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LECTURE – 1

प्रस्तावना

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LECTURE – 1

मुख्य प्रश्न

 
  1. भारत सरकार अधिनियम 1935 की विशेषताओं का उल्लेख करें?
 
  1. भारत शासन अधिनियम 1858 द्वारा किये गये परिवर्तनों को बताईए?
 
  1. रेग्युलेटिंग अधिनियम 1773 द्वारा किये गये परिवर्तनों को बताईए?
 

LECTURE – 1

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भारत का संवैधानिक विकास

     

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    Lecture – 2

    परिसीमा अधिनियम, 1963

    Mains Questions

     
    1. परिसीमा अधिनियम, 1963 के अर्न्तगत विधिक असमर्थन के आधार पर समय सीमा को प्रभावित करने वाले प्रावधानों का वर्णन कीजिये।
     
    1. परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 6, 7, 8 में निर्योग्यता जिसके कारण यमवधि बढी जाती है, से सम्बन्धित क्या नियम है?
     
    1. जब एक बार समय का चलना प्रारम्भ हो जाता है तब कोई भी पश्चातवर्ती निर्योग्यता उसे नही रोक सकती। इस कथन को समझाइए।
     
    1. परिसीमा काल की संगणना करने में कौन सा समय अपवर्जीत कर दिया जायेगा?
     
    1. अंकिचन के रुप मे वाद लाने हेतु इजाजत में लगे समय का अपवर्जन करें।
     

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    Lecture – 2

    परिसीमा अधिनियम, 1963

     

    परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 6, 7 एवं 8 में निर्योग्यता, जिसके कारण समयावधि बढ़ जाती है, से सम्बन्धित क्या नियम है?

    What are the various rules as to disability extending time limitation as provided under sections 6, 7 and 8 of the Limitation Act, 1963?

    अथवा

    परिसीमा अधिनियम, 1963 के अन्तर्गत विधिक असमर्थता के आधार पर समय सीमा को प्रभावित करने वाले प्रावधानों का वर्णन कीजिये।

    [Discuss the provisions relating to legal disabilities affecting the period of limitation under the Limitation Act, 1963]

    परिसीमा विधि का यह एक सामान्य नियम है कि वाद संस्थित करने अथवा डिक्री के निष्पादन के लिए आवेदन करने के समय वादी अथवा आवेदक का सक्षम होना आवश्यक है। सक्षमता से अभिप्राय ऐसे व्यक्ति के वयस्क और स्वस्थचित्त होने से है। अर्थात् वह अवयस्क, पागल अथवा जड़ नहीं होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति वाद संस्थित करने अथवा आवेदन करने के समय अवयस्क, पागल या जड़ (minor, insane or idiot) है तो इसे विधिक निर्योग्यता (legal disability) माना जायेगा और जब तक ऐसी निर्योग्यता बना रहती है, विहित काल की संगणना नहीं की जायेगी। परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 6, 7 एवं 8 में इसी सम्बन्ध में प्रावधान किया गया है।

    विधिक निर्योग्यता

    धारा 6 में विधिक निर्योग्यता के बारे में निम्नांकित प्रावधान किये गये है—

    जहाँ कोई व्यक्ति वाद संस्थित करने अथवा डिक्री के निष्पादन के लिए आवेदन करने के समय अवयस्क, पागल या जड़ है तो परिसीमा की दृष्टि से विहित काल की संगणना ऐसी निर्योग्यता के समाप्त होने की तारीख से की जायेगी।

    उदाहरणार्थ—धन की वसूली के लिए वाद लाने हेतु विहित काल की संगणना 20 अगस्त, 2005 से प्रारम्भ होती है लेकिन उस रोज वादी अवयस्क, पागल या जड़ है और यह स्थिति 15 मार्च, 2006 तक बनी रहती है। ऐसी स्थिति में विहित काल की संगणना 20 अगस्त से न की जाकर 16 मार्च से की जायेगी।

    फर्म दुनीचंद बनाम कुलदीप सिंह (ए.आई.आर. 1955 लाहौर 144) के मामले में यह कहा गया है कि धारा 6(1) की प्रयोज्यता के लिए वादी अथवा आवेदक का विहित काल की संगणना किये जाने की प्रारम्भिक तिथि को अवयस्क, पागल या जड होना आवश्यक है।

    (2) अब यदि कोई व्यक्ति वाद लाने या आवेदन करने के लिए विहित काल की संगणना के समय किसी एक निर्योग्यता से ग्रस्त है और ऐसी निर्योग्यता के समाप्त होने से पूर्व ही वह किसी दूसरी निर्योग्यता से ग्रस्त हो जाता है तो विहित काल की संगणना पूर्ववर्ती एवं पश्चात्वर्ती सभी निर्योग्यताओं के समाप्त होने के बाद की जायेगी।

    उदाहरणार्थ—वाद लाने के लिए विहित काल की संगणना किये जाने के दिन वादी अवयस्क है और वयस्क होने के पूर्व ही वह पागल या जड़ हो जाता है। ऐसी स्थिति में विहित काल की गणना उसके वयस्क एवं स्वस्थचित्त हो जाने पर की जायेगी।

    (3) यदि ऐसी निर्योग्यताएँ मृत्युपर्यन्त बनी रहती हैं तब उसका विधिक प्रतिनिधि मृत्यु के पश्चात् उतनी अवधि में वाद संस्थित कर सकेगा या आवेदन कर सकेगा जितनी उसे अन्यथा अनुज्ञात होगी।

    उदाहरणार्थ—किसी अवयस्क व्यक्ति की वाद लाने से पहले ही मृत्यु हो जाती है। ऐसी दशा में उसकी ओर से उसके विधिक प्रतिनिधि द्वारा वाद लान के लिए विहित काल की संगणना अवयस्क की मृत्यु के बाद से की जायेगी। (रामलियाह बनाम ब्रह्ममियाह, ए.आई.आर. 1930 चेन्नई 821)

    (4) जब किसी व्यक्ति की निर्योग्यता समाप्त होने से पूर्व ही मृत्यु हो जाती है और मृत्यु के समय उसका विधिक प्रतिनिधि भी किसी निर्योग्यता से ग्रस्त है तब विहित काल की संगणना ऐसे विधिक प्रतिनिधि की निर्योग्यता समाप्त होने के पश्चात् से की जायेगी। (लक्ष्मणदास बनाम सुन्दर, 59, आई.सी.678)

    (5) इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति की निर्योग्यता समाप्त होने के पश्चात् किन्तु वाद संस्थित करने वा आवेदन करने के लिए विहित कालावधि से पूर्व हो जाती है तो उसका विधिक प्रतिनिधि उतनी कालावधि के भीतर वाट ला सकेगा या आवेदन कर सकेगा जितनी कालावधि के भीतर मृत्यु नहीं होने की दशा में वाद लाया जा सकता था या आवेदन किया जा सकता था।

    कई व्यक्तियों में से एक की निर्योग्यता

    अधिनियम की धारा 7 में धारा 6 की अनुपूरक व्यवस्था की गई है। इसके अनुसार जहाँ वाद संस्थित करने या डिक्री के निष्पादन के लिए आवेदन करने के लिए संयुक्त रूप से हकदार कई व्यक्तियों में से कोई एक किसी निर्योग्यता से ग्रस्त हो और उस व्यक्ति की सहमति के बिना उन्मोचन दिया जा सकता हो, वहाँ उन सभी व्यक्तियों के विरुद्ध समय का जाना प्रारम्भ हो जायेगा;

    लेकिन जहाँ नियोग्यता से ग्रस्त व्यक्ति की सहमति के बिना उन्मोचन नहीं दिया जा सकता हो, वहाँ किसी के भी विरुद्ध समय का जाना तब तक प्रारम्भ न होगा, जब तक कि—

    (क) उनमें से कोई एक अन्यों की सहमति के बिना उन्मोचन देने के लिए समर्थ न हो जाये; अथवा

    (ख) ऐसी निर्योग्यता का अन्त न हो जाये।

    इस प्रकार धारा 7 निर्योग्य व्यक्ति की सहमति के बिना उन्मोचन दिये जाने की विधिक क्षमता के बारे में प्रावधान करती है। ऐसा सामान्यतः भागीदारों अथवा संयुक्त हिन्दू कुटुम्ब के कर्ता के मामलों में होता है। इन्हें अन्य डिक्रीधारियों की सहमति के बिना डिक्रीकृत राशि को वसूल करने का अधिकार होता है।

    ‘लालाराम बनाम रामस्वरूप’ (ए.आई.आर. 1964 इलाहाबाद 495) के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि-मिताक्षारा सयुक्त हिन्दू परिवार का कर्ता या प्रबन्धक अन्य सदस्यों की सहमति के बिना उन्मोचन देने के लिए सक्षम माना गया है। उसका यह विवक्षित प्राधिकार है और सभी सदस्य उससे आबद्ध होते है चाहे वे अवयस्क ही क्यों न हों। अतः ऐसे मामलों में परिवार के सभी सदस्यों का समय का जाना प्रारम्भ हो जाता है।”

