Lectures of Evidence

Lectures of Evidence

भारतीय साक्ष्य अधि. 1872

  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872, 1 सितम्बर, 1872 को प्रवृत हुआ
  • इसमें कुल 11 अध्याय व 167 धाराएँ है,
  • यह स्टीफेन की देन है
  • इसका सबसे बड़ा अध्याय, अध्याय दो में कुल 51 धाराएँ है व सबसे छोटा अध्याय 11 है जिसमे केवल 1 धारा है. इसमें कुल तीन भाग है.
  • इसका विस्तार समस्त भारत पर है निम्नलिखित पर नहीं है-
  1. जम्मू-कश्मीर राज्य
  2. आर्मी एक्ट, नेवल डिसिप्लेन एक्ट, इंडियन नेवी, डिसिप्लेन एक्ट, एयर फ़ोर्स एक्ट
  • शपथ पत्र
  1. मध्यस्थों के समक्ष कार्यवाही
  2. अध्याय 1 की धारा 3 में कुल 10 परिभाषाएं है-
  3. न्यायालय- इसमें आते है-
  4. न्यायधीश
  5. मजिस्ट्रेट
  • साक्ष्य लेने के वैध रूप से प्राधिकृत व्यक्ति इसमें नहीं आते- मध्यस्थ
  1. तथ्य –
  2. वस्तु, वस्तुओ की अवस्था, वस्तुओ का सम्बन्ध जो इन्द्रियों द्वारा बोधगम्य हो
  3. मानसिक दशा जिसका मान किसी व्यक्ति को हो
  4. सुसंगत- इसका अर्थ वह है जो धारा 5 से धारा 55 तक सुसंगत
  5. विवंधक- विवाधक वह है-
  6. जिस पर पक्षकारो मे आपस मे मतभेद हो.
  7. जिस पर उनके दायित्व व अधिकार निर्भर करे.
  8. दस्तावेज- से ऐसा विषय है जो किसी पदार्थ पर अक्षरों, अंको, चिन्हों के साधन द्वारा अभिव्यक्त या वर्णित हो,
  9. साक्ष्य-
  10. कथन जिनके जान्चाधीन विषयों के सन्दर्भ मे न्यायालय अपने समक्ष साथियो द्वारा द्वारा किये जाने की अनुज्ञा देता है
  11. न्यायालय के निरिक्षण के लिए पेश दस्तावेज जिसमे इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख भी है
  12. साबित- कोई तथ्य साबित कहा जाता है जब न्यायालय अपने समक्ष के विषयों पर विचार करने के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुचे कि इसका अस्तित्व है या प्रज्ञावान व्यक्ति को उस मामले मे विश्वाश करना चाहिये कि अस्तित्व है
  13. नासबित- जब यह विश्वास करे कि अस्तित्व नहीं है या प्रज्ञावान भी यह विश्वास करे की यह अस्तित्व नहीं
  14. साबित नहीं हुआ- जब कोई न तो साबित किया जाता है न नासबित तब साबित नहीं हुआ.

 

  1. प्रारूप- सर जेम्स स्टीफन

गवर्नर जनरल की सहमति – 15 मार्च 1872

प्रवर्तन मे आने की तिथि – 1 सितम्बर 1872

  1. प्रस्तावना :
  2. प्रस्तावना अधि. का भाग नहीं होते है ( भारत के संविधान की प्रस्तावना संविधान का भाग है )
  3. यह समेकनकारी,परिभाषानकारी,संशोधनकारी है|
  • समेकनकारी होने के कारण यह अधि. साक्ष्य सम्बन्धी समस्त पूर्व विधियों को निरसित करता है | धारा 2 मे निदृष्ट विधियाँ निरसन के विरूद्ध संरक्षित की गयी थी| धारा 2 के साथ सलंग्न अनुसूची के साथ पठनीय थी|
  1. धारा 2 तथा सूची निरसन अधि. 1938 of 1938 द्वारा निरसित किये जा चुके है |
  2. साक्ष्य अधि. की प्रकृति :
  3. प्रक्रियात्मक विधि (ramjas vs surendra nath 1980)
  4. विशेष विधि( ram naresh vs emperor 1939)
  • lex fori ( bain vs whhite ravan and furness junction r/y co, 1850)
  1. ऐसा साक्ष्य जो अधिनियम द्वारा अग्र्ह्य घोषित किया गया है उसे इस आधार पार भी ग्रहण नहीं किया जा सकता की सत्य का पता लगाने के लिए उसका ग्रहण किया जाना आवश्यक है | (shri chand nandi vs r. nandi,1941, pc)

 

  1. अधि. का उद्देश्य:
  2. बेहतर तथा समरूप नियम उपलब्ध कराना |
  3. साक्ष्य की ग्रह्यता के सम्बन्ध मे अस्थिरता तथा अनिश्चितता का निवारण करना |

 

  1. प्रयोज्यता :
  2. अधि. बृहत तथा व्यापक है, किन्तु यह सम्पूर्ण नहीं है |
  3. समस्त न्यायिक कार्यवाहियो पर लागू है | कोर्ट मार्शल पर भी लागू है कुछ कोर्ट मार्शल अपवाद है | मध्यस्थं तथा शपथ पत्रों पर लागू नहीं नहीं है |
  • जम्मू तथा कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर लागू है |
  1. प्रक्रियात्मक विधि होते हुए भी इसका कुछ भाग सारवान प्रकृति का भी है |
  2. धारा 115, 52 तथा 23 केवल सिविल मामलों मे लागू है |
  3. धारा 29,105,111A, 113B, तथा 114’a’ दांडिक मामलो मे लागू है |
  4. अधि. द्वारा व्यवहत विषय:
  5. ऐसे तथ्य जिन्हें सिद्ध करना आवश्यक नहीं है
  6. ऐसे तथ्यों जिन्हें सिद्ध किया जा सकेगा |
  • सिद्द करने से सम्बंधित नियम
  1. तथ्यों को सिद्ध करने का ढंग
  2. सिद्ध भरिता विषयक नियम
  3. सक्षम साक्षी
  • सक्ष्यिक बल का अवधारण
  • सुसंगति तथा ग्राह्यता
  1. अधि. की योजना :
  2. अधि. तीन भागो मे विभक्त है | तीन भागो मे कुल मिलाकर 11 अध्याय है |-
  3. भाग एक ( धारा 1 से 55)———————–तथ्यों की सुसंगति
  • भाग तीन (धारा 101-167)———————-साक्ष्यो का प्रस्तुतीकरण तथा प्रभाव
  1. भाग दो ( धारा 56-100)————————-सबुत के बारे मे
  2. तीनो भागो के अतिरिक्त अधि. मे एक अनुसूची भी थी यह अनुसूची निरसन अधि. 1938 द्वारा निरसित की जा चुकि है|

एक संव्यवहार का भाग निर्मित करने वाले तथ्य

सामान्य :

  1. केवल विवाधक तथ्य सुसंगत तथ्यों को सिद्ध किया जा सकता है अन्य किसी तथ्यों को नहीं धारा 5 लोक नीति पर आधारित है धारा 136 का पैरा 1, धारा 5 का वैधानिक अनुप्रयोग है |
  2. ऐसा तथ्य जो स्वयं विवध नहीं है किन्तु जो विवाद तथ्य से इस प्रकार ससन्क्त है की वह एक संव्यवहार का भाग निर्मित करते हो सुसंगत होगा इस सिद्धांत को धारा-6 मे अंगीकृत किया गया है आंगल विधि मे इस नियम को रेस जेस्टे का सिद्धांत कहा जाता है
  3. धारा- 6 अनुश्रुत साक्ष्य के अपवर्जन के नियम का एक अपवाद है

धारा 6 के आवश्यक तत्व

  1. धारा 6 के उपबंध :

“जो तथ्य विवाध न होते हुए भी किसी विवाधक तथ्य से उस प्रकार संशक्त है कि वे एक ही संव्यवहार के भाग है, वे तथ्य सुसंगत है, चाहे वे उसी समय और स्थान पर या विभिन्न समयों और स्थानों पर घटित हुए हो|”

  1. संव्यवहार :
  2. संव्यवहार शब्द धारा 6 मे पर्युक्त महत्वपूर्ण शब्द है, किन्तु इसे अधि. मे परिभाषित या स्पष्टीकृत नही किया गया है| अत: संव्यवहार शब्द को उसके सामान्य अर्थ मे लिया जायेगा|
  3. स्टीफन के अनुसार: “संव्यवहार परस्पर सम्बन्ध तथ्यों का एक ऐसा समूह है जिसे संविदा अपकार या जाचाधीन अन्य कोई विषय के रूप मे संदर्भित किया जा सकता है
  • फिकसन के अनुसार: “संव्यवहार भौतिक तथ्यों की या संबध भौतिक तथ्यों की एक श्रंखला है, साथ कहे गये शब्दों के साथ”
  1. निर्णय
  2. आर बनाम बेन्डिंगफिल्ड1879
  3. रटन बनाम क्वीन, 1971
  • ओह द्वारा बनाम एस.ऍम.टी कम्पनी लि. 1941 sc ऑफ़ स्कॉटलैंड
  1. आर. बनाम बेन्डिंगफिल्ड धारित: कहे गये शब्द उत्तरवर्ती कथानक के रूप ने नहीं चाहिये यदि वह उत्तरवर्ती कथानक अर्थात प्र्त्थक्रित शब्द है तो वे भिन्न संव्यवहार के भाग के रूप में सुसंगत नहीं होंगे|
  2. रटन बनाम क्वीन 1971 धारित: कहे गये शब्द उसी संव्यवहार का भाग है या नही यह पाना प्राय: कठिन होता है बाह्य विषय विचारणीय तो है किन्तु निर्णायक नहीं उत्तरवर्ती शब्द तारतम्यता पूर्ण तथा अप्रथ्कृत होने चाहिये ताकि प्रित्बध्ह व्यक्तियो द्वारा सिखाये पढाये जाने की सम्भावना न रह जाए|
  3. ओह द्वारा बनाम एस.सम. टी लि. 1941 धारित: कहे गये शब्द उसी संव्यवहार का भाग है या नही यह अवधारित करते समय न्यायालय को सतर्क रहना चाहिये यदि उत्तरवर्ती शब्द नर्सेंगिक रूप से तथा तारतम्यता से सम्बन्ध है तो उन्हें उसी संव्यवहार का भाग माना जायेगा

आलोचना:

  1. प्रो. स्टर्नके अनुसार-

“कोई भी सक्ष्यिक समस्या इतनी भ्रामक तथा संदिग्ध नही है जितनी कि रेस जेस्टे का सिद्धांत”

  1. प्रो. बगिमोर के अनुसार-

“रेस जेस्टे का सिद्धांत न केवल व्यर्थ है बल्कि क्षतिकारी भी| व्यर्थइसलिए क्योंकि इस सिद्धांत का प्रत्येक भाग तथ्यों की सुसंगति किसी न किसी नियम द्वारा आच्छादित है|

रेस जेस्टे का सिद्धांत

इस धारा का सिद्धांत यह है कि जब कोई संव्यवहार, जैसे कि कोई संविदा या अपराध, विवाधक तथ्य हो,तो प्रत्येक ऐसे तथ्य का साक्ष्य दिया जाता है जो उसी संव्यवहार का एक भाग है| यह धारा आंग्ल विधि के उस सिद्धांत पर आधारित है जिसे रेस जेस्टे का सिद्धांत कहते है, यधपि ये शब्द धारा मे प्रयोग न्हिन्न किये गये है| कारण यह है कि यह सिद्धांत अनिश्चितता को जन्म देता है | ये शब्द लैटिन भाषा के है और इनके शाब्दिक अर्थ है “ जो काम किया गया है” और जब अंग्रेजी मे अनुवाद किया जाये तो अर्थ यह होंगे “ऐसे कथन तथा कार्य जो किसी संव्यवहार के साथ हुए है|” जो मामले न्यायालय के सामने आते है उनमे कोई न कोई घटना छिपी रहती है | प्रत्येक घटना से जुड़े हुए कुछ कार्य , लोप तथा कुछ कथन होते है | प्रत्येक ऐसा कार्य, लोप या कथन जिससे संव्यवहार की प्रकृति पर कुछ प्रकाश पड़ता है या जो उसके सही रूप या गुण को दर्शाता है, उसे संव्यवहार का भाग कहा जाता है और इसका साक्ष्य दिया जा सकता है | EXAMPLE: रटन बनाम क्वीन मे:

एक व्यक्ति पर अपनी पत्नी की हत्या का आरोप था| उसका कहना था कि गोली दुर्घटनावश चल गयी थी | एक साक्ष्य यह था की अभियुक्त की पत्नी ने टेलीफ़ोन मिलाया और आपरेटर से लड़की ने कहा: “मुझे पुलिस दीजिये” आपरेटर अभी कुछ भी न कह पाई थी कि स्त्री जो बहुत तकलीफ से बोल रही थी उसने जल्दी से अपना पता बताया और कॉल ठप हो गई| ओपरेटर ने पुलिस को सूचित कर दिया, पुलिस वहां पहुंची और स्त्री का शव पाया | उसके द्वारा टेलीफ़ोन करना और पुलिस माँगना उसकी हत्या के संव्यवहार का भाग मानते हुए सुसंगत साक्ष्य ठहराए गये | घबराहट की हालत मे उसका टेलीफ़ोन करना यह बताता था कि उसकी हत्या साशय थी, दुर्घटना वश नहीं थी | क्योंकि किसी दुर्घटना से पीड़ित व्यक्ति को स्वप्न मे यह सूझ नहीं सकता था की वह दुर्घटना से पहले ही पुलिस को बुला ले |

रेस जेस्टे के सिद्धांत का यही एक लाभ है | यह न्यायालय को प्रत्येक संव्यवहार के सभी आवश्यक अंग ध्यान मे लेने की अनुज्ञा देता है |

संव्यवहार तथ्यों के ऐसे समूह को कहते है जो दुस्सरे से इतने जुड़े रहते है की उन्हें एक ही नाम दिया जा सकता है;  जैसे- कोई अपराध संविदा, कोई दुष्कृति या जांच-पडताल का कोई भी ऐसा विषय जो विवाधक हो | मोटे तौर पर संव्यवहार किसी भी भौतिक कार्यो के लिए जिसमें वे कथन भी सम्मिलित होंगे जो कार्य या कार्यो के साथ होते चले गये हों|

किसी भी संव्यवहार को सही रूप से तभी समझा जा सकता है जब उसके सभी आवश्यक अंग साथ-साथ देखे जायें, अलग होकर नहीं | यह कहना बिलकुल गलत होगा की साक्ष्य केवल बंदूक के चलने तक या गोली के धसने तक सीमित रखना चाहिये और जो घटना हो रही थी जिसका कि वह भाग था उसे ध्यान मे न लिया जाये| तदनुसार ओ लियरी बनाम रेगेम मे, हत्या के पूर्व आक्रमण जो अभियुक्त जो अभियुक्त ने किये थे उनका साक्ष्य ग्राह्य माना गया, क्योकि वह उस रात होने वाली निरंतर घटनाओ का एक भाग था |

कार्य या लोप : जहाँ तक संव्यवहार के साथ होने वाले कार्य या लोप का प्रश्न है, कोई विशेष कठिनाई पैदा नहीं होती| संव्यवहार की प्रकृति के साथ होने वाले कार्य या लोप का प्रश्न है, कोई विशेष कठिनाई पैदा नहीं होती | संव्यवहार की प्रकृति ही यह स्पष्ट कर देती है उसके आवश्यक अंग क्या है|  मान लीजिये की भारतीय सरकार को बाल द्वारा बदल देने का षड्यंत्र है| इस प्रयोजन के लिए कलकत्ता मे पैसा जमा किया जाता है, मद्रास मे यंत्र और बम्बई मे ट्रेनिंग दी जाती है | ये सब कार्य चाहे एक दुसरे से समय और स्थान मे दूर दूर है; फिर भी एक ही संव्यवहार के भाग हैं | निरंतर प्रकार के सभी व्यवहारों पर यही सिद्धांत लागू है | इसी प्रकार, जब यह प्रश्न हो कि क्या किसी संविदा के पालन हेतु माल का प्रदान हो चुका है, तब यह तथ्य कि माल कई ऐसे मध्यवर्ती व्यक्तियों को दिया गया था ताकि वह क्रेता तक पहुँच जायें, सुसंगत होगा, क्योकि एक के क्योकि एक के बाद एक होने वाले प्रदान विक्रय के संव्यवहार के भाग है तो उस पत्र व्यवहार मे लिखा गया प्रत्येक पत्र उस संव्यवहार का भाग होगा |

मिलने बनाम लेसलर एक अन्य एक उदहारण है| इसमें प्रश्न यह था की संविदा किसी व्यक्ति के सथ उसकी व्यक्तिगत हैसियत से या अभिकर्ता होने के नाते से की गयी थी | यह तथ्य कि पक्षकार ने अपने दलाल से पत्र द्वारा कुछ पुछताछ कि थी, सुसंगत माना गया | यदि उसने केवल अपने लिपिक को यह बताया कि वह ‘ग’ से नहीं बल्कि ‘ख’ से संविदा कर रहा था, यह बात चाहे संविदा के समय ही कही गयी होती, सुसंगत न होती | उपरोक्त वाद मे ख के कहने पर पुछताछ की गयी थी और इस उदेश्य के लिए कि इससे विक्रेता की शोध्य क्षमता के बारे मे पता लग जाता था, जिसके बगैर संव्यवहार ही न हुआ होता इसलिये उसको रेस जेस्टे का भाग माना गया |

बलातकार्य की विलंबित सुचना- बलातकार्य के मामलें मे केवल विलम्ब से की गयी प्रथम इत्लाह सुचना अभियोजन- पक्ष के मामले को रद्द नहीं कर सकती | परन्तु यह तथ्य कि सुचना देर से की गयी है, एक सुसंगत तथ्य है और इसे ध्यान मे रखना चाहिये |

कथन – कुछ कथन भी भौतिक घटनाओ के साथ हुआ करते है| उदहारण के लिए घायल होने पर प्राय: प्रत्येक व्यक्ति चिल्लाता है| वह चाहे दर्द के कारण चिल्लाये, चाहे सहायता के लिए और उस आदमी का नाम पुकारे जिसने उससे घायल किया | यदि संव्यवहार, जैसे की कोई दुर्घटना, किसी सार्वजनिक स्थान पर हुई हो तो कई लोग इकट्ठे हो जायेंगे और घटना और घटना के बारे मे बातचीत करते रहेंगे| प्रश्न यह है कि किस सीमा तक ऐसे कथन संव्यवहार का भाग माने जा सकते है? इस धारा के साथ दिया गया प्रथम दृष्टांत इसी विषय पर है | इसमें एक व्यक्ति को पीट-पीट कर मार दिया गया है | जो भी कार्य या कथन अपराधी ने या मृतक ने या मार-पीट को देखने वाले व्यक्तियों ने किये, जो मार-पीट के साथ या उसके कुछ देर बाद तक हुए हों वे उसी मार-पीट के भाग माने जायेंगे और वे इसलिये सुसंगत भी होंगे|

हेतु तैयारी तथा आचरण sec 8

सामान्य:

  1. केवल विवाधक या सुसंगत तातःय सिद्ध किया जा सकेगा अन्य कोई नहीं यह नियम लोक निति पर आधारित है धारा 136 का प्रथम खंड, धारा 5 मे प्रावधानित नियम का वैधानिक अनुप्रयोग है
  2. धारा 8 के अंतर्गत निम्नलिखित चीज़े सुसंगत है-
  3. विवाधक तथ्य या सुसंगत तथ्य का हेतु दर्शाने या गठित करने वाले तथ्य
  4. विवाधक तथ्य तथा सुसंगत तथ्य की तैयारी दर्शाने या गठित कारने वाले तथ्य
  • पूर्ववर्ती या उत्तरवर्ती आचरण

 

  • हेतु दर्शाने या गठित करने वाले तथ्य
  1. विवाधक तथ्य तथा सुसंगत तथ्य का हेतु दर्शाने या गठित करने वाले तथ्य सुसंगत है धारा 8 के दृष्टांत A तथा B सन्दर्भ योग्य है?
  2. हेतु:
  3. यह मानसिक तत्व है यह प्रेरक शक्ति है यह कहा जाता है कि बिना हेतुक के शायद ही कोई कार्य किया जाता है|
  4. हेतु अभियुक्त तथा परिवादित कृत्य को सम्बन्ध करने मे सहायक सिद्ध होता है यह प्रकरण की बेहतर समझ मे सहायक है इससे यह निर्धारित करने मे सहायता मिलती है कि अभियुक्त का कृत्य संशय था या नहीं |
  • अपराध की गंभीरता बढ़ने के सथ ही हेतु का महत्व भी बढ़ जाता है यह कहा जाता है कि जितना ही गंभीर कृत्य होगा उतना ही महत्वपूर्ण हेतु हो जायेगा
  1. हेतु की पर्याप्तता सारहीन है| मामूली हेतु गंभीर अपराध का आधार हो सकता है इसके विपरीत बड़ा से बड़ा हेतु सचरित्र व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता है|
  2. यधपि हेतु सुसंगत है किन्तु यह निर्णायक नहीं है| यह दांडिक दायित्व के निर्धारण का आधार नहीं हो सकता है अत: जहाँ अपराध के आवश्यक तत्व सिद्ध हो जाते है, वहां अभियुक्त दोषसिद्धि के योग्य होगा भले ही हेतुक निर्धारित न हो सका हो इसी प्रकार, अभियुक्त दोषमुक्ति का प्राधिकारी होगा यदि अपराध के आवश्यक तत्व सिद्ध नहीं हो पाते है भले ही हेतुक सिद्ध हो गया हो|

 

  1. निर्णय:
  2. सरवाराम बनाम मध्य प्रदेश 1992 sc

सरवाराम का प्रकरण धारित: परिस्थिति जजनी साक्ष्य पर आधारित मामले मे हेतु काफी महत्वपूर्ण होता है| ऐसे मामले में हेतु काफी महत्वपूर्ण होता है | ऐसे मामले मे हेतु का अनवधारित रह, जाना दोषमुक्ति का आधार हो सकता है

  1. बाबुलोधी बनाम स्टेट यू.पी. 1987

बाबुलोधी का प्रकरण धारित: ऐसा मामला जिसमे अभियुक्त की दोषिता का प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध हो, उसमे हेतु लगभग महत्वहीन हो जाता है

  • तैयारी दर्शाने या गठित करने वाले तथ्य :
  1. विवाधक तथ्य या सुसंगत तथ्य की तैयारी दर्शाने या गठित करने वाले तथ्य सुसंगत है धारा 8 के दृष्टांत c तथा d संदर्भित योग्य है |

 

  1. तैयारी :
  2. तैयारी किसी कार्य को करने हेतु व्यवस्था बनाने तथा साधन जुटाने से निर्मित होती है|
  3. यह कहा जाता है कि तैयारी के बिना शायद ही कोई कृत्य किया जा सकता है|
  • तैयारी दर्शाने या गठित करने वाले तथ्य सुसंगत है|
  1. तैयारी दर्शाने वाले तथ्य प्रकरण की बेहतर समक्ष मे सहायक होते है तथा
  2. तैयारी दर्शाने वाले तथ्य आभियुक्त को उसके कृत्य से सम्बन्ध करने मे सहायक है |

 

