य की प्रकृति तथा परिणामों को समझने में असमर्थ है जिसके लिए वह सहमती दे रहा है|
(v) यदि सहमती दाता 12 वर्ष से कम आयु का है|
2. VOLENTI NON FIT INGURIA:-
(i) Volenti Non Fit Inguria अर्थात सहमती की प्रतिरक्षा सिविल तथा आपराधिक दोनों मामलों में मान्य है| सहमती की प्रतिरक्षा पूर्ण प्रतिरक्षा नहीं है|
(ii) संहिता की धारा 87, 88 तथा 89 सुक्ति volenti non fit injuria पर आधारित है| इन धाराओं में प्रावधानित शर्तों के संतुष्ट हो जाने पर निम्न. कृत्य क्षम्य होंगे-
(a) ऐसा कृत्य जिससे अपहानि हो गई है
(b) ऐसा कृत्य जो अपहानि कारित करने के आशय से किया गया था
(c) ऐसा कृत्य जो इस ज्ञान के अधीन किया गया था कि उससे क्षति संभाव्य है|
3. सहमति की प्रतिरक्षा का विधिशास्त्रीय आधार:-
(i) सहमती से किया गया कृत्य समाज में आश्चर्य तो उत्पन्न कर सकता है किन्तु वह समाज में चिंता, घबराहट, उत्तेजना तथा असुरक्षा की भावना उत्पन्न नहीं करता है|
(ii) सहमति प्रतिरक्षा हो सकती है किन्तु यह पूर्ण प्रतिरक्षा नहीं है| सहमति को पूर्ण प्रतिरक्षा मानना लोकहित में नहीं होगा|
(iii) कुछ कृत्य सहमति से स्वतंत्र रहते हुए अपराध होते है ऐसे कृत्य सहमती से वैध नहीं बनाये जा सकते यह नियम भी लोकनीति पर आधारित है|
(iv) आपात परिस्थितियों में उद्देश्य तथा आवश्यकता प्राथमिकता पर होतें है| ऐसे मामलों में सहमति के बिना किया गया कृत्य भी क्षम्य हो सकता है|
धारा 87, 88 तथा 89 के अंतर्गत सहमती की प्रतिरक्षा:-
1) धारा 87, 88 तथा 89 लैटिन सुक्ति “Vlenti non fit injuria” पर आधारित है| इन धाराओं के अंतर्गत सहमती पूर्ण प्रतिरक्षा नहीं है| इनके अंतर्गत सहमति एक सशर्त प्रतिरक्षा है| इन शर्तों को अदोषिता की शर्तें कहा गया है|
2) धारा 87, 88 तथा 89 के अंतर्गत अदोषिता की भिन्न-भिन्न शर्तों के अधीन निम्लिखित कृत्य क्षम्य है
(i) ऐसा कृत्य जिससे अपहानि हो गई है;
(ii) ऐसा कृत्य जो अपहानि कारित करने के आशय से किया किया है;
(iii) ऐसा कृत्य जो इस ज्ञान के अधीन किया गया है कि उससे क्षति संभाव्य है|
3) धारा 87, 88 तथा 89 के अंतर्गत अदोषिता की शर्तों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है|:-
(i) अदोषिता की सामान्य शर्त अर्थात धारा 90 I.P.C के अर्थों में ‘वैद सहमति’;
(ii) अदोषिता की विशिष्ट शर्तें|