    इसी प्रकार भोलानन्द बनाम पदमानन्द (6सी.डब्ल्यू.एन. 348) के मामले में यह कहा गया है कि नैसर्गिक अथवा वैधानिक सरक्षक अवयस्क व्यक्तियों की ओर से विधिमान्य उन्मोचन दे सकता है। अत: ऐसे मामलों में अवयस्क व्यक्तियों के वयस्क होने की प्रतीक्षा किया जाना आवश्यक नहीं है।

    एक सह-अंशधारी अन्य सह-अंशधारियों की सहमति के बिना विधिमान्य उन्मोचन दे सकता है। (शारदा प्रसाद बनाम लाला जमना प्रसाद, ए.आई.आर. 1961 एस.सी. 1074) उन्मोचन से अभिप्राय यहाँ केवल आर्थिक अर्थात् ऋण या धन के दायित्व के उन्मोचन से नहीं है, अपितु अधिकार या उत्तरदायित्व के परित्याग तथा सभी प्रकार के दायित्वों की उन्मुक्ति से है।

    अपवाद

    धारा 8, धारा 6 एवं 7 का अपवाद प्रस्तुत करती है। जनार्दन बनाम नीलकान्त (ए.आई.आर. 1952 उड़ीसा 31) के मामले में धारा 8 के उपबन्धों को धारा 6 एवं 7 के उपबन्धों का परन्तुक कहा गया है।

    धारा 8 में दो प्रकार के प्रावधान किये गये हैं—

    (क) धारा 6 एवं 7 के उपबन्ध हक़शफा (pre-emptions) के मामले में लागू नहीं होंगे, तथा

    (ख) वाद संस्थित करने अथवा आवेदन करने के लिए परिसीमा काल निर्योग्यता समाप्त होने अथवा मृत्यु होने की तिथि से “तीन वर्ष” से अधिक की अवधि का नहीं होगा।

    धारा 6 के अन्तर्गत किये गये उपबन्धों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति विहित काल की संगणना के समय किसी निर्योग्यता से ग्रस्त है तो समय का जाना उस समय से प्रारम्भ होता है जब ऐसी निर्योग्यता समाप्त हो जाती है जबकि धारा 8 यह कहती है कि ऐसा व्यक्ति निर्योग्यता समाप्ति के पश्चात तीन वर्ष के भीतर ही वाद ला सकेगा या आवेदन कर सकेगा, उसके पश्चात् नहीं।

    अलारक्षी बीबी बनाम उजाला बीबी (ए.आई.आर. 1966 उड़ीसा 49) का इस विषय पर एक उद्धरणीय मामला है। इसमें एक अवयस्क व्यक्ति के विरुद्ध जून 1952 में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 145 की कार्यवाही निर्णीत की गई थी। वह व्यक्ति जून 1954 में वयस्क हुआ। यह अभिनिर्धारित किया गया कि इसके लिए वाद लाने की परिसीमा अवधि जून 1957 तक हो सकती है अन्यथा नही।

    धारा 9 “जब एक बार समय का जाना प्रारम्भ हो जाता है तब कोई पश्चात्वर्ती निर्योग्यता उसे नहीं रोक सकती।” इस कथन को समझाइए।

    “When once time has begun to run, no subsequent disability stops it.” Explain this statement.

    परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 9 में यह कहा गया है कि “जहाँ एक बार समय का चलना प्रारम्भ हो जाये, वहाँ वाद संस्थित करने या आवेदन कर की किसी भी पश्चाप्वर्ती निर्योग्यता या अयोग्यता से वह नहीं रुकता।”

    (Where once time has begun to run, no subsequent disobility or inability to institute a suit or make an application stops it.)

    अभिप्राय यह हुआ कि जब विहित काल की संगणना प्रारम्भ होने के दिन व्यक्ति सक्षम हो अर्थात् अवयस्क, पागल या जड़ नहीं हो तो विहित काल की गणना उसी दिन से प्रारम्भ हो जायेगी। इसके बाद यदि ऐसा व्यक्ति किसी निर्योग्यता या अयोग्यता से ग्रस्त हो जाता है तो उससे विहित काल की संगणना बन्द नहीं होगी।

    सामान्य नियम यह है कि विहित काल की संगणना प्रारम्भ होने के दिन यदि कोई व्यक्ति अवयस्क, पागल या जड़ (Minor, insane or idiot) है तो विहित काल की संगणना उस दिन से प्रारम्भ नहीं होकर उस दिन से होगी जब ऐसा व्यक्ति सक्षम अर्थात् वयस्क एवं स्वस्थचित्त हो जाये। लेकिन यदि विहित काल की संगणना प्रारम्भ होने के दिन ऐसा व्यक्ति स्वस्थचित्त एवं वयस्क है तो समय का जाना उसी दिन से प्रारम्भ हो जायेगा और आगे जाकर उसके पागल या जड़ हो जाने का उस पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    इसे एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। ‘क, ‘ख’ के विरुद्ध वाद लाने का हक़दार है। वाद लाने के लिए विहित कालावधि की संगणना का दिन दिनांक 15 मई 2005 है और उस दिन ‘क’ वयस्क एवं स्वस्थ चित्त है। विहित काल की संगणना 15 मई 2005 से प्रारम्भ हो जायेगी। अब दिनांक 10 नवम्बर 2005 को ‘क’ पागल या जड़ हो जाता है। धारा 9 के अनुसार इस निर्योग्यता से समय का जाना नहीं रुकेगा।

    ‘गेलमनि बनाम मोरिजिन’ [(1913) 2 के. बी. 549] के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि समय का जाना तब प्रारम्भ हो जाता है, जब—

    (क) वाद कारण (cause of action) प्रारम्भ हो जायें, और

    (ख) ऐसे समय व्यक्ति वयस्क एवं स्वस्थचित्त हो।

    फिर धारा की प्रयोज्यता के लिए वादकारण का निरन्तर जारी रहना आवश्यक है। यदि पश्चात्वर्ती किसी घटना से वादकारण समाप्त हो जाता है तो इस धारा के उपबंध लागू नहीं होंगे। (प्रभाकर बनाम चन्द्रकान्त, ए. आई. आर. 1943 नागपुर 178)

    ‘श्रीनिवास बनाम बालश्वर (ए. आई. आर. 1950 लाहाबाद 526) के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा भी यही कहा गया है कि—समय का जाना वादकारण के अस्तित्व पर निर्भर करता है। जहाँ वाद कारण ही नहीं रह जायें, वहाँ यह सिद्धान्त लागू नहीं होता।

    अपवाद

    धारा 9 के परन्तुक में इसका एक अपवाद दिया गया है। इसके अनुसार—”जहाँ कि किसी लेनदार की सम्पदा का प्रशासन पत्र उसके ऋणी को अनुदत्त कर दिया गया हो, वहाँ ऐसे ऋण का वसूल करने के वाद में परिसीमा काल का चलते तब तक निलम्बित रहेगा जब तक वह प्रशासन चलता रहे।” बारे में प्रावधान किया गया है।

    परिसीमा काली संगणना करने में कौन सा समय अपवर्जित कर दिया जायेगा?

    In computing the period of limitation, which period shall be excluded?

    परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 12 से 15 तक में उन परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है जिनमें विहित काल की संगणना में से कुछ समय को अपवर्जित कर दिया जाता है। ऐसा अपवर्जित किया जाने वाला समय निम्नांकित है—

    (1) विधिक कार्यवाहियों में लगे समय का अपवर्जन

    अधिनियम की धारा 12 में उन परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है जिनमें विभिन्न कार्यवाहियों में लगा समय परिसीमा काल की संगणना में से अपवर्जित कर दिया जायेगा। ऐसी चार परिस्थितियाँ हैं—

    (क) किसी वाद, अपील या आवेदन के परिसीमा काल की संगणना करने में वह दिन अपवर्जित (exclude) कर दिया जायेगा जिससे ऐसे परिसीमा काल की संगणना की जानी है।

    उदाहरणार्थ-वाद हेतुक दिनांक 31.3.1983 को उत्पन्न होता है तो परिसीमा काल की संगणना दिनांक 1.4.1983 से किये जाने को विधिनुकूल माना गया है। (नागेश सेल्स कॉरपोरेशन बनाम मै. केरल सोप्स एण्ड ऑयल्स लि., ए.आई.आर. 1994 केरल 150)

    अभिप्राय यह हुआ कि वाद कारण (cause of action) उत्पन्न होने का दिन परिसीमा काल की संगणना में नहीं लिया जाता है।

    इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति किसी तिथि विशेष को वयस्क होता है तो परिसीमा काल की संगणना अगले दिन से किया जाना न्यायोचित है। (कुन्तप्पया बनाम अयप्पा कूनलप्पा देसाई, ए.आई.आर. 1973 मैसूर 50)

    (ख) किसी अपील के लिए या ऐसे आवेदन के लिए जो अपील की इजाजत या पुनरीक्षण के या किसी निर्णय के पुनर्विलोकन के लिए हो, परिसीमा काल की संगणना करने में वह दिन, जिस दिन परिवादित निर्णय सुनाया गया था, अपवर्जित कर दिया जायेगा।