  • आचरण की सुसंगति
  1. व्यवहार तथा प्रतिक्रिया का बही प्रदर्शन आचरण निर्मित कारता है
  2. निम्नलिखित व्यक्तियों का पूर्ववर्ती या उत्तरवर्ती आचरण सुसंगत है-
  3. वाद या कार्यवाही के पक्षकार
  4. वाद या कार्यवाही के पक्षकारो के अभिकर्ता
  • अभियुक्त व्यक्ति
  1. उपरोक्त व्यक्तियों का आचरण –
  2. वाद या कार्यवाही के सन्दर्भ मे या
  3. वाद या कार्यवाही मे सुसंगत या विवाधक तथ्य के सन्दर्भ में सुसंगत है|
  4. क्या आचरण मे कथन शामिल है- स्पष्टीकरण 1
  5. कथन आचरण मे शामिल नहीं है
  6. ऐसे कथन जो कृत्य के साथ है तथा उन्हें स्पष्ट करते है, वे आचरण में शामिल है ( दृष्टान्त j + k)
  7. आचरण कप प्रभावित करने वाले काठन सुसंगत है- स्पष्टीकरण 2
  8. जहाँ किसी व्यक्ति का आचरण सुसंगत है वहां उससे या उसकी मान की दिशा या शारीर की दशा या शारीरिक अनुभूति की दशा दर्शाने वाले तथ्य:s.14 r/w 15
  • सामान्य :
  1. धारा-14 सामान्य प्रकृति की है, इसके अंतर्गत मन की दशा, शारीर की दशा या शारीरिक अनुभूति की दशा दर्शाने वाले तथ्य सुसंगत है धारा 15 विशिष्ट प्रकृति की है यह धारा 14 मे प्रावधानित नियम का व्यापक अनुप्रयोग है
  2. धारा 14 के अंतर्गत मन की ददशा दर्शाने वाले ऐसे समस्त तथ्य सुसंगत है, जो मन की दशा को विशिष्ट संदर्भो में दर्शाते हैं किन्तु धारा 15 में केवल सामान्य घटनाओ की श्रंखला सुसंगत हाई धारा 15 प्र्नालिबध आचरण से सम्बंधित है|

न तो धारा 14 तथा धारा 15 के अंतर्गत समान घटनाओ का साक्ष्य, आरोपित कृत्य व अपराध को सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत करने की अनुमति देगी |

 

  • धारा 14 के आवश्यक तथ्य :
  1. किसी वाद या कार्यवाही मे मन की दशा या शरीर की दशा या शारीरिक अनुभूति की दशा विवध या सुसंगत होता है |
  2. ऐसा कोई भी तथ्य सुसंगत होगा जो विवाध या सुसंगत मन या शारीरिक अनुभूति की दशा को दर्शाता है
  3. मन की दशा दर्शाने वाला तथ्य मन की दशा की विशिष्ट संदर्भो मे दर्शाने वाला होना चहिये
  4. किन्तु जब कि किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के विचारण में इस धारा के अर्थ के अंतर्गत उस आभियुक्त द्वारा किसी अपराध का कभी पहले किया जाना सुसंगत हो, तब ऐसे व्यक्ति की पूर्व दोषसिद्धि भी सुसंगत तथ्य होगी|
  5. मन की दशा दर्शाने वाले तथ्यों के उदा. धारा-14 में संदर्भित की गयी है-
  • आशय
  • ज्ञान
  • सदभाव
  • उपेक्षा
  • उतावालपन
  • वैमनस्य

निर्णय:

  • आर बनाम प्रभुदास
  • आर बनाम पंचुदास
  • एम्परर बनाम अत्कुमियां हुसैन

 

  1. धारा 15 के आवश्यक तथ्य :
  • न्यायालय के समक्ष यदि यह प्रशन है कि कोई कृत्य जो संशय हो या आकस्मिक|
  • निर्णय:
  1. मोतीलाल राय VS INDUSTRIAL AREA LTD. 1946 कलकत्ता

MOTILAL RAY धारित : एकल कृत्य समान घटनाओ की श्रंखला निर्मित नहीं करता है |

  1. H. GANDHI; 1941 RANGUN
  2. H. GANDHI धारित : एकल कृत्य भी धारा 15 के अंतर्गत सुसंगत हो सकता है |

सामान्य:

  1. धारा 17-31 स्वीकृति तथा संस्वीकृति से सम्बंधित है| यह धाराएँ, धारा 58 तथा 59 के साथ पठनीय है|
  2. स्वीकृत विषयक उपबंध :
  3. स्वीकृति की परिभाषा—————————————- धारा 17 r/w 18, 1920
  4. स्वीकृति की सुसंगति——————————————धारा 21r/w 22,22a,23
  • स्वीकृति विबंध की भाँती प्रवर्तित होती है————————–धारा 31
  1. न्यायिक स्वीकृतियों को सिद्ध करना आवश्यक नहीं है————धारा
  2. संस्वीकृति विषयक उपबंध
  • संस्वीकृति की परिभाषा
  • ऐसी संस्वीकृति जो विसंगत है
  1. धारा 24
  2. धारा 25
  3. धारा 26
  • संस्वीकृति जो सुसंगत है-
  1. धारा 28
  2. धारा 26
  3. धारा 27
  4. धारा 29
  5. धारा 30
  6. धारा 58 तथा 59 के उपबंध :
  7. न्यायिक स्वीकृतियां सिद्ध भारिता का अभिव्यंजन करती है——–s.57
  8. सिवाय दस्तावेज या इले. अभिलेख की अंतर्वस्तु के, मौखिक साक्ष्य से सभी सिद्ध किये जा सकेंगे
  • स्वीकृति-परिभाषा तथा आवश्यक तत्व :
  1. परिभाषा :s.17

“स्वीकृति वह मौखिक या दस्तावेजी या इलेक्ट्रोनिक रूप में अंतर्विष्ट कथन है जो किसी विवाधक तथ्य के बारे में कोई अनुमान इंगित करता है और जो ऐसे व्यक्तियों में से किसी के द्वारा और ऐसी परिस्थितियों में किया गया है जो एत्स्मिनपश्चात वर्णित है”

  1. आवश्यक तत्व:
  2. स्वीकृति एक मौखिक या दस्तावेजी या इले. अभिलेख में अंतर्विष्ट कथन है|
  3. यह एक ऐसा कथन है जो जो विवाधक तथ्य या सुसंगत तथ्य के बारे में अनुपात इंगित करता है|
  • यह अधि. में वर्णित परिस्थितियों में निदृष्ट व्यक्तियों द्वारा किया गया कथन है

आचरण भी स्वीकृति गठित कर सकता है उचित मामला में “मौन” स्वीकृति गठित कर सकता है सक्रिय आचरण भी स्वीकृति गठित कर सकता है यहाँ धारा 8 का दृष्टांत (g) सन्दर्भ योग्य है|

स्वीकृति दायित्व की प्रत्यक्ष अभिस्वीकृति के रूप में हो सकती हैं यह दायित्व का संकेत या अनुमान करने वाला कथन या आचरण भी हो सकती है अनुमान स्पष्ट अभ्रामक तथा बोधगम्य होना चाहिये इसे अस्पष्ट, भ्रमाक या खंडित नहीं होना चाहिये |

  1. कौन स्वीकृति कर सकेगा- ss 18,19,20
  • धारा 18 के अनुसार निम्न व्यक्तियों के कथन स्वीकृति हो सकते है-
  1. वाद या कार्यवाही के पक्षकार
  2. पक्षकारो के प्राधिकृत अभिकर्ता
  3. विषय वस्तु में साम्पतिक या आर्थिक हित धारक व्यक्ति जबकि वे ऐसा हित धारण करते हो|
  4. प्रतिनिधिक हैसियत से वाद संचालित कर रहे या वाद में प्रतिरक्षा कर रहे व्यक्ति का कथन

ऐसे व्यक्तियों का कथन जिनसे पक्षकारो ने हित प्राप्त किया हो

  • धारा 19 के अंतर्गत ऐसे व्यक्ति का कथन स्वीकृति हो सकेगा जिसकी स्थिति या दायित्व पक्षकारो के विरुद्ध सिद्ध की जाती है
  • धारा 20 के अंतर्गत ऐसे व्यक्ति का कथन स्वीकृति होगा जिसे वाद के पक्षकार ने विवादित विषय के सन्दर्भ में सुचना हेतु अभिव्यक्त संदर्भित किया हो धारा 20 मे निदृष्ट विधि विलियम्स बनाम ऐंस के प्रकरण में प्रतिपादित सिद्धांत पर आचरित है| धारा 20 इस सामान्य नियम का अपवाद है कि तृतीय व्यक्ति का कथन सुसंगत नहीं होता है |
  • स्वीकृति की सुसंगत विषयक नियम :
  1. स्वीकृतिया सुसंगत है अत: इन्हें स्वीकृतिकर्ता या उसके हित प्रतिनिधि के विरुद्ध सिद्ध किया जा सकता है
  2. स्वीकृति की सुसंगति के आधार:
  • स्वीकृतियां स्वक्षतिकारी कथन है |
  • स्वीकृतियां सत्य का साक्ष्य समझी जाती है
  • स्वीकृतियां सिद्ध भरिता का अभिव्यंजन गठित करती है
  • स्वीकृतिया विबंध की भांति प्रवर्तित होती है
  1. कौन सी स्वीकृतिया विसंगत है
  • दस्तावेज की अंतर्वस्तु के सम्बन्ध मे मौखिक स्वीकृतियां ( सिवाय जबकि दस्तावेज की सत्यता प्रश्नगत हो जबकि द्वितीयक साक्ष्य ग्राह्य हो
  • इले. अभिलेख की अंतर्वस्तु के सम्बन्ध मे मौखिक स्वीकृतिया विसंगत है ( सिवाय जबकि इले. अभिलेख की अंतर्वस्तु की सत्यता प्रश्नगत हो
  • सिविल मामलो में ऐसी स्वीकृतियां विसंगत है जो इस अभिव्यक्त शर्त के अधीन की गई है कि अनूठा साक्ष्य नहीं दिया जायेगा या ऐसी परिस्थितियों मे की गई स्वीकृति जिनसे न्यायालय यह निष्कर्षित कर रहा हो कि उनके साक्ष्य मे न दिए जाने के सम्बन्ध में पक्षकार परस्पर सहमत हुए थे धारा 23 वृत्तिक संसूचना को प्रकटीकरण के विरुद्ध उन्मुक्ति प्रदान नहीं करती है
  • धारा 22 तथा 22-a में प्रावधानित नियम धारा 59 में प्रावधानित नियम का ही एक पक्ष है| धारा 22 तथा 22-a धारा 59 की प्रजातियाँ है
  1. स्वीकृतिकर्ता या उसका हित प्रतिनिधि या उसकी और से कोई अन्य व्यक्ति स्वीकृति को सिद्ध नहीं कर सकता है इस प्रतिबंध का उदेश्य मिथ्या साक्ष्य गढ़े जाने की सम्भावना का निवारण करना है| अपवाद स्वरुप निम्न स्वीकृतियां प्रतिबंध से मुक्त होगी-
  • ऐसी स्वीकृति जो अपनी प्रकृति से ऐसी है कि यदि स्वीकृतिकर्ता की मृत्यु हो गयी होती तो भी ऐसी स्वीकृति तृतीय व्यक्तियों के मध्य सुसंगत होती है
  • ऐसी स्वीकृति जो अपनी प्रकृति से ऐसी है कि यह किसी मन की दशा या शरीर के अस्स्तित्व से संबंद्धित है तथा ऐसे मन या शरीर की दशा के अस्तित्व मे रहने के दौरान की गयी थी तथा साथ ही वह आचरण के साथ है और उसका मिथ्या होना अनाधि संभाव्य है
  • ऐसी स्वीकृति जो स्वीकृति से अन्यथा सुसंगत है
  1. धारा 23 से सम्बंधित अन्य नियम :
  • धारा 23 लैटिन सूक्ति INTREST REPUBLIC UT SIT FINIS LITIUM
  • लार्ड मेंसफील्ड के अनुसार- सभी व्यक्तियों को शांति क्रय करने की अनुमति दी जानी चाहिये
  • Walker vs wilsher 1889 (lord lindley) के अनुसार- न्यायधीश को उन पत्रों पर विचार  नहीं करना चाहिये जिन पर witout prejudice अंकित रहता है वे विसेशाधिकृत होता है जबकि दूसरा पक्ष ऐसे विशेषाधिकार के प्रति सहमति दिए हो यह भी आवश्यक है कि ऐसा पत्र सद्भावनापूर्ण रहा हो
  • स्वीकृतियां विबंध की भांति प्रवर्तित होती है (धारा 31)
  1. स्वीकृतियां, स्वीकृत विषय पर निश्चायक साक्ष्य नहीं है अत: प्रतिकूल साक्ष्य द्वारा स्वीकृति को मिथ्या सिद्ध किया जा सकता है
  2. यधपि स्वीकृतियां, स्वीकृत विषय पर निश्चायक साक्ष्य नहीं, तथापि यह बिबंध की भांति प्रवर्तित होती है अत: स्वीकृतकर्ता, उत्तरवर्ती अवसर पर अपनी स्वीकृति से मुकर नहीं सकता है |
  3. स्वीकृत तथ्यों को सिद्ध करना आवश्यक नहीं रह जाता है धारा 58 केवल न्यायिक स्वीकृतियों पर लागू होती है | न्यायिक स्वीकृतियां कार्यवाही के भाग के रूप मे या अभिवचनो के माध्यम से की जाती है |
  4. स्वीकृत तथ्यों को स्वीकृत से अन्यथा सिद्ध किये जाने की न्याय. द्वारा अपेक्षा की जा सकती है
  • स्वीकृतियों के प्रकार:
  • स्वीकृतिया तीन प्रकार की हो सकती है-
  1. न्यायिक स्वीकृतियां औपचारिक स्वीकृतियां
  2. न्यायिकेत्तर स्वीकृतिया
  3. आचरण द्वारा स्वीकृति
  4. न्यायिक स्वीकृतियां :
  • यह कार्यवाही के भाघ के रूप मे या अभिवाचानो मे की गई स्वीकृति है
  • यह प्रकल्पित या विविक्षित हो सकती है
  • यह श्रेष्ठ प्रकृति की होती है | यह धारा 58 की परिधि मे आता है यह सिद्ध भरिता का अभिव्यंजन गठित करती है
  • न्यायिक स्वीकृतियां, स्विक्रितिकर्ता को पूर्णत: आबद्ध करती है यह निर्णय का आधार हो सकती है
  1. न्यायिकेत्तर स्वीकृतियां :
  • इसे सक्ष्यिक स्वीकृति भी कहते हाई |
  • यह जीवन कार्यभार के सामान्य अनुक्रम में की गई होती है | यह आकस्मिक या अनौपचारिक बात में की गयी हो सकती है |
  • यह धारा 58 की परिधि की परिधि मे नही है
  1. आचरण द्वारा स्वीकृति :
  • सक्रिय या निष्क्रिय आचरण द्वारा स्वीकृति गठित हो सकती है
  • जहाँ किसी व्यक्ति से किसी बात के खंडन किये जाने की अपेक्षा की जाती है किन्तु वह उस बात का खंडन नहीं करता है, वहां उसका मौन आचरण द्वारा स्वीकृति गठित कर सकता
  1. स्वीकृति केवल तथ्य की ही सकती है विधि की नहीं आंग्ल विधि में विधि की स्वीकृति भी मानी है |

संस्वीकृति

सामान्य:

  1. अधि. की धारा 24-30 संस्वीकृति सम्बन्धी वैधानिक नियम है | अधि. मे संस्वीकृति पद परिभाषित नहीं है स्वीकृति शीर्षक के अंतर्गत स्वीकृति तथा संस्वीकृति दोनों से सम्बंधित उपबंध दिए गये है |
  2. धारा 24-30 संस्वीकृति की सुसंगति से सम्बंधित है इन उपबंधो के निम्नत: वर्गीकृत किया जा सकता है |
  • उत्प्रेरणा, धमकी या वचन के अधीन की गई संस्वीकृति
  • पुलिस को या पुलिस अभिरक्षा में रहते हुए की गयी संस्वीकृति
  • गोपनीयता के वचन आदि के अधीन की गई संस्वीकृति
  • सह-अभियुक्त द्वारा की गई संस्वीकृति की विचारणीयता
  1. संस्वीकृति की पारिभाषा:
  • अधि. में संस्वीकृति पद पारिभाषित नहीं है संभवत: इसका कारण यह है कि संस्वीकृति स्वीकृति की है एक प्रजाति है अत: विधायिका ने इसे पारिभाषित करना आवश्यक नहीं समझा |
  • चूंकि संस्वीकृत स्वीकृति की ही एक ही प्रजाति है अत: स्वीकृति की परिभाषा को ही आवश्यक समायोजनो के साथ संस्वीकृति के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है |
  • सर जेम्स स्टीफन ने धारा 17 मे दी गई परिभाषा के रूप में प्रस्तुत किया परिभाषा निम्नवत है-

“ संस्वीकृति किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति द्वारा इस आशय की स्वीकृति है        कि उसने आरोपित आपराध कारित किया या यह एक ऐसा कथन है जिससे यह

अनुमान इंगित होता है की अभियुक्त ने आरोपित अपराध कारित किया है |

  • पकला नारायण स्वामी 1939 pc के मामले में लार्ड स्टीफन ने सर जेम्स स्टीफन द्वारा प्रस्तुत की गई उपरोक्त परिभाषा को असंतोषजनक बताते हुए परिभाषा के अंतिम भाग को अस्वीकार कर दिया | लार्ड स्टीफन ने संस्वीकृति पद निम्नवत परिभाषित

 

  • संस्वीकृति की सुसंगति आधारिक नियम:
  1. संस्वीकृति की सुसंगति हेतु निम्नलिखित दो मौलिक तथा अनिवार्य अपेक्षाये है-
  • संस्वीकृति को स्वैछिक होना चाहिये तथा
  • इसे सत्य तथा विश्वसनीय नही होना चाहिये

उपरोक्त दोनों अपेक्षाये संयुक्त है अत: दोनों का साथ-साथ सिद्ध किया जाना आवश्यक है| महत्वपूर्ण बात यह है कि सर्वप्रथम संस्वीकृति की स्वेछिकता पूर्व शर्त है

  1. स्वेच्छिकता का निर्धारण :
  • संस्वीकृति की सुसंगति हेतु उसकी स्वेछिकता प्रथम अनिवार्य शर्त है स्वेच्छिकता आश्वस्त करने हेतु अभियुक्त को कुछ अवधि के लिए जेल अभिरक्षा में सुपुर्द किया जा सकता है यह अवधि न्यायिक विवेक के अधीन 36 या 48 या 72 घंटे हो सकती है जेल अभिरक्षा से लाये जाने पर मजिस्ट्रेट उसे यह बतायेगा कि वह संस्वीकृति करने हेतु किसी विधिक बाध्यता के अधीन नही है तथा यह है की ऐसी संस्वीकृति आभियुक्त के विरुद्ध साक्ष्य मे प्रयुक्त हो सकती है | प्रश्न पूछकर मजिस्ट्रेट यह आश्वस्त करेगा कि संस्वीकृत स्वेच्छापूर्वक की जा रही है यदि वह स्वेच्छिक प्रतीत नही हो रही है तो वह संस्वीकृत दर्ज नही करेगा संस्वीकृति धारा 164 crpc. के अनुसार दर्ज की जायेगी
  1. सत्यता तथा विश्वसनीयता का निर्धारण:
  • संस्वीकृति की गहन जांच की जानी चहिये
  • उसे प्रकरण के तथ्य एवं परिस्थितियों मे तथा अन्य उपलब्ध साक्ष्य के परिक्षेप में देखा, परखा जाना चहिये |
  • यदि संस्वीकृत, ऐसे तथ्य परिस्थितियों तथा साक्ष्य के साथ तारतम्यता मे हो तथा उनके साथ समायोजित हो रही हो तथा घटनाओ का एक नेर्संगिक क्रय प्रतीत हो रही हो तो उसे सत्य एवं विश्वसनीय माना जायेगा |
  1. धारा 24-30 संस्वीकृति की सुसंगति के उपरोक्त सामान्य सिद्धांतो का वैधानिक प्रयोग है |

 

 

  • उत्प्रेरणा,धमकी या वचन द्वारा प्रेरित संस्वीकृति : s.24 r/w 28
  1. धारा 24- “अभियुक्त व्यक्ति द्वारा की गई संस्वीकृत दांडिक कार्यवाही में विसंगत होती है, यदि उसके किये जाने के बारे मे न्याया. को प्रतीत होता ही कि अभियुक्त व्यक्ति के विरुद्ध आरोप के बारे मे वह ऐसी उत्प्रेरणा धमकी या वचन द्वारा कराई गई है जो प्राधिकार व्यक्ति की और से दिया गया है |

और जो न्यायालय की राय मे इसके लिए पर्याप्त हो की वह अभियुक्त व्यक्ति को यह अनुमान करने के लिए उसे युक्तियुक्त प्रतीत होने वाले आधार देती है कि उसके करने करने से वह अपने विरुद्ध कार्यवाहीयों के बारे मे एहिक रूप का कोई फायदा उठाएगा या अपने एहिक रूप की किसी बुराई का परिवर्जन का लेगा|”

  1. धारा 28 के अनुसार- “यदि ऐसी कोई संस्वीकृति जैसी धारा-24 में निदृष्ट है, न्यायालय की राय मे उसके मन पर प्रभाव के जो ऐसी किसी उत्प्रेरणा, धमकी या वचन से कारित हुआ है, पूर्णत: दूर हो जान के पश्चात की गई है, तो वह सुसंगत है धारा 28 व्यवहारत: धारा 24 का एक पुस्तक है|
  2. प्यारेलाल भार्गव बनाम ऑफ़ राजस्थान, 1993 sc धारित-

प्राधिकारवान व्यक्ति द्वारा दी गई उत्प्रेरणा,धमकी या वचन संस्वीकृति की स्वेच्छिका को नष्ट कर देते है | ऐसी संस्वीकृति विसंगत होगी भले ही यह सिद्ध न किया जा सका हो की ऐसी उत्प्रेरणा, धमकी या वचन अभियुक्त तक पहुंची थी |

  1. प्राधिकारवान व्यक्ति- उदहारण :
  • न्यायधीश या मजि.
  • न्यायधीश या मजि. के स्टाफ का कोई सदस्य
  • o.
  • अभियोजक
  • उपरोक्त के पत्नी, या पति, निकट सम्बन्धी या व्यक्तिगत मित्र
  1. क्वीन अमप्ररर बनाम मोहन लाल 1881 इलाहाबाद धारित :

जाति से निष्कासन की धमकी आरोप के प्रति संदर्भित नहीं कही जा सकती है अत:  ऐसी धमकी की गई संस्वीकृति विसंगत नही होगी ऐसी संस्वीकृति सिद्ध की जा सकेगी |

  1. ऋतू बनाम स्टेट ऑफ़ यू.पी. 1956 धारित :

उत्प्रेरणा,धमकी या वचन आरोप के सम्बन्ध मे होना चाहिये | जाति से निष्कासन की धमकी एहिक प्रकृति की हानि तो है किन्तु यह आरोप से सम्बंधित नहीं है | अत: संस्वीकृति सुसंगत बनी रहेगी|

  1. केवल नैतिक या आध्यात्मिक उत्प्रेरणा संस्वीकृति को विसंगत नही करती है अत: नि.लि. संस्विकृतियाँ सुसंगत बनी रहेगी-
  • यह सुनिश्चित कर लो कि तुम सत्य ही बोलोगे |
  • आपने एक पाप किया है, अब दूसरा न करो
  • आप मंदिर में है, यहाँ आप झूठ नहीं बोल सकते |
  • पुलिस को या पुलिस अभिरक्षा मे रहने के दौरान की गई संस्वीकृति :ss 25,26,27:
  1. पुलिस से की गई संस्वीकृति :धारा 25
  • धारा 25 के अनुसार-

“किसी पुलिस ऑफिसर से की गई कोई भी संस्वीकृति किसी अपराध के               अभि. व्यक्ति के विरुद्ध साबित न की जायेगी”

  • धारा 25 में प्रावधानित नियम विधि का पूर्ण नियम है |
  • धारा 25 का तार्किक आधार :
  • पुलिस अल्पचार का निवारण करना
  • पुलिस द्वारा निष्ठापूर्ण अन्वेषण बाध्य कारना पुलिस को लघु मार्ग का अनुसरण करने से रोकना
  • गहन अन्वेषण द्वारा वास्तविक दोषी को न्यायिक प्रक्रिया के अधीन लाना
  • अभियुक्त को अपने ही साक्ष्य पर दोषसिद्धि रोकना |
  • पुलिस अधिकारी-व्यापक अर्थ:
  • धारा 25,26 तथा 27 के प्रयोजनों हेतु पुलिस शब्द व्यापक अर्थो मे प्रयुक्त है| पुलिस अधिकारी में पुलिस बल का नियमित सदस्य शामिल है| इसमें ऐसे व्यक्ति भी शामिल है जो पोलिस सद्रश्य शाक्तियां पर्युक्त करते है |
  • राजाराम जसवाल बनाम स्टेट ऑफ़ बिहार, 1964 sc :

आबकारी निरीक्षक या उपनिरीक्षक धारा 25 के प्रयोजनों हेतु पुलिस अधिकारी है-

  • बालकृष्ण बनाम स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र,1951 sc :

RPF का जवान धारा 25 के प्रयोजनों हेतु p.o. नहीं है |

  • क्वीन बनाम जगरूप, 1885 इलाहाबाद धारित:

पुलिस से किया गया असंस्विकृतिकारी कथन सुसंगत होगा|

  • रमेशचंद्र मेहता बनाम स्टेट ऑफ़ वेस्ट बंगाल :1970 sc

पुलिस से की गई संस्वीकृति विसंगत होगी भले ही उस समय, संस्वीकृतिकर्ता औपचारिक रूप से आभियुक्त नही था|

  • एमप्र्र बनाम हारिप्यारी 1881 इलहाबाद धारित -पुलिस की गई संस्वीकृति सुसंगत रहेगी, किन्तु यदि संस्वीकृति प्राप्त करने के लिए गोपनीय अभिकर्ता नियुक्त किया गया था तब संस्वीकृति विसंगत होगी|
  • सीताराम बनाम स्टेट ऑफ़ यू.पी. 1996 sc धारित-

जहाँ हत्यारे ने शव के पास संस्वीकृति युक्त लिखित पत्र इस अआश्य से रख दिया ही कि वह पुलिस के हाथ लग जाये, वहां संस्वीकृति विसंगत नही होगी |

  1. पुलिस अभिरक्षा में रहते हुए की गई संस्वीकृति : s. 26,27
  • पुलिस अभिरक्षा मे रहते हुए किसी व्यक्ति से की गई संस्वीकृति विसंगत विसंगत है |
  • पुलिस अभिरक्षा से तात्पर्य पुलिस नियंत्रण से है | पुलिस नियंत्रण कहीं भी स्थापित किया जा सकता है पुलिस स्टेशन या उसके बहार कहीं भी पुलिस नियन्त्रण स्थापित किया जा सकता है |
  • धारा 26,25 में वर्णित नियम का ही आगे विस्तार है धारा 26 का नीतिगत आधार यह है कि जो कुछ प्रत्यक्ष रूप से नहीं किया जा सकता है उसे परोक्षत: भी करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है |
  • धारा 26 में प्रावधानित नियम विधि का पूर्ण नियम नहीं है|

धारा 26 मे एक अपवाद स्वीकार करती है| इसके अनुसार

“मजि. की साक्षात् उपस्थिति में की गई संस्वीकृति  सुसंगत होगी भले ही संस्वीकृतिकर्ता पुलिस अभिरक्षा मे रहा हो|”

Z.L  AERIAL VS STATE OF M.P, 1954 SC.