धारा 87 के अंतर्गत अदोषिता के प्रतिबंध
Conditions of Non Imputability
1. परिवादित कृत्य दुराशय मुक्त रहा हो अर्थात अभियुक्त में प्रश्नगत कृत्य-
(i) मृत्यु कारित करने के आशय से, या
(ii) घोर अपहती कारित करने के आशय से, या
(iii) इस ज्ञान के अधीन की उससे, मृत्यु या घोर अपहती संभाव्य है, न किया हो|
2. पीड़ित ने परिवादित कृत्य किये जाने हेतु वैध सहमति दी हो तथा ऐसी सहमति देते समय उसकी आयु 18 वर्ष से अधिक रही हो|
3. धारा 87 का दृष्टांत:-
क और ख आमोदार्थ आपस में पट्टेबाजी करने के सहमत होते हैं| इस सहमति में किसी अपहानि की हर संपत्ति विवक्षित है| यदि क यथानियम पट्टेबाजी करते हुए ख को अपहति कारित कर देता है तो क कोई अपराध नहीं करता है|
4. Cases:
Dashrath Paswan, 1958
Held:- वैध सहमति पूर्ण प्रतिरक्षा नहीं है| विधि द्वारा निर्धारित शर्तों के अधीन ही सहमति द्वारा किया गया कृत्य क्षम्य होगा| शर्तें संतुष्ट न होने पर, विधि के अनुसार, दायित्व में रियायत का प्रकरण बन सकता है अभियुक्त को तदनुसार, धारा 304 के खण्ड 5 के अपवाद का लाभ दिया गया|
5. धारा 88 के अंतर्गत अदोषिता के प्रतिबंध:-
(i) परिवादित कृत्य दुराशय मुक्त रहा हो अर्थात अभियुक्त ने प्रश्नगत कृत्य-
a) मृत्यु कारित करने के आशय से न किया हो
b) पीड़ित ने सहमति दी हो (स्वतंत्र) और उसकी आयु 12 वर्ष से ऊपर हो
c) परिवादित कृत्य पीड़ित के लाभार्थ सद्भावनापूर्वक किया गया हो|
(ii) धारा 88 का दृष्टांत:-
क, जो कि एक शल्य चिकित्सक है| ‘ख’ जो वेदनापूर्ण व्याधि से ग्रस्त है, मृत्युकारित होने की सम्भावना है| क सद्भावनापूर्वक ‘ख’ के फायदे के आशय से शस्त्रकर्म करता है| ‘क’ ने कोई अपराध नहीं किया|
3. Cases:- Natesas, 1962 Madras
Held:- ऐसा अध्यापक जो विद्यालय में अनुशासन के हित में अपनों शिष्यों को युक्तियुक्त शारीरिक दंड देता है| वह धारा 88 I.P.C का लाभार्थी होगा| यह धारा 323 के अंतर्गत दोषसिद्धि नहीं किया जा सकता है|
6. धारा 89 के अंतर्गत अदोषिता के प्रतिबंध:-
(i) पीड़ित या तो पागल या 12 वर्ष से कम आयु का बालक रहा हो;
(ii) परिवादित कृत्य पीड़ित के लाभार्थ सद्भावनापूर्वक किया गया हो;
(iii) संरक्षण या विधि सम्मत प्रभारी की सहमति ली गई हो
(iv) धारा 89 के परंतुक की अतिरिक्त अपेक्षाएं (दुराशय विहीनता) इंगित करने वाली की संतुष्ट हो रही हो|)
(v) परंतुक की अपेक्षायें:-
a) मृत्यु कारित करने या उसका प्रयत्न करने का आशय नहीं होना चाहिये;
b) अभियुक्त (कर्ता) यह ज्ञान न रखता हो कि उसके कृत्य से मृत्यु संभावित है [सिवाय तब जबकि मृत्यु या घोर उपहति टालने का उद्देश्य हो या घोर बीमारी या क्षीणत के निवारण का उद्देश्य हो]|;
c) स्वेच्छापूर्वक घोर अपहति या उसका प्रयत्न न किया गया हो [जबतक की मृत्यु या घोर अपहति टालने उद्देश्य न हों या घोर बीमारी या क्षीणता के निवारण का उद्देश्य हो]|;
d) ऐसे किसी अपराध का दुष्प्रेरण न किया गया हो जिसके सम्बन्ध में धारा 89 का अपवाद लागू न होता हो|
(vi) दृष्टांत:-
क सद्भावनापूर्वक, अपने शिशु का शल्यचिकित्सक द्वारा पथरी निकलवाने के लिए शल्यक्रिया करवाता है| क का उद्देश्य शिशु को रोग मुक्त कराना था| शिशु की मृत्यु शल्य क्रिया द्वारा कारित हो जाती है| क इस अपवाद के अधीन आएगा|
(vii) Case:-
Raghav v/s State, 1989
Held:- धारा 89 में लाभ से तात्पर्य भौतिक या लैंगिक लाभ से है आर्थिक लाभ इसकी परिधि में नहीं है| अत: अवयस्क शिष्य को अनुशासित रखने हेतु शिक्षक द्वारा दिया गया दंड लाभार्थ माना जाएगा|
सहमति की प्रतिरक्षा का अपवाद ————- धारा 91 I.P.C
1. धारा 91, पूर्ववर्ती धारा 87, 88 तथा 89 का अपवाद है| अत: धारा 91 लैटिन सुक्ति “Volenti Non Fit Injuria” का अपवाद है|
2. धारा 91 ऐसे कृत्यों (अपराध) से सम्बंधित है जो सहमति द्वारा वैध नहीं बनायें जा सकते हैं ऐसे कृत्यों के कुछ उदाहरण निम्न. है –
(i) अवैध गर्भपात करना;
(ii) लोक उपताप करना;
(iii) लोक नैतिकता तथा क्षेम विरुद्ध कृत्य|
उपरोक्त कृत्य सदैव ही दंडनीय है इन्हें सहमति से वैध नहीं बनाया जा सकता है| ऐसे कृत्यों का मूल सहमति दाता को पहुंची क्षति नहीं है| इन कृत्यों (अपराधों) का मूल कोई अन्य चीज होती है|
3. ऐसा कृत्य जो सहमति दाता के विरुद्ध अपराध होता है वह सहमति के अधीन क्षम्य हो सकता है| किन्तु ऐसा कृत्य जो अपहानि से स्वतंत्र रूप से अपराध है वह किसी भी सहमति से क्षम्य नहीं हो सकता है| वस्तुत: लोक अपराधों के विरुद्ध सहमति कोई बचाव नहीं है|
4. धारा 91 के उपबन्ध:-
“धारा 87, 88 तथा 89 के अपवाद ऐसे कृत्यों तक विस्तृत नहीं है जो ऐसी क्षति जो कारित हुई हो या कारित करने हेतु आशयित रही हो या जिसके कारित हो जाने की संभावना का ज्ञान रहा हो जबकि ऐसे अपराध अपहानि से स्वतंत्र रूप से अपराध है|”
5. दृष्टांत:-
सहमति के बिना किया गया कृत्य कब क्षम्य है —— S. 92
1. धारा 92 सहमति की प्रतिरक्षा सम्बन्धी उपबंधों (धारा 87-92) में सर्वाधिक प्रबल उपबन्ध है| इस धारा के अंतर्गत ऐसे कृत्य की क्षम्य हो सकते हैं जो बिना सहमति के किये गये है| (यदि वह पीड़ित के लाभार्थ सद्भावनापूर्ण किया गया हो)
2. धारा 92 का नितिगत आधार-
“अस्थायी आपात किसी भी व्यक्ति के शक्ति में वृद्धि कर देता है ऐसा आपात सम्बंधित व्यक्ति द्वारा उठाये गये सद्भावनापूर्ण तथा लाभदायी कदमों को औचित्य पूर्ण बना देता है|”
3. सहमति का आभाव निम्नलिखित कारणों से होना चाहिये-
(i) पीड़ित के लिए सहमति देना असंभव है|
(ii) पीड़ित सहमति देने में असक्षम है|
(iii) सहमति प्राप्त करने के लिए समय उपलब्ध नहीं है|
4. धारा 92 के प्रयोजनों हेतु अदोषिता के प्रतिबंध:-
(i) आपातकालीन स्थिति;
(ii) अभियुक्त द्वारा कृत्य पीड़ित के लाभार्थ तथा सद्भानापूर्ण किया गया हो;
(iii) सहमति का आभाव औचित्यपूर्ण होना;
(iv) दुराशय का आभाव|
5. धारा 92 का परंतुक:-
(i) इस अपवाद का विस्तार साशय मृत्यु कारित करने या मृत्यु कारित करने के प्रयत्न पर न होगा|
(ii) इस अपवाद का विस्तार मृत्यु या घोर अपहति के निवारण के या किसी घोर रोग या अंग शैथिल्य से मुक्त करने के प्रयोजन से किसी भिन्न प्रयोजन हेतु न होगा, जिसे करने वाला जानता हो कि मृत्यु संभाव्य है|
सद्भावनापूर्वक की गई संसूचना ———— धारा 93
1. धारा 93 आवश्यकता तथा लोकनीति पर आधारित है| यह धारा निर्दोष संसूचना से फलित क्षति को क्षम्य घोषित करती है|
2. धारा 93 के उपबंध:-
“अद्भावनापूर्वक की गई संसूचना (जो संसूचित व्यक्ति के लाभार्थ हो) मात्र इस कारण अपराध नहीं होगी कि संसूचित व्यक्ति को अपहानि कारित हुई है|”
3. दृष्टांत:- A को उसका शल्य चिकित्सक B सद्भावनापूर्वक यह संसूचित करता है कि उसकी राय में वह जीवित नहीं रह सकता|इस आधार के फलस्वरूप उस रोगी की मृत्यु हो जाती है| B ने कोई अपराध नहीं किया|
4. Case:-
Veeda menzees v/s Yousuf Khan, 1966 S.C
Held:- ‘धारा 93 में अपहानि से तात्पर्य क्षतिकारी मानसिक प्रतिक्रिया (Harm= injurious mental reaction) से है|’
धमकी की बाध्यता के अधीन किया गया कृत्य
(act done under compulsion by threat)- S.94
1. धारा 94 लैटिन सुक्ति Actus Men invito Factus Non Est Mens Actus अर्थात मेरे द्वारा अनिच्छापूर्वक किया गया कृत्य मेरा नहीं है, पर आधारित है|
2. धारा 94 का मूल तत्व यह है कि बाध्यता के अधीन किया गया कृत्य इच्छित या स्वैच्छिक नहीं होते (भले ही साशय रहा हो)
3. धारा 94 कका लाभ केवल उन मामलों में उपलब्ध होगा जिन्मने तत्काल मृत्यु की धमकी दी गई है| तत्काल मृत्यु की धमकी से कम कोई भी धमकी धारा 94 की प्रतिरक्षा का आधार नहीं हो सकती है|
4. तत्काल मृत्यु के धमकी के अधीन किया गया कृत्य क्षम्य है यह एक सामान्य नियम है| यह नियम दो अपवादों के अधीन है –
(i) तत्काल मृत्यु की धमकी के अधीन की गई कृत्य|
(ii) तत्काल मृत्यु के धमकी के अधीन राज्य के विरुद्ध मृत्युदंड से दंडनीय अपराध कारित करना|
उपरोक्त अपवाद का नीतिगत आधार यह है कि-
a) जहाँ तुम्हे अपनी मृत्यु तथा किसी अन्य की मृत्यु के मध्य चुनाव करना हो वहाँ तुम अपनी मृत्यु को
चुनो|
b) राज्य को भी अपनी आत्मरक्षा का अधिकार है|
5. चूँकि तत्काल मृत्यु के धमकी के अधीन किया गया अपराधिक कृत्य क्षम्य है अत: तत्काल मृत्यु के अधीन (धमकी के अधीन) उस कृत्य का दुष्प्रेरण या प्रयत्न की क्षम्य होगा|
6. धारा 94 का लाभ ऐसे व्यक्ति को नहीं मिलेगा जो-
(i) तत्काल मृत्यु से न्यूनतम अपहानि की युक्तियुक्त आशंका के अधीन अपराध करता है|
(ii) स्वयं को बाध्यकारी स्थिति में लाने के लिए साथ ही उत्तरदायी है|
7. केवल आवश्यकताजनित बाध्यता धारा 94 की परिधि में नहीं है| अत: भूख से मर रहे व्यक्ति द्वारा की गई चोरी धारा 94 के अंतर्गत क्षम्य नहीं होगी|
8. आंगल विधि राज्य के मूल्य पर अपने जीवन की रक्षा करने की अनुमति देती है (Mc cyreth1746)| आँग्ल विधि वैवाहिक प्रपीडन (matrimonial coercion) को भी मान्यता देती है|
9. धारा 94 का उपबन्ध:-
“हत्या और मृत्यु से दंडनीय उन अपराधों को, जो राज्य के विरुद्ध है, को छोड़कर कोई बात अपराध नहीं हैं जो ऐसे व्यक्ति द्वारा किये जाए, जो उसे करने के लिये ऐसी धमकियों से विवश किया गया हो, जिनसे उस बात को करते समय उसको युक्तियुक्त रूप से यह आशंका कारित की गई हो कि अन्यथा परिणाम यह होगा कि उस व्यक्ति की “तत्काल मृत्यु” हो जाए, परन्तु यह तब जब उस कार्य को करने वाले व्यक्ति ने स्वयं अपने को उन परिस्थितियों में ना डाला हो, जिसमें वह ऐसी मजबूरी के अधीन है|”
10. स्पष्टीकरण – I
वह व्यक्ति जो स्वयं की इच्छा से डाकूओं की टोली में सम्मिलित हो गया है| इस आधार पर फायदा नहीं ले पायेगा कि वह धमकी के अधीन था|
स्पष्टीकरण – II
एक लोहार जो डाकूओं द्वारा अपने औजार सहित एक घर का द्वार तोड़ने के लिए विवश किया जाता है ताकि डाकू घर में प्रवेश कर सके| लोहार को इस अपवाद का लाभ मिलेगा|
तुच्छता की प्रतिरक्षा ————- धारा 95
1. धारा 95 I.P.C तुच्छता की प्रतिरक्षा प्रावधानित करता है यह धारा लैटिन सुक्ति De Minimis Non Curat Lex अर्थात विधि तुच्छ बातों पर विचार नहीं करती है, पर आधारित है| यह सुक्ति लोकनीति पर आधारित है|
2. लोकनीति यह अपेक्षा करती है कि तुच्छ बातों में समय श्रम और धन नष्ट न किया जाए| किसी भी व्यक्ति को तुच्छ बातों के लिए आपराधिक दायित्व की चिंता तथा कठिनाई के अधीन नहीं डाला जाना चाहिये|
3. तुच्छ बातें विधि के शब्दों की परिधि में हो सकती है किन्तु वे
4. धारा 95 के उपबंध:-
“कोई बात इस कारण अपराध नहीं है कि वह अपहानि कारित करती है या कि अपहानि कारित करने हेतु आशयित है या उससे अपहानि कारित होने की सम्भावना का ज्ञान है, यदि वह इतनी तुच्छ है कि सामान्य समझ या स्वभाव व्यक्ति उसकी शिकायत नहीं करेगा|”
5. अपवाद:-
तुच्छता एक प्रतिरक्षा है किन्तु यह पूर्ण प्रतिरक्षा नहीं है| निम्न मामलों में तुच्छता की प्रतिरक्षा मान्य नहीं होगी-
(i) सामाजिक तथा आर्थिक अपराध
(ii) खाद अपमिश्रण अधिनियम के अंतर्गत अपराध
(iii) मूल्य नियंत्रण आदेशों के विरुद्ध अपराध
6. धारा 95 में अपहानि शब्द व्यापक अर्थों में पर्युक्त है| शारीरिक तथा संपत्तिक परिधियां इसकी परिधि में है|
7. Cases:- (i) Shiv Gulam Lal, 1975
(ii) South India Railway Co. v/s Ram Krishnan
(iii) Kishori Mohan v/s State of Bihar
Shiv Gulam Lal, 1975
इस प्रकरण में एक Police कर्मी बरर्खासत कर दिया गया था| उसने वरिष्ठ Police officer के समक्ष Appeal प्रस्तुत किया| वरिष्ठ Police officer ने याचिका पर विचार करने से मना कर दिया क्षुब्ध होकर Police man ने, Senior Police officer के सीने पर छाते से मामूली प्रहार किया|
Held:- ‘अभियुक्त का कृत्य तुच्छ कृत्य नहीं था| धारा 323 I.P.C के तहत दोषसिद्ध किया गया|’
South India Railway co. v/s Ram Krishnan
वादी रेल यात्रा पर था| परिवादी ने उस पर यह लांछन लगाया कि वह अनुचित टिकट पर यात्रा कर रहा है| वादी ने इसे अपनी प्रतिष्ठा के लिए क्षतिकारी बात कहते हुए अभियोजन संस्थित किया|
Held:- ‘अभियुक्त तुच्छता की प्रतिरक्षा का अधिकारी है|’
Kishori Mohan v/s State of Bihar
कर्मचारी हड़ताल पर थे| परिवादी हड़ताल विरोधी था| हड़ताली कर्मचारियों ने परिवादी के चित्त को जूते की माला पहनाकर घुमाया|
Held:- ‘हड़ताली कर्चारियों का कृत्य परिवादी के लिए अपमानजनक था| यह तुच्छ कृत्य नहीं था| उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए न्यायालय ने केवल चेतावनी देते हुए अभियुक्तगण को छोड़ दिया|’
आत्मरक्षा का अधिकार ———- धारा 96-106 (औचित्यपूर्ण प्रतिरक्षा)
सामान्य:-
1. संहिता का भाग IV (Sc. ) साधारणों अपवादों के बारे में है| ऐसा अभियुक्त जिसका मामला अध्याय IV की परिधि में वह दांडिक दायित्व से पूर्णत: मुक्त होगा| अध्याय IV अदोषित की शर्तें नियत करता है| —– s. Huda
2. अध्याय IV के अंतर्गत दांडिक दायित्व से मुक्त के निम्न दो आधार है-
(i) दुराशय का आभाव ——————– धारा 76-94
(ii) तुच्छता ——————————– धारा 95
(iii) कृत्य का औचित्यपूर्ण होना, भले
ही वह दुराशय युक्त है —————— धारा 96-106
3. धारा 96 – 106 आत्मरक्षा के अधिकार से सम्बंधित है| यह धाराएं, धारा 40 I.P.C तथा धारा 105 I.E.A के साथ पठनीय है|
4. आत्मरक्षा का अधिकार केवल ऐसे कृत्य के विरुद्ध उपलब्ध होगा जो धारा 40 I.P.C के अर्थों में अपराध है| धारा 40 I.P.C में अपराध की त्रिस्तरीय (Three tire) परिभाषा दी गई है| ‘साधारण अपवाद’ (Chapter IV) के प्रयोजनों हेतु अपराध शब्द को व्यापकतम परिभाषित किया गया है|
परिभाषा निम्नवत है-
“अपराध से अभिप्रेत है भारतीय दंड संहिता या किसी स्थानीय या विशेष विधि के अंतर्गत दंडनीय बात|”
5. आत्मरक्षा का अधिकार केवल ऐसे कृत्य के विरुद्ध उपलब्ध होगा जो धारा 40 I.P.C के अर्थों में अपराध है| दूसरे शब्दों में संहिता के अंतर्गत सामान्य नैतिक पतन (General Moral Deprovity) दंडनीय नहीं है|
आत्मरक्षा का अधिकार- अर्थ, प्रकृति, औचित्य
1. अर्थ (Meaning)
(i) संहिता में आत्मरक्षा का अधिकार पदावली परिभाषित नहीं की गई है| अत: इसे इसके सामान्य अर्थों में लिया जाना चाहिये|
(ii) विधिक सीमाओं के अधीन, निजी हिंसा द्वारा अपने तथा दूसरे के शरीर एवं संपत्ति की रक्षा करने का वैधानिक अधिकार ही आत्मरक्षा का अधिकार है|
2. औचित्य (Justification)
(i) लोगों के शरीर तथा संपत्ति की रक्षा करने का प्राथमिक कर्तव्य राज्य का है| यह दायित्व (कर्तव्य) बहुत बड़ा है| कोई भी राज्य, चाहे वह कितना ही साधन संपत्ति क्यों न हो, इस कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर सकता है| अत: अपनी बाध्यता के परिप्रेक्ष्य में राज्य व्यक्ति को प्रितकर स्वरूप आत्मरक्षा का अधिकार उपलब्ध कराता है|
(ii) शरीर और संपत्ति का मूल्य बहुमूल्य है, किसी भी सभ्य समाज में, इनके संरक्षण की प्रभावी व्यवस्था, आत्मरक्षा के अधिकार का आधार है|
3. प्रकृति (Nature)
(i) यह, विधिक सीमाओं के अधीन, निजी हिंसा द्वारा, अपने तथा दूसरों के शारीर एवं संपत्ति की प्रतिरक्षा का अधिकार है|
(ii) यह प्रतिरक्षा का अधिकार है| यह विद्वेषात्म्क या दंडात्मक नहीं है|
(iii) यह अपराध के विरुद्ध उपलब्ध वैधानिक अधिकार है| अपराध से यहाँ तात्पर्य I.P.C या special law या local law द्वारा निषिद्ध कृत्य से है|
(iv) यह आवश्यकता पर आधारित है किन्तु यह आवश्यकता के सिद्धांत की अपेक्षा संकीर्ण है|
(v) यह एक निवारक, प्रक्रियात्मक अधिकार है| शरीर या संपत्ति के विरुद्ध संकट की वास्तविक या युक्तियुक्त आशंका होने पर यह अधिकार प्रयोग किया जा सकता है|
(vi) इस अधिकार का मूल प्रतिरोधित व्यक्ति की वास्तविक अपराधिकता नहीं है| इस अधिकार का मूल आशंकित कृत्य का प्रकटत: दोषपूर्ण होना है|
(vii) यह अधिकार सामूहिक/सामुदायिक हित का संरक्षण करता है| क्योंकि इसका प्रयोग किसी भी व्यक्ति के शरीर एवं संपत्ति को रक्षा के लिए किया जा सकता है|
(viii) यह अधिकार, आंग्ल विधि की अपेक्षा भारतीय विधि में, व्यापक है| भारत में इस अधिकार का प्रयोग किसी अजनबी के शरीर या संपत्ति की रक्षा के लिए भी किया जा सकता है| आंग्ल विधि में इस अधिकार का प्रयोग अजनबी के पक्ष में नहीं किया जा सकता है|
(ix) भारतीय विधि में पीछे हटकर या पलायन करके ( rule) मान्य नहीं है| आंग्ल विधि यह अपेक्षा करती है कि रक्षक को प्रथमत: पलायन करके या पीछे हटकर प्रतिरक्षा करनी चाहिए| इस प्रकार प्रतिरक्षा संभव न होने पर हो उसे किसी निजी हिंसा का प्रयोग करना चाहिये|
सिद्ध भारिता (Burden of proof) ———– धारा 105 I.E.A
1. यह सिद्ध करने का भार की, अभियुक्त की तथ्य एवं परिस्थितियां ऐसे है जो साधारण अपवाद, विशेष अपवाद या किसी परंतुक के अंतर्गत आता है|
2. न्यायालय यह प्रकल्पना करेगा कि ऐसे तथ्य एवं परिस्थितियां अस्तित्व में नहीं है|
3. धारा 105 I.E.A का निर्वचन उदारतापूर्वक किया गया है| इसका कारण यह है कि यह धारा प्रकियात्मक तथा तकनीकी है| इस धारा को इस प्रकार प्रवर्तित नहीं किया जा सकता है कि सारवान विधि के लाभदायी उपबन्ध पराजित हो जाये|
आत्मरक्षा सम्बन्धी उपबन्धों का वर्गीकरण:-
1. अध्याय IV में आत्मरक्षा सम्बन्धी कुल 11 धारायें की गई है| इन 11 धाराओं की स्थूल रूप में निम्नत: वर्गीकरण किया जा सकता है-
(i) आत्मरक्षा सम्बन्धी सामान्य उपबन्ध ———————– धारा 96-99
(ii) शरीर के आत्मरक्षा सम्बन्धी उपबन्ध ———————- धारा 100-102, 106
(iii) संपत्ति के आत्मरक्षा सम्बन्धी उपबंध ——————— धारा 103-105
धारा 98 तथा धारा 106 में क्रमश: 2 तथा 1 दृष्टांत संलग्न है|
2. शरीर तथा संपत्ति की आत्मरक्षा सम्बन्धी सामान्य उपबंध Sec. 96-99):-
(i) आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग में की गई कोई बात अपराध नहीं है| ——— धारा 96
(ii) शरीर एवं संपत्ति की आत्मरक्षा का सारवान उपबन्ध —————————- धारा 97
(iii) अपराध करने में अक्षम व्यक्ति के कृत्य के विरुद्ध आत्मरक्षा का अधिकार — धारा 98
(iv) आत्मरक्षा के अधिकार की सामान्य विधिक सीमाएं —————————— धारा 99
3. शरीर के आत्मरक्षा सम्बन्धी उपबन्ध (sec. 100-102, 106)
(i) शरीर के आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग में स्वैच्छिक मृत्यु कारित किया जाना ——– धारा 100
(ii) आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग
के स्वैच्छिक मृयु से अन्यथा किसी अपहानि का कारित किया जाना ————————– धारा 101
(iii) शरीर के आत्मरक्षा के अधिकार प्रारम्भ और बना रहना का ——————————- धारा 102
(iv) प्राणघातक हमले के विरुद्ध शरीर की आत्मरक्षा के अधिकार
के प्रयोग में निर्दोष को अपहानि के संकट में डालना ——————————————— धारा 106
4. संपत्ति के आत्मरक्षा का अधिकार:- (sec. 103-105)
(i) संपत्ति के आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग में स्वैच्छिक मृत्यु कारित करना ———— धारा 103
(ii) आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग में स्वैच्छिक
मृत्यु से अन्यथा किसी अपहानि का कारित किया जाना —————————————- धारा 104
(iii) संपत्ति के आत्मरक्षा के अधिकार का प्रारम्भ तथा बना रहना —————————- धारा 105
आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग में दी गई कोई बात अपराध नहीं है —- धारा 96
1. धारा 96 एक वैधानिक घोषणा है| इस धारा के अनुसार- “आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग में की गई कोई बात अपराध नहीं है|”
2. धारा 96 का शाब्दिक निर्वचन नहीं किया जा सकता है| इसे निम्न आशय की आवश्यक के अधीन पढ़ा जायेगा|
“परन्तुक यह तब जबकि निर्बंधनों का अतिल्लन्घन
Cases:-
(i) Gorie Sheikh, 1971
(ii) Sone Lal, 1981 S.C.
(iii) Queen v/s Rupa, 1906
(iv) Ram Swaroop, 1974 S.C
(v) State of U.P. v/s Pusu, 1983
(vi) Laxman Sahu, 1988, S.C.
(vii) Vijay Pal, 1984
Gorie Sheikh, 1917 और Sone Lal, 1981, S.C.
Held:- “चूँकि आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग में की गई कोई बात अपराध नहीं है| ऐसे बात के विरुद्ध आत्मरक्षा के जवाबी अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता है|”
Queen v/s Rupa, 1906
Held:- “जहाँ दोनों ही पक्ष एक दूसरे पर हावी होने का प्रयास कर रहे हो, वहां आत्मरक्षा के अधिकार का प्रश्न निरर्थक हो जाएगा|
Ram Swaroop, 1974, S.C.
Held:- वह जो आक्रमण कर्ता है, आत्मरक्षा के अधिकार को प्रयोग का दावा नहीं कर सकता है|
State of U.P. v/s Pusu, 1983
Held:- ‘ऐसा अभियुक्त जो स्वयं आक्रमण कर्ता है या जो आक्रमण को आमंत्रित करता है वह आत्मरक्षा के अधिकार का दावा नहीं कर सकता है|
शरीर एवं सम्पत्ति की आत्मरक्षा का सारवान उपबंध — S. 97
1. धारा 97 एक सारवान उपबंध है| यह शरीर तथा संपत्ति के आत्मरक्षा के अधिकार को प्रत्याभूत करता है यह धारा, धारा 99 के निर्बंधनों के अधीन है|
2. धारा 97 के उपबंध:- धारा 99 में अंतर्विष्ट निर्बंधनों के अध्यधीन, हर व्यक्ति को अधिकार है कि वह-
पहला – मानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले किसी अपराध के विरुद्ध अपने शरीर और किसी अन्य
व्यक्ति के शरीर को प्रतिरक्षा करें,
दूसरा – किसी ऐसे कार्य के विरुद्ध, जो चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार की परिभाषा में
आने वाले अपराध है या इनका प्रयत्न है| अपनी या किसी अन्य व्यक्ति की, चाहे जंगम,
चाहे स्थावर संपत्ति की प्रतिरक्षा करें|
3. धारा 97 का प्रथम खंड मानव शरीर को प्रभावित करने वाले किसी की अपराध के विरुद्ध अपने तथा किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर की रक्षा करने का अधिकार प्रत्याभूत करता है| मानव शरीर को प्रभावित करने वाले अपराध संहिता के अध्याय 16 (धारा 299-377) में परिभाषित तथा दंडनीय है|
4. धारा 97 में प्रदत्त अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को उपलब्ध है| अत: नागरिक, अनागरिक सभी इस अधिकार के लाभार्थी है|
अपवाद स्वरूप निम्न. व्यक्ति इस अधिकार का दावा नहीं कर सकेंगे –
(i) जो स्वयं आक्रमजकर्ता है|
(ii) वह जो स्वयं अपराध को आमंत्रित करता है|
(iii) वह जो प्रतिरक्षा करने के स्थान पर दूसरे पक्ष पर हावी होने की चेष्टा कर रहा है|
(iv) वह जो प्रतिहिंसा के बिना ही आक्रमण को टाल सकता है
5. आत्मरक्षा का अधिकार पूर्ण अधिकार नहीं है| यह धारा 99 में वर्णित सीमाओं (वैधानिक सीमाओं) के अधीन है| आत्मरक्षा का अधिकार प्रतिरक्षा का अधिकार है| यह दंडात्मक या विदेषात्मक अधिकार नहीं है|
6. धारा 97 का द्वितीय खंड प्रकटत: काफी संकीर्ण प्रकट होता है| वस्तुत: यह पर्याप्त रूप से व्यापक है| जिन अपराधों का विनिर्दिष्ट उल्लेख किया गया है| वंशीय (Generic) प्रकृति के है| उनकी अनेक प्रजातियां (specis) है| अत: प्रजाति गठित करने वाले अपराध की धारा 97 की खंड-2 की परिधि में आते हैं| उदाहरण के लिए निम्न. प्रजातिगत अपराधों का सन्दर्भ लिया जा सकता है –
(i) डकैती
(ii) उधापन
(iii) गृह अतिचार
(iv) गृह- भेदन, (House Trespass), आदि |
7. धारा 97 के खंड 2 के अध्याय XVII (sec. 378-462) को सम्पूर्णता में स्वीकार न करने के तार्किक कारण है| संपत्ति के विरुद्ध अनेक अपराध मौन प्रकृति के होते हैं| पीड़ित व्यक्ति को ऐसे अपराधों के कारित होने का पता काफी बाद में लगता है| ऐसे स्थिति में निवारक उद्देश्य विफल हो चुका होता है|
ऐसे व्यक्ति के कृत्य के विरुद्ध आत्मरक्षा का अधिकार जो चितविकृति आदि हो ——– धारा 98.
1. सैद्धांतिक आधार:-
“आत्मरक्षा के अधिकार का मूल तत्व प्रतिरोधित व्यक्ति की वास्तविक आपराधिकता नहीं है| इस अधिकार का मूल तत्व प्रतिरोधित व्यक्ति के कृत्य का प्रकटत: दोषपूर्ण होना है| अत: इस अधिकार का प्रयोग ऐसे व्यक्ति के कृत्य के विरुद्ध की किया जा सकता है जो दुराशय मुक्त है या आपराधिक सक्षमता नहीं रखते है|”
2. धारा 98 आत्मरक्षा के अधिकार को व्यहारिक बना देती है| इस धारा के आभाव में आत्मरक्षा का अधिकार लगभग निरर्थक हो गया होता|
3. धारा 98 के उपबन्ध:-
जबकि कोई कार्य, जो अन्यथा कोई अपराध होता, उस कार्य को करने वाले व्यक्ति के बालकपन, समझ की परिपक्वता के आभाव, चितविकृति या मत्तता के कारण, या उस व्यक्ति के किसी भर के कारण, वह अपराध नहीं है, तब हर व्यक्ति उस कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का वहीं अधिकार रखता है जो वह उस कार्य के वैसा अपराध होने की दशा में रखता|
4. दृष्टान्त:-
(क) ‘य’ पागलपन के असर में ‘क’ को जान से मारने का प्रयत्न रहता है| ‘य’ किसी अपराध का दोषी नहीं है| किन्तु ‘क’ को प्राइवेट प्रतिरक्षा का वहीं अधिकार है, जो वह ‘य’ के स्वस्थचित होने की दशा में रखता|
(ख) क रात्रि में वैधानिक अधिकार रखते हुए एक गृह में प्रवेश करता है| य सद्भावनापूर्वक क को गृह भेदक समझकर ‘क’ पर आक्रमण करता है| क, य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार रखता है जब ‘य’ भ्रम के अधीन कार्य न करता
5. धारा 98 निम्न. व्यक्तियों के कृत्य के विरुद्ध आत्मरक्षा का अधिकार प्रदान करती है-
(i) चितविकृति व्यक्ति;
(ii) बालक का कृत्य;
(iii) अस्वैछिक मत्तताग्रस्त व्यक्ति का कृत्य;
(iv) तथ्य के भ्रम से ग्रस्त व्यक्ति का कृत्य|
ऐसे कृत्य जिनके विरुद्ध आत्मरक्षा का अधिकार नहीं है—— S. 99
1. धारा 99 आत्मरक्षा के अधिकार की सामान्य सीमायें प्रावधानित करती है| वैधानिक सीमायें निम्न है-
(i) लोक सेवक द्वारा कृत्य (done) या प्रयासित कृत्य (act);
(ii) लोक सेवक के निर्देशाधीन कृत या प्रयासित कृत्य;
(iii) लोक प्राधिकारियों से सुरक्षा प्राप्त करने के समय की उपलब्धता;
(iv) सीमित बल प्रयोग|
2. धारा 99 के वर्णित प्रथम खंड वाली परिस्थितियों में लोक सेवक के कृत्य या सयासित कृत्य के विरुद्ध आत्मरक्षा का अधिकार नहीं होगा| लोक सेवक कृत्य या प्रासित कृत्य के विरुद्ध आत्मरक्षा का अधिकार नहीं होगा यदि-
(i) मृत्यु या घोर अपहति की युक्तियुक्त आशंका न हो|
(ii) लोक सेवक के अपने पदामास में कार्यरत रहा हो|
(iii) लोक सेवक का कार्य सद्भावनापूर्वक हो|
(iv) प्रतिरक्षक को यह ज्ञान हो या विश्वास करने कारण हो कि कृत्य का कर्ता या प्रयासकर्ता लोक सेवक है|
धारा 99 का प्रथम खंड वहां की लागू होगा जहाँ लोक सेवक का कृत्य या प्रयासित कृत्य विधि द्वारा कठोरत: न्यायनुमत नहीं है|
3. धारा 99 के द्वितीय खंड के अंतर्गत लोक सेवक के निर्देशाधीन कार्यरत व्यक्ति का कृत या प्रयासित कृत्य के विरुद्ध आत्मरक्षा का अधिकार नहीं होगा| यदि-
(i) ऐसा निर्देश सद्भावनापूर्वक पदामास में दिया गया हो|
(ii) मृत्यु या घोर अपहति की युक्तियुक्त आशंका न हो|
(iii) प्रतिरक्षक को यह ज्ञान रहा हो या विश्वास करने का कारण रहा हो कि सम्बंधित व्यक्ति ऐसे निर्देशाधीन कार्यरत है| या जबकि कार्यरत व्यक्ति द्वारा अपने प्राधिकार का अभिकथन किया गया हो,
या जबकि उसने मांग किये जाने पर लिखित प्राधिकार प्रस्तुत कर दिया हो|
4. उन मामलों में आत्मरक्षा का अधिकार नहीं होगा जिनमें लोक प्राधिकारियों के माध्यम से संरक्षण प्राप्त करने का समय है|
5. आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग में केवल उतनी अपहनि कारित की जा सकती है जितनी बचाव के प्रयोजनों हेतु आवश्यक है| उससे अधिक हानि कारित नहीं की जा सकती है|
Amzad Khan v/s State, 1952, S.C.
Held:- ‘आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग में प्रतिरक्षक द्वारा प्रयुक्त बल को स्वर्णतुला (Golden scale) से मापा नहीं जाएगा|’
शरीर की आत्मरक्षा का अधिकार ——— S. 97(1), 100-102, 106
1. धारा 97 का प्रथम खंड:-
प्रत्येक व्यक्ति को धारा 99 के निर्बंधनों के अधीन प्रतिरक्षा करने का अधिकार है-
प्रथम:- “मानव शरीर को परभावित करने वाले किसी अपराध के विरुद्ध अपने शरीर या किसी
अन्य व्यक्ति के शरीर की रक्षा करें|”
द्वितीय:- “———————————-|”
2. धारा 100:-
(i) यह धारा, धारा 99 में वर्णित निर्बंधनों के अधीन है|
(ii) यह धारा, शरीर के आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग में, आक्रमणकर्ता की स्वैच्छापूर्वक मृत्यु कारित करने या उसे कोई अपहति कारित करने तक विस्तृत है|
(iii) केवल निम्न हमलों के सम्बन्ध में धारा 100 लागू होगी:-
(a) मृत्यु की युक्तियुक्त आशंका कारित करने वाला हमला|
(b) घोरउपहति की युक्तियुक्त आशंका कारित करने|
(c) बलातसंग कारित करने के आशय से हमला|
(d) अप्राकृतिक कामतृष्णा की संतुष्टि की आशय से किया गया हमला|
(e) व्यवहरण या अपहरण के आशय से किया गया हमला
(f) सदोष परिरोध कारित करने के आशय से किया गया हमला|
(ऐसी परिस्थितियों में जिनमें यह युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न होती हो की पीड़ित अपनी रिहाई के लिए लोक पधिकारियों की सहायता नहीं ले सकेगा|)
3. धारा 101:-
(i) यह धारा 99 के निर्बंधनों के अधीन है|
(ii) यह धारा शरीर के आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग में आक्रमणकर्ता की स्वेच्छापूर्वक मृत्यु कारित करने से अन्यथा उसे कोई अन्य अपराध कारित करने तक विस्तृत है
(iii) धारा 101 उन सभी हमलों के विरुद्ध आत्मरक्षा का अधिकार प्रदान करती है जो धारा 100 में निर्दिष्ट हमलों से अन्यथा है| अत: धारा 100 अवशेषी है|
4. धारा 102:-
(i) धारा 102 I.P.C. निम्न दो प्रश्नों से सम्बन्धित है:-
(a) शरीर के आत्मरक्षा का अधिकार कब प्रारंभ होता है ?
(b) शरीर के आत्मरक्षा का अधिकार कब तक जारी रहेगा ?
(ii) शरीर के आत्मरक्षा का अधिकार, अपराध के प्रयत्न या धमकी से शरीर के प्रति संकट की युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न होने के साथ ही प्रारम्भ हो जाता हैI (भले ही अपराध कारित न किया गया हो)
(iii) शरीर के आत्मरक्षा का अधिकार, शरीर के प्रति संकट की आशंका बने रहने तक जारी रहता हैI
Dev Narayan v/s State of U.P. 1973 S.C.
Held:- ‘यह कहना कि कोई व्यक्ति आक्रमण के फलस्वरूप चोट भुगतने के बाद ही आत्मरक्षा में बल प्रयोग कर सकता है, धारा 102 को समझने में पूर्ण विफलता दर्शाता हैI’
5. धारा 106:-
धारा 106 प्राण घातक हमले के विरुद्ध शरीर की आत्मरक्षा के अधिकार के प्रभावी प्रयोग का अवसर उपलब्ध कराती हैI प्राणघातक हमले के विरुद्ध इस अधिकार के प्रयोग में निर्दोष व्यक्ति को भी अपहानि के संकट में डाला जा सकता हैI
दृष्टांत:-
‘क’ पर एक भीड़ आक्रमण कर उसकी हत्या का प्रयत्न करती हैI ‘क’ उस भीड़ में शामिल छोटे-छोटे शीशूओं को अपहानि करने की जोखिम उठायें बिना प्राइवेट प्रतिरक्षा में गोली नहीं चला सकताI यदि ‘क’ इस प्रकार गोली चलाकर शीशूओं को अपहानि करे तो, ‘क’ कोई अपराध नहीं करताI
1. धारा 97 का द्वितीय खण्ड:-
प्रत्येक व्यक्ति को, धारा 99 के निर्बंधनों के अधीन प्रतिरक्षा करने का अधिकार है-
प्रथम:- ———————–|
द्वितीय:- किसी ऐसे कार्य के विरुद्ध जो चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार की परिभाषा में आने वाला अपराध है या इनका प्रयत्न है तो अपनी या किसी अन्य व्यक्ति की, चाहे जंगम या स्थावर संपत्ति हो, की प्रतिरक्षा करें|
2. धारा 103 I.P.C.:-
(i) यह धारा, धारा 99 के निर्बंधनों के अधीन है|
(ii) यह धारा अपकारकर्ता की स्वेच्छापूर्वक मृत्यु या उसे कोई अन्य उपहानि कारित करने का अधिकार देती है|
(iii) धारा 103 निम्न अपराधों के विरुद्ध उपबंध है –
(a) लूट
(b) रात्रौ गृह भेदन
(c) अग्नि द्वारा रिष्टि (ऐसे भवन, तंबू या जलयान के प्रति जो मानव आवास या संपत्ति की अभिरक्षा स्थल
के रूप में प्रयुक्त हो)
(d) चोरी, रिष्टि या गृह अतिचार (जबकि मृत्यु या घोर उपहति की युक्तियुक्त आशंका हो|)
उत्तर प्रदेश, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र राज्य में धारा 103 I.P.C. में स्थानीय संशोधन किये गये है| इस संशोधन द्वारा धारा 103 में खण्ड (5) जोड़ा गया है|
नया खण्ड निम्नवत है:-
अग्नि या विस्फोटक पदार्थ द्वारा रिष्टि, जबकि ऐसी रिष्टि निम्न के प्रति निर्देशित हो:-
(i) शासन या स्थानीय प्राधिकारी या वैधानिक प्राधिकारी या शासन के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन कंपनी की संपत्तियां|
(ii) रेलवे या रेलवे स्टोर्स
(iii) यातायात वाहन
3. धारा 104:-
(i) यह धारा, धारा 99 के