    (ग) किसी डिक्री या आदेश की अपील किये जाने की दशा में परिसीमा काल की संगणना में से वे दिन अपवर्जित कर दिये जायेंगे जो उस निर्णय की प्रतिलिपि प्राप्त करने में लगे है जिसके विरुद्ध अपील की जानी है। ठीक यही स्थिति पंचाट को अपास्त करने हेतु आवेदन किये जाने के बारे में है। ऐसे मामलों में पंचाट की प्रतिलिपि प्राप्त करने में लगा समय अपवर्जित कर दिया जायेगा।

    सरल शब्दों में यह कहा जा सकता है कि अपील की दशा में परिसीमा काल की संगणना में से वह समय अपवर्जित कर दिया जाता है जो अपील योग्य निर्णय या आदेश की प्रतिलिपि प्राप्त करने में लगा है। (ज्योति मलहोत्रा बनाम केवल किशोर ए.आई आर 1983 दिल्ली 148)

    लेकिन यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ऐसी प्रतिलिपि प्राप्त करने में लगा वह समय अपवर्जित नहीं किया जायेगा जो प्रतिलिपि प्राप्त करने के लिए किये गये आवेदन से पूर्व ऐसे निर्णय या आदेश की प्रतिलिपि तैयार करने में लग चुका है। (टी. श्यामला बनाम के.वासदेवन, ए.आई.आर. 1996 केरल 4)

    (2) अकिंचन के रूप में वाद लाने हेत इजाजत में लगे समय का अपवर्जन

    धारा 13 के अनुसार-जहाँ कोई व्यक्ति अकिंचन के रूप में वाद लाने या अपील करने की इजाजत के लिए आवेदन करता है और उसका आवेदन न्यायालय द्वारा खारिज कर दिया जाता है, वहाँ ऐसा व्यक्ति न्यायालय शुल्क के साथ वाद या अपील संस्थित कर सकेगा और ऐसे वाद या अपील के लिए परिसीमा काल की संगणना में से वह समय अपवर्जित कर दिया जायेगा जो इजाजत के लिए आवेदन के सद्भावनापूर्वक अभियोजन में लगा है। (बशीर अहमद बनाम रशीदा खातून, ए.आई.आर. 1975 इलाहाबाद 286)

    (3) बिना अधिकारिता वाले न्यायालय में लगे समय का अपवर्जन

    कभी-कभी कोई कार्यवाही सद्भावनापूर्वक गलत न्यायालय में या ऐसे न्यायालय में संस्थित कर दी जाती है जिसे उसकी सुनवाई करने की अधिकारिता नहीं है। ऐसे मामलों में सक्षम न्यायालय में जाने के लिए वादी के समक्ष परिसीमा का प्रश्न उत्पन्न हो जाता है। धारा 14 में इस स्थिति से निपटने के लिए प्रावधान किया गया है। इसके अनुसार—

    “यदि कोई वाद अज्ञानतावश ऐसे किसी न्यायालय में सद्भावनापूर्वक संस्थित कर दिया जाता है जिसे उस मामले की सुनवाई करने की अधिकारिता नहीं है, वहाँ ऐसी कार्यवाही में लगे समय को परिसीमा काल की संगणना में से अपवर्जित कर दिया जायेगा।” (सरूपलाल बनाम नेशनल फर्टिलाइजर्स लि., ए.आई.आर. 1994 एन.ओ.सी. 337 दिल्ली)।

    उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अन्तर्गत उपभोक्ता मंच में। कार्यवाही किए जाने में लगा समय परिसीमा काल में से अपवर्जित किया जा सकेगा। ( संग्रीला अपार्टमेन्ट्स को ऑपरेटिव हाऊसिंग सोसायटी लिमिटेड बनाम मै. रिविन बिल्डर्स, ए.आई.आर. 2016 एन. ओ. सी. 95 मुम्बई)

    इसे एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। एक वाद में वाद का मूल्यांकन सम्पत्ति को नीलामी में क्रय किये जाने की राशि के आधार पर किया गया। कालान्तर में उस सम्पत्ति का मूल्यांकन बाजार मूल्य के आधार पर किया गया। यहाँ पूर्व कार्यवाही को सद्भावनापूर्वक मानते हुए उसमे लगे समय को परिसीमा काल की संगणना में से अपवर्जित किया गया (कामताप्रसाद सिंह बनाम रामनारायण लाल, ए.आई.आर. 1957 पटना 139)

    हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी बनाम सतीश कुमार गोयल (ए.आई.आर. 2009 एन.ओर.सी 489 हिमाचल प्रदेश) के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि किसी गलत फोरपा में चली सद्भावपूर्ण कार्यवाही में लगा समय कालवधि की संगणना में से अपवर्जित किया जाना चाहिए।

    (Period bonafidely spent by party in prosecuting his remedy before wrong forum, liable to be excluded.)

    लेकिन इसके लिए आवेदन किया जाना आवश्यक है तथा यह बताया जाना अपेक्षित है कि गलत फोरम में सद्भावनापूर्वक कार्यवाही चली है। जहाँ केवल विलम्ब को माफ करने के लिए आवेदन किया गया हो, वहाँ धारा 14 का लाभ नहीं मिल सकेगा। (केतन बनाम पारीख, ए.आई.आर. 2012 एस.सी. 683)|

    धारा 14 का लाभ प्राप्त करने के लिए निम्नांकित शर्तों का पूरा होना आवश्यक

    (क) दोनों वादों में पक्षकार एक ही हो;

    (ख) कार्यवाही सिविल हो;

    (ग) दोनों वादों में वाद हेतुक (cause of action) एक ही हो, तथा

    (घ) पूर्व कार्यवाही सद्भावनापूर्वक (Bonafide) रही हो।

    पूर्व कार्यवाही का सद्भावनापूर्वक होना इस धारा की प्रयोज्यता की मुख्य शर्त है। (रविन्द्रनाथ सेम्यूअल बनाम सिवकामी, ए.आई.आर. 1972 एस.सी. 730)

    यदि कार्यवाही सद्भावनापूर्वक नहीं रही है तो धारा 14 का लाभ प्राप्त नहीं किया सकेगा। इस सम्बन्ध में हट्टी गोल्ड माइन्स लि. बनाम मै. विनय हेवी इक्विमेन्ट्स (ए.आइ.आर. 2005 कर्नाटक 264) का एक अच्छा मामला है। इसमें कार्यवाही गलत न्यायालय में संस्थित कर दी गई थी। प्रश्न उठा कि क्या वह सद्भावनापूर्वक थी? न्यायालय – इसे सद्भावनापूर्वक नहीं माना, क्योंकि

    (क) वाद संस्थित करने से पूर्व यह पता नहीं लगाया गया था कि उस न्यायालय को सुनवाई की अधिकारिता है या नहीं; तथा

    (ख) ऐसा करने से पूर्व विधिक परामर्श भी नहीं लिया गया था।

    (4) कुछ अन्य मामलों में समय का अपवर्जन

    धारा 15 में उन परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है जिनमें परिसीमा काल की संगणना में से समय का अपवर्जन किया जा सकेगा। ऐसी परिस्थितियाँ निम्नांकित है—

    धारा 15 में उन परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है जिनमें परिसीमा काल की संगणना में से समय का अपवर्जन किया जा सकेगा। ऐसी परिस्थितियाँ निम्नांकित है—

    (क) प्यादेशबारा वाय संस्थित करने पर रोक लगा दिया जाना

    जहाँ किसी वाद या डिक्री के निष्पादन के लिए आवेदन संस्थित करने को किसी व्यादेश या आदेश (injunction or order) द्वारा रोक दिया जाता है, वहाँ परिसीमा काल की संगणना में से उतना समय अपवर्जित कर दिया जायेगा जितने समय तक ऐसा व्यादेश या। आदेश बना रहा है। इसमें वे दोनों दिन भी सम्मिलित है जिस दिन व्यादेश अथवा आदेश दिया गया और जिस दिन ऐसा व्यादेश या आदेश वापस लिया गया। (गोविन्द राजूलू बनाम रंगाराव, 40 एम.एल.जे. 124)

    (ख) सूचना में लगा समय

    जहाँ किसी वाद को संस्थित किये जाने से पूर्व विधिनुसार कोई सूचना (Notice) दिया जाना आवश्यक हो, वहाँ ऐसी सूचना में लगा समय परिसीमा काल की संगणना में से अपवर्जित कर दिया जायेगा।

    इसका सबसे अच्छा उदाहरण है सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 की धारा 80 के अन्तर्गत राज्य के विरुद्ध संस्थित किये जाने वाले वादों में दो माह की सूचना दिया जाना। इस अवधि को परिसीमा काल की संगणना में से कम कर दिया जाता है। (आई.एस.पी. ट्रेडिंग कम्पनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, ए.आई.आर. 1973 कोलकाता 74)

    ‘मै. डिशा कन्स्ट्रक्शन बनाम स्टेट ऑफ गोवा’ (ए.आई.आर. 2012 एस.सी. 1769) के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह कहा गया है कि—कालावधि की गणना करते समय उसमें से वह समय अपवर्जित कर दिया जाना चाहिए जो सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80 के अन्तर्गत दिये गये नोटिस में लगा है अर्थात् दो माह का समय अपवर्जित कर दिया।

