CONTRACT

CONTRACT

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प्रतिफल (Consideration)

CLASS LECTURE – 4


MAINS QUESTIONS

 
  1. प्रतिफल से आप क्या समझते है? क्या भारतीय विधि में प्रतिफल प्रतिज्ञाग्रहीता के अलावा किसी अजनवी व्यक्ति द्वारा भी दिया जा सकता है?
 
  1. वचनात्मक विबन्ध के सिद्धान्त से आप क्या समझते हैं? अंग्रेजी और भारतीय विधि के सन्दर्भ में उपयुक्त उदाहरणों की सहायता से समझाइये?
 
  1. प्रतिफल को परिभाषित कीजिए। इसके आवश्यक तत्वों का उल्लेख विधिक प्रावधानों एवं निर्णीत वादों की सहायता से कीजिए।
 
  1. “प्रतिफल का अजनवी दावा कर सकता है, किन्तु संविदा का अजनवी दावा नही कर सकता है” इस सबंध में भारतीय विधि एवं अंग्रेजी विधि का तुलनात्मक विश्लेषण करते हुए उपरोक्त नियम को समझाइए।
 
  1. “भूतकालीन प्रतिफल एक अच्छा प्रतिफल होता है” इस नियम को उदाहरण सहित समझाइए।

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प्रतिफल (Consideration)

CLASS LECTURE – 4

 

 अर्थ और परिभाषा

 आवश्यक तत्व

 भारतीय और अंग्रेजी विधि में अन्तर

 वचनात्मक विबन्ध का सिद्धान्त

प्रतिफल का अर्थ और परिभाषा (Meaning and Definition of Consideration)

एक पक्ष किसी कार्य को करने या न करने के बदले में दूसरे पक्ष से जो कुछ वस्तु या धन प्राप्त करता है, वह कानूनी दृष्टि से “ प्रतिफल” कहलाता है। इस प्रकार, संक्षेप मे हम कह सकते हैं कि कुछ के बदले कुछ (Something for something) ही ‘प्रतिफल’ होता है। जस्टिस लश द्वारा “क्यूरी बनाम मीसा में प्रतिफल की परिभाषा देते हुए कहा गया है, “कानून की दृष्टि मे मूल्यवान प्रतिफल वह है जिसमें एक पक्ष को कुछ अधिकार, हित या लाभ प्राप्त हो या जिसके कारण दूसरा पक्ष कुछ हानि या दायित्व उठाये या उठाने का वचन दे।“

धारा 2 (घ) के अनुसार-

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तब ऐसा कार्य या संयम या वचन उस वचन का प्रतिफल कहलाता है।

उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार प्रतिफल (i) भूतकाल (ii) वर्तमान काल (iii) भविष्य काल से सम्बन्धित है। संक्षेप मे, उपर्युक्त परिभाषाओं के विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि एक व्यक्ति की इच्छा पर अन्य व्यक्ति द्वारा कोई कार्य करना या न करना ही उस प्रथम व्यक्ति के लिये प्रतिफल है।

जैसेः- ‘क’ अपने मकान को दस लाख रुपये में ‘ख’ को बेचने का समझौता करता है। यहाँ पर दस लाख रुपये देने की ‘ख’ की प्रतिज्ञा, मकान को बेचने की ‘क’ की प्रतिज्ञा के लिए प्रतिफल है।

(2) प्रतिफल का आवश्यक तत्व (Essontials of consideration)

(i) कार्य या संयम प्रतिज्ञाकर्ता की इच्छा पर होना चाहियेः- प्रतिफल रूपी कोई कार्य या संचम प्रतिज्ञा कर्ता की इच्छा पर ही किया जाना चाहिये। यदि कोई कार्य किसी तीसरे पक्ष के कहने या प्रतिज्ञाकर्ता की इच्छा के बिना ही किया गया है तो वह प्रतिफल नहीं हो सकता। यह आवश्यक नहीं है कि प्रतिज्ञाकर्ता को प्रतिफल से कुछ लाभ ही हो। यदि लाभ न भी हो, तो भी यदि प्रतिज्ञाकर्ता की इच्छा पर प्रतिज्ञाग्रहीता ने कोई कार्य कर दिया है, तो वह वैध प्रतिफल माना जायेगा इससे सम्बन्धित प्रमुख वाद है केदारनाथ बनाम गौरी मुहम्मद

(ii) प्रतिफल स्वयं प्रतिज्ञाग्रहीता या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दिया जाना चाहियेः- अंग्रेजी विधि के अन्तर्गत प्रतिफल प्रतिज्ञाकर्ता की इच्छा पर स्वयं प्रतिज्ञाग्रहीता द्वारा ही दिया जाना चाहिए परन्तु भारतीय संविदा के अन्तर्गत प्रतिफल स्वयं प्रतीज्ञाग्रहीता द्वारा या किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा भी दिया जा सकता है।इस सम्बन्ध मे इग्लैण्ड मे स्थिति परिवर्तित होती रही है। डट्टन बनाम पूल में न्यायालय ने निर्णय दिया कि चूँकि प्रतिफल अन्य व्यक्ति अर्थात् पिता से प्राप्त हो। चुका है अतः भाई अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए बाध्य है। लेकिन, इंग्लैण्ड में विधि का यह सिद्धान्त आगे आने वाले वर्षों में बदल दिया गया। ट्वेडिल बनाम एटकिन्सन में निर्णय दिया गया कि केवल संविदा का पक्ष ही उसे लागू करने के लिए वाद पेश कर सकता है। भारतीय विधि मे यह स्थिति नही है धारा 2(घ) स्पष्ट रूप से वर्णन करती है कि प्रतिफल स्वयं प्रतिज्ञाग्रहीता या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दिया जा सकता है। “किसी अन्य व्यक्ति” वाक्यांश से तात्पर्य है जो संविदा का पक्ष नहीं है। इससे सम्बन्धित प्रमुख वाद है। चिनैया बनाम रमैया

(3) प्रतिफल भूत, वर्तमान तथा भविष्यकालीन हो सकता है

धारा 2 (घ) में वर्णित प्रतिफल की परिभाषा से स्पष्ट है कि समय की दृष्टि से प्रतिफल भूत, वर्तमान और भविष्यकालीन तीन प्रकार का हो सकता है

(अ) भूतकालीन प्रतिफल- प्रतिफल रूपी “वह कार्य या सयंम जो समझौता होने से पूर्व ही किया जा चुका है, या न किया जा चुका है” भूतकालीन प्रतिफल कहलाता है।

(ब) वर्तमान कालीन प्रतिफल- जब प्रतिज्ञाकर्ता प्रतिज्ञा के बदले में तत्काल प्रतिफल प्राप्त करता है तो उसे वर्तमान या निष्पादित प्रतिफल कहते हैं।

(स) भविष्यकालीन प्रतिफल- जब प्रतिज्ञाकर्ता प्रतिज्ञा के बदले में प्रतिफल किसी भविष्य की तिथि को प्राप्त करता है, तो उसे भविष्यकालीन या निष्पाध प्रतिफल कहते हैं।

(4) प्रतिफल मूल्यवान होना चाहिए परन्तु पर्याप्त होना आवश्यक नहीं हैभारतीय संविदा अधिनियम में कही भी यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है कि प्रतिफल मूल्यवान होना चाहिये। किन्तु प्रतिफल का कानूनी दृष्टि में मूल्यवान होना आवश्यक माना गया है। दूसरे शब्दों मे ‘प्रतिफल वास्तविक होना चाहिये’ अर्थात् पर्याप्त न हो। यदि प्रतिफल वास्तविक है। तो यह पर्याप्त प्रतिफल है, भले ही इसका मूल्य कितना भी कम क्यो न हो।

प्रतिफल के सम्बन्ध में भारतीय तथा अंग्रेजी विधि में अन्तर

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वचनात्मक विबन्ध का सिद्धान्त (Doctrine of Promissory estoppels)

अंग्रेजी विधि- के अनुसार एक ऐसा वचन जो बाध्य होने के आशय से किया गया हो तथा जिसके आधार पर कोई कार्य किया जा चुका है बाध्यकारी होगा

जैसे- यदि कोई व्यक्ति देय धन से कम धन स्वीकार करने का वचन देता है और दूसरा पक्ष उसके अनुसार धन की अदायगी करता है, तो ऐसा वचन उस पर बध्यकारी होगा। इससे सम्बन्धित प्रमुख वाद है- सेन्ट्रल लन्दन प्रापर्टी ट्रस्ट लि. बनाम हाईट्रीज हाउस लि.

भारतीय विधि- वचनात्मक विबन्ध के सिद्धान्त के सम्बन्ध में भारतीय विधि पूर्ण रूप से स्पष्ट है। धारा 63 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि प्रत्येक प्रतिज्ञाग्रहीता अपने साथ की गई किसी प्रतिज्ञा के पालन को पूर्णतः या भागतः माफी या छूट दे सकता है या ऐसे पालन के लिए समय बढ़ा सकता है या उसके स्थान पर किसी तुष्टि को, जिसे वह ठीक समझे, स्वीकार कर सकता है।

जैसे- ‘क’ ने ख से 5,000रू. ऋण के रूप में लिया ‘क’ ‘ख’ को 2,000 रु. देता है। ‘ख’ उस रकम को सम्पूर्ण ऋण की तुष्टि में स्वीकार कर लेता है, तो ख शेष धनराशि के लिए वाद नहीं ला सकता।

 

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प्रतिफल (Consideration)

CLASS LECTURE – 4


PRE-QUESTIONS

 
  1. क्यूरी बनाम मीसा के वाद मे प्रतिफल की परिभाषा दी गयी थी

(a) जस्टिस लश

(b) जस्टिस पैटर्सन

(c) जस्टिस ईनिस

(d) उपरोक्त मे से कोई नहीं

 
  1. प्रतिफल हो सकता है-

(a) वर्तमान काल मे

(b) भविष्य काल मे

(c) भूतकाल मे

(d) उपर्युक्त सभी

 
  1. संविदा अधिनियम की धारा 2(घ) के अनुसार प्रतिफल दिया जा सकता है-

(a) प्रतिज्ञाग्रहीता द्वारा

(b) किसी अन्य व्यक्ति द्वारा

(c) उपरोक्त दोनों द्वारा

(d) उपरोक्त मे से कोई नहीं

 
  1. निम्न मे से किस वाद मे न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रतिफल प्रतिज्ञाग्रहीता से ही प्राप्त होना चाहिए अन्य व्यक्ति से नहीं।

(a) डट्टन बनाम पूल

(b) टवेडिल बनाम एटकिन्सन

(c) डनलप न्यूमेटिक दायर कं. बनाम सेलफ्रिज एण्ड कं.