सामान्य (General):-
1. अध्याय V (धारा- 107-120) दुष्प्रेरण के बारे में है| यह अध्याय सम्पूर्ण नहीं है| दुष्प्रेरण से सम्बंधित अन्य उपबन्ध निम्न है-
(i) Sec. 131-135 I.P.C
(ii) Sec. 138 I.P.C
(iii) Sec. 305, 306 I.P.C
(iv) Sec. 161-165-A I.P.C (विलुप्त- Act 45 of 1988)
2. दुष्प्रेरण- शाब्दिक अर्थ
(i) उकसाना
(ii) सशय सहायता करना
(iii) उत्प्रेरित या प्रोत्साहित करना
3. दुष्प्रेरक (Abetor)- कौन है?
(i) यह स्वयं अपराध नहीं करता है|
(ii) यह किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से अपना दुराशय या आपराधिक ज्ञान संतुष्ट करता है|
(iii) यह अपने अभिकर्ता (दुष्प्रेरित व्यक्ति) के माध्यम से अपनी आपराधिक योजना निष्पादित करता है|
(iv) दुष्प्रेरित व्यक्ति अर्थात अभिकर्ता मुख्य अपराधी होता है|
(v) दुष्प्रेरण में दुष्प्रेरक तथा दुष्प्रेरित के अध्य सक्रीय सम्बधता होती है| दुष्प्रेरण को तात्कालिक सह अभिकरण कह सकते है| दुष्प्रेरक मालिक होता है दुष्प्रेरित व्यक्ति अभिकर्ता की भूमिका में होता है
4. आपराधियों के वर्ग- आंग्ल विधि में
(i) प्रथम कोटि का प्रमुख;
(ii) द्वितीय कोटि का प्रमुख;
(iii) तथ्य पूर्व का सहायक;
(iv) तथ्य उपरान्त का सहायक|
उपरोक्त वर्गीकरण केवल अपराध (Felony) के लिए मान्य है यह वर्गीकरण राष्ट्रद्रोह (Treasor) तथा साधारण अपराधों के लिए मान्य नहीं है|
भारतीय विधि में यह वर्गीकरण मान्य नहीं है केवल तथ्य उपरान्त का सहायक मान्य है| तथ्य उपरान्त का सहायक वह व्यक्ति है जो अपराधी के शरण या सुविधा प्रदान करता है या उसे अपनाता है या राहत या आराम पहुंचाता है|
किसी बात के किया जाने का दुष्प्रेरण (Abetment of the doing of a thing) ———– धारा 107
1. “किसी बात के किये जाने का दुष्प्रेरण” धारा 107 I.P.C में परिभाषा है| परिभाषा इस प्रकार से है- वह व्यक्ति किसी बात के किये जाने का दुष्प्रेरण करता है, जो-
“प्रथम:- उस बात को करने के लिए किसी व्यक्ति को उकसाता है|
दूसरा:- उस बात को करने के लिए किसी षड्यंत्र में एक या अधिक अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के साथ सम्मिलित होता है, यदि उस षड्यंत्र के अनुसरण में और उस बात को करने के उद्देश्य से, कोई कार्य या अवैधलोप घटित हो जाए अथवा
तीसरा:- उस बात के किये जाने में किसी कार्य या अवैध लोप द्वारा साशय सहायता करता है|”
2. धारा-107 से स्पष्ट है कि किसी बात का किया जाना तीन प्रकारों से दुष्प्रेरित किया जा सकता है-
(i) उकसाकर;
(ii) षड्यंत्र में शामिल होकर;
(iii) साशय सहायता पहुंचाकर|
3. उकसाकर दुष्प्रेरण (Abetment by Instigation)
(i) किसी व्यक्ति को कोई बात करने के लिए उकसाना उस बात के किये जाने का दुष्प्रेरण गठित करता है|
(ii) “उकसाना” पद धारा-107 के प्रथम स्पष्टीकरण-I में बताया गया है|
स्पष्टीकरण- I “जब कोई व्यक्ति जान बूझकर दुर्व्यपदेशन द्वारा या तात्विक तथ्य, जिसे प्रकट करने के लिए वह आबद्ध है, जानबूझकर छिपाने द्वारा, स्वेच्छया किसी बात का किया जाना कारित या उपाप्त करता है, अथवा कारित या उपाप्त करने का प्रयत्न करता है, वह उस बात का किया जाना उकसाता है, यह कहा जाता है|”
(iii) स्पष्ट है कि-
(a) उकसाना या तो कपटपूर्ण मिथ्यापदेश है या सारवान तथ्यों का कपटपूर्वक छिपाया जाना है|
(b) कपटपूर्ण मिथ्यापदेशन या सारवान तथ्यों को कपटपूर्वक छिपाकर (जबकि अभियुक्त उसके प्रकटीकरण हेतु आबद्ध हो) किसी बात का किया जाना स्वेच्छापूर्वक प्रेरित करना, उपाप्त करना या उसका प्रयत्न करना उस बात के किये जाने का दुष्प्रेरण होगा|
दृष्टांत:- ‘क’ एक लोक ऑफिसर, न्यायालय के वारंट द्वारा ‘य’ को पकड़ने के लिए प्राधिकृत है| ‘ख’ जानबूझकर यह व्यपदिष्ट करता है कि ‘ग’, ‘य’ है और तद द्वारा ‘ग’ को ‘क’ से पकड़वाता है| यहाँ ‘ख’, ‘ग’ के पकड़े जाने का उकसाने का दुष्प्रेरण करता है|
दुष्प्रेरण कब पूर्ण होता है:-
(i) आपराधिक कृत्य हेतु प्रेरित करने के साथ ही दुष्प्रेरण पूर्ण हो जाता है| दुष्प्रेरण का पूर्ण होना दुष्प्रेरण की सफलता या असफलता पर निर्भर नहीं करता|
(ii) पत्र द्वारा दुष्प्रेरण:-
(a) Shiv Dayal Mal, 1874 Allahabad
(b) Rang Ford, 1874
Shiv Dayal Mal, 1874 Allahabad
Held:- प्रेषिती (addressee) द्वारा पत्र पढ़ने के साथ ही दुष्प्रेरण पूर्ण हो जाता है|
Rang Ford, 1874
Held:- प्रेषिती को पत्र प्राप्त न होने पर भी दुष्प्रेरण पूर्ण हो जायेगा|
4. षड्यंत्र द्वारा दुष्प्रेरण:-
(i) किसी बात के किये जाने हेतु षड्यंत्र में शामिल होना उस बात का दुष्प्रेरण गठित कर सकता है|
(ii) धारा-107 का द्वितीय खंड षड्यंत्र द्वारा दुष्प्रेरण को परिभाषित करता है|
“उस बात को करने के लिए किसी षड्यंत्र में एक या अधिक अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के साथ सम्मिलित होता है, यदि उस षड्यंत्र के अनुसरण में, और उस बात को करने के उद्देश्य से, कोई कार्य या अवैध लोप घटित हो जाए|”
(iii) षड्यंत्र द्वारा दुष्प्रेरण के मामले में यह आवश्यक नहीं कि षड्यंत्र में शामिल व्यक्ति अपराध की इतना ही पर्याप्त होगा वे उस षड्यंत्र में शामिल है जो उस बात के किये जाने के लिए रचा गया है| (धारा 108 का स्पष्टीकरण)
(iv) दृष्टान्त:-
5. साशय सहायता द्वारा दुष्प्रेरण-
(i) साशय सहयता द्वारा की दुष्प्रेरण किया जा सकता है धारा 107 के द्वितीय खंड के अनुसार-
“कोई बात किसी के किये जाने का दुष्प्रेरण करता है जो उस बात के किये जाने में कृत्य या अवैध लोप द्वारा साशय सहायता करता है|”
(ii) धारा 107 का द्वितीय स्पष्टीकरण “किसी बात के किये जाने में” सहायता को स्पष्ट करता है|
“जो कोई या तो किसी कृत्य के किये जाने से पूर्व या किये जाते समय उस कार्य को किये जाने में सुकर बनाने हेतु कोई कार्य करता है, तथा तदद्वारा उसके किये जाने को सुकर बनाता है, वह उस कार्य को करने में सहायता करता है|”
सुकर बनाना या सुकर बनाने का उद्देश्य या आशय तथा वास्तव में सुकर बना देना साशय सहायता का मूल तत्व है|
दुष्प्रेरक (Abettor) —————- धारा 108 I.P.C
1. परिभाषा:-
“वह व्यक्ति अपराध का दुष्प्रेरण करता है जो-
(i) अपराध के किये जाने का दुष्प्रेरण करता है, या
(ii) किसी ऐसे कृत्य का दुष्प्रेरण करता है जो अपराध होगा यदि उक्त कृत्य अपराधिक सामर्थ्य धारक व्यक्ति द्वारा दुष्प्रेरक के आशय या ज्ञान से किया जाता है|”
2. धारा-108 के स्पष्टीकरण:-
(i) प्रथम स्पष्टीकरण-I:-
किसी कृत्य के अवैध लोप का दुष्प्रेरण अपराध हो सकता है (भले ही दुष्प्रेरक उस कृत्य को करने के लिए स्वयं आबद्ध न रहा हो|)
(ii) द्वितीय स्पष्टीकरण-II:-
दुष्प्रेरण के गठन हेतु यह आवश्यक नहीं है कि-
(a) दुष्प्रेरित कृत्य कारित हो जाए या
(b) अपराध का गठन करने वाला अपेक्षित प्रभाव कारित हो जाए|]
दृष्टान्त:-
• इन्कार
• वांछित प्रभाव उत्पन्न न होना
(iii) तृतीय स्पष्टीकरणप:-
यह आवश्यक नहीं की-
(a) दुष्प्रेरित व्यक्ति अपराधिक सक्षमता रखता हो या
(b) दुष्प्रेरित व्यक्ति वहीं आशय या ज्ञान रखता हो जो दुष्प्रेरक है|
दुष्प्रेरित व्यक्ति को कोई अपराधिक आशय या ज्ञान रहा हो (दूसरे शब्दों में दुष्प्रेरित यक्ति के पूर्णत: निर्दोष होने पर भी दुष्प्रेरक व्यक्ति दायी होगा|
दृष्टांत:-
• बालक या पागल
• 7 वर्ष से कम आयु का बालक
• चितविकृत व्यक्ति
• भ्रमित व्यक्ति
(iv) स्पष्टीकरण- IV:-
दुष्प्रेरण एक सारवान अपराध है अत: दुष्प्रेरण का दुष्प्रेरण भी अपराध है|
दृष्टान्त :-
• किसी अन्य को दुष्प्रेरित करने का दुष्प्रेरण
(v) स्पष्टीकरण- V:-
षड्यंत्र द्वारा दुष्प्रेरण के मामले में यह आवश्यक नहीं की दुष्प्रेरक अपराध कर्ता के साथ अपराध की योजना निर्मित करे| इतना ही पर्याप्त है कि दुष्प्रेरक उस षड्यंत्र में शामिल है जिसके अनुसरण में अपराध हुआ है|
दृष्टान्त:-
भारत में भारत से बाहर अपराधों का दुष्प्रेरण- S.108
1. धारा-108-A अधि. सं. 4, वर्ष 1898 द्वारा अंत: स्थापित किया गया है| यह संशोधन Queen Empress v/s Ganpati Rao Ram Chandra, 1894 के प्रकरण में दिए गये निर्णय के कारण आवश्यक हो गया था|
2. धारा- 108-A के उपबंध:-
“वह व्यक्ति अपराध का दुष्प्रेरण करता है जो भारत तथा उससे परे किसी ऐसे कार्य के किये जाने का भारत में दुष्प्रेरण करता है, जो यदि भारत में किया जाए तो वह अपराध गठित करेगा|”
दृष्टान्त:-
सफल तथा असफल दुष्प्रेरण के अवशेषी मामलें- S. 109, 115, 116
1. धारा- 109 के आवश्यक तत्व:-
(i) अभियुक्त द्वारा किसी अपराध का दुष्प्रेरण किया जाना,
(ii) दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप दुष्प्रेरित कृत्य कारित कर दिया गया हो;
(iii) ऐसे दुष्प्रेरण को दण्डित करने हेतु संहिता में कोई स्पष्ट उपबंध न हो|
उपरोक्त अपेक्षाओं के संतुष्ट हो जाने पर दुश्प्ररक, दुष्प्रेरित कृत्य (अपराध) हेतु दंडनीय होगा|
(iv) कोई कृत्य या अपराध दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप कारित हुआ कहा जाता है जब वह उकसावे के परिणामस्वरूप या षड्यंत्र के अनुसरण में या साशय सहायता से कारित होता है|
दृष्टांत:-
2. धारा- 115 के आवश्यक तत्व:-
(i) अभियुक्त द्वारा मृत्यु दण्ड या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध का दुष्प्रेरण किया गया हो;
(ii) ऐसा दुष्प्रेरण असफल रहा हो;
(iii) ऐसे दुष्प्रेरण को दंडनीय करने हेतु संहिता में कोई स्पष्ट उपबंध न हो;
उपरोक्त उपेक्षाओं के संतुष्ट हो जाने पर दुष्प्रेरक:-
(a) सात वर्ष तक के किसी की तरह के कारावास से तथा अर्थदण्ड से दंडनीय होगा
(b) 14 वर्ष तक के किसी भी तरह के कारावास से तथा अर्थदण्ड से दंडनीय होगा (यदि दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किये गये कृत्य से किसी व्यक्ति को उपहति कारित हुई हो)|
दृष्टान्त:-
3. धारा-116 के आवश्यक तत्व:-
(i) अभियुक्त द्वारा कारावास से दंडनीय अपराध का दुष्प्रेरण किया गया हो;
(ii) ऐसा दुष्प्रेरण असफल रहा हो;
(iii) ऐसा दुष्प्रेरण को दण्डित करने हेतु संहिता में कोई स्पष्ट उपबंध न हो|
उपरोक्त अपेक्षाओं के संतुष्ट हो जाने पर अभियुक्त (दुष्प्रेरक)-
(a) दुष्प्रेरित अपराध हेतु देय अधिकतम कारावास की 2/4 की अवधि के कारावास से या उक्त अपराध हेतु देय अर्थदण्ड से या दोनों से|
(b) अपराध हेतु देय कारावास की आधी अवधि तक के कारावास से या अपराध हेतु देय अर्थदण्ड से या दोनों से (यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित में से कोई भी अपराध के निवारण हेतु लोक सेवक हो)|
दुष्प्रेरणा हेतु दण्ड यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति दुष्प्रेरक के आशय से भिन्न कार्य करता है| ——– S.110
1. आवश्यक तत्व:-
(i) अभियुक्त ने किसी अपराध का दुष्प्रेरण किया हो;
(ii) दुष्प्रेरित व्यक्ति ने उस कृत्य को दुष्प्रेरण के आशय या ज्ञान से भिन्न आशय या किसी ज्ञान से किया हो|
उपरोक्त अपेक्षाओं के संतुष्ट होने पर केवल उस अपराध हेतु दायी होगा जो हुआ होता यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति ने प्रश्नगत कृत्य दुष्प्रेरक के हेतु दायी नहीं होगा जो वस्तुत: कारित हुआ है|
2. धारा-110 सामान्य नियम प्रावधानित करती है यह दुष्प्रेरक के दायित्व को सीमित करती है यह दायित्व का विस्तार नहीं करती है|
उन मामलों में दुष्प्रेरण का दायित्व जिनमें दुष्प्रेरित कृत्य से भिन्न कृत्य किया गया हो —— S.111 r/w 112
1. धारा-111 मूलत: इस सिद्धांत पर आधारित है कि प्रयेक व्यक्ति अपने कृत्य के नैसर्गिक संभावित परिणाम का आशय रखता है| यह एक प्रकल्पना है यही प्रकल्पना धारा 111 के आधार है|
2. आवश्यक तत्व
(i) अभियुक्त द्वारा कोई कृत्य
(ii) दुष्प्रेरित व्यक्ति ने दुष्प्रेरित कृत्य से भिन्न कोई कृत्य कारित किया हो
(iii) ऐसा भिन्न कृत्य, दुष्प्रेरण का-
(a) संभाव्य परिणाम हो, तथा
(b) दुष्प्रेरण के प्रभाव में किया गया हो
उपरोक्त परिस्थितियों में यह मान लिया जायगा कि अभियुक्त ने उस भिन्न कृत्य को सीधे दुष्प्रेरित किया था|
‘संभाव्य परिणाम’ से तात्पर्य युक्तियुक्त: प्रत्याशित परिणाम से है|
(iv) जहाँ धारा-111 के अंतर्गत प्रत्यक्ष दुष्प्रेरण प्रकल्पित किया गया हो तथा प्रकल्पित दुष्प्रेरण, दुष्प्रेरित कृत्य से अतिरिक्त रहा हो तथा वह सुभिन्न अपराध भी हो वहां दुष्प्रेरक दोनों अपराधों के लिए दायी होगा|
अपराध की परिकल्पना का स्वच्छया छिपाना या उसके सम्बन्ध में मिथ्यापदेशन करना ——- S.118, 119, 120
1. धारा-118 के आवश्यक तत्व:-
(i) मृत्युदंड या आ. कारावास से दंडनीय कोई अपराध;
(ii) अभियुक्त ऐसे अपराध को सुकर बनाने का आशय या सुकर बनाये जाने की संभाव्यता का ज्ञान रखता हो; तथा
(iii) उपरोक्त आशय या ज्ञान के साथ अभियुक्त ने-
(a) उक्त अपराध की परिकल्पना को छिपाया (कृत्य या अवैध लोप द्वारा); या
(b) उक्त अपराध की परिकल्पना के सम्बन्ध में कोई ऐसा व्यपदेशन किया हो जसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान रहा हो|
उपरोक्त अपेक्षाओं के संतुष्ट हो जाने पर निम्न. दण्ड से दंडनीय होगा-
• 7 वर्ष तक का किसी भी प्रकार का कारावास तथा अर्थदण्ड (यदि अपराध कारित हो गया हो) या
• 3 वर्ष तक का किसी भी प्रकार का कारावास तथा अर्थदण्ड (यदि अपराध कारित नहीं हुआ हो)
(iv) दृष्टान्त:-
2. धारा-120 के आवश्यक तत्व:-
(i) कारावास से दंडनीय कोई अपराध
(ii) अभियुक्त ऐसे अपराध को सुकर बनाने का आशय या बनाये जाने की संभाव्य का ज्ञान रखता हो; तथा
(iii) उपरोक्त आशय या ज्ञान के साथ अभियुक्त ने-
(a) उक्त अपराध की परिकल्पना को छिपाया (कृत्य या अवैध लोप द्वारा) हो; या
(b) उक्त अपराध की परिकल्पना के सम्बन्ध में कोई ऐसा व्यपदेशन किया हो जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान रहा हो|
उपरोक्त अपेक्षाओं के पूर्ण हो जाने पर दुष्प्रेरक निम्नलिखित दण्ड से दंडनीय होगा-
• अपराध हेतु देय कारावास की अवधि का अधिकतम 1/4 कारावास या अपराध हेतु देय अर्थ दण्ड या दोनों (यदि अपराध हो गया हो)|
• अपराध हेतु देय कारावास की अवधि का अधिकतम 1/3 कारावास या अपराध हेतु देय अर्थदंड या दोनों (यदि अपराध नहीं हुआ हो)|
3. धारा-119 के आवश्यक तत्व:-
(i) मृत्युदंड या आ. कारावास या कारावास से दंडनीय अपराध हो
(ii) अभियुक्त (अपराध के निवारण कर्तव्याधीन लोक सेवक) ऐसे अपराध का कारित किया जाना सुकर बनाने का आशय या सुकर बनाये जाने की संभाव्यता का ज्ञान रखता हो|
(iii) ऐसे आशय ज्ञान के साथ या अभियक्त ने-
(a) उक्त अपराध की परिकल्पना को छिपाया (कृत्य या अवैध लोप द्वारा) हो; या
(b) उक्त अपराध की परिकल्पना के सम्बन्ध में कोई ऐसा व्यपदेशन किया हो जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान रहा हो|
उपरोक्त अपेक्षाओं के संतुष्ट होने पर निम्न. दण्ड से दंडनीय होगा-
• अपराध हेतु देय अधिकतम कारावास की आधी अवधि तक का कारावास या अपराध हेतु देय अर्थदण्ड या दोनों
• अपराध हेतु देय अधिकतम कारावास का 1/4 कारावास या अपराध हेतु देय अर्थदण्ड या दोनों (यदि अपराध हो गया हो)
• 10 वर्ष तक की अवधि का किसी भी प्रकार का कारावास (यदि अपराध मृत्युदंड या आ. कारावास से दंडनीय हो)
दृष्टान्त:-
दुष्प्रेरक का दायित्व (जबकि दुष्प्रेरित कृत्य से ऐसा प्रभाव उत्पन्न हुआ हो जो दुष्प्रेरक द्वारा आशयित प्रभाव से भिन्न हो ————– धारा- 113
1. धारा-113 पूर्वर्ती धारा-111 में प्रावधानित नियम का परिणाम है|
2. धारा 113 वहां आकर्षित होती है जहाँ अपराधी दुष्प्रेरित कृत्य करते हुए दुष्प्रेरक द्वारा आशयित प्रभाव से भिन्न प्रभाव उत्पन्न कर देता है|
3. आवश्यक तत्व:-
(i) अभियुक्त द्वारा एक विशेष आशय से एक विशेष प्रभाव कारित करने हेतु कोई कृत्य कारित किया गया हो;
(ii) दुष्प्रेरित व्यक्ति ने दुष्प्रेरित कृत्य करते हुए दुष्प्रेरक द्वारा आशयित प्रभाव से भिन्न प्रभाव उत्पन्न क्र दिया हो;
(iii) अभियुक्त ऐसे भिन्न प्रभाव के कारित हो जाने की संभाव्यता से भिन्न रहा हो|
(iv) ऐसा भिन्न प्रभाव हेतु अभियुक्त उसी प्रकार दायी होगा मानो की उसने ऐसा भिन्न प्रभाव उत्पन्न होने के आशय से ही प्रश्नगत कृत्य किया था|
दृष्टान्त:- (a) आशयित प्रभाव
(b) फलित प्रभाव
अपराध किये जाते समय दुष्प्रेरक की उपस्थिति —— S.114
1. दुष्प्रेरित कृत्य (अपराध) किये जाते समय दुष्प्रेरक की उपस्थिति एक अतिरिक्त कार्य होता है| दुष्प्रेरक की उपस्थिति के आधार पर उसे अपराध में भागीदार मान लिया जाता है|
2. धारा 114 के अंतर्गत प्रावधानित प्रकल्पना धारा 113 को धारा 34 के काफी निकट ला देती है| (B.K. Ghosh, 1925)
3. दुष्प्रेरित कृत्य किये जाते समय उपस्थित रहने वाला दुष्प्रेरक आंग्ल विधि में द्वितीय कोटि का मुख्य अपराधी कहलाता है|
जनसामान्य या 10 से अधिक व्यक्तियों द्वारा अपराध हेतु दुष्प्रेरण ——— धारा-117
1. धारा-117 10 से अधिक व्यक्तियों या जनसामान्य के दुष्प्रेरण से सम्बंधित है|
2. यह धारा समूह के दुष्प्रेरण से सम्बंधित है|
3. दुष्प्रेरक 3 वर्ष तक के किसी भी प्रकार के कारावास या अर्थदण्ड या दोनों से दंडनीय होगा|
4. दृष्टान्त:-
अपराधिक षड्यंत्र / Criminal Conspiracy- S. 120A, 120B
सामान्य:-
1. अध्याय V-A (धारा 120A तथा 120B) एक नया अध्याय है| इसे आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम, 1913 द्वारा अंत: स्थापित किया गया है| यह अध्याय आपराधिक षड्यंत्र से सम्बंधित है|
2. अपराधिक षड्यंत्र एक सारवान अपराध है| यह एक सत्त किन्तु अपूर्ण अपराध है| करार, इस अपराध की आधार शिला है|
3. षड्यंत्र एक सहमति है यह केवल इच्छाओं की सहमति नहीं है यह दो या अधिक व्यक्तियों के मध्य हुए करार से फलित सहमति है|
4. आपराधिक षड्यंत्र अवैध कृत्य केरने या करा देने का करार है| यह ऐसे कृत्य जो अवैध नहीं है को अवैध साधनों द्वारा करने या करा देने का करार हो सकता है|
5. “विधि भंग करने का करार” अपराधिक षड्यंत्र का मूल तत्व है| चूंकि आपराधिक षड्यंत्र एक करार है इसलिए यह किसी एक व्यक्ति द्वारा कारित नहीं किया जा सकता है (विनायक बनाम महाराष्ट्र राज्य, 1994 उच्चतम न्यायालय)
6. गोपनीयता तथा निजता षड्यंत्र में अंतनिर्हित है अत: षड्यंत्र का प्रत्यक्ष साक्ष्य दुर्लभ होता है| अत: यह दर्शाना काफी होगा कि यह विश्वास करने के युक्तियुक्त कारण है कि अभियुक्त ने आपराधिक षड्यंत्र किया है आपराधिक षड्यंत्र एक सत्त अपराध है (अब्दुल कादर 1963 बाम्बे) अपराधिक षड्यंत्र सम्बन्धी विधि संतोषजनक नहीं है| सत्ता पक्ष द्वारा इसकी दुरूपयोग की संभवना बनी रहती है|
Russel के अनुसार-
“अपराधिक षड्यंत्र उन लोगों को समर्थन देता है जो यह विचार रखते है कि ‘दण्ड विधि’ शासन के हाथ का उपकरण है|”
Fitzerald के अनुसार-
षड्यंत्र सम्बन्धी विधि हमारे विधिशास्त्र की वह शाखा है जिसे बहुत सूक्ष्म दृष्टि से देखना चाहिए, जिसे सतर्कतापूर्वक पेश करना चाहिए तथा जिसे इसकी वास्तविक सीमाओं से परे नहीं ले जाना चाहिए|
आपराधिक षड्यंत्र की परिभाषा तथा उसके आवश्यक तत्व ———– धारा-120A
1. अपराधिक षड्यंत्र की परिभाषा- “जबकि दो या अधिक व्यक्ति”-
(i) कोई अवैध कार्य, अथवा
(ii) ऐसा कोई कार्य, जो अवैध नहीं है, अवैध साधनों द्वारा, करने या करवाने को सहमत होते है, तब ऐसी सहमति अपराधिक षड्यंत्र कहलाते है|
2. अपराध कारित करने का करार, बिना किसी अतिरिक्त कृत्य के अपराधिक षड्यंत्र होगा, किन्तु अन्य कोई करार तभी आपराधिक षड्यंत्र होगा जबकि करार के अतिरिक्त कोई कृत्य करार के अनुसरण में करार के एक या अधिक पक्ष द्वारा किया गया हो (धारा-120A का परंतुक)
3. यह सारहीन है कि अवैध कृत्य करार का अंतिम उद्देश्य है या कि मात्र अनुसंगिक (धारा- 120A का स्पष्टीकरण)
4. दो या दो से अधिक व्यक्ति:-
(i) षड्यंत्र एक करार है अत: एकल व्यक्ति षड्यंत्र नहीं कर सकता है|
(ii) kenny के अनुसार कुछ परिस्थितियों में एकल व्यक्ति की आ. षड्यंत्र के लिए दोषी ठहराया जा सकता है| अत: षड्यंत्र कर्ता का दूसरा या तीसरा साथी पकड़ा न जा कता हो या उसका पता न चल सका हो, वहां पकड़े गये एकल व्यक्ति को षड्यंत्र हेतु दोष सिद्ध किया जा सकता है|
(iii) Pradyuman 1981 Bombay
धारा 197 Cr.P.C. के अंतर्गत शासन की पूर्वानुमति के बिना अभियोजन के आधार पर एक अभियुक्त के दोषमुक्ति कर दिए जाने पर आ. षड्यंत्र के लिए दायी बना रह सकता है|
5. अवैध कृत्य करने या करा देने या ऐसा कृत्य जो अवैध नहीं है को अवैध साधनों से करने या करा देने का करार आपराधिक षड्यंत्र है|
जहाँ अपराध करने या कराने का करार हो वहां करार ही पर्याप्त होगा कोई अतिरिक्त कृत्य अपेक्षित नहीं होगा| अन्य मामलों में केवल करार ही काफी नहीं होगा अतिरिक्त रूप से यह दर्शाना होगा कि षड्यंत्र के अनुसरण में षड्यंत्र के किसी पक्ष के द्वारा कोई कृत्य भी किया गया है|
आपराधिक षड्यंत्र हेतु दण्ड ————- धारा- 120B
1. षड्यंत्रकर्ता दुष्प्रेरक की भांति दंडनीय होगा (यदि अपराध मृत्यु, आ. कारावास या दो वर्ष या उससे अधिक के समक्ष का कारावास से दंडनीय हो तथा ऐसे षड्यंत्र को दण्डित करने हेतु संहिता में स्पष्ट उपबंध न हो)
2. 6 माह तक का किसी भी प्रकार का कारावास या अर्थदण्ड या दोनों|