    (ग) रिसीवर या समापक की नियुक्ति

    किसी व्यक्ति को दिवालिया न्यायनिर्णीत करने की कार्यवाही में नियुक्त किसी रिसीवर या अन्तरिम रिसीवर द्वारा या किसी कम्पनी के परिसमापन की कार्यवाही में नियुक्त किसी समापक (liquidator) या अन्तरिम समापक द्वारा किये गये किसी वाद या डिक्री के निष्पादन के लिए आवेदन के परिसीमा काल की संगणना में से वह कालावधि अपवर्जित कर दी जायेगी जो ऐसी कार्यवाही को संस्थित करने की तारीख को प्रारम्भ होकर, यथास्थिति रिसीवर या समापक की नियुक्ति की तारीख से तीन मास के अनसान पर समाप्त होती है।

    (घ) विक्रय अपास्त कराने में लगा समय

    किसी डिक्री के निष्पादन में हुए विक्रय में के क्रेता द्वारा कब्जे के लिए वाद के परिसीमा काल की संगणना में से उतना समय अपवर्जित कर दिया जायेगा जिसके दौरान विक्रय अपास्त कराने के लिए कोई कार्यवाही अभियोजित की जाती रही हो। (श्रीपत्त बनाम दत्तात्रेय, ए.आई.आर. 1957 नागपुर 24)

    (ङ) प्रतिवादी का अनुपस्थित रहना।

    किसी वाद के परिसीमा काल में से उतना समय अपवर्जित कर दिया जायेगा जिसके दौरान प्रतिवादी भारत से तथा भारत के बाहर के उन राज्य क्षेत्रों से, जो केन्द्रीय सरकार के प्रशासन के अधीन है, अनुपस्थित रहा हो। (एस.के. इम्पैक्स प्रा.लि. बनाम जे.आर. इम्पोर्टर्स, ए.आई.आर. 1992 दिल्ली 346)

     

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    LECTURE— 2

    Pre Questions

     
    1. परिसीमा अधिनियम, 1963 लागू नही होते है

    a) रिट याचिका

    b) अपील

    c) वाद

    d) आवेदन

     
    1. परिसीमा काल की संगठना से सम्बन्धित धाराएं है

    a) धारा 12 से 18

    b) धारा 12 से 19

    c) धारा 12 से 24

    d) धारा 12 से 22

     
    1. परिसीमाकाल का उद्देश्य है

    a) उन स्थानों पर अधिकार प्रदान करना जहाँ कोई नही है परन्तु कुछ समय बाद वाद में रोक उत्पन्न करता है

    b) एक निश्चित समय के अंदर वाद दया करना

    c) (a) और (b) दोनों

    d) कोई भी नही

     
    1. मर्यादा विधि है

    a) एक प्रकिया विधि

    b) सारवार विधि

    c) अंशतः प्रक्रिया एव अशंतः सारवान

    d) केवल (b)

     
    1. क्या पक्षकार पारस्परिक सहमति से परिसीमा काल में वृद्धि कर सकते है

    a) हाँ

    b) नही

    c) विधि स्पष्ट नही

    d) हाँ, यदि पक्षकार और न्यायालय दोनों सहमत हो

     
    1. परिसीमा अधिनियम लागू नही है

    a) सभी दाडिण्य कार्यवाहियों में

    b) जनप्रतिनिधित्व अधिनियम से उत्पन्न चुनाव सम्बधी कार्यवहियों को

    c) विवाह और तलाक संबंधी विधि के अन्तर्गत वाद या कार्यवाहियों पर

    d) उपर्युक्त सभी

     
    1. विहितकाल के पश्चात् संस्थित वाद की गयी अपील और किया गया आवेदन खारिज कर दिया जायेगा यर्दाप प्रतिरक्षा के तौर पर परिसीमा की बात न उठाई गयी हो। किस धारा मे कहा गया है—

    a) धारा 2

    b) धारा 3

    c) धारा 4

    c) धारा 4

     
    1. परिसीमा अधिनियम की धारा 5 किस सामान्य नियम का अपवाद

    a) धारा 3 (परिसीमा द्वारा वर्जन)

    b) धारा 2

    c) धारा 1

    d) कोई नही

     
    1. जहां कि एक बार समय का चलना प्रारंभ हो जाता है वहाँ वाद संस्थित करने या आवेद करने के किसी पश्चातवर्ती निर्योग्यता से वह नही सकता हैः कहा गया है—

    a) धारा 9

    b) धारा 10

    c) धारा 11

    d) धारा 12

     
    1. न्यासियों तथा उसके प्रतिनिधियों के विरुद्ध वाद से सम्बन्धित धारा है

    a) धारा 9

    b) धारा 10

    c) धारा 11

    d) धारा 12

     

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    Lecture – 3

    परिसीमा अधिनियम

    Mains Questions

     
    1. धारा 14 का लाभ प्राप्त करने के लिए किन शर्तों का पूरा होना आवश्यक है?
     
    1. किन परिस्थितियों में अभिस्वीकृति अवधि का विस्तार कर सकती है

    या

    परिसीमा अधिनियम 1963 के उपबन्धों के अनुसार परिसीमा पर लिखित अभिस्वीकृति का क्या प्रभाव पडता है? समझाइये।

     
    1. धारा 18 एवं 19 में अन्तर बताये साथ ही यूनियन आफ इंडिया बनाम एम.सी.पाण्डे के Judgement पर प्रकास डाले।
     
    1. वाद लाने के अधिकार के होने के समय या उसके मृत्यु का प्रभाव से क्या आशय है
     
    1. वर्तमान अधिनियम (1963) के पूर्व भूल को समयवधि के विस्तार के लिए मान्य आधार नही माना जाता था। परन्तु धारा 17 के अन्तर्गत अब भूत के आधार पर अश्रृति अनुतोष के सम्बन्ध में कपट के सयकदन समय विस्तार की मान्यता प्रदान कर दी गई है। विस्तार से समझाइये।
     

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    Lecture – 3

    परिसीमा अधिनियम

     

    परिसीमा पर कपट या भूल के प्रभाव की विवेचना कीजिए।

    (Discuss the effect of fraud or mistake on limitation)

    अधिनियम की धारा 17 में परिसीमा पर कपट या भूल, के प्रभाव का – उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार जहाँ किसी वाद या आवेदन के … में जिसके लिए परिसीमा काल विहित है-

    (क) वह वाद या आवेदन प्रतिवादी या प्रत्यर्थी या उसके अभिकर्ता के कपट पर आधारित है,

    अथवा

    (ख) उस अधिकार या हक़ का ज्ञान, जिस पर वाद या आवेदन आधारित है, किसी व्यक्ति के कपट द्वारा छिपाया गया है, अथवा

    (ग) वह वाद या आवेदन किसी भूल के परिणाम से मुक्ति के लिए है,

    अथवा

    (घ) चादी या आवेदक के अधिकार को स्थापित करने के लिए आया कोई दस्तावेज उससे कपटपूर्वक छिपाई गई है,

    वहाँ परिसीमा काल का चलना तब तक प्रारम्भ नहीं होगा, जब तक कि.

    (i) वादी या आवेदक को उस कपट या भूल का पता नहीं चल जाता,

    एवं

    (ii) छिपाई गई दस्तावेज वादी या आवेदक को प्राप्त नहीं हो जाती।

    इस प्रकार धारा 17 का मुख्य उद्देश्य वादी या आवेदक के वाद या आवेदन संस्थित करने के अधिकार की कपट एवं भूल (fraud and mistake) से सुरक्षा करना है।

    धारा 17 में परिसीमा काल में वृद्धि के दो आधार बताये गये हैं—कपट एवं भूल। ऐसे मामलों में समय का जाना तब प्रारम्भ होता है जब कपट अथवा भूल का पता चल जाता है। (स्टेट ऑफ मध्यप्रदेश बनाम भाईलाल भाई, ए. आई.आर. 1964 एस.सी. 1006)

    ‘एस. पेचियाम्मा बनाम एन. जी. नाडार’ (ए. आई. आर. 1995, चेन्नई 372) के मामले में चेन्नई उच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि वादी या आवेदक जितने समय तक कपट या भूल के कारण वाद लाने या आवेदन करने से निवारित रहता है, उतना समय परिसीमा काल की संगणना में से अपवर्जित कर दिया जायेगा।

    यहाँ यह उल्लेखनीय है कि धारा 17 के उपबंध केवल सिविल वादों एवं आवेदनों पर लागू होते हैं, आपराधिक मामलों पर नहीं। (बिड़ला सीमेन्ट वर्क्स बनाम जनरल मैनेजर, वेस्टर्न रेलवेज, ए. आई. आर. 1995 एस. सी. 1111).

    फिर धारा 17 का लाभ केवल ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध प्राप्त किया जा सकता। है जो कपट या भल का दोषी है. किसी सद्भावी क्रेता के विरुद्ध नहीं।

    किन परिस्थितियों में ‘अभिस्वीकृति’ अवधि का विस्तार कर सकती है?

