Constitution(Hindi)

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न्यायपालिका

Pre-Question

  1. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है –
  • भारत के मुख्य न्यायाधीश के द्वारा भारत के राष्ट्रपति की राय से
  • राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की राय पर
  • राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमन्त्री के अनुमोदन पर
  • राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से जिन्हें वह आवश्यक समझता है तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय पर
  1. भारत के उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता में वृद्धि की जा सकती है –
  • संसद द्वारा
  • राष्ट्रपति द्वारा
  • भारत के मुख्य न्यायमूर्ति के परामर्श से राष्ट्रपति द्वारा
  • भारत के मुख्य न्यायमूर्ति के परामर्श से संघ की मंत्रि-परिषद् द्वारा
  1. भारतीय संविधान में तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान है-
  • सर्वोच्च न्यायालय में
  • उच्च न्यायालय में
  • जनपद तथा सत्र न्यायालयों में
  • उपरोक्त सभी में
  1. निम्नलिखित वादों में से किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह विनिश्चित किया है कि पंथनिरपेक्षता संविधान का आधारभूत ढाँचा है?
  • एस. पी. मित्तल बनाम भारत संघ
  • श्री जगन्नाथ मन्दिर पूरी प्रबंध समिति बनाम
  • अरुणा राय बनाम भारत संघ
  • उपरोक्त में से कोई नहीं
  1. भविष्यलक्षी विनिर्णय का सिद्धांत सर्वप्रथम प्रतिपादित किया था-
  • जस्टिस सुब्बा राव ने
  • जस्टिस सीकरी ने
  • जस्टिस मैथ्यू ने
  • जस्टिस कृष्णा अय्यर
  1. संविधान के किस अनुच्छेद में यह प्रावधान है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के राज्य क्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्धकर होगी?
  • अनुच्छेद 140
  • अनुच्छेद 141
  • अनुच्छेद 143
  • अनुच्छेद 136
  1. एक मामले में उच्चतम न्यायालय को अपील हो सकेगी यदि इसमें अंतर्ग्रस्त है-
  • विधि का एक प्रश्न
  • विधि का एक महत्वपूर्ण प्रश्न
  • विधि का एक सारवान प्रश्न
  • विधि एवं तथ्य का एक मिश्रित प्रश्न
  1. संविधान के किस अनुच्छेद के अधीन भारत का राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय का परामर्श ले सकता है?
  • अनुच्छेद 143
  • अनुच्छेद 142
  • अनुच्छेद 136
  • अनुच्छेद 141
  1. निम्नलिखित में से कौन अपने पद से असमर्थता के आधार पर हटाया जा सकता है?
  • लोक सेवा आयोग का सदस्य
  • उच्च न्यायालय का न्यायाधीश
  • भारत के राष्ट्रपति
  • उपर्युक्त में से कोई भी नहीं
  1. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण का मुख्य संरक्षक होता है-
  • राज्यपाल
  • मुख्यमंत्री
  • उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश
  • न्याय मंत्री (विधि)
  1. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति में किसकी राय की प्रधानता है-
  • भारत के राष्ट्रपति
  • प्रधानमंत्री
  • भारत के मुख्य न्यायमूर्ति
  • विधिमंत्री
  1. भारत के संविधान के किस अनुच्छेद द्वारा राष्ट्रपति को उच्च न्यायालय का कार्यकारी मुख्य-न्यायाधीश नियुक्त करने की शक्ति दी गयी है?
  • अनुच्छेद-223
  • अनुच्छेद-224
  • अनुच्छेद-224-A
  • अनुच्छेद-225
  1. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए कौन सी अर्हता नहीं है-
  • वह भारत का नागरिक होना चाहिए
  • उच्च न्यायालय में कम से कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में अनुभव हो
  • उसने 35 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली हो
  • उसने भारत में कम से कम 10 वर्ष तक न्यायिक पद धारण किया हो
  1. उच्चतम न्यायालय ने किस वाद में निर्णित किया है कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संविधान का मूलभूत ढाँचा है-
  • केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य
  • राजनारायण बनाम श्रीमती इंदिरा गांधी
  • मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ
  • गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य
  1. किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने निर्णित किया कि संविधान ‘जनता की इच्छा’ के ऊपर अभिभावी होता है?
  • आर. एस. चौधरी बनाम पंजाब राज्य
  • बी. आर. कपूर बनाम तमिलनाडु राज्य
  • महेन्द्रपाल दास बनाम बिहार राज्य
  • उपर्युक्त में से कोई नहीं
  1. उच्चतम न्यायालय ने “आरोग्यकर याचिका’ (क्यूरेटिव पिटीशन) के उपचार का प्रयोग किस वाद में किया था?
  • एम. इस्माइल बनाम भारत संघ
  • बाबू सिंह बनाम भारत संघ
  • रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा
  • लिली थॉमस बनाम भारत संघ
  1. निम्नलिखित में से किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रपति के संदर्भित मामले पर अपनी सलाहकारी राय देने से इन्कार किया है?
  • इन री केरल एजूकेशन बिल
  • इन री बेरुबरी के वाद में
  • इन री स्पेशल कोर्ट बिल
  • इन री एम. इस्माइल फारुकी के वाद में
  1. रिट्स (Writs) कौन जारी कर सकता है-
  • सिविल न्यायालय
  • जिला न्यायालय
  • जिला मजिस्ट्रेट
  • उच्च न्यायालय
  1. सूची-I (वाद) को सूची-II (आपराधिक मूल) संरचना के सिद्धांत के तत्व) से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गये कूट की सहायता से सही उत्तर दीजिए-

सूची-I                             सूची-II 

(वाद)                             (आधारित संरचना के सिद्धांत के तत्व)

  1. आई. आर. कोल्हो बनाम पंथ निरपेक्षता 

तमिलनाडु राज्य

  1. एम. नागराज बनाम न्यायिक पुनर्विलोकन

भारत संघ

  1. एस. आर. बोम्मई स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष चुनाव

बनाम भारत संघ 

  1. इंदिरा नेहरू गांधी बनाम समानता

राजनारायण

कूट :

A     B     C     D

  • 1 2     3     4
  • 2 3     4     1
  • 4 3     1     2
  • 2 4     1     3
  1. उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत राज्य क्षेत्र में सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है| इसमें-
  • उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय भी शामिल है
  • उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय शामिल नहीं है
  • उच्चतम न्यायालय शामिल नहीं है
  • उपर्युक्त में कोई सही नहीं है

Mains Questions

  1. उच्चतम न्यायालय का गठन एवं न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया का उल्लेख कीजिये 99वां संविधान संशोधन की संवैधानिकता का परिक्षण कीजिये|

 

  1. उच्चतम न्यायालय की शक्तियों का परिक्षण संक्षेप में करे|

 

  1. उच्चतम न्यायालय की परामर्शकारी अधिकारिता का उल्लेख करे|

 

  1. उच्चतम न्यायालय की पारित विधि सम्पूर्ण भारत में लागू होगी क्या इसका कोई अपवाद है|

 

  1. रिट कितने प्रकार की होती है| इसका संक्षेप में उल्लेख कीजिये|

 

          

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Constitution

मूल अधिकार

 

  1. “शिक्षा का अधिकार” को मूल अधिकार के रूप में संविधान में जोड़ा गया-
  • 42वें संविधान संशोधन द्वारा|
  • 44वें संविधान संशोधन द्वारा|
  • 84वें संविधान संशोधन द्वारा|
  • 86वें संविधान संशोधन द्वारा|
  1. संविधान के अनुच्छेद 12 के अन्तर्गत निम्नलिखित में से कौन ‘राज्य’ नहीं है?
  • जीवन बीमा निगम
  • भारत का स्टेट बैंक
  • दिल्ली विश्वविद्यालय
  • एन.सी.ई.आर.टी.
  1. ‘आच्छादन’ का सिद्धांत संबंधित है-
  • अनुच्छेद 12 से
  • अनुच्छेद 13 से
  • अनुच्छेद 14 से
  • अनुच्छेद 15 से
  1. संविधान के निर्वचन में प्रथम बार भविष्यलक्षी विनिर्णय का सिद्धांत निम्न वाद में लागू किया गया-
  • केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य
  • गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य
  • ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य
  • चरणजीत लाल बनाम भारत संघ
  1. न्यायिक पुनर्विलोकन संविधान के किस अनुच्छेद में निहित है?
  • अनुच्छेद 11
  • अनुच्छेद 12
  • अनुच्छेद 13
  • अनुच्छेद 15
  1. भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन का सिद्धांत निम्न संविधान से लिया गया है?
  • ब्रिटेन के
  • फ्रांस के
  • यू.एस.ए. के
  • स्विट्ज़रलैंड के
  1. निम्नलिखित सिद्धांतों में से कौन सा संविधान के अनुच्छेद 13 से सम्बन्धित नहीं है?
  • पृथक्करणीयता का सिद्धांत
  • तत्व और सार का सिद्धांत
  • अधित्याग का सिद्धांत
  • आच्छादन का सिद्धांत
  1. भारत के संविधान में ‘विधि का शासन’ निहित है अनुच्छेद-
  • अनुच्छेद 13 में
  • अनुच्छेद 14 में
  • अनुच्छेद 19 में
  • अनुच्छेद 25 में
  1. निम्नलिखित में से कौन मौलिक अधिकार नहीं है?
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार
  • समता का अधिकार
  • हड़ताल का अधिकार
  • संगम या संघ बनाने का अधिकार
  1. संविधान के निम्नलिखित अनुच्छेदों में से किसमें ‘किसी भी रूप में अस्पृश्यता के अंत’ के लिये प्रावधान है?
  • अनुच्छेद 14
  • अनुच्छेद 17
  • अनुच्छेद 19
  • अनुच्छेद 16
  1. प्रेस की स्वतन्त्रता निम्नलिखित के हित में निर्बन्धित नहीं की जा सकती है-
  • लोक व्यस्था
  • राज्य की सुरक्षा
  • जनहित
  • भारत की प्रभुता एवं अखंडता
  1. ‘जनहित वाद’ की अवधारणा निम्नलिखित किस देश से उत्पन्न हुई?
  • ऑस्ट्रेलिया
  • यू.एस.ए.
  • यू.के.
  • भारत
  1. PIL से संबंधित व्यक्ति हैं-
  • न्यायाधीश भगवती
  • न्यायाधीश आर.एन. मिश्रा
  • न्यायाधीश वेंकटचेलैया
  • उपर्युक्त में से कोई नहीं
  1. निम्नलिखित में से कौन-सा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में सम्मिलित नहीं है?
  • मृत्यु का अधिकार
  • जीवन का अधिकार
  • जीविका का अधिकार
  • सम्मान का अधिकार
  1. “किसी व्यक्ति को, उसके प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा” से तात्पर्य है-
  • विधायिका द्वारा पारित कोई भी विधि
  • ऐसी विधि जो नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार हो
  • ऐसी विध जिससे रोजगार का अधिकार प्राप्त हो
  • ऐसी विधि जो केवल ‘प्रक्रिया’ से संबंधित हो
  1. निम्नलिखित में से किस संविधान संशोधन के अन्तर्गत सम्पति का अधिकार मौलिक अधिकार से हट गया?
  • 24वाँ संशोधन
  • 25वाँ संशोधन
  • 42वाँ संशोधन
  • 44वाँ संशोधन
  1. सूची-I एवं सूची-II को सुमेलित कीजिये और सूचियों के नीचे दिए गये कूट की सहायता से सही उत्तर चुनिये-

सूची – I                                          सूची – II

  1. बालाजी बनाम मैसूर राज्य मूल अधिकारों के अभित्यजन का सिद्धांत
  2. मेनका गाँधी बनाम भारत संघ धार्मिक स्वतंत्रता
  3. रेव. स्टेनिस्लाव बनाम मध्य प्रदेश राज्य प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार
  4. बशेशर नाथ बनाम आयकर आयुक्त पिछड़े वर्ग का आरक्षण

कूट:

A     B     C     D

  • 4     2     3     1
  • 1     4     3     2
  • 4     3     2     1
  • 4     1     2     3
  1. संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन जीवन तथा दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार में सम्मिलित है-
  • मृत्यु का अधिकार
  • आत्महत्या करने के प्रयत्न का अधिकार
  • शिक्षा का अधिकार
  • नियोजन का अधिकार
  1. विज्ञापन एक ‘वाणिज्यिक वाक्’ है, यह निर्णीत हुआ था-
  • हमदर्द दवाखाना ब. भारत संघ में
  • एक्सप्रेस न्यूज़ पेपर्स (प्रा.) लि. ब. भारत संघ में
  • बेनेट कोलमैन एंड क. ब. भारत संघ में
  • टाटा प्रेस लि. ब. महानगर टेलीफोन निगम लि. में
  1. अवैध कैद के लिए कौन सी रिट जारी होती है?
  • निषेध रिट
  • परमादेश रिट
  • बन्दी प्रत्यक्षीकरण रिट
  • अधिकार-प्रच्छा रिट

भारत का संविधान (एक नजर)

(The Constitution of India)

 

भाग- 1                              भाग- 2                                 भाग- 3

संघ और उसका राज्यक्षेत्र                    नागरिकता                                मूल अधिकार

[अनुo 1-4]                                  [अनुo 5-11]

साधारण          समता का        स्वतंत्रता का      शोषण के विरुद्ध धर्म की स्वतंत्रता संस्कृति एवं शिक्षा

अधिकार           अधिकार           अधिकार       का अधिकार      का अधिकार

[अनु. 12, 13]    [अनु. 14–18]     [अनु. 19-22]     [अनु. 23, 24]    [अनु. 25-28]     [अनु. 29-30]

कुछ विधियों की व्यावृत्ति            सांविधानिक उपचारों का अधिकार

[अनु. 31-क, 31-ख 31-ग]                 [अनु. 32-35]

भाग- 4                             भाग- 4 क                    भाग- 5

राज्य की नीति के निदेशक तत्व                 मूल कर्तव्य                       संघ    

[अनु. 36-51]                         [अनु. 51-क]

अध्याय-1       अध्याय-2           अध्याय-3                 अध्याय-4                     अध्याय-5

कार्यपालिका       संसद       राष्ट्रपति की विधायी शक्तियाँ    संघ की न्यायपालिका    भारत का नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक 

[अनु. 52-78]   [अनु. 79-122]      [अनु. 123]               [अनु. 124-147]                   [अनु. 148-151]

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति        मंत्रिपरिषद्           भारत का महान्यायवादी     सरकारी कार्यों का संचालन

[अनु. 52-73]            [अनु. 74, 75]               [अनु. 76]             [अनु. 77, 78]

साधारण      संसद के अधिकारी     कार्यसंचालन      सदस्यों की निगर्हतायें       संसद और उसके       विधायी प्रक्रिया

[अनु. 79-88]    [अनु. 89-98]      [अनु. 99-100]      [अनु. 101-104]         सदस्यों की शक्तियाँ    [अनु. 107, 111]

विशेषाधिकार और

उन्मुक्तिया

[अनु. 105, 106]

वित्तीय विषय के सम्बन्ध में उपबन्ध            साधारणतया प्रक्रिया

[अनु. 112-117]                     [अनु. 119-122]

भाग- 6

राज्य

[ अनु. 152–212 ]

 

अध्याय- 1       अध्याय- 2           अध्याय- 3           अध्याय- 4      अध्याय- 5           अध्याय- 6

परिभाषा          कार्यपालिका       राज्य का विधानमंडल      राज्यपाल की    राज्यों के उच्च     अधीनस्थ न्यायालय

विधायी शक्तियाँ     न्यायालय

[अनु. 152]       [अनु. 153-167]     [अनु. 168-212]         [अनु. 213]     [अनु. 214-232]     [अनु. 233-237]

राज्यपाल                 मंत्रिपरिषद्        महाधिवक्ता       सरकारी कार्य का संचालन 

[अनु. 153-162]        [अनु. 163-164]      [अनु. 165]          [अनु. 166, 167]

साधारण          राज्यों के विधान       कार्यसंचालन      सदस्यों की निरर्हतायें    राज्यों के विधान      विधायी प्रक्रिया

मण्डल के अधिकारी                                          मण्डलों और उनके

[अनु. 168-177]   [अनु. 178-187]   [अनु. 188-189]       [अनु. 190-193]     सदस्यों की शक्तियाँ    [अनु. 196-201]

विशेषाधिकार और

उन्मुक्तियाँ [अनु. 194,195]

वित्तीय विषयों के सम्बन्ध में प्रक्रिया           साधारण प्रक्रिया

[अनु. 202-207]                   [अनु. 208-212]

भाग- 7          भाग- 8          भाग- 9                  भाग- 10                          भाग- 11

निरसित      संघ राज्यक्षेत्र        पंचायत           अनुसूचित और जनजाति क्षेत्र       संघ एवं राज्यों के बीच सम्बन्ध

[अनु. 239-241]   [अनु. 243, 243 क-ण]     [अनु. 244, 244 क]                 [अनु. 245-263]

भाग- 9 क               भाग- 9 ख

नगरपालिकाएं             सहकारी समितियां

[अनु. 243 त-यछ]         [अनु. 243 य ज- य न]

अध्याय- 1                       अध्याय- 2

विधायी सम्बन्ध विधायी शक्तियों का वितरण         प्रशासनिक सम्बन्ध

[अनु. 245- 255]                          [अनु. 256-263]

साधारण                          जल सम्बन्धी विवाद                राज्यों के बीच विवाद

[अनु. 256- 261]                     [अनु. 262]                         [अनु. 263]

भाग- 12                                                 भाग- 13

वित्त, संपत्ति, सविदायें और वाद [अनु. 264- 300क] भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर व्यापार, वाणिज्य एवं समागम की स्वतंत्रता

[अनु. 301- 307]

अध्याय- 1         अध्याय- 2                     अध्याय- 3                               अध्याय- 4

  वित्त             उधार लेना      संपत्ति, सविदायें, अधिकार, दायित्व, बाध्यतायें और वाद        संपत्ति का अधिकार

[अनु. 264-290क]  [अनु. 292, 293]                 [अनु. 294- 300]                          [अनु. 300क]

साधारण          संघ एवं राज्यों के बीच राजस्वों का वितरण         प्रकीर्ण वित्तीय सम्बन्ध

[अनु. 264-267]           [अनु. 268- 281]                          [अनु. 282- 290क]

भाग- 14                     भाग- 14क                       भाग- 15

संघ एवं राज्यों के अधीन सेवायें      अधिकरण                        निर्वाचन

[अनु. 308- 313]           [अनु. 323 क, 323 ख]             [अनु. 324- 329]

अध्याय- 1               अध्याय- 2

सेवायें                    लोक सेवा आयोग

[अनु. 308-313]           [अनु. 315- 323]

भाग- 16                         भाग- 17                 भाग- 18                 भाग- 19

कुछ वर्गों के सम्बन्ध में विशेष उपबन्ध        राजभाषा               आपात उपबन्ध              प्रकीर्ण

[अनु. 330- 342]               [अनु. 343- 351]          [अनु. 352- 360]         [अनु. 361- 367]

अध्याय- 1             अध्याय- 2                    अध्याय- 3                            अध्याय- 4

संघ की राजभाषा     प्रादेशिक राजभाषाएं      उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों आदि की भाषा      विशेष निदेश

[अनु. 343, 344]     [अनु. 345- 347]               [अनु. 348, 349]                        [अनु. 350- 351]

भाग- 20                      भाग- 21                         भाग- 22

संविधान का संशोधन       अस्थायी, संक्रमणकालीन और        संक्षिप्त नाम, प्रारम्भ, हिन्दी में प्राधिकृत

विशेष उपबन्ध                     पाठ और निरसन

[अनु. 368]                  [अनु. 369- 392]             [अनु. 393, 394, 394 क, 395]

अनुसूचियाँ ( 1 से 12 )

(Schedules)

        पहली अनुसूची       द्वितीय अनुसूची                तृतीय अनुसूची            चौथी अनुसूची

शपथ या प्रतिज्ञान के प्रारूप      राज्य सभा में स्थानों का आबंटन

(1) राज्य    (2) संघ राज्यक्षेत्र

 भाग- क                भाग- ख           भाग- ग                          भाग- घ              भाग- ड.

राष्ट्रपति और राज्यों के     निरसित    लोक सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्षों     उच्चतम न्यायालय और    भारत के नियन्त्रक

राज्यपालों के बारे में                   के तथा राज्य सभा के सभापति और     उच्च न्यायालयों के        महालेखा परीक्षक

विशेष उपबन्ध                        उपसभापति के तथा राज्य की विधान-    न्यायाधीशों के बारे में      के बारे में उपबन्ध

सभा के सभापति और अध्यक्ष और      उपबन्ध

उपाध्यक्ष के तथा विधान परिषद् के

उपसभापति के बारे में उपबन्ध

   पाँचवी अनुसूची                       छठीं अनुसूची                   सातवीं अनुसूची        आठवीं अनुसूची

अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित       असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम                          भाषाएं (22 भाषा)

जनजातियों के प्रशासन और          के जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन के बारे

नियन्त्रण के बारे में उपबन्ध         में उपबन्ध

सूची- 1          सूची- 2          सूची- 3

संघ सूची         राज्य सूची        समवर्ती सूची

भाग- क                         भाग- ख                 भाग- ग                  भाग- घ

साधारण          अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों     अनुसूचित क्षेत्र        अनुसूची का संशोधन

का प्रशासन और नियन्त्रण

नवीं अनुसूची                         दसवीं अनुसूची             ग्यारहवीं अनुसूची              बारहवीं अनुसूची 

कुछ अधिनियमों और विनियमों       दल परिवर्तन के बारे में     पंचायतों की शक्तियाँ, अधिकार     नगरपालिकाओं आदि की

का विधिमान्यकरण                निरर्हता के बारे में उपबन्ध    और उत्तरदायित्व                शक्तियाँ, प्राधिकार और

उत्तरदायित्व

भाग तीन

मूल अधिकार

अनुच्छेद 12      अनुच्छेद 13      अनुच्छेद 14         स्वातंत्र्य का    शोषण के         धर्म की          संस्कृति और

राज्य की परिभाषा मूल अधिकारों    समता का अधिकार     अधिकार    विरुद्ध अधिकार    स्वतंत्रता का     शिक्षा सम्बन्धी

से असंगत या                                                      अधिकार          अधिकार

उनका अल्पीकरण

करने वाली विधियाँ

अनुच्छेद 14 : विधि के समक्ष समता

अनुच्छेद 15 : धर्म, मूल वंश जाति, लिंग या जन्म स्थान

के आधार पर विभेद का प्रतिषेध

अनुच्छेद 16 : लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता

अनुच्छेद 17 : अस्पृश्यता का अंत

अनुच्छेद 18 : उपाधियों का अंत

अनुच्छेद 19 : वाक्-स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण

अनुच्छेद 20 : अपराधों के लिए दोषसिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण

अनुच्छेद 21 : प्राण एवं देहिक स्वतंत्रता का संरक्षण

अनुच्छेद 21क : शिक्षा का अधिकार

अनुच्छेद 22 : कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण

अनुच्छेद 23 : मानव के दुर्व्यापार और बलातश्रम का प्रतिषेध

अनुच्छेद 24 : कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध

अनुच्छेद 25 : अंत:करण की और धर्म के अबाध रूप से माननें, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता

अनुच्छेद 26 : धार्मिक कार्यों के प्रबन्ध की स्वतंत्रता

अनुच्छेद 27 : किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के संदाय के बारे में स्वतंत्रता

अनुच्छेद 28 : कुछ शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वतंत्रता

अनुच्छेद 29 : अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण

अनुच्छेद 30 : शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार

पंथनिरपेक्ष शब्द 42वें संविधान संशोधन,1976 द्वारा जोड़ा गया इसका तात्पर्य यह है की राज्य सभी धर्मों की समान रूप से रक्षा करेगा तथा किसी भी धर्म को राज्य के धर्म के रूप में नही मानेगा|

प्रश्न :  क्या ‘पंथ निरपेक्षता’ संविधान का आधारभूत ढांचा (basic structure) है?