सामान्य:-
1. अध्याय XXIII (S. 511) अपराध कारित करने के प्रयत्न से सम्बन्धित है| धारा 511 सम्पूर्ण नहीं है| यह अवशेषी (Residuary) है|
2. धारा 511 केवल निम्न. प्रयत्नों हेतु दण्ड का प्रावधान करती है-
(i) आ. का. या कारावास से दंडनीय अपराध कारित करने या करा देने का प्रयत्न;
आइए प्रयत्न जिसे दण्ड करने हेतु संहिता में कोई विनिर्दिष्ट उपबंध न हो|
मात्र प्रयत्न धारा 511 के अंतर्गत दंडनीय नहीं होगा अभियोजक का परिवादी को यह भी सिद्ध करना होगा कि-
अभियुक्त ने ऐसे प्रयत्न में अपराध की दिशा में कोई कृत्य किया है|
3. अपराध कारित किया जाना भौतिक रूप से असंभव होने पर अभियुक्त उस अपराध के प्रयत्न हेतु दायी ठहराया जा सकेगा| यह धारा 511 के दृष्टान्तों से स्पष्ट है|
धारा 511 से सम्बंधित विधि अभी विकास के क्रम में है| अभियुक्त का कृत्य मात्र तैयारी है या कि उसका कृत्य दंडनीय प्रयत्न गठन करता है| इस बात का निर्णय करना नजदीकी मामले में व्यवहारिक कठिनाइयाँ उत्पन्न करता है| इस समस्या का हल ढूंढने का न्यायिक प्रयत्न जारी है|
अपराध के चार चरण [The four phases of offences]:-
1. अपराध के निम्न चार चरण माने गये है-
(i) आशय
(ii) तैयारी
(iii) प्रयत्न
(iv) अपराध कारित होना
2. अपराध कारित करने का आशय- [Intention]
अपराध कारित करने का आशय दंडनीय नहीं है| उपरोक्त नियम का तार्किक आधार यह है कि विधि लोगों के हृदय में नहीं झांकती है| वह इनके बाह्य क्रियाकलापों पर ही दृष्टिपात करती है|
3. अपराध कारित करने की तैयारी- [Preparation]
(i) तैयारी व्यवस्था बनाने तथा साधन जुटाने से निर्मित होती है|
(ii) तैयारी आशय से उतरवर्ती किन्तु प्रयत्न से पूर्ववर्ती चरण है|
(iii) तैयारी समान्यत: दंडनीय नहीं है| इसका कारण यह है कि तैयारी करने के बावजूद तैयारीकर्ता अपनी आपराधिक योजना से पीछे हट सकता है|
(iv) आपवाद स्वरूप कुछ अपराधों की तैयारी दंडनीय है| यहाँ धारा 122, 126, 399, 233, 234 तथा 235 का सन्दर्भ लिया जा सकता है|
4. अपराध कारित करने का प्रयत्न- [Attempt]
(i) अपराध का प्रयत्न अपराध का तृतीय चरण है,
(ii) यह तैयारी से उत्तरवर्ती कारित हो जाता है|
(iii) प्रयत्न के सफल न होने पर भी आपराधिक दायित्व उत्पन्न हो सकता है| ऐसे प्रयत्नों को दंडनीय प्रयत्न कहते हैं|
(iv) प्रयत्न एक हिंसक चरण हो सकता है| इसमें दृढ़ता का तत्व अधिक होता है| यह अपराध की दिशा में प्रत्यक्ष कार्यवाही है|
(v) अधिकांश आपराधिक प्रयत्न संहिता की विनिर्दिष्ट धाराओं में दंडनीय कृत्य है| यहाँ धारा- 307, 308, 309, 385, 389, 393, 398 आदि का सन्दर्भ लिया जा सकता है|
(vi) कुछ आपराधिक प्रयत्नों को दण्डित करने के लिए संहिता में विनिर्दिष्ट प्रावधान नहीं किये गये है| अवशेषी प्रयत्न के ऐसे मामले धारा 511 की परिधि में आ सकते हैं|
तैयारी तथा प्रयत्न में भेद:-
तैयारी (Preparation) प्रयत्न (Attempt)
यह अपराध का द्वितीय चरण है| यह प्रयत्न से पूर्ववर्ती है|
तैयारी सामान्यत: दंडनीय नहीं है| क्योंकि इसमें प्रत्याहरण की संभाव्यता बनी रहती है तथा इसके सामाजिक प्रभाव अपेक्षाकृत कम गंभीर है|
तैयारी अपराध का मौन या शांत चरण है|
यह अपराध का तृतीय चरण है यह तैयारी से उत्तरवर्ती है|
प्रयत्ना सदैव ही दंडनीय है| यह अपराध की दिशा में प्रत्यक्ष कार्यवाही है| इसमें दृढ़ता का तत्व प्रबल होता है| इसके सामाजिक प्रभाव भी गंभीर होते हैं|
प्रयत्न अपराध का हिंसक चरण है| यह समाज में चिंता घबराहट तथा असुरक्षा की भावना उत्पन्न करता है|

तैयारी तथा प्रयत्न के मध्य सैद्धांतिक तथा शैक्षणिक विभेद सरल है| कुछ मामलों में व्यवहारत: यह निर्धारित करना कठिन हो सकता है कि अभियुक्त का कृत्य मात्र तैयारी है या कि प्रयत्न| न्यायाधीशों का दृष्टिकोण भी इस बिंदु पर एक समान नहीं रहा है| कुछ न्यायाधीशों ने संकीर्ण दृष्टिकोण जबकि कुछ अन्य ने व्यापक दृष्टिकोण अपनाया है|
अभियुक्त का कृत्य तैयारी है या कि प्रयत्न इसे निर्धारित करने के लिए न्यायालयों ने कुछ नियम (सिद्धांत) विकसित किये है| यहाँ निम्न. सिद्धातों का सन्दर्भ लिया जा सकता है|-
1. सीमाव्यता परीक्षण [The proximity test]
2. प्रत्याहरण परीक्षण [The withdraw test]
3. असम्भाव्यता परीक्षण [The impssiblity test]
4. स्पष्टता परीक्षण [The unequivocality test]
उपरोक्त परीक्षण या सिद्धांत समस्या का पूर्ण हल उपलब्ध नहीं कराते हैं| उचित मामलों में ये सहायक सिद्ध हो सकते हैं| यह स्वीकार करना होगा कि अभियुक्त का कृत्य केवल तैयारी है या कि प्रयत्न यह मुलत: तथ्य एवं परिस्थितियों का प्रश्न है| इस सम्बन्ध में अमूर्त रूप से कोई अंतिम नियम प्रतिपादित नहीं किया जा सकता है|
आवश्यक तत्व (धारा 511 का):-
1. जो कोई –
(i) आ. का. या का. से दंडनीय अपराध
(a) कारित करने या
(b) करा देने का प्रयत्न करता है|
(ii) ऐसे प्रयत्न में “अपराध कारित करने की दिशा में” कोई कृत्य करता है, तथा
(iii) संहिता में ऐसे प्रयत्न को दण्डित करने हेतु कोई विनिर्दिष्ट उपबन्ध नहीं है|
(iv) वह –
(a) आजीवन कारावास से आधे तक को अवधि या
(b) उस अपराध के लिए उपबंधित दीर्घतम अवधि के आधे तक की अवधि या
(c) जुर्माने से या
(d) दोनों से दण्डित किया जायेगा|
2. धारा 511 आजीवन कारावास या कारावास से दंडनीय अपराध करने या करा देने का प्रयत्न (अवशेषी) हेतु दण्ड का प्रावधान करती है| “कारित करा देने” शब्दों से दुष्प्रेरण का संकेत मिलता है|
3. मृत्युदण्ड या केवल अर्थदंड से दंडनीय अपराधों के प्रयत्न धारा 511 परिधि में नहीं है|
सिद्धांत [Theories]:-

1. सीमाव्यता परीक्षण [The Proximity test]:-
(i) अभियुक्त का कृत्य प्रयत्न होगा यदि ऐसा कृत्य अपराध के पूर्ण होने के पर्याप्त निकट है|
(ii) Cases:
सुधीर कुमार मुखर्जी, 1974 S.C.
अभयानन्द मिश्र, 1961 S.C.
(iii) अभियुक्त के कृत्य सारवान अपराध के सारत: निकट है या नहीं यह तथ्य एवं परिस्थितियों का प्रश्न है| इसे अमूर्त रूप से प्रतिपादित नहीं किया जा सकता है|
2. प्रत्याहरण परीक्षण (The withdrawl test or locus paemitentiae test):-
(i) Locus paemitentiae का शाब्दिक अर्थ है “प्रत्याहरण का अवसर”|
(ii) प्रत्याहर परीक्षण के अनुसार अभियुक्त का कृत्य तैयारी होगा यदि उसके लिए प्रत्याहरण या वापसी करने के अवसर उपलब्ध है|
(iii) Mikiat Singh, 1969 S.C.
अभियुक्त दिल्ली सीमा से 32 मील पहले दिल्ली की ओर बढ़ते समय पकड़ा गया था| आरोप या था कि वह सुसंगत ** के उल्लंघन में पंजाब के बाहर धान ले जा रहा था|
Held:- अभियुक्त का कृत्य धान के अवैध निर्यात की तैयारी मात्र था|
3. सामाजिक जोखिम परिक्षण (The social danger test):-
(i) अभियुक्त का कृत्य तैयारी है या कि प्रयत्न यह निम्न. दो बातों पर निर्भर करता है-
(a) अपराध की गंभीरता
(b) अंतर्निहित सामाजिक जोखिम
(ii) यह परिक्षण परिणाम को आधार बनाकर तैयारी तथा प्रयत्न को विभेदित करता है|
Osborn’s Case, 1875
4. असम्भाव्यता परिक्षण (The Impossibility test):-
(i) जहाँ अभियुक्त का कृत्य आपराधिक आशय के साथ हो किन्तु किन्ही आकस्मिक परिस्थितियों के कारण (जो अभियुक्त के पूर्वानुमान या नियंत्रण से परे रही है) के कारण सारवान अपराध कारित न हो सके हों जहाँ अभियुक्त का कृत्य प्रयत्न गठित करेगा|
(ii) इस सिद्धांत का मूल यह है कि अपराध का कारित होना भौतिक रूप से असम्भव होने पर भी उसका दंडनीय प्रयत्न सम्भव है|
(iii) धारा 511 के दोनों दृष्टान्त इसी सिद्धांत पर आधारित है|
5. स्पष्टता परिक्षण (The unequivocal test):-
जहाँ अभियुक्त का कृत्य स्वयं में बिल्कुल स्पष्ट हों तथा आपराधिक आशय के अनुसरण में हो वहां उसका कृत्य प्रयत्न होगा|
सिद्धांत –
अभियुक्त का कृत्य (दुराशय युक्त) प्रयत्न करेगा यदि किन्हीं स्वतंत्रता एवं आकस्मिक कारणों से न कि अभियुक्त के अपने कृत्य या लोप के कारण उसकी परिणति सारवान अपराध में नहीं हो सकी| असम्भाव्यता के बावजूद प्रयत्न गठित होगा यदि कृत्य दुराशय युक्त है तथा वह अपराध कारित करने की दिशा में निर्दिष्ट था|
आपराधिक आशय से किये गये कृत्य को जो अपराध की दिशा में हो| दंडनीय प्रयत्न माना जाना चाहिए| ऐसा निम्नलिखित कारणों से आवश्यक है-
1. सामाजिक शान्ति तथा सुरक्षा के हित में ;
2. अभियुक्त के अतांछित कृत्यों की पुनरावृति टालना ;
3. विधि का विकास इस प्रकार होना चाहिए कि वह समाज के पक्ष में हो तथा अभियुक्त के विरुद्ध हो, (परस्पर विरोधी हितों का संतुलन)|