    (Under what circumstances can an acknowledgement extend the period of limitation)

    अथवा

    परिसीमा अधिनियम, 1963 के उपबन्धों के अनुसार परिसीमा पर लिखित अभिस्वीकृति का क्या प्रभाव पड़ता है ? समझाइये।

    [Explain the effect of acknowledgement in writing on limitation as stipulated in Limitation Act, 1963]

    परिसीमा की दृष्टि से अभिस्वीकृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अभिस्वीकृति से परिसीमा काल में अभिवृद्धि हो जाती है। यही कारण है कि अभिस्वीकृति को एक विशेष उपचार माना जाता है। परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 18, 19, एवं 20 में अभिस्वीकृति के बारे में प्रावधान किया गया है।

    (1) लिखित अभिस्वीकृति का प्रभाव

    परिसीमा अधिनियम की धारा 18 में लिखित अभिस्वीकृति के प्रभाव के बारे में। प्रवधान किया गया है। इसका मूल पाठ इस प्रकार है—

    “जहाँ कि किसी सम्पत्ति या अधिकार के लिए वाद या आवेदन के लिए विहित काल के अवसान के पहले ऐसी सम्पत्ति या अधिकार विषयक दायित्व की लिखित अभिस्वीकृति की गई है, जो उस पक्षकार द्वारा जिसके विरुद्ध ऐसी सम्पत्ति या अधिकार का दावा किया जाता है या ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा जिसमें वह अपना अधिकार या दायित्व व्युत्पन्न करता है, हस्ताक्षरित है, वहाँ उस समय से, जब वह अभिस्वीकृति इस प्रकार हस्ताक्षरित की गई एक नया परिसीमा काल संगणित किया जायेगा।”

    स्पष्ट है कि दायित्व की लिखित अभिस्वीकृति नये परिसीमा काल को जन्म देती।

    सुभाषचन्द बनाम स्टेट बैंक ऑफ पटियाला (ए. आई. आर. 2014 दिल्ली 82) के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा यह विनिर्धारित किया गया है कि-अभिस्वीकृति के पश्चात् तीन वष की अवधि में प्रस्तुत किया परिसीमा अवधि में है।

    अभिस्वीकृति क्या है?

    आगे बढ़ने से पूर्व यहाँ अभिस्वीकृति का अर्थ समझ लेना समीचीन होगा। अभिस्वीकृति से अभिप्राय है—सम्पत्ति या अधिकार विषयक दायित्व का स्वीकार किया जाना। उधवजी बनाम बापूदास (ए.आई.आर. 1950 मुम्बई 94) के मामले में अभिस्वीकार की परिभाषा देते हुए यह कहा गया है कि अभिस्वीकृति का अर्थ है ऋण अर्थात् दायित्व की स्पष्ट स्वीकारोक्ति।

    उदाहरणार्थ— ऋणी अपने लेनदार को एक पत्र लिखकर ऋण के दायित्व को स्वीकार करते हुए उसके शीघ्र भुगतान का वचन देता है। यह अभिस्वीकृति है। (स्टेट ऑफ उड़ीसा बनाम प्रतिभा प्रकाश भावन, ए.आई.आर. 2005 उड़ीसा 58)

    अभिस्वीकृति का प्रभाव

    अभिस्वीकृति का प्रभाव है-विहित परिसीमा काल में अभिवृद्धि। जहाँ कोई व्यक्ति अर्थात् ऋणी या प्रतिवादी किसी ऋण अथवा सम्पत्ति विषयक अपने दायित्व को स्वीकार करता है, वहाँ परिसीमा की दृष्टि से समय का जाना ऐसी अभिस्वीकृति की तिथि से प्रारम्भ हुआ माना जायेगा। (मै. केशरी इंजीनियरिंग वर्क्स बनाम बैंक ऑफ इंडिया, ए.आई.आर. 1991 पटना 1994)

    उदाहरणार्थ-एक मामले में दिनांक 6.9.1974 को ऋण अदायगी की माँग की जाती है। प्रतिवादी दिनांक 6.8.1976 को पत्र द्वारा ऋण के दावे को स्वीकार करता है। तथा बजट पारित होते ही शीघ्र भुगतान का आश्वासन देता है। इस मामले में विहित काल की संगणना दिनांक 6.8.1976 से किया जाना अभिनिर्धारित किया गया। (स्टेट ऑफ उडीसा बनाम प्रतिभा प्रकाश भावन, ए.आई.आर. 2005 उड़ीसा 58)।

    विधिमान्य अभिस्वीकृति के आवश्यक तत्त्व

    विधिमान्य अभिस्वीकृति के लिए निम्नांकित बातें आवश्यक है—

    (क) विधिमान्य अभिस्वीकृति का पहला आवश्यक तत्त्व है-सम्पत्ति या अधिकार विषय दायित्व को स्वीकार किया जाना। जब तक दायित्व की स्पष्ट स्वीकारोक्ति नहीं की जाती, तब तक उसे विधिमान्य अभिस्वीकृति नहीं माना जा सकता।

    यदि कोई व्यक्ति बैंक ऋण के बकाये की पुष्टि (confirmation of debt halance) करता है तो यह एक विधि मान्य अभिस्वीकृति है। (यनियन बैंक ऑफ इण्डिया बनाम सुरेश भाई लाल मेहता, ए.आई.आर, 1997 गुजरात 48)

    (ख) इसका दूसरा आवश्यक तत्त्व है—अभिस्वीकृति का विहित काल के अवसान से पूर्व किया जाए। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि अभिस्वीकानि का उस समय किया जाना आवश्यक है जब अधिकार प्रवर्तन योग्य हो। विहित काल के अवसान के पश्चात् की गई अभिस्वीकृति प्रभावशून्य होती है। (अजब एन्टरप्राइजेज बनाम जयन्त बी.केमिकल्स प्रा.लि. ए.आई.आर. 1991 बम्बई 35)

    उदाहरणार्थ-किसी ऋण की वसूली हेतु वाद लाने की अंतिम तिथि 25 दिसम्बर 2005 है। यहाँ यदि ऋणी द्वारा दिनांक 25 दिसम्बर 2005 से पूर्व ऋण के दायित्व को स्वीकार किया जाता है तो वह विहित काल के अवसान से पूर्व की गई अभिस्वीकृति मानी जायेगी और यदि यही अभिस्वीकृति दिनांक 25 दिसम्बर 2005 के बाद की जाती है तो प्रभावशून्य होगी।

    (ग) विधिमान्य अभिस्वीकृति का तीसरा आवश्यक तत्त्व है-उसका लिखित में होना। अभिस्वीकृति लिखित में होनी चाहिए, मौखिक नहीं। (सी.के. जेवियर बनाम कासी, ए.आई.आर. 1990, केरल 271)

    यह पत्र द्वारा की जा सकती है और पृष्ठांकन के द्वारा भी की जा सकती है। (जनार्दनम बनाम टी.ए. अनीफा रॉथर, ए.आई.आर. 2005 केरल 89)।

    (घ) अभिस्वीकृति का चौथा अनिवार्य तत्त्व है-दायित्व को स्वीकार करने वाले व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित (signed) होना। हस्ताक्षर रहित स्वीकृति का कोई महत्त्व नहीं होता। (मै. क्राफ्ट सेन्टर बनाम कोनचेरी कोयर फैक्ट्रीज, ए.आई.आर. 1991 केरल 83) हस्ताक्षर अभिकर्ता के भी हो सकते हैं।

    इस प्रकार उपरोक्त चारों शर्तों को पूरा करने वाली अभिस्वीकृति विधिमान्य अभिस्वीकृति होती है।

    ‘अमर अहमद खान बनाम शमीम अहमद खान’ (ए.आई.आर. 2012 झारखण्ड 39) के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि-अभिस्वीकृति का लाभ केवल तभी मिल सकता है जब अभिस्वीकृति करने वाले व्यक्ति का सम्पत्ति में हित निहित हो। यदि किसी व्यक्ति को अग्रिम प्राप्त करने का अधिकार, स्वत्व अथवा हित ही नहीं है तो उसके द्वारा प्राप्त अग्रिम (Advance) को अभिस्वीकृति नहीं माना जायेगा।

    (2) ऋण लेखे संदाय का प्रभाव

    अधिनियम की धारा 19 में एक और अभिस्वीकृति के बारे में प्रावधान किया गया। है। इसके अनुसार—

    “जहाँ कि ऋण या वसीयत सम्पदा के सदांय के लिए दावी व्यक्ति द्वारा या उसके इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत अभिकर्ता द्वारा कोई सदांय उस ऋण लेखे या वसीयत सम्पदा के ब्याज लेखे विहित काल के अवसान के पूर्व किया जाता है, वहाँ उस जब संदाय किया गया था, नया परिसीमा काल संगणित किया जायेगा।”

    इस प्रकार धारा 19 ऋण या वसीयत सम्पदा लखकाई सदाय (payment जाने पर परिसीमा काल में अभिवृद्धि का प्रावधान करती है। यह भी एक अभिस्वीकृतिक है।

    इसे एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। ‘क’ का ‘ख’ 10,000/- रुपये का ऋणी है। ‘क’, ‘ख’ के विरुद्ध इस ऋण वसूली हेतु दिनांक 15 सितम्बर 2007 तक वाद ला सकता है। इसी दौरान ‘ख’ दिनांक 20 अप्रेल 2004 को उक्त ऋण एवं उसके ब्याज लेखे 3000/- रुपये जमा करा देता है। यहाँ अब ‘क’, ‘ख’ के विरुद्ध दिनांक 20 अप्रेल 2007 तक वाद ला सकेगा, क्योंकि अब विहित काल की संगणना 20 अप्रेल 2004 से नये सिरे से की जायेगी।