उत्तर : आर. एस. बोम्मई बनाम भारत संघ, 1994 (3) एस. सी. सी. के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया की पंथ निरपेक्षता संविधान का आधार-भूत ढाँचा है|

‘समाजवाद’ शब्द 42वें संविधान संशोधन द्वारा उद्देशिका में जोड़ा गया|

भारत में समाजवाद मिश्रित अर्थव्यवस्था पर आधारित है|

एक्सल-वियर बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 1979 एस. सी. 25 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने समाजवाद के प्रभाव को स्पष्ट करते हुए यह कहा कि राष्ट्रीयकरण और राज्य स्वामित्व को महत्व देना चाहिए लेकिन समाजवाद और सामाजिक न्याय को इस सीमा तक नहीं लागू किया जा सकता है जिससे निजी स्वामित्व वाले हितों की उपेक्षा हो|

उच्चतम न्यायालय ने डी. एस. नकारा बनाम भारत संघ के वाद में धारित किया कि समाजवाद का उदेश्य दुर्बल वर्ग और क्ष्रमिको के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाना है और उनके लिए जन्म से मृत्यु तक सुरक्षा की गारण्टी देना है यह गाँधीवाद और मार्क्सवाद का ऐसा मिश्रण है जो गाँधीवाद की ओर झुका हुआ है|

केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य के वाद में उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि विधिक सम्प्रभुता भारतीय संविधान में निवास करती है न हम के लोगों में|

संविधान की प्रकृति

(Nature of Constitution)

संविधान की प्रकृति के अनुसार लिखित संविधानो को दो वर्गो में विभाजित किया जा सकता है –

  • परिसंघात्मक (federal) (2) एकात्मक (unitary)

एकात्मक संविधान – एकात्मक संविधान वह होता है जिसमें समस्त शक्तियाँ एक ही सरकार में निहित होती हैं  जो केंद्रीय सरकार होती है तथा राज्य सरकारों को केन्द्र के अधीन रहना पड़ता है|

संघात्मक संविधान – इसके अंतर्गत केंद्र एवं राज्य में शक्तियों का विभाजन होता है|

भारतीय संविधान की प्रकृति के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों के मत निम्नलिखित हैं-

प्रोफेसर के. सी. ह्वियर के अनुसार- भारतीय संविधान एक अर्द्ध–संघीय (Quasi-federal) संविधान है|

आइवर जेनिंग्स के अनुसार – भारतीय संविधान एक ऐसा संविधान है जिसमें केन्द्रीकरण की सशक्त प्रवृत्ति है|

ग्लेनविल आस्टिन जे अनुसार- भारतीय संविधान एक सहकारी परिसंघीय संविधान है|

डॉo भीमराव अम्बेडकर ने कहा है की भारतीय संविधान समय और परिस्थितियों के अनुसार एकात्मक और संघात्मक हो सकता है|

एसo आरo बोम्मई बनाम भारत संघ के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया है कि भारतीय संविधान परिसंघीय संविधान है|

संघात्मक संविधान के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित है-

  1. शक्तियों का विभाजन- संघात्मक संविधान में केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों के मध्य शक्तियों का विभाजन होता है|
  2. संविधान की सर्वोपरिता- लिखित संविधानों में सरकार के सभी अंगो का उल्लेख रहता है इसलिए परिसंघीय संविधान सर्वोच्च होता है|
  3. लिखित संविधान – संघात्मक संविधान लिखित संविधान होता है| संघ और राज्य की स्थापना एक जटिल संविदा द्वारा होती है इसलिए संविधान का लिखित होना आवश्यक है|
  4. संविधान की नम्यता एवं अनम्यता – संविधान की नम्यता और अनम्यता उसके संशोधन की प्रक्रिया पर आधारित होती है| जिस संविधान में सरलता से संशोधन किया जा सकता है उसे नम्य संविधान कहा जाता है तथा जिन संविधानों में सरलता से संशोधन नहीं हो सकता है उसे अनम्य संविधान कहते है|
  5. स्वतंत्र न्यायपालिका- परिसंघात्मक संविधान में केंद्र और राज्य सरकारें एक दूसरे के अधिकारिता में अतिक्रमण न करे इसलिए न्यायपालिका का स्वतंत्र होना अत्यन्त आवश्यक है|

एकात्मक संविधान के प्रमुख लक्षण-

  1. राज्यपालों की नियुक्ति- राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है तथा राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त राज्यपाल पद धारण करता है|                                                                             [अनुच्छेद155-156]

राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक को कुछ मामलों में राष्ट्रपति के विचार के लिए राज्यपाल सुपुर्द कर सकता है|                                                                                                                                      [अनुच्छेद 201, 288(2), 304(b)]

  1. राष्ट्रहित में कानून बनाने की संसद की शक्ति- यदि राष्ट्रहित में राज्य सभा अपने सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत द्वारा यह घोषित कर दे कि राष्ट्रहित में आवश्यक है कि राज्य सूची के विषय पर संसद कानून बनाये तो संसद राज्य सूची के विषय पर कानून बना सकती है|                                                                                                                                (अनुच्छेद 249)
  2. नये राज्यों के निर्माण, वर्तमान राज्य के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों को बदलने की संसद की शक्ति- राज्यों का अस्तित्व संसद की इच्छा पर निर्भर है| वह नये राज्यों का निर्माण कर सकती है तथा वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों तथा सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है या उनके नामों को बदल सकती है|                                                                                 (अनुच्छेद 3)
  3. एकल नागरिकता- अनुच्छेद 5 से 11 के अधीन रहते हुए नागरिकों को एकल नागरिकता प्राप्त है|
  4. अखिल भारतीय सेवायें– राष्ट्रहित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है तो राज्य सभा अपने उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो तिहाई सदस्यों द्वारा संघ या राज्यों के लिए अखिल भारतीय सेवाओ के सृजन हेतु संसद को अधिकृत कर सकती है|
  5. आपात-उपबंध- आपात की घोषणा का परिणाम यह होता है की सम्पूर्ण भारत के प्रशासन की शक्ति केंद्र में निहित हो जाती है| आपातकाल तीन प्रकार का होता है-
  • राष्ट्रीय आपात
  • राज्यों में सवैधानिक तंत्र की विफलता
  • वित्तीय आपात

संविधान निर्माता विगत कई वर्षो के अनुभवो के मद्देनजर एक दृढ एवं सशक्त केंद्रीय सरकार की स्थापना करना चाहते थे| ऐसा इसलिए था कि कही किसी व्यक्ति का उत्कर्ष राष्ट्र के उत्कर्ष में बाधक न बन जाए तथा राष्ट्र की एकता एवं अखंडता बनी रहे|

भाग 1

संघ तथा उसका राज्यक्षेत्र

(Tha Union and its Territory)

(अनुच्छेद 1 से 4)

अनुच्छेद 1- संघ का नाम और राज्यक्षेत्र

अनुच्छेद 2- नये राज्यों का प्रवेश या स्थापना

अनुच्छेद 3- नये राज्यों का निर्माण और वर्तमान राज्यों के क्षेत्रो, सीमाओं या नामों में परिवर्तन

अनुच्छेद 4- पहली अनुसूची और चौथी अनुसूची के संशोधन तथा अनुपूरक, आनुषंगिक और परिणामिक विषयों का उपबंध करने के लिए अनुच्छेद 2 और अनुच्छेद 3 के अधीन बनायी गयी विधियाँ|

अनुच्छेद 1 के अनुसार भारत अर्थात इण्डिया राज्यों का संघ होगा| भारत का राज्यक्षेत्र निम्नलिखित तीन प्रकार के राज्यक्षेत्रो से गठित होता है-

  • राज्यों के राज्यक्षेत्र
  • संघ राज्यक्षेत्र
  • ऐसे अन्य राज्यक्षेत्र जो अर्जित किये जाए|

वर्तमान में भारत के राज्यक्षेत्र में निम्नलिखित दो श्रेणियों के राज्य सम्मिलित है –

  • राज्य
  • संघ राज्यक्षेत्र
  • भारत में वर्तमान में कुल 29 राज्य तथा 7 संघ राज्यक्षेत्र है|
  • अभी हाल ही में भारत सरकार ने आन्ध्र प्रदेश का विभाजन करके “तेलंगाना” राज्य के गठन करने का निर्णय लिया है जो भारत का 29वां राज्य होगा|

भारतीय संविधान के अंतर्गत संघीय व्यवस्था को अपनाया गया है| संघ (Union) से राज्य स्थायी रूप से जुड़े होते है|  इस व्यस्था में केंद्र राज्यों की उपेक्षा सशक्त होता है| जबकि परिसंघीय (federal) व्यवस्था में राज्य एक समझौते के अंतर्गत संघ से जुड़े होते हैं तथा राज्य संघ की अपेक्षा अधिक सशक्त होते हैं|

संविधान की प्रथम अनुसूची में राज्यक्षेत्रो का नाम तथा उनके अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों का विवरण दिया गया है|

  • भाषाई आधार पर गठित प्रथम राज्य आंध्रप्रदेश है जिसका गठन 1953 में आंध्रप्रदेश अधिनियम के द्वारा किया गया |
  • 1956 में 7वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया गया तथा राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर किया गया|
  • राज्य पुनर्गठन आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति सैयद फजल अली थे एवं हृदयनाथ कुंजरू और के. एम. पणिक्कर सदस्य थे |
  • राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्रो की सूची
  • 69वें संविधान संशोधन अधिनियम,1991 द्वारा दिल्ली को “राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली” के नाम से संघ शासित राज्य बनाया है|
  • केंद्र सरकार ने आंध्रप्रदेश का विभाजन करके “तेलंगाना” नामक राज्य के गठन की घोषण की है| इसे मिलाकर अब कुल 29 राज्य हो जायेंगे|
  • अनुच्छेद 2 नये राज्यों के प्रवेश तथा स्थापना से संबंधित है| अनुच्छेद 2 के अनुसार संसद विधि द्वारा, ऐसे निबंधनो और शर्तो पर जो वह ठीक समझे, भारत संघ में नये राज्यों का प्रवेश या उनकी या उनकी स्थापना कर सकेगी|
  • 1974-75 में सिक्किम को भारत-संघ में नये राज्य क रूप में जोड़ा गया|

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के अनुसार संसद विधि द्वारा–

  • किसी राज्य में से उसका राज्यक्षेत्र अलग करके अथवा दो या अधिक राज्यों को या राज्यों के भागों को मिलाकर अथवा किसी राज्यक्षेत्र को किसी राज्य के भाग के साथ मिलाकर नये राज्य का निर्माण कर सकेगी|
  • किसी राज्य का क्षेत्र बढ़ा सकेगी|
  • किसी राज्य का क्षेत्र घटा सकेगी|
  • किसी राज्य की सीमाओं में परिवर्तन कर सकेगी|
  • किसी राज्य के नाम में परिवर्तन कर सकेगी|

संविधान के अंतर्गत संसद राज्यों की सीमाओं तथा क्षेत्रों में उनकी सम्मति के बिना परिवर्तन कर सकती है| संसद द्वारा नये राज्यों का गठन साधारण बहुमत से विधि बना कर किया जा सकता है और वर्तमान राज्यों के सीमाओं तथा क्षेत्रों अथवा नामों में परिवर्तन किया जा सकता है| किन्तु ऐसी विधि के निर्माण के लिए निम्नलिखित पूर्व शर्तें हैं-

  • किसी नये राज्य के गठन या वर्तमान राज्यों की सीमाओं या नामों में परिवर्तन के लिए कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना नहीं प्रस्तुत किया जाएगा|
  • यदि विधेयक के द्वारा किसी राज्य के क्षेत्र सीमा या नाम में परिवर्तन का प्रस्ताव अंतर्विष्ट है तो उसे राष्ट्रपति सम्बन्धित राज्य विधान मण्डल के पास उसके राय के लिए भेजेगा|
  • राष्ट्रपति द्वारा विधेयक जिस राज्य के पास राय के लिए भेजा जाता है वह विधेयक को राष्ट्रपति द्वारा नियत अवधि के भीतर अपनी राय सहित वापस कर देगा| यदि राज्य के द्वारा ऐसा नहीं किया जाता है तो राष्ट्रपति को दो विकल्प प्राप्त है-
  • राष्ट्रपति उक्त अवधि को बढ़ा सकता है, अथवा
  • विधेयक को संसद के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है|
  • राज्य विधान मण्डल की राय से राष्ट्रपति बाध्य नहीं है|

अनुच्छेद 4 के अनुसार अनुच्छेद 2 एवं 3 के अंतर्गत नये राज्यों का गठन या विद्यमान राज्यों के नामों, क्षेत्रों अथवा सीमाओं में परिवर्तन के लिए यदि कोई विधि बनाई जाती है तो वह अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए संविधान का संशोधन नहीं मानी जायेगी|

  • इन री बेरुवारी यूनियन, ए.आई.आर. 1960 एस. सी. 845 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि भारत का कोई राज्यक्षेत्र किसी अन्य राष्ट्र को अंतरित करने के लिए संविधान का संशोधन करना आवश्यक है|

भाग 2

नागरिकता (Citizenship)

(अनुच्छेद 5 से 11)

अनुच्छेद 5- संविधान के प्रारंभ पर नागरिकता

अनुच्छेद 6- पाकिस्तान से भारत को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार|

अनुच्छेद 7- पाकिस्तान को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार|

अनुच्छेद 8- भारत के बाहर रहने वाले भारतीय उद्भव के कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार|

अनुच्छेद 9- विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित करने वाले व्यक्तियों का नागरिक न होना|

अनुच्छेद 10- नागरिकता के अधिकारों का बना रहना

अनुच्छेद 11- संसद द्वारा नागरिकता के अधिकार का विधि द्वारा विनियमन किया जाना है| भारतीय संविधान में ‘नागरिकता’ शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है| एक नागरिक को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में समझा जा सकता है जो सरकार के प्रति निष्ठा रखता है तथा जो सरकार द्वारा सुरक्षा का हकदार है|

राज्य के नागरिक को सभी सिविल एवं राजनैतिक अधिकार प्राप्त होते हैं| संविधान द्वारा नागरिकों को कुछ अधिकार प्रदान किये गये हैं जो विदेशियों को नहीं प्राप्त हैं|

उदाहरणार्थ अनुच्छेदों 15, 16, 19, 29, 30 इत्यादि के अंतर्गत मूल अधिकार केवल नागरिकों को प्राप्त है| राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, महान्यायवादी तथा महाधिवक्ता आदि संवैधानिक पद पर केवल नागरिकों की नियुक्ति हो सकती है| संसद तथा राज्य विधान मंडलों का चुनाव केवल नागरिक लड़ सकते हैं तथा अनुच्छेद 326 के अंतर्गत मताधिकार केवल नागरिकों को प्राप्त है|

भारत का संविधान ‘एकता नागरिकता’ अर्थात भारत की नागरिकता प्रदान करता है| भारत का संविधान अमेरिका के संविधान के समान दोहरी नागरिकता को मान्यता नहीं देता है|

भारत का संविधान के प्रारंभ पर नागरिकता के सम्बन्ध में प्रावधान करता है| संविधान का अनुच्छेद 11 संसद ने इस शक्ति का प्रयोग करते हुए संविधान के प्रारम्भ के पश्चात नागरिकता की प्राप्ति तथा समाप्ति के बारे में प्रावधान करता है|

अनुच्छेद 5- संविधान के प्रारम्भ पर नागरिकता के बारे में उपबन्ध करता है| अनुच्छेद 5 के अंतर्गत नागरिकता का दावा करने वाला व्यक्ति भारत के राज्य क्षेत्र का अधिवासी होना चाहिए तथा उसे निम्नलिखित में से किसी शर्त को पूरा करना चाहिए|

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मूल अधिकार (अनुच्छेद 12 से 35)

Fundamental Rights

 

मौलिक अधिकारों से सम्बन्धित प्रावधान भारतीय संविधान के भाग तीन में किया गया है|

भाग-3 में अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35 तक विभिन्न मूल अधिकारों को प्रत्याभूत (Gauranteed) किया गया है|

मूल अधिकार को भारतीय संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है| गोलकथान बनाम पंजाब राज्य, 1967 के मामले में न्यायमूर्ति सुब्बाराव ने मूल अधिकारों को नैसर्गिक तथा अप्रतिदेय अधिकार माना है| न्यायमूर्ति बेग के अनुसार मूल अधिकार स्वयं संविधान में समाविष्ट अधिकार है|

  • मूल अधिकार एवं साधारण अधिकारों में अंतर

मूल अधिकार साधारण अधिकारों से भिन्न होते हैं| साधारण अधिकार विधियों द्वारा प्रदत्त किये गये हैं जबकि मूल अधिकार संविधान द्वारा प्रत्याभूत किये गये हैं|

साधारण अधिकार साधारण विधियों द्वारा संक्षिप्त (abridged) कम (curtail) या रद्द (Abrogate) किये जा सकते हैं किन्तु मूल अधिकार तब तक संक्षिप्त कम या रद्द नहीं किये जा सकते हैं जब तक कि स्वयं संविधान द्वारा या संविधान संशोधन द्वारा अनुज्ञात न हो|

साधारण अधिकारों का अधित्याग (Waiver) किया जा सकता है जबकि मूल अधिकारों का अधित्याग नहीं किया जा सकता है|

साधारण अधिकारों के अतिलंघन (Infringement) होने पर साधारण विधियों के अंतर्गत उपचार की मांग की जाती है जबकि मूल अधिकारों का अतिलंघन होने पर अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय तथा अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय में उपचार के लिए समुचित रिट जारी करने की मांग की जाती है|

संविधान के भाग तीन में 6 मूल अधिकार प्रदान किये गये हैं|    

  • 44वें संविधान संशोधन के पूर्व 7 मूल अधिकार थे किन्तु उक्त संशोधन द्वारा सम्पत्ति का अधिकार निरसित (समाप्त) कर दिया गया|

सम्पत्ति का अधिकार अब अनुच्छेद 300-A के अंतर्गत संवैधानिक अधिकार (Constitutional Right) है न कि मूल अधिकार|

मूल अधिकार की प्राप्ति – भाग-3 में प्रत्याभूत मूल अधिकार सभी व्यक्तियों को प्राप्त नहीं है| इनमें से कुछ केवल नागरिकों को प्राप्त हैं तथा कुछ नागरिकों तथा गैर नागरिकों दोनों को प्राप्त है|

केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त मूल अधिकार – अनुच्छेद 15, 16, 19, 29, 30 के अंतर्गत प्रत्याभूत अधिकार है|

भारत के नागरिकों तथा गैर नागरिकों (विदेशियों) दोनों को प्राप्त मूल अधिकार- अनुच्छेद 14, 20, 21, 23, 25, 27, 28 के अंतर्गत प्रत्याभूत अधिकार,

नकारात्मक अभिव्यक्ति वाले मूल अधिकार- अनुच्छेद 14, 15(1), 16(2), 18(1), 20, 22(1) तथा 28(1) के अंतर्गत आने वाले मूल अधिकार इस श्रेणी में आते हैं|

सकारात्मक अभिव्यक्ति वाले मूल अधिकार- अनुच्छेद 29(1), 30(1), के अंतर्गत आने वाले मूल अधिकार इस श्रेणी में आते हैं|

केवल राज्य के विरुद्ध प्राप्त मूल अधिकार- अनुच्छेद 14, 15(1), 16, 18(1), 19, 20, 21, 22, 25, 26, 27, 28, 29, 30 के अंतर्गत प्रत्याभूत मूल अधिकार|

राज्य के साथ ही साथ निजी व्यक्तियों के विरुद्ध प्राप्त मूल अधिकार- अनुच्छेद 15(2), 17, 23(1), तथा 24 के अंतर्गत प्रत्याभूत आने वाले मूल अधिकार इस श्रेणी में आते हैं|

अनुच्छेद 12 मूल अधिकारों के प्रयोजन के लिए राज्य को परिभाषित करती है|

अनुच्छेद 12 में राज्य के अंतर्गत निम्नलिखित आते हैं-

  • भारत सरकार और संसद
  • राज्य सरकार और विधान मंडल
  • सभी स्थानीय प्राधिकारी, तथा
  • अन्य प्राधिकारी     

अभिव्यक्ति (Expression) अन्य प्राधिकारी विस्तृत अर्थ रखती है इसलिए इसका विनिश्चय करने में कुछ कठिनाइयाँ आईं|

अन्य प्राधिकारी पद के अंतर्गत वे सभी प्राधिकारी आते हैं जो संविधान या किसी परिनियम द्वारा स्थापित किये जाते हैं जिन्हें विधियाँ तथा उपविधियां बनाने का अधिकार प्राप्त है|

  • उच्चतम न्यायालय ने समय-समय पर अपने विभिन्न विनिश्चयों में निम्नलिखित को राज्य माना है-
  1. विश्वविद्यालय – उमेश बनाम बी. एन. सिंह, ए. आई. आर. 1968 पटना 3
  2. इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड – इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड, राजस्थान बनाम मदन लाल, ए. आई. आर. 1967 एस. सी. 2857
  3. नगरपालिका-
  4. देवासन बोर्ड – नम्बूदरीपाद बनाम ट्रावनकोर कोचीन ए. आई. आर. 1956 ट्रा. को. 19
  5. को-आपरेटिव सोसाइटियां – दुखराम बनाम को-आपरेटिव एग्रीकल्चर एसोसियेशन, ए. आई. आर. 1961 मध्य भारत 289
  6. उच्च न्यायलय का मुख्य न्यायाधीश (जब न्यायालय के अधिकारियों की नियुक्ति करता है) – परमात्माशरन बनाम चीफ जस्टिस, ए. आई. आर. 1961 एस. सी. 13
  7. राष्ट्रपति, जब वह अनुच्छेद 359 के अंतर्गत आदेश जारी करता है – हारू भाई बनाम स्टेट ऑफ़ गुजरात, ए. आई. आर. 1967 गुजरात 229
  8. सेन्ट्रल इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट कोर्पोरेशन लिमिटेड – सेन्ट्रल इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन लि. बनाम ब्रेजोनाथ गांगुली, ए. आई. आर. 1986 एस. सी.
  9. एन. सी. ई. आर. टी. – चन्द्र मोहन खन्ना बनाम एन. सी. ई. आर. टी., ए. आई. आर. 1992 एस. सी. 76
  10. ओ. एन. जी. सी. – सुखदेव सिंह बनाम भगत राम, ए. आई. आर. 1975 एस. सी. 1331
  11. भारतीय जीवन बीमा निगम – सुखदेव सिंह बनाम भगत राम
  12. इंडस्ट्रियल फाइनेंस कोर्पोरेशन – सुखदेव सिंह बनाम भगत राम
  13. रोड ट्रांसपोर्ट कोर्पोरेशन – मफतलाल बनाम रोड ट्रांसपोर्ट कोर्पोरेशन, ए. आई. आर. 1966 एस. सी. 1364
  14. स्टेट वेयर हाउसिंग कोर्पोरेशन – एस. बी. रामन बनाम स्टेट वेयर हाउसिंग कोर्पोरेशन, ए. आई. आर. 1971 मद्रास 431
  15. स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया – स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया बनाम कलपका ट्रांसपोर्ट, ए. आई. आर. 1979 बाम्बे 250
  16. दामोदर वैली कोर्पोरेशन – ए. एन. मोंडल बनाम डी. वी. सी., 1974 लैब आई. सी. 821
  17. इंटरनेशनल एयरपोर्ट अथारिटी – रमन दयाराम सेठी बनाम इंटरनेशनल एयरपोर्ट अथारिटी ऑफ़ इण्डिया ए. आई. आर. 1979 एस. सी. 1628
  18. भारतीय कृषिशोध परिषद् – एम. ए. इलियास बनाम आई. सी. ए. आर. 1993
  19. भारत संचार निगम – तरसीम सिंह बनाम भारत संचार निगम लि. ए. आई. आर. 2004 पंजाब एंड हरियाणा
  20. कर्मचारी कल्याण निगम – बी. के. श्रीवास्तव बनाम उ. प्र. कर्मचारी कल्याण निगम, ए. आई. आर. 2005 एस. सी. 411
  21. पब्लिक चैरिटेबुल ट्रस्ट राज्य नहीं है – मनदीप मिश्र बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 2009 कलकत्ता 31
  22. दिल्ली स्टाक एक्सचेंज राज्य नहीं हैं-

भारतीय संविधान में 6 प्रकार के मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया है जो निम्नलिखित है:-