1. अध्याय-XVI (धारा 299-377) मानव शरीर को प्रभावित करने वाले अपराध से सम्बंधित है| यह अध्याय संहिता का सबसे बड़ा अध्याय है| इस अध्याय को दो स्थूल वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-
(i) मानव जीवन के विरुद्ध अपराध ———– S. 299-318
(ii) मानाव शरीर के विरुद्ध अपराध ———– S. 319-377
2. मानव जीवन के विरुद्ध अपराध —————— S. 299-318
(i) सदोष मानववध ————————- S. 299
(ii) हत्या ————————————- S. 300
(iii) अपेक्षापूर्वक मृत्यु कारित करना ——- S. 304-क
(iv) दहेज़ मृत्यु ——————————- S. 304-ख
(v) आत्म हत्या का दुष्प्रेरण ————— S. 306
(vi) हत्या, सदोष मानव
वध तथा आत्म हत्या के प्रयत्न —– S. 307, 308, 309
(vii) ठग होना ——————————- S. 310
(viii) गर्भपात करना, शिशु को अरक्षित छोड़ देना तथा
बच्चों के जन्म को छिपाना ———- S. 312-318
3. सदोष मानव वध मनव जीवन के विरुद्ध अपराध है यह एक संशेय अजमानतीय तथा सत्र न्यायलय द्वारा अनन्यत: विधारणीय अपराध है|
सदोष मानव वध एक पद है-
1. HOMICIDE शब्द की उत्पत्ति लैटिन है [HOMO+CIDO]
2. Walker के अनुसार Homicide एक वंशीय पद है इसकी अनेक प्रजातियाँ है, जैसे-
(i) सदोष मानव वध
(ii) हत्या
(iii) अपेक्षापूर्वक कारित मानव वध
(iv) औचित्यपूर्ण तथा क्षम्य मानव वध
उपरोक्त में से प्रथम दो [सदोष मनवे वध तथा हत्या] अपराधिक है क्योंकि यह साशय या ज्ञान से किये गये कृत्य से फलित होते हैं| अपेक्षापूर्वक कारित मनव वध साशय नहीं होता है अत: इसे आपराधिक नहीं समझा जाता है| इसे प्राय: दुष्कृतिक [Tortious] माना जाता है|
3. सदोष मानव वध को साधारण सदोश मनव वध या ऐसा सदोष मानव वध जो हत्या के समतुल्य नहीं है भी कहा जाता है| आंग्ल विधि में इसे Man Sliughter कहते हैं अमेरिकी विधि में इसे द्वितीय कोटि की हत्या कहते हैं|
4. सदोष मानव वध मानव द्वारा मानव का वध [S. 299 में निर्दिष्ट आशय या ज्ञान के अधीन] है| मानव द्वारा मानव की मृत्यु त्वरित करना भी सदोष मनव वध हो सकता है [स्पष्टीकरण-I तथा II] धारा- 299
सदोष मानव वध की परिभाषा तथा उसके आवश्यक तत्व:-
1. सदोष मानव वध की परिभाषा-
सदोष मानव वध धारा 299 में परिभाषित है इस परिभाषा का विस्तृत रूप धारा 300 में हत्या की परिभाषा निर्मित करता है सर जेम्स स्टीफन ने इस परिभाषाओं की आलोचना की है| उनके अनुसार यह परिभाषाएं सुगड़ (well duauem) नहीं है| यह संहिता का दुर्बलतम पक्ष है|
2. धारा 299 के अनुसार-
“जो कोई-
1. (i) मृत्यु कारित करने के आशय से या
(ii) ऐसी शारीरिक क्षति, जिससे मृत्यु संभाव्य हो, कारित करने के आशय से
(iii) यह ज्ञान रखते हुए भी मृत्यु संभाव्य है,
2. कोई कृत्य करके मृत्यु कारित करता है, वह सदोष मानव वध का अपराध कारित करता है|”
3. आवश्यक तत्व:-
(i) अभियुक्त द्वारा कोई कृत्य किया गया हो
(ii) ऐसे कृत्य से मृत्यु फलित हुई हो
(iii) ऐसा कृत्य-
(a) मृत्यु कारित करने के आशय से
(b) ऐसी शारीरिक क्षति जिससे मृत्यु संभव हो कारित करने के आशय से
(c) इस ज्ञान से की उससे मृत्यु संभव है किया गया होना चाहिए|
4. कोई कृत्य-
(i) कृत्य में अवैध लोप शामिल है कृत्य में कृत्यों की श्रृंखला भी शामिल है इसी प्रकार, अवैध लोप में लोपों की श्रृंखला भी शामिल है| [धारा 32, 33 I.P.C]
5. अभियुक्त के कृत्य से मृत्यु का फलित होना-
(i) अभियुक्त को यह सिद्ध करना होगा कि अभियुक्त के कृत्य तथा परिवादिक कृत्य के मध्य कार्यमात्मक संबद्धता है|
(ii) मृत्यु से तात्पर्य मानव की मृत्यु से है [धारा 46 I.P.C]
(iii) अभियोजन को धारा 299 में निर्दिष्ट आशय या ज्ञान भी सिद्ध करना होगा जहाँ अभियुक्त का कृत्य निर्दिष्ट आशय या ज्ञान से न हो वहां अभियुक्त का कृत्य सदोष मानव वध नहीं होगा भले ही उसके कृत्य से मृत्यु फलित हई हो [Rahi, 1866; Nirbhaya singh, 1972]
(iv) बाध्यकारी कृत्य से फलित कृत्य भी सदोष मानव वध हो सकती है| [बसप्पा, 1968 R. v/s curley 1909]
(v) State of Bihar v/s Pashupati singh 1973 S.C.
Held:- जहाँ कारित शारीरिक क्षति मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त हो, वहां यह प्रश्न निरर्थक हो जाता है कि अभियुक्त मृत्यु कारित करने का आशय या ज्ञान रखता था कि नहीं|
6. घोर उपेक्षा (प्रलक्षित ज्ञान) के आधार पर स. मानव वध हेतु दायित्व:-
(i) ज्ञान वास्तविक या प्रलक्षित हो सकता है प्रलक्षित ज्ञान का आधार घोर उपेक्षा हो सकता है| प्रलक्षित ज्ञान के आधार पर स. मानव वध का कृत्य उत्पन्न हो सकता है|
(ii) प्रलक्षित ज्ञान के आधार पर यह प्रकल्पना की जा सकती है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कृत्य के स्वाभाविक तथा संभाव्य परिणामों के उत्पन्न होने का ज्ञान रखता है|
(iii) Cases:-
(a) Palagi Gowndan, 1919
(b) Sri Narayan, 1947
(c) Chatur Nath, 1919
(d) Kangla, 1898
Palagi Gowndan, 1919
अभियुक्त ने अपनी पत्नी पर हल के फल से प्रहार किया| प्रहार ऐसा नहीं था जिससे मृत्यु संभाव्य हो| अभियुक्त की पत्नी प्रहार के कारण बेहोश हो गई थी| अभियुक्त ने उसे मृत समझाते हुए तथा अभियोग से बचने के लिए आत्महत्या का रूप देने के लिए उस महिला के गले में फंदा डालकर उसे छत से लटका दिया|
Held:- अभियुक्त स. मानव वध का दोषी नहीं है उसे घोर उपहति के लिए दोषी समझा गया|
Sri Narayan, 1947
अभियुक्त ने पीड़ित के सर पर भले हुई लकड़ी से प्रहार किया पीड़ित के नाक से खून बहने लगा वह बेहोश हो गया| अभियुक्त तथा उसकी पत्नी ने चिता पर रख कर उसे जला दिया|
Held:- अभियुक्त घोर अपेक्षा के आधार पर प्रकल्पित ज्ञान के माध्यम से स. मानव वध का दोषी है|
Chatur Nath, 1919
अभियुक्त तथा परिवादी के मध्य अँधेरी रत में विवाद हुआ| अभियुक्त ने परिवादी पर डंडे से प्रहार किया|
परिवादी की पत्नी [जिसकी गोद में बच्चा था] परिवादी को बचाने के लिए बीच में आई| अभियुक्त का प्रहार चूक गया डंडा बच्चे के सर पर लगा| बच्चे का मृत्यु हो गया|
Held:- यदि प्रश्नगत प्रहार परिवादी पर पड़ा होता तो उसे अधिक से अधिक साधारण उपहति कारित हुई होती| अत: अभियुक्त केवल साधारण उपहति के लिए दायी है|
Kangla, 1898
अभियुक्त ने पीड़ित को प्रेत समझते हुए उस पर लाठी से प्रहार किया अभियुक्त बुरी तरह डरा हुआ था| उसने यह जानने का भी प्रयास नहीं किया कि जिस पर वह प्रहार कर रहा है वह आदमी है या प्रेत|
Held:- अभियुक्त घोर अपेक्षा के माध्यम से प्रकल्पित ज्ञान के आधार पर सदोष मानव वध के लिए दायी होगा|
7. प्लीहा/तिल्ली [spleen Rapture case] पड़ने के मामले में:-
(i) Megha Miyan, 1965
(ii) Panchanan Tanti, 1868
(iii) Fox, 1879
(iv) Munni Lal, 1849
Megha Miyan, 1865
अभियुक्त ने एक इंच व्यास वाले डंडे से मृतक पर प्रहार किया प्लीहा फट जाने के कारण पीड़ित की मृत्यु हो गई|
Held:- “अभियुक्त घोर उपहति का दोषी है|”
Panchanan Tanti, 1868
अभियुक्त ने अपनी पत्नी को धक्का दिया वह भूमि पर गिर पड़ी प्लीहा फट जाने से महिला की मृत्यु हो गई|
Held:- ‘अभियुक्त साधारण उपहति कारित करने का दोषी है|’
Fox, 1879
पीड़ित एक पंखा ठीक कर रहा था उसकी आकुशलता से क्रोधित होकर अभियुक्त ने उसे एक दो घूसे मारे, प्लीहा फट जाने से उसकी मृत्यु हो गई|
Held:- ‘अभियुक्त साधारण उपहति का दोषी है|’
Munni Lal, 1949
अभियुक्त पीड़ित के सीने पर चढ़ बैठा पीड़ित का गला घोटने लगा, प्लीहा फट जाने से मृत्यु हो गई|
Held:- ‘अभियुक्त तृतीय कोटि के मानव वध के लिए दायी है|’
धारा- 299 के स्पष्टीकरण:-
1. स्पष्टीकरण-I :-
(i) ऐसा व्यक्ति जो किसी विकार, रोग या अंग शैथिल्य से ग्रस्त व्यक्ति के शारीरिक क्षति कारित करता है तथा तदद्वारा उसकी मृत्यु कारित करता है, वह ऐसी मृत्यु का कर्ता समझा जायेगा|
(ii) स्पष्टीकरण-I प्रकल्पित मृत्यु के माध्यम से स. मानव वध हेतु दायित्व सृजित करता है| इसका मूल तत्व यह है कि शारीरिक क्षति द्वारा मृत्यु कारित करने वाला व्यक्ति फलित मृत्यु का कर्ता समझा जायेगा|
(iii) यह आवश्यक है कि मृतक सामान्य स्वास्थ्य का व्यक्ति न रहा हो उसे किसी विकार, रोग या अंग शैथिल्य से ग्रस्त होना था|
2. स्पष्टीकरण-II :-
(i) जहाँ शारीरिक क्षति से मृत्यु कारित की गई हो वहां शारीरिक क्षति कारित कर्ता फलित मृत्यु का प्रकल्पित कर्ता समझा जायेगा यधपि उचित उपचार तथा दक्ष चिकित्सा से वह मृत्यु निवारित की जा सकती थी|
(ii) स्पष्टीकरण-II का सैधांतिक आधार-
(a) मृत्यु का प्राथमिक कारण सृजित करने वाला व्यक्ति फलित मृत्यु हेतु दायी होगा भले ही ऐसे मृत्यु का कोई द्वितीय कारण रहा हो |
(b) यह तर्क की दक्ष चिकित्सा तथा समुचित उपचार मृत्यु टाल सकता था, स्वीकार नहीं हो सकता है| ऐसा तर्क अभियुक्त को अवांछित लाभ देगा|
(iii) Cases:-
• Shah Pal, 1936, Rangoon (यंगून)
• NGA PAW, 1936, Rangoon
• Mc Intyr, 1874
• Davis, 1887
Shah Pal, 1936 Rangoon
सद्भावनापूर्ण उपचार के बावजूद पीड़ित की मृत्यु हो गई थी|
Held:- शारीरिक क्षति कारित करने वाला व्यक्ति स. मानव वध का दायी होगा भले ही उसकी राय में उपचार दक्ष तथा उचित न रहा हो|
NGA PAW, 1936, Rangoon
इस प्रकरण में अभियुक्त ने मृतक को शारीरिक क्षति कारित किया| गंदगी के सम्बन्ध में आने के कारण उग्र हो गई| पीड़ित ग्रैंग्रीन से ग्रस्त हो गया| उसकी मृत्यु हो गई|
Held:- अभियुक्त प्रकल्पित मृत्यु के माध्यम से स. मानव वध हेतु दायी होगा|
Mc Intyr, 1874
अभियुक्त ने अपनी पत्नी को शारीरिक क्षति कारित किया चिकित्सीय भूल के कारण औषधि के रूप में पिलाया गया अल्कोहल पीड़ित महिला के फेफड़े में चला गया| दम घुटने से उसकी मृत्यु हो गई|
Held:- अभियुक्त प्रकल्पित मृत्यु के माध्यम से स. मानव वध हेतु दायी है|
Davis, 1887
अभियुक्त ने पीड़ित को एक घूसा मारा, गंभीर चोट आई ऑपरेशन आवश्यक हो गया क्लोरोफॉर्म की अधिक मात्र देने के कारण पीड़ित की मृत्यु हो गई|
Held:- अभियुक्त स्पष्टीकरण-II के माध्यम से स. मानव वध के लिए दायी है|
3. स्पष्टीकरण-III :-
मां के गर्भ में किसी शिशु की मृत्यु कारित करना मानव वध नहीं है किन्तु किसी जीवित शिशु की मृत्यु कारित करना अपराधिक मानव वध हो सकेगा| यदि उस शिशु का कोई भाग बाहर आ गया हो [यधपि उस शिशु ने सांस न लिया हो या उसने पूर्णत: जन्म न लिया हो]
स्पष्टीकरण-III The Medical Termination of Pregnancy Act गर्भ का चिकित्सीय|
इसके अनुसार 4 माह या उससे अधिक का गर्भ दो परिस्थितियों में ही समाप्त किया जा सकता है-
(a) मां के जीवन के रक्षा के लिए तथा
(b) जबकि शिशु शारीरिक या मानसिक रूप से इतना असामान्य हो कि जन्म लेने पर वह सामान्य जीवन यापन नहीं कर सकेगा|
सदोष मानव वध हेतु दण्ड ——– धारा 304
1. प्रथम तथा द्वितीय कोटि का मानव वध धारा 304 हेतु प्रथम खंड में 10 वर्ष तक के किसी भी प्रकार के कारावास से तथा अर्थदण्ड से दंडनीय होगा| आजीवन कारावास भी दिया जा सकेगा|
2. तृतीय कोटि का स. मानव वध धारा 304 के द्वितीय खंड में 10 वर्ष तक किसी भी प्रकार का कारावास या अर्थदण्ड या दोनों से दंडनीय है|
सदोष मानव वध का प्रयत्न ————– धारा 308
7 वर्ष तक का किसी भी प्रकार का कारावास या अर्थदण्ड या दोनों|
1. अध्याय-XVI (S. 299-377) मानव शरीर को प्रभावित करने वाले अपराध से सम्बंधित है यह संहिता का सबसे बड़ा अध्याय है| इसे दो स्थूल वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-
(i) मानव शरीर के विरुद्ध अपराध ——- S. 299-318
(ii) मानव शरीर के विरुद्ध अपराध ——- S. 319-377
2. मानव जीवन के विरुद्ध अपराध:-
(i) सदोष मानव वध ———————- S. 299, 304 r/w 301
(ii) हत्या ———————————— S. 300, 302 r/w 301
(iii) अपेक्षापूर्वक मृत्यु कारित करना —– S. 304-A
(iv) दहेज़ मृत्यु —————————– S. 304-B
(v) आत्महत्या का दुष्प्रेरण ————— S. 305, 306
(vi) प्रयत्न [सदोष मनव वध, हत्या, आत्महत्या] —- S. 307, 308, 309
(vii) ठग होना —————————— S. 310, 311
(viii) गर्भपात करना, शिशु को अरक्षित छोड़ देना
तथा शिशु जन्म को छिपाना ——- S. 312-318
3. मानव द्वारा मानव का वध या मानव द्वारा मानव की मृत्यु त्वरित करना मानव वध गठित करता है| मानव वध एक वंशीय पद है| इसकी निम्नलिखित प्रजातियाँ हैं-
(i) सदोष मानव वध
(ii) उपेक्षापूर्ण मानव वध (Homicide)
(iii) दहेज़ मृत्यु
(iv) हत्या
(v) औचित्यपूर्ण तथा क्षम्य मानव वध
4. सदोष मानव वध तथा हत्या दोनों ही मानव वध की प्रजातियां है| हत्या, सदोष मानव वध की प्रजाति है| सदोष मानव वध के दो प्रकार है-
(i) साधारण सदोष मानव वध या
(ii) ऐसा सदोष मानव वध जो हत्या के समतुल्य नहीं है|
(iii) ऐसा सदोष मानव वध जो हत्या के समतुल्य है|
5. साधारण सदोष मानव तथा धारा 299 में परिभाषित है| इसके अनुसार-
“स. मानव वध धारा 299 में निर्दिष्ट आशय या ज्ञान के अधीन किये गया मृत्यु से फलित मृत्यु है|”
6. धारा 299 स. मानव वध की तीन श्रेणिया प्रावधानित करते हैं-
(i) प्रथम कोटि का स. मानव वध
(ii) द्वितीय कोटि का स. मानव वध
(iii) तृतीय कोटि का स. मानव वध
मृत्यु कारित करने के आशय से किये गये कृत्य से फलित मृत्यु प्रथम कोटि का स. मानव वध है| यह हत्या के समतुल्य होने पर धारा 302 के अंतर्गत दंडनीय होगा यदि यह हत्या के समतुल्य नहीं है तो यह धारा 304 के प्रथम खंड के अंतर्गत दंडनीय है|
द्वितीय कोटि का स. मानव वध यदि हत्या के समतुल्य है तो यह धारा 302 के अंतर्गत दंडनीय होगा यदि यह हत्या के समतुल्य नहीं है तो यह धारा 304 के प्रथम खंड के अंतर्गत दंडनीय होगा| द्वितीय कोटि का जो ऐसी क्षति कारित करने के आशय से किया गया था जिससे मृत्यु संभाव्य थी|
तृतीय कोटि का सदोष मानव वध ऐसे कृत्य से फलित मृत्यु है जो बिना आशय से किन्तु जो इस ज्ञान के साथ किया गया कि उससे मृत्यु संभाव्य है| तृतीय कोटि का स. मा. वध हत्या के समतुल्य होने पर धारा 302 के अंतर्गत दंडनीय होगा यदि यह हत्या के समतुल्य नहीं है तो यह धारा 304 के द्वितीय खंड में दंडनीय होगा|
हत्या (Murder)
1. “हत्या” स. मानव वध की एक प्रजाति है इसमें स. मानव वध की अपेक्षा आपराधिकता की कोटि अधिक होती है| दूसरे शब्दों में, “हत्या” सदोष मानव वध का ही एक उग्र रूप है|
2. “हत्या” धारा 300 के अंतर्गत परिभाषित है| यह परिभाषा नकारात्मक है वस्तुत:, यह स. मानव वध की परिभाषा का ही विस्तृत रूप है|
3. ऐसा सदोष मानव वध जो धारा 300 के संगत खंड के अतिरिक्त अपेक्षाओं को पूर्ण करता है किन्तु जो धारा 300 के किसी अपवाद में नहीं आता है वह हत्या होगा|
4. धारा 300 के उपबंध- “एतस्मिन पश्चात आपवादित दशाओं को छोड़कर आपराधिक मानव वध हत्या है, यदि वह कार्य जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गई हो, मृत्यु कारित करने के आशय से किया गया हो, अथवा
दूसरा- यदि वह ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से किया गया हो जिससे वह अपराधी जनता हो कि उस व्यक्ति की मृत्यु कारित करना संभाव्य है, जिसको वह अपहानि कारित की गई है, अथवा
तीसरा- यदि वह किसी व्यक्ति को शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से किया गया हो और वह शारीरिक क्षति, जिसके कारित करने का आशय हो, प्रकृति के मामूली अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त हो, अथवा
चौथा- यदि कार्य करने वाला व्यक्ति जानता हो कि वह कार्य इतना आसन्न संकट है कि पूरी अधिसंभाव्यता है कि वह मृत्यु कारित कर ही देगा या ऐसी शारीरिक क्षति कारित कर ही देगा जिससे मृत्यु कारित होना संभाव्य है और वह मृत्यु कारित करने या पूर्वोक्त रूप की क्षति कारित करने की जोखिम उठाने के लिए किसी प्रति हेतु के बिना ऐसा कार्य करे|
धारा 300 के उपबंधों की व्याख्या
1. धारा 300 का प्रथम खंड-
(i) धारा 300 का प्रथम खंड धारा 299 के प्रथम खंड को दोहराता है| अत: प्रथम कोटि का सदोष मानव वध अनिवार्यत: हत्या है| किसी अतिरिक्त अपेक्षा की संतुष्टि वांछित नहीं है| एक मात्र प्रतिबंध यह है कि मामला धारा 300 के किसी अपवाद में न आता हो|
2. धारा 300 का द्वितीय खंड-
(i) द्वितीय कोटि का स. मा. वध होगा यदि धारा 300 के द्वितीय या तृतीय खण्डों में से किसी खंड की अपेक्षा पूर्ण हो जाती है किन्तु मामला S. 300 के अपवाद में नहीं आता|
(ii) धारा 300 का द्वितीय खंड अभियुक्त के विशेष ज्ञान पर दृष्टिपात करता है| आपराधिकता विशेष ज्ञान आपराधिकता की कोटि बड़ा देता है| अत: आशयित शारीरिक क्षति के अपेक्षाकृत हल्का होने के बावजूद अपराधी हत्या के लिए दायी हो जाता है|
3. धारा 300 के तृतीय खंड-
(i) द्वितीय कोटि का स. मा. वध हत्या होगा यदि साशय कारित क्षति इतनी प्रचंड है कि प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में वह मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त है|
4. धारा 300 का चतुर्थ खंड-
(i) तृतीय कोटि का स. मा. वध आशय विहीन कृत्य किन्तु जो सज्ञान था [मृत्यु की संभावना की दृष्टि से] से फलित मृत्यु है|
(ii) तृतीय कोटि का स. मा. वध आपराधिकता की कोटि बढ़ जाने के आधार पर धारा 300 के अधीन हत्या गठित करेगा|
(iii) अपराधिकता की कोटि में वृद्धि के आधार:-
(a) अपराधी को कार्य के इतना आसन्न संकट होने का ज्ञान की प्रत्येक संभाव्यता है कि उसका कृत्य या तो मृत्यु कारित कर देगा या मृत्यु की संभाव्यता से युक्त शारीरिक क्षति कारित कर देगा|
(b) ऐसे ज्ञान के बावजूद बिना किसी प्रति हेतु के, अपराधी द्वारा मृत्यु कारित करने या मृत्यु कारित करने की संभाव्यता, से युक्त कृत्य शारीरिक क्षति का संकट मोल लेना|
धारा 300 के अपवाद:-
1. धारा 300 I.P.C. पांच (5) अपवाद प्रावधानित करती है यह विशेष अपवाद है| इनकी परिधि में आने वाला मामला हत्या नहीं होगा| ऐसा मामला एक ऐसा स. मा. वध होगा जो हत्या नहीं है|
2. धारा 300 के किसी भी अपवाद में आने वाले मामले में अभियुक्त दांडिक दायित्व से मुक्त नहीं होगा| यह अपवाद सिर्फ उसके दायित्व को सीमित करते है| दोषी व्यक्ति धारा 302 के स्थान पर धारा 304 I.P.C के अनुसार दंडनीय होगा|
3. गंभीर तथा अचानक प्रकोपण ————- अपवाद- I
(i) सदोष मानव वध हत्या नहीं है यदि गंभीर तथा अचानक प्रकोपण के कारण आत्म नियंत्रण की शक्ति से वंचित होकर अपराधी या तो प्रकोपन कर्ता की या भूल या घटनावश किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु कारित कर देता है|- r/w illus. (b)
(ii) उपरोक्त नियम निम्न. परंतुकों के अधीन है-
(a) प्रकोपन वास्तविक तथा स्वाभाविक होना चाहिए इसे कृत्रिम या स्वैच्छिक नहीं होना चाहिए| यह किसी व्यक्ति का वध करने या उसे अपहानि कारित करने का बहाना मात्र नहीं होना चाहिए| r/w illus.(a), (f)
(b) प्रकोपन विधि के पालन में लोक सेवक द्वारा किये गये कृत्य से उद्भूत नहीं होना चाहिए| r/w (c), (d)
(c) प्रकोपन आत्मरक्षा के विधिसम्मत प्रयोग में किये गये कृत्य से नहीं होना चाहिए|- r/w illus. (e)
(iii) क्या प्रकोपन अपराध को हत्या होने से निवारित करो के लिए पर्याप्त अचानक तथा गंभीर था, यह तथ्य का प्रश्न है|
(iv) K.M Narawati v/s State of Maharashtra, 1962 S.C
(a) शब्द तथा हाव-भाव गंभीर तथा अचानक प्रकोप कारित कर सकते है|
(b) मृतक के पूर्व कृत्यों द्वारा सृजित मानसिक पृष्ठ भूमि भी विचारणीय है|
(c) आपराधि का सामाजिक स्तर भी विचारणीय बात होगी|
(d) घातक प्रहार (Fatal blow) प्रकोपन से उत्पन्न भावावेश में किया गया होना चाहिए| भवावेश, के शिथिल (cool down) पड़ जाने के बाद किया गया प्रहार अपवाद के प्रयोजनों हेतु असंगत होगा|
4. अपवाद-II आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग में विधिक सीमा के अतिलंघन में कारित स. मानव वध:-
(i) स. मानव वध हत्या नहीं है यदि अपराधी शरीर या संपत्ति के आत्मरक्षा के अधिकार के सद्भावनापूर्वक प्रयोग में विधि शक्ति के अतिचालन में आक्रमणकर्ता की मृत्यु कारित करता है|
(ii) अपवाद-II का लाभ निम्न प्रतिबंधों के अधीन है-
(a) कारित मृत्यु पूर्वचिंतन के बिना हो तथा
(b) अपराधी प्रतिरक्षा के प्रयोजनों हेतु आवश्यक अपहानि से अधिक अपहानि कारित करने का आशय न रखता हो|
(iii) दृष्टान्त:-
5. लोक सेवक या उसकी सहायता में कार्यरत व्यक्ति द्वारा विधिक शक्ति का अतिलंघन ——- अपवाद-III
(i) स. मानव वध हत्या नहीं है यदि अपराधी लोक न्याय के अनुसरण में कार्यरत लोक सेवक या उसे सहायता देने वाला व्यक्ति होते हुए विधिक शक्ति के अतिलंघन में मृत्यु कारित करता है|
(ii) अपवाद-III निम्न. शर्तों के अधीन है-
(a) अपराधी सद्भावनापूर्वक कार्यरत;
(b) सद्भावनापूर्वक विश्वास की कर्तव्य के निष्पादन हेतु परिवादित कृत्य किया जाना विधि सम्मत तथा आवश्यक था|
(c) मृतक के प्रति कोई वैमनस्य न रहा हो|
6. अचानक लड़ाने में पूर्वचिंतन के बिना कारित सदोष मानव वध ———- अपवाद-IV
(i) स. मानव वध हत्या नहीं है यदि वह अचानक झगड़ा की आवेश की तीव्रता में हुई अचानक लड़ाई में किये गये कृत्य का परिणाम है|
(ii) अपवाद IV निम्न. शर्तों के अधीन है-
(a) पूर्व चिंतन का आभाव,
(b) अपराधी ने असम्यक लाभ न लिया हो या उसने क्रूर या असामान्य ढंग से कार्य न किया हो|
यह सारहीन होगा कि किस पक्ष ने प्रकोपन दिया था या प्रथम प्रहार किया था [अपवाद-IV का स्पष्टीकरण]|
7. सहमती के अधीन कारित स. मानव वध ——- अपवाद-V
(i) स. मानव वध हत्या नहीं है यदि मृतक 18 वर्ष से अधिक आयु का होते हुए-
(a) मृत्यु भूगतता है या
(b) मृत्यु भुगतने का जोखिम मोल लेता है [अपनी सहमति से]
(ii) दृष्टांत:-
(iii) Dashrath Paswan, 1958 के मामले में अपराधी ने, अपनी व्यस्क पत्नी की सहमती से उसकी मृत्यु कारित कर दिया था| अपराधी को अपवाद-V का लाभ दिया गया|
1. सदोष मानव वध तथा हत्या के मध्य मूल भेद आपराधिक कर्ता की कोटि (degree of criminality) का है| स. मा. वध के अपराधिकता की कोटि अपेक्षाकृत कम है जबकि हत्या में अपराधिकता की कोटि अपेक्षाकृत अधिक है|
2. स. मा. वध एक वंश (genus) है जबकि हत्या उसकी एक प्रजाति (specie) है दूसरे शब्दों में प्रत्येक हत्या एक स. मानव वध है किन्तु प्रत्येक स. मा. वध अनिवार्यत: हत्या नहीं है|
3. R. v/s Govinda, 1876 Bombay के प्रकरण में न्यायमूर्ति मेलविल ने स. मानव वध तथा हत्या में विभेद करते हुए निम्न. प्रक्षेपण किया है-
(i) दोनों अपराधों में अंतर सूक्ष्म (fine) है किन्तु यह परख योग्य (appreciable) है|
(ii) दोनों अपराधों को विभेदित करने के लिए धारा 299 तथा 300 के संगत खंडों की तुलना करते हुए विभिन्न खंडों में प्रयुक्त महत्वपूर्ण शब्दों पर दृष्टिपात करना होगा|
4. न्यायमूर्ति मेलविन ने धारा-300 तथा 299 के संगत खंडों को निम्नलिखित प्रकार से प्रस्तुत किया-

धारा – 299 धारा – 300
कोई व्यक्ति मानव–वध कारित करता है जब वह कार्य जिससे मृत्यु कारित की गई है,
(क) मृत्यु कारित करने के आशय से, या
(ख) ऐसी शारीरिक उपहति कारित करने के आशय से जिससे मृत्यु कारित होना संभाव्य हो या,

(ग) इस ज्ञान से कि वह ऐसे कार्य द्वारा मृत्यु कारित कर सकता है, किया गया
हो|

इस धारा में वर्णित अपवाद को छोड़कर आपराधिक मानव वध हत्या है यदि वह कार्य जिससे मृत्यु कारित की गई है|
(1) मृत्यु कारित करने के आशय से, या
(2) ऐसी शारीरिक उपहति कारित करने के आशय से जिससे अपराधी जनता हो कि उस व्यक्ति की मृत्यु कारित करना संभाव्य है| जिसको उपहति कारित की गई है, या
(3) किसी व्यकी को शारीरिक उपहति कारित करने के आशय से और वह शारीरिक उपहति जिसे कारित करने के आशय है, प्रकृति के सामान अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त हो, या
(4) इस ज्ञान से कि वह कार्य आसन्न संकट से इतना परिपूर्ण है कि हर अधिसंभाव्यता के अंतर्गत उस कार्य से मृत्यु हो ऐसी शारीरिक उपहति जिससे मृत्यु कारित होना सम्भाव्य हो, किया या हो

5. आंध्र प्रदेश बनाम रायावरप्पू पुनैया, 1977 S.C. के प्रकरण में न्यायमूर्ति सरकारिया ने सदोष मानव वध तथा हत्या को विभेदित करते हुए निम्नलिखित प्रेक्षण किया-
(i) सर्वप्रथम यह देखना चाहिए कि अभियुक्त के कृत्य तथा परिवादित मृत्यु के मध्य कारणात्मक संबद्धता है|
(ii) यदि अभियुक्त का कृत्य तथा परिवादित मृत्यु के मध्य कारणात्मक संबद्धता है तब यह देखना होगा की क्या अभियुक्त का कृत्य अपेक्षित आशय या ज्ञान (धारा 299 में निर्दिष्ट) से किया गया था| यदि अपेक्षित आशय या ज्ञान सिद्ध हो जाता है तो अभियुक्त का कृत्य सदोष मानव वध गठित करेगा|
(iii) यदि अभियुक्त का कृत्य सदोष मानव वध है तब मामले की आगे परीक्षा की जनी चाहिए| यह देखना चाहिए की धारा 300 के खंड की अतिरिक्त अपेक्षायें संतुष्टि हो रही है यदि अतिरिक्त अपेक्षायें संतुष्ट हो रही है तो मामला हत्या होगा (यदि मामला धारा 300 की अपवाद के परिधि में नहीं आता है)|