    इस प्रकार धारा 18 एवं 19 दोनों अभिस्वीकृति के बारे में प्रावधान करती है। धारा 18 ऋण के दायित्व की अभिस्वीकृति के बारे में है जबकि धारा 19 संदाय के रूप में अभिस्वीकृति के बारे में है। (गजाधर बनाम उदयचंद ए.आई.आर. 1940 नागपुर 354)

    अनिवार्य तत्त्व

    धारा 19 में वर्णित अभिस्वीकृति की प्रयोज्यता के लिए निम्नांकित शर्तों का पूरा होना आवश्यक है—

    (क) इसका पहला आवश्यक तत्त्व है-ऋण या वसीयत सम्पदा के संदाय के लिए दायी व्यक्ति या उसके अभिकर्ता द्वारा उस ऋण या वसीयत सम्पदा के ब्याज लेखे कोई संदाय (payment) किया जाना। संदाय धन या वस्तु के रूप में हो सकता है। यह लेखों के परिशोधन द्वारा भी हो सकता है। यदि कोई कर्मचारी अपने ऋण लेखे अपने वेतन का कुछ भाग जमा कराता है तो वह भी इस धारा के प्रयोजनार्थ संदाय है।

    हनुमानमल बनाम जतनमल (ए.आई.आर. 2005 राजस्थान 71) के मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि-धारा 19 की प्रयोज्यता के लिए संदाय को प्रमाणित किया जाना आवश्यक है। (Proof of payment is essential condition under sec. 19)

    (ख) ऐसा संदाय विहित काल के अवसान के पूर्व किया जाना इसका दूसरा आवश्यक तत्त्व है। यदि संदाय विहित काल के अवसान के बाद किया जाता है तो वह अर्थहीन होगा। (मै. कादर कन्स्ट्रक्शन्स बनाम मै. तारा टाइल्स, ए.आई.आर. 1984 मुम्बई 258)

    (ग) तीसरा आवश्यक तत्त्व है-संदाय का लिखित में होना। यदि संदाय लिखित में नही है तो उसका कोई अभिप्राय नहीं होगा। (अर्जुनलाल धनजी राठौड़। बनाम दयाराम प्रेमजी, ए.आई.आर. 1971 पटना 278)।

    (घ) लिखित संदाय का हस्ताक्षरित (signed) होना विधिमान्य अभिस्वीकति का चौथा आवश्यक तत्त्व है।

    यनियन ऑफ इंडिया बनपाम एम.सी.पाण्डे (ए.आई.आर. 2009 एन.ओ.सी. 494 उत्तरांचल) के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि जहाँ तीन वर्ष की अवधि में तीन बार अभिस्वीकृतियाँ की गई हों, वहाँ अन्तिम अभिस्वीकृति की तारीख से कालावधि की संगणना की जायेगी।

    (3) अन्य व्यक्ति द्वारा अभिस्वीकृति या संदाय का प्रभाव

    अधिनियम की धारा 20 भी अभिस्वीकृति से जुड़ी हुई है। इसमें उन व्यक्तिया का उल्लेख किया गया है जो अभिस्वीकृति के लिए प्राधिकृत किये जा सकते हैं और उनके। द्वारा की गई अभिस्वीकृति विधि मान्य होती है। धारा 20 के अन्तर्गत निम्नांकित व्यक्ति विधिमान्य अभिस्वीकृति कर सकते हैं

    (क) विधि पूर्ण संरक्षक

    (ख) सुपुर्द दार

    (ग) प्रबन्धक, एवं

    (घ) इनकी ओर से प्राधिकृत कोई अभिकर्ता।

    उदाहरणार्थ-यदि किसी अवयस्क की ओर से उसके संरक्षक द्वारा संदाय किया जाता है तो वह

    विधिमान्य संदाय है। (मणिदेवी बनाम अन्नपूर्णा, ए.आई.आर. 1943 पटना 218)

    कुटम्ब के लिए उपगत किये गये ऋणों के सम्बन्ध में कर्ता द्वारा की गई अभिस्वीकृति कुटुम्ब पर आबद्धकर है। इसके लिए कर्ता को अभिव्यक्त रूप से प्राधिकृत किया जाना आवश्यक नहीं है। (नागरमल बनाम बजरंगलाल, ए.आई.आर. 1950 पी.सी. 15)

    लेकिन भागीदार द्वारा की गई अभिस्वीकृति तभी मान्य होती है जब अन्य भागीदारों द्वारा उसे अभिव्यक्त रूप से इस निमित्त प्राधिकृत किया गया हो। (गोवर्धनदास बनाम भूला भाई, ए.आई.आर. 1932 मुम्बई 426)

     

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    LECTURE-3

    PRE QUESTIONS

     
    1. गेलमनि बनाम मोरिजिन के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि समय का जाना तब प्रारम्भ हो जाता है, जब_____

    (a) वाद कारण प्रारम्भ हो जाये

    (b) ऐसे समय व्यक्ति वयस्क एवं स्वस्थचित हो

    (c) (a) एवं (b) दोनों

    (d) कोई भी नही

     
    1. धारा 17 में परिसीमा काल में वृदि के आधार कौन से है-

    (a) कपट

    (b) भूल

    (c) उत्पीडन

    (d) (a) एवं (b) दोनों

     
    1. जहाँ वाद संस्थित होने के पश्चात् कोई नया वादी या प्रतिवादी प्रतिस्थापित किया या जोडा जाये, वहाँ वाद जहाँ तक कि उसका सम्बन्ध है, तब संस्थित किया गया समझा जायेगा, जब वह इस प्रकार उत्पन्न पहले पक्षकार बनाया गया। किसी धारा का प्रावधान है?

    (a) धारा 21

    (b) धारा 20

    (c) धारा 23

    (d) धारा 22

     
    1. धारा 16 की उपधारा (1) या उपधारा (2) किन वादों पर लागू नही होती है।

    (a) पूर्वक्रय के अधिकारों को लागू करने के लिए

    (b) अचल सम्पत्ति

    (c) आनुवांशिक पद के अधिपत्य

    (d) अपयुक्त सभी

     
    1. यह साबित करने का भार किस पर होता है कि कपट किया गया था और उसी कपट की आड में उसे यह जानकारी नही होने दी गई कि उसे वाद लाने का अधिकार है या उस स्वत्व की जानकारी नही होने दी गई जिस पर उसका अधिकार आधारित था

    (a) वादी

    (b) प्रतिवादी

    (c) अंशतः वादी अंशतः प्रतिवादी

    (d) कोई अन्य

     
    1. अभिस्वीकृति वाद चलाने के लिए किसी नये अधिकार का सृजन नही करती केवल-

    (a) समयावधि को विस्तृत कर देती है

    (b) समयावधि को संकुचित कर देती है

    (c) (a) एवं (b) दोनों

    (d) कोई नही

     

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    Lecture – 4

    कब्जे द्वारा स्वामित्व का अर्जन

    (Acquisition of Title by Ownership)

    Mains Questions

     
    1. चिरभोग द्वारा सुखाधिकार का अर्जन को विस्तार से समझाये।
     
    1. अधिसेवी सम्पत्ति के उत्तरभोगी के पक्ष में अपवर्जन की व्याख्या करें।
     
    1. सम्पत्ति के अधिकार की समाप्ति की धारणा की व्याख्या करे।
     
    1. धारा 25 तथा धारा 27 में निर्धारित समयावधि के अन्तर का औचित्य समझाये।
     
    1. धारा 27 के लागू होने के लिए किन अपेक्षाओं का पूरा होना आवश्यक है?
     

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    Lecture – 4

    कब्जे द्वारा स्वामित्व का अर्जन

    (Acquisition of Title by Ownership)

     

    परिचयात्मक

    भारतीय परिसीमा अधिनियम का भाग पाँच कब्जे द्वारा स्वामित्व की प्राप्ति से सम्बन्धित है। इसमें तीन धाराएँ 25, 26 एवं 27 आच्छादित होती हैं। प्रथम दो धाराएँ चिरभोगाधिकार के इस सुखाधिकार के अर्जन से सम्बन्धित हैं। अंतिम धारा 27 सम्पत्ति के अधिकार की समाप्ति की विवेचना करती है। विधिक दृष्टि में ये तीनों धाराएँ अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं, विशेषकर धारा 27 जो मियाद विधि के सामान्य नियम- “कालावधि उपचार को बाधित करती है, न कि अधिकार को।” (limitation bars the remedy but not the rights) का एकमात्र अपवाद है। अत: इन धाराओं के प्रावधानों को पृथक्-पृथक रूप से समझना ही श्रेयस्कर होगा, यद्यपि उनके अन्तर्सम्बन्ध को नकारना अनुपयुक्त है।

    1.चिरभोग द्वारा सुखाधिकार का अर्जन (धारा 25)

    [Acquisition of Easements by Prescription]

    अर्थ एवं क्षेत्र-विषय-वस्तु की इस स्थिति का वर्णन करते हुए धारा 25 निम्नलिखित प्रकार उपबन्धित करती है।