(d) चिनैया बनाम रमैया

 
  1. भूतकालीन प्रतिफल कोई प्रतिफल नहीं होता है

(a) भारतीय विधि में

(b) अंग्रेजी विधि में

(c) उपरोक्त दोनों में

(d) उपरोक्त मे से कोई नहीं


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करार (Agreement)

CLASS LECTURE – 5


MAINS QUESTIONS

 
  1. अमान्य करार के बारे में समझाइये। अमान्य करारो के विषय में संविदा अधिनियम मे दिये गये नियमो की चर्चा कीजिए?
 
  1. शून्य करार किसे कहते है? संविदा के पक्षों के अधिकारों और दायित्वों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
 
  1. (3) A, 16 वर्ष की आयु का एक लडका है। A ने 15 वर्ष की आयु की लडकी (B) से एक विवाह का प्रस्ताव करता है। B इस प्रस्ताव की स्वीकृति देती है।

इस संदर्भ में वैवाहिक करार के वैधानिक अस्तित्व की समीक्षा कीजिए।

 

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करार (Agreement)

CLASS LECTURE – 5

 

 परिभाषा

 आवश्यक तत्व

 करार के प्रकार

 शून्य करार की परिभाषा

 करारों की शून्यता और प्रवर्तनीयता में अन्तर

 शून्य एवं अवैध करार में अन्तर

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“दो या दो से अधिक व्यक्तियों का अपने वैध सम्बन्धों को लागू करने के लिये समान आशय की अभिव्यक्ति ही करार कहलाता है।”

करार के आवश्यक तत्व (Essentials of agreement)

(i) दो या दो से अधिक पक्षों का होना

(ii) पक्षों का एक ही विषय पर, एक ही भाव में मतैक्य होना

(iii) पक्षों में पारस्परिक संसूचना का होना

करार के प्रकार (Kinds of Agreement)

1. मान्य करार- मान्य करार वह करार है जो विधि द्वारा प्रवर्तनीय हो। एक मान्य करार की आवश्यक शर्ते धारा 10 में दी गई हैं जिनमें मुक्त करार मान्य एवं विधि द्वारा प्रवर्तनीय होते है तथा संविदा की रचना कर सकते है।

2. अवैध करार- धारा 23 के अनुसार, यदि किसी करार का उद्देश्य या प्रतिफल विधि द्वारा निषिद्ध है या ऐसे रूप का है कि यदि लागू किया जाये, तो वह किसी विधि के उपबन्धों को निष्फल कर देगा, या कपटपूर्ण है या दूसरे के शरीर और सम्पत्ति को क्षति पहुँचाता है या न्यायालय उसे अनैतिक या लोकनीति के विरुद्ध समझता है, तो वह करार अवैध होता है। ये करार अप्रभावकारी या अप्रवर्तनीय होते है।

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वह करार जो कानून द्वारा लागू न किया जा सके, शून्य कहलाता है।“

यदि करार शून्य है, तो वह करार होते हुए भी संविदा नहीं हो सकता, क्योंकि विधि द्वारा प्रवर्तनीय करार ही संविदा कहा जाता है।

करारों की शून्यता और प्रवर्तनीयता में अन्तर (Difference between voidability and enforcealoility of Agreement)

करारों की शून्यता और प्रवर्तनीयता एक दूसरे के न तो पर्यायवाची है और न ही परस्पर समविस्तीर्ण हैं। यह आवश्यक नहीं है कि वे सब करार जो शून्य नहीं हैं, वास्तव में प्रवर्तनीय ही हों। कोई करार शून्य न होते हुए भी अप्रवर्तनीय हो सकता है और कोई करार अप्रवर्तनीय है इसका यह अर्थ भी नहीं होता कि वह करार शून्य ही हो दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि “प्रत्येक शून्य करार अप्रवर्तनीय होता है परन्तु, प्रत्येक अप्रवर्तनीय करार, शून्य नहीं होता।“

जैसे- बिना स्टाम्प या कम स्टाम्प लगा हुआ करार अप्रवर्तनीय होता है,

परन्तु, शून्य नहीं होता।

धारा 20 और 24 से 30 और धारा 36 व 56(1) में उन करारों की गणना की गई है जो शून्य है। अतः वे धारा 2(छ) के अनुसार प्रवर्तनीय नहीं होते। इस प्रकार “करार जो विधि द्वारा प्रवर्तनीय न हो, शून्य कहलाता है।“ यह शब्दावली एक निश्चयात्मक कथन के रूप में प्रयुक्त हुई है जबकि इसी का नकारात्मक कथन यह होगा कि ‘वह करार, जो शून्य है, विधि द्वारा प्रवर्तनीय नहीं है। यहाँ तक इस अभिव्यक्ति का एक सीमित अर्थ है। सीमित इस दृष्टि से की ‘जो करार शून्य नहीं है, उनका भी संविदा की श्रेणी तक पहुंचना आवश्यक नहीं है।

P.T Question

 
  1. निम्न मे से कौन सा करार का आवश्यक तत्व नहीं है?

(a) दो या दो से अधिक व्यक्ति

(b) पक्षों का एक ही विषय पर एक ही भाव मे मतैक्य न होना

(c) पक्षों में पारस्परिक संसूचना का होना

(d) पक्षों में विधिक सम्बन्ध कायम करने का इरादा होना

 
  1. करारों की शून्यता और प्रवर्तनीयता है-

(a) एक दूसरे के परस्पर समविस्तीर्ण

(b) एक दूसरे के परस्पर समविस्तीर्ण नहीं

(c) एक दूसरे के पर्यायवाची

(d) उपर्युक्त मे से कोई नहीं

 
  1. संविदा अधिनियम की कौन सी धारा शून्य करार से सम्बन्धित नहीं है?

(a) धारा 20

(b) धारा 24

(c) धारा 57

(d) धारा 25

 
  1. संविदा अधिनियम 1872 की किस धारा मे करार को परिभाषित किया गया है?

(a) धारा 2 (h)

(b) धारा 2 (e)

(c) धारा 2 (f)

(d) धारा 2 (g)

 
  1. विधिक कार्यवाहियों के अवरोधक करार-

(a) शून्य है

(b) शून्यकरणीय है

(c) वैध है

(d) अवैध है

 
  1. विवाह में अवरोध डालने वाला करार शून्य होता हैः-

(a) धारा 25

(b) धारा 26

(c) धारा 27

(d) धारा 28


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संविदा (Contract)

CLASS LECTURE – 6


MAINS QUESTIONS

 
  1. सभी संविदा करार होते हैं किन्तु सभी करार संविदा नहीं होते स्पष्ट कीजिये?
 
  1. संविदा को परिभाषित करें। वैध संविदा के आवश्यक तत्वों का उल्लेख निर्णीत वादों की सहायता से कीजिए।
 
  1. एक पिता ने अपने पुत्र से कहा कि यदि तुम LL.B. की परीक्षा उत्तीर्ण करोगें तो मै तुम्हें एक कार दुँगा। जिस समय यह बात कही गयी उस समय पुत्र की आयु 21 वर्ष थी। पुत्र LL.B. उत्तीर्ण होने के बार कार की प्राप्ति हेतु पिता पर वाद लाया।

इस संदर्भ में पिता को विधिक दायित्व का विश्लेषण कीजिए।

 

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संविदा (Contract)

CLASS LECTURE – 6

 

 संविदा का अर्थ और परिभाषा

 आवश्यक तत्व

 कौन से करार संविदा होते है

 संविदा करने के लिए कौन सक्षम है

संविदा का अर्थ और परिभाषा (Meaning and Definition of Contract)

संविदा से तात्पर्य एक व्यक्ति द्वारा दूसरे से वैधानिक सम्बन्ध स्थापित करना है। यह सम्बन्ध पक्षों में पारस्परिक अधिकारों और दायित्वों को जन्म देता है। जब एक व्यक्ति किसी कार्य को करने या न करने का सम्बन्ध स्थापित करने की अपनी इच्छा दूसरे व्यक्ति को इस उद्देश्य से प्रकट करता है कि वह अपनी सहमति उस कार्य या कार्यलोप के प्रति प्रदान करे, तो सहमति देने के बाद दोनों व्यक्तियों में अपसी मतैक्य या करार हो जाता है जिसे समझौता या ठहराव भी कहते हैं। जब किसी करार द्वारा एक व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त हो कि वह किसी दूसरे व्यक्ति को किसी कार्य को करने या न करने के लिए बाध्य कर सकता है, तो उसे संविदा कहते हैं।

पोलक के अनुसार “प्रत्येक करार या वचन जो कानून द्वारा लागू होने योग्य हो, संविदा कहलाता है।“