  • समता का अधिकार (Right to Equality) (अनुच्छेद 14 से 18)
  • स्वतन्त्रता का अधिकार (Right to Freedom) (अनुच्छेद 19 से 22)
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right against Expliotation) (अनुच्छेद 23 और 24)
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom of Religion) (अनुच्छेद 25 से 28)
  • संस्कृत एवं शिक्षा का अधिकार (Cultural and Educational Rights) (अनुच्छेद 29 से 30)
  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies)
  • मूल अधिकारों को सर्वप्रथम संवैधानिक दर्जा अमेरिका ने दिया|
  • भारतीय संविधान में मूल अधिकार अमेरिका के संविधान से लिये गये हैं|

मूल अधिकारों के प्रवर्तन की शक्ति – जहाँ एक तरफ संविधान के भाग तीन में मूल अधिकारों की गारंटी दी गई है वहीं दूसरी तरफ उनके अतिलंघन (Ifringement) होने पर अनुच्छेद 32 के अंतर्गत समुचित कार्यवाहियों द्वारा मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्चतम में अभ्यावेदन करने का अधिकार प्राप्त है| उच्च न्यायालयों को भी अनुच्छेद 226 के अंतर्गत मूल अधिकारों के प्रवर्तन की शक्ति प्रदान की गई है|

अनुच्छेद 13 मूल अधिकार राज्य के विरुद्ध नागरिकों को मूल अधिकारों के संरक्षण की गारंटी देते है| यदि राज्य कोई ऐसा विधि बनाता है जो मूल अधिकारों का उल्लंघन करती है तो न्यायालय उसको शून्य घोषित कर सकती है| यह कार्य न्यायालय न्यायिक पुनर्विलोकन के द्वारा करता है जो अनुच्छेद 13 से न्यायालयों को प्राप्त होती है| इसीलिए अनुच्छेद 13 को मूल अधिकारों का प्रहरी कहा जाता है|

अनुच्छेद 13 विधायिका द्वारा बनाई गयी विधि के न्यायिक पुनर्विलोकन का प्रावधान करता है| इसके द्वारा न्यायालय संविधियों की संवैधानिकता की जांच करता है| संविधान के प्रावधानों से असंगत है| अनुच्छेद 13 के तीन उपखंड दिये गये हैं जो है अनुच्छेद 13(1), 13(2), 13(3) है|

अनुच्छेद 13(1) के अनुसार, इस संविधान के लागू होने के तत्काल पहले भारत राज्यक्षेत्र में प्रचलित सभी विधियाँ उस मात्रा तक शून्य होगी जिस तक वे इस भाग के उपबन्धों से अपंगत है|

अर्थात सभी संविधानपूर्व विधियाँ जो मूल अधिकारों से असंगत है, असंगतता की सीमा तक शून्य होगी|

आच्छादन या ग्रहण का सिद्धांत (Doctrine of Eclipse)- अनुच्छेद 13 (1) – यह सिद्धांत अनुच्छेद 13 (1) पर आधारित है| संविधान के प्रवर्तन के साथ ही संविधान पूर्व प्रवृत्त ऐसी विधियाँ जो मूल अधिकारों से असंगत है, मूल अधिकारों से असंगति की सीमा तक शून्य होगी ये विधियाँ प्रारम्भ से शून्य नहीं होती बल्कि मूल अधिकारों द्वारा आच्छादित होने के कारण प्रस्तुत हो जाती है वे मृत नहीं होती है| यदि संशोधन के द्वारा ऐसी विधि को असंवैधानिक बनाने वाली असंगतता दूर कर दी जाय तो वह विधि पुनर्जीवित हो जायेगी क्योंकि मूल अधिकारों की छाया (आच्छादन) समाप्त हो जाएगी| इसे ही आच्छादन का सिद्धांत कहते हैं|

  • भीकाजी बनाम मध्य प्रदेश राज्य, ए. आई. आर. 1955 एस. सी. 781 के वाद में आच्छादन का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया|

प्रथक्करणीयता का सिद्धांत (Doctrine of Severability) – अनुच्छेद 13 (2) – पृथक्करणीयता का सिद्धांत अनुच्छेद 13(2) पर आधारित है| अनुच्छेद 13(2) के अनुसार राज्य कोई ऐसी विधि नहीं बनायेगा जो इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनती या न्यून करती है और इस खण्ड के उल्लंघन में बनायी गयी प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक शून्य होगी| अर्थात मूल अधिकारों का उल्लंघन करने वाली विधियां उल्लंघन करने वाली विधियाँ उल्लंघन की मात्रा तक शून्य होगी, सम्पूर्णत: शून्य नहीं होगी वरन उसका केवल वह अंश शून्य होगा जो मूल अधिकार से असंगत है| यदि विधि का शून्य भाग शेष भाग से अधिनियम के मूल उद्देश्य को प्रभावित किये बिना पृथक किया जा सकता हो तो विधि का शेष अंश प्रवर्तन में बना रहेगा अर्थात केवल असंगत भाग शून्य होगा शेष वैध बना रहेगा|

  • बंबई राज्य बनाम बलसारा, ए. आई. आर 1951 एस. सी. 318, के मामले में बम्बई प्रांत मघ निषेध अधिनियम, 1949 के कुछ उपबन्धों को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया किन्तु शेष अधिनियम वैध बना रहा|

अनुच्छेद 13(3) के अनुसार – ‘विधि’ शब्द के अंतर्गत कोई अध्यादेश, आदेश, उपविधि, नियम, अधिसूचना, रूढ़ियाँ तथा प्रथाएं सम्मिलित हैं|

  • गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य के मामले के उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन को भी विधि की परिभाषा में सम्मिलित माना|

गोलकनाथ के मामले में दिए गये निर्णय का परिणाम यह हुआ कि राज्य संविधान संशोधन द्वारा मूल अधिकारों को कम नहीं कर सकती थी|

उक्त निर्णय के प्रभाव को दूर करने के लिए 24वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया गया तथा अनुच्छेद 13 में खण्ड (4) जोड़कर यह उपबंधित किया गया कि इस अनुच्छेद की कोई बात अनुच्छेद 368 के अंतर्गत किये गये संविधान संशोधन को लागू नहीं होगी| अर्थात संशोधन भी अनुच्छेद 13 में प्रयुक्त ‘विधि’ शब्द के अर्थान्तर्गत विधि है अत: यदि वह मूल अधिकारों को छीनता या न्यून करता है तो शून्य होगा|

  • केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य, ए. आई. आर. 1973 एस. सी. 1461 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने गोलकनाथ मामले में दिए गये अपने विनिश्चय को उलट दिया तथा 24वें संविधान संशोधन अधिनियम को वैध घोषित किया|

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संसद को मूल अधिकारों सहित संविधान में संशोधन करने की शक्ति है किन्तु वह शक्ति असीमित नहीं है उससे संविधान का मूलभूत ढांचा नष्ट नहीं होना चाहिए|

केशवानन्द भारती के निर्णय के पश्चात संसद ने 42वां संविधान संशोधन पारित किया तथा उपबंधित किया कि संसद की संशोधन शक्ति असीमित एवं अनिर्बन्धित है और संविधान के किसी संशोधन की विधिमान्य को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है|

  • मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 1980 एस. सी. 1789 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने 42वें संविधान द्वारा अनुच्छेद 368 में जोड़े गये खण्ड (4) एवं (5) को असंवैधानिक घोषित कर दिया|

अधित्याग का सिद्धांत (Doctrine of Waiver)- सर्वप्रथम बेहराम खुर्शीद बनाम बाम्बे राज्य, ए. आई. आर. 1955 एस. सी. 146 के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से अपने मूल अधिकार का अधित्याग नहीं कर सकता है| संविधान में मूल अधिकारों को केवल व्यक्ति विशेष के लाभ के लिए नहीं बल्कि सार्वजनिक लाभ के लिए लोकनीति के आधार पर समाविष्ट किया गया है| अत: इसका अधित्याग नहीं किया जा सकता है|

  • विशेषरनाथ बनाम इन्कम टैक्स कमिश्नर के मामले में भी उच्चतम न्यायालय ने अपने उपर्युक्त मामले में दिये गये निर्णय को पुष्ट किया|

संविधान के अंतर्गत निम्नलिखित 6 मूल अधिकार प्रदान किये गये हैं-

  • समता का अधिकार (Right to Equality) (अनुच्छेद 14 से 18)
  • स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom) (अनुच्छेद 19 से 22)
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right against Exploitation) (अनुच्छेद 23 से 24)
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Freedom of Religion) (अनुच्छेद 25 से 28)
  • संस्कृति एवं शिक्षा का अधिकार (Cultural and Educational Rights) (अनुच्छेद 29 से 30)
  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies) (अनुच्छेद 32 से 35)
  • समता का अधिकार (Right to Equality) (अनुच्छेद 14-18)

समता का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 में उपबंधित किया गया है प्रत्येक व्यक्ति को प्राप्त है|

अनुच्छेद 14 के अनुसार “राज्य” भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा|

अनुच्छेद 14 में प्रयुक्त पदावलियां “विधि के समक्ष समता” एवं “विधियों का समान संरक्षण” क्रमश: ब्रिटिश तथा अमेरिका के संविधानों से ली गयी है|

इन दोनों पदावलियों में विधि के शासन तथा समान न्याया की अवधारणाएं अंतर्निहित है|

विधि के समक्ष समता (Equality before Law) की अवधारणा निषेधात्मक है तथा यह सुनिश्चित करती है कि विधि के समक्ष सभी है तथा कोई भी व्यक्ति विधि से ऊपर नहीं है| यह किसी व्यक्ति के पक्ष में किसी विशेषधिकार का अभाव अंतर्निहित करती है| सभी व्यक्ति समान रूप से देश की साधारण विधि के अधीन हैं, और कोई भी व्यक्ति, चाहे उसका जो भी पद या सामाजिक स्थिति हो, विधि के ऊपर नहीं है| किन्तु यह आत्यन्तिक नियम नहीं है इसके अनेक अपवाद हैं|

  • यह डायसी के “विधि का शासन” सिद्धांत के दूसरे अर्थ के समान है|

विधियों का समान संरक्षण (Equal Protection of Law) का तात्पर्य है कि “समान लोगों में विधि समान रूप से प्रशासित की जायेगी अर्थात समान लोगों के साथ समान व्यवहार किया जायेगा|

अर्थात विधि द्वारा प्रदत्त विशेषाधिकारों तथा अधिरोपित कर्तव्यों (दायित्वों) के सम्बन्ध में समान परिस्थितियों में समान व्यवहार किया जाना चाहिए|

  • यह एक सकारात्मक अवधारणा है|

अनुच्छेद 14 में समता के सामान्य नियम प्रावधानित है तथा अनुच्छेद 15, 16, 17, 18 उक्त सामान्य नियम के विशिष्ट उदाहरण है| अर्थात यदि अनुच्छेद 15, 16, 17 एवं 18 का उल्लंघन किया जाता है तो उससे अनुच्छेद 14 का भी उल्लंघन स्वयमेव होगा|

  • अनुच्छेद 14 सभी व्यक्तियों पर समान रूप से लागू होता है चाहे वह नागरिक हो या अनागरिक प्राकृतिक व्यक्ति या कृत्रिम व्यक्ति जैसे निगम|
  • अनुच्छेद 14 के प्रावधान संविधान का आधारभूत ढांचा है इन्हें संशोधन द्वारा नष्ट नहीं किया जा सकता है|
  • अनुच्छेद 14 में नैसर्गिक न्याय (Natural Justice) का सिद्धांत अंतर्निहित है|
  • मूल अधिकार आत्यन्तिक अधिकार (Absolute Right) नहीं है इनके ऊपर लोकहित में युक्तियुक्त निर्बन्धन (Reasonable Restriction) लगाये जा सकते हैं|

समता के नियम निरपेक्ष तथा अपवाद रहित नहीं हैं| जैसे विदेश कूटनीतिज्ञ न्यायालयों की अधिकारिता से मुक्त है| अनुच्छेद 361 के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति तथा राज्यों के राज्यपालों को उन्मुक्ति प्राप्त है तथा लोक प्राधिकारी तथा न्यायालयों के न्यायाधीश को भी विशेष उन्मुक्तियाँ प्राप्त हैं|

  • अनुच्छेद 14 वर्गीकरण की अनुमति देता है, किन्तु वर्गविधान का निषेध करता है|
  • उच्चतम न्यायालय ने अपने अनेक निर्णयों में यह माना है कि राज्य को सामाजिक व्यवस्था को समुचित ढंग से चलाने के लिए अनुच्छेद 14 के अंतर्गत वर्गीकरण की शक्ति है|
  • अनुच्छेद 14 तब लागू होता है जब समान परिस्थिति वाले व्यक्तियों के साथ आसमान व्यवहार किया जाता है यद्यपि इसके लिए युक्तियुक्त आधार नहीं है|

अनुच्छेद 14 वर्गीकरण की अनुमति देता है वर्गीकरण युक्तियुक्त (Reasonable) होना चाहिए मनमाना नहीं अन्यथा वर्गीकरण असंवैधानिक होगा|

  • काठी रेनिंग बनाम स्टेट ऑफ़ सौराष्ट्र, ए. आई. आर. 1952 एस. सी. 123 (136) के मामले में वर्गीकरण को युक्तियुक्त के लिए उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित दो शर्तों का पूरा होना आवश्यक माना –
  • वर्गीकरण एक बोधगम्य अन्तरक (intelligible differentia) पर आधारित होना चाहिए जो एक वर्ग में शामिल किये गये व्यक्तियों तथा वस्तुओं तथा उसके बाहर रखे गये व्यक्तियों तथा वस्तुओं में विभेद करता हो|
  • अन्तरक और उस उद्देश्य में तर्कसंगत सम्बन्ध हो|
  • ई. पी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य, ए. आई. आर. 1974 एस. सी. 597 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने युक्तियुक्त वर्गीकरण पर आधारित समता की पारम्परिक अवधारणा को अस्वीकृत करते हुए एक नवीन दृष्टिकोण अपनाया न्यायमूर्ति श्री भगवती ने स्म्प्रेक्षित किया कि-

समता एक गतिशीलता अवधारणा है जिसके अनेक रूप एवं आयाम हैं और इसको परम्परागत एवं सिद्धांतवाद की सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता है| वस्तुत: समानता और मनमानापन एक दूसरे के कट्टर शत्रु हैं| जहाँ कोई कार्य मनमाना होता है, वहाँ असमानता आवश्यक रूप से होगी था अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा|

  • मिट्ठू सिंह बनाम पंजाब राज्य, ए. आई. आर. 1983 एस. सी. 473 के मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 302 को न्यायालय ने इस आधार पर असंवैधानिक घोषित कर दिया गया कि मृत्यु दंड देने के मामले में दो प्रकार के अपराधियों के मध्य किया गया वर्गीकरण मनमाना हैं क्योंकि यह किसी तर्कसंगत सिद्धांत पर आधारित नहीं है|
  • रणधीर सिंह बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 1982 एस. सी. 879 में न्यायालय ने धारित किया कि “समान कार्य के लिए समान वेतन” यद्यपि एक मूल अधिकार नहीं है किन्तु अनुच्छेद 14, 16 तथा 39 ग के अधीन निश्चित रूप से एक संवैधानिक लक्ष्य है तथा बिना किसी द्खोस आधार के दो व्यक्तियों के मध्य विभेद अनुच्छेद 14 का अतिक्रमण है|
  • जान वालामटोम बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 2003 एस. सी. 2902 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह धारित किया कि उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 118 विभेदकारी है एवं अनुच्छेद 14 का अतिक्रमण करती है|
  • सरोज रानी बनाम सुदर्शन चड्ढा, (1984) 4 एस. सी. सी. 90 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 संवैधानिक है तथा धारा 14 उल्लंघन नहीं करती है| यह धारा पक्षकारों को दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन का अधिकार प्रदान करती है, पक्षकारों को मनमाना करने की शक्ति नहीं देती है|
  • जावेद बनाम हरियाणा राज्य, ए. आई. आर. 2003 एस. सी. 3057 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि हरियाणा राज्य के द्वारा पंचायत राज अधिनियम में यह उपबन्ध किया जाना कि दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्ति सरपंच या उपसरपंच का चुनाव नहीं लड़ सकते हैं, वैध है क्योंकि इससे परिवार नियोजन को बढ़ावा मिलता है|
  • एयर इंडिया बनाम नरगिस मिर्जा, ए. आई. आर. 1981 एस. सी. 1829 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने एयर इण्डिया तथा इण्डियन एयर लाइंस द्वारा विमान परिचारिकाओं की सेवा शर्तें विनियमित करने वाले नियमों को अयुक्तियुक्त, विभेदकारी एवं अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करने वाला मानते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया|
  • डी. एस. नकारा बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 1983 एस. सी. 130 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने सेन्ट्रल सर्विसेज (पेंशन) रूल्स, 1972 को उच्चतम न्यायालय ने इस आधार पर अविधिमान्य ठहराया कि उसके द्वारा एक निश्चित तिथि के पूर्व सेवा निवृत्त होने वाले तथा उसके पश्चात सेवा निवृत्त होने वाले पेंशन भोगियों के मध्य किया गया वर्गीकरण मनमाना एवं अयुक्तियुक्त है|
  • इन री स्पेशल कोर्ट विल, ए. आई. आर. 1979 एस. सी. 478 के मामले में न्यायालय ने धारित किया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 246 के अंतर्गत संसद को विशेष न्यायालयों की स्थापना की शक्ति प्राप्त है| यह प्रावधान अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करता है|
  • चिरंजीत लाल बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 1951 एस. सी. 41 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि एक व्यक्ति भी वर्ग माना जा सकता है, तथा युक्तियुक्त वर्गीकरण करने वाला अधिनियम केवल इस आधार पर अवैध नहीं होगा कि जिस वर्ग को वह लागू होता है, उसके अंतर्गत केवल एक व्यक्ति ही आता है| यदि वह किन्हीं विशेष परिस्थितियों के कारण एक व्यक्ति को लागू होता है दूसरे व्यक्तियों को नहीं लागू होता है तो उस एक व्यक्ति को ही वर्ग माना जा सकता है|
  • ए. के. क्रेपक बनाम भारत संघ के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि नैसर्गिक न्याय के उद्देश्यों के लिए अर्द्धन्यायिक एवं प्रशासनिक कार्यों में कोई भेद नहीं है| दोनों का उद्देश्य न्याय करना है तथा उन दोंनों कार्यों में नैसर्गिक न्याय का सिद्धांत लागू होगा|

प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता कार्यकुशलता, उपलब्धियों चरित्र तथा व्यक्तिव में भिन्न होते हैं| पद तथा स्थान की अपेक्षाओं में भी भिन्नता होती है| अत: पूर्ण समानता न तो सम्भव है और न ही वांछनीय है|

युक्तियुक्त वर्गीकरण उपरोक्त कारणों से ही आवश्यक है| युक्तियुक्त वर्गीकरण समानता का उल्लंघन नहीं करता है| समानता का तात्पर्य व्यवहार में समरूपता नहीं है|

वर्गीकरण की युक्तियुक्तता के लिए यह आवश्यक है कि वह निरंकुश, अतार्किक एवं काल्पनिक न हो| वर्गीकरण के निम्नलिखित आधार हो सकते हैं-

  • भाषा तथा संस्कृति
  • वृत्तिक आधार
  • भौगोलिक आधार
  • आयु तथा लिंग
  • अन्य सुसंगत बातें

वर्ग विधान एक अतार्किक एवं निरंकुश भेदभाव (discrimination) है अत: अनुच्छेद 14 वर्ग विधान का निषेध करता है| वर्ग विधान समता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है अत: निरंकुश है तथा अनुच्छेद 14 के विरुद्ध है|

  • डेनियल लतीफी बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 2002 एस. सी. 3958 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 एवं 4, जिसमें इद्दत के पश्चात भी भरण-पोषण प्राप्त करने का हक़ प्रदान किया गया है, को विधिमान्य घोषित किया गया तथा धार्मिक किया गया कि यह धारा अनुच्छेद 14 के अंतर्गत विभेदकारी नहीं है|
  • रेवाथी बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 1988 एस. सी. 835 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 198(2) तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को संवैधानिक घोषित किया तथा कहा कि ये धारायें लैंगिक आधार पर भेद-भाव नहीं करती हैं|
  • अनुच्छेद 14 में दिये गये समता के नियम के निम्नलिखित अपवाद है –
  • अनुच्छेद 31(सी) (2) अनुच्छेद 359
  • नवीं अनुसूची
  • अनुच्छेद 361 के अंतर्गत राष्ट्रपति तथा राज्यपालों को प्राप्त विशेषाधिकार
  • अन्तर्राष्ट्रीय विधि के नियमों के अंतर्गत आपवादित व्यक्ति

धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध

(Prohibition of discrimination on grounds of religion, race, caste, sex

or place of birth) (अनुच्छेद 15)

 

अनुच्छेद 15(1) के अनुसार राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग ज्न्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा|

अनुच्छेद 15(2) के अनुसार कोई नागरिक केवल, धर्म मूलवंश जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर-

  • दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश, या
  • पूर्ण या आंशिक रूप से राज्य निधि से पोषित या साधारण जनता के प्रयोग के लिए समर्पित कुओं, तालाबो, स्नानघाटों, सड़कों और सार्वजनिक समागम के स्थानों के उपयोग के सम्बन्ध में किसी भी निर्योग्यता, दायित्व, निर्बन्धन या शर्त के अधीन नहीं होगा|
  • अनुच्छेद 15 एवं 15(2) के निम्नलिखित अपवाद, अनुच्छेद 15(3), 15(4), 15(5) में दिए गये हैं जो निम्नलिखित हैं – (1) अनुच्छेद 15(1) तथा 15(2) में दिये गये सामान्य नियम का प्रथम अपवाद अनुच्छेद 15(3) में दिया गया है जो इस प्रकार है- “इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को स्त्रियों तथा बालकों के लिए कोई विशेष उपबन्ध करने से निवारित नहीं करेगी| अर्थात राज्यस्त्रियों तथा बालकों के सम्बन्ध में विशेष उपबन्ध कर सकता है|
  • अनुच्छेद 15(1) एवं 15(2) के सामान्य नियम का दूसरा अपवाद अनुच्छेद 15(4) प्रस्तुत करता है|
  • अनुच्छेद 15(4) संविधान के प्रथम संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा संविधान में जोड़ा गया|
  • मद्रास राज्य बनाम च्म्पाकम दोराई राजन, ए. आई. आर. 1952 एस. सी. 226 के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के परिणामस्वरूप अनुच्छेद 15(4) संविधान में जोड़ा गया|
  • ऐसा इसलिए किया गया कि समाज के पिछड़े वर्गों के लिए विशेष उपबन्ध बनाने में अनुच्छेद 15(1) बाधक था|
  • अनुच्छेद 15(4) यह उपबन्ध करता है कि सामाजिक और शैक्षिणिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के वर्गों के लिए अथवा अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों की उन्नति के लिए कोई विशेष उपबन्ध करने से राज्य को यह अनुच्छेद तथा अनुच्छेद 29(2) नहीं रोकेगा|

अपवाद- अनुच्छेद 15(5) – संविधान के 93वें संशोधन अधिनियम, 2005 द्वारा अनुच्छेद 15(5) जोड़ा गया| इसके द्वारा यह उपबंधित किया गया है कि इस अनुच्छेद की कोई बात या अनुच्छेद 19 के खण्ड (1) के उपखण्ड (छ) राज्य को नागरिकों के किसी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की उन्नति के लिए जहाँ तक ऐसे विशेष उपबन्ध उनके शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश से सम्बन्धित है जिसके अंतर्गत प्राइवेट संस्थाएं हैं, चाहे राज्य द्वारा सहायता प्राप्त हो या बिना सहायता प्राप्त हो, अनुच्छेद 30 के खण्ड (1) में निर्दिष्ट अल्पसंख्यक वर्ग की शिक्षा संस्थाओं से भिन्न हैं, विधि द्वारा विशेष उपबन्ध करने से निवारित नहीं करेगी|

अर्थात सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों की उन्नति के लिए उन्हें ऐसे शैक्षणिक संस्थानों में जिनमें प्राइवेट संस्थाएं भी सम्मिलित हैं| प्रवेश देने के लिए विशेष उपबन्ध करने से राज्य को अनुच्छेद 15 तथा 19(1)(छ) निवारित नहीं करेगा| ऐसी संस्थाएं चाहे राज्य निधि से सहायता प्राप्त करती हो या नहीं करती हो|