इस प्रकरण मे यह धारण किया गया कि साक्षात् या तात्कालिक उपस्थिति से तात्पर्य उस कक्ष में उपस्थिति से है जिसमे अभियुक्त संस्वीकृत करते समय था |

  • धारा 27 पुलिस अभिरक्षा में रहते हुए किये गये ऐसे कथन का उतना अंश सिद्ध किये जाने की अनुमति देती है, जितने से किसी तथ्य का पता चला हो| वस्तुत: धारा 27 पूर्ववर्ती धारा 26 के परंतुक जैसा है| धारा 27 के अनुसार-

“जहाँ पुलिस अभिराक्षधीन अभियुक्त से प्राप्त सुचना के परिणामस्वरूप किसी तथ्य का पता चला हो, वहां ऐसी सुचना का उतना अन्स्श जितना पता चले हुए तथ्य से सुभिन्नता सम्बन्ध है, सिद्ध किया जा सकेगा|”

  • देवमन उपाध्याय बनाम उ.प्र. राज्य, 1966 sc-

इस प्रकरण में इलाहाबाद 4C ने धारा 27 को ART. 21 (3) के प्रतिकूल होने के आधार पर शून्य घोषित कर दिया था| सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद hc के निर्णय को उलटते हुए धारा 27 को सवैधानिक घोषित किया|

 

  • अन्यथा सुसंगत संस्वीकृति,गोपनीयता के वचन आदि के कारण विसंगत नहीं होगी :-

धारा 29

  1. धारा 29 केवल दांडिक मामलो में लागू होती है यह धारा सिविल तथा अन्य मामलों में लागू नहीं होती है |
  2. अन्यथा सुसंगत संस्वीकृति नि.ली. में से किसी आधार पर विसंगत नहीं होगी-
  • यह कि संस्वीकृति गोपनीयता के वचन के अधीन की गई थी|
  • यह कि संस्वीकृति प्रवचनापूर्ण साधनों से प्राप्त की गई थी |
  • यह कि संस्वीकृति मत्तता के दौरान की गई थी |
  • यह कि संस्वीकृति ऐसे प्रश्नों के उत्तर में की गई थी जिनका उत्तर देना अभियुक्त के लिए आवश्यक नहीं था |
  • यह कि अभियुक्त को यह चेतावनी नहीं दी गई थी कि वह संस्वीकृत करने हेतु आबद्ध नहीं था तथा यह कि उसके द्वारा संस्वीकृति साक्ष्य में दी जा सकती है |
  1. “अन्यथा सुसंगत संस्वीकृति” से तात्पर्य ऐसी संस्वीकृति से है जो स्वेच्छिक हो तथा साथ ही वह सत्य एवं विश्वसनीय भी हो|
  • संस्वीकृतिकर्ता तथा उसके साथ उसी अपराध हेतु सयुक्त्त: विचारित व्यक्ति को प्रभावित करने वाली संस्वीकृति धारा 30:
  1. जहाँ एक ही अपराध के लिए संयुक्त्त: विचारित व्यक्तियों मे से कोई एक व्यक्ति स्वयं को तथा संयुक्त्त: विचारित किसी अन्य व्यक्ति को प्रभावित करने वाली संस्वीकृति करता है तथा ऐसी संस्वीकृति सिद्ध हो जाती है, वहां न्यायालय ऐसी संस्वीकृति को संस्वीकृतिकर्ता तथा उसी अपराध हेतु संयुक्त्त: विचारित व्यक्ति दोनों के लिए विचार मे ले सकेगा |
  2. धारा 30 के प्रयोजनों के लिए अपराध में नि. लि. शामिल है-
  • दुष्प्रेरण:इवं
  • प्रयत्न
  1. धारा 30 संस्वीकृति के विचार मेनन लिए जाने का प्रावधान करती है किन्तु यह धारा ऐसी संस्वीकृति के साक्ष्यिक बल के सम्बन्ध मे मौन है| इसमें संदेह नहीं है कि धारा 30 मे संदर्भित संस्वीकृति संस्वीकृतिकर्ता की दृष्टि से पूर्ण सक्ष्यिक बाल धाख करेगी|
  2. CASES:
  • भुभनी साहू बनाम किंग 1949 pc
  • कश्मीरा सिंह बनाम स्टेट ऑफ़ m.p. 1952 sc

उपरोक्त प्रकरणों में यह धारण किया गया कि धारा 30 की परिधि में आने वाले संस्वीकृति संस्वीकृतिकर्ता से भिन्न संयुक्त्त: विचारित व्यक्ति के सन्दर्भ में केवल समर्थनकारी होगी| यह उसकी दोषसिद्धि का आधार नहीं हो सकती है |

 

  • प्रत्याहारी संस्वीकृति:
  1. प्रत्यहारी संस्वीकृति की वैधानिक परिभाषा उपलब्ध नहीं है वस्तुत: अधि. में इस अभिव्यक्ति का कहीं भी प्रयोग नहीं हुआ है अपने सामान्य अर्थो में, प्रत्याहारी संस्वीकृति एक ऐसी संस्वीकृति है जिससे, बाद में संस्वीकृतिकर्ता यह कहते हुए मुकर जाता है कि उसने ऐसी कोई संस्वीकृति नहीं की या उसके द्वारा की गई संस्वीकृति मिथ्या है|
  2. सिद्धांत प्रत्याहरण संस्वीकृति को निष्प्रभावी या विसंगत नहीं बनाता है दुसरे शब्दों में, प्रत्याहरण के बावजूद, संस्वीकृति सुसंगत बनी रहती है|
  3. व्यवहारिक नियम यह है कि प्र्त्याहारी संस्वीकृति की तात्विक विसिष्टियों पर स्वतंत्र साक्ष्य से संपुष्टिकरण की मांग की जानी चाहिये सम्पूर्णता से संपुष्टिकरण आवश्यक नही होगा | संपुष्टिकरण का नियम सतर्कता का नियम है, विधि का नहीं अत: किसी विशेष मामले में संपुष्टिकरण के बिना संस्वीकृति को दोषसिद्धि का आधार बनाया जा सकता है
  4. CASES:
  • स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र बनाम M.K. मैटी 1980: इस प्रकरण में अभियुक्त ने अपनी संस्वीकृति प्रत्याहरित कर ली थी इस संस्वीकृति के आधार पर तस्करी का माल बरामद हुआ इस संस्वीकृति के आधार पर दोषसिद्धि अभिलिखित की गई थी दोषसिद्धि को वैध ठहराया गया |

 

  • प्यारेलाल बनाम स्टेट ऑफ़ राजस्थान 1963 : बिना संपुष्टिकरण के प्रत्याहारी संस्वीकृति के आधार पर दोषसिद्धि अभिलिखित करना सुरक्षित नहीं है| जहाँ मामले के तथ्यों व परिस्थितियों से संस्वीकृत स्वेच्छिका तथा सत्यता स्थापित होती है, वहां बिना संपुष्टि के दोषसिद्धि अभिलिखित करना विधि-विरुद्ध नहीं होता है|

 

  • संस्वीकृति सक्ष्यिक मूल्य तथा उसके प्रकार :
  1. सक्ष्यिक मूल्य
  • संस्वीकृति एक सारवान साक्ष्य है अत: यह दोषसिद्धि का एकल आधार हो सकता है
  • प्रत्यहारित संस्वीकृति भी सिद्धांत दोषसिद्धि का आधार हो सकती है सतर्कता का नियम यह है ऐसी संस्वीकृति को सारवान विशिष्टियों पर संपुष्ट करा लेना चाहिये |
  • संयुक्त्त: विचारित में से किसी एक के संयुक्तता विचारित किसी व्यक्ति को संदर्भित करती है विचारणीय तो होगी, किन्तु उस व्यक्ति की दृष्टि से उसका सक्ष्यिक बाल पुष्टि दुर्भर होगा ऐसी संस्वीकृति केवल समर्थनकारी मूल्य रखेगी

 

  1. संस्वीकृति के प्रकार :
  • न्यायिक संस्वीकृति
  • इसे औपचारिक संस्वीकृति भी कहते है
  • यह न्यायालय के समक्ष या न्यायिक कार्यवाही के भाग के रूप में की जाती है |
  • यह पूर्णत: आबद्धकारी होती है अत: यह दोषसिद्धि का एकल आधार हो सकती है
  • न्यायिकेत्तर संस्वीकृति
  • इसे अनोपचारिक या आकस्मिक संस्वीकृति कहते है
  • यह जीवन या कारबार के सामान्य अनुक्रम में, किन्तु न्यायालय से बाहर की जाती है |
  • यह स्वयं से भी की जा सकती है (साहू vs स्टेट बैंक ऑफ़ up 1996)

इसकी विश्वसनीयता हेतु यह आवश्यक है कि यह अभियुक्त के शब्दों में हो | इसका हेतुक दृश्य होना चाहिये | इसे विश्वसनीय व्यक्ति से किया गया होना चाहिये

मृत्युकालिक कथन

सामान्य:

  1. मृत्युकालिक कथन की सुसंगति विषयक विधि लैटिन सूक्ति “nemo moriturus praesemitur mentire” (अर्थात मृत्युशय्या पर पड़ा हुआ व्यक्ति मिथ्या कथन नहीं करता है) पार आधारित है | मृत्युकालिक कथन की सुसंगति का आधार आवश्यकता तथा औचित्य भी है
  2. मृत्युकालिक कथन धारा 32(1) के अंतर्गत सुसंगत है मृत्युकालिक कथन की सुसंगति अनुश्रुत साक्ष्य के अपवर्जन के नियम का एक अपवाद है
  3. मृत्युकालिक कथन एक सारवान साक्ष्य है अत: यह दोषसिद्धि का एकल आधार हो सकता है
  4. मृत्युकालिक कथन कथनकर्ता की मृत्यु के कारण के बारे मे किया गया कथन है | यह उस संव्यवहार की किसी परिस्थिति के बारे मे किया गया कथन हो सकता है जिसकी परिणिति कथनकर्ता की मृत्यु मे हुई है|
  5. जो कोई d.d का साक्ष्य देना चाहता है उसे प्रथमत: कथनकर्ता की मृत्यु सिद्ध करना होगा
  6. मृत्युकालिक कथन सम्बंधित भारतीय विधि की अपेक्षा व्यापक है| इसे नि. दो बिन्दुओ से समझा जा सकता है-
  • आंग्ल विधि में कथनकर्ता को कथन करते समय मृत्यु की प्रत्याशा में होना चाहिये भारतीय विधि में कथनकर्ता का मृत्यु की प्रत्याशा में होना आवश्यक नहीं है|
  • आंग्ल विधि में d.d. केवल दांडिक कार्यवाही में सुसंगत है भारतीय विधि में d.d. किसी भी कार्यवाही में स्सुसंगत हो सकता है यदि उसमें कथनकर्ता की मृत्यु का प्रश्न उठा है|
  • मृत्युकालिक कथन – आवश्यक तत्व:
  1. कथनकर्ता द्वारा किस्सी स्सुसंगत तथ्य के बारे में मौखिक या लिखित कथन किया गया हो |
  2. कथनोप्रांत, कथनकर्ता की मृत्यु हो गई हो
  3. ऐसे कथनकर्ता ने-
  • अपनी मृत्यु का कारण ; या
  • उस संव्यवहार जिस्सकी परिणिति उसकी मृत्यु में हुई हो कि, किसी परिस्थिति के बारे कुछ कहा हो
  1. कार्यवाही में कथनकर्ता की मृत्यु का कारण प्रसंगत होना चाहिये

उपरोक्त अपेक्षाओ के संतुष्ट होने पर प्रश्नगत कथन d.d के रूप में सुसंगत होगा चाहे कार्यवाही की प्रकृति कुछ भी हो  और चाहे कथन करते समय कथनकर्ता मृत्यु की प्रत्याशा मे हो रहा हो या नहीं

  1. प्रकला नारायण स्वामी बनाम किंग 1939 pc:

इस प्रकरण में शब्द “संव्यवहार की किसी परिस्थिति” का निर्वाचन किया गया यह धारण किया गया कि यह आवश्यक नहीं है:-

  • कथन संव्यवहार के पूर्ण हो जाने के बाद किया गया हो
  • कथानकर्ता कथन करते समय कम से कम मृत्यु के निकट होना चाहिए
  • परिस्थितियां समय तथा स्थान की दृष्टि से मृत्यु की निकटवर्ती रही हो
  1. क्वीन इम्प्ररस बनाम अब्दुल्ला 1885 धारित:

मृत्युकालिक कथन संकेतों के द्वारा भी किया जा सकता है न्यायमूर्ति महमूद ने विसम्मति व्यक्त करते हुए यह अपेक्षित किया की संकेत कथन नियमित नहीं करते है अत: संकेतों द्वारा d.d नहीं किया जा सकता है संकेत धारा 8 के अंतर्गत सुसंगत हो सकते हैंI

  1. दर्शनसिंह बनाम स्टेट ऑफ़ पंजाब धारित: यदि कथनोंपरस्थ कथनकर्ता जीवित बच जाता है तो उसका कथन d.d के रूप में सुसंगत नहीं होगाI ऐसा कथन धारा 157 के अंतर्गत उसके वर्तमान कथन के खंडन या सम्पुष्टिकरण हेतु प्रयुक्त किया जा सकता है I
  • मृत्युकालिक कथन किससे किया जा सकता है
  1. d स्वभाविक रूप से उपलब्ध किसी भी व्यक्ति से किया जा सकता है अत: यह निम्नलिखित में से किसी भी व्यक्ति से किया गया हो सकता है
  • परिवार का कोई सदस्य
  • सेवक
  • चिकित्साकर्मी
  • पुलिसकर्मी
  • पड़ोसी या अधनबी
  1. कोई व्यक्ति कितने ही d.d कर सकता हैI यह भिन्न समयों पर भिन्न-भिन्न व्यक्तियों से किया जा सकता हैI
  2. जहाँ एक से अधिक d.d किये गये हो वहा उनमे विषमता या प्रतिकूलता नहीं होनी चाहिए प्रतिकूलता या विषमता पाये जाने पर d.d संधिग्ध तथा उसका साक्ष्यिक मूल्य गिर जायेगाI
  3. यह भी आवश्यक है कि कथन करते समय कथनकर्ता की मानसिक या शारीरिक स्थितियां स्थिर रही हैI
  • मृत्युकालिक कथन के सम्बन्ध में भारतीय तथा आंगल विधि में अंतर:
  1. d सम्बन्धी भारतीय विधि आंगल विधि के सापेक्ष व्यापक हैI
  2. भारतीय विधि में, कथन करते समय कथनकर्ता का मृत्यु की प्रत्याशा में होना आवश्यक नहीं हैI आंगल विधि में मृत्युकालिक कथन की सुसंगति हेतु यह आवश्यक है कि कथन की सुसंगति हेतु यह आवश्यक है कि कथन करते समय कथनकर्ता मृत्यु कि प्रतियाषा में रहा होI
  3. भारतीय विधि में d.d ऐसी किसी भी कार्यवाही में सुसंगत हो सकता है जिसमें कथनकर्ता की मृत्यु का प्रश्न अंतर्विष्ट होI आंगल विधि में d.d केवल दाण्डिक मामलों ने सुसंगत हो सकता है वह भी तब जबकि अभियुक्त पर हत्या या सदोष मानवबंध का आरोप होI

विशेषज्ञ की राय का साक्ष्य

ss.45-51

सामान्य:

  1. धारा 45-51 तृतीय व्यक्तियों की राय की सुसंगति से सम्बंधित हैI तृतीय व्यक्ति से तात्पर्य पक्षकारों से भिन्न किसी व्यक्ति से हैI तृतीय व्यक्ति से विशेषज्ञ तथा अविशेषज्ञ दोनों शामिल हैंI
  2. सामान्य नियम:
  • साक्षी तथ्य का साक्षी होता है राय या विधि का नहीं अत: साक्षी से यह अपेक्षित है कि वह न्याय. को उन तथ्यों से अवगत कराये जो उसने देखे हैं या सुने हैं या अन्यथा अनुभूति दे सकते हैं
  • राय निर्मित करना न्यायिक कृत्य हैं साक्षी, राय निर्मित करने में न्याय. को सहायता दे सकते हैं
  1. अपवाद:
  • ज्ञान की समितियां है कोई भी व्यक्ति सर्वज्ञ नहीं हैं अत: तकनीकी प्रकृति के कुछ ऐसे विषय हो सकते हैं जिन पर राय निर्मित करने में न्याय. कठिनाई का अनुभव कर सकता हैI ऐसे मामलों में अपवाद स्वरूप ऐसे व्यक्तियों की राय सुसंगत हो सकती है जो उन निर्दिष्ट तकनिकी विधियों पर विशेष दक्षता प्राप्त हैI ऐसे विशेष दक्षता प्राप्त व्यक्ति विशेषज्ञ कहलाते हैंI
  1. विशेषज्ञ की राय का साक्ष्य सुसंगत तो होता है किन्तु अनेक कारणों से इसका सक्ष्यिक मूल्य दुर्भर होता हैI अत: न्यायधीश से यह अपेक्षित है कि वह विशेषज्ञ की राय के समक्ष अपनी राय का समर्पण न करेंI न्याय. को चाहिए की वह विशेषज्ञ की राय की सहायता से अपनी स्वतंत्र राय निर्मित करेंI
  2. जब कभी विशेषज्ञ की राय सुसंगत होती है तब नि. भी सुसंगत होंगे-
  • विशेषज्ञ की राय का समर्थन या खंडन करने वाले तथ्य; तथा
  • विशेषज्ञ की राय के आधार
  1. धारा 48,49,50 में वर्णित व्यक्तियों की राय भी सुसंगत हो सकती है यधपि वे विशेषज्ञ की में नहीं आते हैंI

ब्रिस्टो 1850 के प्रकरण में विधि में व्यवसाय करने वाले अधिवक्ता की राय को विदेशी विधि के एक बिंदु पर सुसंगत माना गया थाI

डी. विच 1935 के प्रकरण में विदेशी बैंकिंग विधि के प्रश्न पर एक बैंकर की राय को सुसंगत माना गया थाI

किन विषयों पर विशेषज्ञों की राय सुसंगत है

  1. धारा 45 के अंतर्गत नि. के सम्बंधित में विशेषज्ञ की राय सुसंगत होगी-
  • विदेशी विधि के किसी बिंदु पर
  • विज्ञान या फल के किसी बिंदु पर
  • अगुली चिन्ह या हस्तलेख के सम्बन्ध में
  1. धारा 45-A के अंतर्गत इले. साक्ष्य परीक्षक की राय सुसंगत होगी उसकी राय कंप्यूटर स्रोत या किसी अन्य इले. या आंकिक रूप में संग्रहित या पक्षेशित सूचना के सम्बन्ध में सुसंगत होगीI
  2. विदेशी विधि:
  • विदेशी विधि से तात्पर्य ऐसी विधि से है जो भारत में प्रवर्तित न हो
  • शिया विधि विदेशी विधि नहीं हैं क्योंकि यह भारतीय शिया मुस्लिमों पर लागू होती हैI अत: शिया विधि के किसी बिंदु पर विशेषज्ञ की राय सुसंगत नहीं होगी [अजीज बानों]
  • विदेशी विधि के किसी बिंदु को निम्न. ढंग से सिद्ध किया जा सकता हैI
  • विशेषज्ञ की राय द्वारा
  • सम्बंधित विदेशी शासन के प्रधाकराधीन प्रकाशित ग्रन्थ के प्रत्यक्ष संधर्भ द्वाराI
  1. विज्ञान या कला:
  • विज्ञान या कला शब्दों को उनके तकनीकी अर्थों में नहीं लिया जायेगा इन्हें विशेषज्ञ अध्ययन, ज्ञान या अनुभव से सम्बध् विषय के परीपेक्ष में लिया जायेगा ऐसा कोई भी बिंदु विषये जो एक सामान्य व्यक्ति की समक्ष से परे है उसे विज्ञान या कला का बिंदु माना जा सकता हैI
  • एस. जे. चौधरी 1996 sc के प्रकरण में sc ने हनुमंत, 1962 के प्रकरण को अमान्य घोषित करते हुये यह धारण किया कि कोई पत्र एक विशेष टाइप मशीन से टाइप किया गया है या कि नहीं इसे विज्ञान का प्रश्न माना जा सकता हैI

 

 

 