संविदा अधिनियम 1872 की धारा 2(ज) के अनुसार-

“विधि द्वारा लागू किया जा सकने वाला करार, संविदा कहलाता है।“

उपर्युक्त परिभाषाओं की व्याख्या के आधार पर यह कहा जा सकता है कि संविदा एक ऐसा करार है जिसका उद्देश्य विधि द्वारा लागू होने योग्य आभार की उत्पत्ति करना है।

संविदा के आवश्यक तत्व (Essortials of Contract)

एक वैध संविदा के निर्माण के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित दो तत्वों का होना आवश्यक है-

(i) एक करार होना चाहिए-

संविदा के निर्माण के लिये सर्वप्रथम आवश्यक तत्व यह है कि दो या दो से अधिक पक्षों के बीच एक करार होना चाहिये। करार को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

(क) प्रत्येक वचन करार है और

(ख) वचनों का प्रत्येक समूह, जो एक दूसरे लिए प्रतिफल हो, करार है।

किसी करार के लिये प्रतिफल का होना आवश्यक नहीं है जबकि संविदा के लिये प्रतिफल का होना आवश्यक है इस प्रकार एक ऐसा करार ही संविदा बन सकता है जिसमें वचनों का प्रत्येक समूह एक दूसरे के लिये प्रतिफल हो। यह बात संविदा अधिनियम की धारा 10 और 25 से ओर भी स्पष्ट होती है धारा 10 प्रतिफल को करार का आवश्यक तत्व घोषित करती तथा यही कारण है कि धारा 25 प्रतिफलहीन संविदा को स्पष्ट रूप से शून्य घोषित करती है।

(ii) करार कानून द्वारा लागू होने योग्य होना चाहिये-

एक करार तभी संविदा बनता है जब वह धारा 10 में वर्णित शर्तों को पूरा करे अर्थात धारा 10 के अनुसार- “सभी करार संविदा होते है’ यदि वे संविदा करने के लिये सक्षम पक्षों की स्वतन्त्र सहमति से वैधानिक प्रतिफल और वैधानिक उद्देश्य से किये गये है और इस अधिनियम द्वारा स्पष्ट रूप से शून्य घोषित नहीं किये गये है।“ इस प्रकार, विधि द्वारा लागू होने के लिए किसी करार को निम्नलिखित पाँच शर्ते पूरी करना आवश्यक है-

करार के पक्षों में संविदा करने की क्षमता होनी चाहिये-

धारा 10 का कहना है कि करार करने वाले पक्षों में संविदा करने की क्षमता होनी चाहिये। धारा 11 के अनुसार, प्रत्येक ऐसा व्यक्ति संविदा करने के लिये सक्षम है जो स्वयं पर लागू होने वाली विधि के अनुसार-

– बालिग हो

– स्वस्थचित हो तथा

– कानून द्वारा संविदा करने हेतु अयोग्य घोषित न हो।

मोहरी बीबी बनाम धर्मोदास घोष में –

प्रिवी कौंसिल ने निर्णय दिया कि नाबालिक की संविदा आरम्भ से ही शून्य होती है। क्योंकि वह धारा 11 के अनुसार, संविदा करने के लिए सक्षम पक्ष नही होता।

करार पक्षों की स्वतन्त्र सहमति से किया जाना चाहिये-

प्रस्तावकर्ता द्वारा प्रस्ताव पर स्वीकर्ता की सहमति स्वतन्त्र रुप से प्राप्त की जानी चाहिये। यदि स्वीकर्ता की सहमति स्वतन्त्र नहीं है। तो संविध उसके विकल्प पर शून्यकरणीय हो जाता है सहमति तभी स्वतन्त्र रूप से प्राप्त की गई मानी जाती है जबकि वह उत्पीड़न या अनुचित प्रभाव या कपट या मिथ्यावर्णन, या भूल से प्राप्त न की गई हो।

करार वैधानिक प्रतिफल तथा वैधानिक उद्देश्य से किया जाना चाहिये-

यदि करार का प्रतिफल या उद्देश्य विधिपूर्ण नहीं है, तो करार शून्य होगा।

करार संविदा अधिनियम या किसी अन्य प्रचलित विधि द्वारा स्पष्ट रूप से शून्य घोषित नहीं होना चाहिए-

संविदा अधिनियम में निम्नलिखित अवस्थाओं में करार स्पष्ट रूप से शून्य घोषित किये गये हैं-

 करार की विषय-वस्तु के बारे में तथ्य सम्बन्धी भूल

 बिना प्रतिफल वाले करार

 व्यापार मे रुकावट डालने वाले करार आदि

धारा 20, 24 से 30, धारा 36 और 56 मे दिये गये करार स्पष्ट रूप से शून्य घोषित किये गये है

सभी संविदा करार होते हैं किन्तु सभी करार संविदा नहीं होते (All contracts are agreements, but all agreements are not contracts)

प्रस्तुत कथन ‘करार’ तथा ‘संविदा’ मे अन्तर प्रकट करने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसका विश्लेषण करने पर हमें ज्ञात होता है कि इस कथन के दो भाग हैं-

सभी संविदा करार होते है– इससे स्पष्ट होता है कि ‘करार’ का क्षेत्र विस्तृत है ओर ‘सविदा’ का क्षेत्र संकुचित है, क्योंकि संविदा होने के लिए करार का होना आवश्यक है। जिस प्रकार बिना जड़ के वृक्षकी उत्पत्ति नहीं हो सकती ठीक उसी प्रकार बिना करार के संविदा का निर्माण भी नहीं हो सकता।

(ii) सभी करार संविदा नहीं होते- करार का क्षेत्र विस्तृत होने के कारण इसमें वे सभी प्रकार के करार सम्मिलित हो जाते हैं, जो वैधानिक दायित्व उत्पन्न करते हो या न करते हों संविदा के लिए आवश्यक है कि दोनों पक्षों का वैधानिक दायित्व उत्पन्न करने का अभिप्राय रहा हो।

सभी करार प्रवर्तनीय होते हैं बशर्ते कि वे धारा 10 में वर्णित शर्ते को पूरा करते हों। धारा 10 वस्तुतः किसी करार के उन सुभेदक गुणों को बताती है जिनके संयोग से कोई करार संविदा बन जाता है। संक्षेप में उपर्युक्त वर्णन के आधार पर हम कह सकते हैं कि संविदा कानून द्वारा लागू होने वाला एक करार होता है। परन्तु विशेष प्रकार के करार ही कानून द्वारा लागू किये जाते हैं। जो करार कानून द्वारा लागू नहीं किये जाते उन्हें शून्य करार कहते हैं।

P.T Question

 
  1. संविदा अधिनियम की कौन सी धारा मे संविदा की परिभाषा दी गई है?

(a) धारा 2 (a)

(b) धारा 2 (e)

(c) धारा 2 (h)

(d) धारा 2 (b)

 
  1. एक वैध संविदा के निर्माण के लिए आवश्यक तत्व है-

(a) एक करार होना चाहिये

(b) करार कानून द्वारा लागू होने योग्य होना चाहिए

(c) उपरोक्त दोनों

(d) उपरोक्त मे से कोई नहीं

 
  1. निम्न मे से कौन सा व्यक्ति संविदा करने के लिए सक्षम है?

(a) बालिग

(b) स्वस्थचित्त

(c) कानून द्वारा संविदा करने हेतु, अयोग्य घोषित न हो।

(d) उपर्युक्त सभी

 
  1. निम्न मे से कौन सी धारा यह उपबन्ध करती है कि करार वैधानिक प्रतिफल तथा वैधानिक उद्देश्य से किया जाना चाहिये

(a) धारा 22

(b) धारा 23

(c) धारा 24

(d) धारा 25

 
  1. निम्न मे से किस वाद मे यह कहा गया है कि नाबालिग की संविदा आरम्भ से ही शून्य होती है

(a) मौहरी बीबी बनाम धर्मोदास घोष

(b) मीर सर्वर्जन बनाम कखरुद्दहीन मोहम्मद

(c) सुब्रामनियम बनाम सुब्वाराव

(d) उपर्युक्त मे से कोई नहीं


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समाश्रित सविदाओं के विषय में

(of Contingent Contract)

CLASS LECTURE – 7


MAINS QUESTIONS

 
  1. समाश्रित संविदा किसे कहते हैं? इसके आवश्यक तत्व क्या है? संयोगिक संविदाओं के पालन के नियमों का वर्णन कीजिये।
 
  1. समाश्रित संविदा का किन परिस्थितियों में प्रवर्तन किया जा सकता है?
 
  1. A और B के बीच इस बात की संविदा होती है कि यदि जहाज से 100 क्विटल चावल आ गया तो वह B को परिदत्त कर देगा। संविदा बनने की तिथि 5 जनवरी, 2018 है, जबकि निष्पादन की तिथि 15 मई 2018 है। इस बीच 10 फरवरी को वह जहाज डूब जाता है। क्या इस संविदा का प्रवर्तन कराया जा सकता है?