सामान्य:-
1. Hurt को शारीरिक अपराध की कोटि में रखा गया है| अर्थात यह एक शरीर के विरुद्ध अपराध है| Hurt को इस संहिता के अध्याय-16 में बताया गया है तथा यह धारा 319-338 तक विस्तृत है|
2. “उपहति” का अर्थ एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को पीड़ित रोग या अंग शैथिल्य कारित करता है [Modha singh, 1878] ऐसी पीड़ित कारित करने के लिए अभियुक्त और अतिग्रस्त व्यक्ति के बीच सीधा शारीरिक सम्पर्क होना जरूरी नहीं है|
3. ऐसा कार्य जिसने न तो मृत्यु आशयित है और न ही मृत्यु होना सम्भाव्य है, उपहति की प्रकृति के अनुसार या तो साधारण उपहति होंगे या घोर उपहति, भले ही उन कार्यों से मृत्यु कारित की गई हो|
4. “उपहति” के अंतर्गत वे शारीरिक पीड़ा आती है जिसमें शिकायत कोई सामान्य प्रश्न वाला व्यक्ति शिकायत नहीं करेगा| उपहति के लिए अवधि (पीड़ा की) महत्वपूर्ण नहीं है| किसी स्त्री को केश पकड़ कर खींचना उपहति के अंतर्गत आता है|
5. अंग शैथिल्यता का अर्थ है, अपने सामान्य कार्यों को सम्पादित करने में किसी अंग की आयोग्यता और यह अयोग्यता स्थायी या अस्थायी हो सकती है|
मुख्य उपहति:-
(i) उपहति ————————————————– S.319
(ii) घोर उपहति ——————————————— S. 320
(iii) स्वेच्छया घोर उपहति कारित करना —————– S. 322 r/w 325
(iv) स्वेच्छया उपहति कारित करना ———————– S. 321 r/w 323
(v) खतरनाक साधनों द्वारा V.G.H. ——————— S. 324, 326
(vi) प्रकोपन पर स्वेच्छया उपहति कारित करना ——— S. 334 r/w 300
(vii) प्रकोपन पर स्वेच्छया घोर उपहति कारित करना —- S. 335 r/w 300
परिभाषा तथा आवश्यक तत्व:-
1. परिभाषा- उपहति (S. 319)
“जो कोई किसी व्यक्ति को शारीरिक पीड़ा, रोग या अंग शैथिल्य कारित करता है, वह उपहति कारित करता है, यह कहा जाता है|”
2. आवश्यक तत्व:-
(i) किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को-
(ii) शारीरिक पीड़ा
(iii) रोग
(iv) अंग शैथिल्य
3. घोर उपहति- S. 320:-
उपहति में ‘केवल’ नीचे लिखी किस्में ‘घोर’ कहलाती है-
प्रथम:- पुंसत्वहरण
दूसरा:- दोनों में से किसी नेत्र की दृष्टि का स्थायी विच्छेद
तीसरा:- दोनों में से किसी की कान की श्रवणशक्ति का स्थायी विच्छेद
चौथा:- किसी भी अंग या जोड़ का विच्छेद
पांचवा:- किसी भी अंग या जोड़ की शक्तियों का नाश या स्थायी ह्रास
छटा:- सिर या चेहरे का स्थायी विदूपीकरण
सातवां:- अस्थि या दांत का भंग या विसंधान
आठवा:- कोई उपहति जो जीवन को संकटापन्न करती है या जिसके कारण उपहत व्यक्ति बीस दिन तक तीव्र शारीरिक पीड़ा में रहता है या अपने मामूली कामकाज के करने के लिए असमर्थ रहता है|
4. धारा 321 स्वेच्छा उपहति कारित करना:-
जो कोई किसी कार्य को इस आशय से करता है कि उससे किसी व्यक्ति को उपहति कारित करता है या इसकी सम्भावना की ज्ञान रखता है, और इस प्रकार से व्यक्ति को उपहति कारित करता है, वह “स्वेच्छया उपहति” कारित करता है, यह कहा जाता है|


1. व्यपहरण मानव शरीर के विरुद्ध अपराध है यह मानव जीवन के प्रति अपराध नहीं है| अपहरण एक सहायक कृत्य है यह कोई अपराध नहीं है [जब तक कि आवश्यक दुराशय के साथ न किया गया हो]
2. धारा- 358 व्यपहरण के दो प्रकारों का उल्लेख करती है-
(i) भारत में से व्यपहरण
(ii) विधिक संरक्षकता में से व्यपहरण
उपरोक्त दोनों प्रकारों के व्यपहरण क्रमश: धारा 360 तथा 361 में परिभाषित है| दोनों ही धारा 363 के अंतर्गत 7 वर्ष के किसी भी भांति की कारावास और दण्ड से दंडनीय है| ये दोनों अपराध असतत अपराध है|
3. अपहरण धारा- 362 में परिभाषित है यह सतत कृत्य है यह स्वयं में कोई अपराध नहीं है यह केवल सहायक कृत्य है| विशिष्ट दुराशय होने पर यह अपराध गठित करेगा और दंडनीय होगा|
4. धारा- 363-A, 364-A, 366-A, 366-B उत्तरवर्ती अंत: स्थापन है|
व्यपहरण [Kidnapping]- S. 359, 360, 361, 363
1. धारा 359 I.P.C के अनुसार व्यपहरण दो प्रकार के होते है| धारा 360 भारत में से व्यपहरण को परिभाषित करती है धारा 361 अभिसम्मत संरक्षकता में से व्यपहरण को परिभाषित करती है|
2. व्यपहरण का शाब्दिक अर्थ है बालक की चोरी| व्यवहारत: व्यपहरण का अपराध व्यस्क तथा चितविकृत व्यक्ति के खिलाफ भी हो सकता है|
3. भारत में से व्यपहरण- परिभाषा — धारा- 360
(i) “जो कोई किसी व्यक्ति का, उस व्यक्ति की या उसकी ओर से सहमति देने हेतु विधित: प्राधिकृत व्यक्ति की सम्मति के बिना भारत की सीमा से परे प्रवहण कर लेता है, उस व्यक्ति का भारत में से व्यपहरण करता है, यह कहा जाता है|”
(ii) आवश्यक तत्व:-
(a) अभियुक्त द्वारा किसी व्यक्ति का भारत के सीमा से परे प्रवहण किया गया हो, तथा
(b) ऐसा प्रवहण व्यक्ति या उसकी ओर से सहमती देने हेतु या विधित: प्राधिकृत व्यक्ति की सहमती के बिना किया गया हो|
(iii) सहमती का आभाव तथा भारत के सीमाओं से परे प्रवहण इस अपराध की मुख्य बात है|
(iv) प्रवहण शब्द संहिता में परिभाषित या स्पष्ट नहीं है सामान्य भाव में प्रवहण से तात्पर्य ले जाने, भेज देने, या पहुंचा देने से है|
(v) भारत से तात्पर्य धारा 18 I.P.C में परिभाषित भारत यथा परिभाषित से है| धारा 18 के अनुसार भारत में J&K राज्य शामिल नहीं है|
(vi) व्यक्ति शब्द धारा 11 I.P.C में परिभाषित है इसके अनुसार व्यक्ति में शामिल है कोई कंपनी या संगम या व्यक्तियों का निकाय चाहे नियमित हो या नहीं|
धारा 360 तथा 361 के प्रयोजनों हेतु व्यक्ति से तात्पर्य केवल वैसर्गिक व्यक्ति से है|
(vii) सहमती के आभाव से तात्पर्य वैध सहमती के आभाव से है| सहमती की वैधता धारा- 90 I.P.C के अनुसार तय की जाएगी| जहाँ वैध सहमती से प्रवहण किया गया हो वहां धारा 360 में परिभाषित अपराध गठित नहीं होगा|
4. विधिसम्मत संरक्षकता में से व्यपहरण- परिभाषा (S. 361)
परिभाषा (Definition):-
जो कोई किसी अप्राप्तवय को, यदि नर हो, तो 10 वर्ष से कम आयु वाले को, या यदि वह जारी हो तो, 18 वर्ष से कम वाली को या किसी विकृतचित व्यक्ति को, ऐसे अप्राप्तवय या चितविकृत व्यक्ति के विधिपूर्ण संरक्षकता में से ऐसे संरक्षक की सम्मति के बिना ले जाता है, या बहका ले जाता है, वह ऐसे अप्राप्तवय या ऐसे व्यक्ति का विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण करता है, यह कहा जाता है|
(i) Varadrajan vs. State of Madras, 1965 S.C.
Held:- “अव्यस्क को ले जाना” तथा अवयस्क को अपने साथ चल की अनुमति देना या साथ चलने से मना न करना नितांत भिन्न चीजे हैं| धारा 361 में परिभाषित अपराध गठित नहीं होगा जहाँ अभियुक्त ने अव्यस्क के साथ चलने से मना नहीं किया या साथ चलने की अनुमति दिया|
(ii) Karan Singh, 1916
Held:- संरक्षता विधि का विषय है यह अपनी पसंद या विकल्प से निर्धारित नहीं होता है अत: अवयस्क द्वारा यह घोषणा की वह अपनी ससुराल हमेशा के लिए छोड़ रही है और कभी वापस नहीं आएगी, उसके पति के सविधिसम्मत संरक्षता को समाप्त नहीं करती|
(iii) Baldev, 1870
Held:- धारा 361 में परिभाषित अपराध के लिए विचारण न्यायालय द्वारा की गई दोषसिद्धि अवैध है| अपील स्वीकार की गई| H.C. ने यह धारण किया कि बालिका विधि सम्मत संरक्षक की संरक्षकता में नहीं थी| अत: धारा 361 में परिभाषित अपराध गठित नहीं होगा
(iv) Emperor vs Nemai 1900 Calcutta
Facts- A अवयस्क बालिका को G को उसके पति के गृह से ले गया| A ने G को दो दिनों तक अपने पास रखा| इसी बीच B आ गया| B उसे अपने घर ले गया वहां G 20 दिनों तक रही तत्पश्चात B ने ने उसे C के पास पहुंचा दिया वहां से B तथा C उसे कलकत्ता के गये| C धारा 361 में परिभाषित अपराध के लिए विचारित किया गया| निर्णय दीजिये|
Held:- व्यपहरण असतत अपराध है| वह व्यक्ति ही दायी होगा जिसने अव्यस्क को प्रथम बार विधि सम्मत संरक्षकता में से हटाया था| एक बार संरक्षकता से बाहर निकाल लिए जाने के बाद दूसरे व्यक्ति द्वारा और ले जाने वाला व्यक्ति दायी नहीं होगा|
(v) व्यपहरण के दण्ड:
जो कोई भारत में से या विधिपूर्ण संरक्षकता में से किसी व्यक्ति का व्यपहरण करता है उसे दोनों में से किसी भी प्रकार के कारावास से जिसकी अवधि 7 वर्ष और जुर्माने से दंडनीय हो:
अपहरण (Abduction):-
1. अपहरण एक सहायक कृत्य है| यह स्वयं में कोई अपराध नहीं है आ. आशय या ज्ञान के अधीन अपहरण दंडनीय होगा| अवहरण एक सतत कृत्य है|
2. परिभाषा (Definition)- 362
“जो कोई किसी व्यकी को किसी स्थान से जाने के लिए बल पूर्वक बाह्य करता है या प्रवंछनापूर्ण साधनों द्वारा उत्प्रेरित करता है वह उस व्यक्ति को अपह्रत करता है, यह कहा जाता है|”
3. आवश्यक तत्व-
(i) अभियुक्त द्वारा बलपूर्वक बाह्य किया गया हो या प्रवंछनापूर्ण साधनों द्वारा उत्प्रेरित किया गया हो|
(ii) ऐसी बाध्यता या उत्प्रेरणा के अधीन पीड़ित व्यक्ति किसी स्थान से जाने के लिए बाध्य या उत्प्रेरित हुआ हो|
4. Cases-
• अल्लाहराखियों, 1934 सिंध
• फतनाया, 1942 लाहौर
• नाथा सिंह, 1883 इलाहाबाद
• गंगा देवी, 1914 इलाहाबाद
• अल्लू, 1925 लाहौर
(i) अल्लाह राखियों, 1934 सिंध
Held:- यह सिद्ध किया जाना चाहिए कि अपह्रत व्यक्ति का मस्तिष्क परिवर्तन बाह्य दवाब का परिणाम था|
(ii) फतनाया, 1942 लाहौर
Held:- किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध बलपूर्वक ले जाना अपहरण होगा भले ही अभियुक्त का उद्देश्य उस महिला को उसके पति के पास ले जाना रहा हो|
(iii) Natha Singh, 1883 Alld.
ऐसी महिला जो स्वतंत्र सहमती से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाए जाने की अनुमति प्रदान करती है वह अपहरण का शिकार नहीं हुई कहीं जा सकती है|
(iv) Ganga Devi, 1914 Alld.
Held:- अपहरण एक सतत कृत्य है अत: जब-जब अपह्रत व्यक्ति को स्थान परिवर्तित कराया जाता है तब-तब एक नया अपहरण कारित होता है|
(v) Allu, 1925 Lahor
Held:- अभियुक्त ने छत पर सो रही एक महिला को जगाया और साथ चलने को कहा| महिला ने साथ जाने से मना कर दिया| अभियुक्त ने साथ ले जाने के आशय से उसे उठा लिया महिला द्वारा शोर मचाने पर वह उसे छत पर पटक कर भाग गया| अभियुक्त प्रयत्न (अपहरण का) का दोषी था|


सामान्य (General):-
1. मानहानि सिविल तथा दांडिक दोनों अपकार है| यह प्रतिष्ठा के विरुद्ध अपकार है| अत: पीड़ित व्यक्ति साथ-साथ दोनों कार्यवाहियाँ संचालित कर सकेगा|
2. यधपि मानहानि सिविल तथा दांडिक दोनों ही अपकार है तथापि दोनों के आवश्यक तत्व भिन्न है| दूसरे शब्दों में सिविल तथा दांडिक कार्यवाहियों में से किसी एक की सफलता या असफलता का आधार किसी एक दूसरी कार्यवाही की सफलता या असफलता का आधार नहीं हो सकती है|
3. सिविल कार्यवाही अपनी प्रकृति से उपचारात्मक होती है| इसमें प्राय: पीड़ित को प्रतिकर दिलाकर उसे निजी न्याय उपलब्ध कराया जाता है| दांडिक कार्यवाहियाँ उपचारात्मक होकर शास्तिक होती है| दोषी व्यक्ति को दण्डित करके समाज (लोक न्याय)के प्रति न्याय किया जाता है|
4. मानहानि प्रतिष्ठा के विरुद्ध अपकार है| प्रतिष्ठा एक सम्पत्ति है| सम्भवत: यह किसी अन्य सम्पत्ति से मूल्यवान संपत्ति है| [Dexon vs. Holden]
5. सिविल विधि मानहानि के दो प्रकारों को मान्यता देती है –
(i) अपमान लेख (Libel)
(ii) अपमान वचन (Slander)
दण्ड विधि उपरोक्त प्रकारों को मान्यता नहीं देती है|
6. संहिता का अध्याय 21 (धारा 499-502) मानहानि से सम्बन्धित है| इस अध्याय की योजना निम्नवत है-
(i) मानहानि के अपराध की परिभाषा ———— धारा 499
(ii) साधारण मानहानि के लिए दण्ड ————– धारा 500
(iii) मानहानि के विशिष्ट रूप ———————- धारायें 501, 502
(a) मानहानिकारक सामग्री का मुद्रण / उत्कीर्णन ——- धारा 501
मानहानिकारक सामग्री से युक्त चीज का विक्रय — धारा 502
धारा 500, 501, तथा 502 के अंतर्गत दोषी व्यक्ति 2 वर्ष तक के साधारण कारावास या अर्थदंड या दोनों से दंडनीय है|
परिभाषा तथा आवश्यक तत्व —— धारा- 499
Defamations definition and essential eliments

1. परिभाषा (Definition):- धारा 499
“जो कोई बोले गये या पढ़े जाने के लिए आशयित शब्दों द्वारा या दृश्य-रुपणों द्वारा किसी व्यक्ति के बारे में कोई लांछन इस आशय से लगाया था प्राकशित करता है कि ऐसे लांछन से ऐसे व्यक्ति की ख्याति की अपहानि हो जाए या यह जानते हुए या विश्वास करने का कारण रखते हुए लगाना या प्रकाशित करता है कि ऐसे लांछन से ऐसे व्यक्ति की ख्याति की अपहानि होगी|
ऐतस्मिन पश्चात अपवादित दशाओं के सिवाय उसके बारे में कहा जाता है कि वह उस व्यक्ति की मानहानि करता है|”
2. धारा 499 के स्पष्टीकरण:-
स्पष्टीकरण-I :- मृत व्यक्ति पर लांछन लगाना मानहानि हो सकता है [यदि ऐसा लांछन उसके जीवित होने पर उसकी प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचाने तथा यदि ऐसे लांछन का उद्देश्य मृतक के परिवार या निकट सम्बन्धियों की भावनाओं को आहत करना है]
स्पष्टीकरण-II :- कंपनी या निगम या संगम या व्यक्तियों के समूह पर लांछन लगाना मानहानि हो सकता है|
स्पष्टीकरण-III :- अनुकल्प या व्यंगात्मक रूप में अभिव्यक्त लांछन मानहानि हो सकता है|
स्पष्टीकरण-IV :- निम्नलिखित लांछन प्रतिष्ठा के प्रतिक्षतिकारी होंगे-
(1) ऐसा लांछन जो अन्यों की दृष्टि में, पीड़ित के नैतिक तथा बौद्धिक शील हेय बनता है| ऐसा लांछन जो पीड़ित के साख को गिराता है ऐसा लांछन जो यह विश्वास उत्पन्न करता है कि पीड़ित का शरीर घृणोत्पादक यानिकृष्ट दशा में है|
3. दृष्टांत (Illustrations):-
4. आवश्यक तत्व [Essentials]:-
(i) दोषपूर्ण कृत्य (Actus reus)-
लांछन लगाया या प्रकाशित करना
(ii) दुराशय (Mens Rea)-
(a) प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाने का आशय;
(b) यह ज्ञान होना कि प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचेगी;
(c) यह विश्वास करने का कारण कि प्रतिष्ठा को क्षति पहुंच सकती है|
(iii) साधन (Means)-
(a) शब्द (मौखिक या पढ़े जाने हेतु आशयित)
(b) संकेत या दृश्यमान रूपण
(iv) अभियुक्त का प्रकरण धारा 499 के किसी अपवाद में न आता हो|
धारा 499 के अपवाद (Exception to S. 499) :-
1. लोक लाभ हेतु सत्य लांछन
2. लोक सेवक के लोक आचरण के सम्बन्ध में सद्भावनापूर्वक अभिव्यक्त की गयी राय
3. लोक प्रश्न को स्पर्श करने वाले बिंदु पर किसी व्यक्ति के आचरण पर सद्भावनापूर्ण अभिव्यक्त राय
4. न्यायालय की कार्यवाही या उसके परिणाम की रिपोर्ट का प्रकाशन (जबकि Report सारत: सत्य हो)
5. सिविल या दांडिक मामले पर गुण दोष के आधार पर सद्भावनापूर्वक अभिव्यक्त राय या पक्षकार साक्षी या अभिकर्ता के आचरण पर सद्भावनापूर्वक अभिव्यक्त राय
6. किसी कृति से अभिव्यक्त शील या स्वयं कृति पर अद्भावनापूर्वक अभिव्यक्त राय
7. प्राधिकार धारक द्वारा प्राधिकाराधीन व्यक्ति के सम्बन्ध में सद्भावनापूर्वक परिनिन्दा [जबकि परिनिन्दा सद्भावनापूर्वक हो तथा सुसंगत आचरण से सम्बन्धित हो
8. प्राधिकृत व्यक्ति के समक्ष सद्भावनापूर्वक अभियोग लगाना
9. हितों के संरक्षण हेतु, लोक कल्याण हेतु किसी के शील पर सद्भावनापूर्वक लांछन लगाना
10. सद्भावनापूर्वक सावधान करना
मानहानि के विशिष्ट रूप [Specific forms of Defamation] ———– धारा 501 तथा 502
1. मानहानिकारक सामग्री का मुद्रण या उत्कीर्णन – S. 501
2. मानहानिकारक सामग्री से युक्त चीज का विक्रय – S. 502
3. उपरोक्त दोनों धारा (S. 501, 502) के अंतर्गत दोषी व्यक्ति को 2 वर्ष का सा. का. या अर्थदंड या दोनों से दण्डित किया जायेगा|

सामान्य:-

  1. अध्याय- XVII (S. 378-462) संपत्ति के विरुद्ध अपराधों के बारे में है| संपत्ति के विरुद्ध अपराधों को तीन स्थूल वर्गों में बांटा जा सकता है-
  • संपत्ति से वांछित करने वाले अपराध ———————- S. 378-424
  • संपत्ति को क्षति कारित करने वाले अपराध ————— S. 425-440
  • साम्पत्तिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले अपराध — S. 441-462
  1. संपत्ति से वंछित करने वाले अपराध:-
  • चोरी [Theft]
  • उद्दापन [Extortion]
  • लूट [Robbery]
  • डकैती [Dacoity]
  • संपत्ति का आपराधिक दुर्विनियोग [Misapropriation of property]
  • आपराधिक न्यासभंग [Criminal breach of trust]
  • छल [Cheating]
  • संपत्ति के कपटपूर्ण विलेख तथा व्ययन [Fraudulent deeds and Dispositions of property]
  1. चोरी विषयक उपबंध:-
  • चोरी की परिभाषा ———— S. 378
  • साधारण चोरी हेतु दण्ड —– S. 379
  • चोरी के उग्र रूप ————- S. 380-390 का द्वितीय खंड
  • आवासीय घर में चोरी ————- S. 380
  • स्वामी के क्ब्जाधीन संपत्ति का

लिखिक या नौकरी द्वारा चोरी — S. 381

  • चोरी करने हेतु, मृत्यु उपहति या परिरोध कारित करने की

तैयारी के बाद चोरी ————— S. 382

  • लूट ———————————- S. 390
  1. संगत खंड / उपबंध:-
  • चल संपत्ति ——— S. 22
  • बेईमानीपूर्वक ——– S. 24 r/w 23
  • प्रलक्षित कब्जा —— S. 27

चोरी के अपराध की प्रकृति:

  1. केवल चल संपत्ति चोरी योग्य है अचल संपत्ति को चल में रूपांतरित करके चोरी योग्य बनाया जा सकता है| निम्न. चल संपत्ति न होने के कारण चोरी का विषय नहीं है-
  • मानव [जीवित / मृत]
  • उन्मुक्त प्राणी [Free creatures] चल संपत्ति है|
  • विद्धुत उर्जा [चल संपत्ति नहीं है किन्तु चोरी योग्य है]
  • भूमि|
  1. चोरी कब्जा के विरुद्ध अपराध है अत: कब्जा विहीन संपत्तियां (Res nullius) चोरी योग्य नहीं है| मुक्त प्राणी किसी के कब्जे में न होने के कारण चोरी योग्य नहीं है| चूंकि चोरी कब्जे के विरुद्ध अपराध है अत: किसी चल संपत्ति का स्वामी अपनी उस संपत्ति का चोर हो सकता है|
  2. सहमति का आभाव चोरी का आवश्यक तत्व है| अत: सहमति से हटाई या ले ली गई चीज चोरी नहीं होगी| सहमति प्रत्यक्ष या विवक्षित हो सकती है किन्तु इसे वैध होना चाहिए|
  3. बेईमानीपूर्वक ले लेने की आशय से हटाया चोरी की मुख्य विशेषता है| जब तक चल संपत्ति को हटाया नहीं जाता तब तक चोरी गठित नहीं होती है|
  4. बेईमानीपूर्वक ले लेने का आशय स्थायी होना जरुरी नहीं है| अस्थायी रूप से बेईमानीपूर्वक ले लेने का आशय चोरी गठित करेगा|
  5. धारा 390 के खंड दो की अतिरिक्त अपेक्षापूर्ण हो जाने पर चोरी लूट बन जाती है|