  • इस नियम का एक अपवाद अनुच्छेद 30 के खण्ड (1) में निर्दिष्ट अल्पसंख्यक वर्ग की शिक्षा संस्थाएं हैं|
  • अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत संघ, एस. सी. 2008 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27% आरक्षण का प्रावधान करने वाले संविधान के 93वें संशोधन अधिनियम, 2005 को विधिमान्य घोषित किया|

भारतीय संविधान सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर पिछड़ेपन की अवधारणा का उपबन्ध करता है| इसे अनुच्छेद 15(4) एवं 16(4) में प्रावधानित किया गया है|

अनुच्छेद 15 (4) शिक्षण संस्थाओं में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े, वर्गों के लिए स्थानों को आरक्षण का उपबन्ध होता है|

  • इन्द्रा साहनी बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 1993 एस. सी. के वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा धारित किया गया कि आरक्षण 50% से अधिक नहीं हो सकता है|

उक्त मत उच्चतम न्यायालय ने पूर्व में बालाजी बनाम मैसूर राज्य, ए. आई. आर. 1963 एस. सी. 649 के मामले में व्यक्त किया था|

इन्द्रा साहनी मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह भी धारित किया कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में आरक्षण 50% से अधिक हो सकता है किन्तु ऐसा करते समय विशेष सावधानी बरतना अपेक्षित होगा|

  • डाक्टर नीलिमा बनाम डीन पोस्ट ग्रेजुयेट स्टडीज एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, आंध्र प्रदेश, ए. आई. आर. 1993 ए. पी. 229 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णित किया कि यदि एक उच्च जाति की लड़की अनुसूचित जनजाति के लड़के से विवाह कर लेती है तो उसे अनुच्छेद 15(4) के अंतर्गत अनुसूचित जनजाति के व्यक्तियों को मिलने वाला आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा|
  • बालसम्मा पाल बनाम कोचीन विश्वविद्यालय, 1996 3 एस. सी. सी. 545 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि यदि उच्च जाति की लड़की पिछड़ी जाति के लड़के से विवाह कर लेती है तो उसे अनुच्छेद 15(4) एवं अनुच्छेद 16(4) के अंतर्गत पिछड़े वर्ग के व्यक्तियों को मिलने वाला आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा|
  • मीरा कनवरिया बनाम सुनीता, ए. आई. आर. 2006 एस. सी. 597 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि एक उच्च जाति का पुरुष एक अनुसूचित जाति की महिला से विवाह कर लेने से अनुच्छेद 15(4) एवं 16(4) के अंतर्गत आरक्षण का हकदार नहीं हो जाता है|
  • लोक सेवाओं में अवसर की समता (Equality of opportunity in matters of public employment) (अनुच्छेद 16)

अनुच्छेद 16(1) के अनुसार राज्य के अधीन किसी पद पर नियुक्ति या नियोजन से सम्बन्धित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी|

अनुच्छेद 16(2) के अनुसार राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के सम्बन्ध में केवल धर्म, मूलवंश , जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जाएगा| अत: राज्याधीन सेवाओं में नियोजन या नियुक्ति से सम्बन्धित समता के अनुच्छेद 16(1) तथा 16(2) में सामान्य नियम दिये गये हैं|

अपवाद- समता के उक्त नियम के तीन अपवाद दिये गये हैं जो क्रमश: अनुच्छेद 16(3), (4), (4क) तथा (5) में दिये गये है-

अनुच्छेद 16(3) के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह विधि बना कर सरकारी सेवाओं में नियुक्ति के लिए उस राज्य में निवास की अर्हता निर्धारित कर सकती है|

अनुच्छेद 16(4) राज्य को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, पदों का आरक्षण कर सकता है|

  • अनुच्छेद 16(4) में 77वां एवं 81वां संशोधन
  • 77वें संविधान संशोधन 1995 द्वारा अनुच्छेद 16(4क) जोड़ा गया जो अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के वर्गों के लिए सरकारी सेवाओं में प्रोन्नति में आरक्षण का प्रावधान करता है|

अनुच्छेद 16 (4क) में 85वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 के द्वारा पुन: संशोधन किया गया| इस संशोधन के पश्चात अनुच्छेद 16 (4क) का प्रावधान निम्नलिखित है-

इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के आधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, राज्य के अधीन किसी सेवाओं में किसी वर्ग या वर्गों के पदों पर अनुवर्ती (Consiquencial) वरिष्ठता सहित प्रोन्नति के मामलों में आरक्षण के लिए उपबन्ध करने से निवारित नहीं करेगी|

  • 81वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2000 द्वारा अनुच्छेद 16 में एक नया खण्ड (4ख) जोड़ा गया|

अनुच्छेद 16 (4ख) 81वां संशोधन यह उपबंधित करता है कि इस अनुच्छेद की कोई भी बात राज्य को किसी एक वर्ष में न भरी गई रिक्तियां जिसे उस वर्ष में आरक्षित किया गया था, खण्ड (4क) के अंतर्गत पृथक रिक्तियां मानी जायेंगी और उन्हें अगले वर्ष या वर्षों में भरा जायेगा| किसी ऐसे वर्ग की रिक्तियों पर उस वर्ष की रिक्तियों के साथ जिनमें उन्हें भरा जाना है 50% की सीमा के निर्धारण के लिए उस वर्ष की कुल रिक्तियों के आरक्षण पर विचार नहीं किया जायेगा|

  • एम. नागराज बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 2007 एस. सी. 71 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने संविधान के 77वें, 81वें, और 85वें संशोधन अधिनियम को विधिमान्य घोषित किया|
  • कर्नाटक राज्य बनाम के. गोविन्दप्पा, ए. आई. आर. 2009 एस. सी. 618 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अपने पूर्व मत को दोहराते हुए निर्णय दिया कि एकल पद पर आरक्षण नहीं हो सकता क्योंकि इसके परिणामस्वरूप आरक्षण 100% हो जाएगा जो कि असंवैधानिक है|

अनुच्छेद 16(5) के अनुसार राज्य किसी धार्मिक या साम्प्रदायिक संस्थाओं के प्रबंध के लिए विशेष धर्म या सम्प्रदाय को मानने वाले लोगों को ही नियुक्त करने सम्बन्धी प्रावधान कर सकता है|

  • आरक्षण : एक सिंहावलोकन
  • भारत में विभिन्न वर्गों एवं समुदायों में व्याप्त गरीबी, बेरोजगारी तथा दयनीय उनकी दशा को देखते हुए तथा सबल वर्गों के सापेक्ष उन्हें प्रगति की दौड़ में शामिल कर उनके सशक्तिकरण के लिए सरकारी नौकरियों तथा शैक्षणिक एवं तकनीकी संस्थाओं में प्रवेश के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई|
  • आरक्षण को संवैधानिक आधार संविधान के प्रथम संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा अनुच्छेद 15 (4) अंत:स्थापित कर प्रदान किया गया|
  • सर्वप्रथम 1922 में तमिलनाडु ने सरकारी सेवाओं में गैर ब्राह्मण जातियों के लिए आरक्षण किया|
  • 1932 में पूना पैक्ट द्वारा हरिजनों के लिए विधान मंडलो में आरक्षण करने पर सहमति बनी|
  • अनुच्छेद 46 के अंतर्गत अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा एवं अर्थ सम्बन्धी हितों का संरक्षण राज्य का दायित्व है|
  • अनुच्छेद 335 के अंतर्गत सेवाओं और पदों के लिए नियुक्तियां करने में, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के दावों को, प्रशासनिक दक्षता बनाये रखते हुए ध्यान में रखा जायेगा|
  • अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों को केंद्रीय एवं विभिन्न प्रादेशिक सेवाओं में 1951 में 15% तथा 7.5% आरक्षण प्रदान किया गया जो कि वर्तमान में भी है| अनुच्छेद 340 के अंतर्गत राष्ट्रपति को सामाजिक रूप से पिछड़े हुए वर्गों की एवं कठिनाइयों का अन्वेक्षण करने के लिए तथा उनका पता लगाने के लिए एक आयोग गठित करने की शक्ति प्रदान की गई है|
  • पिछड़ेपन के युक्तियुक्त आधार का पता लगाने के लिए 1953 में काका कालेलकर आयोग गठित किया गया किन्तु आयोग ऐसा करने में विफल रहा|
  • 1979 में जनता पार्टी की सरकार ने मण्डल आयोग का गठन किया जिसने 1980 में अपनी सिफारिशें सरकार को दी इसी के आधार पर तत्कालीन प्रधान मंत्री वी. पी. सिंह ने 1990 में केंद्रीय सेवाओं में पिछड़े वर्गों के लिए 27% आरक्षण लागू करने की घोषणा की|
  • 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने पिछड़े वर्गों के लिए 27% आरक्षण को इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ, 1992 परि. (3) एस. सी. सी. 217 के मामले में वैध ठहराया किन्तु पिछड़े वर्गों के संपन्न तबके (Creamy Layer) को आरक्षण का लाभ न दिये जाने पर जोर दिया|
  • उच्चतम न्यायालय ने कहा कि आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए और यह भी धारित किया कि अग्रनयन (Carry forward) वैध है|
  • पिछड़े वर्गों में सम्पन्न तबके (Creamy Layer) के निर्धारण के लिए रघुनंदन प्रसाद समिति गठित की गई|
  • 5 लाख तक वार्षिक आय होने पर व्यक्ति को क्रीमी लेयर में सम्मिलित मान कर आरक्षण के लाभ से वंचित कर दिया जायेगा|
  • इन्द्रा साहनी के मामले न्यायालय ने यह भी धारित किया था कि आरक्षण केवल प्रारम्भिक नियुक्तियों में ही दिया जा सकता है प्रोन्नति (Promotion) में नहीं| संशोधन द्वारा अनुच्छेद 16 (4क) जोड़कर इस बाधा को समाप्त कर दिया गया तथा अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रोन्नति में आरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया गया|
  • 81वां संशोधन अधिनियम, 2000 के द्वारा अनुच्छेद 16 (4ख) जोड़कर यह उपबंधित किया गया कि आरक्षित श्रेणी की पिछली रिक्तियों को पृथक वर्ग माना जायेगा तथा इसमें आरक्षण की 50% की अधिकतम सीमा का नियम लागू नहीं होगा|
  • 82वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2000 द्वारा अनुच्छेद 335 में एक परन्तुक जोड़कर यह व्यवस्था की गई कि संघ या राज्य से सम्बन्धित सेवाओं या पदों के लिए होने वाली परीक्षा में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में अर्हता अंकों या मूल्यांकन के मापदंडों को शिथिल (कम) किया जा सकता है|
  • अस्पृश्यता का अंत (Abolition of untouchability) अनुच्छेद 17

अनुच्छेद 17- अस्पृश्यता का अंत (Abolition of untouchability) – अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है तथा उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध करता है| अस्पृश्यता पर आधारित किसी अयोग्यता को लागू दंडनीय अपराध बनाता है|

संसद द्वारा अनुच्छेद 17 के अधीन अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 जिसे बाद में सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 नाम दिया गया, पारित किया| इसके पश्चात 1989 में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 पारित किया गया|

  • पीपुल्स यूनियन फार डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 1982 एस. सी. 1473 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि अनुच्छेद 17 के अंतर्गत प्रत्याभूत (Guaranteed) अधिकार न केवल राज्य के विरुद्ध प्राप्त है बल्कि प्राइवेट व्यक्तियों के विरुद्ध भी प्राप्त है| इन अधिकारों का उल्लंघन रोकना राज्य का कर्तव्यों है|

अनुच्छे 18 – उपाधियों का अंत (Abolition of titles) – अनुच्छेद 18 (1) सेना एवं शिक्षा सम्बन्धी उपाधियों को छोड़कर उपाधियों को समाप्त करता है तथा राज्य द्वारा ऐसी उपाधियों का दिया जाना वर्जित करता है|

– अनुच्छेद 18 (2) यह उपबंधित करता है कि भारत का कोई भी नागरिक किसी विदेश राज्य से कोई उपाधि नहीं लेगा|

  • स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom) (अनुच्छेद 19-22)

अनुच्छेद 19 भारत के समस्त नागरिकों को निम्नलिखित 6 प्रकार की स्वतंत्रताएं प्रदान करता है-

  • वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  • शांतिपूर्वक एवं निरायुद्ध सम्मलेन की स्वतंत्रता
  • संगम या संघ (या सहकारी समिति) बनाने की स्वतंत्रता
  • भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण की स्वतंत्रता
  • भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निवास करने या बस जाने की स्वतंत्रता
  • कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारबार करने की स्वतंत्रता|

ये स्वतंत्रताएं केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त हैं विदेशी व्यक्तियों को एवं कम्पनी को नहीं प्राप्त है|

अनुच्छेद 19 के अंतर्गत प्रदत्त स्वतंत्रता का अधिकार आत्यन्तिक नहीं है बल्कि यह युक्तियुक्त निर्बन्धनों के अधीन है| अनुच्छेद 19 के खण्ड (2) से (6) तक दिये गये आधारों पर राज्य इन स्वतंत्रताओं पर प्रतिबन्ध लगा सकता है|

  • वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बन्धन ही लगाये जा सकते हैं तथा निर्बन्धन युक्तियुक्त है या नहीं इस बात का अवधारण न्यायालय द्वारा किया जायेगा|
  • वाक् एवं अभिव्यक्ति पर निम्नलिखित वाद
  • रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य, ए. आई. आर. 1950 एस. सी. 124 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि विचारों के प्रसार की स्वतंत्रता वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है|
  • विजोय इमैनुअल बनाम केरल राज्य, (1986) 3 एस. मी. सी. 615 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में चुप रहने की स्वतंत्रता भी सम्मिलित है| इस मामले में तीन बच्चों को राष्ट्रगान न गाने के कारण स्कूल से निकाल दिया गया था न्यायालय ने उनका निष्कासन अवैध माना क्योंकि उनके धार्मिक विश्वास के अनुसार सिवाय अपने ईश्वर की प्रार्थना के सिवाय किसी अन्य की प्रार्थना करने की मनाही थी|
  • सांकल पेपर्स लिमिटेड बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 1962 एस. सी. 305 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि भाषण की स्वतंत्रता में प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है क्योंकि समाचार विचारों को अभिव्यक्त करने के एक माध्यम हैं|
  • एस. पी. गुप्त और अन्य बनाम भारत का राष्ट्रपति और अन्य, ए. आई. आर. 1982 एस. सी. 14 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में जानने का अधिकार भी सम्मिलित है|
  • प्रभुदत्त बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 1982 एस. सी. 6 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि प्रेस की स्वतंत्रता में सनसूचनाओं तथा समाचारों को जानने का अधिकार भी सम्मिलित है|
  • भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी बनाम भारत कुमार एवं अन्य, ए. आई. आर. 1978 एस. सी. 184 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि राजनीतिक दलों द्वारा बंद का आह्वाहन एवं आयोजन असंवैधानिक है एवं अनुच्छेद 19 के अंतर्गत मूल अधिकारों की श्रेणी में नहीं आता है|
  • भारत संघ बनाम नवीन जिंदल, ए. आई. आर. 2004 एस. सी. 1559 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि अपने मकान पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार अनुच्छेद 19(1) (क) में प्रत्याभूत एक मूल अधिकार है|
  • ओ. के. घोष बनाम ई. एक्स. जोसेफ, ए. आई. आर. 1973 एस. सी. 812 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हड़ताल करने का अधिकार अनुच्छेद 19(1) (क) के अंतर्गत मूल अधिकार नहीं है|
  • अजय गोस्वामी बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 2007 एस. सी. 493 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने घारित किया कि किशोरों की निर्दोषिता को बचाने हेतु अश्लील सामग्री के प्रकाशन पर पूर्ण प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता है|
  • पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 2004 एस. सी. 2112 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि मतदाता का सूचना का अधिकार अनुच्छेद 19 के अंतर्गत एक मूल अधिकार है| मतदाता किसी भी प्रत्याशी का पूर्ववृत्त (Antecedent), आय का ब्यौरा, ऋण एवं शैक्षिक योग्यता आदि के बारे में जानकारी रखने का अधिकार रखता है अत: नामांकन पत्र भरते समय उक्त बातों की सूचनाएं देना प्रत्याशियों के लिए अनिवार्य बना दिया गया है|

वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर निर्बधन- नागरिकों की वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत दिये गये आधारों पर निर्बन्धन लगाये जा सकते हैं जो निम्नलिखित हैं-

  • राज्य की सुरक्षा
  • विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध
  • लोक-व्यवस्था
  • सदाचार एवं शिष्टाचार के हित में
  • न्यायालय अवमान
  • मानहानि
  • अपराध उद्दीपन
  • भारत की एकता और अखंडता

(ख) शांतिपूर्ण एवं निरायुद्ध सम्मेलन की स्वतंत्रता- अनुच्छेद 19 (1) (ख) भारत के समस्त नागरिकों को शांतिपूर्वक एवं बिना हथियार के सम्मेलन करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है| इस अधिकार के परिणामस्वरूप शांतिपूर्वक जुलूस निकालने, सार्वजनिक सभाएं करने तथा प्रदर्शन करने के लिए व्यक्तियों को स्वतंत्रता प्राप्त है|

  • इस अधिकार पर निम्नलिखित निर्बन्धन लगाये गये हैं-
  • सम्मेलन शांतिपूर्ण होना चाहिए, एवं
  • बिना हथियार के होना चाहिए|

इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 19 के खण्ड (3) के अंतर्गत भी निर्बन्धन प्रावधानित है अर्थात सम्मेलन पर राज्य द्वारा –

  • भारत की सम्प्रभुता और अखंडता के हित में, तथा
  • लोक व्यवस्था के हित में, निर्बन्धन लगाया जा सकता है|

(ग) संगम या संघ या सहकारी समिति बनाने की स्वतंत्रता- अनुच्छेद 19 (1) (ग) – सभी नागरिकों को संगम तथा संघ और सहकारी समिति बनाने का अधिकार प्रदान करता है| सहकारी समिति बनाने का अधिकार विधान के 97वें संशोधन अधिनियम, 2011 द्वारा अनुच्छेद 19(1) (ग) में संशोधन करके प्रदान किया गया है|

संगम या संघ बनाने के अधिकार पर 19 के खण्ड (4) के अंतर्गत उपबंधित युक्तियुक्त प्रतिबन्ध लगाये जा सकते हैं जो-

  • भारत की सम्प्रभुता तथा अखंडता, तथा
  • लोक व्यवस्था, एवं
  • सदाचार के हित में लगाये जा सकते हैं|

(घ) भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण की स्वतंत्रता – अनुच्छेद 19(1) (घ) भारत के प्रत्येक नागरिक को भारत के राज्यक्षेत्र में निर्बाध रूप से आने-जाने का अधिकार प्रदान करता है|

इस अधिकार पर अनुच्छेद 19 (5) के अंतर्गत –

  • जनसाधारण के हितों में, या
  • किसी अनुसूचित जनजाति के हितों की रक्षा के लिए, प्रतिबन्ध लगाये जा सकते हैं|

(ड.) भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निवास करने का बस जाने की स्वतंत्रता- अनुच्छेद 19 (ड.) के अंतर्गत भारत के समस्त नागरिकों को भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निवास करने की स्वतंत्रता प्राप्त है|

किन्तु राज्य के द्वारा इस स्वतंत्रता पर निम्नलिखित आधारों पर निर्बन्धन लगाया जा सकता है –

  • साधारण जनता के हित में, तथा
  • अनुसूचित जनजाति के हित के संरक्षण के लिए|
  • कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार तथा कारोबार करने की स्वतंत्रता- अनुच्छेद 19 (1) (छ) भारत के समस्त नागरिकों को कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार तथा कारोबार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है|
  • अनुच्छेद 19 (6) के अधीन राज्य को जनसाधारण के हित में इस अधिकार पर प्रतिबन्ध लगाने का अधिकार है|
  • किसी वृत्ति या व्यापार हेतु राज्य आवश्यक वृत्तिक या तकनीकी अर्हता की शर्त भी राज्य लगा सकता है|
  • किसी व्यापार या कारबार से नागरिकों को पूर्ण या आंशिक रूप से अपवर्जित करने का अधिकार भी राज्य को प्राप्त है|
  • अनुच्छेद 19 क से सम्बन्धित वाद
  • सोदन सिंह बनाम न्यू दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी, ए. आई. आर. 1989 एस. सी. 1988: (1989) 4 एस. सी. सी. 155 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि सड़क के फुटपाथों पर व्यापार करना संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (छ) के अधीन एक मूल अधिकार है ततः राज्य उस पर केवल 19(6) के अन्तर्गत विहित निर्बन्धन ही लगा सकता है|
  • मेमर्स बी. आर. इंटरप्राइवेट बनाम उ. प्र. राज्य, ए. आई. आर. 1999 एस. सी. 186 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि लाटरी वाणिज्य या व्यापार नहीं हो सकता क्योंकि इसमें संयोग के तत्व की प्रमुखता होती है जबकि व्यापार में कौशल प्रमुख तत्व है, इसलिए लाटरी जुआ है|
  • ओम प्रकाश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए. आई. आर. 2004 एस. सी. 1896 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि हरिद्वार एवं ऋषिकेश नगरपालिका के भीतर अण्डों की बिक्री पर परिबंध अनुच्छेद 19 (1) (छ) के अधीन युक्तियुक्त प्रतिबन्ध है|

अपराधों के लिए दोषसिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण (Protection in respect of conviction for offences) अनुच्छेद 20- अनुच्छेद 20 अपराधों के लिए दोषसिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण प्रदान करता है| यह संरक्षण नागरिकों तथा गैर नागरिकों सभी को प्राप्त है|

व्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षित करने वाले इस अनुच्छेद के महत्व को देखते हुए संविधान के 44वें संशोधन द्वारा यह उपबंधित किया गया कि अनुच्छेद 20 को आपात की उद्घोषणा के प्रवर्तन में रहने के दौरान अनुच्छेद 359 के अधीन किसी आदेश द्वारा निलंबित नहीं किया जा सकता है|

अनुच्छेद 20 में तीन प्रकार का संरक्षण प्रदान किया गया है –

  • कार्यात्तर विधि से संरक्षण (Protection from Expost Facto Law)
  • दोहरे दंड से संरक्षण (Protection from Double Jeopardy)
  • आत्म-अभिशंसन से संरक्षण (Protection from self-incriminatio)

अनुच्छेद 20 (1)- कार्योत्तर विधि से संरक्षण (Protection from Ex-post Facto Law) – अनुच्छेद 20 के खण्ड तक सिद्धदोष नहीं ठहराया जाएगा जब तक कि उसने ऐसा कार्य करने के समय प्रवृत्त विधि का अतिक्रमण न किया हो तथा उस अपराध के किये जाने के समय जो शास्ति अधिरोपित (Impose) की जा सकती थी वह उससे अधिक शास्ति का भागी नहीं होगा|

अनुच्छेद 20 (1) विधान-मण्डल की विधायिनी शक्ति पर नियंत्रण लगाता है तथा उसे भूतलक्षी प्रभाव से अपराध सृजित करने वाली अथवा दंड में वृद्धि करने वाली विधि बनाने से रोकता है|

ऐसी कार्योत्तर विधि जो अपराध का सृजन करती हैं या दंड में वृद्धि करती हैं, उसे भूतलक्षी प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता है किन्तु कार्योत्तर विधि के लाभकारी उपबन्ध को भूतलक्षी प्रभाव दिया जा सकता है और कोई व्यक्ति उसका लाभ उठा सकता है|

  • रतन लाल बनाम पंजाब राज्य, ए. आई. आर. 1965 एस. सी. 444 के मामले में एक 16 वर्षीय लड़के को प्रोबेशन ऑफ़ अफेंडर्स एक्ट के उस प्रावधान का लाभ प्रदान किया गया जिसके द्वारा 21 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को कारावास का दंड देने का प्रतिषेध किया गया था यद्यपि कि ऐसा संशोधन अपराध किये जाने के पश्चात किया गया था|

(2) दोहरे दंड से संरक्षण (Protection from double Jeopardy)- अनुच्छेद 20 (2) के अनुसार किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दण्डित नहीं किया जायेगा|

यह अंग्रेजी विधि के (nemo debate vis vexari) के नियम पर आधारित है जिसका अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार अभियोजित और दण्डित नहीं किया जायेगा|