 

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समाश्रित सविदाओं के विषय में

(of Contingent Contract)

CLASS LECTURE – 7

 

समाश्रित या संयोगिक संविदा वह संविदा है, जिसमें पक्षों के दायित्व उसी क्षण से उत्पन्न नहीं होते जिस क्षण से संविदा उत्पन्न होता है बल्कि किसी साम्पार्श्विक घटना के घटित होने पर उत्पन्न होते हैं।

जैसे- ‘अ’ ‘ब’ से संविदा करता है कि यदि ‘ब’ का घर जल गया, तो वह ‘ब’ को 1,000 रुपये देगा। यह आकस्मिकताश्रित संविदा है। इस संविदा में दोनो पक्षों के अधिकार और दायित्व तभी उत्पन्न होते हैं जबकि आनुषंगिक घटना अर्थात् घर का जलना घटित होता है इससे पूर्व नहीं।

समाश्रित संविदा के आवश्यक तत्व (Essentials of Contingent Contract)

(i) कुछ करने या न करने की संविदा होनी चाहिए

(ii) संविदा का पालन किसी अनिश्चित घटना के घटने या न घटने पर निर्भर होना चाहिए

(iii) यह घटना संविदा से साम्पार्श्विक होनी चाहिए

(iv) यह घटना अनिश्चित एवं भविष्यकालीन होनी चाहिए

समाश्रित संविदाओं के पालन के नियम (Rules relating to the Performance of the contingent contracts)

1- धारा 32 ऐसे संयोगिक सविदाओं के पालन से व्यवहार करती है जिनका लागू होना किसी घटना के घटित हो जाने पर निर्भर करता है। ऐसे संविदाओं का पालन तब तक नही कराया जा सकता जब तक कि कोई अनिश्चित भावी घटना घट न जाये। यदि घटना असम्भव हो जाती है, तो संविदा शून्य हो जाती है।

2- धारा 33 के अन्तर्गत समाश्रित संविदाओं का पालन उसी हालत में कराया जा सकता है जबकि उस संविदा में दी गई घटना का घटित होना असम्भव हो जाता है।

3- धारा 34 के अनुसार, यदि भावी घटना जिस पर कोई संविदा आश्रित है। इस प्रकार हो जिस प्रकार से कोई व्यक्ति किसी अभिर्धारित समय पर कार्य करेगा, तो उस घटना के बारे में तब यह समझा जायेगा कि वह असम्भव हो गई जबकि ऐसा व्यक्ति कोई ऐसी बात करता है, जिससे यह असम्भव होता है कि वह किसी निश्चित समय के भीतर या आगे की ओर आकस्मिकताओं के बिना उस व्यक्ति द्वारा वैसा किया जाना असम्भव कर दे।

4- धारा 35 के अनुसार किसी निर्धारित अनिश्चित घटना के किसी नियत समय के भीतर होने पर किसी बात को करने या न करने के समाश्रित संविदा, यदि नियत समय के समाप्त होने पर ऐसी घटना नहीं होती या नियत समय के पूर्व ऐसी घटना असम्भव हो जाती है, शून्य हो जाते है।

धारा 36 के अनुसार समाश्रित करार जो किसी असम्भव घटना के घटित होने पर ही कोई बात करने या न करने के लिए हो शून्य होते हैं, भले ही घटना की असम्भवता करार के पक्षों को उस समय मालूम भी या नहीं जब करार किया गया था

व्यतिकारी वचन और समाश्रित संविदा में अन्तर

व्यतिकारी वचन में दायित्व पारस्परिक होता है जबकि समाश्रित संविदा में सम्पूर्ण दायित्व एक ही पक्ष पर हो सकता है।

 

P.T Question

 
  1. वह संविदा जो ऐसे संविदा से साम्पार्श्विक किसी घटना के घटित होने या न होने पर ही किसी बात को करने या न करने के लिये हो कहलाती है

(a) समाश्रित संविदा

(b) शून्य संविदा

(c) शून्यकरणीय संविदा

(d) उपर्युक्त मे से कोई नहीं

 
  1. ‘क’ करार करता है कि यदि दो सीधी रेखायें किसी स्थान को घेर लें, तो वह ‘ख’ को 1000 रु. देगा यह करार किस धारा के अन्तर्गत शून्य है

(a) धारा 35

(b) धारा 36

(c) धारा 37

(d) धारा 38

 
  1. निम्न मे से कौन सा अध्याय समाश्रित सविदाओं के विषय से सम्बन्धित है?

(a) अध्याय 2

(b) अध्याय 3

(c) अध्याय 4

(d) अध्याय 5

 
  1. निम्न मे से कौन सा संविदा का आवश्यक तत्व नही है

(a) घटना संविदा से साम्पार्श्विक होनी चाहिए

(b) घटना अनिश्चित एवं भविष्यकालीन होनी चाहिए

(c) संविदा का पालन किसी अनिश्चित घटना के घटने या न घटने पर निर्भर होना चाहिए

(d) उपर्युक्त सभी

 
  1. संविदा अधिनियम की कौन सी धाराये समाश्रित संविदाओं के विषय में है

(a) धारा 31 से 36

(b) धारा 32 से 36

(c) धारा 30 से 36

(d) धारा 33 से 36


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संविदाओं के पालन के विषय में

(Of The Performance of Contracts)

धारा 37-67

CLASS LECTURE – 8


MAINS QUESTIONS

 
  1. संविदा के पूर्वकालिक उल्लंघन से आप क्या समझते है वचन का पूर्णतः पालन करने से पक्ष के इन्कार का क्या प्रभाव होता है?
 
  1. संविदा पालन के सम्बन्ध में संविदा के पक्षों के क्या दायित्व होते है? उपयुक्त उदाहरणों की सहायता से समझाइये।
 
  1. प्रत्यास्थापन से आप क्या समझते है? किन परिस्थितियों मे प्रत्यास्थापन हो सकता है?

 

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संविदाओं के पालन के विषय में

(Of The Performance of Contracts)

धारा 37-67

CLASS LECTURE – 8

 

संविदा अधिनियम का अध्याय 4 संविदा के पालन से सम्बन्धित है। इस सम्बन्ध में अधिनियम की धारा 37 निम्नलिखित उपबन्ध करती है।

धारा 37 के अनुसार, संविदा के प्रत्येक पक्ष को अपने-अपने दायित्व का पालन करना चाहिये या पालन का प्रस्ताव करना चाहिये। यदि संविदा का एक पक्ष अपने भाग का पालन कर लेता है, तो वह संविदा द्वारा उत्पन्न अपने दायित्व से मुक्त हो जाता है और दूसरा पक्ष यदि वह अपने भाग का पालन करने में असफल रहता है, तो वह संविदा-भंग का दोषी माना जाता है और प्रथम पक्ष को उसके विरूद्ध हानि-पूर्ति आदि प्राप्त करने के उपचार प्राप्त हो जाते हैं।

निम्नलिखित विधियों के अन्तर्गत संविदा के पालन से माफी को इस धारा में शामिल किया गया है-

(i) दिवालिया विधि

(ii) धारा 62 के अन्तर्गत संविदा के नवीकरण तथा

(iii) धारा 56 के पैरा 2 के अन्तर्गत संविदा विफलता का सिद्धान्त आदि।

धारा 38 के अनुसार, जब वचनदाता ने वचनग्रहीता से पालन की पेशकश की हो परन्तु स्वीकार न की गई हो तो वचनदाता न तो अपालन के लिए उत्तरदायी होगा और न ही संविदा के अधीन के अपने अधिकारों को खो देगा। परन्तु ऐसी हर पेशकश को निम्न शर्ते पूरी करनी होगी-

(i) वह अशर्त होनी चाहिए

(ii) वह उचित समय, उचित स्थान, और उचित परिस्थितियों मे की गई हो

(iii) यदि वह पेशकश वचनग्रहीता को वस्तु परिदान करने के लिए हो तो वचनग्रहीता को यह देखने का युक्तियुक्त अवसर मिलना ही चाहिए पेशकश की गई वही वस्तु है जिसे प्रदान करने के लिए वचनदाता अपने वचन द्वारा आवद्ध है।

संविदा का पूर्वकालिक भंग

धारा 39 के अनुसार-

“जब किसी संविदा के एक पक्ष ने अपने वचन का पूर्णतः पालन करने मे इन्कार कर दिया हो या ऐसा पालन करने के लिये अपने को अयोग्य बना लिया हो तब वचनग्रहीता संविदा का अन्त कर सकेगा, यदि उसने उसको चालू रखने की शब्दों या आचरण द्वारा अपनी सहमति प्रकट न की संविदा का पूर्वकालिक उल्लंघन दो प्रकार का होता है-

(i) संविदा के खण्डन द्वारा

(ii) पालन की असमर्थता द्वारा

पूर्वकालिक भंग का संविदा पर प्रभाव

I. निर्दोष पक्षकार भी संविदा पालन से मुक्त हो जाता है

II. निर्दोष पक्षकार को यह अधिकार प्राप्त हो जाता है कि वह संविदा को तत्क्षण ही निराकृत कर दे और क्षतिपूर्ति का दावा कर दे। यह सिद्धान्त होचेस्टर बनाम दि लॉ दूर (1853) के बाद मे लार्ड कैम्पवेल द्वारा प्रतिपादित किया गया।

धारा 40 के अन्तर्गत संविदा का पालन निम्नलिखित व्यक्तियों द्वारा किया जा सकता है-

(i) स्वयं वचनदाता द्वारा- वचन का पालन वचनदाता स्वयं करेगा जब मामले की प्रकृति से यह प्रतीत हो कि संविदा के पक्षकारों का यह आशय था कि उसमें उल्लिखित किसी वचन का पालन वचनदाता द्वारा किया जाना चाहिए।

(ii) वचन दाता या उसके प्रतिनिधि द्वारा नियोजित व्यक्ति द्वारा- यदि सविदा के विलेख से यह प्रतीत न हो कि उसमें वर्णित किसी वचन का पालन वचनदाता को स्वयं करना है तो ऐसे वचन का पालन वचनदाता या उसके प्रतिनिधि द्वारा नियुक्त सक्षम व्यक्ति द्वारा किया जा सकेगा।