चोरी की परिभाषा तथा आवश्यक तत्व —— S. 378

  1. चोरी की परिभाषा:-

“जो कोई किसी व्यक्ति के कब्जे में से, उस व्यक्ति की संपत्ति के बिना कोई जंगम संपत्ति बेईमानी से ले लेने का आशय रखते हुए, वह संपत्ति ऐसे लेने के लिए हटाया है, वह चोरी करता है, यह कहा जाता है|”

  1. आवश्यक तत्व:-
  • कोई चल संपत्ति हो;
  • ऐसी संपत्ति किसी के कब्जे में हो;
  • अभियुक्त ने ऐसी चल सम्पत्ति को-
  • कब्जाधारी की सहमति के बिना;
  • बेईमानीपूर्वक ले लेने के आशय से;
  • हटाया हो|
  1. चल संपत्ति:-
  • चोरी की विषय वस्तु केवल चल संपत्ति ही हो सकती है|
  • धारा 22 (चल संपत्ति):-

“चल संपत्ति में शामिल है प्रत्येक प्रकार की मूर्त संपत्ति, सिवाय भूमि तथा भू-बद्ध चीजें या भू-बद्ध चीज से स्थायी रूप से जकड़ी किसी चीज से|”

  • धारा 378 का स्पष्टीकरण:-

“कोई चीज तब तक वह भू-बद्ध है, चल संपत्ति न होने के कारण, चोरी का विषय नहीं है किन्तु जैसे ही उस भूमि से अलग किया जाता वह चोरी का विषय होने लायक हो जाती है|

  1. कब्जाधीन चल संपत्ति:-
  • चोरी कब्जा के विरुद्ध अपराध है कब्जा ताथ्यिक (De-facts) होना चाहिए| इसका विधित: (De jure) होना आवश्यक नहीं है|
  • चूंकि चोरी कब्जा के विरुद्ध अपराध है अर्थात क्ब्जधीन वस्तुएं (Res- nullius) चोरी योग्य नहीं है|
  • चूंकि चोरी कब्जा के विरुद्ध अपरध है अत: संपत्ति को स्वामी भी चोरी हेतु दाई हो सकता है|
  • कब्जा वास्तविक या प्रलक्षित हो सकता है यहाँ धारा 27 I.P.C का सन्दर्भ लिया जा सकता है-

“जब सम्पत्ति किसी व्यक्ति की पत्नी, लिपिक या सेवक के कब्जे में [उस व्यक्ति के लेखें] तब ऐसी संपत्ति संहिता के अर्थों में उस व्यक्ति के कब्जे में होगी| अस्थायी रूप से नियोजित सक्रिय किसी विशेष रूप में सेवक लिपिक के रूप में नियुक्त व्यक्ति, लिपिक या सेवक होगा|

  1. बेईमानीपूर्वक ले लेने का आशय ——— S. 24 r/w 23
  • किसी के क्ब्जाधीन चल संपत्ति को बेईमानीपूर्वक लेने के आशय से क्ब्जाधीन के समाती के बिना हटाना चोरी है|
  • बेईमानीपूर्वक ले लेने का आशय चोरी का आवश्यक तत्व है यह आवश्यक नहीं है कि अभियुक्त स्थायी रूप से ले लेने का आशय रखता हो| अस्थायी रूप से ले लेने का आशय की चोरी गठित करेगा| दूसरे शब्दों में लौटा देने का आशय कोई प्रतिरक्षा नहीं होगी|
  • धारा 24 I.P.C. बेईमानीपूर्वक पद को सदोष लाभ या सदोष हानि के आधार पर परिभाषित करती है|

“जो कोई, कोई बात किसी व्यक्ति को सदोष अभिलाभ या किसी अन्य व्यक्ति को सदोष हानिकारित करने के आशय से करता है वह उस बात को बेईमानीपूर्वक करता है यह कहा जाता है|” [S. 24 I.P.C]

“सदोष लाभ, विधि विरुद्ध साधनों से संपत्ति का लाभ है जिसका लाभ प्राप्त करने वाला व्यक्ति विधित: अधिकारी नहीं है|

सदोष हानि विधि विरुद्ध साधनों से संपत्ति की ऐसी हानि है जिस संपत्ति का हानि उठाने वाला व्यक्ति विधित: अधिकारी है|” [S. 23 I.P.C]

  1. सहमति का आभाव:- स्पष्टीकरण- V r/w S. 90 I.P.C
  • क्ब्जाधारी या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति की सहमति के बिना उसके कब्जे से चल संपत्ति को बेईमानीपूर्वक ले लेने हेतु हटाना चोरी है|
  • सहमति प्रत्यक्ष या विवक्षित हो सकती है| यह कब्जाधारक की या उसके द्वारा प्रत्यक्षत: या विवक्षित रूप से अधिकृत व्यक्ति की होनी चाहिए|
  • सहमति वैध होनी चाहिए, सहमति की वैधता धारा 90 I.P.C द्वारा निर्धारित होगी|
  1. बेईमानीपूर्वक ले लेने के लिए हटाया स्पष्टीकरण- III, IV
  • चल संपत्ति को कब्जाधारक या प्राधिकृत व्यक्ति के कब्जे से बिना सहमति बेईमानीपूर्वक ले लेने के लिए घटना चोरी है|
  • हटाना से तात्पर्य स्थान परिवर्तन या विस्थापन से है| स्पष्टीकरण-III “हटाना” के तीन रूपों को मान्यता देता है-
  • पृथक्करण द्वारा हटाना,
  • बाधा हटाकर हटाना,
  • वास्तव में हटाना
  • स्पष्टीकरण-IV जानवर के माध्यम से हटाना सम्बंधित है| जानवर को हटाने वाला व्यक्ति जानवर को हटाने के साथ-साथ उस जानवर के हटने के कारण, हटीं हुई सभी चीजों को हटाता है|
  1. साधारण चोरी हेतु दण्ड ——– धारा 379
  • 3 वर्ष तक का किसी भी प्रकार का कारावास या
  • अर्थ दण्ड, या
  • दोनों|

चोरी के उग्र रूप ——- S. 380, 381, 382 I.P.C

  1. आवासीय गृह आदि में चोरी ——– S. 380
  • भवन, तम्बू या जलयान [मानव निवास या संपत्ति की अभिरक्षा हेतु प्रयुक्त] में चोरी
  • दण्ड:- 7 वर्ष तक का किसी भी प्रकार का कारावास तथा अर्थदंड|
  1. लिपिक या सेवक द्वारा स्वामी के क्ब्जाधीन संपत्ति की चोरी —— धारा 381
  • सेवक या लिपिक की हैसियत से नियोजित व्यक्ति या ऐसा व्यक्ति जो लिपिक या सेवक है, द्वारा स्वामी या सिवायोजक के क्ब्जाधीन संपत्ति की चोरी धारा 381 में दंडनीय है|
  • दण्ड 7 वर्ष तक का किसी भी प्रकार का कारावास तथा अर्थदंड|
  1. चोरी करने के लिए मृत्यु, उपहति या अवरोध कारित करने की तैयारी के पश्चात चोरी —– धारा 382
  • मृत्यु या उपहति या अवरोध या इनका भय कारित करने की तैयारी के अधीन चोरी S. 382 के अंतर्गत दंडनीय है| हिंसा की ऐसी तैयारी चोरी के बाद भागने हेतु या चोरी से प्राप्त संपत्ति को धारण किये रहने के प्रयोजन हेतु भी हो सकती है|
  • दण्ड 10 वर्ष तक का किसी भी प्रकार का कारावास तथा अर्थदंड|

चोरी कब लूट होगी ———- धारा 390 का द्वितीय खंड

  1. प्रत्येक लूट में या तो चोरी होती है या उद्यापन|
  2. धारा 390 के द्वितीय खंड में वर्णित परिस्थितियों में चोरी, लूट गठित करेगी|
  3. धारा 390 के द्वितीय खंड में वर्णित परिस्थितियों में उद्दापन, लूट गठित करेगी|
  4. धारा 390 के द्वितीय खंड के अनुसार-

चोरी लूट है, यदि उस चोरी को करने के लिए या उस चोरी के करने में या उस चोरी द्वारा अभिप्राप्त संपत्ति को ले जाने या ले जाने का प्रयत्न करने में, अपराधी उस उद्देश्य से स्वेच्छा या किसी व्यक्ति की मृत्यु या उपहति या उसको सदोष अवरोध का भय कारित करता है या कारित करने का प्रयत्न करता है|

उद्दापन करने हेतु किसी व्यक्ति को क्षति के भय में रखना ———– S. 385

उद्दापन (Extortion)

परिभाषा तथा आवश्यक तत्व —– S. 383 I.P.C

  1. परिभाषा-

“जो कोई किसी व्यक्ति  को स्वयं उसी व्यक्ति को या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति के भय में साशय डालता है तथा तद् द्वारा भय में डाले गये व्यक्ति को, कोई संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति या

हस्ताक्षरित या मुद्रोकित कोई चीज जिसे मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तन किया जा सके, किसी व्यक्ति को परिदत्त करने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित करता है, वह “उद्यापन” करता है|”

  1. आवश्यक तत्व:-
  • अभियुक्त द्वारा किसी व्यक्ति [परिवादी या पीड़ित] को साशय क्षति के भय में डाला गया हो तथा
  • इस प्रकार भय में रखे गये व्यक्ति को कोई संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति या मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तनीय (हस्ताक्षरित या मुद्रोकित) कोई चीज जिसे परिदत्त करने हेतु परिदान किया गया है|
  1. क्षति :- ———– S. 44 I.P.C
  • “क्षति के भय में साशय डालना “उद्दापन” का मुख्य आवश्यक तत्व है|
  • क्षति

“क्षति शब्द किसी व्यक्ति के शरीर ख्याति या संपत्ति को अवैध रूप से कारित किसी प्रकार के अपहानि का घोतक है|”

  1. बेईमानीपूर्वक उत्प्रेरणा:-
  • क्षति के भय में रखे गये व्यक्ति को बेईमानीपूर्वक उत्प्रेरित करना [परिदान हेतु] उद्दापन का आवश्यक तत्व है|
  • बेईमानीपूर्वक ———- S. 24 r/w 23

“जो कोई इस आशय से कार्य करता है कि एक व्यक्ति को सदोष अभिलाभ कारित करे या अन्य व्यक्ति को सदोष हानि कारित करे, वह उस कार्य को “बेईमानी से करता है, यह कहा जाता है|”

  1. विषय वस्तु का परिदान-
  • भय में रखे गये व्यक्ति द्वारा परिदान [विषय वस्तु का] उद्दापन के अपराध को पूर्ण कर देता है| परिदान के आभाव में उद्दापन गठित नहीं होगा|
  • परिदान अभियुक्त या उसके द्वारा निर्देशित व्यक्ति के पक्ष में किया जा सकता है|
  1. Cases:-
  • लाभ शंकर, 1955 सौराष्ट्र
  • चन्द्रकला बनाम रामकृष्ण, 1985 S.C.
  • बी. शेख, 1866 S.C.
  • लाभ शंकर, 1955 सौराष्ट्र

Held:- उद्दापन तब तक गठित नहीं होगा जब तक की परिदान गठित नहीं हो जाता|

  • चन्द्रकला बनाम राम कृष्ण, 1958 S.C.

Held:- महिला शिक्षक से इस धमकी के अधीन कोरे कागज़ पर हस्ताक्षर लेना की अन्यथा उसका शील भंग कर दिया जाएगा उद्दापन गठित करेगा|

  • बी. शेख, 1866 S.C.

Held:- जहाँ पीड़ित ने भयवश प्रतिरोध न किया हो तथा अभियुक्त संपत्ति उठा ले गया हो, वहां परिदान न होने के कारण उद्दापन नहीं होगा, हालांकि यह लूट होगा|

  1. मूल्यवान पतिभूति ———– S. 30 I.P.C
  • मूल्यवान प्रतिभूति धारा 30 I.P.C में परिभाषित है यह परिभाषा धारा 29 पर आधारित है| धारा 29 दस्तावेज को परिभाषित करती है|
  • S. दस्तावेज की एक प्रजाति है| V.S एक ऐसा दस्तावेज है जो विधिक अधिकार या विधिक दायित्व हेतु या विधिक अधिकार के आभाव से सम्बंधित है|
  • S एक ऐसा दस्तावेज है जिससे
  • अधिकार (विधिक) सृजित, विस्तारित, अंतरित, निर्बन्धित, निर्वाणित या निर्युक्त होता है या
  • कोई विधिक दायित्व या किसी विशेष अधिकार का आभाव अभिस्वीकार किया जाता है|

उद्दापन से सम्बंधित अन्य उपबंध:-

उद्दापन कब लूट होगा ——— S. 390 का खंड 1 तथा 3

  1. खंड = चोरी कब लूट है? :-

“चोरी “लूट” है, यदि उस चोरी को करने के लिए या उस चोरी के करने में या उस चोरी द्वारा अभिप्राप्त संपत्ति को ले जाने में आने का प्रयत्न करने में, अपराधी उस उद्देश्य से स्वैच्छया किसी व्यक्ति की मृत्यु या, उपहति या उसको सदोष अवरोध या तत्काल मृत्यु का, या तत्काल उपहति का, या तत्काल सदोष अवरोध का भय कारित करता है या कारित करने का प्रयत्न करता है|

  1. खंड 1 = उद्दापन कब लूट है? :-

“उद्दापन” लूट है, यदि अपराधी वह उद्दापन करते समय भय में डाले गये व्यक्ति की उपस्थिति में है और उस व्यक्ति को स्वयं उसकी या किसी की अन्य व्यक्ति की तत्काल मृत्यु या तत्काल उपहति या तत्काल सदोष अवरोध के भय में डालकर वह उद्दापन करता है और इस को उद्दापन की जाने वाली चीज उसी समय और वहां ही परिदत्त करने के लिए उत्प्रेरित करता है|

  1. स्पष्टीकरण:- खंड 3

अपराधी का उपस्थिति होगा कव्य कहा जाता है, यदि वह उस अन्य व्यक्ति को तत्काल मृत्यु के, तत्काल उपहति के, या तत्काल सदोष अवरोध के भय में डालने के लिए पर्याप्त रूप से निकट हो|

  1. दृष्टांत:-
  • क, य को सदोष अवरोध कारित करते हुए दबोच लेता है और य के कपड़े में से य का धन और आभूषण य की संपत्ति के बिना कपटपूर्वक निकाल लेता है, यहाँ क ने लूट किया|
  • क, य को राजमार्ग पर पिस्तौल दिखाकर य की थैली मांगता है| यहाँ क तत्काल उपहति का भय दिखाकर थैली (य की) उद्दापित करता है, अत: क ने लूट किया|
  • क, य को, य को शिशु को राजमार्ग से नीचे फेक देने का भय दिखाकर य से थैली प्राप्त करता है (परिदत्त करता है) यहं थैली तत्काल उपहति का भय दिखा कर प्राप्त की गई है अत: क ने लूट किया|
  • क, य से यह कहकर, संपत्ति अभिप्राप्त करता है कि “तुम्हारा शिशु मेरी टोली के हाथों में है, “यदि तुम हमारे पास d हजार रुपया नहीं भेज दोगे, तो वह मार डाल जाएगा|” यह उद्दापन है, और इसी रूप में दंडनीय है, किन्तु यह लूट नहीं है|

क्योंकि इसमें शिशु की तत्काल मृत्यु के भय में नहीं डाला गया है|

  1. उद्दापन तथा चोरी में अंतर [Distinguish between theft and extortion]:-
चोरी [Theft] उद्यापन[Extortion]
(1) यह S. 378 में परिभाषित है|

(2) बेईमानीपूर्वक ले लेने के लिए चल सम्पत्ति को हटाना|

(3) सहमति का आभाव

(4) अति का भय का आभाव

(5) धारा 90 खंड 2 में वर्णित अपेक्षाओं के पूर्ण होने पर चोरी लूट होगी|

(1) यह S. 383 में परिभाषित है|

(2) विषय वस्तु के परिदान हेतु उत्प्रेरित करना बेईमानीपूर्वक|

(3) दूषित सहमति

(4) क्षति का भय (साशय)

(5) धारा 90 खंड 3 की अपेक्षायें पूर्ण होने पर उद्दापन लूट होगा|

सामान्य:- 

  1. अध्याय XVII (S. 378-462) संपत्ति के विरुद्ध अपराधों के बारे में है| संपत्ति के विरुद्ध अपराधी को तीन स्थूल वर्गों में बांटा गया है / बांटा जा सकता है:-
  • संपत्ति से वंचित करने वाले अपराध ——————- S. 378-424
  • संपत्ति को क्षति कारित करने वाले अपराध ———– S. 425-440
  • संपत्ति अधिकारों का उल्लंघन करने वाले अपराध —- S. 441-462
  1. संपत्ति से वंचित करने वाले अपराध ————- S. 378-424
  • चोरी;
  • उद्दापन;
  • लूट;
  • डकैती;
  • संपत्ति का आपराधिक दुर्विनियोग;
  • आपराधिक न्यासभंग;
  • छल;
  • संपत्ति के कपटपूर्ण व्ययन तथा विलेख|
  1. लूट तथा डकैती विषयक उपबंध —————————————- S. 390-402
  • लूट की परिभाषा ———————————————– S. 390
  • डकैती की परिभाषा ——————————————— S. 391
  • साधारण लूट के लिए दण्ड ———————————— S. 392
  • लूट का प्रयत्न ————————————————— S. 393
  • लूट कारित करने में स्वेस्वापूर्वक उपहति कारित करना —– S. 394
  • डकैती के लिए दण्ड ——————————————— S. 395
  • हत्या के साथ डकैती ——————————————– S. 396
  • मृत्यु या घोर उपहति के प्रयत्न के अधीन लूट या डकैती — S. 397
  • घातक आयुध से लैस होकर लूट या डकैती का प्रयत्न —— S. 398
  • डकैती हेतु तैयारी ———————————————— S. 399
  • डकैती के गिरोह से संबद्धता ———————————— S. 400
  • चोरो के गिरोह से संबद्धता ————————————– S. 401
  • डकैती कारित करने के उद्देश्य से एकत्र होना —————– S. 402

लूट की परिभाषा तथा आवश्यक तत्व:-

  1. लूट की परिभाषा ——— धारा 390
  • सभी प्रकार के लूट में या तो चोरी या उद्दापन होता है
  • चोरी या लूट है, यदि-
  • उस चोरी को करने के लिए या

उस चोरी को करने में या

उस चोरी द्वारा प्राप्त सम्पत्ति को ले जाने या ले जाने के प्रयत्न में

  • अपराधी उस उद्देश्य से
  • स्वेच्छा
  • किसी व्यकी की-
  • मृत्यु या उपहति या उसको सदोष अवरोध या
  • तत्काल मृत्यु का या तत्काल उपहति का, या तत्काल सदोष अवरोध का
  • भय कारित करता है या कारित करने का प्रयत्न करता है
  • उद्दापन “लूट” है, यदि-
  • अपराधी वह उद्दापन करते समय
  • भय में डाले गये व्यक्ति की उपस्थिति में है तथा
  • उस व्यक्ति को स्वयं उसका या किसी अन्य व्यक्ति की तत्काल मृत्यु या तत्काल उपहति या तत्काल सदोष अवरोध के भय डालकर उद्दापन करता है, तथा

इस प्रकार भय में डालकर, इस प्रकार भय में डाले गये व्यक्ति को उद्दापन करने वाली चीज उसी समय तथा तथा वहां ही परिदत्त करता है|

स्पष्टीकरण:- अपराधी उपस्थिति कहा जाता है यदि वह उस व्यक्ति को तत्काल मृत्यु के, तत्काल उपहति के या तत्काल सदोष अवरोध के भय में डालने के लिए पर्याप्त रूप से निकट हो|

दृष्टान्त:-

  • Robbery है
  • Robbery है
  • Robbery है
  • Robbery नहीं Extortion है|
  1. आवश्यक तत्व:-
  • चोरी “लूट” है, यदि-
  • उस चोरी को करने के लिए या

उस चोरी को करने में

उस चोरी द्वारा प्राप्त सम्पत्ति को ले जाने या ले जाने के प्रयत्न में

  • अपराधी उस उद्देश्य से
  • स्वेच्छा
  • किसी व्यक्ति को
  • मृत्यु या उपहति या उसको सदोष अवरोध या
  • तत्काल मृत्यु का या तत्काल उपहति का या तत्काल सदोष अवरोध का
  • भय कारित करता है या कारित करने का प्रयत्न करता है|
  • क, य को सदोष अवरोध कारित करते हुए दबोच लेता है और य के कपड़े में से य का धन और आभूषण य की संपत्ति के बिना निकाल लेता है, यहाँ क ने लूट किया है|
  • उद्दापन “लूट” है, यदि-
  • अपराधी वह उद्दापन करते समय भय में डाले गये
  • भय में डाले गये व्यक्ति की उपस्थिति में तथा
  • उस व्यक्ति को स्वयं उसका या किसी अन्य व्यक्ति की तत्काल मृत्यु या तत्काल उपहति या तत्काल सदोष अवरोध के भय डालकर उद्दापन करता है, तथा

इस प्रकार भय में डालकर, इस प्रकार भय में डाले गये व्यक्ति को उद्दापन करने वाली चीज उसी समय तथा तथा वहां ही परिदत्त करने हेतु उत्प्रेरित करता है|

स्पष्टीकरण:-

अपराधी उपस्थिति कहा जाता है यदि वह उस व्यक्ति को तत्काल मृत्यु के या तत्काल उपहति के या तत्काल सदोष अवरोध के भय में डालने के लिए पर्याप्त रूप से निकट (sufficiently near)है|

दृष्टांत:-

(b) क, य को राज मार्ग पर पिस्तौल दिखाकर “य” की थैली मांगता है| यहाँ “क” तत्काल उपहति का भय दिखाकर थैली उद्दापित (य की) करता है| अत: क ने लूट किया है|

(c) क, य को य के शिशु को राजमार्ग से नीचे होने फेंक देने का भय दिखाकर य से थैली प्राप्त करता है (परिपादित करवाता है)| यहाँ थैली तत्काल उपहति का भय दिखाकर प्राप्त की गई है अत: यह लूट है|

  1. Cases:-
  • कईयों के रिओ, 1873

अभियुक्त चोरी कर रहा था| पकड़े जाने से बचने हेतु अभियुक्त ने स्वामी को उपहति कारित कर दिया|

Held:- “अभियुक्त लूट का दोषी नहीं है वह केवल चोरी का दोषी है|”

  • हसरत शेख, 1866

अभियुक्त [अपराधी] पेड़ से आम तोड़कर चोरी कर रहा था इस बीच A वहां पहुंचा| अपराधी ने A को धक्का दे दिया| A गिरकर बेहोश हो गया|

Held:- “उपहति चोरी करने में की गई थी अत: यह लूट है|”

  • खुशो महतो, 1980

अभियुक्त चोरी करके माल ले जा रहा था| लोगों ने उसका पीछा किया अभियुक्त ने माल फेंक दिया| इसके बावजूद लोगों ने पीछा करना जारी रखा| अभियुक्त पीछा करने वालों को डरा कर भागने के लिए उस पर पत्थर फेंकने लगा|

Held:- “अभियुक्त चोरी का दोषी है लूट का नहीं|”

  • हरीशचन्द्र v/s उ. प्र. राज्य, 1976 S.C.