इंग्लैण्ड तथा अमेरिका में यदि किसी व्यक्ति का किसी अपराध के लिए विचारण किया गया हो तो भले ही वह दोषसिद्ध न किया गया हो तो उसका उसी अपराध के लिए पुन: विचारण नहीं किया जा सकता है| किन्तु भारत में अभियोजित और दण्डित होने पर ही पुन: विचारण से उन्मुक्ति प्राप्त है| यदि विचारण के पश्चात दोषमुक्ति कर दी गई है तो अभियुक्त का पुन: विचारण किया जा सकता है|

शर्तें- अनुच्छेद 20 (2) का संरक्षण तभी प्राप्त हो सकता है जब निम्नलिखित शर्तें पूरी हो जाती हैं –

  • व्यक्ति किसी अपराध का अभियुक्त हो
  • उसे अभियुक्त और दण्डित किया गया हो,
  • उसे किसी सक्षम क्षेत्राधिकार वाले न्यायालय या न्यायिक अधिकरण के सक्षम अभियोजन एवं दण्डित किया गया हो, तथा
  • दूसरी बार उसी अपराध के लिए अभियोजन और दण्डित किया गया हो|

(3) आत्म अभिशंसन से संरक्षण (अपने विरुद्ध गवाही देने से संरक्षण) (Protection self incrimination) – अनुच्छेद 20 (3) के अनुसार किसी भी व्यक्ति को जो किसी अपराध का अभियुक्त हो, स्वयं अपने विरुद्ध एक साक्षी बनने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा|

इस अनुच्छेद का संरक्षण साक्षी को नहीं प्राप्त है बल्कि केवल अभियुक्त व्यक्ति को प्राप्त है|

शर्तें- अनुच्छेद 20 (3) का संरक्षण प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित शर्तें पूरी होनी आवश्यक हैं:

  • व्यक्ति किसी अपराध का अभियुक्त हो,
  • उसे अपने विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए बाध्य किया जाये|
  • अपने विरुद्ध साक्ष्य देने से उन्मुक्ति न्यायालय ही नहीं पुलिस द्वारा पूछ-ताछ में भी प्राप्त है| (नन्दिनी सत्पथी बनाम पी. एल. दानी, ए. आई. आर. 1978 एस. सी. 1025)
  • स्टेट ऑफ़ बाम्बे बनाम काथीकालू, ए. आई. आर. 1961 एस. सी. 1808 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि साक्षी बनने का अर्थ साक्ष्य प्रस्तुत करना या न्यायालय में किसी विलेख को प्रस्तुत करना है जो विवादग्रस्त विषय पर कुछ प्रकाश डालता हो| इसमें अभियुक्त के व्यक्तिगत ज्ञान पर आधारित ब्यान सम्मिलित नहीं है|
  • सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य, ए. आई. आर. 2010 एस. सी. 1974 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने नार्कों टेस्ट, ब्रेन मैपिंग और पालीग्राफी टेस्ट को अनुच्छेद 20 (3) का उल्लंघन बताया तथा इन्हें अवैध घोषित कर दिया|
  • प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता (Life and Personal Liberty) (अनुच्छेद 21)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रत्याभूत प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार नागरिकों तथा गैर नागरिकों सभी व्यक्तियों को प्राप्त है|

अनुच्छेद 21 के अनुसार किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं|

यह अधिकार प्रत्येक व्यक्ति (नागरिक-गैर-नागरिक) को ‘राज्य’ के विरुद्ध प्राप्त है|

  • ए. के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य, ए. आई. आर. 1952 एस. सी. 27 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि अनुच्छेद 21 केवल कार्यपालिका के कृत्यों के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है विधायिका के कृत्यों के विरुद्ध नहीं| अत: विधायिका विधि बनाकर किसी भी व्यक्ति को उसके प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित कर सकती है|
  • किन्तु इस निर्णय को उलटते हुए उच्चतम न्यायालय ने मेनका गांधी बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 1978 एस. सी. 507 के मामले में धारित किया कि अनुच्छेद 21 कार्यपालिका एवं विधायिका दोनों के कृत्यों के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करती है|

न्यायालय ने स्म्प्रेक्षित किया कि जीवित रहने का अधिकार केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं है बल्कि उसके अंतर्गत मानवीय गरिमा के साथ जीवित रहने का अधिकार भी आता है|

दैहिक स्वतंत्रता के अंतर्गत वे सभी आवश्यक तत्व सम्मिलित हैं जो व्यक्ति को पूर्ण बनाने में सहायक है|

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि ‘प्रक्रिया’ से तात्पर्य कोई प्रक्रिया नहीं बल्कि ऐसी प्रक्रिया से है जो ऋजु, न्यायपूर्ण और युक्तियुक्त है|

अनुच्छेद 21 के अंतर्गत वे सभी अधिकार सम्मिलित हैं जो व्यक्ति के जीवन के लिए सहायक हैं भले ही उनका किसी पृथक अनुच्छेद में उल्लेख नहीं है|

अनुच्छेद 21 में प्रयुक्त ‘प्रक्रिया’ का अर्थ कोई भी प्रक्रिया नहीं अपितु ऐसी प्रक्रिया है जो ऋजु न्यायपूर्ण एवं युक्तियुक्त हो|

  • बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 1984 एस. सी. 802 में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि जीवन का अर्थ मानव गरिमा के साथ शोषण मुक्त जीवन है|
  • नीरजा चौधरी बनाम मध्य प्रदेश राज्य, ए. आई. आर. 1982 एस. सी. 1099 के मामले में धारित किया गया कि बंधुआ मजदूरों का पता लगाना तथा उन्हें मुक्त कराना ही पर्याप्त नहीं है उनका पुनर्वासकिया जाना भी अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अपेक्षित है|
उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत निम्नलिखित अधिकारों को मूल अधिकार घोषित किया है एवं उससे सम्बन्धित प्रमुख वाद निम्नलिखित हैं|
1.       एकान्तता का अधिकार – गोविन्द बनाम मध्य प्रदेश राज्य (ए.आई.आर. 1975 एस.सी. 1379)

2.       विदेश यात्रा का अधिकार – मेनका गाँधी बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1978 एस.सी. 507 एवं सतवंत सिंह बनाम असिस्टेंट पासपोर्ट अधिकारी| ए.आई.आर. 1967 एस.सी. 1836.

3.       जीविकोपार्जन का अधिकार – ओलगा टेलिस बनाम बोम्बे म्युनिसिपल कारपोरेशन, ए.आई.आर. 1986 एस.सी. 180

4.       आहार का अधिकार – पी.यू.सी.एल. बनाम भारत संघ, 2000 (5) एस.सी.सी. 30

5.       जीने के अधिकार से मरने का अधिकार सम्मिलित नहीं – ग्यान कौर बनाम पंजाब राज्य, ए.आई.आर. 1996 एस.सी. 946

6.       मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार – मेनका गाँधी बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1978 एस.सी. 507

7.       चिकित्सीय सहायता पाने का अधिकार – परमानन्द कटारा बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1989 एस.सी. 2039

8.       शिक्षा पाने का अधिकार – उन्नीकृष्णन बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य, (1993) 4 एस.सी.सी. 645

9.       नि:शुल्क विधिक सहायता का अधिकार – एम.एच. हास्काट बनाम महाराष्ट्र राज्य, AIR 1978 SC 1548

10.   प्रदूषण मुक्त जल एवं वायु के उपभोग का अधिकार – सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य, AIR 1991 SC 420

11.   आश्रय का अधिकार – चमेली सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य

12.   शीघ्रतर परीक्षण का अधिकार – हुस्न आरा खातून बनाम बिहार राज्य, AIR 1979 SC 1360

13.   श्रमजीवी महिला का कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संरक्षण का अधिकार – विशाखा बनाम राजस्थान राज्य, AIR 1997 SC 3011

14.   पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु के विरुद्ध संरक्षण – नीलवती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य, (1993) 2 SCC 746

15.   राज्य सरकार द्वारा अवैध निरोध किये जाने पर निरुद्ध व्यक्ति को क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार – रूदुल शाह बनाम बिहार राज्य, (1983) 4 SC 141

16.   अभियुक्त को अकारण जमानत पर न छोड़ना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है – बाबू सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, AIR 1978 SC 527

17.   विकलांग तथा अंधे व्यक्ति को भी भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा में प्रतियोगी के रूप में भाग लेने का अधिकार है – नेशनल फेडरेशन ऑफ़ ब्लाइंड बनाम संघ लोक सेवा आयोग, 1993, 4 SCC 411

18.   प्रत्येक व्यक्ति को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अवैध गिरफ्तारी के विरुद्ध संरक्षण प्राप्त है- जोगिन्दर सिंह बनाम उत्तर-प्रदेश राज्य, 1994 SCC २६०

19.   न्यूनतम मजदूरी पाने का अधिकार- पीपुल्स यूनियन फार डेमोक्रेटिक राइट बनाम भारत सिंह, AIR 1981 SC 1473

20.   मस्जिदों के इमामों को पारिश्रामिक पाने का अधिकार है- आल इण्डिया इमाम संगठन बनाम भारत संघ, (1993) 3 SC 584

21.   चरित्रहीन महिला को भी एकान्तता का अधिकार प्राप्त है- महाराष्ट्र राज्य बनाम मघुलकर नारायण, AIR 1991 SC 2007

22.   सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान का निषेध- मुरली एस. देवड़ा बनाम भारत संघ, AIR 2002 SC 4

23.   प्राप्तवय (Mazor) बालिका को स्वेच्छा से विवाह करने का अधिकार है- लता सिंह बनाम उत्तर-प्रदेश राज्य, AIR 2006 SC 2522

24.   बलात्कार पीड़ित महिला को अंतरिम प्रतिकर प्राप्त करने का अधिकार है- बोधसत्व गौतम बनाम शुभ्रा चक्रवर्ती, (1996) 1 SC 490

25.   पैतृकता निर्धारण के लिए रक्त परिक्षण न कराने का अधिकार- निगंमार बनाम चिकैय्या, AIR 2000 कर्नाटक 50

26.   हथकड़ी लगाने (Hand cuffing) के विरुद्ध संरक्षण- प्रेम शंकर शुक्ल बनाम दिल्ली प्रशासन, AIR 1980 SC 898

27.   कारागार में सजा भुगत रही महिला के साथ रहने वाले बच्चों के हितों का संरक्षण- आर. डी. उपाध्याय बनाम आंध्र-प्रदेश राज्य, AIR 2006 SC 1946

28.   परम्परागत धरोहर को बनाए रखना अनु. 21 और 51-क (9) के अंतर्गत राज्य का कर्तव्य है- सुशान्ता टैगोर बनाम भारत संघ, AIR 2005 SC 1975

29.   अनुच्छेद 21 का संरक्षण विदेशियों को भी प्राप्त है- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग बनाम अरुणाचल प्रदेश राज्य, (1999) 1 SCC 742

30.   अभिरक्षा में पूछ-ताछ आवश्यक न होने पर भी अग्रिम जमानत से इन्कार अनु. 21 का अतिलंघन है- जय प्रकाश सिंह बनाम बिहार राज्य, AIR 2012 SC 1676

31.   एकान्तता का अधिकार आत्यन्तिक अधिकार नहीं है| इस पर युक्तियुक्त निर्बन्धन लगाया जा सकता है- मि. एक्स बनाम हास्पिटल जेड, AIR 1999 SC 445

32.   कौमार्य परिक्षण अनु. 21 के अंतर्गत प्राप्त एकान्तता के अधिकार का अतिलंघन है- सुरजीत सिंह थिंड बनाम जीत कौर, AIR 2003 पंजाब एंड हरियाणा 353

33.   टेलीफोन टेप करना व्यक्ति के एकान्तता के अधिकार में हस्तक्षेप है, यह अपरिहार्य परिस्थितियों में ही अनुज्ञात किया जा सकता है- पीपुल्स यूनियन ऑफ़ सिविल लिबर्टीज बनाम यूनियन ऑफ़ इण्डिया, AIR 1997 SC 568

34.   बिजली पाने का अधिकार अनु. 21 के अंतर्गत आत है- एम. के. आचार्य बनाम भारत संघ, AIR 2008 कोलकत्ता 47

35.   भारतीय दंड संहिता की धारा 303 अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है अत: असंवैधानिक है- मिट्ठू सिंह बनाम पंजाब राज्य, AIR 1983 SC 473

36.   गर्भधारण के पूर्व लिंग परिक्षण न कराने का अधिकार- विजय शर्मा बनाम भारत संघ, AIR 2008

37.   नार्कों, ब्रेन मैपिंग तथा पॉलीग्राफी टेस्ट न कराने का अधिकार- सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य, AIR 2010 SC 1974

38.   एक महिला को बच्चा पैदा करने या न करने के विकल्प का अधिकार अनुच्छेद 21 में प्रत्याभूत दैहिक, स्वतंत्रता का अधिकार सम्मिलित है- सुचेता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन, AIR 2010 SC 235

39.   पक्षकारों के दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन का उपबन्ध करने वाली हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं करती है- सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार चड्ढा, (1984) 4 SCC 90

40.   “मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार” प्रत्येक नागरिक का मूल अधिकार है और इसे सुरक्षित करने के लिए आवश्यक सुविधाएँ प्रदान करना राज्य का कर्तव्य है- विक्रमदेव सिंह तोमर बनाम बिहार राज्य, AIR 1988 SC 1782

41.   निष्पक्ष विचारण का अधिकार विधि की सम्यक प्रक्रिया में निहित है- रत्तीराम बनाम म. प्र. राज्य, AIR 2012 SC 1485

42.   अभियोजन आरम्भ होने से वर्षों की समाप्ति ही अभियोजन को रोक देने या परिवाद वापस लेने को औचित्यपूर्ण नहीं बनाती है- मोहम्मद हुसेन उर्फ़ जुल्फिकार अली बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) दिल्ली, AIR 2012 SC 3860

43.   फुटपाथों पर व्यापार करना मूल अधिकार है- सोदान सिंह बनाम न्यू दिल्ली म्यूनिसिपल कमेटी, ए. आई. आर. 1989 एस. सी.|                                          

  • अनुच्छेद 21 से सम्बन्धित नवीन वाद
  • निर्मल सिंह कहलोन बनाम पंजाब राज्य, AIR 2009 SC 984 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि युक्तियुक्त विचारण सम्मिलित है एवं यह अनुच्छेद 21 द्वारा प्रत्याभूत अधिकार है|
  • पुलिस उपमहानिरिक्षण बनाम एस. सामूथिराम, AIR 2013 SC 14 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं से छेड़-छाड़ रोकने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश दिया है, इसका तब तक अनुपालन किया जाएगा जब तक कि इस विषय पर उपयुक्त विधि न निर्मित कर ली जाय|
  • मेधा कोतवाल लेले बनाम भारत संघ, AIR 2013 SC 93 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न जो कि विशाखा बनाम राजस्थान राज्य के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित सिद्धांतों के समुचित अनुपालन न होने के करण हो रहा था, को रोकने के लिए कुछ अतिरिक्त निर्देश दिये जिनका सम्बन्धित विषय पर विधि निर्मित होने तक अनुपालन किया जाएगा|

नोट : ध्यातव्य है कि विशाखा बनाम राजस्थान राज्य के बाद में माननीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा पारित दिशा निर्देश का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए संसद द्वारा सन 2013 में विधि का अधिनियम कर दिया गया है, जो “कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 (2013 का अधिनियम संख्या 14) के रूप में अब प्रवर्तित हो गयी है|

  • स्वपन कुमार साहा बनाम साउथ प्वाइंट मांटेसरी हाई स्कूल और अन्य, AIR 2008 (NOC) 236 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि सकूल बसों में बच्चों को सुरक्षित यात्रा करने का अधिकार मूल अधिकार है तथा स्कूल बसों में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाना अनुच्छेद 21 में प्रत्याभूत उनके मूल अधिकार का अतिक्रमण है|
  • डी. के बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, AIR 1997 SC 610 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि कोई भी उत्पीड़न या क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार अनुच्छेद 21 के विरुद्ध है चाहे यह अन्वेक्षण, पूछ-ताछ या अन्यथा के दौरान किया गया हो| पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु सभ्य समाज में सबसे बुरा अपराध है|
  • जीवन एवं मृत्यु के अधिकार पर महत्वपूर्ण वाद

प्रश्न : क्या जीवन के अधिकार में मरने का अधिकार सम्मिलित है?

उत्तर : प्रारम्भ में अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का निर्वचन करते हुए न्यायालय ने धारित किया कि जीवन के अधिकार में मृत्यु का अधिकार भी सम्मिलित है|

  • सबसे पहले महाराष्ट्र राज्य बनाम मारुति श्रीपति दूबल, 1987 क्रि. लॉ ज. 743 के मामले में बंबई उच्च न्यायालय ने धारित किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 309 संविधान के अनुच्छेद 21 का अतिक्रमण करती है इसलिए अवैध है| अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीने के अधिकार में मरने का अधिकार भी सम्मिलित है|
  • आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने चेत्रा जगादेश्वर बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, (1988) क्रि. लॉ ज. 549 में भारतीय दंड संहिता की धारा 309 को संवैधानिक अभिनिर्धारित करते हुए कहा कि जीने के अधिकार में मरने का अधिकार नहीं सम्मिलित है|
  • पी. रतीनाम बनाम भारत संघ, (1994) 3 ACC 394 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 309 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के प्रतिकूल मानते हुए असंवैधानिक माना तथा कहा कि जीवन के अधिकार में मरने का अधिकार भी सम्मिलित है|
  • ग्यान कौर बनाम पंजाब राज्य, (1996) 2 SCC 649 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अपने पूर्व के निर्णय को उलट दिया और धारित किया कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार में मरने का अधिकार नहीं सम्मिलित है तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 309 संवैधानिक है|
  • जगमोहन सिंह बनाम उत्तर-प्रदेश राज्य, AIR 1973 SC 947 में मृत्युदंड की संवैधानिकता का परिक्षण उच्चतम न्यायालय ने किया तथा धारित किया कि मृत्युदंड संवैधानिक है| क्योंकि मृत्युदंड और आजीवन कारावास में चुनाव करते समय न्यायालय विधि द्वारा विहित प्रक्रिया के अनुसार कार्य करता है|
  • बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य, AIR 1980 SC 898 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि हत्या के अपराध के लिए मृत्युदंड का वैकाल्पिक दंड संविधान के अनुच्छेद 14, 19 तथा 21 का उल्लंघन नहीं करता है| मृत्युदंड के लिए द. प्र. सं. की धारा 354 (3) में निर्धारित प्रक्रिया अनुच्छेद 14, 19 तथा 21 का अतिक्रमण नहीं करती है और न ही अयुक्ति युक्त एवं अन्यायपूर्ण है|
  • दीना बनाम भारत संघ, (1983) 4 SCC 645 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354 (5) में विहित रस्सी से फाँसी लगाकर मृत्युदंड देने की प्रक्रिया संवैधानिक है|
  • मिट्ठू सिंह बनाम पंजाब राज्य, AIR 1983 SC 473 के मामले में धारा 303 में प्रावधानित आजीवन सिद्धदोष द्वारा हत्या के लिए अनिवार्य मृत्युदंड दिए जाने का उपबन्ध इस आधार पर असंवैधानिक घोषित कर दिया गया कि वह 21 के आधार पर अनुचित अयुक्तियुक्त और अन्यायपूर्ण है|

44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 359 में संशोधन कर के यह उपबंधित किया गया है कि अनुच्छेद 21 में प्रत्याभूत प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार को आपातकाल में भी राष्ट्रपति के आदेश द्वारा निलम्बित नहीं किया जा सकता है|

  • शिक्षा का अधिकार : अनुच्छेद 21क 86वां संविधान संशोधन

संविधान के 86वें संशोधन अधिनियम, 2002 पारित करके संविधान में अनुच्छेद 21-क जोड़ा गया है| जिसमें यह उपबन्ध है कि “राज्य ऐसी रीति से जैसा कि विधि बनाकर निर्धारित करे 6 वर्ष की आयु से 14 वर्ष की आयु के सभी बालकों के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के लिए उपबन्ध करेगा”|

  • इस संशोधन के पूर्व उच्चतम न्यायालय ने मोहिनी जैन बनाम कर्नाटक राज्य, 1992 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि शिक्षा पाने का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का मूल अधिकार है|
  • उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र-प्रदेश राज्य, (1993) 4 SCC 645 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि शिक्षा का अधिकार अनुच्छेद 21 के अधीन एक मूल अधिकार है तथा सभी को शिक्षा प्रदान करना राज्य का उत्तरदायित्व है किन्तु राज्य का यह दायित्व 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा देने तक ही सीमित है|

अत: 86वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 21-क जोड़कर 6 से 14 वर्ष तक के बालकों के लिए शिक्षा का अधिकार अब मूल अधिकार बना दिया गया है|

86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान के भाग 4-क अनुच्छेद 51-क में उपखण्ड (ट) जोड़ा गया जो 6 से 14 वर्ष के बच्चों के माता-पिता और प्रतिपाल्य के संरक्षकों पर बच्चों और प्रतिपाल्यों को शिक्षा का अवसर प्रदान करने का मूल कर्तव्य बना दिया गया है|

86वें संविधान संशोधन द्वारा ही संविधान के भाग-4, में अनुच्छेद 45 प्रतिस्थापित करके 6 वर्ष की आयु के सभी बच्चों के पूर्व बाल्यकाल की देख-रेख और शिक्षा देने का प्रयास राज्य द्वारा किये जाने का निर्देश उपबंधित किया गया है|

उक्त संशोधन के अनुसरण में संसद ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 पारित किया जो 1 अप्रैल 2010 से सम्पूर्ण देश में लागू हुआ| इसमें 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को राज्य के व्यय पर निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का उपबन्ध किया गया है|

इस अधिनियम में निजी विद्यालयों सहित सभी विद्यालयों में आर्थिक रूप से दुर्बल वर्गों के बच्चों के लिए 25% सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है|

  • एन. कोमोन बनाम मणिपुर राज्य, AIR 2010 मणिपुर 102 के मामले में गोहाटी उच्च न्यायालय ने 6 से 14 वर्ष के बालकों के लिए मुक्त एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करने हेतु शिक्षा अधिकारी को 4 सप्ताह में याची के प्रतिवेदन पर निर्णय लेने का आदेश दिया|
  • गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण (अनुच्छेद 22) (Protection Against Arrest and Detention)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22 में सभी व्यक्तियों (नागरिकों तथा गैर नागरिकों) को गिरफ्तारी एवं निरोध से संरक्षण प्रदान किया गया है|

अनुच्छेद 22 के अधीन दो प्रकार की गिरफ्तारियों का उल्लेख हैं-

  • सामान्य विधि के अधीन गिरफ़्तारी, तथा
  • निवारक निरोध विधि के अधीन गिरफ्तारी

अनुच्छेद 22 के खण्ड (1) एवं (2) में सामान्य विधि के अन्तर्गत गिरफ्तार किये जाने पर गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकारों के प्रावधान किये गये हैं| ये निम्नलिखित हैं-

  • गिरफ़्तार व्यक्ति को यथाशीघ्र गिरफ्तारी का कारण बताये बिना अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं रखा जाएगा (अर्थात उसे गिरफ्तारी का कारण जानने का अधिकार है)
  • उसे अपनी पसंद के विधि व्यवसायी (वकील) से परामर्श करने और प्रतिरक्षा कराने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जाएगा|
  • गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा| इसमें गिरफ़्तारी के स्थान से न्यायालय तक ले जाने में लगा समय शामिल नहीं किया जाएगा|
  • मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना 24 घंटे से अधिक निरुद्ध नहीं रखा जाएगा|

अनुच्छेद 22(3) में यह उपबंधित किया गया है कि उक्त अधिकार निम्नलिखित दो कोटियों में आने वाले व्यक्तियों को नहीं प्राप्त है-

  • विदेशी शत्रु, एवं
  • निवारक निरोध-विधि के अंतर्गत गिरफ्तार व्यक्ति|
  • निवारक निरोध (Preventive Detention)

सामान्य गिरफ्तारी किसी व्यक्ति द्वारा अपराध कारित किये जाने के पश्चात की जाती है| किन्तु निवारक गिरफ्तारी (निरोध) अपराध किये जाने के पूर्व की जाती है| निवारक निरोध अपराध घटित होने से रोकने के प्रयोजन से किया जाता है| अर्थात यह कार्यवाही दंडात्मक न होकर निवारणात्मक होती है|