    चिरभोगाधिकार द्वारा सुखाचारों के अधिकार का अर्जन (धारा 25)

    (1) जहाँ किसी भवन में, और उसके लिए, प्रकाश या वायु के प्रवेश और उपयोग का फायदा सुखाचार के रूप में और अधिकार के नाते किसी विघ्न के बिना और बीस वर्षों तक शांतिपूर्वक उठाया जाता रहा है, और जहाँ कि किसी मार्ग या जल-प्रवाह अथवा किसी जल के उपयोग अथवा किसी अन्य स्वभोगात्मक या निषेधात्मक सुखाचार का फायदा किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा जो सुखाचार के रूप में और अधिकार के नाते उस पर हक रखने का दावा करता है और विघ्न के बिना बीस वर्षों तक शांतिपूर्वक और खुले तौर पर उठाया जाता रहा है, वहाँ प्रकाश या वायु के ऐसे प्रवेश और उपयोग, ऐसे मार्ग, जल-धारा, जल के प्रयोग या अन्य सुखाचार का अधिकार पक्का और अलोप्य होगा।

    (2) बीस वर्षों की उक्त कालावधियों में से प्रत्येक ऐसी अवधि कालावधि समझी जायेगी जो कि उस वाद के संस्थित किये जाने के अव्यवहित दो वर्ष के पूर्व के अन्दर खत्म हुई है जिसमें कि वह दावा, जिसमें कि ऐसी कालावधि सम्बद्ध है, प्रतिविरोधास्पद है।

    (3) जहाँ कि वह सम्पत्ति, जिस पर कि किसी अधिकार का दावा उपधारा (1) के अधीन किया जाता है, सरकार की है, वहाँ वह उपधारा ऐसे पढ़ी जायेगी, मानो “बीस वर्ष” शब्दों के स्थान पर “तीस वर्ष” शब्द प्रतिस्थापित कर दिये गये हों।

    व्याख्या- कोई बात जब तक कि कब्जे या उपयोग का वास्तव में विच्छेद दावेदार से भिन्न किसी व्यक्ति के कार्य द्वारा हुई बाधा के कारण न हो गया हो और जब तक कि दावेदार को उसकी और उसे करने वाले को या उसका किया जाना प्राधिकृत करने वाले व्यक्ति की सूचना मिलने के पश्चात् एक वर्ष तक ऐसी बाधा को सहन न कर लिया गया हो या उस बाधा के प्रति उपहति न की गई हो, इस धारा के अर्थों में विघ्न नहीं है।

    सुखाधिकार का अर्थ- इसे हर्ष का विषय ही मानना चाहिए कि अपने उद्देश्यों के लिए अधिनियम ने सुखाधिकार अथवा सुखभोग की परिभाषा स्वयं दे दी है। इस परिभाषा के अनुसार सुखाधिकार (सुखभोग) में ऐसा अधिकार शामिल है, जो संविदा से उत्पन्न नहीं होता है और जिसके द्वारा एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति की भूमि के किसी भाग को, अथवा किसी दूसरे की भूमि में पैदा होने वाली या उससे संलग्न या उस पर आश्रित किसी वस्तु को अपने लाभ के लिए हटाने या विनियोग (remove and appropriate) करने का अधिकारी है। यह भी स्मरण रखना चाहिए कि भारतीय सुखाधिकार अधिनियम, 1882 की धारा 4 में सुखाधिकार की परिभाषा दी गई है। विस्तार में न जाकर केवल इतना समझना पर्याप्त है।

    सुखाधिकार प्राप्त करने की अनिवार्यतायेः-

    1. शांतिपूर्वक (Paceably) उपभोग

    2. खुले रुप से (Openly)

    3. सुखाधिकार के रुप में (As an Easement)

    4. अधिकार के रुप में (As of right)

    5. बिना किसी विघ्न (रुकावट) के (Without any interruption)- धारा 25 के साथ लगे हुए स्पष्टीकरण की व्याख्या करने से स्पष्ट हो जाता है कु कालावधि (limitation) के उद्देश्यों के लिए निम्नलिखित तीन शर्तों का पूरा होना आवश्यक है

    (i) कब्जे या उपभोग का वास्तविक विच्छेद’ (actual discontinuance) हुआ हो;

    (ii) ऐसी विघ्न दावेदार से भिन्न किसी व्यक्ति के कृत्य द्वारा उत्पन्न की गई बाधा के कारण कारित हुई हो; तथा

    (iii) दावेदार द्वारा उस बाधा की सूचना मिलने के पश्चात्, उसे (बाधा को) एक वर्ष तक सहन किया गया हो या उसके (बाधा के) प्रति मौन सम्मति दी गई हो।

    6. बीस वर्षों तक (Twenty Years)- सुखाधिकार के अधिकार का उपभोग कम से कम बीस वर्षों तक किया गया हो। यदि ऐसे अधिकार का हक सरकार की सम्पत्ति पर जताया जाता है तो उक्त अवधि बीसके स्थान पर तीस वर्ष होगी।

    7. अधिकार किसी वाद में उठाया जाना (Right to be brought in question in some suit)- धारा 25 की उपधारा (1) घोषित करती है कि अन्य शर्तों के साथ बीस वर्ष की अवधि की शर्त पूरी हो जाने पर अधिकार पक्का एवं आलोप्य (absolute and indefeasible) बन जाएगा। परन्तु वास्तविक विधिक स्थिति यह नहीं है क्योंकि उपर्युक्त उपधारा (1) उसी धारा की उपधारा (2) द्वारा नियन्त्रित है।’ उपधारा (2) का आशय इस बात को स्पष्ट कर देता है कि उपभोग की अवधि बीस वर्ष या उससे चाहे जितनी अधिक क्यों न हो जाये अधिकार अपूर्ण (“imperfect, inchoate and incomplete”) रहेगा जब तक न्यायालय द्वारा उसके पूर्ण होने की घोषणा न कर दी जाए; और न्यायालय द्वारा ऐसी घोषणा तभी की जा सकती है जब विघ्न (interruption) की तारीख से दो वर्षों के भीतर न्यायालय की शरण ली गई हो। वस्तुत: यह दो वर्ष की समयावधि कालावधि (limitation) के रूप में है। न्यायालय उक्त प्रकार की घोषणा नहीं करेगा यदि उसकी शरण विघ्न कारित होने के दो वर्षों बाद ली गई है।।

    उपर्युक्त अनिवार्यताओं के सारांश को ‘nec vi (बिना जोर जबरदस्ती) ‘nec clam’ (गुप्त रूप से नहीं, बल्कि खुले तौर पर) तथा ‘nec precario’ (बिना अनुमति के) जैसी प्रचलित उक्तियों के माध्यम से प्रायः अभिव्यक्त किया जाता है।

    II. अधिसेवी सम्पत्ति के उत्तरभोगी के पक्ष में अपवर्जन (धारा 26)

    [Exclusion in favour of servient tenement]

    धारा 26 भी पिछली धारा की भाँति सुखाधिकारों के अर्जन से संव्यवहरण (deals with) परन्तु इसका प्रमुख उद्देश्य अधिसेवी उत्तरभोगी (servient tenement) के प्रतिवर्तियों (revesioners) के हितों की सुरक्षा प्रदान करना है। यह धारा निम्न प्रकार है।

    “अधिसेवी सम्पत्ति के उत्तरभोगी के पक्ष में वर्जन (धारा 26)– जहाँ ऐसे हित के अधीन या बल पर, जो कि जीवन-पर्यन्त के लिए हैं या उसके अनुदत्त किये जाने से तीन वर्षों से अधिक किसी अवधि के लिए कोई सुखभोग किसी भूमि या जल में, या उसके ऊपर या उसके उपभोग में लाया जाता रहा है, या व्युत्पन्न हुआ है, वहाँ ऐसे हित या अवधि के चालू रहने के अभ्यन्तर ऐसे सुखभोग का उपभोग करने का समय, बीस वर्षों की कालावधि की गणना में से, उस अवस्था में, जिसमें कि ऐसे हक के समाप्त होने के पश्चात्, उक्त भूमि या जल के हकदार व्यक्ति द्वारा ऐसे हित या अवधि के समाप्त होने के पश्चात् आगामी तीन वर्षों के अन्दर उस दावे का प्रतिरोध किया जाता है, अपवर्जित कर दिया जायेगा।”

    इस प्रकार इस धारा का प्रभाव निरन्तर उपभोग की अपेक्षित अवधि को उस समयावधि तक विस्तृत कर देना है जब कि उक्त अवधि या जीवन पर्यन्त (life-interest) चलता रहता है। इस धारा के उपबन्ध, तथा सुखाधिकार की परिभाषा धारा 25 की ही भाँति उन राज्यों पर लागू नहीं होगी जिनमें कि भारतीय सुखाधिकार अधिनियम, 1882 विस्तृत है।

    अनिवार्यताएँ

    (i) कि सुखाधिकार का उपभोग, पट्टे की शर्तों के अनुरूप अथवा आजीवन हित का सृजन करने वाले के अनुरूप, तीन वर्ष या उससे अधिक का रहा हो; तथा