धारा 41 यह उपबन्ध करती है कि यदि वचनग्रहीता किसी अन्य व्यक्ति से वचन का पालन प्रतिगृहीत कर लेता है तब वह तत्पश्चात उसे वचनदाता के विरूद्ध प्रवर्तित नहीं करा सकता।

धारा 42 के अनुसार- जब दो या दो से अधिक व्यक्तियों ने कोई संयुक्त वचन दिया हो तो संविदा के अभाव मे ऐसा वचन निम्न को सयुक्त रूप से पूरा करना होगा।

(i) वचन देने वाले सभी व्यक्तियों को

(ii) उनमे से किसी की मृत्यु होने पर उसके प्रतिनिधि को उत्तरजीवियों के साथ और

(iii) अन्तिम उत्तरजीवी के मरने के बाद सबके प्रतिनिधियों को

धारा 43 के अनुसार– संयुक्त वचन दाताओं मे से कोई भी पालन के लिए विवश किया जा सकेगा

धारा 45 के अनुसार-

“जब किसी व्यक्ति ने दो या अधिक व्यक्तियों को सयुक्त रूप से वचन दिया हो, तब यदि संविदा से इसके प्रतिकूल आशय प्रकट न हो, तो उसके पालन के लिए दावा करने का अधिकार, जहाँ तक कि उसका और उनका सम्बन्ध है, उनके संयुक्त जीवनों के दौरान उनको और उनमें से किसी की मृत्यु के पश्चात् ऐसे मृतक व्यक्ति के प्रतिनिधि को उत्तरजीवी या उत्तरजीवियों के साथ संयुक्त रूप से और अन्तिम उत्तरजीवी की मृत्यु के पश्चात् उन सबके प्रतिनिधियों को संयुक्त रूप से होता है।”

वचन के पालन के लिए समय और स्थान के सम्बन्ध मे उपबन्ध धारा 46 से 50 तक मे किया गया है

धारा 46 के अनुसार-

जहाँ वचन के पालन के लिये समय और स्थान वचनग्रहीता द्वारा आवेदन किये जाने के बिना करना हो और समय निर्धारित न हो वहाँ पालन युक्तियुक्त समय में करना होगा।

धारा 47-

ऐसे मामलों में लागू होती है जहां संविदा पालन के लिए-

(i) एक दिन विशेष निश्चित कर दिया गया हो, तथा

(ii) प्रतिज्ञाग्रहीता द्वारा आवेदन किये जाने के बिना ही वचन का पालन किया जाना हो। ऐसी दशा में, प्रतिज्ञाकर्ता को वचन का पालन उस दिन कारोबार के सामान्य घण्टों में करना होता है।

धारा 50 के अनुसार-

“किसी भी वचन का पालन उस प्रकार से और उस समय पर किया जा सकेगा जिसे वचनग्रहीता निर्धारित करे।”

 जब किसी संविदा में दोनों पक्षकारों के द्वारा वचन दिये जाते है तो उन्हें व्यतिकारी वचन कहते है। व्यतिकारी वचनों के पालन के सदंर्भ में उपबंध धारा 51 से 58 तक में दिये गये है।

 सदांयों का विनियोग

जब एक व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के प्रति एक से अधिक ऋणों के लिए देनदार हो और उसके द्वारा किये गये भुगतान से सभी ऋण समाप्त न होने पाये तो प्रश्न उठता है कि यह संदाय किस ऋण को समाप्त करने में प्रयोग किया जाए। इस सम्बन्ध में संविदा अधिनियम की धारा 59 से 61 तक में निम्नलिखित सिद्धांत बताए गए हैं-

1- ऋणी द्वारा विनियोग (धारा 59)

2- ऋणदाता द्वारा विनियोग (धारा 60)

3- विधि द्वारा विनियोग (धारा 61)

वे संविदायें जिनको करने की आवश्यकता नहीं है

सविदाएँ जिनका पालन करने की आवश्यकता नहीं है

धारा 62 – 67

धारा 62 के अनुसार संविदा के नवीयन विखण्डन और परिवर्तन के फलस्वरूप मूल संविदा का पालन करने की आवश्यकता ना होगी।

धारा 63 के अनुसार-

 प्रतिज्ञाग्रहीता प्रतिज्ञा-पालन को पूर्णतः या अंशतःमाफी या छूट दे सकता है।

 वह संविदा-पालन के समय को बढ़ा सकता है

 वह किसी भी सन्तुष्टि को जिसे वह ठीक समझे, स्वीकार कर सकता है।

धारा 64 के अनुसार-

जब कोई व्यक्ति, जिसके विकल्प पर संविदा शून्यकरणीय है, संविदा को खण्डित करता है।

 संविदा के दूसरे पक्ष द्वारा संविदा का पालन आवश्यक नहीं है।

 शून्यकरणीय संविदा को खण्डित करने वाला पक्ष किये हुये लाभों को उस पक्ष को वापस करेगा, जिससे उसने उन्हें प्राप्त किया था।

धारा 65 के अनुसार-

 जिसने शून्य करार के अधीन या उस संविदा के अधीन जो शून्य हो गई हो, फायदा प्राप्त किया हो जिससे उसने उसे प्राप्त किया था प्रत्यावर्तित करने या उसके लिए प्रतिकर देने को आबद्ध होगा।

धारा 66 कहती है-

शून्यकरणीय संविदा के विखण्डन की संसूचना या प्रतिग्रहणसंहरण की रीति वही होगी जो प्रस्थापना की संसूचना या प्रतिसहरण को लागू है।

धारा 67 के अनुसार-

यदि वचनग्रहीता वचनकर्ता को उसके आभार का पालन करने के लिये समुचित सुविधाये देने में विफल रहता है, तो वचनकर्ता को क्षमा कर दिया जाता है और वह ऐसे अपालन द्वारा अपने द्वारा उठाये गये नुकसान के लिये वचनग्रहीता से हानिपूर्ति के लिए दावा कर सकता है।

P.T Question

 
  1. ‘क’ अमुक कीमत पर अमुक दिन तक ‘ख’ के लिये एक रंगचित्र बनाने का वचन देता है। ‘क’ उस दिन से पहले ही भर जाता है। यह संविदा किसके द्वारा प्रवर्तित कराई जा सकती है

(a) ‘क’ के प्रतिनिधियों द्वारा

(a) ‘क’ के प्रतिनिधियों द्वारा

(c) ‘के’ के प्रतिनिधियों द्वारा नही कराई जा सकती

(d) उपर्युक्त मे से कोई नहीं

  1. निम्न मे से कौन सी धारा प्रत्याशित संविदा भंग से सम्बन्धित है?

(a) धारा 38

(b) धारा 39

(c) धारा 40

(d) धारा 41

  1. निम्न मे से कौन सी धारा संयुक्त दायित्वों के न्यागमन से सम्बन्धित है

(a) धारा 42

(b) धारा 43

(c) धारा 44

(d) धारा 45

  1. युक्तियुक्त समय क्या है यह प्रश्न हर एक विशिष्ट मामले मे तथ्य का प्रश्न है उपर्युक्त कथन किस धारा से सम्बन्धित है

(a) धारा 45

(b) धारा 46

(c) धारा 48

(d) धारा 49

  1. ऐसे अनुकल्पी वचन की दशा मे जिसकी एक शाखा वैध हो तथा दूसरी अवैध तो किसका प्रवर्तन कराया जा सकता है?

(a) वैध शाखा का

(b) अवैध शाखा का

(c) दोनों का

(d) उपर्युक्त मे से कोई नहीं

  1. संविदा अधिनियम की धारा 64 बात करती है

(a) केवल शून्य संविदा के विखण्डन के परिणाम की

(b) केवल शून्यकरणीय संविदा के विखण्डन के परिणाम की

(c) उपरोक्त दोनों की

(d) उपरोक्त मे से कोई नहीं


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संविदा कल्प (Quasi- contract)

धारा 68-72

CLASS LECTURE – 9


MAINS QUESTIONS

 
  1. संविदा-कल्प सिद्धान्त की व्याख्या कीजिये। संक्षेप में, भारतीय संविदा अधिनियम के उन प्रावधानों का उल्लेख कीजिये जिनमें इस सिद्धान्त को अपनाया गया है?
 
  1. संक्षेप में संविदा और संविदा-कल्प में अन्तर कीजिये।
 
  1. संविदा सृजित संबंधो से उत्पन्न अधिकारों के उल्लंघन होने पर क्या उपचार उपलब्ध है?