  1. हस्तलेख या अंगुलिचिंह की पहचान:
  • हस्लेख तथा अगुलिचिंह विशिष्ट होते हैं प्रत्येक व्यक्ति का हस्लेख तथा उसके अंगुलिचिंह विशिष्ट तथा सुभिन्न होते हैंI विशेष दक्षता प्राप्त व्यक्ति यह राय दे सकता है कि प्रश्नगत हस्तलेख अंगुलिचिंह किसी विशिष्ट व्यक्ति का है या नहीं
  • अंगुलिचिंह को विशेषज्ञ की राय से सिद्ध किया जा सकता है हस्तलेख को कई साधनों से सिद्ध किया जा सकता है, यथा-
  • लेखक की स्वीकृति द्वारा-
  • प्रत्यक्षदर्शी के साक्ष्य द्वारा-
  • सुपरिचित व्यक्ति की राय द्वारा-
  • विशेषज्ञ की राय के साक्ष्य द्वारा-
  • न्याय. द्वारा तुलना करके-
  • मुरारीलाल 1980 के प्रकरण में यह धारित किया गया की हस्तलेख के सम्बन्ध में विशेषज्ञ की राय पर आँख मूँद कर विश्वास नहीं करना चाहिए उसकी राय के सम्पुष्टिकरण की मांग की जानी चाहिये किसी विशेष मामले में, सम्पुष्टिकरण की मांग का परित्याग किया जा सकता है निष्कर्ष यह है की न्याय. को सतर्क रहना चाहियेI

 विशेषज्ञ की राय के साक्ष्य का सक्ष्यिक मूल्य:

  1. विशेषज्ञ की राय का साक्ष्य नि. कारणों से दुर्बल साक्ष्य माना जाता है
  • विशेषज्ञ द्वारा भूल-चूक की जा सकती है
  • विशेषज्ञ एक भ्रष्ट व्यक्ति हो सकता है
  • विशेषज्ञ पर्याप्त दक्षता संपन्न नहीं भी हो सकती
  • विशेषज्ञ एक पेशेवर व्यक्ति होता है परिणामत: उसकी राय उस व्यक्ति के पक्ष में झुकी हुई हो सकती है जिससे शुल्क चुकाकर विशेषज्ञ की सेवाये ली हैंI
  1. चूकी विशेषज्ञ की राय के साक्ष्य का सक्ष्यिक मूल्य दुर्बल होता है अत: न्याय. से विशेष सतर्कता अपेक्षित हैI
  2. ए. सी. लागू 1960 sc धारित: चिकित्सीय साक्ष्य के विशेषज्ञ की राय होता है ऐसा साक्ष्य सदैव निर्णायक तथा अंतिम नहीं होता हैI अत: जहाँ चिकित्सीय साक्ष्य, प्रत्यक्षदर्शी के साक्षी के साक्ष्य में विरोध हो, वहाँ न्याय. उस साक्ष्य का अवलंब लेगा जो न्यायिक अंत:कारण को अधिक विश्वसनीय प्रतीत हो रहा है

 

तृतीय व्यक्ति की राय की सुसंगति सम्बन्धी अन्य नियम: ss.47,47.A,48,49,50

  1. हस्तलेख से सम्बंधित राय: s.47
  • जहाँ न्याय. को यह राय समिति करनी है कि कोई दस्तावेज किस व्यक्ति द्वारा लिखित पर हस्ताक्षारित है वहाँ उस व्यक्ति की राय सुसंगत होगी जो सम्बंधित व्यक्ति के हस्तलेख से परिचित है
  • कोई व्यक्ति, दूसरे व्यक्ति के हस्तलेख से परिचित कहा जाता है
  • जबकि उससे सम्बंधित व्यक्ति को लिखते हुये देखा है या
  • जबकि उससे सम्बंधित व्यक्ति द्वारा लिखे गये दस्तावेजो की प्राप्त किया है, स्वयं द्वारा लिखे गये दस्तावेजो की प्राप्त किया है स्वयं द्वारा लिखे गये दस्तावेजो के उत्तर में या,
  • जबकि कारोबार के सामान्य अनुक्रम में सम्बंधित व्यक्ति द्वारा लिखे गये दस्तावेज उसके समय प्रस्तुत किये जाते रहे हैI
  1. अभिप्रभावन प्राधिकारी की राय इलेक्ट्रोनिक हस्ताक्षर के सम्बन्ध में: sec 47-A
  • जबकि न्याय. को किसी व्यक्ति के इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर के सम्बन्ध में राय निर्मित करनी हो तब इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर प्रमाणपत्र जारी करने वाले अभिप्रमारण प्राधिकरण की राय सुसंगत होगी
  • धारा 47-A के अंतर्गत इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर, अभिप्रमाण प्राधिकारी तथा इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर अभिप्रमाणपत्र का वही अर्थ है जो सूचना प्रौधोगिकी अधि. 2000 की धारा 7 में दिया गया हैI
  1. अधिकार या रुढ़ि के अस्तित्व के सम्बन्ध में उस व्यक्ति की राय सुसंगत है जिसे उसके अस्तित्व का ज्ञान होना संभाव्य है: sec. 48
  • जबकि न्याय. को किसी सामान्य रुढ़ि या प्रथा के अस्तित्व के सम्बन्ध में राय समिति करनी हो तब उस व्यक्ति की राय सुसंगत होगी जिसे ऐसी रुढ़ि या प्रथा का ज्ञान होना संभाव्य होI
  • सामान्य रुढ़ि या अधिकार में व्यक्तियों के बड़े वर्ग के अधिकार या रुढ़ि शामिल है
  1. विशेष ज्ञान के साधन संपन्न व्यक्ति को राय की सुसंगति: sec. 49
  • धारा 49 वहाँ आकर्षित होती है जहाँ न्याय. को नि. के सम्बन्ध में राय निर्मित करनी हैI
  • व्यक्तियों के निकाय या परिवार के प्रचलन तथा मत
  • किसी धार्मिक या पूर्त संस्था के गठन तथा प्रशासन
  • किसी विशेष जनपद या वर्ग विशेष के व्यक्तियों द्वारा प्रयुक्त शब्दों एव पदों के अर्थ
  • उपरोक्त के सम्बन्ध में ऐसे व्यक्तियों की राय सुसंगत हैं जो ज्ञान के विशेष साधन रखते हैI
  1. संबंधों के बारे में ज्ञान विशेष साधन संपन्न व्यक्तियों की राय: sec.50
  • धारा 50 वहाँ आकर्षित होती है जहाँ किन्ही दो व्यक्तियों के मध्य संबंधों के बारे में न्याय. को राय निर्मित करनी हैI
  • ऐसे मामले में उस परिवार के सदस्य या ज्ञान के विशेष साधन संपन्न व्यक्ति की राय सुसंगत होगीI

अध्याय- 4 [sec. 59, 60]

                मौखिक साक्ष्य के विषय में     

सामान्य:              

  1. अधि. में तीन भाग है दूसरा भाग सबूत पर है इस भाग का विस्तार धारा 56-100 तक है
  2. भाग 2 [धारा 56-100] में चार अध्याय हैI
  • अध्याय-3 [धारा 56-58] ऐसे तथ्य हैं जिनका सिद्ध किया जाना आवश्यक नहीं है
  • अध्याय-4 [धारा 59 तथा 60] मौखिक साक्ष्य
  • अध्याय-5 [धारा 61-90A] दस्तावेजी साक्ष्य
  • अध्याय-6 [धारा 91-100] दस्तावेजी साक्ष्य द्वारा मौ. साक्ष्य का अपवर्जन

मौखिक साक्ष्य: (धारा 3)

  1. साक्ष्य वह सामग्री या साधन है जिससे किसी न्यायिक कार्यवाही में किसी तथ्य का अस्तित्व या अनअस्तित्व साबित किया जाता हैI
  2. साक्ष्य पद अधि. की धारा-3 में परिभाषित हैI परिभाषा समावेशी अर्थात् व्याप्त हैI धारा 3 के अनुसार-

“साक्ष्य” शब्द से अभिप्रेत है, और उसके अंतर्गत आते हैं-

  • वे सभी कथन (बयान) जिनके जाचाधीन तथ्य के

विषयों के सम्बन्ध में न्यायालय अपने सामने

साक्षियों द्वारा किये जाने की अनुज्ञा देता है या

अपेक्षा करता है;

इसे कथन मौखिक साक्ष्य कहलाते हैं;

  • न्याय के निरिक्षण के लिए पेश की गयी सब

दस्तावेजे जिनमें इले. अभिलेख शामिल हैI

ऐसी दस्तावेजें दस्तावेजी साक्ष्य कहलाती हैI

  1. धारा -3 में दी गयी उपरोक्त परिभाषा बहुत संतोषजनक नहीं है यह साक्ष्य की प्रकृति उसकी उपयोगिता तथा उसके महत्व के सम्बन्ध में मौन हैI यह परिभाषा कम तथा साक्ष्य के प्रकारों का उल्लेख कम करती हैI
  2. कितने में असमर्थ साक्षी द्वारा न्याय. में उपस्थित होकर किया गया लिखित कथन [deemed oral evidence] कहलाता हैI

जो कुछ आंगल विधि में वास्तविक साक्ष्य कहलाता है वह भारतीय विधि में दस्तावेजी साक्ष्य में शामिल समझा जाता है अत: हत्या में प्रयुक्त चाक़ू भारतीय विधि में दस्तावेजी साक्ष्य होगाI

मौखिक साक्ष्य की सहायता सम्बन्धी नियम: sec. 59, 60

  1. मौ. साक्ष्य से समस्त तथ्य सिद्ध किये जा सकते हैं सिवाय-
  • दस्तावेज की अंतरवस्तु या
  • इले. अभिलेख की अंतरवस्तु
  1. मौ. स्वीकृतियां भी मौ. साक्ष्य ही है मौखिक स्वीकृतियों की सुसंगति सम्बंधित नियम धारा 22 तथा 22 A में देखे गये हैंI
  2. दस्तावेज की अंतरवस्तु के सम्बन्ध में मौ. स्वीकृतियां विसंगत हैं सिवाय नि. मामलों में-
  • जबकि दस्तावेज की असलियत प्रश्नगत हो तथा
  • जबकि दस्तावेज की अंतरवस्तु का द्वितीयक साक्ष्य अनुभव हो [धारा 22]
  1. इले. अभिलेख की अंतरवस्तु के सम्बन्ध में मौखिक स्वीकृतियां विसंगत है सिवाय- जबकि इले. अभिलेख की असलीयत प्रश्नगत हो [धारा 22-A]
  2. मौखिक साक्ष्य प्रत्येक मामलों में चाहे वे जो भी हो प्रत्यक्ष ही होना चाहिए दुसरे शब्दों में, परोक्ष मौ. साक्ष्य में ग्राह्य नहीं होगा यह नियम अनुश्रुत साक्ष्य के अपवर्जन का नियम कहलाता हैI यह नियम साक्ष्य विधि का मौखिक नियम है किन्तु यह पूर्ण नियम नहीं हैI यह नियम कुछ मान्य अपवादों के अधीन हैI
  3. मौ. साक्ष्य प्रत्येक मामलों में चाहे वे जो भी हो प्रत्येक होना चाहिए इसका अर्थ है-
  • यदि वह किसी देखे जा सकने वाले तथ्य के बारे में है, तो वह ऐसे साक्षी का ही साक्ष्य होगा जो कहता है कि उसने उसे देखा;
  • यदि वह किसे सुने जा सकने वाले तथ्य के बारे में है तो वह ऐसे साक्षी का है साक्ष्य होगा जो कहता है कि उसने उसे सुना;
  • यदि वह किसी ऐसे तथ्य के बारे में है जिसका किसी अन्य इन्द्रिय छाया था किसी अन्य रीति से बोध हो सकता था, तो वह ऐसे साक्षी का ही साक्ष्य होगा जो सहता है कि उसने उसका बोध उस इंद्रिय द्वारा या उस रीति से किया;
  • यदि वह किसी राय के, या उन आधारों के जिन पर वह राय धारित है, बारे में है, तो वह उस व्यक्ति का ही साक्ष्य होगा जो वह राय उन आधारों पर धारण करता है;
  1. किसी व्यक्ति विशेषज्ञ की राय तथा ऐसी राय के आधार उसके ग्रन्थ जिसमें उसकी राय तथा आधार अभिव्यक्त है के प्रस्तुतीकरण द्वारा सिद्ध किये जा सकेंगे यदि ऐसा ग्रन्थ विक्रय हेतु सामान्यता प्रस्तावित है, तथा यदि राय धारक-
  • मृत है या
  • अक्षम हो गया है या
  • मिल नहीं सकता है या
  • उसका बुलाया जाना समय तथा धन की दृष्टि से युक्तियुक्त: व्यय साध्य हैI

आंगल विधि में विशेषज्ञ की राय तथा उसकी राय तथा उसकी राय के आधारों को उसका ग्रन्थ प्रस्तुत करके सिद्ध नहीं किया जा सकता हैI

  1. ग्रन्थ से भिन्न किसी मौखिक वस्तु के अस्तित्व या दशा के सम्बन्ध में दिए गये मौ. साक्ष्य के मामले में न्याय. उचित समझने पर निरिक्षण हेतु उस भौतिक वस्तु के प्रस्तुतीकरण का आदेश दे सकता हैI

अनुश्रुत साक्ष्य के अपवर्जन का नियम:

  1. अनुश्रुत साक्ष्य के अपवर्जन का नियम धारा 60 साक्ष्य अधि. में अन्तर्निहित है धारा 60 के अनुसार-

मौखिक साक्ष्य प्रत्येक मामलों मे, चाहे वह

जो भी हो प्रत्येक ही होना चाहिए,

       धारा 60 के उपबंधों से स्पष्ट है कि मौखिक साक्ष्य परोक्ष नहीं होना चाहिये दुसरे शब्दों में, परोक्ष साक्ष्य मौखिक साक्ष्य (अनुश्रुत साक्ष्य) साक्ष्य से ग्राह्य नहीं होगाI यह नियम अनुश्रुत साक्ष्य के अपवर्जन का नियम कहलाता हैI

  1. नियम का तार्किक आधार:
  • न्याया. के समक्ष सर्वश्रेष्ठ साक्ष्य आना चाहिये ये बात नीतिगत रूप से तथा विधिक रूप से भी औचिव्यपूर्ण हैI
  • अनुश्रुत साक्ष्य की सहायता न्याया. के समक्ष सर्वश्रेष्ठ साक्ष्य का आगमन बाधित कर सकता है (निम्न कोटि के साक्ष्य की ग्राह्यता न्याय हित में नहीं होता)
  1. अपवाद:
  • अनुश्रुत साक्ष्य के अपवर्जन का नियम साक्ष्य विधि का एक मौखिक नियम है, कि किन्तु यह विधि का पूर्ण नियम नहीं हैI यह नियम नि. लि. अपवादों के अधीन है-
  • रेसजेस्टे का सिद्धांत ——————————— sec. 6
  • स्वीकृतियां तथा संस्वीकृतियाँ ———————- sec. 21
  • धारा 32 के अंतर्गत सुसंगत तथ्य —————- मृत्युकालिक कथन सहित
  • पूर्व कार्यवाहियों के साक्ष्य ————————– sec. 33
  • लोक दस्तावेज में किये गये प्रकरण ————– sec. 23
  • विशेषज्ञ की राय तथा उसकी राय के

आधार जो उसके ग्रन्थ में अभिव्यक्त हो ——– sec. 60 का परन्तुक

  1. सक्ष्यिक बल:
  • अनुश्रुत साक्ष्य का सक्ष्यिक बल दुर्बल होता हैI
  • दुर्बलता के कारण:
  • यह शपथ पर नहीं किया जाता है अत: इसकी सव्यता प्रतिपरीक्षा द्वारा जांचे जाने योग्य नहीं हैI
  • इसकी सहायता विचारण या जाँच को अनावश्यक रूप से खींच सकता हैI
  1. क्या नये अपवाद सृजित किये जा सकते हैं-
  • मेयर्स vs डायरेक्टर, पब्लिक प्रसिक्यूशन, 1965
  • नए अपवाद सृजित किये जा सकते है, (Pre Lord Raid Lord Perce)
  • असुविधा के निवारण सामाजिक को स्थित करते हुये अपवाद सृजित किये जा सकते हैं

गत एक शताब्दी से भी अधिक समय शायद ही कोई अपवाद सृजित किया गया होगाI अत: व्यवहारत: यह नियम दृढत: हो चला हैI

सामान्य:

  1. अधि. तीन भागों में विभक्त है द्वितीय भाग [धारा 56-100] सबूत के बारे में हैI द्वितीय भाग में निम्नलिखित IV अध्याय हैI

(i) अध्याय III [sec. 56-58]———-ऐसा तथ्य जिन्हें सिद्ध करना आवश्यक नहीं है

(ii) अध्याय IV [sec. 59-60]———मौ. साक्ष्य के विषय में

(iii) अध्याय V [sec. 61-90A]——-दस्तावेजी साक्ष्य के विषय में

(iv) अध्याय VI [sec.91-100]——–दस्तावेजी साक्ष्य द्वारा मौ. साक्ष्य के अपवर्जन केविषय में

  1. अध्याय V [sec. 61—90A] की योजना:
  • परिभाषायें:
  • प्राथमिक साक्ष्य
  • द्वितीयक साक्ष्य
  • लोक दस्तावेज
  • निजी दस्तावेज
  • दस्तावेज के अंतरवस्तु का सबूत:
  • प्राथमिक साक्ष्य या द्वितीयक साक्ष्य ————————sec. 61, 64
  • लोक दस्तावेज का सबूत —————————————sec. 77
  • अन्य अधिकारिक दस्तावेजों का सबूत————————-sec. 78
  • इले. अभिलेख की अंतरवस्तु का सबूत —————————-sec. 65A, 65B
  • प्रकल्पनायें:
  • दस्तावेजों के सम्बन्ध में प्रकल्पना —————————-sec. 79, 80, 81, 82B,

84, 85, 86, 87B, 89, 90

  • इले. अभिलेख के सम्बन्ध में प्रकल्पना ———————–sec. 81A, 85A, 85B,

85C, 88A, 90

  • अन्य नियम

परिभाषाये: sec. 62, 63, 74, 75

  1. प्राथमिक साक्ष्य: sec. 62.

प्राथमिक साक्ष्य से न्याया. के निरिक्षण के लिए पेश की गई दस्तावेज स्वय अभिप्रेत है

स्पष्टीकरण 1- जहाँ कि कोई दस्तावेज कई मूल प्रतियों में निष्पादित है, वहाँ हर एक मूल प्रति उस दस्तावेज का प्राथमिक साक्ष्य हैI

जहाँ की कोई दस्तावेज प्रतिलेख में निष्पादित है और एक प्रतिलेख पक्षकारों में से केवल एक पक्षकार या कुछ पक्षकारों द्वारा निष्पादित किया गया है वहाँ हर एक प्रतिलेख उन पक्षकारों के विरुद्ध, जिन्होंने उसका निष्पादन किया है, प्राथमिक साक्ष्य हैI

स्पष्टीकरण 2- जहाँ की अनेक दस्तावेजें एकरूपात्मक प्रक्रिया द्वारा बनाई गई है, वहाँ उनमें से हर एक शेष सबकी अंतरवस्तु का प्राथमिक साक्ष्य है किन्तु जहाँ की वे सब किसी सामान्य मूल की प्रतियाँ है, वहाँ वे मूल की अंतरवस्तु का प्राथमिक साक्ष्य नहीं हैI

  1. द्वितीयक साक्ष्य: sec. 63

             द्वितीयक साक्ष्य से अभिप्रेत है और उसके अंतर्गत आते है –

  1. एतस्मिन पश्चात अंतरविर्षित उपबंधों के अधीन दी गई प्रमाणित प्रतियाँ
  2. मूल से ऐसी यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा, जो प्रक्रियाएं स्वमं ही प्रति की शुद्धता सुनिश्चित करती है, बने गई प्रतियाँ तथा ऐसी प्रतियों से तुलना की हुई प्रतिलिपियां
  3. मूल से बनाई गई या तुलना की गई प्रतियाँ
  4. उन पक्षकारों के विरुद्ध, जिन्होने उन्हें निष्पादित नहीं किया हैं दस्तावेजों के प्रतिलेख (प्रतिरूप सुसत्रा)
  5. किसी दस्तावेज की अंतरवस्तु का उस व्यक्ति द्वारा जिसने स्वयं उसे देखा हैं दिया हुआ मौखिक वृतांत
  6. लोक दस्तावेजें: sec. 74

       निम्नलिखित दस्तावेजें लोक दस्तावेजें है-

  1. वे दस्तावेजें जो-
  • प्रभुतासंपन्न प्राधिकारी के,
  • शासकीय निकायों और प्राधिकारणों के तथा
  • भारत के किसी भाग के या कामनवेल्थ के या किसी विदेश के विधायी, न्यायिक तथा कार्यपालक लोक आफिसरों के कार्यों के रूप में या कार्यों के अभिलेख के रूप में है
  1. किसी राज्य में रखे गये प्राइवेट दस्तावेजों के लोक अभिलेख
  2. प्राइवेट दस्तावेजें: sec. 75

अन्य सभी दस्तावेजें प्राइवेट हैं

दस्तावेज की अंतरवस्तु का सिद्ध किया जाना:

  1. दस्तावेज की अंतरवस्तु की या तो प्राथमिक साक्ष्य से या द्वितीयक साक्ष्य से सिद्ध किया जा सकेगा [sec. 61]
  2. सामान्यत: दस्तावेज की अंतरवस्तु को प्राथमिक साक्ष्य द्वारा सिद्ध किया जाना चाहिये अपवाद स्वरुप दस्तावेज की अंतरवस्तु को, धारा 65 की परिधि में आने वाले मामलों में द्वितीयक साक्ष्य से भी सिद्ध किया जा सकता है [sec. 64]
  3. द्वितीयक साक्ष्य प्रस्थापित करने वाले पक्ष को धारा-104 के अनुसार सिद्ध भारिता का अनुसरण करना होगाI न्यायालय, उचित मामलों में स्वविवेक से धारा 104 में वर्णित नियम शिथिल कर सकता हैI [धारा 136 का पैरा 1]
  4. दस्तावेज की अंतरवस्तु का द्वितीयक साक्ष्य धारा- 65 के अनुसार दिया जा सकेगा
  5. दस्तावेज की अंतरवस्तु को मौखिक साक्ष्य से सिद्ध नहीं किया जा सकता हैं [sec. 69]

दस्तावेज की अंतरवस्तु के सम्बन्ध में मौखिक स्वीकृतियां विसंगत हैं सिवाय-

  • जबकि दस्तावेज की असलियत प्रश्नगत हो या
  • जबकि द्वितीय साक्ष्य दिया जा सकता है [sec. 22]

इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख की अंतरवस्तु का सिद्ध किया जाना: sec. 65A, 65B

  1. धारा 2(1)(t), IT. Act 2000 इले. अभिलेख पद को परिभाषित करती हैI
  2. इले. अभिलेख की अंतरवस्तु को मौखिक साक्ष्य से सिद्ध नहीं किया जा सकता है [sec. 59]
  3. इले. अभिलेख की अंतरवस्तु के सम्बन्ध में मौखिक स्वीकृतियां विसंगत है, सिवाय जबकि इले. अभिलेख की असलियत प्रश्नगत हो [sec. 22A]
  4. इले. अभिलेख की अंतरवस्तु को धारा 65B के अनुसार सिद्ध किया जा सकता है[sec. 65A]
  5. धारा 65B के अनुसार इले. अभिलेख की अंतरवस्तु को कंप्यूटर आउटपुट द्वारा सिद्ध किया जा सकता है यह आवश्यक है कि कंप्यूटर आउटपुट धारा 65B (2) की अपेक्षा को पूर्ण कर रहा हो कंप्यूटर आउटपुट प्रलक्षित दस्तावेज गठित करता हैI