निवारक निरोध विधि समाज विरोधी एवं राष्ट्र विरोधी तत्वों से उत्पन्न होने वाले खतरों से नागरिकों एवं देश की सुरक्षा के लिए आवश्यक है|

  • निवारक निरोध से सम्बन्धित अधिनियम

सर्वप्रथम संसद ने 1950 में निवारक निरोध अधिनियम पारित किया जो 1969 तक लागू रहा|

1971 में आतंरिक सुरक्षा अधिनियम (Maintenance of Internal Security Act, 1971) (मीसा) अधिनियमित किया गया|

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासुका) को 1980 में अधिनियमित किया गया|

इसके अतिरिक्त आर्थिक अपराधों को रोकने के लिए 1978 में प्रिवेंशन ऑफ़ ब्लैक मार्केटिंग एंड मेंटेनेन्स ऑफ़ सप्लाइज ऑफ़ एसेंशियल कमोडिटी एक्ट, 1978 पारित किया गया|

अनुच्छेद 22 के खण्ड (4) से (7) के अन्तर्गत निवारक निरोध, विधियों के विरुद्ध संरक्षण के प्रावधान किये गये हैं| यदि किसी व्यक्ति को निवारक निरोध विधि के अन्तर्गत गिरफ्तार किया जाता है तो इन प्रक्रियाओं का अनुपालन करना एक अनिवार्य संवैधानिक अपेक्षा है|

अनुच्छेद 22 (4) के अनुसार निवारक निरोध का उपबन्ध करने वाली कोई विधि किसी व्यक्ति का तीन माह से अधिक अवधि के लिए निरुद्ध किया जाना तब तक प्राधिकृत नहीं करेगी, जब तक कि सलाहकार बोर्ड ने तीन मास की उक्त अवधि की समाप्ति के पहले यह प्रतिवेदन नहीं दिया है कि उसकी राय में ऐसे निरोध के लिए पर्याप्त कारण है|

अनुच्छेद 22 के खण्ड (5) के अंतर्गत निरुद्ध व्यक्ति को प्राप्त संवैधानिक संरक्षण निम्नलिखित है-

  • गिरफ्तारी का आधार जानने का अधिकार
  • परामर्श बोर्ड के विचार के लिए अभ्यावेदन प्रस्तुत करने का अधिकार
  • परामर्श बोर्ड का यह कर्तव्य है कि वह निरोध आदेश जारी किये जाने की तिथि से तीन माह के भीतर अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत कर दे|
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24) (Right Against Exploitation)

अनुच्छेद 23 के अंतर्गत मानव के दुर्व्यापार और बलात श्रम का प्रतिषेध किया गया है| इसमें ‘बेगार’ भी शामिल है|

इस उपबन्ध का उल्लंघन अपराध घोषित किया गया है तथा विधि के अनुसार दंडनीय बनाया गया है|

अनुच्छेद 23 का संरक्षण सभी व्यक्तियों (नागरिकों एवं गैर नागरिकों) तथा प्राइवेट व्यक्तियों के विरुद्ध भी प्राप्त है|

मानव दुर्व्यापार (Human Trafficking) का अर्थ है दास (गुलाम) के रूप में मानव का क्रय-विक्रय करना तथा अनैतिक प्रयोजन के लिए बच्चों एवं महिलाओं का क्रय विक्रय भी इसमें सम्मिलित हैं|

दंड विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013 (2013 का अधिनियम संख्या 13) के द्वारा भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 370 के स्थान पर नई धारा 370 तथा 370-क का प्रतिस्थापन कर के क्रमश: व्यक्ति का दुर्व्यापार (Trafficking of person) धारा 370 तथा ऐसे व्यक्ति का, जिसका दुर्व्यापार किया गया है, शोषण धारा 370 क, को दंडनीय अपराध बना दिया गया है जो अनुच्छेद 23 के उद्देश्यों की पूर्ति  करता है|      

अनुच्छेद 23 के खण्ड (2) के अनुसार राज्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए किसी व्यक्ति से अनिवार्य सेवा ले सकता है विनिवार्य सेवा लागू करने में राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा| राज्य ऐसी अनिवार्य सेवा के लिए पारिश्रमिक का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं है|

  • पीपुल्स यूनियन फार डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ, AIR 1982 SC 1473 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि यदि किसी व्यक्ति से पारिश्रामिक दिये बिना बलपूर्वक बतात श्रम लिया जाता है तो यह ‘बेगार’ है| अनुच्छेद 23 के अंतर्गत बलपूर्वक लिए जाने वाले सभी कार्य जिनसे मानव की गरिमा तथा सम्मान को क्षति पहुंचती है वर्जित किये गये हैं| यदि किसी व्यक्ति को पारिश्रमिक देकर भी उसकी इच्छा के विरुद्ध कार्य कराया जाता है तो यह बलातश्रम (Bonded labour) के अंतर्गत आता है|
  • दीना बनाम भारत संघ, AIR 1983 SC 1155 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि बिना पारिश्रामिक दिये कैदियों से काम कराना बलात श्रम है तथा अनुच्छेद 23 का उल्लंघन है|
  • नीरजा चौधरी बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (1984) 3 SCC 243 के मामले में धारित किया गया कि बंधुआ श्रमिकों को मुक्त कराना ही नहीं उनके पुनर्वास की व्यवस्था करना भी सरकार का कर्तव्य है जिसके अभाव में वे पुन: शोषण के शिकार हो सकते हैं|

कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध (अनुच्छेद 24)- अनुच्छेद 24 के अनुसार चौदह वर्ष से कम आयु के बालकों को किसी कारखाने या खान में काम करने के लिए नियोजित नहीं किया जाएगा या किसी अन्य परिसंकटमय (Hazardous) नियोजन में नहीं लगाया जाएगा|

  • पीपुल्स यूनियन फार डेमोक्रेटिक राइट बनाम भारत संघ, AIR 1983 SC 1473 के मामले में धारित किया गया कि भवन निर्माण कार्य में 14 वर्ष के बच्चों को नहीं नियोजित किया जा सकता है| क्योंकि वह भी जोखिम वाला कार्य है|
  • एम. सी. मेहता बनाम भारत संघ, (1996) 6 SCC 756 के मामले में धारित किया गया कि 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को किसी कारखाने या खान या परिसंकटमय कार्यों में नियोजित नहीं किया जा सकता है| न्यायालय ने बालकों के कल्याण के लिए बनाये गये विभिन्न विधियों के क्रियान्वयन के लिए सरकार को विस्तृत दिशा निर्देश भी जारी किया|
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom of Religion) (अनुच्छेद 25-28)

भारतीय संविधान की उद्देशिका में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा ‘पंथ निरपेक्ष’ पद जोड़ा गया अर्थात भारत एक ‘पंथनिरपेक्ष’ राज्य है इस बात की घोषणा उद्देशिका में की गई है| पंथ निरपेक्ष राज्य से तात्पर्य धर्म विहीन या धर्म विरोधी राज्य से नहीं है| इसका तात्पर्य यह है कि राज्य का कोई धर्म नहीं होगा सभी धर्मों का समान रूप से आदर किया जाएगा|

धर्म के आधार पर किसी के साथ विभेद नहीं किया जाएगा एवं प्रत्येक व्यक्ति को धर्म की पूर्ण स्वतंत्रता होगी|

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 30 में सभी व्यक्तियों के लिए धार्मिक स्वतंत्रता प्रत्याभूत की गई हैं|

  • एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि पंथनिरपेक्षता संविधान का आधारभूत ढ़ांचा है|

अनुच्छेद 25 (1) के अनुसार- लोक व्यवस्था (Public order) सदाचार (Morality) एवं स्वास्थ्य (health) तथा इस भाग के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए सभी व्यक्तियों को अंत:करण की स्वतंत्रता तथा बिना किसी बाधा के धर्म को मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने की स्वतंत्रता होगी|

  • कृपाण धारण करना तथा लेकर चलना सिखों की धार्मिक स्वतंत्रता का ही अंग माना जाएगा|

अनुच्छेद 25 (2) (क) यह उपबंधित करता है कि- राज्य धार्मिक आचरण से सम्बन्धित किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनैतिक या अन्य लौकिक क्रिया-कलाप का विनिमयन करने के लिए विधि बना सकती है|

अनुच्छेद 25 (2) (ख) यह उपबंधित करता है कि राज्य सामाजिक कल्याण और सुधार करने के लिए या किसी सार्वजनिक प्रकार की हिन्दुओं की धार्मिक संस्थाओं को हिन्दुओं के सभी वर्गों तथा विभागों के लिए खोलने के लिए विधि बना सकता है|

स्पष्टीकरण 2 यह स्पष्ट करता है कि हिन्दू शब्द में सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म मानने वाले भी सम्मिलित है और हिन्दू संस्थानों का अर्थ भी उसी के अनुरूप लगाया जाएगा|

  • अनुच्छेद 25 दो प्रकार के अधिकार प्रदान करता है-
  • अंत:करण की स्वतंत्रता का, तथा
  • बिना किसी बाधा के धर्म को मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने की स्वतंत्रता का|
  • इस अधिकार पर अनुच्छेद 25 में ही निम्नलिखित निर्बन्धन लगाये जा सकते हैं-
  • सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार एवं जनता के स्वास्थ्य के हित में,
  • धर्म से सम्बन्धित आर्थिक वित्तीय तथा राजनीतिक कार्यकलापों के विनियमन के लिए,
  • समाज कल्याण तथा समाज सुधार,
  • इस भाग के अन्य उपबन्धों के अन्तर्गत लगाए जा सकने वाले निर्बन्धन|
  • विजोय इमैनुअल बनाम केरल राज्य, 1986 (3) SCC 615 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि किसी व्यक्ति को राष्ट्रगान गाने के लिए विवश नहीं किया जा सकता है यदि उसका धार्मिक विश्वास उसे ऐसा करने से रोकता हो|
  • जावेद बनाम हरियाणा राज्य, AIR 2003 SC 3057 के मामले में न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि यह नियम कि जिन व्यक्तियों के दो से अधिक बच्चे होंगे वे स्थानीय निकायों का चुनाव लड़ने के अयोग्य होंगे, धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है|
  • रेव स्टेनिस्लाम बनाम म. प्र. राज्य, AIR 1977 SC 908 में धारित किया गया कि अनु. 25 (1) बलात धर्मांतरण कराने का अधिकार नहीं प्रदान करता है|

अनुच्छेद 26 प्रत्येक धार्मिक अनुभाग या उसके किसी वर्ग को निम्नलिखित अधिकार प्रदान करता है-

  • धार्मिक तथा पूर्त उद्देश्यों के लिए संस्थाओं की स्थापना और उसका पोषण करने का
  • अपने धार्मिक मामले के प्रबंधन का
  • चल या अचल सम्पत्ति का अर्जन और उसका स्वामित्व प्राप्त करने का
  • ऐसी सम्पत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन करने का|

उक्त स्वतंत्रताओं पर लोक व्यवस्था, सदाचार तथा स्वास्थ्य के हित में निर्बन्धन लगाया जा सकता है|

धार्मिक अनुभाग अर्थात धार्मिक सम्प्रदाय का अर्थ ऐसे व्यक्तियों के समूह से है जो एक विशिष्ट नाम के तहत संगठित होते हैं तथा जो सामान्यतया एक धार्मिक सम्प्रदाय या संस्था होती है जिसका किसी धर्म विशेष में विश्वास होता है|

अनुच्छेद 26 (घ) के अंतर्गत धार्मिक संस्थाओं से सम्बन्धित सम्पत्ति का प्रबन्धन कार्य राज्य विनियमित कर सकता है किन्तु सम्पत्ति के प्रबन्धन का अधिकार उस सम्प्रदाय विशेष के पास ही रहेगा राज्य यह अधिकार उससे लेकर किसी अन्य व्यक्ति में निहित नहीं कर सकता है|

अनुच्छेद 27- किसी व्यक्ति को किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि या पोषण में व्यय के लिए कोई कर देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा|

अनुच्छेद 28- पूर्णतया राज्य निधि से पोषित शैक्षिक संस्थाओं में किसी प्रकार की कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती है|

अनुच्छेद 28 (2)- यदि कोई ऐसी शिक्षण संस्था जो किसी ऐसे न्यास या विन्यास (Trust or endowment) के अधीन स्थापित की गई है जिसके अनुसार धार्मिक शिक्षा देना आवश्यक है तो खण्ड (1) का प्रतिबन्ध ऐसी शिक्षा संस्था के सम्बन्ध में लागू नहीं होगा अर्थात उस संस्था में धार्मिक शिक्षा देने पर प्रतिबन्ध नहीं होगा|

अनुच्छेद 28 (3)- राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त अथवा अनुदान प्राप्त किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश लेने वाले किसी भी व्यक्ति को इस बात के लिए बाध्य नहीं किया जायेगा कि वह उस संस्था द्वारा प्रदान की जाने वाली धार्मिक शिक्षा में भाग ले या उसमें की जाने वाली धार्मिक उपासना में भाग लें जब तक कि यह स्वयं इसके लिए सहमत नहीं होता या यदि वह व्यस्क है तो उसका संरक्षक इसके लिए अपनी सहमति नहीं देता है|

  • एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, (1994) 3 SCC के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि पंथनिरपेक्षता संविधान का आधारभूत ढांचा है|
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सभी व्यक्तियों को प्राप्त है चाहे वे भारतीय नागरिक हो या विदेशी|
  • अरुणा राय बनाम भारत संघ, AIR 2003 SC 3176 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के नये पाठ्यक्रम को संवैधानिक माना तथा कहा कि यह न तो अनुच्छेद 28 का उल्लंघन करता है और न ही पंथनिरपेक्षता का उल्लंघन करता है|
  • संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार Cultural and Educational Rights (अनुच्छेद 29, 30)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 तथा 30 में संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी मूल अधिकारों का प्रावधान किया गया है|

अनुच्छेद 29 के अंतर्गत अधिकार केवल भारत के नागरिकों को प्राप्त है| इस अनुच्छेद का उद्देश्य अल्प-संख्यक वर्ग के हितों को संरक्षित करना है|

अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण (अनुच्छेद 29)- अनुच्छेद 29 (1) भारत क्षेत्र में रहने वाले “नागरिकों के प्रत्येक वर्ग को, जिनकी अपनी भाषा लिपि या संस्कृति है” उसे बनाये रखने के अधिकार की गारंटी देता है|

अनुच्छेद 29(2) के अनुसार किसी भी नागरिक को राज्य द्वारा घोषित और राज्य निधि से सहायता पाने वाले किसी शिक्षा संस्था में केवल धर्म मूलवंश, जाति या भाषा या इनमें से किसी के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं किया जाएगा|

  • अहमदाबाद सेंट जेवियर कालेज सोसाइटी बनाम गुजरात राज्य, ए. आई. आर. 1974 एस. सी. 1389 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि अनुच्छेद 29 (2) का लाभ केवल अल्पसंख्यक वर्ग को ही नहीं प्राप्त है बल्कि बहुसंख्यक वर्ग को भी इसका लाभ प्राप्त है|
  • शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और उनका प्रबन्धन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार (Right of minorities to establish and administration of educational institution) (अनुच्छेद 30)

अनुच्छेद 30 (1) के अनुसार- धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रूचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन (administration) का अधिकार होगा|

44 वें संविधान संशोधन अधिनियम, द्वारा  1978 अनुच्छेद 30 में खंड (1क) जोड़कर यह उपबंध किया गया कि अल्पसंख्यक वर्ग दवारा स्थापित और  प्रशासित किसी शिक्षा संस्था की सम्पति का यदि अनिवार्य अर्जन किया जाता हे तो समुचित एव पर्याप्त क्षतिपूर्ति दी जानी चाहिए ताकि इस भाग के अधीन प्रत्याभूत अधिकार सीमित या समाप्त न हो जाए|

अनुच्छेद 30(2) – के अनुसार – राज्य शिक्षा संस्थानों को सहायता देने में इस आधार पर विभेद नही करेगा कि वह अल्पसंख्यक वर्ग के प्रबंध में इस आधार पर विभेद नही करेगा की वह अल्पसंख्यक वर्ग के प्रबंध में हे|

अनुच्छेद 30 का उदेश्य अल्पसंख्यको के अधिकारो की रक्षा करना है|  अनुच्छेद 30 अनुच्छेद 29 से अधिक व्यापक अधिकार प्रदान करती है जेसे अपनी रूचि की शिक्षा संसथाओं की स्थपना तथा प्रशासन का अधिकार, जिसमे उन्हें शिक्षा का माध्यम पाठ्यचर्या पढाए जाने वाले विषय आदि को निर्धारित करने का अधिकार सम्मिलित है|

  • सेंट स्टीफेन कालेज बनाम दिल्ली विश्वविद्यालय I SCC 558  के मामले में उच्चतम न्यायालय ने  कहा कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में 50 % अन्य समुदाय के छात्रों को प्रवेश देना होंगा|
  • अहमदाबाद सेंट  जेवियर कालेज बनाम  गुजरात राज्य, AIR 1974  SC 1389 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया सम्बन्धन और मान्यता का अधिकार मूल अधिकार नही है|
  • अनुच्छेद 29 और 30 पर ( अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों ) पर सबसे मत्वपूर्ण निर्णय टी. ऍम. ए. पाई फाउन्डेशन क. लि. बनाम स्टेट ऑफ कर्णाटक, AIR 2003 SC 355 के मामले में उच्चतम की ग्यारह न्यायधीशो की पीठ ने विनिश्चयः किया है कि राज्य और विश्विद्यालय को धार्मिक और शैक्षणिक रूप से अल्पसंख्यको द्वारा चलायी जा रही और गैर सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं में प्रवेस निति के मामले का विनिमयन करने का अधिकार नही है|

 

  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार

(अनुच्छेद 32)

संविधान के अनुच्छेद 32 को सम्विधान की आत्मा कहा गया है|

डॉ भीमराव अम्बेडकर ने कहा था कि “ यदि मुझसे पूछा जाए कि संविधान में कौन सा विशेष अनुच्छेद सबसे महत्वपूर्ण है जिसके बिना यह सम्विधान शून्य हो जाएगा तो मै अनुच्छेद 32  सबसे के सिवाय किसी अन्य अनुच्छेद का नाम नहीं लूगा|

अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को पांच प्रकार की रिट जारी करने की शक्ति है जो कि मूल अधिकारों के उल्लघन होने पर जारी किया जाता है

रिट जारी करने की यह शक्ति संसद किसी अन्य न्यायालय को विधी द्वारा प्रदान कर सकती है|

  • उच्चतम न्यायालय अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत निम्लिखित पांच रिट जारी कर सकता है|
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण
  • परमादेश
  • प्रतिषेध
  • उत्प्रेक्षण
  • अधिकार – पृच्छा
  • एल. चन्द्रकुमार बनाम भारत संघ, AIR 1997 SC 1125 के मामले में माननीय उच्चतम

न्यायालय ने कहा कि न्यायिक पुनर्विलोकन  संविधान का आधारभूत ढांचा है|

अनुच्छेद 32 के अंतर्गत ही लोकहित वाद की अवधारणा विकसित हुई| लोकहित वाद कि अवधारणा का विकास भारत में हुआ | इसके जन्मदाता न्यायमूर्ति पी. ऍम. भगवती माने जाते है|

उपचारात्मक याचिका – के सिद्धांत का प्रतिपादन उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति एस. पी. भरूचा ने रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा, AIR 2002 SC 1771 के वाद में किया|

अनुच्छेद 32 के अंतर्गत राज्य की निति के निदेशक तत्व (Directive Principales of States Policy)

(अनुच्छेद 36 से 51)

सविधान के भाग 4 में राज्य के नितिनिदेश्क तत्वों के बारे में उपबंध किया गया है| अनुच्छेद 36 से 51 तक निति निदेशक तत्वों के बारे में उपबंध किया गया है की निति निदेशक तत्वों से सम्बंधित उपबंध भारतीय सविंधान में आयरलैंड के संविधान से लिया गया है

  • न्यायालय द्वारे निति-निदिशेक तत्वों का परवर्तन नही कराया जा सकता है| यह कल्याणकारी राज्य की संकल्पना पर आधारित है
  • निति निदाशेक तत्वों को डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर ने सविंधान की अनोखी विशेषताए’ कहाँ है
  • 25 वे और 42 वे सविंधान संसोधन द्वारे निदेशक तत्वों को महत्व दिया गया है तथा उन्हें मूल अधिकारों पर वरीयता परदान किया गया है|
  • ग्रीनविल ओस्टिन ने निति-निदेशक तत्वों को “सविंधान की आत्मा” कहाँ है|
  • के0 टी0 शाह ने निति-निदेशक तत्वों को “बैंक का चेक” कहा है निति-निदेशक तत्वों की प्रकर्ति सकरात्मक होती है|

अनुच्छेद 36 में राज्य की परिभाषा वही बताई गयी है जो भाग तीन के अनुच्छेद 12 में प्रावधानित है |

अनुच्छेद 37 के यह कहा गया है की जो भाग चार में उपबंधित प्रवधान किसी न्यायालय द्वारे प्रवर्तनीय नही होंगे इनमे अभिकथित तत्वों देश के साशन ने मुलभुत है तथा विधि के निर्माण में इन तत्वों को लागु करना राज्य का कर्तव्य है|

अनुच्छेद 38 (1) राज्य को यह निदेश देता है की राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि कर के ऐसी प्रत्येक के लिये सुनिश्चित हो|

अनुच्छेद 38 (2) मे यह उपबंधित किया गया की राज्य विशेष रूप से आय की असमानता को कम करने का प्रयास करेगा और न केवल व्यक्ति के बीच बल्कि विभिन्न क्षेत्रो में व्यवसाय में लगे लोगो के बीच प्रतिष्ठा , सुविधाओ और अवसरों की असमानता समाप्त करने का प्रयास करेगा|

अनुच्छेद 39 में उपबंधित है की राज्य अपनी निति का इस प्रकार संचालन करेगा की-

  • पुरुष और स्त्री सभी नागरिको को समान रूप से जीविका ले पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार होगा|
  • समुदाय के भौतिक साधनों का स्वामित्व इस प्रकार बटा हो जिसमे सामूहिक हित का सर्वोतम रूप से साधन हो|
  • आर्थिंक व्यवस्था इस प्रकार चले जिसमे धन और उत्पादन के साधनों का सर्वसाधरण के लिए अहितकारी संकेन्द्र्ण न हो|
  • पुरुस और स्त्री दोनों का समान कार्य के लिया समान वेतन हो|
  • पुरुष आयर स्त्री कर्मकारो के स्वास्थ्य और सकती का तथा बालको की सुकुमार अवस्था का दुरपयोग न हो और आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिको को ऐसे रोजगारो में न जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हो|
  • बालको को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाये दी जाये और बालको तथा अल्पवय व्यक्तियों की शोषण तथा आर्थिक और नैतिक परित्याग से रक्षा की जाए|

सामान न्याय और निश्लुक विधिक सहायता (Equal justice and free legal aid) अनुच्छेद 39 तक राज्य यह सुनिश्चित करेगा की विधिक तंत्र इस प्रकार कार्य करे की समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ सो और यह सुनिश्चित करने के लिए की आर्थिक या किसी अन्य निर्योगता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए| उपयुक्त विधान या योजना द्वारे या किसी अन्य रीति से निशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा, इसे 42 वे सविंधान संशोधन द्वारे अंत: स्थापित किया गया है|

मो0 अहमद बनाम शाहबानो के बाद में सभी भारतीयों के लिए एक सी व्यहवार सहिंता बनाने की बात कही है|

ग्राम पंचायतो का संगठन (Organi-zation of village Panchayat) अनुच्छेद 40-राज्य ग्राम पंचायत का संगठन करने के लिए कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्ति और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उनको स्वायत शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हो|

कुल दशाओ में काम शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार (Right to work, to education and to pub-lic assistance in certain cases) अनुच्छेद 41– राज्य अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमओं के भीतर कम पाने के, शिक्षा पाने के और बेकारी बुढ़ापा, बीमारी और नि;शकता तथा अन्य अनर्ह आभाव में लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त करने का प्रभावी उपबंध करेगा|

अनुच्छेद 42- कम की न्यायसंगत तथा मानवोचित दशाओ का प्रसूति सहायता का उपबंध (Provision for just and Humane Condition and Maternity Relief)-राज्य कम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओ को शुनिचित करने के लिए और प्रसूति सहायता के लिए उपबंध करेगा|