 

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संविदा कल्प (Quasi- contract)

धारा 68-72

CLASS LECTURE – 9

 

धारायें 68 से 72:- तक ऐसे दायित्वों का उल्लेख करती है जो संविदा द्वारा सर्जित सम्बन्धों के सदृश है किंतु वे किसी संविदा द्वारा सर्जित नहीं है। धारा 73 के प्रभाव से ऐसी बाध्यताओं के भंग का प्रभाव वही होता है जो कि संविदा भंग का होता है। आंग्ल विधि में इसे संविदा-कल्प कहा जाता है।

सर्वप्रथम लार्ड मेन्सफील्ड ने मोमेज बनाम मैकफरलान, 1760 के वाद में इसकी व्याख्या इस सिद्धान्त के आधार पर की कि कानून ‘अन्यायपूर्ण धनी’ होना रोकता है। अर्थात् एक व्यक्ति को दूसरे की कीमत पर धनवान नहीं बनने दिया जायेगा। यह साम्या और प्राकृतिक न्याय की मांग है।

भारतीय विधिः-

धारा 68 के अनुसार, “यदि संविदा करने में किसी अक्षम व्यक्ति या किसी ऐसे व्यक्ति को जिसको अक्षम व्यक्ति कानूनी रूप में पालन करने के लिये बाध्य है, कोई दूसरा व्यक्ति उसके जीवन को आवश्यकताओं के अनुकूल वस्तुओं की पूर्ति करता है तो उस व्यक्ति को अक्षम व्यक्ति की सम्पत्ति से क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार है।”

धारा 69 के अनुसार, “जो उस धन के भुगतान में रुचिबद्ध है जिसके अदा करने के लिये दूसरा व्यक्ति कानूनी रूप से बाध्य है, और उसका भुगतान करता है, वह उस अन्य से क्षतिपूर्ति प्राप्त कराने का हकदार है।”

धारा 70 के अनुसार, “यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के लिये परोपकार की भावना के बिना ही कोई वैधानिक कार्य करता है या उसे कोई वस्तु देता है तथा वह अन्य व्यक्ति उससे लाभ प्राप्त कर लेता है, तो ऐसी स्थिति में लाभ उठाने वाला व्यक्ति किसी संविदा के न होते हुये भी पहले वाले व्यक्ति की क्षतिपूर्ति करने के लिये बाध्य है।”

धारा 71 के अनुसार, “उस व्यक्ति का दायित्व उपनिहिती (Bailee) के दायित्व के समान है जो किसी अन्य व्यक्ति की खोई हुई वस्तु को पाता है और उसे अपने अभिरक्षा में लेता है।”

धारा 72 के अनुसार, “उस व्यक्ति को, जिसे भूल या उत्पीड़न द्वारा कुछ धन या वस्तु दी गई हो, उसे उस धन या वस्तु को वापस लौटाना आवश्यक है।”

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P.T Question

 
  1. निम्न मे से कौन सी धारा ऐसे दायित्वों का उल्लेख करती है जो संविदा द्वारा सर्जित सम्बन्धों के सदृश है किन्तु वे किसी संविदा द्वारा सर्जित नहीं है।

(a) धारा 68 से 72

(b) धारा 69 से 73

(c) धारा 66 से 72

(d) धारा 68 से 73

 
  1. निम्न मे से किसे अर्ध-संविदात्मक दायित्व का जनक माना जाता है

(a) लार्ड समर को

(b) लार्ड मेन्सफील्ड को

(c) लार्ड पारकर को

(d) हाउस ऑफ लार्डस को

 
  1. पड़ा हुआ माल पाने वाला उसी उत्तर दायित्व के अध्यधीन है जिसके

(a) उपनिधाता होता है

(b) उपनिहिती होता है

(c) जिसके अभिकर्ता होता है

(d) जिसके मालिक होता है

 
  1. ख को जो पागल है, पत्नी और बच्चों को जीवन में उनकी स्थिति के योग्य आवश्यक वस्तुओं का प्रदाय क करता है क किसकी सम्पत्ति से प्रतिपूर्ति पाने का हकदार है।

(a) ख की

(b) पत्नी की

(c) बच्चों की

(d) उपर्युक्त मे से कोई नहीं

 
  1. संविदा अधिनियम की कौन सी धारा माल पडा पाने वाले के उत्तरदायित्व से सम्बन्धित है?

(a) धारा 69

(b) धारा 70

(c) धारा 71

(d) धारा 72


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विफलता का सिद्धान्त (Doctrine of Frustration)

CLASS LECTURE – 10


MAINS QUESTIONS

 
  1. संविदा विफलता के सिद्धान्त से आप क्या समझते है? इसके आवश्यक तत्व क्या है विफलता के सिद्धान्त के परिणाम क्या होते है?
 
  1. B और आपस में संविदा करते है कि वे एक दूसरे से 15 अक्टूबर, 2019 को शादी करेगें। इससे पूर्व ही G का निर्धन 15 सिंतबर को ही जाता है। इस स्थिति में B और G के विधिक दायित्वों का विश्लेषण कीजिए।

 

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विफलता का सिद्धान्त (Doctrine of Frustration)

CLASS LECTURE – 10

 

संविदा-पालन की असम्भवता संविदा के उन्मोचन का एक ढंग है संविदा पालन के असम्भवता से सम्बन्धित प्रावधान संविदा अधिनियम की धारा 56 में दिया गया है। धारा 56 तीन पैराग्राफों मे विभाजित है। इस धारा के विश्लेषण करने पर हमें ज्ञात होता है कि संविदा-पालन की असम्भवता निम्नलिखित दो अवस्थाओं में उत्पन्न होती है-

(1) आरम्भिक असम्भवता

(2) पश्चातवर्ती असम्भवता

धारा 56 का प्रथम पैराग्राफ प्रारम्भिक असम्भवता से सम्बन्धित है। इस पैराग्राफ में स्पष्ट रूप से घोषित किया गया है कि असम्भव कार्य करने का करार शून्य होता है।

धारा 56 के दूसरे पैराग्राफ में ऐसी अवस्था का वर्णन किया गया है जहाँ संविदा का पालन करना आरम्भ से तो असम्भव नहीं होता परन्तु संविदा के पश्चात् असम्भव हो जाता है।

धारा 56 के द्वितीय पैराग्राफ में निहित पश्चातवर्ती असम्भवता का सिद्धान्त आंग्ल विधि के संविदा के विफलता के सिद्धान्त को समाहित करता है। आंग्ल विधि के एक पुराने वाद-

पैराडाइन बनाम जेन 1647 में स्थापित यह सिद्धान्त कि संविदा हो जाने के बाद घटित होने वाली घटनाओं का संविदा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता को टेलर बनाम कातडवेल 1863 में न्यायालय ने मानने से इंकार कर दिया न्यायमूर्ति ब्लैकबर्न ने कहा कि उपरोक्त सिद्धान्त केवल सकारात्मक तथा अप्रतिबन्धित संविदाओं में लागू होता है, ऐसी सविदाओं में नहीं जिनमें कोई स्पष्ट या अन्तर्निहित शर्त लगी हो।

सत्यव्रतघोस बनाम मगनीराम बागुंर एण्ड कं. 1954 ए.आई.आर. एस.सी. में जस्टिस वी. के. मुखर्जी ने कहा था कि धारा 56 के दूसरे पैरे में प्रयुक्त ‘असम्भव’ शब्द का अर्थ “भौतिक तथा शाब्दिक असम्भवता से नहीं लगाया जाना चाहिये। यदि संविदा होने के बाद परिस्थितियों के बदलने से पक्षों के वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती अर्थात् संविदा का अन्तिम उद्देश्य विकल हो जाता है, तो भी वचनदाता ऐसे संविदा के पालन से स्वयं को असम्भव पाता है। इस प्रकार असम्भवता का अर्थ निम्न दो बातों से होता है-

(i) संविदा पालन की असम्भवता

(ii) संविदा के अन्तिम उद्देश्य की असफलता

संविदा विफलता के सिद्धान्त के आवश्यक तत्व (Essentials of the doctrine of frustration)

1- पक्षों के बीच एक मान्य संविदा अस्तिव में होना चाहिए।

2- संविदा का कुछ भाग पूरा किया जाना बाकी होना चाहिये।

3- संविदा पालन पश्चातवर्ती घटना के कारण असम्भव होना चाहिये।

4- घटना को दूर करने में प्रतिज्ञाकर्ता असमर्थ होना चाहिये।

5- घटना स्वयं प्रतिज्ञाकर्ता द्वारा उत्पन्न की गई, या उसकी असावधानी का परिणाम नहीं होना चाहिये।

संविदा विफलता के सिद्धान्त का परिणाम (Consequences of the doctrine of frustration)

संविदा विफल होने के कारण पक्ष संविदा-पालन से मुक्त हो जाते है, संविदा हमेशा के लिए समाप्त और शून्य माना जाता है।

विफलता के सिद्धान्त के अपवाद (Exceptions of the doctrine of frustration)

(1) व्यापारिक असंम्भवता

(2) स्वयं द्वारा खोजी गई विफलता

(3) पट्टे से सम्बन्धित संविदा

(4) विवाह की संविदा

(5) माल की बिक्री की संविदा

 

P.T Question

 
  1. संविदा अधिनियम की धारा 56 का पैराग्राफ द्वितीय सम्बन्धित है?

(a) पूर्ववर्ती असम्भवता से

(b) पश्चातवर्ती असम्भवता से

(c) उपरोक्त दोनों

(d) उपरोक्त मे से कोई नहीं

 
  1. सर्वप्रथम यह सिद्धान्त किस वाद मे प्रतिपादित किया गया था कि संविदा होने के बाद की घटनाओं का संविदा-पालन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता

(a) पेराडाइन बनाम जेन 1647

(b) सत्यव्रतघोस बनाम मगनीराम बागुंर एण्ड कं. 1954

(c) टेलर बनाम काव्डवेल 1863

(d) उपर्युक्त मे से कोई नहीं

 
  1. सत्यव्रतघोस बनाम मगनीराम बागुंर एण्ड क. 1954 के वाद में जस्टिस थे?

(a) बी. के. मुखर्जी

(b) ब्लैकबर्न

(c) लार्ड साइमन

(d) उपर्युक्त मे से कोई नहीं

 
  1. निम्न मे से कौन सा विफलता के सिद्धान्त का अपवाद है?

(a) व्यापारिक असम्भवता

(b) स्वयं द्वारा खोजी गई विफलता

(c) पट्टे से सम्बन्धित संविदा

(c) (d) उपर्युक्त सभी

 
  1. निम्न मे से कौन सा विफलता के सिद्धान्त का आवश्यक तत्व नही है?