लोक दस्तावेज का सबूत: sec. 77

  1. लोक दस्तावेज धारा 74 में परिभाषित हैI
  2. लोक दस्तावेज की अंतरवस्तु को प्रमाणित प्रतिलिपि द्वारा सिद्ध किया जा सकता है [sec. 77]
  3. प्रमाणित प्रतिलिपि द्वितीयक साक्ष्य है [sec. 63(1)]
  4. प्रमाणित प्रतिलिपि धारा 76 के अनुसार प्राप्त की जा सकती हैI
  5. धारा 78 में कुछ लोक दस्तावेजों को निर्दिष्ट किया गया है इस धारा में निर्दिष्ट लोक दस्तावेजों को धारा 78 में वर्णित नियमों के अनुसार सिद्ध किया जा सकता हैI

दस्तावेज तथा इले. अभिलेख के सम्बन्ध में प्रकल्पनाये:

  1. अध्याय 5 दस्तावेजों तथा इले. अभिलेखों के सम्बन्ध में कुछ प्रकल्पनाये प्रावधानित करता है यह प्रकल्पनाये खण्डनीय प्रकल्पनाये है दस्तावेज के सम्बन्ध में प्रकल्पनाये प्रावधानित करती है इस प्रकार प्रकल्पनाये से सम्बंधित कुल 18 धाराये है

Image 1

  1. दस्तावेज से सम्बंधित प्रकल्पनाये: sec. 79-85 तथा 89, 86-88, 90
  • न्याया. प्रकल्पना करेगा: sec. 79, 85, 89
  • प्रमाणित प्रतिलिपि असली है [sec. 79]
  • साक्ष्य अभिलिखित करने वालों दस्तावेज असली है [sec. 80]
  • शासकीय राजपत्र लन्दन राजपत्र तथा समाचार पत्रों तथा जनरल असली है [sec. 81]
  • कुछ मुद्राओ टिकटों तथा हस्ताक्षर के असली होने की परिकल्पना [sec. 82]
  • केंद्र या राज्य शासन के प्राधिकाराधीन निर्मित मानचित्र या योजनायें सटीक है [sec. 83]
  • शासकीय प्राधिकरण के अधीन प्रकाशित विधि ग्रन्थ असली है [sec. 84]
  • पावर ऑफ़ अटर्नी का निष्पादन तथा अभिप्रमाणन सम्बन्धी प्रकल्पना [sec. 85]
  • नोटिस के बावजूद प्रस्तुत नहीं किये गये दस्तावेज के सम्यक अभिप्रमाणन तथा निष्पादन के सम्बन्ध में प्रकल्पना [sec. 89]
  • न्याय. प्रकल्पना कर सकेगा: sec. 86-88, 90
  • विदेशी न्यायिक अभिलेख की प्रमाणित प्रतिलिपियाँ असली तथा सटीक है [sec. 86]
  • पुस्तकों मानचित्रों तथा चार्ट के लेखक तथा प्रकाशक तथा प्रकाशन स्थल तथा समय सम्बन्धी प्रकल्पना [sec. 87]
  • तार सन्देश के सम्बन्ध में प्रकल्पना
  • 30 वर्ष पुराने दस्तावेजों के सम्बन्ध में प्रकल्पना
  1. इले. अभिलेखों के सम्बन्ध में प्रकल्पनाये: sec. 81A, 85A, 85B, 85C, 88A, 90A
  • न्याया. प्रकल्पना कर सकेगा: sec. 81A, 85A, 85B, 85C
  • इले. गजट तथा इले. अभिलेख असली है [sec. 81A]
  • इले. करार के सम्बन्ध में प्रकल्पना [sec. 85A]
  • इले. अभिलेख तथा इले. हस्ताक्षर के सम्बन्ध में प्रकल्पना [sec 85B]
  • इले. हस्ताक्षर प्रमाणपत्र के सम्बन्ध में प्रकल्पना [sec. 85c]

(ii)न्याय. प्रकल्पना कर सकेगा: sec. 88A, 90A

  • इले. सन्देश के सम्बन्ध में प्रकल्पना [sec. 88A]
  • इले. अभिलेखों [5 वर्ष पुराने] के सम्बन्ध में प्रकल्पना [sec. 90A]

अन्य नियम:

1.दस्तावेजों के प्रस्तुतीकरण हेतु नोटिस ——————————-sec. 66

2.हस्ताक्षर तथा हस्तलेख का साक्ष्य ———————————–sec. 67

3.इले. हस्ताक्षर का साक्ष्य ———————————————-sec. 67A

4.दस्तावेज के निष्पादन का साक्ष्य ————————————sec. 68, 72

5.सबूत जबकि अभिप्रमाणन साक्षी न मिल गया हो —————-sec. 69

6.सबूत जबकि साक्षी द्वारा अभिप्रमाणन से इनकार

किया गया हो ———————————————————-sec. 71

7.पक्षकार द्वारा निष्पादित की स्वीकृति —————————-sec. 72

8.हस्ताक्षर लेख या मोहर की तुलना ——————————–sec. 73

9.इले. हस्ताक्षर के सत्यापन का सबूत ——————————sec. 73A

अध्याय-vi [sec. 91-100]

          दस्तावेजी साक्ष्य द्वारा मौखिक साक्ष्य के अपवर्जन के विषय में

सामान्य:

  1. ch-vi [sec. 91-100] दस्तावेजी साक्ष्य द्वारा मौखिक साक्ष्य के अपवर्जन से सम्बंधित है अध्याय-6 की योजना का सम्पेक्षण निम्नवत हैI
  • संविदा अनुसार तथा संपत्ति के अन्य व्यय

की शर्तों [दस्तोवेजी रूप में] का साक्ष्य ————————–sec. 91

  • मौखिक करार या मौखिक कथन के साक्ष्य

का अपवर्जन ——————————————————-sec. 92 r/w 99

  • बाह्य साक्ष्य की अग्राह्यता —————————————sec. 93, 94
  • बाह्य साक्ष्य की ग्राह्यता —————————————–sec. 95, 96, 97
  • विदेशी, अप्रचलित तकनीकी तथा स्थानीय शब्दों

तथा अभिव्यक्तियों का अर्थ दर्शाने हेतु साक्ष्य —————–sec. 98

  • व्यावृत्ति खण्ड ——————————————————sec. 100

शर्तों तथा विषयों का साक्ष्य: sec. 91 r/w 144

  1. नि. को सिद्ध करने हेतु दस्तावेज या द्वितीयक साक्ष्य ही दिया जा सकेगा
  • संविदा, अनुदान या संपत्ति के अन्य व्ययन की शर्तें [जिन्हें दस्तावेजी रूप दिया गया है]
  • विधिक अपेक्षा अनुसार दस्तावेजी रूप में उपलब्ध विषय
  1. दस्तावेज में अभिकथित किसी तथ्य को अन्य किसी साक्ष्य से मौखिक साक्ष्य सहित सिद्ध किया जा सकेगा [धारा 91 का स्पष्टीकरण 1 दृष्टान्त(a) (b)]
  2. धारा 91 का सैधांतिक आधार यह है की जो कुछ भी लेखबद्ध है उसे लेख द्वारा ही सिद्ध किया जाना चाहिए काशीनाथ बनाम चंडीचरण के प्रकरण में pc ने प्रेक्षित किया कि-

लिखित विलेख के प्रतिस्थापन के रूप में प्रयोग हेतु या लिखित के खंडन या परिवर्तन हेतु उस विलेख से अन्यथा किसी साक्ष्य का प्रयोग नहीं किया जा सकता है [सिद्धांत: तथा नीतिगत दोनों आधारों पर]

लिखित विलेख अपनी प्रकृति से मौखिक साक्ष्य की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय होते है लिखित विलेख [जिस पर किसी व्यक्ति का अधिकार निर्भर हो] को निम्नतर कोटि के सम्पार्खिक साक्ष्य द्वारा अधिक्षेपित करने की अनुमति देना भारी रिब्ती उत्पन्न करेगाI

  1. स्टफिन के अनुसार लिखित चीज को लेख से ही प्रस्तुत किया जाना चाहिये अन्यथा लेखन का उद्देश्य ही विफल हो जायेगा लेखन के दो उचित उद्देश्य होते हैI
  • लिखित सामग्री को स्मृति में बनाये रखना तथा
  • लिखित चीज का स्थाई साक्ष्य प्रस्तुत करना

अत: यदि संभव हो तो स्वमं दस्तावेज ही निरिक्षण हेतु प्रस्तुत किया जाना चाहिए अंतिम रूप से लिखे गये दस्तावेज अंतिम ही समझे जाने चाहिए उन्हें मौखिक शब्दों द्वारा परिवर्तित नहीं किया जा सकता हैI

  1. अपवाद
  • लोक अधिकारी की नियुक्ति (लिखित) यह दर्शा कर सिद्ध की जा सकेगी कि उस हैसियत में कार्य किया गया हैI लिखित नियुक्ति सिद्ध करना आवश्यक नहीं है [अपवाद-1]
  • प्रोबेट हेतु स्वीकृत वसीयत प्रोबेट द्वारा सिद्ध की जा सकेगी द्वितीयक साक्ष्य होते हुए भी प्रोबेट मूल वासियत से अधिक वजनदार समझी जाती है [अपवाद 2]
  1. स्पष्टीकरण:
  • शर्त चाहे एक दस्तावेज में या अधिक दस्तावेज में अंतरविष्ट क्षे. दोनों स्थितियों में समानत: लागू होगी [स्पष्टीकरण-1 दृष्टान्त(a) तथा (b)
  • एक से अधिक मूल होने पर कोई एक सिद्ध करना काफी होगा सभी को सिद्ध करना आवश्यक नहीं होगा [स्पष्टीकरण 2, दृष्टान्त(c)
  • शर्तों से अन्यथा किसी तथ्य को मौखिक साक्ष्य से सिद्ध किया जा सकेगा [स्पष्टीकरण-3 दृष्टान्त(d) तथा (e)
  1. धारा-144 के अनुसार परीक्षाधीन साक्षी से यह पूछा जा सकेगा कि क्या जिस संविदा अनुसार या संपत्ति के अन्य व्ययनन का वह साक्ष्य दे रहा है किसी दस्तावेज में अंतरविष्ट हैI यदि साक्षी यह कहता है की उक्त संविदा अनुदान या अन्य व्ययन लेखबद्ध है तब विपक्षी साक्षी द्वारा दिए जा रहे साक्ष्य के विरुद्ध या आपत्ति कर सकेगा यह मांग की जा सकेगी कि जब तक दस्तावेज या द्वितीयक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर दिया जाता है तब तक साक्षी को द्वितीयक साक्ष्य न दिया जाये उपरोक्त नियम ऐसे दस्तावेज के सम्बन्ध में भी लागू होगा जिसके सम्बन्ध में न्याया. को यह राय है कि उसे प्रस्तुत किया जाना चाहियेI

मौखिक करार या मौखिक कथन के साक्ष्य का अपवर्जन: sec. 92 r/w sec. 99

  1. जहाँ किसी संविदा अनुवाद या संपत्ति के अन्य किसी व्यक्ति की शर्ते या कोई विषय जिसका लेखबद्ध किया जाना विधित: अपेक्षित है धारा 91 के अनुसार सिद्ध की जा चुकि हो, वहाँ उन्हें खंडित, परिवर्तित करने या उनमें कुछ जोड़ने या घटाने के प्रयोजनों हेतु मौखिक करार या मौखिक कथन का साक्ष्य नहीं दिया जा सकेगाI
  2. धारा 92 निषेधात्मक है यह दस्तावेज की शर्तों के खंडन या परिवर्तन आदि के लिये मौखिक करार या मौखिक कथन के अपवर्जन का प्रावधान करती हैI
  3. धारा 92 के साथ 6 पुस्तक संग्लन है इन पुस्तक में आने वाले मामलों में मौखिक करार या मौखिक कथन का साक्ष्य दिया जा सकेगाI

बाह्य साक्ष्य की अग्रह्यत: sec. 93, 94

  1. जहाँ दस्तावेज में प्रयुक्त भाषा स्पष्टत: भ्रामक या दोषपूर्ण हो, वहाँ उसका अर्थ दर्शाने हेतु या दोष दूर करने के लिए बाह्य साक्ष्य नहीं दिया जा सकेगा [sec. 93]

धारा 93 प्रकट संदिग्धता [patent ambiguity] के निवारण हेतु बाह्य साक्ष्य [Extrinsic evid] की  ग्राह्यता का निषेध करती हैI

  1. जहाँ दस्तावेज में प्रयुक्त भाषा स्वयं में स्पष्ट हो तथा वह विधमान तथ्यों पर सटीक रूप से लागू हो रही हो, वहाँ यह दर्शाने हेतु साक्ष्य नही दिया जा सकेगा कि भाषा उन तथ्यों पर लागू होने हेतु आशयित नही थी [धारा 94]

धारा 94 उन मामलों में बाह्य साक्ष्य को अग्राह्य घोषित करती है जिनमें दस्तावेज असंदिग्ध तथा स्पष्ट हैI

बाह्य साक्ष्य की ग्राह्यता: sec. 95, 96, 97

  1. धारा 95, 96 तथा 97 में वर्णित मामलों में बाह्य साक्ष्य ग्राह्य होगा यह धाराये लैटिन सुक्ति FALSA DEMONSTRATION NON NOCET [अर्थात दस्तावेज में किया गया मिथ्या कथन दस्तावेज को दूषित नही करता हैI
  2. जहाँ दस्तावेज में प्रयुक्त भाषा स्वयं में स्पष्ट हो किन्तु वह विधमान तथ्यों के सन्दर्भ में अर्थहीन हो, वहाँ यह दर्शाने के लिये कि उक्त भाषा विशेष भाव में प्रयुक्त है, बाह्य साक्ष्य दिया जा सकेगा [sec. 95]
  3. जहाँ तथ्यों से यह इंगित होता हो कि दस्तावेज में प्रयुक्त भाषा अनेक वस्तुओं या व्यक्तियों में किसी एक पर लागू होने हेतु तात्पर्यित थी तथा वह उन सभी व्यक्तियों या वस्तुओं पर लागू होने हेतु आशयित नही हो सकती थी वहाँ इस तथ्य का साक्ष्य दिया जा सकेगा कि वह किस व्यक्ति या वस्तु पर लागू होने हेतु आशयित थी [sec. 96]
  4. जहाँ प्रयुक्त भाषा विधमान तथ्यों के एक समूह पर अशत: लागू हो रही हो तथा अशत: दूसरे विधमान तथ्यों के समूह पर लागू हो रही हो, किन्तु वह ऐसे समूहों में से किसी एक पर ठीक-ठीक लागू न हो रही हो, वहाँ यह दर्शाने हेतु बाह्य साक्ष्य दिया जा सकेगा के उक्त भाषा ऐसे दोनों समूहों में से किस समूह पर लागू होने हेतु तात्पर्यित थी [sec. 97]

शब्दों अभिव्यक्ति तथा संक्षेयाक्षरो का अर्थ दर्शाने हेतु साक्ष्य: sec. 98

  1. धारा 98 नि. का अर्थ दर्शाने हेतु साक्ष्य देने की अनुमति प्रदान करती है-
  • विदेशी शब्द
  • अप्रचलित शब्द
  • तकनीकी शब्द
  • स्थानीय तथा प्रांतीय अभिव्यक्तियां
  • संक्षेयाक्षर
  • विशेष भाव में प्रयुक्त शब्द

दस्तावेज के अपक्षकार या ऐसे पक्षकार के प्रतिनिधि मौखिक साक्ष्य दे सकेंगे: sec. 99

  1. धारा 99, समस्त व्यवहारिक प्रयोजनों हेतु धारा 92 तथा 91 का स्पष्टीकरण हैI
  2. धारा 99 दस्तावेज के अपेक्षाकारो या उनके हित-प्रतिनिधियों को दस्तावेज की शर्तों में परिवर्तन दर्शाने हेतु समकालीन मौखिक करार का साक्ष्य देने की अनुमति देती हैI

व्यावृत्ति खण्ड: sec. 100

अध्याय 6 की कोई भी बात वसीयत के निर्वचन के सम्बन्ध में भारतीय उत्तराधिकार के उपबंधों को प्रभावित नही करेगीI

अध्याय-7 [sec. 101-114A]

सबूत के भार के विषय में

सामान्य:

  1. अध्याय – 7 [sec. 101-114A] सबूत के भार से सम्बंधित है इस अध्याय से धारा 111-A, धारा 113-A, 113-B तथा 114-A बाद में अंत: स्थापित की गई है यह धाराये अपवादिक प्रकल्पनाओं से सम्बंधित है यह इस सिद्धांत का अपवाद हैं कि-

“अभियुक्त निर्दोष प्रकल्पित किया जाता है उसकी दोषित स्थापित करने का कठोर भार अभियोजक या परिवादी पर होगा अत: अभियुक्त से स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने की अपेक्षा नही की जा सकती हैI”

  1. “सिद्ध भारिता या सबूत का भार” के दो अर्थ हो सकते हैं
  • प्रकरण स्थापित करने का भार [sec. 101]
  • साक्ष्य प्रस्तुत करने का भार [sec. 102]

State of Maharashtra Vs Vasu Kaidalwar 1981 sec. के प्रकरण में sc ने यह प्रेक्षित किया कि सबूत के भार के दो भिन्न अर्थ होते हैं-

  • विविध भार *
  • साक्ष्यिक भार *

प्रकरण स्थापित करने का भार: sec. 101

  1. धारा 101 के अर्थों में सबूत का भार प्रकरण स्थापित करने का भार है इसे facta probandi या आरंभिक सिद्धभारिता भी कहते हैं यह धारा 101 में निम्नता परिभाषित है-

“जो कोई न्याय से यह चाहता है कि वह ऐसे किसी विधिक अधिकार या दायित्व के बारे में निर्णय दे, जो उन तथ्यों के अस्तित्व पर निर्भर है, जिन्हें वह प्रख्यात करता हैं, उसे साबित करना होगा कि उन तथ्यों का अस्तित्व हैI

जब कोई व्यक्ति किसी तथ्य का अस्तित्व साबित करने के लिये आबद्ध है, तब यह कहा जाता है कि उस व्यक्ति पर सबूत का भार हैI”

द्रष्टान्त (a)

(b)

  1. धारा 101 में प्रावधनिय नियम का विधि शास्त्रीय आधार:

(i) विषय का सकारात्मक पक्ष सिद्ध करना सरल होता कोई प्रख्यापन सकारात्मक है या नकारात्मक यह एक मौलिक प्रश्न हैं यह प्रयुक्त भाषा के सम्बन्ध पर ही अन्तिमत: निर्भर नही करता है [affirmanti non neganti incumbit probatis]

(ii) वह जो किसी चीज का अस्तित्व प्राख्यापित करता है उसे ही वह प्रख्यापन सिद्ध करना चाहिये क्योंकि वह ही सर्वाधिक, स्वभाविक, तार्किक व्यक्ति होगा उक्त प्रयोजनों हेतुI

(iii)वह जो सकारात्मक प्रख्यापन करता है जो उसे वह प्रख्यापन सिद्ध करना होगा, यह सुविधा लोकनीति पर आधारित हैI यह नियम नकारात्मक सिद्ध करने की असंभाव्यता पर आधारित नही हैI

3.धारा 101 के अर्थों में सिद्ध भारिता सदैव उस पक्ष पर होती है जो न्याया. से निर्णय की बांछा कराता है तथा उस हेतु किन्ही तथ्यों का प्राख्यापन करता हैI यह भार कभी स्थानांतरित नही होता है सिविल मामलों में यह वादी पर होता है दाण्डिक मामलों में यह अभियोजक या परिवादी पर होता हैI

साक्ष्य प्रस्तुत करने का भार: sec. 102

  1. धारा 102 सश्यिक सिद्धभारिता से सम्बंधित हैI इसे onus provandi भी कहते हैI यह कार्यवाही के दौरान एक पक्ष से दूसरे पक्ष पर स्थानांतरिक हो सकता हैI
  2. धारा 102 एक विधायी सूत्र है इससे यह निर्धारित किया जा सकता है कि किसी विशेष प्रावस्था पर किस पक्ष द्वारा साक्ष्य का प्रस्तुतीकरण अपेक्षित है धारा 102 के अनुसार-

किसी वाद या कार्यवाही में सबूत का भार उस व्यक्ति पर होता है जो असफल हो जायेगा यदि दोनों में से किसी भी और से कोई भी साक्ष्य न दिया जायेI

द्रष्टांत (a)

(b)

  1. शिवचरण सिंह vs चन्द्रभान सिंह 1988 sec. धारित: इस आधार पर सक्ष्यिक सिद्ध भारिता से मुक्त नही हुआ जा सकता है कि प्रश्नगत तथ्यों को सिद्ध करना कठिन तथा लगभग असंभव से हैI

सिविल तथा दाण्डिक मामलों में सिद्धभारिता का मानक:

  1. दाण्डिक मामलों में सिद्ध भारिता का मानक:
  • अभियुक्त के पक्ष में निर्दोषिता की प्रकल्पना की जाती है अत: अभियुक्त से अपनी निर्दोषिता स्थापित करने की अपेक्षा नही की जा सकती हैI
  • अभियुक्त के पक्ष में निर्दोषिता की प्रकल्पना खण्डित हैI अभियोजक या परिवादी अभियुक्त की दोषित प्रतियेक युकितियुक्त सन्देश से परे स्थापित करने हेतु कठोरता आबद्ध हैI
  • सन्देश का लाभ अभियुक्त को प्राप्त होगा वह दोषमुक्ति का अधिकारी होगाI
  • आंगल दण्ड विधि शास्त्र का स्वर्णिमी नियम:
  • हजारों दोषी व्यक्ति अदण्डित रह जाए यह स्वीकार्य हो सकता है किन्तु एक भी निर्दोष व्यक्ति दण्डित नही होना चाहिये
  • न्याय हुआ है यही पर्याप्त नही है, न्याय हुआ है, यह प्रतीत भी होना चाहिये
  • दोषित की आपवादिक प्रकल्पना:
  • निर्दोषित की प्रकल्पना न्याय की व्यापक अवधारणा पर आधारित हैI यह दण्ड विधि शास्त्र का बहुत ही मौलिक नियम रहा हैI कुछ नियमों जैसे सामाजिक आर्थिक अपराध महिलाओ के विरुद्ध अपराध निर्धोशिता की प्रकल्पना का नियम, न्याय के स्थान पर अन्यायकारी सिद्ध हुआ है अभियुक्त को इसका अनुचित लाभ मिल जाता है अत: न्याय के व्यापक भाव में निर्दोषित की प्रकल्पना के स्थान पर उपरोक्त मामलों में दोषिता की प्रकल्पना की जाती हैI
  • भारतीय साक्ष्य अधि. की धारा 113-A, 113-B, तथा 114-A दोषित की प्रकल्पना से सम्बंधित है यह प्रकल्पना खंडनीय हैI
  1. सिविल मामलों में सिद्ध भारिता का मानक:
  • सिविल मामलों में सिद्ध भरिता का मानक अपेक्षाकृत कम कठोर हैI वादी से अपना प्रकरण प्रत्येक मुक्तिमुक्त सन्देश से परे स्थापित करने की अपेक्षा नही की जाती है प्रकरण का प्रथम द्रष्टया स्थापित करना पर्याप्त हो सकता हैI
  • वादी द्वारा प्रथम द्रष्ट्तया प्रकरण स्थापित कर देने पर, न्याय. विपक्षी को उपस्थित होने तथा अपनी प्रतिरक्षा करने हेतु नोटिस जरी कर सकता हैI
  • N SINGH VS LAUDHAR, 1978 ALLD. धारित: वादी द्वारा शपथपूर्वक यह कहना कि विवादित संपत्ति पर उसे स्वत्त प्राप्त है तथा अपने दावे के सम्बन्ध में राजस्व अभिलेखों की सुसंगत प्रविष्टियों की प्रतिया संग्लन करने पर न्याय. को वादी के दावे पर अविश्वास भी करना चाहियेI ऐसे मामले में विचारण न्याया. को प्रतिवादी के विरुद्ध नोटिस जरी कर देना चाहिये थाI
  • SITARAM B. PATIL VS RAMESH CHANRA N. PATIL 1972 SC. धारित- जहाँ प्रकरण में समस्त साक्ष्य संबद्ध पक्षों द्वारा प्रस्तुत किया जा चुका हो, वहाँ सिद्ध भारिता का प्रश्न असंगत हो सकता हैI