अनुच्छेद 43-कर्मकारो के लिए निर्वाह मजदूरी आदि (living wage, etc. For workers)- राज्य उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से कृषि के, उधोग के या अन्य प्रकार के सभी कर्मकारो को काम, निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवन स्तिर और अवकास का सम्पूर्ण उपभोग सुनिश्चित करने वाले काम की दशाये तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक अवसर प्राप्त कराने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया ग्रामो में कुटीर उधोगो को वैय्तिक्त और सहकारी आधार पर बढ़ाना का प्रयास करेंगे|

अनुच्छेद 43-क-उधोग के प्रबंध में कर्मकारो का भाग लेना (Participation of workers in management of Industries)-राज्य उपयुक्त विधान द्वारा किसी उधोग में कर्मकारो का भाग लेना सुनिश्चित करने के लिए कदम उठायेंग|

[अनुच्छेद 43-ख]- सहकारी सिमितयो की अभिवृद्धि करने का प्रयास करेगा|

अनुच्छेद 44- नागरिको के लिये एक समान सिविल संहिता (Uniform Civil Code for Citizens)- राज्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिको के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेंगे|

अनुच्छेद 45-छ: वर्ष से कम आयु के बालको की देख-रेख एवं शिक्षा का प्रावधान (Provision for early childhood care and education to children below the age of 6 year)-86 वे संविधान संशोधन द्वारा यह व्यवस्था किया गया है की राज्य 6 वर्ष की आयु के सभी बच्चो के पूर्व- बाल्यकाल की देख-रेख और शिक्षा देने का प्रयास करेंगे|

अनुच्छेद 46- अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियो और अन्य दुर्बल वर्गो की शिक्षा तथा अर्थ सम्बंधित हितो की अभिवृद्धि (promotional of educational and economic Interest of schedule cast and schedule tribe and other weaker section)- राज्य जनता के दुर्लब वर्गो के, अनुसूचित जातियों जनजातियो और अनुसूचित जनजातियो के शिक्षा सम्बन्धित हितो की अभिवृद्धि करेगा और सभी प्रकार के शोषण से सुरक्षा करेगा|

अनुच्छेद 47- पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा लोक-स्वास्थ्य का सुधार करने का राज्य का कर्तव्य (Duty of the state to raise the level of nutri-tion and the standard of living and to improve public health)-राज्य अपने लोगो के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने और लोक स्वास्थ्य में सुधार करना अपना प्राथमिक कर्तव्य मानेगा|

अनुच्छेद 48- राज्य कृषि और पशुपालन का संगठन (Organization of Agriculture and Animal Husbandry)- राज्य कृषि और पशुपालन का आधुनिक तथा वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठन करने का प्रयास करेगा|

अनुच्छेद 48-क-पर्यावरण का सरक्षण और  संवर्धन और वन तथा जीवो की रक्षा (protection and improvement of Environment and safeguarding of for- ests and wild life)-राज्य देश के पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन अरु वन तथा वन्य जीवो के रक्षा का प्रयाश करेगा|

अनुच्छेद 50- कार्यपालिका से न्यायपालिका का प्रथक्करण- राज्य की लोकसभा मे कार्यपालिका से न्यायपालिका के प्रथक्करण का राज्य प्रयास करेगा|

अनुच्छेद 51  अंतररास्त शांति एवं सुरक्षा की अभिवर्धि का राज्य प्रयास करेगा|

  • अंतर्राष्ट्रीय शांति एंव सुरक्षा की अभिव्रधि का,
  • राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण सम्बन्धो को बनाये रखने का,
  • संगठित लोगो का एक दूसरे से व्यवहारों में अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधि बाध्यताओ के प्रति आदर बढ़ाने का, और
  • अंतर्राष्ट्रीय विवादों का  माध्यस्थम द्वारा निपटाने को प्रोत्सहन देने का

 महत्वपूर्ण वाद

रणवीर सिंह बनाम भारत संघ के  वाद में समान कार्य के लिए समान वेतन को निति निदेशक तत्व माना गया |

उन्नीक्र्ष्णन बनाम आंध्रप्रदेश राज्य के  मामले में न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया हे कि 6 से 14 वर्ष  तक के बालको को नि:शुल्क  शिक्षा देना राज्य का संवेधानिक दायित्व हे क्योकि शिक्षा पाने का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मूल अधिकार माना गया |

ऍम. एच् हास्टकाट  बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में विधिक सहायता तथा हुस्नआरा खातून बनाम गृह सचिव बिहार राज्य के वाद में शीघ्रता परीक्षण को बन्धियो का मूल अधिकार माना गया |

राष्ट्रपति की शक्तियों पर एक नजर

कार्यपालिका शक्ति सैनिक शक्ति कूटनीतिक शक्ति न्यायिक शक्ति विधायिका शक्ति आपातकालीन शक्तियाँ
 संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है| (अनु.53)|

भारत सरकार की सभी कार्यपालिका कार्यवाहियाँ राष्ट्रपति के नाम से की जाती है| (अनु. 77)|

राष्ट्रपति देश के समस्त उच्चाधिकारियों की नियुक्ति करता है, जैसे –

(1) प्रधानमन्त्री तथा

(2) अन्य मंत्रीगण की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह से करता है|

(3) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश

(4) उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश

(5) राज्यों के राज्यपालों

(6) भारत के महान्यायवादी

(7) भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक

(8) लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यगण

(9) अनुसूचित तथा जनजातियों के लिए विशेष अधिकारी

(10) अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लिए आयोग

(11) पिछड़े वर्गों के लिए आयोग

(12) अल्पसंख्यकों के लिए आयोग तथा विशेष अधिकारी आदि|

(अनु. 76, 124, 148, 155, 217 आदि)

राष्ट्रपति देश के सैन्य बलों थल सेना, वायुसेना तथा नौसेना का सर्वोच्च कमांडर होता है| युद्ध तथा शान्ति की घोषणा राष्ट्रपति के द्वारा ही कह जाती है किन्तु राष्ट्रपति की सैनिक शक्ति कार्यपालिका शक्ति के अधीन है तथा इसका प्रयोग वह मंत्रिपरिषद् की सलाह से करता है| राष्ट्रपति राष्ट्रध्यक्ष के रूप में अन्य देशों के कूटनीतिक प्रतिनिधियों राजदूतों तथा अन्य प्रतिनिधियों का स्वागत करता है| अन्य देशों में भारत के राजदूतों की नियुक्ति करता है| अन्य देशों से संधियाँ तथा समझौते राष्ट्रपति के नाम से किये जाते हैं| अनुच्छेद 72 के अंतर्गत क्षमादान की शक्ति राष्ट्रपति की न्यायिक शक्ति है| इस शक्ति के अंतर्गत राष्ट्रपति किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलम्बन, विराम या परिहार कर सकता है अथवा दंड का निलम्बन परिहार या लघुकरण कर सकता है| ऐसा राष्ट्रपति उन सभी मामलों में कर सकता है जिसमें दंड –

(1) सेना न्यायालय द्वारा दिया गया हो,

(2) संघीय विधि के विरुद्ध अपराध के लिए दिया गया हो|

(3) मृत्यु दंड हो|

संसद, राष्ट्रपति एवं लोकसभा तथा राज्य सभा से मिलकर बनती है| राष्ट्रपति दोनों सदनों का अधिवेशन बुलाता है तथा उनका सत्रावसान करता है वह लोक सभा को भंग कर सकता है| वह संसद के दोनों सदनों के संबोधित करता है| वह दोनों सदनों को संदेश भी भेज सकता है| दोनों सदनों को संदेश भी भेज सकता है| दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति से ही कानून बन सकते हैं| कतिपय विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश से पुर:स्थापित किया जा सकता है|

अनुच्छेद 123 में राष्ट्रपति की अध्यादेश प्रख्यापित

करने की शक्ति का उपबन्ध किया गया है| राष्ट्रपति उस स्थिति में अध्यादेश प्रख्यापित कर सकता है जब संसद के दोनों सदनों का सत्र न चल रहा हो तथा राष्ट्रपति को इस बात का समाधान हो जाए कि ऐसी परिस्थितियां विधमान है जिनमें तत्काल कार्यवाही करना आवश्यक हो गया है तो वह अध्यादेश जारी कर सकता है| राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश का वही बल एवं प्रभाव होगा जो संसद द्वारा पारित विधियों का होता है|

(अनु. 352-360) भारत के संविधान में आपात की उद्घोषणा का प्रावधान तीन विशेष परिस्थितियां उत्पन्न होने पर किया गया है ये परिस्थितियां हैं-

(क) युद्ध, वाह्य आक्रमण या सयंत्र विद्रोह की स्थिति में आपात| (अनु.352)

(ख) राज्यों में संविधानिक तंत्र के विफल होने पर आपात| (अनु. 356)

(ग) वित्तीय आपात (अनु. 360)- राष्ट्रपति भारत या उसके किसी भाग की सुरक्षा संकट में है ऐसा समाधान होने पर या राज्यपाल द्वारा यह पतिवेदन प्राप्त होने पर कि किसी राज्य का संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है या ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर जिसमें भारत की साख या वित्तीय स्थायित्व को खतरा उत्पन्न होने पर आपात की उद्घोषणा कर सकता है|

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भारत का संविधान

गणतीय आंकणों पर आधारित केंद्र राज्य सम्बन्ध

केंद्रीय अनुच्छेद + 89 राज्य अनुच्छेद

नीचे उल्लिखित अनुच्छेदों के प्रावधान समान हैं एवं पूर्वलिखित अनुच्छेद में 89 जोड़ने पर पश्चातवर्ती अनुच्छेद का उपबन्ध प्राप्त होता है जो राष्ट्रपति, राज्यपाल, मंत्रिपरिषद, संसद तथा राज्य विधानमण्डल से सम्बन्ध हैं|

उदाहरणार्थ 72 (राष्ट्रपति के क्षमादान की शक्ति) + 89 = 161 (राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति)

  संघ कार्यपालिका   राज्य कार्यपालिका
अनुच्छेद 72

अनुच्छेद 73

अनुच्छेद 74

अनुच्छेद 75

अनुच्छेद 76

अनुच्छेद 77

अनुच्छेद 78

क्षमा आदि की और कुछ मामलों में दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की राष्ट्रपति की शक्ति

संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार

राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद

मंत्रियों के बारे में अन्य उपबन्ध

भारत का महान्यायवादी

भारत सरकार के कार्य का संचालन

राष्ट्रपति को जानकारी देने आदि के सम्बन्ध में प्राधानमंत्री के कर्तव्य

अनुच्छेद 161

अनुच्छेद 162

अनुच्छेद 163

अनुच्छेद 164

अनुच्छेद 165

अनुच्छेद 166

अनुच्छेद 167

क्षमा आदि की और कुछ मामलों में दंडादेश के निलम्बन, परिहार या लघुकरण की राज्यपाल की शक्ति

राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार

राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद

मंत्रियों के बारे में अन्य उपबन्ध

राज्य का महाधिवक्ता

राज्य की सरकार के कार्य का संचालन

राज्यपाल को जानकारी देने आदि के सम्बन्ध में मुख्यमंत्री के कर्तव्य

  संसद   राज्य की विधान मण्डल
अनुच्छेद 79

अनुच्छेद 80

अनुच्छेद 81

अनुच्छेद 83

अनुच्छेद 84

अनुच्छेद 85

अनुच्छेद 86

अनुच्छेद 87

अनुच्छेद 88

संसद का गठन

राज्य सभा की संरचना

लोक सभा की संरचना

संसद के सदनों की अवधि

संसद की सदस्यता के लिए अर्हता

संसद के सत्र, सत्रावसान और विघटन

सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राष्ट्रपति का अधिकार

राष्ट्रपति का विशेष अभिभाषण

सदनों के बारे में मंत्रियों और महान्यायवादी के अधिकार

अनुच्छेद 168

अनुच्छेद 169

अनुच्छेद 170

अनुच्छेद 172

अनुच्छेद 173

अनुच्छेद 174

अनुच्छेद 175

अनुच्छेद 176

अनुच्छेद 177

राज्यों के विधान मंडलों का गठन

राज्यों में विधान परिषदों का उत्सादन या सृजन

विधान सभाओं की संरचना, अनु. 171

राज्यों के विधान मण्डलों की अवधि

राज्य के विधान मंडल की सदस्यता के लिए अर्हता

राज्य के विधान मण्डल के सत्र, सत्रावसान और विघटन

सदन या सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राज्यपाल का अधिकार

राज्यपाल का विशेष अभिभाषण

सदनों के बारे में मंत्रियों और महाधिवक्ता के अधिकार

 

  संसद के अधिकारी   राज्य के विधान मंडल के अधिकारी
अनुच्छेद 89

अनुच्छेद 90

अनुच्छेद 91

अनुच्छेद 92

अनुच्छेद 93

अनुच्छेद 94

अनुच्छेद 95

अनुच्छेद 96

अनुच्छेद 97

अनुच्छेद 98

अनुच्छेद 99

अनुच्छेद 100

 

अनुच्छेद 101

अनुच्छेद 102

अनुच्छेद 103

अनुच्छेद 104

राज्य सभा का सभापति और उपसभापति

उपसभापति का पद रिक्त होना, और पद में हटाया जाना

सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन करने या सभापति के रूप में कार्य करने की उपसभापति या अन्य व्यक्ति की शक्ति

जब सभापति या उपसभापति को पद से हटाने का कोई संकल्प विचारधीन है तब उसका पीठासीन न होना

लोक सभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष

अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की पद रिक्त होना,

अनुच्छेद के पद के कर्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्ति

जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होगा

सभापति और उपसभापति तथा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते

संसद का सचिवालय

संघ सदस्यों की निरर्हतायें 

सदस्यों द्वारा शपथ, कार्यसंचालन या प्रतिज्ञात

सदनों में मतदान, रिक्तियों के होते हुए भी सदनों की कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति

संघ सदस्यों की निरर्हतायें

स्थानों का रिक्त

सदस्यता के लिए निरर्हताओ से सम्बन्धित प्रश्नों का विनिश्चय

सदस्यों की निरर्हताओं से सम्बन्धित प्रश्नों का विनिश्चय

अनुच्छेद 99 के अधीन शपथ लेने या प्रतिज्ञान करने से पहले या अर्हित न होते हुए या निरर्हित किये जाने पर बैठने और मत देने के लिए शास्ति

अनुच्छेद 178

अनुच्छेद 179

अनुच्छेद 180

अनुच्छेद 181

अनुच्छेद 182

अनुच्छेद 183

अनुच्छेद 184

अनुच्छेद 185

अनुच्छेद 186

अनुच्छेद 187

अनुच्छेद 188

अनुच्छेद 189

अनुच्छेद 190

अनुच्छेद 191

अनुच्छेद 192

अनुच्छेद 193

विधान सभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष

अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना, पद-त्याग और पद से हटाया जाना

अध्यक्ष के पद के कर्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्ति

जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना

विधान परिषद् का सभापति और उपसभापति

सभापति और उपसभापति का पद रिक्त होना, पदत्याग और पद से हटाया जाना

सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन करने या सभापति के रूप में कार्य करने की उपसभापति या अन्य व्यक्ति की शक्ति

जब सभापति या उपसभापति को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना

अध्यक्ष और उपाध्यक्ष तथा सभापति और उपसभापति के वेतन और भत्ते

राज्य के विधान-मण्डल का सचिवालय

संघ कार्यसंचालन

सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान

सदनों में मतदान, रिक्तियों के होते हुए भी सदनों की कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति

राज्य सदस्यों की निरर्हतायें

स्थानों का रिक्त होना

सदस्यता के लिए निरर्हतायें

सदस्यों की निरर्हताओं से सम्बन्धित प्रश्नों का विनिश्चय

अनुच्छेद 188 के अधीन शपथ लेने या प्रतिज्ञा करने से पहले या अर्हित न होते हुए या निरर्हित किये जाने पर बैठने और मत देने के लिए शास्ति|

संसद की तथा उनके सदस्यों और समितियों की         राज्यों के विधानमंडलों तथा उनके सदस्यों और शक्तियाँ विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ                 समितियों की शक्तियाँ विशेषाधिकार और     

                                            उन्मुक्तियाँ

अनुच्छेद 105

अनुच्छेद 106

अनुच्छेद 107

अनुच्छेद 108

संसद के सदनों की तथा उनके सदस्यों और समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार आदि

सदस्यों के वेतन और भत्ते

विधेयकों के पुर:स्थापन और पारित किये जाने सम्बन्ध में उपबन्ध

कुछ दशाओं में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक

अनुच्छेद 194

अनुच्छेद 195

अनुच्छेद 196

अनुच्छेद 197

विधान मण्डलों के सदनों की तथा उनके सदस्यों और समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार आदि

सदस्यों के वेतन और भत्ते

विधेयकों के पुर:स्थापन और पारित किये जाने के सम्बन्ध में उपबन्ध

धन विधेयकों से भिन्न विधेयकों के बारे में विधान परिषद की शक्तियों पर निर्बन्धन

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राष्ट्रपति के क्षमादान को शक्ति

क्षमादान केवल दंड को समाप्त नहीं करता अपितु दण्डित व्यक्ति को उस स्थिति में ला देता है जैसे कि उसने अपराध किया हो न हो अर्थात वह निर्दोष हो जाता है|

अनुच्छेद 72:- राष्ट्रपति को किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहरा दिए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, प्रविलम्बन, विराम या परिहार करने को अथवा दंडादेश के निलम्बन, परिहार या लघुकरण करने को शक्ति प्रदान करता है| क्षमादान का प्रयोग, परिक्षण के पूर्व उसके दौरान और उसके पश्चात सभी स्थितियों में किया जा सकता है|

राष्ट्रपति के क्षमादान की शक्ति का निर्धारण निम्न प्रकार से किया जा सकता है:- निर्धारण मानक

  • राष्ट्रपति को क्षमादान की ब्रिटिश सम्राट के निर्वाध दयाशीलता (Clemency) को सम्प्रभु शक्ति से भिन्न एक संवैधानिक शक्ति है| और इसका प्रयोग राष्ट्रपति के संवैधानिक मापदंडों अर्थात अनुच्छेद 14 के अनुरूप करना होता है|
  • अनुच्छेद 72 की शक्ति एक कार्यपालिकीय शक्ति है और इस शक्ति का प्रयोग करते समय राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के निर्णय में गुणागुण के आधार पर उसका पुनर्विलोकन नहीं करता| क्षमादान की शक्ति न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं अपितु एक स्वतंत्र शक्ति है|
  • राष्ट्रपति से क्षमादान पाने का अधिकार कोई मौलिक अधिकार नहीं है और यह पूर्णतया राष्ट्रपति की वैवेकिक शक्ति है|

अनुच्छेद 72 के अधीन क्षमादान के “तीन आधार” हैं –

  • राष्ट्रपति भारतीय सम्प्रभुता का संवैधानिक घोतक है और यह एक अवशेष शक्ति के रूप में राष्ट्रपति को इसलिए प्रदान की गयी है कि न्यायालय के निर्णय के पश्चात भी उसके साथ तनिक भी अन्याय होने की सम्भावना न शेष रहे|
  • हो सकता है, न्यायालय द्वारा किसी सामग्री पर त्रुटिवश विचार न किया गया हो अथवा किसी तथ्य का पता निर्णय के पश्चात चला हो|
  • कोई तथ्य न्यायालय के समक्ष ही न रखा गया हो,

उचित ढंग से प्रस्तुत ही नहीं किया गया हो,

दंडादेश के पश्चात किसी तथ्य की खोज हुई हो, अथवा

दंडादेश के पश्चात असाधारण परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हो|

अन्य कोई विशेष कारण|

  1. पंजाब राज्य vs जोगिन्दर सिंह तथा अशोक कुमार बनाम भारत संघ के मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 72 निरपेक्ष है और किसी भी संवैधानिक प्रावधान द्वारा इसमें न्यूनतम नहीं किया जा सकता और न ही इसमें छेड़छाड़ की जा सकती है|
  1. मारू राम बनाम भारत संघ AIR 1980 S.C के मामले में S.C ने अनुच्छेद 14 के कठोर संवैधानिक मापदंडो के अनुरूप किया जाएगा| अनुच्छेद 72 के प्रयोग के तीन मानक नियत किए थे –
  • इसका प्रयोग अनुच्छेद 14 के कठोर संवैधानिक मापदंडो के अनुरूप किया जाएगा|
  • राष्ट्रपति इसका प्रयोग केवल मंत्रिपरिषद के सलाह से ही कर सकते हैं|
  • राष्ट्रपति को क्षमादान आदेश के विरुद्ध न्यायालय की पुनर्विलोक की शक्ति अत्यधिक सीमित है क्योंकि न्यायालय राष्ट्रपति के विवेद को परख नहीं कर सकता| न्यायालय के पुनर्विलोक का आधार, दुर्भावना, पक्षपात, अथवा असावधानी हो सकती है| यदि वह अनुच्छेद के मापदण्डों का पालन नहीं करती|
  1. केहरसिंह बनाम भारतसंघ AIR 1989 S.C के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा निम्न सिद्धांत दिए गये हैं –
  • क्षमादान संवैधानिक योजना का एक भाग है| अनुच्छेद 72 द्वारा राष्ट्रपति आपराधिक मामलों में साक्ष्य की जांच कर सकते हैं तथा न्यायालय से भिन्न निर्णय दे सकते हैं|
  • न्यासिक पुनर्विलोकन की शक्ति राष्ट्रपति के शक्ति तक सीमित है, इसका विस्तार यहाँ तक नहीं हो सकता कि क्षमादान की शक्ति का प्रयोग गुण दोषों के आधार पर किया गया था नहीं राष्ट्रपति के शक्ति का प्रयोग न्यासिक क्षेत्राधिकार के अधीन है तथा न्यासिक पुनर्विलोकन के माध्यम से इसकी जांच की जा सकती है|
  • याची को मौलिक रूप से सुना जाना पूर्णतया राष्ट्रपति के विवेकाधिकार के अधीन है| इसके लिए अभियुक्त दबाव नहीं डाल सकता|
  • अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को अपने अधिकार के प्रयोग के लिए किसी सुपरिभाषित निर्देश को मानने की बाध्यता नहीं होती|
  1. इपउ शंकर बनाम आंध्र प्रदेश राज्य 2006 S.C के मामले में S.C ने दो प्रमुख प्रतिपाद्नाएकी है –
  • अनुच्छेद 72 तथा 161 के अधीन राष्ट्रपति व राज्यपाल के क्षमादान की शक्ति संवैधानिक शक्ति है और यह न्यासिक पुनर्विलोकन के अधीन है और क्षमादान देने अथवा न देने के आधारों का न्यासिक पुर्विलोकन किया जा सकता है|
  • किन्तु न्यायालय, राष्ट्रपति व राज्यपाल के आदेश में हस्तक्षेप तभी करेगा| जब सुसंगत तथ्यों की अपेक्षा की गयी हो अथवा बाध्य व निरर्थक सामग्री का विचार करके क्षमादान दिया गया हो अथवा ठुकराया गया हो और मस्तिष्क का प्रयोग किए बगैर ही मशीनी ढंग से उसकी निस्तारण कर दिया गया हो| अत: राष्ट्रपति या राज्यपाल का विवेक अनुच्छेद 14 के अनुरूप होना चाहिए अन्यथा न्यायालय उसके आदेश को अवैध घोषित करके उसे निरस्त कर सकता है|
  1. शत्रुध्न चौहान बनाम भारत संघ 21 jan 2014 S.C के मामले में अनुच्छेद 72/161 के अधीन शक्तियों का निर्धारण विस्तृत ढंग से किया गया|
  • अनुच्छेद 32 के अधीन अनुच्छेद 72/161 के राष्ट्रपति के आदेश को परिणाम में चूंकि अनुच्छेद 21 का प्रश्न विहित है| इसलिए दोषसिद्ध व्यक्ति के अलावा उसका परिवार या लोकहित याचिका के रूप में दायर की जा सकती है|
  • अनुच्छेद 72/161 के अधीन राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति उच्चतम न्यायालय के न्यासिक शक्ति से सर्वधा भिन्न है| इसके अधीन राष्ट्रपति या राज्यपाल उच्च अथवा उच्चतम न्यायालय के दण्डो की वैधता नहीं परखता बल्कि संवैधानिक शक्ति के अधीन लोकहित समाज पर दंडादेश का प्रभाव को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है|