(a) पक्षों के बीच एक मान्य संविदा अस्तित्व में होना चाहिये

(b) संविदा का कुछ भाग पूरा किया जाना बाकी होना चाहिये।

(c) संविदा-पालन पश्चातवर्ती घटना के कारण असम्भव होना आवश्यक नही है

(d) घटना को दूर करने में प्रतिज्ञाकर्ता असमर्थ होना चाहिये।


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क्षतिपूर्ति और प्रत्याभूति की संविदा (Contract of Indemnity and Guarantee)

CLASS LECTURE – 11


MAINS QUESTIONS

 
  1. क्षतिपूर्ति की संविदा से आप क्या समझते है? यह प्रत्याभूति की संविदा से किस प्रकार भिन्न है?
 
  1. प्रत्येक प्रत्याभूति की संविदा क्षतिपूर्ति की संविदा होती है किन्तु प्रत्येक क्षतिपूर्ति की संविदा प्रत्याभूति की संविदा नहीं होती है” उक्त कथन को स्पष्ट कीजिए।
 
  1. प्रतिभू का दायित्व मूलु ऋणी के दायित्व के समविस्तीर्ण होता है इस कथन की विवेचना कीजिए।
 
  1. प्रतिभू कब अपने दायित्व से उन्मेचित हो जाता है?
 
  1. प्रतिभू के अधिकारों एवं कर्त्तव्यों का विश्लेषण कीजिए।

 

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क्षतिपूर्ति और प्रत्याभूति की संविदा (Contract of Indemnity and Guarantee)

(Contract of Indemnity and Guarantee)

CLASS LECTURE – 11

 

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 124 में क्षतिपूर्ति की संविदा को परिभाषित किया गया है धारा 124 के अनुसार- “वह संविदा जिसके द्वारा एक पक्षकार दूसरे पक्षकार को स्वयं वचनदाता के आचरण से या किसी अन्य व्यक्ति के आचरण से उस दूसरे पक्षकार को हुई हानि से बचाने का वचन देता है, क्षतिपूर्ति की संविदा कहलाती है।”

दृष्टान्त- A 200 रूपये की किसी राशि के सम्बन्ध में B द्वारा C के विरूद्ध संचालित की जाने वाली किसी कार्यवाही के परिणामस्वरूप C को क्षतिपूर्ति देने की संविदा करता है यह क्षतिपूर्ति की संविदा है।

इस परिभाषा द्वारा ही क्षतिपूर्ति के क्षेत्र को केवल ऐसी हानियों से सुरक्षित रखने के लिए सीमित कर दिया गया है, जो-

(1) वचन दाता के या

(2) किसी अन्य व्यक्ति के आचरण द्वारा हुई हों।

इस परिभाषा में दुर्घटनाओं द्वारा होने वाली हानियाँ सम्मिलित नहीं है। हानि किसी मनुष्य के आचरण द्वारा होनी चाहिये।

 क्षतिपूर्ति का वचन विवक्षित या अभिव्यक्त हो सकता है।

धारा 125- में दायित्व की सीमा बतायी गयी है। क्षतिपूर्तिधारी, क्षतिपूर्तिदाता की इच्छानुसार कार्य करते हुए निम्नलिखित घन वसूलने का हक रखता है-

(1) क्षतिपूर्ति के वचन से संबधित वाद में जितना प्रतिकर उसे देना पड़ा हो।

(2) वाद लाने या उसके बचाव में जो खर्चे हुए हों यदि वे खर्चे ऐसे हों कि एक युक्तियुक्त व्यक्ति जिसे क्षतिपूर्ति का कोई वचन प्राप्त न होने पर भी अपने निजी वाद को लाने या उसके बचाव में करता या ऐसे खर्चे जो उसने क्षतिपूर्ति दाता की इच्छानुसार किये हैं।

(3) यदि उसने वाद के दूसरे पक्षकार के साथ समझौता ऐसा हो जो कोई युक्तियुक्त व्यक्ति जिसे क्षतिपूर्ति का वचन प्राप्त न हो तो अपने ही वाद में ऐसा समझौता करता या समझौता उसने क्षतिपूर्तिदाता की इच्क्षानुसार किया हो।

 

प्रत्याभूति की संविदा

(Contract of Guarantee)

धारा 126-147

 

धारा 126 के अनुसार-

“प्रत्याभूति की संविदा किसी पर व्यक्ति द्वारा व्यतिक्रम की दशा में उनके वचन का पालन या उसके दायित्व का निर्वहन करने की संविदा है”

वह व्यक्ति, जिसके व्यतिक्रम के बारे में प्रत्याभूति दी जाती है, मूल ऋणी कहलाता है। वह व्यक्ति जिसकों प्रत्याभूति दी जाती है, ‘लेनदार’ (ऋणदाता) कहलाता है।

प्रत्याभूति की संविदा के आवश्यक तत्व-

(1) मूल ऋण

(2) प्रतिफल

(3) दुर्व्यपदेशन नहीं होना चाहिए

(4) लिखित होना आवश्यक नहीं है।

(5) प्रत्याभूति की संविदा के पक्षकार

(i) प्रतिभू

(ii) मूलऋणी

(iii) लेनदार (ऋणदाता)

प्रत्याभूति के प्रकार

1- विशिष्ट प्रत्याभूति

2- चलत प्रत्याभूति

धारा 129 के अनुसार वह प्रत्याभूति जिसका विस्तार संव्यवहारों की किसी आवली पर हो-

“चलत प्रत्याभूति” कहलाती है।

चलत प्रत्याभूति का प्रतिसहंरण

(1) सूचना द्वारा

(2) प्रतिभू की मृत्यु द्वारा

(3) संविदा के निबंधनों के सम्बन्ध में परिवर्तन द्वारा

(4) मूलऋणी को नियुक्ति करने या उसका उन्मोचन करने पर

PICTURE01  

P.T Question

 
  1. चलत प्रत्याभूति परिभाषित है-

(a) धारा 124

(b) धारा 129

(c) धारा 130

(d) धारा 146

 
  1. अधिनियम 124 के अन्तर्गत क्षतिपूर्ति की संविदा में सम्मिलित करती है-

(a) दुर्घटना से कारित क्षतियां

(b) प्राकृतिक आपदा से कारित क्षतियां

(c) मानव आचरण से कारित क्षतियां

(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं

 
  1. प्रतिभू का दायित्व मूलऋणी के दायित्व के समविस्तीर्ण है यह उपबन्ध किस धारा मे प्रावधानित किया गया है?

(a) धारा 126

(b) धारा 127

(c) धारा 128

(d) धारा 129

 
  1. अधिनियम की धारा 126 मे कितनी परिभाषा दी गई है?

(a) 4

(b) 5

(c) 3

(d) 2

 
  1. संविदा अधिनियम की कौन सी धारा “क्षतिपूर्ति की संविदा” की परिभाषा से सम्बन्धित है

(a) धारा 124

(b) धारा 125

(c) धारा 126

(d) धारा 127


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उपनिधान

(Bailment and pledge)

(धारा 148 से 181)

CLASS LECTURE – 12


MAINS QUESTIONS

 
  1. उपनिधान क्या है? उपनिहित माल के सम्बन्ध में उपनि धाता और उपनिहिती के कर्तव्य और दायित्व का उल्लेख करें।
 
  1. उपनिधान से आप क्या समझते है? उपनिधान के आवश्यक तत्वों का विश्लेषण कीजिए।

 

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उपनिधान

(Bailment and pledge)

(धारा 148 से 181)

CLASS LECTURE – 12

 

 परिभाषा

 आवश्यक तत्व

 उपनिधाता के अधिकार और कर्तव्य

 उपनिहिती के अधिकार और कर्तव्य

 गिरबी

 गिरबी कौन कर सकता है।

 षणयमदार या गिरबीदार के अधिकार एवं कर्तव्य

धारा 148 के अनुसार

“उपनिधान एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को किसी प्रयोजन के लिए इस संविदा पर माल पर परिदान करना है कि जब वह प्रयोजन पूरा हो जाय, तब वह लौटा दिया जायेगा या उसे परिदान करने वाले व्यक्ति के निर्देशों के अनुसार अन्यथा व्ययनित कर दिया जायेगा।”

परिदानकर्ता उपनिधाता कहलाता है और जिस व्यक्ति को माल परिदत्त किया जाता है उसे उपनिहिती कहते है।

जैसे- घड़ी या रेडियों या स्कूटर मरम्मत के देना, आभूषण बनाने के लिए स्वर्णकार को स्वर्ण देना, ड्राईक्लीनर को कपड़ा धोने के लिये देना, उपनिधान है।

धारा 148 के स्पष्टीकरण के अनुसार जिस व्यक्ति के पास माल पर कब्जा पहले से ही है वह बाद में उसे उपनिहिती की हेसियत से रखने के लिए सहमत हो जाए तो वह उपनिहिती हो जाएगा।

धारा 149 अनुसार कब्जा दो प्रकार से सौंपा जा सकता है।

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उपनिधान के आवश्यक तत्व (Essentials of Bailment)

(i) माल के कब्जे का परिदान

(ii) विशिष्ट उद्देश्य अथवा प्रयोजन

(iii) युक्तियुक्त समय में लौटाये जाने की शर्त

उपनिधाता के अधिकार धारा 153, 155, 156, 157, 159, 163, 180, 181 (Right of Bailor)

 उपनिधान के पर्यवसान करने का अधिकार

 मिश्रित माल में हित धारण करने का अधिकार

 उपनिहिती से प्रतिकर प्राप्त करने का अधिकार

 माल को वापस पाने का अधिकार

 उपनिहित माल में वृद्धि या उससे हुए लाभ को प्राप्त करने का अधिकार

 दोषकर्ता के विरूद्ध वाद लाने का अधिकार

उपनिधाता के कर्तव्य (धारा- 150, 158, 164) (Duties of Bailor)