विशेष तथ्य सिद्ध करने का भार: s.103

  1. विशेष तथ्य सिद्ध करने का भार-
  • उस व्यक्ति पर होगा जो न्याया. से उस विशेष तथ्यों पर विशवास करने की वांछा करता है या जो किसी विधि के अधीन विशेष तथ्य सिद्ध करने हेतु बाध्य हैI
  1. विशेष तथ्य की उधारणा:
  • स्वीकृति तथा संस्वीकृति
  • अन्ययत्र होने का अभिवाक
  1. धारा 103 के द्रष्टान्त:

“’ख’ को ‘क’ चोरी के लिए अभियोजित करता है और न्याया. से यह चाहता है कि न्याया. यह विशवास करे कि ‘ख’ से चोरी की स्वीकृति ‘ग’ से की हैI ‘क’ को यह स्वीकृति साबित करनी होगीI

‘ख’ न्याया. से चाहता है कि वह यह विशवास करे कि प्रश्नगत समय पर वह अन्यत्र थाI उसे यह बात साबित करनी होगीI”

साक्ष्य को ग्राह्य बनाने वाले तथ्य को सिद्ध करने का भार: धारा 104 r/w 136

  1. कभी – कभी किसी तथ्य का साक्ष्य तभी ग्राह्य होता है जबकि किसी अन्य तथ्य का अस्तित्व पहले सिद्ध कर लिया जायेI
  2. जहाँ साक्ष्य को ग्राह्यता प्रदान करने हेतु पहले किसी तथ्य का सिद्ध किया जाना आवश्यक है, वहा ऐसा पूर्व तथ्य उस व्यक्ति द्वारा सिद्ध किया जायेगा जो किसी दूसरे तथ्य हेतु साक्ष्य प्रस्तुत कर रहा हैI
  3. धारा 104 में वर्णित नियम न्यायिक विवेक के अधीन शिथिल किया जा सकता हैI
  4. धारा 136 के द्वितीयक पैरा के अंतर्गत न्याया. साक्ष्य को ग्राह्यता प्रदान करने वाले तथ्य को वाद में सिद्ध करने की छूट दे सकता हैI
  5. द्रष्टान्त: धारा 104 के द्रष्टान्त (a) तथा (b) r/w s. 136 के द्रष्टान्त (a) तथा (b)

यह सिद्ध करने का भार की अभियुक्त का प्रकरण अपवाद में आता है: sec 105

  1. धारा 105 केवल दाण्डिक मामलों में लागू होती हैI
  2. धारा 105 सिद्ध भारिता तथा प्रकल्पना विषयक नियम प्रावधानित करती हैI
  3. यह सिद्ध करने का भार की अभियुक्ति का प्रकरण साधारण अपवाद (1.p.c. के अंतरगत) या 1.p.c. या अन्य विधि के अधीन किसी विशेष अपवाद या पुस्तक के अधीन आता है, अभियुक्त पर होगाI
  4. न्याया. ऐसे तथ्यों का अभाव [अनअस्तित्व] प्रकल्पित करेगा जो अभियुक्त के प्रकरण को साधारण अपवाद या किसी विशेष अपवाद या किसी पुस्तक की परिधि में लाते हैंI
  5. धारा 105 में प्रावधानित प्रकल्पना खंडनीय तथा दुर्बल हैI

मुस्समात आनंदी 1925 इलाहाबाद धारित: जहाँ अभियुक्त का प्रकरण साधारण अपवाद की परिधि में हो किन्तु अभियुक्त धारा 105 द्वारा अपेक्षित सिद्ध भारिता का निर्वाह नही करता हैI वहाँ न्याया. अभियुक्त को साधारण अपवाद का लाभ देने हेतु आबद्ध होगाI

  1. द्रष्टान्त (a)

(b)

(c)

विशेष ज्ञान के अधीन तथ्य की सिद्ध भारिता: s. 106

  1. ऐसा तथ्य जो किसी विशेष व्यक्ति के विशेष ज्ञान में हो, उस व्यक्ति द्वारा ही सिद्ध किया जायेगाI
  2. धारा 106 का सैधांतिक आधार यह है “सर्वश्रेष्ट ज्ञाता सर्वश्रेष्ट साक्षी होगा”
  3. धारा 106 लैटिन सूक्ति resipsa loquitur (अर्थात घटना स्वयं बोलती है) में प्रतिपादित सिद्धांत पर आधारित हैI (SCOTT VS LONDON & KATHERINE DOCKS. CO. 1965)
  4. स्वयं प्रमाश का सिद्धांत, धारा 106 में अंतर्विष्ट हैI धारा 101 का अपवाद हैI
  5. 911 usts. (a) & (b)

जीवित होने की प्रकल्पना: sec. 107, 108

  1. धारा 107 जीवित होने की प्रकल्पना से सम्बंधित है धारा 108, व्यवहारत: धारा 107 का पुस्तक हैI
  2. धारा 107 –
  • न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह होना चाहिये कि क्या कोई व्यक्ति जीवित है
  • यह दर्शाया गया हो कि उक्त व्यक्ति गत 30 वर्षों में जीवित था
  • सिद्ध भारित (मृत होने की) उस व्यक्ति पर होगी जो सम्बंधित व्यक्ति का मृत होना प्रख्यापित करता हैI
  1. धारा 108 –
  • न्याया. के समक्ष प्रश्न यह होना चाहिए कि अमुक व्यक्ति जीवित है या कि मृतI
  • यह सिद्ध कर दिया गया हो कि उक्त व्यक्ति को गत 7 वर्षो से उन व्यक्तियों द्वारा भी नही सुना गया है जिन्होंने स्वाभाविकत: उसके बारे में सुना होता यदि वह जीवित होताI
  • प्रश्नगत व्यक्ति के जीवित होने की सिद्धभारिता उस व्यक्ति पर चली जायेगी जो उसका जीवित होना प्राख्यापित करता हैI
  • Mohd Sharif Vs Bande Ali 1911 Alld धारित- धारा 107, या 108 मृत होने की तिथि के सम्बन्ध में कोई प्रकल्पना नही करतीI अत: जो मृत्यु की किसी विशिष्ट तिथि की बात करता है, उसे वह तिथि सिद्ध करनी होगीI

कुछ संबंधों के सम्बन्ध में प्रकल्पना: s. 109

  1. धारा 109 का नीतिगत आधार यह है कि –

“विधि संबंधों की स्त्तता के पक्ष में हैI”

  1. धारा 109 केवल नि. लि. संबंधों को आच्छादित करती है –
  • भवन स्वामी तथा किरायेदार
  • मालिक तथा अभिकर्ता
  • भागीदारी
  1. न्याया. के समक्ष प्रश्न यह होना चाहिये कि क्या व्यक्ति के मध्य उपरोक्त में से कोई सम्बन्ध है|
  2. यह दर्शाया गया हो कि क्या किन्ही दो व्यक्ति के मध्य उपरोक्त में से कोई सम्बन्ध है|
  3. यह सिद्ध करने का भार कि वे व्यक्ति अब उस सम्बन्ध में नहीं है, उस व्यक्ति पर होगा जो ऐसा प्राख्यित करता है

स्वामित्व सिद्ध करने का भार : s. 110:

  1. धारा 110 लैटिन सूक्ति “potior est condito possedents” (अर्थात कब्ज़ा स्वामित्व का प्रथम द्रष्टया प्रमाण है) पर आधारित हैI अत: जहाँ कोई व्यक्ति कब्जा धारक है, वहाँ उसे कब्जाधीन संपत्ति का स्वामी समझा जायेगाI
  2. जबकि न्याया. के समक्ष प्रश्न यह हो की ऐसा व्यक्ति जो कब्जे में दर्शाया गया है, क्ब्जाधीन संपत्ति का स्वामी है?
  3. यह सिद्ध करने का धारा कि कब्जाधारक स्वामी नही है, उस व्यक्ति पर होगा जो ऐसा प्रतिज्ञात करता हैI
  4. उचित कारणों से विधि – विरुद्ध बेदखली के विरुद्ध कब्ज़ा विषयक उपचार प्रदान करती हैI कब्जे का संरक्षण लोक शक्ति तथा सामाजिक स्थिरता की मौलिक अपेक्षा हैI अत: अवैध बेदखली का शिकार व्यक्ति अपना कब्जा पुन: प्राप्त कर सकता हैI

यह कहा जाता है कि कब्जे के 10 में से 9 अंक होते है यदि कब्जे का सम्मान नही किया जाता है तो भारी अराजकता, अव्यवस्था अशांति फ़ैल जाएगीI अग्रेतर, कब्ज़ा, उपयोग का अवसर प्रदान करता हैI

स्वयंव्यवहार का सद्भावनापूर्ण होना सिद्ध करने का भार: s.111

  1. न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह हो कि क्या पक्षकारों के मध्य संव्यवहार सद्भावनापूर्ण है (जबकि उनमे से एक पक्ष दूसरे के प्रति सक्रिय विशवास की स्थिति में होI)
  2. संव्यवहार का सद्भावनापूर्ण होना सिद्ध करने का भार उस व्यक्ति पर होगा जो सक्रिय विशवास करने की स्थिति में हैI
  3. द्रश्त्ता: (a)

(b)

निश्चायक साक्ष्य: s. 41, 112, 113

  1. निश्चायक साक्ष्य का आधार विधायी घोषणा हैI अधि. की धारा-4 निश्चायक साक्ष्य की परिभाषित करती हैI धारा 4 के अनुसार –

“जहाँ इस अधि. द्वारा किसी तथ्य को किसी दूसरे तथ्य का निश्चायक साक्ष्य घोषित किया गया हो, वहाँ ऐसा तथ्य के सिद्ध हो जाने पर न्याय. उस दूसरे तथ्य को सिद्ध हुआ समझेगा तथा उस दूसरे तथ्य के असिद्ध करने के उद्देश्य से साक्ष्य देने की अनुमति नही देगा”

अधि. की धारा 41 तथा 112, 113 निश्चायक साक्ष्य का प्रावधान

  1. विधिक परिस्थिति आदि से सम्बंधित निर्णय की सुसंगति: s.41
  • प्रेबेत, वैवाहिक, सामुद्रिक या दिवालिया क्षेत्राधिकार के प्रयोग में किसी समक्ष न्याय द्वारा कोई अंतिम निर्णय, आदेश या आज्ञाप्ति पारित किया गया होI
  • ऐसे निर्णय आदेश या आज्ञप्ति द्वारा:
  • किसी व्यक्ति पर कोई विधिक परिस्थिति प्रदत्त की गयी हो या उससे ऐसी परिस्थिति छीन ली गई होI
  • किसी व्यक्ति के विधिक परिस्थिति के अधिकारी होने या किसी वस्तु पर पूर्ण अधिकार धारण करने की घोषणा की गई होI

उपरोक्त अपेक्शाओ के संतुष्ट हो जाने पर प्रश्नगत निर्णय आदेश या आज्ञाप्ति धारा 41 के अनुसार सुसंगत होगा तथा धारा 41 ये निर्दिष्ट मामलों में निश्चायक भी होगाI

  1. धर्मजता की निश्चायक प्रकल्पना: s.112
  • धारा 112 का नीतिगत आधार यह है कि मात्रव्व एक तथ्य किन्तु पित्र्व्व एक अनुमान हैI विधि धर्मजता के पक्ष में झुकी हुई है तथा यह अधर्मजता को स्वीकार नही करता हैI
  • धारा 112 पित्रव्व के पक्ष में निश्चायक प्रकल्पना करती हैI वैध विवाह के दौरान जन्मी संतान तथा वैध विवाह के भंग हो जाने के बाद अगले 280 दिनों के अंदर जन्मी संतान जबकि मां ने पूनी विवाह न किया हो उस महिला से विवाहित पुरुष की धर्मज संतान मानी जायेगीI
  • अपवाद:
  • धर्मजता की निश्चायक प्रकल्पना वहाँ नही होगी जहाँ विवाह के पक्षकारो की ऐसी पारस्परिक पहुंच नही होगी कि उक्त संतान का गर्भाधान हो सकता है इस अपवाद का आधार यह विचार है कि –

कोई भी प्रकल्पना असंभाव्यता की सीमा तक विस्तारणीय हैI”

  • निर्णय:
  • वेकटेश्वरलू प्रति वेंकट नारायण 1954 s.
  • क्रांति देवी प्रति पोशीराम 2001 s.
  • चिरुथा कुट्टी प्रति सुब्रमन्यम 2000 केरल
  1. साक्ष्य क्षेत्र के वैध विलयन की निश्चायक प्रकल्पना: s.113
  • शासकीय राजपत्र में वैध विलयन की अधिसूचना, ऐसे विलयन का निश्चायक साक्ष्य होगाI
  • विलयन ब्रिटिश राज्य क्षेत्र के किसी भाग का होना चाहिए [भारत शासन अधि. 1935 के भाग 3 के लागू होने से पूर्ण]
  • विलयन किसी देश राज्य या किसी देशी राजकुमार या किसी शासन के पक्ष में अधिसूचित होना चाहिएI

उपरोक्त परिस्थितियों में गजट अधिसूचना में उल्ल्लेखित तिथि से विलयन की निश्चायक प्रकल्पना की जायेगीI

कुछ अपराधों के सम्बन्ध में खण्डनीय प्रकल्पना: s. 111-A

  1. अभियुक्त पर नि. में से किसी अपराध का आरोप हो-
  • धारा 121, 121-A, 122 या 123. 1.p.c
  • धारा 122 या 123 1.p.c के अंतर्गत अपराध हेतु आपराधिक श्न्यन्त्र या झ धारायों के अधीन अपराध का प्रयत्न या दुश्प्रेरण
  1. कोई क्षेत्र सुसंगत विधि के अंतर्गत उपद्रवग्रस क्षेत्र घोषित किया गया हो [अव्यवस्थित का शमन करने तथा लोक व्यवस्था की पुर्नस्थापना तथा अनुसरण हेतु] या कोई ऐसा स्थान हो जहाँ एक माह से अधिक अवधि से लोकशान्ति में गंभीर व्यवधान जारी होI
  2. यह दर्शाया गया हो कि अभियुक्त ऐसे क्षेत्र में उस समय विधमान था जबकि उस स्थान से सशस्त्र बल या लोक व्यवस्था के अनुसरण के दाखिल से भारित बल के विरुद्ध अम्यायुधो या विस्फोटकों द्वारा इन बलों पर आक्रमण किया गया था या इनका प्रतिरोध किया गया थाI

उपरोक्त अपेक्षित के संतुष्ट हो जाने पर या प्रकल्पना की जायेगी कि उक्त अपराध अभियुक्त ने ही किया थाI यह प्रकलपना खण्डनीय होगीI

कुछ तथ्यों के अस्तित्व के सम्बन्ध में प्रकल्पना: s. 114

  1. धारा 114 के अंतर्गत न्याया. ऐसे तथ्य जिसके घटित होने की संभाव्यता समझता हो, के अस्तित्व की प्रकल्पना कर सकता हैI
  2. धारा 114 के अंतर्गत नि. आधारों पर प्रकल्पना की जा सकती हैI
  • नसगीके घटनाओं का सामान्य अनुक्रम
  • मानव आचरण
  • लोक तथा निजी कारबार
  1. द्रष्टान्त: (a)-(i)
  2. Dagoli vs State of Matharstha Held: धारा 114 के द्रष्टान्त (b) तथा अधि. की धारा 183 के मध्य कोई विरोध नही हैI

दोषिता की खण्डनीय प्रकल्पना:

  1. धारा 111-A, 113-A, 113-B तथा 114-A दोषिता की खण्डनीय प्रकल्पना प्रावधान करती हैI यह धाराए निर्दोषित की प्रकल्पना का अपवाद हैI
  2. विवाहित द्वारा आत्महत्या के दुश्प्रेरण की प्रकल्पना: s. 113-A
  • अधि. 46 1983 द्वारा 19 नवम्बर 1986 से अन्त: स्थापितI
  • धारा 113-A भूतलक्षी है [गुरुवचन सिहं प्रति सतपाल सिंह 1990 s.]
  • न्याया. के समक्ष प्रश्न

विकाहिल द्वारा हत्या उसके प्रति या उसके पति के सम्बन्धी रिश्तेदार ने दुष्प्रेरित किया हैI

  • यह दर्शाया गया हो कि-
  • आत्महत्या विवाह की तिथि से 7 वर्षों के भीतर की गई हैI
  • अभियुक्त पति या उसके सम्बन्धी ने नृतक महिला के साथ क्रूरता की थीI
  • न्याया. यह प्रकल्पना कर सकेगा [अन्य परिस्थितियों के परिपेक्ष में] कि उक्त आत्म हत्या पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा दुष्प्रेरित थी [may pressume]
  • धारा 113-A में क्रूरता शब्द का वही अर्थ होगा जैसा कि धारा 498-A i.p.c में प्रावधानित हैI
  1. दहेज मृत्यु के सम्बन्ध में प्रकल्पना: s. 113-B
  • अधि. सूचना 43, 1986 द्वारा अंत: स्थापित [19.11. 1986]
  • न्याया. के समक्ष प्रश्न: क्या अभियुक्त ने किसी महिला की दहेज़ मृत्युकरीत की हैI
  • यह दर्शाया गया हो कि-
  • मृत्यु से शीघ्र पूर्व मृतक महिला के साथ क्रूरता की गई थी या उसे तंग किया गया थाI
  • ऐसी क्रूरता या ऐसा तंग किया जाना दहेज़ की मांग हेतु या ऐसी मांग के सम्बन्ध में की गई थीI
  • नयया. यह प्रकल्पना करेगा कि अभियुक्त द्वारा उक्त दहेज़ मृत्यु कारित की गई हैI
  • दहेज़ मृत्यु का वही अर्थ होगा जैसा कि धारा 304B(1) में परिभाषित है (explain to s.114-A
  1. द्रूत्संग के कुछ अभियोजकों में सहमती के अभाव की प्रकल्पना: s.114-A
  • धारा 114-A संशोधन अधि. 43 1984 द्वारा अंत: स्थापित की गई हैI यह धारा केवल बलात्संग के मामलों में लागू होगी-
  • पुलिस अधिकारी द्वारा कथित थाना क्षेत्र में बलात संग
  • अभिराक्षधीन महिला से लोकसेवक द्वारा बलात संग
  • जेल प्रबंध संप्रेक्षाग्रन्थ या ऐसी ही किसी अन्य संस्था के प्रबंध से सम्बंधित व्यक्ति द्वारा अंत: वासित महिला के साथ बलात्संग
  • चिकित्साकर्मी द्वारा चिकित्सालय में कथित बलात संग
  • गर्भवती महिला के साथ बलात संग
  • सामूहिक बलात्संग
  • पीड़िता के साथ लौगिक सहवास हो गया हो
  • न्याया. के समक्ष प्रश्न: क्या अभियुक्त द्वारा कथित बलात संग पीड़ित की सहमती के बिना लैंगिक सहवास किया गया थाI
  • पीड़िता द्वारा न्याया. के समक्ष अपने साक्ष्य में यह कहा गया हो कि उसने सहमती नही दी थीI

न्याया. सहमती का अभाव प्रक्ल्प्ति करेगाI

(विबंध) अध्याय – VIII [s.115-117]

सामान्य:

  1. अध्याय-8 [s. 115-117] निबंध से सम्बंधित हैI विबंध सिविल मामलों में लागू होता है विबंध का सिद्धांत सर्वप्रथम पिकार्ड प्रति सियर्स 1837 के प्रकरण में प्रतिपादित किया गया थाI
  2. विबंध का आधार साम्या है भारत में. विबंध का सिद्धांत वैधानिक या अधिनियमित प्रस्थिति रखता है विबंध का सिद्धांत लैटिन सूक्ति- Nemo deset quod non habet [अर्थात कोई भी व्यक्ति उससे बेहतर स्वत्व अंतरित नही कर सकता है जो वह स्वयं धारण करता है] का एक अपवाद हैI
  3. विबंध का सिद्धांत अनेक अधि. में अंगीकृत किया गया है यहाँ नि. का विशेष संदर्भ किया जा सकता है-
  • धारा 35, 41, 43 संपत्ति अंतरण अधि.
  • धारा 27, 28 माल विक्रय अधि.
  • वाणिज्यक अभिकरता द्वारा गिरवी
  • शून्यकरणीय संविदा के अधीन संपत्ति के कब्जाधारक द्वारा ऐसी संपत्ति की गिरवी या विक्रय
  1. विबंध प्रक्रिया का नियम है अत: यह प्रक्रियात्मक नियमों की सीमाओ के अधीन हैI अग्रेतर, विबंध प्रतिरक्षा में अभिवचन योग्य है यह वाद कारण प्रदान नही करता है यह कहा जाता है कि विबंध ढाल है तलवार नही

 

  1. विधिशास्त्र आधार:
  • कोई भी व्यक्ति साथ-साथ अनुमोदन तथा अनअनुमोदन नही कर सकता हैI
  • कोई व्यक्ति एक ही समय मे दो विरोधी बाते नही कर सकता हैI
  • Allegans Contraria non est audiendus (अर्थात परस्पर विपरीत बाते करने वाले व्यक्ति को नही सुना जाना चाहिएI
  • अध्याय VIII आचरण द्वारा विबंध से सम्बंधित है विलेख द्वारा विबंध तथा अभिलेख द्वारा विबंध अध्याय VIII की परिधि में नही हैI

विबंध के प्रकार:

 

  1. विबंध के नि. तीन प्रकार है-
  • आचरण द्वारा विबंध
  • विलेख द्वारा विबंध
  • अभिलेख या अभिलेख द्वारा विबंध

 

 

  1. आचरण द्वारा विबंध (estupppel in pais)
  • यह साशय व्यय्देशन (प्रत्यक्ष या परोक्ष) से उत्पन्न होता हैI व्यय्देशन, क्रित्प या लोप द्वारा किया जा सकता हैI
  • आचरण द्वारा विबंध वहाँ उत्पन्न नही होता जहाँ व्यय्देषित व्यक्ति वस्तुस्थिति से अवगत था [मोहरी बीबी प्रति धर्मोदास घोष, 1903]
  • विबंध की प्रतिरक्षा अभिरचित करने वाले पक्ष को यह दर्शाना होगा कि साश्या व्ययदेशन पर विशवास करते हुए उसने अपनी स्थिति में अलाभकर परिवर्तन कियाI

 

  1. विलेख द्वारा विबंध:
  • यह पक्षकारो के मध्य वृधित: निष्पादित विलेख से उत्पन्न होता हैI विलेख के पक्षकार विलेख में किये गये कथनों से मुकर नही सकते
  • विलेख द्वारा विबंध केवल नि. शर्तों के संतुष्ट होने पर उद्भूत हो सकता है-
  • विलेख सम्यक रूप से निष्पादित हैI
  • विलेख पर पक्षकारों के हस्ताक्षर किये गये हैI
  • विलेख प् साक्षियों द्वारा हस्ताक्षर किये गये हैI
  • विलेख विधि के अनुसार पंजीकृत हैI

 