अनुच्छेद 72 के प्रयोग में राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के विरुद्ध अपीलीय न्यायालय के रूप में नहीं बैठता अपितु यह शक्ति उसको संवैधानिक गरिमा, मानवीयता अथवा अन्य यथोचित परिस्थितियों को ध्यान में रखकर उसे प्रदत्त की गयी है और उसको प्रकृति भिन्न निरपेक्ष तथा गैर असीमित [distinct, absolute and undetermined] है

  • अनुच्छेद 72 ब्रिटिश सम्राट की सम्प्रभुता पर आधारित दयाशीलता की शक्ति नहीं अपितु अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह एक संवैधानिक शक्ति है|
  • क्षमादान की शक्ति के सन्दर्भ में S.C के पुनर्विलोकन की शक्ति अत्यंत सीमित है और वह केवल malafide तथा विवेकहीन प्रयोग तक सीमित है|
  • राष्ट्रपति के वैवेकीय शक्ति को किसी संविधानिक प्राधिकार छीना नहीं जा सकता अथवा न ही किसी नियम द्वारा इसमें संशोधन अथवा हस्तक्षेप किया जा सकता है|
  • अनुच्छेद 32 के अधीन याचिका में राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान करने में विलम्ब एकमात्र आधार नहीं हो सकता|

राष्ट्रपति या राज्यपाल की क्षमा याचिका के आदेश की पुनर्विलोकन द्वारा न्यायालय वास्तव में 72/161 में हस्तक्षेप नहीं करता सिद्ध व्यक्ति के जीवन सुरक्षा की जो अनुच्छेद 21 के अनुरूप उपलब्ध है| सुरक्षा प्रदान करता है|

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संघ की न्यायपालिका (The Union Judiciary)

(अनुच्छेद 124–147)

 

उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन (अनुच्छेद 124)- भारत के संविधान के भाग 5 के अध्याय 4 में (अनुच्छेद- 124-147) में संघ की न्यायपालिका के सम्बन्ध में प्रावधान किया गया है|

अनुच्छेद 124(1) के अनुसार भारत का एक उच्चतम न्यायालय होगा|

उच्चतम न्यायालय का गठन मुख्य न्यायमूर्ति तथा 30 अन्य न्यायाधीशों से मिलकर होगा (2009 में संसद ने न्यायधीशों की संख्या 30 कर दी)

  • मूल संविधान में न्यायाधीशों की संख्या मुख्य न्यायमूर्ति सहित कुल आठ थी|
  • अनुच्छेद 124 (2) के अनुसार न्यायाधीशों की नियुक्ति, राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करने के पश्चात करता है जैसा कि यह आवश्यक समझे|
  • उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक पद धारण करता है|
  • मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की स्थिति में राष्ट्रपति को मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करना आवश्यक है|
  • एस. सी. एडवोकेट्स आन रिकार्ड एसोसियेशन बनाम भारत संघ, (1993) 4 एस. सी. सी. 44, के मामले में यह धारित किया गया कि उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश द्वारा इन न्यायाधीशों से परामर्श करके की गयी सिफारिश को राष्ट्रपति प्राथमिकता देगा|
  • इन. सी प्रेसिडेंसियल रिफरेन्स, ए. आई. आर. 1999 एस. सी. 1 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि कार्यपालिका मुख्य न्यायाधीश की ऐसी सिफारिश को मानने के लिए बाध्य नहीं है जो उसने न्यायमूर्तिगण की कॉलेजियम से परामर्श किये बिना की है| कलेजियम भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों से मिलकर गठित होनी चाहिए:
  • भारत के मुख्य न्यायाधीश की व्यक्तिगत परामर्श अनुच्छेद 124 (2) के अंतर्गत ‘परामर्श’ नहीं है|
  • सामान्यत: उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश को ही न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है| किन्तु 1973 में इस परम्परा से विचलन दृष्टिगत हुआ जब तीन वरिष्ठ न्यायाधीशगण को उपेक्षित करते हुए न्यायमूर्ति ‘ए. एन. रे’ को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया| यह निर्णय बहुत विवादास्पद रहा किन्तु इसके पश्चात इस पुरानी परम्परा को बनाये रखा गया|
  • अनुच्छेद 124(3) के अनुसार उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए निम्नलिखित अर्हतायें होनी चाहिए-
  • वह भारत का नागरिक हो;
  • वह किसी उच्च न्यायालय का या ऐसे दो न्यायालयों का लगातार कम से कम पांच वर्ष तक न्यायाधीश रहा हो;
  • किसी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में 10 वर्षों तक अधिवक्ता रहा हो;
  • राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता हो|
  • अनुच्छेद 124(4) के अनुसार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को साबित कदाचार तथा असमर्थता के आधार पर पद से हटाया जा सकता है|

उक्त आधार पर संसद के दोनों सदनों द्वारा एक ही सत्र में प्रस्तुत किये गये समावेदन पर राष्ट्रपति, न्यायाधीशों को हटा सकता है| समावेदन संसद के प्रत्येक सदन के कुल सदस्य संख्या के बहुत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो तिहाई बहुमत से समर्थित होना चाहिए|

उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश राष्ट्रपति को सम्बोधित कर सकता है| हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पदत्याग कर सकता है|

उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश रहा है सेवा निवृत्ति के पश्चात न्यायालय में या प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन या कार्य नहीं करेगा|

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को दिया जाने वाला वेतन संविधान के अंतर्गत निर्धारित है| संविधान के अनुच्छेद 125 (1) में या उपबंधित किया गया है कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को वह वेतन दिया जाएगा जो-

  • संसद विधि द्वारा अवधारित करे, या
  • ऐसे अवधारण के अभाव में दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट वेतन दिया जाएगा|

न्यायाधीशों का वेतन- दूसरी अनुसूची में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का वेतन 1,00,000 रूपये तथा अन्य न्यायाधीशों का वेतन 90,000 रूपये निर्धारित किया गया है|

न्यायाधीशों की नियुक्ति- अनुच्छेद 126 के अनुसार राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को कार्यवाही मुख्य न्यायाधीश (Acting C.J.) नियुक्त कर सकता है जब-

  • मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त हो, या
  • वह अपने पद के कर्तव्यों के पालन में अन्युपस्थिति के कारण या अन्यथा असमर्थ हो|

अनुच्छेद 127 तदर्थ न्यायाधीश की नियुक्ति के सम्बन्ध में प्रावधान किया गया है जो निम्नवत है-

यदि उच्चतम न्यायालय के सत्र को चालू रखने हेतु न्यायाधीशों की गणपूर्ति पर्याप्त नहीं है तब उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने की सम्यक योग्यता रखता हो तदर्थ न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता है|

  • तदर्थ न्यायाधीश की नियुक्ति भारत का मुख्य न्यायाधीश करता है:
  • राष्ट्रपति की पूर्व सहमति, एवं
  • सम्बन्धित राज्य के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से करता है|
  • तदर्थ न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के कर्तव्यों का निर्वहन करता है तथा उसे उसी की भाँति क्षेत्राधिकार, शक्ति एवं उन्मुक्तियाँ प्राप्त होंगी|

अनुच्छेद 128 में उपबंधित है कि भारत का मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति से पूर्व अनुमति लेकर उच्चतम न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश से अनुरोध कर सकेगा कि वह उच्चतम न्यायालय के रूप में कार्य करे|

सेवानिवृत्त न्यायाधीश यदि सहमत है तभी उससे कार्य करने की अपेक्षा की जाएगी अन्यथा नहीं|

उच्चतम न्यायालय का क्षेत्राधिकार एवं शक्ति (Jurisdiction of Supreme Court)- उच्चतम न्यायालय को निम्नलिखित क्षेत्राधिकार है-

  • अभिलेख न्यायालय (A Court of Record) (अनुच्छेद 129)
  • प्रारम्भिक या मूल क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction) (अनुच्छेद 71, 32 एवं 131)
  • अपीलीय क्षेत्राधिकार (Appellate Jurisdiction) [(अनुच्छेद 132, 133, 134, 136)]
  • सलाहकारी क्षेत्राधिकार (Advisory Jurisdiction) [(अनुच्छेद 143)]
  • पुनर्विलोकन की शक्ति (अनुच्छेद 137)
  • मामले के अंतरण की शक्ति (अनु. 139क)
  • आनुषंगिक शक्तियाँ (अनुच्छेद 140)
  • नियम बनाने की शक्ति (अनुच्छेद 145)
  • उच्चतम न्यायालय की डिक्रियों और आदेशों के प्रवर्तन आदि के बारे में आदेश (अनुच्छेद 142)

उच्चतम न्यायालय का क्षेत्राधिकार एवं शक्तियाँ

अभिलेख      आनुषंगिक             पुनर्विलोकन की शक्ति        मामले के    उच्चतम न्यायालय       सलाहकारी

न्यायालय     शक्तियाँ               अनुच्छेद 137              अंतरण की    की डिक्रियों आदि         क्षेत्राधिकार

अनु. 129     अनु. 140                                       शक्ति         के प्रवर्तन के           अनु. 143

अनु. 139A    बारे में आदेश

प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार                                    अनु. 142

राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति     रिट क्षेत्राधिकार  अनन्य क्षेत्राधिकार                               नियम बनाने

का निर्वाचन से सम्बन्धित     अनुच्छेद 32      अनुच्छेद 131                                  की शक्ति

विवाद अनुच्छेद 71                                                                      अनु. 145                                                 अपीलीय क्षेत्राधिकार

संवैधानिक मामले       दीवानी मामले          विशेष अनुमति      आपराधिक मामले

अनुच्छेद 132          अनुच्छेद 133          से अपील            अनुच्छेद 134

अनुच्छेद 136

  • अभिलेख न्यायालय (Court of Record)

अनुच्छेद 129 के अनुसार उच्चतम न्यायालय –

  • अभिलेख न्यायालय होगा, तथा
  • उसे अपने अवमान के लिए दंड देने की शक्ति होगी| अभिलेख न्यायालय से तात्पर्य ऐसे न्यायालय से है जिसके निर्णयों के साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर लिये जाते हैं और वे आबद्धकर प्रभाव रखते हैं| भारतीय संविधान उच्चतम न्यायालय को अपने अवमानना के लिए (For contempt) दंड देने की शक्ति प्रत्यक्ष रूप से प्रदान करता है|
  • दिल्ली न्यायिक सेवा संघ बनाम गुजरात राज्य, ए. आई. आर. 1991 एस. सी. 2177 : (1991) 4 एस. सी. सी. 406 में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि एक उच्चतर न्यायालय (Superior Court) न्यायालय को अपने स्वयं के अवमान के साथ ही अधीनस्थ (निम्न या Inferior) न्यायालयों का अवमान करने वाले व्यक्तियों को दण्डित करने की अंतर्निहित शक्ति है|
  • इन री विनय चन्द्र मिश्र, (1995) 2 एस. सी. सी. 584 में धारित किया गया कि उच्चतम न्यायालय को अनुच्छेद 129 तथा 142 के अधीन अवमानना करने वाले व्यक्ति पर स्वप्रेरणा पर (suo motu) कार्यवाही करके दण्डित करने का अधिकार है| अनुच्छेद 129 तथा 142 के अंतर्गत न्यायालय की यह शक्ति किसी अधिनियम द्वारा परिसीमित नहीं की जा सकती है|
  • सुप्रीम कोर्ट बार एसोसियेशन बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 1998 एस. सी. 1895 के मामले में इन री विनय चन्द्र मिश्र मामले में दिये गये अपने पूर्व के निर्णय को उलट दिया तथा निर्णय दिया कि अवमानना के लिए दण्डित करने की न्यायालय की अनुच्छेद 129 के अंतर्गत शक्ति अत्यंत व्यापक है फिर भी इतनी व्यापक नहीं है कि अधिवक्ता अधिनियम में निर्धारित प्रक्रिया को नजरअंदाज करके यह अभिनिर्धारित कर सके कि कोई अधिवक्ता वृत्तिक कदाचार का दोषी है| अनुच्छेद 142 के अंतर्गत पूर्ण न्याय करने की शक्ति एक सुधारक (Corrective) शक्ति है जो साम्य को विधि पर वरीयता देती है किन्तु न्यायालय अवमान के मामले का निपटारा करते समय उसका प्रयोग अधिवक्ता अधिनियम में विहित प्रक्रिया के सम्यक रूप से पालन किये बिना किसी अधिवक्ता के विधि व्यवसाय करने के लाइसेंस को संक्षिप्त प्रक्रिया से निलम्बित करने के लिए नहीं किया जा सकता है|
  • उच्चतम न्यायालय का प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction of Supreme Court) –
  • राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से सम्बन्धित विवाद उच्चतम न्यायालय द्वारा ही निर्णित किये जाते हैं|
  • मूल अधिकारों का प्रवर्तन (Information of Fundamental Rights)

अनुच्छेद 32 के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति अपने मूल अधिकारों का अतिलंघन होने पर उपचार के लिए रिट के माध्यम से उच्चतम न्यायालय में समावेदन कर सकता है| उच्चतम न्यायालय मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए पांच प्रकार की रिटें, अर्थात –

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)
  • परमादेश (Mandamus)
  • प्रतिषेध (Prohibition)
  • अधिकारपृच्छा (Quo Warranto)
  • उत्प्रेषण (Certiorary)

जारी कर सकता है|

  • अनन्य क्षेत्राधिकार (Exclusive Jurisdiction) (अनुच्छेद 131)-
  • उच्चतम न्यायालय को निम्नलिखित विवादों के सम्बन्ध में अनन्य क्षेत्राधिकार प्राप्त है अर्थात ऐसे विवाद जो –
  • भारत सरकार तथा एक या अधिक राज्यों के बीच है;
  • भारत सरकार तथा एक या अधिक राज्य एक ओर तथा दूसरी ओर एक या अधिक राज्यों के बीच विवाद;
  • दो या दो से अधिक राज्यों के बीच विवाद

अनुच्छेद 131 के परन्तुक में उन स्थितियों को भी बताया गया है जिनमें प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार का उपबन्ध लागू नहीं होता है, अर्थात-

  • संविधान से पहले किये गये किसी संधि, करार, प्रसंविदा, वचनबंध, संसद या वैसे ही लिखत से उत्पन्न विवाद|
  • उपर्युक्त विषयों के संबंध में क्षेत्राधिकार लागू नहीं होगा यदि ऐसी संधि, करार, प्रसंविदा के प्रारम्भ के पश्चात भी जारी है या
  • जिसमें यह उपबंधित है कि उक्त अधिकारिता का विस्तार ऐसे विवाद पर नहीं होगा|

अपीलीय क्षेत्राधिकार

(Appellate Jurisdiction)

उच्च न्यायालय द्वारा सिविल, दांडिक या अन्य कार्यवाही में दिये गये निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील हो सकती है यदि-

  • उच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 134-क के अंतर्गत प्रमाण पत्र दे दिया हो,
  • प्रमाण-पत्र संविधान के निर्वचन से संबंधित विधि का सारवान प्रश्न अन्तर्वलित होने से सम्बन्धित हो,
  • प्रमाण-पत्र में प्रश्न का विनिश्चय अनुचित है|
  • सिविल मामलों में अपीलीय क्षेत्राधिकार अनुच्छेद 133 (Appellate Jurisdiction in Civil Cases)

डिक्री कार्यवाही में उच्च न्यायालय द्वारा दिए गये निर्णय डिक्री या अंतिम आदेश की अपील उच्च न्यायालय में होगी यदि-

  • इस मामले में व्यापक महत्व का कोई सारवान विधिक प्रश्न अन्तर्वलित है, और
  • उच्च न्यायालय की राय में उस प्रश्न का उच्चतम न्यायालय के द्वारा विनिश्चय किया जाना आवश्यक है,
  • उपर्युक्त आशय का प्रमाण-पत्र उच्च न्यायालय के द्वारा प्रदान कर दिया गया है|

ऐसी अपील में यह प्रश्न भी आधार के रूप में उठाया जा सकता है कि मामले में संविधान के निर्वाचन से सम्बन्धित विधि का सारवान प्रश्न अंतर्विष्ट है|

उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश के निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश की अपील उच्चतम न्यायालय में तब तक नहीं होगी जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंधित न करे|

दांडिक मामलों में अपीलीय क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 134)

(Appellate Jurisdiction in Criminal matters)

किसी उच्च न्यायालय द्वारा दांडिक कार्यवाही में दिये गये किसी निर्णय अंतिम आदेश या दंडादेश की अपील उच्चतम न्यायालय में होगी यदि –

  • उच्च न्यायालय ने अपील में दोषमुक्ति के आदेश को उलट दिया हो तथा अभियुक्त को मृत्युदंड दिया हो
  • उच्च न्यायालय ने अपने अधीनस्थ न्यायालय से किसी मामले को विचरण के लिए अपने पास मंगा लिया हो और अभियुक्त को सिद्धदोष द्ख्हराते हुए मृत्युदंड दिया हो
  • उच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 134-क के अधीन प्रमाणित कर दिया हो कि मामला उच्चतम न्यायालय में अपील किये जाने योग्य है|

अपील के लिए उच्चतम न्यायालय की विशेष अनुमति (अनुच्छेद 136)   

(Special leave to appeal by the Supreme Court)

उच्चतम न्यायालय भारत के राज्यक्षेत्र में स्थित किसी न्यायालय या न्यायाधिकरण द्वारा पारित निर्णय, आदेश या दंडादेश के विरुद्ध अपील के लिए विशेष इजाजत दे सकता है|

सशस्त्र बलों से सम्बन्धित किसी विधि द्वारा गठित किसी न्यायालय या न्यायाधिकरण द्वारा पारित किये गये किसी निर्णय, अवधारणा, दंडादेश या आदेश को अनुच्छेद 136 लागू नहीं होगा|

अनुच्छेद 136 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय की शक्ति वैवेकीय शक्ति है|

अनुच्छेद 136 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय उच्च-न्यायालयों के निर्णयों के साथ ही साथ किसी भी अधीनस्थ नयायालय के निर्णय से अपील ग्रहण कर सकता है|

उच्चतम न्यायालय किसी भी न्यायालय के चाहे वह सिविल, दांडिक, राजस्व या श्रमिक विवादों से सम्बन्धित हो के अंतिम या अंतरिम आदेशों से अपील ग्रहण कर सकता है चाहे विधि में अपील का कोई उपबन्ध न हो|

पुनर्विलोकन की शक्ति (अनुच्छेद 137)

(Power of Review)

उच्चतम न्यायालय को अपने द्वारा दिये गये निर्णयों या आदेशों के पुनर्विलोकन की शक्ति है|

अनुच्छेद 139 के अंतर्गत संसद उच्चतम न्यायालय को अनुच्छेद 32 के खण्ड (1) में वर्णित प्रयोजनों से भिन्न प्रयोजनों के लिए भी निदेश आदेश या रिट निकालने की शक्ति प्रदान कर सकती है|

कुछ मामलों का अंतरण करने की उच्चतम न्यायालय की शक्ति

(अनुच्छेद 139 क)

42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा अनुच्छेद 139-क संविधान में जोड़ा गया|

अनुच्छेद 139-क के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय किसी मामले को किसी भी उच्च न्यायालय से मंगा कर उसका निपटारा कर सकता है|

अनुच्छेद 139-क के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को यह भी शक्ति है कि वह किसी मामले के निपटारे के लिए एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय को अंतरित कर सकता है|

उच्चतम न्यायालय ऐसा –

  • स्वप्रेरणा पर, या
  • भारत के महान्यायवादी द्वारा किये गये आवेदन पर

अथवा

  • किसी पक्षकार द्वारा किये गये आवेदन पर ही कर सकता है यदि उस मामले में-

व्यापक महत्व का विधि का सारवान प्रश्न अंतर्ग्रस्त है|

सलाहकारी क्षेत्राधिकार (Advisory Jurisdiction) अनुच्छेद 143- यदि राष्ट्रपति की राय में सार्वजनिक महत्व का ऐसा प्रश्न उत्पन्न हो गया है या उत्पन्न होने की संभावना है जिस पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करना समीचीन है तो वह उस प्रश्न पर विचार करने के लिए उसे उच्चतम न्यायालय को निर्देशित कर सकता है|

उच्चतम न्यायालय उस प्रश्न पर सुनवाई करने के पश्चात अपनी राय राष्ट्रपति को दे सकता है|

ऐसे प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय में कम से कम पांच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा सुनवाई की जाती है|

उच्चतम न्यायालय ऐसे प्रश्न पर राय देने के लिए बाध्य नहीं है अत: वह समुचित मामलों में परामर्श देने से मना कर सकता है| इस्माइल फारूख बनाम भारत संघ, ए. आई. आर. 1994 एस. सी. 605 : (1994) 6 एस. सी. सी. 360

26 जनवरी 1950 से अब तक उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित ग्यारह मामलों में परामर्श दिया है :

  • इन री देलही लाज एक्ट, ए. आई. आर. 1951 एस. सी. 332
  • इन री केरल एजूकेशन बिल, ए. आई. आर. 1958 एस. सी. 956
  • इन री बेरुबारी, ए. आई. आर. 1960 एस. सी. 845
  • इन री दी सी कस्टम्स एक्ट, ए. आई. आर. 1963 एस. सी. 1760
  • केशव सिंह, ए. आई. आर. 1956 एस. सी. 745
  • इन री प्रेसिडेंसियल पोल, ए. आई. आर. 1979 एस. सी. 1682
  • दी स्पेशल कोर्ट रिफरेन्स केस, ए. आई. आर. 1979 एल. सी. 478
  • कावेरी जल विवाद अधिकरण, ए. आई. आर. 1992 एस. सी. 522
  • अयोध्या के राममन्दिर का मामला
  • उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण का मामला, ए. आई. आर. 1999 एस. सी. 1
  • स्पेशल रिफरेन्स 2002, ए. आई. आर. 2003 एस. सी. 87
  • पदच्युत की प्रक्रिया
  • उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को पदच्युत करने की प्रक्रिया| (अनुच्छेद 124 (4)
  • उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है|
  • सिद्ध कदाचार तथा अक्षमता के आधार पर संसद के दोनों सदनों के बहुमत तथा उपस्थिति एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित समावेदन के आधार पर उन्हें हटाया जा सकता है|
  • इस प्रस्ताव को महाभियोग कहा जाता है|
  • अनुच्छेद 141 के अनुसार उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि सभी अधीनस्थ न्यायालयों पर आबद्धकर होती है|
  • बंगाल इम्युनिटी कम्पनी बनाम बिहार राज्य, ए. आई. आर. 1955 एस. सी. 661 के मामले में भी उच्चतम न्यायालय ने उक्त निर्णय दिया|
  • उच्चतम न्यायालय अपने निर्णयों से बाध्य नहीं है तथा वह अपने निर्णयों को बदल सकता है|

न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review)

न्यायिक पुनर्विलोकन न्यायपालिका में निहित वह शक्ति है जिसके अंतर्गत वह विधायिका द्वारा निर्मित विधि या कार्यपालिकीय कृत्य को असंवैधानिक घोषित करती है| भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति प्राप्त है|

न्यायिक पुनर्विलोकन संविधान को संरक्षित करने का एक साधन है क्योंकि संविधान सरकार एवं विभिन्न विधानमण्डलों की सीमा निर्धारित करता है उन सीमाओं के अतिक्रमण की स्थिति में न्यायालय को न्यायिक पुनर्विलोकन द्वारा सही स्थिति के अवधारणा की शक्ति प्राप्त हो जाती है|

भारत के संविधान के निम्नलिखित अनुच्छेदों में अभिव्यक्त या विवक्षित (Implied) रूप से न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति निहित है-

  • अनुच्छेद 13 (2) अनुच्छेद 32 एवं अनुच्छेद 226 है
  • अनुच्छेद 245, 246, 254
  • अनुच्छेद 137

भारत के संविधान के अंतर्गत विधायिकाओं पर निम्नलिखित परिसीमायें हैं-

  • मूल अधिकार
  • संविधान द्वारा प्रगणित विधायी क्षमता
  • विशिष्ट विषयों के बारे में सीमाओं का अधिरोपण करने वाले संविधान के अन्य उपबन्ध
  • न्यायिक पुनर्विलोकन सर्वप्रथम अमेरिकी न्यायमूर्ति जान मार्शल द्वारा 1803 में मारबरी बनाम मेडिसन के मामले में प्रारम्भ किया गया|

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