 उपनिहित माल की श्रुटियों को प्रकट करने का कर्तव्य

 आवश्यक व्ययों को प्रतिसंदाय करने का कर्तव्य

 उपनिहिती को कारित हानि की प्रतिपूर्ति करने का दायित्व

उपनिधान के प्रकार

 निक्षेप या जमा (Deposit)

 भाड़ा (Hire)

 गिरबी (Pledge)

 मँगनी (अनुदान)

 माल का परिदान

उपनिहिती के अधिकार (धारा 155, 158, 164, 171, 180 एवं 181) (Right of Bailee’s)

 उपनिहित माल में हित धारण करने का अधिकार

 व्यय वसूल करने का अधिकार

 क्षतिपूर्ति वसूल करने का अधिकार

 उपनिहिती का विशिष्ट धारणाधिकार

 दोषकर्ता के विरूद्ध वाद लाने का अधिकार

 अभिप्राप्त अनुतोष या प्रति में हित धारण करने का अधिकार

उपनिहित का कर्तव्य (धारा 151-157, 159-161, 163 एवं 165-167) (Duties Bailee’s)

 सतर्कता का कर्तव्य

 अप्राधिकृत प्रयोग न करने का कर्तव्य

 वस्तु (माल) को मिश्रित न करने का कर्तव्य

 वस्तु या माल को वापस करने का कर्तव्य

 माल में हुई वृद्धि को वापस करने का कर्तव्य

गिरवी (धारा 172-181)>

धारा 172 के अनुसार

किसी ऋण के संदाय के लिये या किसी वचन के पालन के लिये प्रतिभूति के तौर पर माल का उपनिधान गिरवी कहलाता है। उस दशा में उपनिधाता “पणयमकार (Pawnor) कहलाता है और उपनिहिती “पणयमदार” (Pownee) कहलाता है।

गिरवी कौन कर सकता है

सामान्य नियम यह है कि गिरवी केवल माल के स्वामी द्वारा अथवा माल के स्वामी द्वारा इसनिमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा की जा सकती है।

इस सामान्य नियम का अपवाद धारा 178,178-क एवं 179 अपवाद प्रस्तुत करते है।

पणयमदार या गिरवीदार के अधिकार एवं कर्तव्य (Right and Duties of Pawnor and Pawnee)

1- धारा 173 गिरवीदार को प्रतिधारण का अधिकार प्रदान करता है। प्रतिधारण के अधिकार के सम्बन्ध मे धारा 174 कहता है। कि जिस ऋण या वचन के लिए माल का गिरवी रखा गया है, गिरवीदार उससे भिन्न ऋण या वचन के लिए गिरवी रखे माल को रोक नहीं सकता है। जब तक की उनके बीच ऐसी कोई संविदा न हो।

धारा 175 के अनुसार पणयमदार या गिरवीदार गिरवी माल की सुरक्षा के सम्बन्ध मे किये गये गैर मामूली व्ययों को गिरवीकर्ता से वसूल कर सकता है।

धारा 176 के अनुसार जब पणयमकार ऋण का भुगतान न करे तो पणयमदार को धारा-176 के तहत दो अधिकार प्राप्त है, पहला यह कि वह भुगतान के लिये वाद ला सकता है और माल को प्रतिभूति के रूप में रोक सकता है। द्वितीय यह कि वह पणयमकार को उचित सूचना देकर माल बेच सकता है।

धारा 177 में व्यतिक्रम करने वाले पणयमकार को मोचनाधिकार प्राप्त है।

 

P.T Question

 
  1. निम्न मे से कौन सी धारा उपनिहिती को परिभाषित करती है?

(a) धारा 148

(b) धारा 149

(c) धारा 150

(d) धारा 151

 
  1. ‘क’ एक गौ को देखभाल के लिये ‘ख’ की अभिरक्षा में छोड़ता है। गौ के बछड़ा पैदा होता है। निम्न मे से किस पर बछड़े का हक होगा।

(a) ‘क’ पर

(b) ख पर

(c) दोनों पर

(d) दोनों में से किसी पर भी नहीं

 
  1. पाई गई चीज के बारे में पड़े पाने वाले के विधिपूर्ण प्रभार उसके मूल्य की कितनी सीमा तक पहुच जाए तो वह उसे बेच सकेगा-

(a) एक तिहाई

(b) दो-तिहाई

(c) चार-तिहाई

(d) आधा

 
  1. निम्न मे से कौन सी धारा गिरवी की परिभाषा से सम्बन्धित है?

(a) धारा 172

(b) धारा 173

(c) धारा 175

(d) धारा 174

 
  1. निम्न मे से कौन सी धारा विशिष्ट धारणाधिकार से सम्बन्धित है

(a) धारा 166

(b) धारा 167

(c) धारा 170

(d) धारा 171


PAHUJA LAW ACADEMY

अभिकरण (Agency)

(धारा 182 से 238)

CLASS LECTURE – 13


MAINS QUESTIONS

 
  1. अभिकरण से आप क्या समझते है अभिकर्ता के अधिकार और कर्तव्य बताइये?
 
  1. अभिकर्ता से आप क्या समझते है? क्या एत अभिकर्ता अपभिकर्ता को नियुक्त कर सकता है?
 
  1. क्या एक अवयस्क को अभिकर्ता बनाया जा सकता है? यदि हाँ तो उसके कर्त्तव्यों की जाँच आप किस प्रकार करेंगे।

 

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अभिकरण (Agency)

(धारा 182 से 238)

CLASS LECTURE – 13

 

मालिक और अभिकर्ता के सम्बन्ध को अभिकरण कहते है। संविदा अधिनियम की धारा 182 अभिकर्ता और मालिक को परिभाषित करती है। जिसके अनुसार-

अभिकर्ता वह व्यक्ति है जो किसी अन्य की ओर से कार्य करने के लिए या पर व्यक्तियों से व्यवहारों में किसी अन्य प्रतिनिधित्व करने के लिए नियोजित है। वह व्यक्ति जिसके लिए ऐसा कार्य किया जाता है या जिसका इस प्रकार प्रतिनिधित्व किया जाता है मालिक कहलाता है।

धारा 183 के अनुसार-

के अनुसार वह व्यक्ति जो विधि के अनुसार वयस्क एवं स्वस्थचित्त है, अभिकर्ता नियोजित कर सकता है।

धारा 184 के अनुसार-

कोई भी व्यक्ति अभिकर्ता हो सकेगा किन्तु कोई भी व्यक्ति जो वयस्क और स्वस्थचित्त न हो अभिकर्ता ऐसे न हो सकेगा कि वह अपने मालिक के प्रति इसके उपबन्धों के अनुसार उत्तरदायी हो।

धारा 185 के अनुसार-

उपबन्ध करता है कि अभिकरण के सृजन हेतु कोई प्रतिफल आवश्यक नहीं है।

अभिकरण के सम्बन्ध की स्थापना निम्न ढंग से होती है-

 स्पष्ट रूप से नियोजन द्वारा

 पक्षकारों के आचरण या सम्बन्ध द्वारा

 परिस्थितियों की आवश्यकताओं द्वारा

 अनुसमर्थन द्वारा

अभिकर्ता के कर्तव्य (Duties of Agent)

 मालिक द्वारा सौंपे कृत्य को करने का कर्तव्य

 मालिक के आदेशानुसार कार्य करने का कर्तव्य।

 युक्तियुक्त तत्परता तथा कौशल प्रयोग करने का कर्त्तव्य

 कर्तव्य तथा हित का टकराव रोकने का कर्तव्य

 मालिक से सम्पर्क रखने का कर्त्तव्य

 गुप्त लाभ प्राप्त न करने का कर्त्तव्य

 प्राप्त राशियोँ का सदांय करने का कर्तव्य

 वही खाते रखने का कर्तव्य आदि

अभिकर्ता के अधिकार (Rights of Agent)

 पारिश्रमिक प्राप्त करने का अधिकार

 राशि प्रतिधारण का अधिकार

 धारणाधिकार

उपअभिकर्ता (Sub-agent)

धारा 191 के अनुसार- “उपअभिकर्ता वह व्यक्ति है, जो अभिकरण के कारबार में मूल अभिकर्ता द्वारा नियोजित हो और उसके नियन्त्रण के अधीन कार्य करता हो।”

 
  1. निम्न मे अभिकर्ता के लिए आवश्यक है कि वह-

(a) वयस्क हो

(b) स्वस्थचित्त हो

(c) उपरोक्त दोनों

(d) उपरोक्त मे से कोई नहीं

 
  1. निम्न मे से कौन सी धारा यह उपबन्ध करती है कि अभिकरण के सृजन हेतु कोई प्रतिफल आवश्यक नहीं है।

(a) धारा 183

(b) धारा 185

(c) धारा 184

(d) धारा 196

 
  1. अभिकरण के सम्बन्ध की स्थापना किस ढंग से होती है-

(a) स्पष्ट रूप से नियोजन द्वारा

(b) पक्षकारों के आचरण या सम्बन्ध द्वारा

(c) अनुसर्मन द्वारा

(d) उपर्युक्त सभी

 
  1. धारा 191 के अनुसार उपअभिकर्ता नियुक्त किया जाता है?

(a) मूलअभिकर्ता द्वारा

(b) मालिक द्वारा

(c) मालिक द्वारा अधिकृत व्यक्ति द्वारा

(d) उपर्युक्त मे से कोई नहीं

 
  1. उपअभिकर्ता अपने कार्यो के लिए किसके प्रतिग्रहण उत्तरदायी है।

(a) मालिक के प्रति

(b) अभिकर्ता के

(c) स्वयं के प्रति

(d) उपर्युक्त मे से कोई नहीं


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