  1. अभिलेख या अर्ध अभिलेख द्वारा विबंध:
  • अभिलेख न्याया. द्वारा दिया गया निर्णय अभिलेख द्वारा विबंध सृजित करता हैI अन्य न्याया. द्वारा दिया गया निर्णय अर्ध अभिलेख द्वारा विबंध सृजित करता हैI
  • अभिलेख या अर्ध अभिलेख द्वारा विबंध धारा -11 c.p.c. के अंतर्गत Res judicate के रूप में प्रावधानित हैI धारा 300.c.r.p.c में इसे अंगीकृत किया गया हैI

आवश्यक तत्व:

  • एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के समक्ष साशय व्ययदेशन किया गया हो
  • ऐसी व्ययदेशन द्वारा दूसरे व्यक्ति को किसी बात के सत्य होने का विश्वास कराया गया हो या किये जाने दिया गया होI
  • व्ययदेशित व्यक्ति ने ऐसे व्ययदेशन पर विशवास करते हुए अपनी स्थिति में अलाभकर परिवर्तन कर लिया होI

उपरोक्त अपेक्षा के संतुष्ट हो जाने पर न तो व्ययदेशनकर्ता और न उसका प्रतिनिधि व्ययदेशित व्यक्ति या उसके प्रतिनिधि के मध्य किसी वाद या कार्यवाही में ऐसे व्ययदेशन की सम्यता से इन्कार कर सकेगाI

 

 

 

विनिदिष्ट विबंध: धारा 116, 117

  1. धारा 116 स्वव आधारित विनिर्दिष्ट प्रावधानित करती हैI धारा 117 प्राधिकार आधारित विनिर्दिष्ट विबंध प्रावधानित करती हैI

 

  1. स्वल्व आधारित विनिर्दिष्ट विबंध: धारा 116
  • अनुज्ञाप्तिदाता तथा अनुज्ञाप्तिधारी के मध्य विबंध
  • भू-स्वामी तथा अभिधारी के मध्य विबंध

 

  1. प्राधिकार आधारित विनिर्दिष्ट विबंध: धारा 117
  • अनुज्ञाप्तिदाता तथा अनुज्ञाप्तिदाता के मध्य विबंध
  • उपनिधाता तथा उपनिहिती के मध्य विबंध
  • लेखीवाल तथा विनिमय पत्र के प्रतिग्रहीता के मध्य विबंध

 

  1. अनुज्ञाप्तिदाता तथा अनुज्ञाप्तिधारी के मध्य विबंध:
  • कब्जाधारक के Licence पर अचल संपत्ति पर आने वाला व्यक्ति इस बात से इनकार नही कर सकेगा के Licence देते समय कब्जाधारक को कब्जे का स्वल्व प्राप्त था [धारा 116]
  • अनुज्ञाप्तिधारी इस बात से इनकार नही कर सकता है कि लाइसेंस के प्रारम्भ के समय अनुज्ञाप्तिदाता को लाइसेंस देने का प्राधिकार था [धारा 117]

 

  1. भवन स्वामी तथा अभिधारी के मध्य विबंध: धारा 116
  • अचल संपत्ति का अभिधारी या उसके माध्यम से दावा करने वाला व्यक्ति अभिधृति के जारी रहने के दौरान इस बात से इनकार नही कर सकेगा कि भवन स्वामी को अभिधृति के प्रारम्भ के समय भवन पर स्वल्व था [धारा 116]

 

  1. विनियम-प्रपत्र के लेखिपाल तथा प्रतिग्रहीता के मध्य विबंध:
  • विनियम – प्रपत्र का प्रतिग्रहीता इस बात से इनकार नही कर सकेगा कि लेखीवाल को ऐसा विनियम पत्र लिखने या प्रष्ठांकित करने का प्राधिकार था [धारा 117]
  • प्रतिग्रहीता इस बात से इनकार कर सकता है कि विनियम पत्र उस व्यक्ति द्वारा लिखित है जिनके द्वारा उसका लिखित होना दर्शित है [स्पष्टीकरण-1 धारा 117]

 

 

 

  1. उपनिधाता तथा उपनिहिर्ता के मध्य विबंध: धारा 117
  • उपनिहिर्ता इस बात से इनकार नही कर सकता है कि उपनिधान के प्रारम्भ के समय उपनिधाता को उपनिधान करने का प्राधिकार थाI
  • उपनिधाता से भिन्न व्यक्ति को उपनिधान की विषयवस्तु परिदत्त करने वाला उपनिर्हिता यह सिद्ध कर सकेगा कि परिदान प्राप्त कर्ता को विषय वस्तु पर उपनिधाता के विरुद्ध अधिकार प्राप्त था [स्पष्टीकरण धारा 117]

 

वचनात्मक विबंध:

  1. यह सिद्धांत साम्या पर आधारित है यह न्यायालयों द्वारा विकसित किया गया सिद्धांत है यह अधिनियमित या वैधानिक सिद्धांत नही है इसे नि. अन्य नामों से भी जाना जाता हैI
  • निर्वान विबंध
  • अपेक्षित विबंध
  • विबंध कल्प का सिद्धांत
  1. यह सिद्धांत प्रतिफल के सिद्धांत का अपवाद हैI यह सिद्धांत वादकारण भी प्रदान करता है क्षति इस सिद्धांत के लागू होने की पूर्व शर्त नही हैI यह सिद्धांत शासन के विरुद्ध भी अभिवचन योग्य हैI
  2. वाचानात्मक विबंध के सिद्धांत का आधार भविष्यकालिक वचन द्वारा सृजित प्रकल्पित संविदा हैI

 

  1. आवश्यक तत्व:
  • एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष के समक्ष भविष्यकालिक वचन किया गया होI
  • वचनदाता को यह ज्ञान रहा हो, कि दूसर पक्ष ऐसे वचन का अवलंब ले सकता है, तथा ऐसा वचन विधिक् सम्बन्ध स्थापित करने के आशय से दिया गया होना चाहिएI
  • दूसरे पक्ष ने ऐसे वचन का अवलंब लिया हो तथा अपनी स्थिति में परिवर्तन किया होI

उपरोक्त अपेक्षाओं के संतुष्ट हो जाने पर वचनदाता अपने वचन से आबद्ध होगा दोनों पक्षों के मध्य एक संविदा का अस्तित्व प्रकल्पित कर लिया जाता हैI वचनदाता यह तर्क नही दे सकेगा कि उसके द्वारा दिया गया वचन प्रतिफलविहीन हैI

  1. निर्णय:
  • P Sugarmiles 1984 sc.
  • Sharadchandra day vs Gopal Chandra Laha 1891 p.c

Hardwari Lal vs G.D. Tapashe. 1982

साक्षियों के विषय में

अध्याय – IX [sc.118-134]

सामान्य:

  1. अध्याय ix [sc. 118-134] साक्षियों के बारे में हैI अध्याय x [sc. 135-166] साक्षियों की परीक्षा के सम्बन्ध में हैI
  2. अध्याय ix की योजना:
  • समक्ष साक्षी:
  • कौन अभिसक्ष्य दे सकेगा——————————-sec. 118.
  • पागल व्यक्ति समक्ष साक्षी हो सकता है————-sec. 118 का स्पष्टीकरण
  • मूक साक्षी————————————————sec. 119.
  • पक्षकार तथा उसका या उसकी पति या पत्न——–sec. 120.
  • न्यायाधीश और मजि. ———————————sec. 121.
  • सह अपराधी———————————————-sec. 133.
  • विशेषाधिकार संसूचनाये:
  • वैवाहिक संसूचना—————————————-sec.122.
  • राज्य विषयों से सम्बंधित अप्रकाशित

अभिलेखों से प्राप्त साक्ष्य——————————sec. 123.

  • शासकीय विशवास में की गई संसूचना—————sec. 124.
  • अपराध के सम्बन्ध में संसूचना ———————sec. 125.
  • वृत्तिक संसूचना —————————————sec. 126-129.
  • साक्षियों को संरक्षण:
  • अपक्षकार साक्षी स्वत्व विलेख पेश करने

जाने के लिए बाध्य नही है—————————sec. 130 r/w sec.131.

  • कब साक्षी उत्तर देने हेतु बाध्य किया जा सकेगा—sec. 132.
  • साक्षियों की संख्या—————————————–sec. 134.

 

 

कौन अभिसाक्ष्य दे सकेगा: sec. 118-121 r/w sec. 133

  1. सभी व्यक्ति समक्ष साक्षी है ऐसे व्यक्ति समक्ष साक्षी नहीं है जो कोमल वयस [Tender years] अत्यधिक ब्रद्धावस्ता रुग्वता (मानसिक/शारीरिक) ऐसे ही किसी अन्य कारणों से पूछे गये प्रश्नों का समझने या उनका तार्किक उत्तर देने से निवारित हो गये [sec. 118]
  2. सक्षमता के सम्बन्ध में विविध मानक बहुत उदार है यह उदारता तर्क संगत है कठोर मानक साक्षियों की उपलब्धता हो प्रभावित कर सकते हैI इससे न्याय. प्रशासन बाधित हो सकता है यहाँ बेनथम को उदघृत किया जा सकता है-

“साक्षी न्याय. के आँख या कान है

इन्हें संरक्षित किया जाना चाहिएI”

  1. चित विकृत व्यक्ति साक्ष्य देने में अक्षम नही हैI जब तक कि अपनी चितविकृति के कारण वह पूछे गये प्रश्नों को समझने या उनका तार्किक उत्तर देने से निवारण न हो गया हो [धारा 118 का स्पष्टीकरण]
  2. बोलने में असमर्थ व्यक्ति लिखकर या अन्य किसी बोधगम्य ढंग से अपना साक्ष्य दे सकता हैI यह आवश्यक है कि ऐसा लेख या संकेत खुले न्याय. में दिया गया हो ऐसा साक्ष्य प्रकल्पित मौखिक साक्ष्य होगा [s. 119]
  3. सिविल या दांडिक कार्यवाही के पक्षकार तथा उनके पति या पत्नी सक्षम साक्षी है [s. 120]
  4. किसी भी न्यायाधीश या मजि. को नि. का उत्तर देने के लिये बाध्य नही किया जा सकता हैI
  • न्यायाधीश या मजि. को कार्य करते समय उसके अपने सम्बन्ध के आचरण में पुछा गया प्रश्न
  • न्यायाधीश या मजि. के रूप में कार्य करते समय किसी की गई बात के सम्बन्ध में प्रश्न

उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर देने के लिए उसे उस न्याय. के विशेष आदेश जिसके वह अधीन है बाध्य किया जा सकता हैI न्यायाधीश या मजि. को उस हैसियत में कार्य करते समय उसकी उपस्थिति में हुई घटना के सम्बन्ध में परीक्षाधीन किया जा सकता हैI [s.121]

  1. सह अपराधी अभियुक्त के विरुद्ध सक्षम साक्षी है सह अपराधी के असंतुष्ट साक्ष्य के आधार पर अभिलेखित दोषसिद्धि मात्र उस कारण विधि-विरुद्ध नही होगी [s. 133]

सह अपराधी के साक्ष्य का स्पष्टीकरण सतर्कता या प्रज्ञा का नियम हैI यह विधि का नियम नही हैI

DAGDU vs State of Matharastra 1976 sec. (per chandrachud j.)

धारा 133 तथा धारा 114 के द्रष्टान्त(b) के अध्य कोई विरोध नही हैI

 

विशेषाधिकृत संसूचनाये: s.

  1. “विशेषाधिकृत संसूचना” पद की वैधानिक परिभाषा उपलब्ध नही है सामान्य अर्थो में संसूचनाये विशेषाधिकृत ऐसे कथन या सन्देश है जिनकी निजता तथा गोपनीयता का अनुरक्षण लोकनीति का विषय हैI इन्हें प्रकटीकरण के विरुद्ध विधिक संरक्षण प्राप्त हैI
  2. विशेषाधिकृत संसूचनाओ के प्रकार:
  • वैवाहिक संसूचना ————————————-sec. 122.
  • राज्य संसूचना —————————————–sec. 123-125 r/w 12
  • वृत्तिक संसूचना —————————————sec. 126-129.
  1. वैवाहिक संसूचना: s. 122.
  • ऐसा व्यक्ति जो विवाहित है या रह चुका है को विवाह के दौरान विवाह के दूसरे पक्ष द्वारा की गई संसूचना के प्रकाटीकरण हेतु न तो अनुज्ञात किया जायेगा और नही बाध्य किया जायेगाI
  • वैवाहिक संसूचना जीवन प्रयत्न के लिए प्रकटीकरण के विरुद्ध संरक्षण हैI
  • अपवाद
  • संसूचना करने वाले पक्ष की सहमती
  • सहमती के बिना प्रकटीकरण [जबकि दोनों पक्षों के मध्य सिविल या दांडिक कार्यवाही संचालित हो रही हो]
  • e Vergheese vs t.j Ponnen. 1970 sc Held: धारा 122 द्वारा आरोपित निषेध केवल पति, पत्नी तथा पूर्व पति या पत्नी पर आरोपित है अन्य कोई भी व्यक्ति धारा 122 के निषेध में नही है अत: ऐसे भिन्न व्यक्ति के माध्यम से वैवाहिक संसूचना का प्रकटीकरण हो सकता हैI
  1. राज्य संसूचना: sec. 123-125 r/w s.121
  • राज्य विषयों से सम्बंधित अप्रकाशित विषयों से पाप्त साक्ष्य नही दिया जा सकेगा [सिवाय विभाग प्रमुख की अनुमति से]
  • किसी भी लोक अभिकारों को शासकीय विशवास में दी गई संसूचना के प्रकटीकरण हेतु बाध्य नही किया जायेगा [यदि ऐसे लोक अधिकारी {धारा 123. लैटिन सूक्ति Salus populi est Supreme lex अर्थात लोक कल्याण ही सर्वोच्च विधि है पर आधारित है} की राय में ऐसा प्रकटीकरण लोकहित को प्रभावी करेगा]
  • किसी भी मजि. पुलिस अधिकारी या लोक अधिकारी को अपराध की सूचना का स्रोत बताने हेतु बाध्य नही किया जायेगाI
  • किसी भी न्यायाधीश या मजि. को नि. के सम्बन्ध में पूछे गये प्रश्न का उत्तर देने के लिए बाध्य नही किया जायेगाI
  • न्यायाधीश या मजि. के रूप में न्याय. में उसके आचरण के सम्बन्ध में
  • न्यायाधीश या मजि. के रूप में न्याया. में उसके ज्ञान में आई गई किसी बात के सम्बन्ध में उस न्याय. जिसके वह अधीन है के विशेष आदेश के द्वारा उपरोक्त से सम्बंधित प्रश्न का उत्तर देने हेतु बाध्य किया जा सकता हैI न्याया. में घटित घटना के सम्बन्ध में न्यायाधीश या मजि. की परीक्षा की जा सकेगीI
  1. वृत्तिक संसूचना: sec. 126-129
  • कक्षिकार (client) की अभियुक्त सहमती के सिवाय किसी भी बैसिटर प्लीडर अटार्नी या वकील को नि. के प्रकटीकरण या अभियुक्त की अनुमति नही होगीI
  • सेवायोजना के अनुक्रम में या सेवायोजन कके उद्देश्य से कक्षीकार द्वारा या उसकी और से की गयी संसूचनाI
  • सेवायोजन के अनुक्रम तथा सेवायोजन के प्रयोजनो हेतु कक्षीकार को दिए गये परामर्श का प्रकटीकरणI
  • सेवायोजन के अनुक्रम मे तथा सेवायोजना के उद्देश्य से सौपे गये किसी दस्तावेज की अंतरवस्तु का या दशा का प्रकटीकरणI
  • नि. का प्रकटीकरण संरक्षित नही है-
  • अवैध प्रयोजन हेतु की गई संसूचना
  • बैसिस्टर अटार्नी या वकील द्वारा प्रेक्षित ऐसा तथ्य जिससे सेवायोजना के प्रारम्भ के बाद अपराध या कपट दर्शित होता होI
  • धारा 126 द्वारा आरोपित आभार नियोजन के समापन के बाद भी बना रहता हैI
  • धारा 126 नि. व्यक्तियों पर भी लागू है-
  • द्विभाषीया
  • लिपिक
  • विधि परामर्शी से गोपनीय संसूचना: s. 129.
  • किसी भी व्यक्ति को अपने विधिक परामर्शी तथा उसके मध्य हुई गोपनीय संसूचना के प्रकटीकरण हेतु बाध्य नही किया जायेगाI
  • जहाँ ऐसा व्यक्ति साक्षी के रूप में उपस्थित होता है वहाँ उसे ऐसी संसूचना के प्रकटीकरण हेतु बाध्य किया जा सकेगा जिस सीमा तक साक्ष्य के प्रकटीकरण हेतु आवश्यक हैI
  • अभिव्यक्त सहमती: s. 128.
  • वाद के किसी पक्ष के द्वारा साक्ष्य देना धारा-126 के प्रयोजनों हेतु प्रकटीकरण की सहमती नही मानी जायेगीI
  • जहाँ पक्षकार अपने प्लीडर को साक्षी के रूप में आहूत करता है तथा उससे ऐसे प्रश्न करता है जिसका उत्तर विधित: प्रकट नही किया जा सकता है, वहाँ अभियुक्त सहमती मान ली जायेगीI

साक्षियों को संरक्षण: s. 130-132

  1. अपक्षकार साक्षी को नि. के प्रस्तुतीकरण के लिए बाध्य नही किया जायेगा
  • स्वत्व विलेख
  • बंधक या गिरवी विलेख
  • ऐसे दस्तावेज जो अपराध में फसाने की प्रवृत्ति से मुक्त हो
  1. अपक्षकार साक्षी, लिखित संविदा द्वारा उपरोक्त संरक्षण का अभित्जन कर सकता हैI
  2. धारा 131 एक न्य प्रतिस्थाप है यह सूचना प्रोधोगिकी अधि. 2000 द्वारा मूल धारा 131 के स्थान पर प्रतिस्थापित की गई है [17 oct 2000 से]
  3. नई धारा 131 के अनुसार किसी व्यक्ति को नि. के प्रस्तुतीकरण हेतु बाध्य नही किया जायेगा-
  • ऐसा दस्तावेज जो उसके कब्जे में हो
  • ऐसा इले. रिकॉर्ड जो उसके नियंत्रण में होI

उपरोक्त नियम. तब लागू भी होगा जबकि उस व्यक्ति द्वारा सहमती दे दी गई हो जो उपरोक्त के प्रस्तुतीकरण करने से इनकार करने का अधिकार रखता हो [s.131]

  1. कब साक्षी को पूछे गये प्रश्नों का उत्तर देने के लिए बाध्य किया जा सकता है-
  • वाद या कार्यवाही में विवाद विषय के प्रति सुसंगत विषय पर पूछे गये प्रश्न का उत्तर देने से नि. आधारों पर सूक्ति नही मिल सकती है-
  • यह कि उत्तर उसे किसी अपराध में फसा देगा या प्रत्यक्ष: या परोक्षत: फसाने की प्रवृति से युक्त होगा या
  • यह कि उत्तर उसे किसी शासकीय या समपहरण के प्रति उच्चहन कर देगा या प्रत्यक्ष: या परोक्षता उच्चहन करने की प्रवृत्ति से युक्त होगाI

दिए गये उत्तर के आधार पर साक्षी को गिरफ्तार या अभियोजिता नही किया जायेगा न ही ऐसा उत्तर किसी दांडिक कार्यवाही में उसके विरुद्ध प्रयोग किया जा सकेगा [सिवाय ऐसे  उत्तर के माध्यम से मिथ्या साक्ष्य देने हेतु अभियोजन के]

न्यायिकेत्तर संस्वीकृति का महत्व –

न्यायिकेत्तर संस्वीकृति को आमतौर से उतना महत्व नहीं दिया जाता है| जितना कि न्यायिक संस्वीकृति का न्यायिकेत्तर संस्वीकृति एक अत्यन्त ही कमजोर साक्ष्य होता है| अतः इसे बड़ी सावधानी और जनकर्ता से ग्रहण किया जाना चाहिये| ऐसी संस्वीकृतियों को ग्राह्रा किये जाने से पूर्व इस बात पर विचार कर लेना चाहिये कि-

  • क्या वह स्वेच्छा से की गई थी,
  • क्या वह सत्य थी,
  • जिस व्यक्ति के समक्ष वह की गई है उस व्यक्ति की परिस्थिति और उत्तरदायित्व,
  • ऐसे व्यक्ति की सत्यवादिता आदि,

 

न्यायिकेत्तर संस्वीकृति को अत्यन्त होशियारी से लेना चाहिये| इस पर तभी विश्वास करना चाहिये जब यह स्पष्ट हो और विश्वास करने के काबिल हो, तथा उसके कथन एक दूसरे सुसंगत और विश्वसनीय हो| न्यायालय को यह निश्चय करना पड़ेगा कि जिस व्यक्ति के सम्मुख संस्वीकृति की गई है, विश्वास करने योग्य गवाह है कि नहीं|

न्यायिकेतर संस्वीकृति मजिस्ट्रेट या न्यायालय के अतिरिक्ति किसी व्यक्ति यहाँ तक कि मजिस्ट्रेट के सामने उसके निजी हैसियत या व्यक्तियों के समूह के सामने की जा सकती है| साधारणता किसी प्राइवेट व्यक्ति के सामने की जाती है|

पियारा बनाम राजस्थान राज्य 1976 S.C.

अब सुस्थापित विधि यह है कि विधि यह अपेक्षा नहीं करती है कि एक न्यायिकेतर संस्वीकृति की सम्पुष्टि प्रत्येक मामले में होनी चाहिये| जहाँ न्यायिकेतर संस्वीकृति को एक स्वतंत्र साक्षी द्वारा साबित किया जाता है जो अभियुक्त के विरुद्ध कोई द्वेषपूर्ण भावना नहीं रखता है, तो वह बिना सम्पुष्टि के दोषसिद्धि का आधार हो सकता है|

 

बलदेव सिराज बनाम हरियाणा राज्य 1990 S.C.