    (ii) कि ऐसे पट्टे की समयावधि (period) की बीस वर्षों की गणना में से निकाल दिया जायेगा; यदि विरोधी पक्षकार इस बात को पट्टे की अवधि के समाप्त होने के तीन वर्षों के भीतर उठाने में असफल रहता है, तो उसे नहीं निकाला जायेगा।

    उदाहरण

    निम्न दृष्टान्त से धारा 26 की प्रयोज्यता को समझा जा सकता है—

    ‘क’ इस घोषणा के लिए ‘ख’ के विरुद्ध एक वाद चलाता है कि वह ‘ख’ की भूमि पर मार्ग के अधिकार (right of way) का हकदार है। ‘क’ सिद्ध करता है कि उसने उक्त अधिकार का उपभोग पचीस वर्षों तक किया है; परन्तु ‘ख’ यह दर्शाने में सफल रहता है कि कथित. अवधि के दौरान ‘ग’ नामक एक हिन्दू विधवा उस भूमि पर दस वर्षों तक आजीवन हित (life interest) रखती थी, कि ‘ग’ की मृत्यु पर ‘ख’ उस भूमि का हकदार बना तथा ‘ग’ की मृत्यु के दो वर्षों के भीतर उसने ‘क’ के अधिकार के हक का प्रतिरोध (contest) किया। ‘क’ द्वारा चलाया गया प्रस्तुत वाद निश्चित रूप से खारिज कर दिया जायेगा क्योंकि धारा 16 के सन्दर्भ में, ‘ख’ केवल पन्द्रह वर्षों का उपभोग सिद्ध कर सका है।

    III. सम्पत्ति के अधिकार की समाप्ति (धारा 27) (विनष्टकारी चिरभोगी)

    [Extinguishment of Right to Property (Extinctive Prescription)]

    सामान्य नियम- परिसीमा सम्बन्धी सामान्य नियम यह है कि कालावधि केवल उपचार को बाधित करती है न कि अधिकार को (Limitation bars the remedy but not the right) यह सामान्य नियम इतना अधिक सुस्थापित है कि इसके समर्थन में भारतीय एवं विदेशी न्यायिक निर्णयों की एक अन्तहीन श्रृंखला प्रस्तुत कराने की कालावधि की जा सकती है।

    अपवाद–धारा 27 उपर्युक्त नियम का एक और एकमात्र अपवाद है—

    “सम्पत्ति के अधिकार की समाप्ति (धारा 27)— किसी व्यक्ति द्वारा किसी सम्पत्ति के कब्जे के लिए वाद संस्थित किए जाने के लिए एतद् द्वारा जो कालावधि विहित की गई है, उसकी समाप्ति पर ऐसी सम्पत्ति पर उसका अधिकार समाप्त हो जायेगा।”

    अपवाद का अर्थ एवं क्षेत्र– धारा 27 में प्रयुक्त शब्दावली से स्पष्ट हो जाता है कि अधिनियम, 1963 के अन्तर्गत कब्जे के लिए वाद दायर करने की कालावधि बीत जाने के पश्चात् कब्जे के लिए वाद करने का अधिकार भी समाप्त हो जाता है। यह धारा जब कालावधि की बात करती है तब यह भी कहती है कि यह अवधि सम्पत्ति पर कब्जे हेतु वादों के सम्बन्ध में ही होगी। जिस हक की समाप्ति विधिक रूप से हो चुकी है। उसका पुनर्नवीनीकरण सम्भव नहीं है। निःसन्देह धारा 27 में अन्तर्निहित सिद्धान्त, प्रारम्भ में उल्लिखित सामान्य नियम का अपवाद है।

    धारा 25 तथा धारा 27 में निर्धारित समयावधि के अन्तर का औचित्य—धारा 25 में उपभोग की अवधि बीस वर्ष है, जबकि धारा 27 में यही अवधि 12 वर्ष है। (सरकार की सम्पत्ति को छोड़कर) उसका औचित्य केवल इतना है कि धारा 25 के अन्तर्गत की जाने वाली सम्पत्ति (प्रकाश एवं वायु आदि) उपभोग करने योग्य तो है, किन्तु शारीरिक कब्जे के योग्य नहीं है। इसके विपरीत धारा 27 के अन्तर्गत सम्पत्ति (कोई भी चल या अचल सम्पत्ति) वास्तविक शारीरिक कब्जे के योग्य हैं। यदि भेद उक्त वर्णित समयावधि के अन्तर के औचित्य को स्पष्ट करता है।

    अब केवल दो-एक बातें सामान्य रूप से उल्लेखनीय रह जाती हैं। पहली यह कि कब्जे की निरन्तरता (continuity) में कोई विघ्न (break) न पड़ा हो क्योंकि उससे पिछले प्रतिकूल कब्जे का प्रभाव नष्ट हो जायेगा और इससे सर्वथा एक नई कालावधि का चलना आरम्भ हो जायेगा। दूसरे, प्रतिकूल कब्जे को अनुमतिकारी (permissive) नहीं होना चाहिए क्योंकि इस प्रकार का कब्जा प्रतिकूल कब्जे का गठन नहीं कर सकता।

    अन्त में यह उल्लेख करना भी आवश्यक है कि यद्यपि धारा 27 के उपबन्ध यथावत् रूप से विशेष अथवा स्थानीय अधिनियमों पर लागू नहीं होते, तथापि दीनदयाल बनाम राजाराम’ के महत्वपूर्ण प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने धारण किया है कि धारा 27 का अन्तर्निहित सिद्धान्त प्रयोज्यता (applicability)। यह केवल उन वादों तक सीमित नहीं है जिनके लिए अधिनियम में मियाद की अवधि विहित कर दी गई है।

     

    PAHUJA LAW ACADEMY

    Lecture 4

    कब्जे द्वारा स्वामित्व का अर्जन

    (Acquisition of Title by Ownership)

    PRE QUESTIONS

     
    1. चिरभोग द्वारा अर्जन का दावा ऐसी संपत्ति पर किया गया हो जो सरकार की हो वहां सम्पत्ति का बिना विघ्न कितने वर्षों तक उपयोग किया गया है?

    (a) 30 वर्ष

    (b) 20 वर्ष

    (c) 60 वर्ष

    (d) 70 वर्ष

     
    1. चिरभोग द्वारा सुखाधिकार का अर्जन का वर्णन किस धारा में है-

    (a) धारा 25

    (b) धारा 26

    (c) धारा 27

    (d) कोई नही

     
    1. भारतीय सुखाधिकार अधिनियम, 1882 की किस धारा में सुखाधिकार की परिभाषा दी गयी है?

    (a) धारा 4

    (b) धारा 5

    (c) धारा 6

    (d) धारा 25

     
    1. सुखाधिकार के अधिकार का उपभोग कम से कम _____ किया गया हि

    (a) 20

    (b) 30

    (c) 25

    (d) 12

     
    1. धारा 25 की उपहारा (2) का आशय इस बात को स्पष्ट कर देता है कि उपभोग की अवधि बीस वर्ष या उससे चाहे जितनी अधिक क्यो न हो जाए अधिकार अपूर्ण रहेगा जब तक___

    (a) न्यायालय द्वारा उसके पूर्ण होने की होने न कर दी जाए

    (b) न्यायालय द्वारा ऐसी घोषणा तभी की जा सकती है जब विघ्न की तारीख से दो वर्षो के भीतर न्यायालय की शरण ली गई हो

    (c) या दो वर्ष की समयावधि कालावधि के रुप में हो।

    (d) उपयुक्त सभी

     
    1. धारा 25 में बिना किसी विघ्न के लिए कौन सी शर्त अनिवार्य है

    (a) कब्जे या उपभोग का वास्तविक विच्छेद हुआ हो

    (b) ऐसी विघ्न दावेदार से मित्र किसी व्यक्ति के कृव्य द्वारा उत्पन्न की गई बाधा के कारण कारित हुई हो

    (c) दावेदार द्वारा उस बाधा की सूचना मिलने के पश्चात्, उसे (बाधा को) एक वर्ष तक सहन किया गया हो

    (d) उपयुक्त सभी

     
    1. सुखाधिकार प्राप्त करने की अनिवार्यताये

    (a) शांतिपूर्वक उपभोग

    (b) खुले रुप से

    (c) सुखाधिकार के रुप में

    (d) उपयुक्त सभी

     
    1. अधिसेवी सम्पत्ति के उत्तरभोगी के पक्ष में अपर्वजन की व्याख्या किस धारा में है-

    (a) धारा 26

    (b) धारा 27

    (c) धारा 25

    (d) कोई नही

     
    1. सम्पत्ति के अधिकार की समाप्ति व्याख्या किस धारा में कि गयी है

    (a) धारा 27

    (b) धारा 28

    (c) धारा 29

    (d) कोई नही

     
    1. धारा ___ के अर्न्तगत की जाने वाली सम्पत्ति (प्रकाश एव वायु आदि) उपभोग करने योग्य तो है, किन्तु शारीरिक कब्जे के योग्य नही है। इसके विपरित धारा ___ के अर्न्तगत सम्पत्ति (कोई भी चल या अचल सम्पत्ति) वास्तविक शारीरिक कब्जे के योग्य है।

    (a) धारा 25, धारा 27

    (b) धारा 27, धारा 25

    (c) धारा 27, धारा 28

    (d) धारा 26, धारा 27

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