A तथा B ने रेल यात्रा के दौरान एक सहयात्री C की कलाई से घड़ी छीन ली| जब ट्रेन स्टेशन के निकट पहुंच रही थी तथा रुकने के निकट थी तभी सहयात्री C ने चिल्लाकर सहायता की मांग की| इस पर B ने पीड़ित को झापड़ लगाया| A तथा B चलती ट्रेन से कूद कर भाग गये| कुछ दूरी पर वे दोनों चाय पीते पकड़े गये|

Held:- “अभियुक्तगणगण S. 392 सपठित S. 34 के अंतर्गत लूट के लिए दण्डित किये गये|”

  • Edward, 1843

अभियुक्त रस्सी से लटकी हुई टोकरी चुराने के लिए रस्सी काट रहा था| टोकरी का स्वामी टोकरी को पकड़े हुए थे तथा उसे चोरी होने से बचाने में लगा हुआ था| रस्सी काटने की प्रक्रिया में स्वामी के हाथ में चोट आई|

Held:- “उपहति दुर्घटना जनित थी न कि स्वैच्छिक अत: अभियुक्त लूट का दोषी नहीं था| वह सिर्फ चोरी का दोषी था|”

डकैती की परिभाषा तथा डकैती के आवश्यक तत्व:

  1. डकैती की परिभाषा ——— S. 391 I.P.C

“जबकि –

  • पांच या अधिक व्यक्ति संयुक्त होकर लूट करते हैं या लूट का प्रयत्न करते हैं,
  • जहाँ की वे व्यक्ति संयुक्त होकर लूट करते हैं या लूट का प्रयत्न करते है तथा वे व्यक्ति जो उपस्थित जो उपस्थित है या ऐसे लूट के किये जाने में या ऐसे प्रयत्न जो सहायता करते है, जो कुल मिलाकर 5 या अधिक है,

तब प्रत्येक व्यक्ति जो इस प्रकार लूट करता है या उसका प्रयत्न करता या उससे सहायता करता है, वह डकैती करता है यह कहा जाता है|”

  1. आवश्यक तत्व:-
  • 5 या अधिक व्यक्तियों ने संयुक्त होकर लूट या लूट का प्रयत्न किया हो या
  • लूट या लूट का प्रयत्न या लूट या उसके प्रयत्न में उपस्थित होकर सहायता करने वाले व्यक्तियों की कुल संख्या 5 या 5 से अधिक हो तथा वे संयुक्तत: सक्रिय हो|
  1. 5 या अधिक व्यक्ति:-

लूट तथा डकैती का मूल अंतर संख्या में निहित है| जहाँ यह सिद्ध हो गया हो कि अपराधियों की संख्या 5 या 5 से अधिक है वहां 5 से कम व्यक्तियों को भी डकैती के लिए दोष सिद्ध किया जाएगा|

  1. Lingaya, 1958

Held:- पांच से कम व्यक्ति डकैती के लिए दोष सिद्ध नहीं किये जा सकते यह एक सामान्य नियम हैं|

  1. संयुक्तत: (Conjointly):-

Nahu Lal, Tulsi, 1956

Held:- धारा 391 में संयुक्तत: शब्द सामान्य आशय का पर्याय है|

Ramchandra, 1932 Allahabad

Held:- भयवश प्रतिरोध न होने के कारण बल या हिंसा का प्रयोग करने की आवश्यकता न पड़ने पर भी डकैती हो सकती है|

Kissdre Pater 1864

Held:- डकैती की सूचना पर अंत: वासियों का पलायन कर जाना तथा आपराधियों द्वारा घर पर धावा बोलकर सामान उठा ले जाना डकैती होगी|

सामान्य:-

  1. छल को सम्पत्ति के विरुद्ध अपराध की कोटि में रखा गया है जिसका वर्णन संहिता की अध्याय-17 वर्णन करती है| छल को धारा 415-420 तक में बताया गया है|
  2. कोई व्यक्ति छल करता हुआ कहा जाता है यदि वह दूसरे व्यक्ति से प्रवंचना कर उसे कपटपूर्वक या बेईमानीपूर्वक से उत्प्रेरित करता है कि वह कोई सम्पत्ति उसे परिदत्त कर दे|
  3. आवश्यक तत्व:-
  • किसी व्यक्ति को प्रवंचित किया जाये
  • (a) प्रवंचित व्यक्ति को कपटपूर्वक या बेईमानी से
  • किसी व्यक्ति को सम्पत्ति परिदत्त करे, या
  • किसी व्यक्ति को कोई सम्पत्ति रखने हेतु सम्पत्ति देने के लिए उत्प्रेरित किया जाए|

(b) आशय युक्त कोई कार्य करने या करने का लोप करने के लिए उत्प्रेरित करने जिससे शारीरिक, मानसिक, ख्याति सम्बन्धित या साम्पत्तिक नुकसान या अपहानि कारित होती है या कारित होने की सम्भावना है|

  1. अर्थात हम कह सकते है कि छल प्रवंचना द्वारा कारित क्षति या उपहति उस व्यक्ति के सम्बन्ध में सिद्ध किया जाना चाहिए जिसे प्रवंचित किया गया था|

परिभाषा तथा दण्ड:-

छल [S. 415]- परिभाषा :

जो कोई किसी व्यक्ति से प्रवंचना कर उस व्यक्ति को, जिसे प्रवंचित किया गया है, कपटपूर्वक या बेईमानी से उत्प्रेरित करता है, कि वह कोई सम्पत्ति किसी व्यक्ति को परिदत्त कर दे, या सम्पत्ति दे दे कि, सम्पत्ति को रखे, जिसे इस प्रकार प्रवंचित किया गया न हो, उत्प्रेरित करता है कि वह ऐसा कार्य करे, जिसे यदि उसे हर प्रकार प्रवंचित किया गया होता तो, न करता जिससे उस व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक, ख्याति सम्बन्धी या साम्पत्तिक नुकसान या अपहानि कारित होती है या सम्भाव्य है वह “छल” करता है, यह कहा जाता है|

स्पष्टीकरण:- प्रवंचना के अंतर्गत इस धारा में तथ्यों को बेईमानी से छिपाना अभिप्रेत है|

दण्ड:- S. 417

  • 1 year, or
  • Fine, or
  • Both

रिष्टि के विषय में S. 425-440

सामान्य:-

  1. अध्याय- XVIII [S. 378-462] संपत्ति के विरुद्ध अपराधों से सम्बंधित है| संपत्ति के विरुद्ध अपराधों के तीन स्थूल वर्गों में बांटा गया है|
  • संपत्ति से वंचित करने वाले अपराध ————- S. 378-424
  • संपत्ति को क्षति कारित करने वाले अपराध —- S. 425-440
  • साम्पत्तिक अधिकारों को उल्लंघ

करने वाले अपराध ———————————- S. 441-462

  1. संपत्ति को क्षति कारित करने वाले अपराध ———- S. 425-440
  • रिष्टि ———————- S. 425
  • रिष्टि के लिए दण्ड —— S. 426
  • रिष्टि के बिगड़े रूप —– S. 427-440
  • रिष्टि से पचास रूपए का नुकसान —————— S. 427
  • जीव जंतु को वध करने या

उसे विकलांग करने द्वारा रिष्टि ——————– S. 428, 429

  • सिंचन संकर्म या जल को

दोषपूर्वक मोड़ने द्वारा रिष्टि ———————— S. 430

  • लोक सड़क, नदी, पुल को क्षति कर रिष्टि ——– S. 431, 432
  • किसी चीज को नष्ट करके रिष्टि कारित करना — S. 433, 434
  • विस्फोटक पदार्थ द्वारा रिष्टि ———————– S. 435, 436, 438
  • नष्ट या सापद वाले बनाने के आशय से रिष्टि — S. 437
  • चोरी आदि करने के आशय से रिष्टि ————— S. 439
  • मृत्यु / उपहति कारित करने की तैयारी

के पश्चात की गई रिष्टि —————————– S. 440

रिष्टि तथा उसके आवश्यक तत्व:-

  1. रिष्टि की परिभाषा–

जो कोई –

  • इस आशय से या
  • यह सम्भाव्यता को जानते हुए कि वह
  • लोक या किसी व्यक्ति को –
  • सदोष हानि या
  • नुकसान कारित करे, या
  • किसी संपत्ति का नाश या
  • उसकी स्थिति में तब्दीली करता है,
  • जिससे उसका मूल्य या उपयोगिता
  • नष्ट होती है या
  • कम हो जाता है या
  • उस पर क्षतिकारक प्रभाव पड़ता है, वह रिष्टि करता है|
  1. (i) स्पष्टीकरण-I :

रिष्टि के अपराध के लिए या आवश्यक नहीं है कि अपराधी क्षतिग्रस्त या नष्ट संपत्ति के स्वामी को हानि, या नुकसान कारित करने का आशय रखे|

(ii) स्पष्टीकरण-II :

संपत्ति पर प्रभाव डालने वाला कार्य, जो उस कार्य को करने वाले व्यक्ति की हो या किसी अन्य व्यक्ति या संयुक्त रूप से कार्य करने वाले व्यक्ति का हो, रिष्टि की जा सकेगी|

  1. आवश्यक तत्व:-
  • लोक या किसी व्यक्ति को सदोष हानि या नुक्सान कारित करने का आशय या इस सम्भावना का ज्ञान:
  • किसी संपत्ति को नष्ट करना या उसके या उसके स्थिति में कोई बदलाव या तब्दीली करना:
  • तब्दीली के परिणाम स्वरूप संपत्ति नष्ट हो जाए या उसका मूल्य या उसकी उपयोगिता कम हो जाए या उस पर क्षतिकारक प्रभाव पड़े|
  1. संपत्ति के कोई नुकसान या उसमें / उसकी स्थिति में तब्दीली (परिवर्तन):-

संपत्ति का विनाश या उसमें ऐसा परिवर्तन जिससे उसका मूल्य या उसकी उपयोगिता नष्ट हो जाये या कम हो जाये इस अपराध का मूल्य तत्व है| व्यौमकेश भट्टाचार्य प्रति एल. एम. दत्त, 1978

इस वाद में कहा गया कि यदि संपत्ति की कोई चीज उसके प्राकृतिक प्रयोग या उपयोगिता के विपरीत किया गया है तो ऐसे कार्य से उसका मूल्य या उपयोगिता नष्ट या कम हो जाती है और यह रिष्टि के कोटि में आएगा|

तब्दीली या परिवर्तन से तात्पर्य ऐसे शब्द से है कि वस्तु की संरचना या स्वरूप में कोई भौतिक या परिवर्तन हो|

  1. आशय का ज्ञान:-

धारा 425 के अंतर्गत अपराध गठित करने के लिए यह आवश्यक नही है कि नुक्सान विनाशकारी प्रकृति का हो किन्तु यह आवश्यक है कि दूसरे के अधिकार पर अतिक्रमण किया गया हो तथा जिससे संपत्ति का मूल्य कम हो गया हो|

कास्त्य राम, 1871 के वाद में यह निर्धारित किया गया कि यधपि अभियुक्तों का कार्य (आशय) सूटों को संपरिवर्तित करना नहीं या फिर भी इस कार्य द्वारा ग्रामवासियों को नुकसान पहुंचा अत: इसका (उनका) कार्य रिष्टि के अपराध के अंतर्गत (तुल्य) आता है|

रिष्टि के लिए दण्ड:-

जो कोई रिष्टि करेगा, वह दोनों में से किसी भी प्रकार के कारावास से, जिसकी अवधि 3 मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा|

सामान्य:-

  1. अध्याय- XVII [378-462] सम्पत्ति से सम्बन्धित अपराध के विषय में उपबन्ध करती है| सम्पत्ति के विरुद्ध अपराधों को तीन स्थूल वर्गों में विभाजित किया गया है-
  • सम्पत्ति से वंचित करने वाले अपराध ——————— S. 378-424
  • सम्पत्ति को क्षति कारित करने वाले अपराध ————- S. 425-440
  • सम्पत्तिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले अपराध —- S. 441-462
  1. साम्पतिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले अपराध S. 441-462
  • आपराधिक अतिचार ———————————————————– S. 441
  • गृह-अतिचार तथा इसके दण्ड ———————————————— S. 442, 448
  • प्रच्छन्न गृह-अतिचार एवं रात्रौ प्रच्छन्न गृह ——————————- S. 443, 444
  • गृह भेदन ———————————————————————— S. 445
  • रात्रौ गृह भेदन —————————————————————— S. 446
  • आपराधिक अतिचार के लिए दण्ड ——————————————– S. 447
  • कारावास, आ. का. तथा मृत्युदण्ड से दंडनीय

अपराध के लिए गृह-अतिचार ————————————————– S. 449

  • प्रच्छन्न गृह-अतिचार या गृह-भेदन के लिए दण्ड ————————— S. 453
  • उपहति, हमला या सदोष अवरोध की तैयारी के बाद गृह

अतिचार और प्रच्छन्न गृह-अतिचार या गृह-भेदन (प्रच्छन्न) ————— S. 452, 455

  • कारावास से दंडनीय अपराध के लिए प्रच्छन्न या

रात्रौ प्रच्छन्न गृह अतिचार या गृह-भेदन ————————————- S. 454, 457

  • प्रच्छन्न गृह-अतिचार / रात्रौ गृह-भेदन ————————————— S. 458
  • प्रच्छन्न गृह-अतिचार / गृह भेदन करते

समय घोर उपहति कारित होना ———————————————– S. 459

  • रात्रौ प्रच्छन्न गृह अतिचार / रात्रौ गृह-भेदन के लिए दण्ड —————- S. 456
  • रात्रौ प्रच्छन्न गृह-अतिचार रात्रौ में संयुक्त सम्पृक्त के लिए उपबन्ध — S. 460
  • ऐसे पात्र को, जिसमं सम्पत्ति है, बेईमानी से तोड़कर खोलना ———— S. 461
  • अभिरक्षा न्यस्त किये गये व्यक्ति द्वारा किया गया अपराध ————- S. 462
  1. जब कोई किसी के सम्पत्ति में इस आशय से प्रवेश करता है कि उसको [कब्जाधारी को] अभित्रास, अपमानित या क्षुब्ध या कोई अपराध कारित करे, वहां बने रहते हुए, तो कहा जाता है कि उसमें “आपराधिक अतिचार” करता है|
  2. सम्पत्ति पर विधिक रूप से प्रवेश करना और उस पर अपमानित करने या क्षुब्ध करने के आशय से अवैध रूप से बने रहने की धारा 441 के अंतर्गत दंडनीय है|

आपराधिक अतिचार ———- S. 441      

  1. “जो कोई –

परिभाषा:- ऐसी सम्पत्ति में या पर, जो किसी दूसरे के कब्जे में है, इस आशय से प्रवेश करता है, कि वह कोई अपराध करे या किसी व्यक्ति को जिसके कब्जे में ऐसी सम्पत्ति है, अभित्रस्त, अपमानित या क्षुब्ध करे, अथवा

ऐसी सम्पत्ति में या पर, विधिपूर्वक प्रवेश करके वहां विधिविरुद्ध रूप में इस आशय से बना रहता है कि तद्द्वारा वह किसी ऐसे व्यक्ति को अभित्रस्त, अपमानित या क्षुब्ध करे या इस आशय से बना रहता है कि वह कोई अपराध करे,

वह “आपराधिक अतिचार” करता है यह कहा जाता है|”

  1. आवश्यक तत्व:-
  • किसी दूसरे व्यक्ति के क्ब्जाधीन सम्पत्ति में या सम्पत्ति पर प्रवेश
  • यदि प्रवेश विधिसम्मत है, तो विधिविरुद्ध ढंग से सम्पत्ति में या पर बना रहना
  • ऐसा प्रवेश या अवैध रूप से बना रहना,
  • अपराध कारित करने या,
  • कब्जाधारी [Fine]- 500 तक का या,
  • दोनों से दंडनीय|

गृह अतिचार [house trespass] —— S. 442

“जो कोई किसी निर्णय तम्बू, या जलयान में, जो मानव निवास के रूप में उपयोग में आता है, या किसी निर्माण में, जो उपासना स्थान के रूप में, या किसी सम्पत्ति की अभिरक्षा के स्थान के रूप में आता, प्रवेश करके या उसमें बना रह कर, आपराधिक अतिचार करता है, वह “गृह-अतिचार” करता है, यह कहा जाता है|”

स्पष्टीकरण:- आपराधिक अतिचार करने वाले व्यक्ति के शरीर के किसी भाग का प्रवेश गृह अतिचार गठित करने के लिए पर्याप्त प्रवेश है|

दण्ड:- S. 448

  • कारावास तीन मास तक किसी प्रकार का, या
  • जुर्माना- 1000 तक का, या
  • दोनों|

गृह भेदन [House breaking] ——- S. 445

“जो व्यक्ति गृह अतिचार करता है, वह “गृह भेदन” करता है यदि निम्न तरीके से व्यक्ति प्रवेश करता है तथा बाहर निकलता है-

  • रास्ता बनाकर दुष्प्रेरक या खुद द्वारा,
  • सीढी द्वारा पहुंचना या ऐसे रास्ते से जो मानव प्रवेश के लिए आशयित नहीं है, द्वारा,

दण्ड:- S. 453

  • 2 वर्ष का कारावास और
  • जुर्माना से दंडनीय होगा

रात्रौ प्रच्छन्न गृह-अतिचार ——- S. 444

“जो कोई सूर्यास्त के पश्चात और सूर्योदय से पूर्व प्रच्छन्न गृह-अतिचार करता है, वह “रात्रौ प्रच्छन्न गृह-अतिचार” करता है, यह कहा जाता है|”

दण्ड:- ——– S. 456

  • 3 वर्ष का कारावास, और
  • जुर्माने से दंडनीय होगा|

  1. परिभाषा:- S. 403

जो कोई बेईमानी से किसी जंगम सम्पत्ति का दुर्विनियोग करेगा या उसको अपने उपयोग के लिए समपरिवर्तित कर लेगा, वह आपराधिक दुर्विनियोग करेगा|

  1. दण्ड:-

ऐसा व्यक्ति दोनों में से किसी भी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि 2 वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा|

  1. आवश्यक तत्व:-
  • किसी सम्पत्ति का अपने उपयोग के लिए बेईमानी से दुर्विनियोग या संपरिवर्तन;
  • ऐसी सम्पत्ति चल सम्पत्ति हो|
  • दुर्विनियोग- दुर्विनियोग से तात्पर्य, अवैध रुप से अपने लिए ले लेने से है|
  • संपरिवर्तन- संपरिवर्तन से तात्पर्य, निस्तरण के अधिकार को हस्तगत कर लेने से है|

इस धारा में वर्णित अपराध के लिए यह आवश्यक नहीं है, कि सम्पत्ति को बेईमानीपूर्वक आशय से लिया जाए| सम्पत्ति पर आधिपत्य निर्दोष ढंग से प्राप्त किया जा सकता है परन्तु वाद में आशय परिवर्तन के कारण या किसी नए तथ्य के ज्ञान के कारण आधिपत्य सदोषपूर्ण या कपटपूर्ण बन जाता है [भागीराम डोम प्रति अवर डोम (1888)]|

  1. (i) स्पष्टीकरण- I :-

केवल कुछ समय के लिए बेईमानी से दुर्विनियोग करना इस section के अंतर्गत दुर्विनियोग है|

दृष्टांत:- A वचन पत्र (beauer)- Banker के पास गिरवी- Y को देने के लिए अपराध (403)

(ii) स्पष्टीकरण- II :-

  • जिस व्यक्ति को ऐसी सम्पत्ति पड़ी मिलती है, जो अन्य व्यक्ति के कब्जे में नहीं है| वह न तो बेईमानी से उसे होता है और न बेईमानी से उसका दुर्विनियोग करता है|
  • किसी अपराध का दोषी नहीं है, किन्तु वह धारा 403 में परिभाषित अपराध का दोषी है|
  • यदि वह युक्तियुक्त साधनों द्वारा यह पता लगाये बिना सम्पत्ति को अपने लिए विनियोजित करता है|
  • युक्तियुक्त साधन या समय तथ्य का प्रश्न होगा
  • यह आवश्यक नहीं है कि पाने वाला व्यक्ति जानता हो कि उसका स्वामी कौन है|
  • इतना पर्याप्त होगा कि वह सम्पत्ति पाने वाले व्यक्ति का नहीं है, इसका ज्ञान होना|

दृष्टांत :-

  • राजमार्ग पर- पड़ा मिला- उठाना (क) द्वारा- S. 403 का अपराध नहीं है|

(च) मूल्यवान अंगूठी- पड़ी- स्वामी की खोज किये बिना- बेचना- S. 403 के अपराध का दोषी|

आपराधिक न्यासभंग / Criminal breach of trust- S. 405-409

  1. परिभाषा:- S. 405

जो कोई सम्पत्ति या सम्पत्ति पर किसी प्रकार अपने को न्यस्त किये जाने पर उस सम्पत्ति का बेईमानीपूर्वक दुर्विनियोग कर लेता है या उसे अपने उपयोग में स्म्परिवर्तित कर लेता है या किसी अभिव्यक्त था विवक्षित वैध संविति का अतिक्रमण करके बेईमानी से उस सम्पत्ति का उपयोग या व्ययन करता है या जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति का ऐसा करना सहन करता है, वह “आपराधिक न्यासभंग” करता|

  1. 406 दण्ड:- 3 वर्ष का दोनों प्रकार का कारावास या Fine या दोनों से दण्डित किया जाएगा|
  2. आवश्यक तत्व:-
  • किसी व्यक्ति में कोई सम्पत्ति या सम्पत्ति का कोई स्वत्व न्यस्त किया गया हो,
  • सम्पत्ति पर अखित्यार रखने वाला व्यक्ति,
  • सम्पत्ति को बेईमानी से दुर्विनियोग कर ले, या अपने उपयोग के लिए समपरिवर्तित कर ले या
  • कोई विहित प्रक्रिया जो कि विधि के अंतर्गत निर्देशित है या –
  • वैध संविदा का अतिक्रमण करके|
  • बेईमानीपूर्वक उस सम्पत्ति का उपयोग या व्ययन कर ले अथवा जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति का ऐसा करना सहन कर ले|
  1. दृष्टांत:-
  • मृत व्यक्ति

(घ) अंश धारण करना

(च) वाहक

आपराधिक न्यासभंग के विषय में बिगड़े रूप या धारा 405 के बिगड़े रूप –

  1. धारा 407:- वाहक द्वारा, घाटवाल या भांडागारिक के रूप अपने पास सम्पत्ति न्यस्त किये जाने पर ऐसी सम्पत्ति का आ. न्यासभंग करेगा, वह 7 वर्ष के किसी भांति के कारावास और जुर्माने स. भी दण्डित होगा|
  2. धारा 408:- लिपिक या सेवक द्वारा आपराधिक न्यासभंग करने पर 7 वर्ष के किसी भी भांति के का. और जुर्माने से भी दंडनीय होगा|
  3. धारा 409:- लोक सेवक या बैंकर, व्यापारी या अभिकर्ता द्वारा आपराधिक न्यासभंग करने पर किसी भी भांति का कारावास जिसकी अवधि 7 वर्ष और जुर्माने से भी दंडनीय होगा|

आपराधिक दुर्विनियोग तथा आपराधिक न्यासभंग में अंतर –

  1. B.O.T में किसी व्यक्ति के पास वैश्वासिक हैसियत में जो सम्पत्ति रहती है उसका वह संपरिवर्तन करता है अर्थात संपत्ति उसे न्यस्त की गई रहती है| Cr. Misapp. में जिस संपत्ति को अपने उपयोग में लाया जाता है उसका कब्जा किसी भी प्रकार से प्राप्त हो सकता है|
  2. B.O.T में Parties के बीच किसी प्रकार का संविदात्मक सम्बन्ध रहता है चाहे वह अभिव्यक्त या विवक्षित हो परन्तु Cr. Misapp. में ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं होता है|
  3. B.O.T में संपत्ति अपराधी को विधिपूर्ण ढंग से न्यस्त की जाती है और वह उसे बेईमानीपूर्वक आशय से उपयोग कर लेता है अथवा जानबूझकर किसी उस सम्पत्ति से सम्बन्धित न्यास का अनुपालन न कर उसे किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उसका उपयोग किये जाने की अनुमति देता है| Cr. Missapp. में सम्पत्ति अपराधी के कब्जे में आकस्मिक रूप से आती है अर्थात सम्पत्ति दुर्घटनावश या अन्यथा अपराधी के कब्जे में आती है और उसके बाद उसके द्वारा वह अपने उपयोग में लाई जाती है|

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