एक अस्पष्ट न्यायिकेतर संस्वीकृति साक्ष्य में ग्राह्र है बराते वह संदेह से और उसके झूठ होने के सुझाव से मुक्त हो किन्तु न्यायिकेतर संस्वीकृति के मामले में न्यायालय को इस बात से संतुष्ट होना चाहिये कि वह स्वैच्छिक है और उत्प्रेरणा धमकी और बचन के फलस्वरूप नहीं है या धारा 25 और 26 कि प्रवंचना करने के लिए संदेहास्पद परिथितियों में नहीं है|

 

 

 

प्रश्न: प्रत्याहारी संस्वीकृति शब्द से आप क्या समझते है? इसके साक्षियक महत्व की धारणा कीजिये|

उत्तर: प्रत्याहारी संस्वीकृति का अर्थ

प्रायः ऐसा होता है कि अभियुक्त संस्वीकृति करता है और जब विचारण में उसके विरुद्ध संस्वीकृति के लिए पेश किया जाता है तो वह मुकर जाता है या इन्कार कर जाता है| ऐसी संस्वीकृतियों को प्रत्याहारी संस्वीकृति कहते है| जैसे यदि ‘अ’ जो हत्या का अभियुक्त है, किसी भी वजह से मजिस्ट्रेट के सामने संस्वीकृति करता है और जब हत्या के लिए उसका विचारण होने लगता है तो वह कहता है कि उसने संस्वीकृति नहीं की थी, या जो कुछ उसने कहा वह नहीं लिखा गया है तो यह प्रत्याहारी संस्वीकृति हुआ|

 

जहाँ तक प्रत्याहारी संस्वीकृति के महत्व या मूल्य का प्रश्न है तो ऐसा नहीं है कि न्यायालय प्रजाहारी संस्वीकृति को एकदम साक्ष्य से अलग कर देता है या उसका कोई महत्व नहीं रह जाता| एक बार संस्वीकृति करके उससे मुकर जाने से यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि वह अनुचित ढंग से प्राप्त किया गया है या स्वेच्छापूर्वक नहीं किया गया था, परन्तु अभियुक्त का उससे मुकर जाना उसे संदेहास्पद अवश्य बना देता है और न्यायालय को अधिक सावधानी से उसकी सत्यतता और स्वेच्छा पूर्ण होने पर विचार करना पड़ता है|

 

संस्वीकृति करके फिर उससे मुकर जाने के निम्नलिखित तीन नियम है

  • किसी संस्वीकृति को केवल इसलिए अनैच्छिक किया हुआ नहीं माना जायेगा क्योंकि वह वापस की गई है;
  • जो संस्वीकृति वापस ले ली गई है दोष के आधार पर यदि वह सच ही मान ली जाती है तो स्वेच्छा से की गई समझी जायेगी, किन्तु वापस ली गई संस्वीकृति पर दोषसिद्धि असुरक्षित है|
  • सह-अभियुक्तों के खिलाफ न्यायालय को दूरदर्शिता (Prudence) और होशियारी दोनों करने की आवश्यकता होती है और वापस ली गई संस्वीकृति को बिना स्वतन्त्र और पोषक साक्ष्य के नहीं ग्रहण करना चाहिये फिर भी न्यायालयों का मत है कि वापस ली गयी संस्वीकृति के आधार पर ही दण्डित करना सुरक्षापूर्ण कदम नहीं है|

 

सैद्धांतिक रूप से वापस ली गई संस्वीकृति के आधार पर ही दण्डित किया जा सकता है| किन्तु व्यवहारिक द्रष्टि से दण्डित करने के पूर्ण वापस ली गई संस्वीकृति का अन्य साक्ष्यों से पोषित होना अनिवार्य है अतःएव उच्चतम न्यायालय ने यह धारण किया कि बुद्धिमत्ता और सावधानी के द्रष्टिकोण से जो कि वास्तव में अब एक कानून का नियम बन गया है, वापस ली गई संस्वीकृति मात्र ही एक दण्डादेश का आधार नहीं बन सकती है| इसके पोषण के लिए कुछ अतिरिक्त साक्ष्यों का होना अनिवार्य है|

 

 

 

  • सखाराम बनाम महाराष्ट्र राज्य AIR 1994 S.C.

S.C. ने यह निर्णय किया कि अब यह सुव्यवस्थित नियम हो चुका है कि यद्यपि वापस ली गई न्यायालय बाह्रा संस्वीकृति अच्छा साक्ष्य है परन्तु इसकी स्वतंत्र साक्ष्यों द्वारा सम्पुष्टि होनी आवश्यक है| इसके अतिरिक्त न्यायालय को संतुष्ट होना चाहिये कि आरोपित संस्वीकृति सत्य तथा स्वतंत्र एवं स्वेच्छया की गई थी|

 

  • प्यारेलाल भार्गव बनाम राजस्थान राज्य 1963 S.C.

प्रत्याख्यापित संस्वीकृति का मूल्य अब सुसात है| न्यायालय का यह समाधान होना चाहिये कि संस्वीकृति प्राथमिक रूप से ही सत्य एवं स्वैच्छिक है| न्यायालय का यह समाधान होना ही चाहिए कि संस्वीकृति प्राथमिक रूप से ही सत्य एवं स्वैच्छिक है|

 

  • पूरन सिंह बनाम पंजाब राज्य, 1953

प्रत्याहारी संस्वीकृति को स्वीकार करने में सतकर्ता एवं प्रज्ञा नियम है|

 

  • बलवीर सिंह बनाम पंजाब राज्य, 1957.

यद्यपि प्रत्याहारी संस्वीकृति को तात्विक विशिष्टयों में संयोजक होना पाया जाता है, तो यह दोषसिद्धि का आधार हो सकेगी|

 

  • स्टेट ऑफ यू०पी० बनाम बूटासिंह 1978 S.C.

S.C. ने कहा कि चूंकि अभियुक्त ने अपनी संस्वीकृति वापस ले ली है इसलिए इस पर विश्वास करने के लिए यह आवश्यक हो गया है कि इसका महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में संपोषण हो जाये|

 

  • केहर सिंह बनाम स्टेट एडमिनिस्ट्रेशन

S.C. ने इस बात को फिर से दोहराया कि चाहे कोई संस्वीकृति अभियुक्त द्वारा वापस ले ली गयी हो, उसके आधार पर न्यायालय अभियुक्त को दोषसिद्धि ठहरा सकता है|

 

  • आलोक नाथ दत्ता बनाम पश्चिमी बंगाल राज्य AIR 2009 S.C.

S.C. ने अभिनिर्धारित किया है कि विधि का अब यह सुस्थापित सिद्धांत है कि प्रत्याहारी  संस्वीकृति एक कमजोर प्रकार का साक्ष्य होता है| न्यायालय को ऐसी प्रत्याहारी संस्वीकृति पर विश्वास करते समय स्वयं का समाधान कर लेना चाहिये कि वह सत्य एवं विश्वसनीय है| उस न्यायिक संस्वीकृति के रूप में, जिसका प्रत्याख्यान किया गया है अभिलेख पर किये गये साक्ष्य कि अन्य स्वतन्त्र तथा अकाट्य साक्ष्यों से सारभूत रूप से सम्पुष्टि होनी चाहिये, जो न्यायालय को पर्याप्त आश्वासन देगा कि वह उस पर विश्वास करने की इच्छा कर सकता है|

 

 

 

स्वीकृति का साक्ष्यिक मूल्य:

धारा 31 यद्यपि सुसंगति के अध्याय में दी गई है, परन्तु वह सुसंगति के बारे में कुछ नहीं कहती| धारा 31 स्वीकृति के साक्ष्य मूल्य तोलने का तरीका बताती है| इस धारा में साक्ष्यिक मूल्य के प्रयोजनार्थ स्वीकृति को 2 वर्गों में विभाजित किया गया है|

 

  • विबंध के रूप में प्रभावी होना यह निश्चायक साक्ष्य है|
  • विबंध के रूप में न प्रभावी होना, यह सारगन साक्ष्य है, अर्थात प्रथम द्रष्टया साक्ष्य है जो स्वीकृतिकर्ता को स्वीकृति से आबद्धकर या बाध्यकारी करता है| स्वीकृति करने वाला अपनी स्वीकृति से आबद्ध है जब तक वह उसका स्पष्टीकरण न दे या गलत न साबित करे|

 

धारा 31 और धारा 58 का प्रभाव इस प्रकार है-

  • स्वीकृति स्वीकार करने वाले के विरुद्ध प्रथम द्रष्टया सबूत है:- स्वीकृति तथ्यों का निर्णायक साक्ष्य नहीं होती, यह केवल प्रथम द्रष्टया सबूत होती है| निश्चायक सबूत की जो परिभाषा धारा 4 में दी गई है उसके अनुसार जब किसी तथ्य को निश्चायक रूप से साबित कर दिया जाता है तो न्यायालय को चाहिये कि उसके विरुद्ध कोई साक्ष्य स्वीकार न करे| स्वीकृति निश्चायक साक्ष्य नहीं होती इसलिए उसे ना साबित किया जा सकता है| जिस स्वीकृति का सबूत मिल जाता है वह साक्ष्य बन जाती है| चाहे स्वीकृति करने वाला व्यक्ति न्यायालय के सामने न आया हो और अगर वह न्यायालय में आया है और अपनी स्वीकृति के विरुद्ध कोई बात कह रहा है कि वह प्रश्नगत सम्पत्ति का मालिक नहीं था परन्तु उसने आयकर अधिकारी के सामने यह बात कही थी कि वह सम्पत्ति का मालिक था, यह निर्णित हुआ कि उसकी यह स्वीकृति उसके मालिक होने का प्रत्यक्ष साक्ष्य थी एक उम्मीदवार जो चुनाव फार्म भरता है उसमें कही गई बातें उसके खिलाफ स्वीकृति हो जाती है| यह उसे तो साबित करना था कि अपनी उम्र के बारे में जो बात उसने भरी थी वह सत्य नहीं थी|
  • स्वीकृति से सबूत का अधित्यजन अर्थात् स्वीकृति को साबित करने की आवश्यकता नहीं:- न्यायिक स्वीकृति से सबूत का अधिव्यजन हो जाता है और उससे अधिक सबूत की आवश्यकता नहीं रह जाती, चाहे न्यायालय फिर भी अधिक साक्ष्य मांग सकता है|
  • स्वीकृति विर्वान्धत कर सकती है:-

जब कोई स्वीकृति विवन्ध का प्रभाव रखती है तो जिस पक्षकार ने तथ्य ‘स्वीकार’ किये है, उसे स्वीकृत तथ्यों को न साबित करने का अवसर नहीं दिया जाएगा| धारा 115 के अनुसार विवन्ध पैदा होने के लिए यह आवश्यक है कि स्वीकृति एक तरीके से दूसरे पक्षकार के प्रति (से) निरूपण हो और उसने इसे सही जानकर कुछ कार्य किया है या अपनी स्थिति को परिवर्तित किया है|

 

साक्ष्य अधिनियम की धाराओं 17 से 23 और 31 में स्वीकृतियां न्यायिक स्वीकृतियों से भिन्न है वे विवन्ध के रूप में धाराओं 115 से 117 में प्रभावी हो सकती है|

 

स्वीकृति हक या स्वत्व का निर्माण नहीं करती:-

स्वीकृति स्वीकार किये गये तथ्य का प्रबल साक्ष्य है, किन्तु उसे गलत भी साबित किया जा सकता है| स्वीकृति द्वारा बर्तमान हक को साबित किया जा सकता है| हक मात्र स्वीकृति द्वारा अन्तरित नहीं होता है स्वीकृति मौलिक साक्ष्य है- स्वीकृति साख्यान (ठोस) साक्ष्य है, स्वीकृति को साक्ष्य अधिनियम की धारा 145 के अधीन मुकाबला करने कि आवश्यकता नहीं है|

 

स्वीकृतिकर्ता को जब तक गवाह के रूप में उपस्थित हो बिना मुकाबला (confront) कराये हुये यदि वह उसके विरुद्ध कथन करे, स्वीकृति ग्राह्रा होती है, बशर्ते वह स्पष्ट हो|

 

संस्वीकृति का साक्ष्यिक मूल्य

संस्वीकृति का साक्ष्यिक मूल्य के विषय पर उच्चतम न्यायालय के कई मामलों में प्रकाश डाला है जिनमें एक (1) शंकरिया बनाम राजस्थान राज्य 1978 S.C. जिसमें “न्यायमूर्ति सरकारिया” ने कहा कि स्वतन्त्र तथा सत्य संस्वीकृति दोष का बहुत जोरदार सबूत होता है| इसलिए जब मृत्युदण्ड के मामले अभियोजन पक्ष सजा मांग करता है और केवल इस आधार पर कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के अन्तर्गत अभियुक्त ने संस्वीकृति लिखवायी है तो न्यायालय की दोहरी परख लागू की जानी चाहिये, एक यह कि क्या संस्वीकृति सही अर्थ में स्वैच्छिक थी और यह कि क्या वह विश्वनीयता और सत्य भी थी|

 

पहली शर्त का पूरा होना संस्वीकृति के ग्राह्र होने के आवश्यक शर्त है| न्यायालय को चाहिये कि संस्वीकृति के कथन की सावधानी से जांच करे और बाकी साक्ष्य जो सामने आया है उसमें तुलना करे जांच और तुलना पर यदि संस्वीकृति के कथन को पढ़कर यह महसूस हो कि घटना का रूप दर्शाता है तथा अन्य साक्ष्य तथा परिस्थितियों के अनुसार भी सही लगती है, तो यह कहा जा सकता है कि दूसरी कसौटी भी मिल गई है|

 

(2) अब्दुल रज्जाक बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में अभियुक्त पुलिस के कब्जे में था| उसे करीब तीन दिन के लिए कारागार में छोड़ दिया गया और मजिस्ट्रेट के सामने अपनी बात बताने के लिए लाया गया| मजिस्ट्रेट ने उसे चेतावनी दी की उसे कोई बात कहने के लिए विवश नहीं किया जा सकता लेकिन जो भी अपनी इच्छा से कहेगा वह उसके विरुद्ध साक्ष्य बन जायेगा| उसे फिर 24 घन्टे के लिए जेल भेज दिया गया| अगले दिन उसकी बात लिखी गई| इस संस्वीकृति को स्वैच्छिक माना गया क्योंकि वह 4 दिन तक पुलिस के भय से मुक्त था|

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872

(1872 का अधिनियम संख्यांक 1, समेकित 3 भाग, 11 अध्याय, 167 धाराएँ)

अध्याय 7 सबूत का भार (Burden of Proof)

धाराएँ 101 – 114-क तक

 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में सबूत के भार के सन्दर्भ में कुल 5 नियम व दो अपवाद हैं, जो कुल 18 धाराओं में अन्तर्विष्ट है|

जिसमें 14 धाराएँ मूल अधिनियम के साथ लिखे गये थे, किन्तु 4 धाराएँ तत्पश्चात् समय के सन्दर्भ में संशोधित करके जोड़े गये हैं|

 

सबूत का भार कि अर्थ व परिभाषा? धारा 101

नियम 1, धारा 101 – जो कोई न्यायालय से यह चाहता है कि वह ऐसे किसी अधिकार या दायित्व के बारे में निर्णय दे, जो उन तथ्यों के अस्तित्व पर निर्भर है, जिन्हें वह प्राख्यात करता है, उसे साबित करना होगा कि उन तथ्यों का अस्तित्व है|

जब कोई व्यक्ति किस तथ्य का अस्तित्व साबित करने के लिए आबद्ध है, तब यह कहा जाता है कि उस व्यक्ति पर सबूत का भार है|

द्रष्टान्त (क) “क न्यायालय से चाहता है कि वह ख को उस अपराध के लिये दण्डित करने का निर्णय दे जिसके बारे में क कहता है कि वह ख ने किया है|”

क को यह साबित करना होगा कि ख ने वह अपराध किया है|

(ख) “क न्यायालय से चाहता है कि न्यायालय उन तथ्यों के कारण, जिनके सत्य होने का वह प्राख्यान और ख प्रत्याख्यान करता है, यह निर्णय दे कि वह ख के कब्जे में कि अमुक भूमि का हकदार है|”

क को उन तथ्यों का अस्तित्व साबित करना होगा|

सामान्यतः सिविल मामले में वादी तथा दाण्डिक मामले में अभियोजक अपने मामले को सिद्ध किया करता है| सिविल मामले में वादी सम्भावना बहुल्य सिद्ध किया करता है जबकि दाण्डिक मामले अभियोजक, अभियुक्त के दोष को युक्तियुक्त सन्देह के परे साबित करता है|

व्याख्या – अपराध विधिशास्त्र के 3 मुख्य सिद्धान्त हैं-

  • अभियोजक का यह कर्तव्य है कि वह अभियुक्त के दोष को युक्तियुक्त सन्देह के परे साबित करें|
  • परीक्षण में यह उपधारणा कि जाती है कि अभियुक्त निर्दोष है जब तक कि उसका दोषी होना साबित न हो जाय|
  • अभियोजक का यह भार कभी नहीं बदलता|

सबूत का भार किस पर होता है? धारा 102

नियम 2, धारा 102 – किसी वाद या कार्यवाही में सबूत का भार उस व्यक्ति पर होता है| जो असफल हो जायेगा, यदि दोनों में से किसी भी ओर से कोई भी साक्ष्य न दिया जाये|

 

द्रष्टान्त- (क) ख पर उस भूमि के लिए क वाद लाता है जो ख के कब्जे में है और जिसके बारे में क प्राख्यात करता है कि वह ख के पिता ग कि विल द्वारा क के लिए डी गई थी|

यदि किसी भी ओर से कोई साक्ष्य नहीं दिया जाय, तो ख इसका हकदार होगा कि वह अपना कब्जा रखे रहे| अतः सबूत का भार क पर है|

 

नियम 3, (धारा 103) – विशिष्ट तथ्य के बारे में सबूत का भार उस व्यक्ति पर होगा जो न्यायालय से यह चाहता है कि उसके अस्तित्व में विश्वास करे, जब तक कि विधि यह उपबंधित न करे कि सबूत का भार किसी विशिष्ट व्यक्ति पर होगा|

 

द्रष्टान्त – क, ख को चोरी के लिए अभियोजित करता है| क न्यायालय से चाहता है कि यह विश्वास करे कि ख ने चोरी की स्वीकृति ग से कि है| क को यह स्वीकृति साबित करनी होगी|

 

नियम 4 (धारा 104) – साक्ष्य को ग्राह्रा बनाने के लिए जो तथ्य साबित किया जाना हो उसे साबित करने का भार उस व्यक्ति पर है, जो ऐसा साक्ष्य देना चाहता है| यथा –  यदि कोई व्यक्ति मृत्युकालिक कथन का साक्ष्य देना चाहता है तो पहले उसे मृत्यु साबित करनी होगी, यदि द्वितीयक साक्ष्य देना चाहता है तो पहले उसे सिद्ध करना पड़ेगा कि मूल खो गया है|

 

नियम 5 (धारा 105) – धारा 105 केवल दाण्डिक कार्यवाहियों पर ही लागू होता है|

कानूनी अपवादों को साबित करने का भार अभियुक्त पर है अन्यथा न्यायालय ऐसी परिस्थितियों के अभाव की उपधारणा करेगा|

यथा – (1) भारतीय दण्ड संहिता का अध्याय– 4, साधारण अपवाद धाराएं 76–106

(2) आंशिक क्षम्य प्रतिवाद

(3) धाराओं के साथ जुड़ी हुई विशेष अपवाद या परन्तुक|

 

द्रष्टान्त – क हत्या का अभियुक्त है क अभिकथित करता है कि वह चित्त विकृति के कारण कार्य कि प्रकृति नहीं जानता था| सबूत का भार का पर है|

 

धारा 105 कि व्याख्या – अभियोजन को यह साबित करना पड़ता है कि अभियुक्त दोषी है| किन्तु अभियुक्त को यह साबित नहीं करना पड़ता है कि वह निर्दोष है|

 

अभियुक्त दोषी होने के बारे में कोई युक्तियुक्त सन्देह पैदा कर दें यही पर्याप्त है| (अर्थात् अपवाद के अधिसंभाव्यता की प्रभावशीलता)|

न्यायिक प्रमाण –

  • प्रभु बनाम एम्परर AIR 1941 Alld 402
  • बूल मिन्टन (1935) A.C. 462, 475 : लार्ड सेन्के
  • के.एम. नानावती बनाम महाराष्ट्र राज्य AIR 1962 S.C. 605 : न्यायमूर्ति सुब्बाराव
  • रवीन्द्र कुमार डे बनाम स्टेट ऑफ उड़ीसा (1976) 4, S.C. 233 : न्यायमूर्ति फजल अली

 

दो अपवाद – सबूत का भार के सन्दर्भ में दो अपवाद हैं-

अपवाद 1 – विशेष ज्ञात तथ्य धारा 106 – विशेष ज्ञात तथ्य को साबित करने का भार उस व्यक्ति पर होता है, वह तथ्य जिस व्यक्ति के ज्ञान में हो|

 

द्रष्टान्त – ख पर रेल में बिना टिकट यात्रा करने का आरोप है| यह साबित करने का भार कि उस के पास टिकट था, उस पर है| न्यायिक द्रष्टान्त की सूची (घटित घटना प्रतिवादी के ज्ञान में होने के कारण सबूत का भार बदल गया)

 

  • बाईने बनाम बोंडल (1863)
  • स्काट बनाम लंडन डाक कं. (1865) : न्यायमूर्ति अर्ल
  • ग्रान्ट बनाम ऑस्ट्रेलियन नीटिंग मिल्स लि. (1936) A.C. 85
  • दिल्ली नगर निगम बनाम सुभगावंती – AIR 1966 S.C. 1750 : न्यायमूर्ति रामास्वामी
  • कृष्णा बस सर्विस बनाम मंगली – AIR 1976 S.C. 700 : न्यायमूर्ति सरकारिया

 

अपवाद 2 – उपधारणा – दूसरा अपवाद उपधारणा है| जब किसी के पक्ष में विधि की या तथ्य की उपधारणा, अनुमान या निष्कर्ष निकाल ली जाती है तो उस प्राख्यायित तथ्य को साबित करने की आवश्यकता नहीं रहती है| यदि कोई व्यक्ति उस उपधारणा, अनुमान या निष्कर्ष को नहीं मानता तो सबूत का भार उस व्यक्ति पर चला जाता है|

 

यथा – धारा 107 से लेकर 114-क तक

  • उत्तरजीविता तथा मृत्यु की उपधारणा (धारा 107 व 108)
  • कुछ विशिष्ट सम्बन्धों के बारे में उपधारणा (धारा 109)
  • स्वामित्व का सबूत (धारा 110)
  • सदभाव का सबूत (धारा 111) व (111-क, संशोधन अधिनियम, 1984)
  • धर्मजत्व की उपधारणा (धारा 112)
  • राज्य क्षेत्र के अध्यपर्ण का सबूत (धारा 113)
  • आत्महत्या के बारे में उपधारणा (धारा 113-क, संशोधन अधिनियम, 1983)
  • दहेज मृत्यु के बारे में उपधारणा (धारा 113-ख, संशोधन अधिनियम, 1986)
  • तथ्य की उपधारणायें (धारा 114)
  • बलात्संग के मामले में उपधारणा (धारा 114-क, संशोधन अधिनियम, 1983)

विबंध का सिद्धांत

 

धारा 115:- तीन सूत्री – आचरण द्वारा विवन्ध

  • जो परस्पर विरोधी बातें करता है उसे नहीं सुना जाना चाहिये,
  • आप गरम एवं ठण्डी सांस एक साथ नहीं ले सकते (शिव श्याम बनाम उ.प्र. राज्य)
  • आप एक ही समय में स्वीकार एवं अस्वीकार दोनों नहीं कर सकते|

 

जब एक व्यक्ति –

  • घोषणा
  • कारी या द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को-
  • लोप

 

  • विश्वास साशय कराया है, या
  • कर लेने दिया है कि कोई बात सत्य है, और
  • ऐसे विश्वास पर कार्य कराया या
  • करने दिया है|

 

तब न तो उसे और न उसके प्रतिनिधि को अपने और ऐसे व्यक्ति के या उसके प्रतिनिधि के बीच किसी-

  • वाद या
  • कार्यवाही में उस बात कि सत्यता का प्रव्याख्यान करने दिया जायेगा|

 

द्रष्टान्त:-

तत्व

  • किसी व्यक्ति द्वारा व्यवदेशन,
  • अन्य व्यक्ति ने उस व्यवदेशन के द्वारा कार्य किया हो,
  • किये गये कार्य से उसे हानि हुयी हो|

 

परीक्षण:-

प्रकार

  • अभिलेख द्वारा विवन्ध,
  • विलेख द्वारा विवन्ध
  • आचरण द्वारा विवन्ध
  • वचनात्मक विवन्ध – एक्सप्रेस न्यूजपेपर प्रा० लि० बनाम UOI 1986 S.C.

 

 

 

अपवाद:-

  • अवयस्क [जब सत्यता दोनों पक्षकारों को ज्ञात हो (मोहरी बीवी बनाम धर्मदास घोष)]
  • विधि के प्रश्न, – जालंधर इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट बनाम सम्पूर्ण सिंह AIR 1999
  • कानून या सम्प्रभु कार्यों

 

वाद:-

  • पिकार्ड बनाम सिपर्स 1837,
  • शरद चन्द डे बनाम गोपाल चन्द लाहा,
  • पलकधारी बनाम कलेक्टर
  • मोतीलाल पदमपत शुगर मिल्स बनाम उ.प्र. राज्य
  • एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स लि० बनाम UOI AIR 1986,
  • श्री कृष्ण बनाम कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी

यूनियन कारबार्ईडिक कं० लि० बनाम UOI, 1992 S.C.

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