Muslim Law

Muslim Law

मुस्लिम लॉ

वैयक्तिक विधि (Personal Law)

मुस्लिम कौन है?

इस्लाम धर्म को मानने वाला व्यक्ति मुस्लिम कहलाता है| अरबी भाषा का शब्द है जिसका अभिप्रात “ईश्वर के प्रतिपूर्ण समपर्ण”|Image 1

  • फैजी आउटलाइंस ऑफ़ मुहम्मद ला. सं. IV Page 12 पर लिखते है मुस्लिम शब्द की व्युत्पत्ति ‘इस्लाम’ शब्द से हुई है जिसका अर्थ है| ऐसा व्यक्ति जो इस्लाम में आस्था रखता हो|
  • जनमत मुस्लिम Muslim by Birth

जन्म के समय दोनों माता पिता मुस्लिम हो

 

हेदापायदि माता अथवा पिता में से किसी एक का भी धर्म इस्लाम रहा हो तब भी उस व्यक्ति को मुस्लिम माना जा सकता है|

 

सपरिवर्तित मुस्लिम

व्यस्क तथा स्वस्थचित्त मस्तिष्क का कोई व्यक्ति अपने मूल (जन्म के) धर्म का परित्याग करके इस्लाम धर्म स्वीकार कर सकता है|

Image 2

Test :- सपरिवर्तन दुर्भावपूर्ण (malafide) नहीं होना चाहिए| दुर्भावपूर्ण धर्मपरिवर्तन विधिपूर्ण नहीं होगा, इस्लाम स्वीकार करने का कारण कुछ सुविधा प्राप्त करना है हो ऐसा सपरिवर्तन अवैध होगा और वह मुस्लिम नहीं माना जायेगा|

 

स्किनर vs. ऑर्ड 1871  

ईसाई विधवा, ईसाई विवाहित पुरुष के साथ सहवास करती थी जो कि सहवास अवैध एवं दंडनीय या इस कारण दोनों इस्लाम धर्म परिवर्तन किया P.C ने इसे अवैध माना क्योंकि धर्मपरिवर्तन सहभावनापूर्ण नहीं था|

सरला मुदगल vs भारत संघ 1995 S.C – हिन्दू पति इस्लाम स्वीकार किया ताकि दूसरा विवाह कर सके न्यायालय ने इसे अवैध माना|

लिली थामस vs भारत संघ 2000 S.C – एक हिन्दू द्वारा प्रथम पत्नी से विवाह विच्छेद किये बिना दूसरी महिला से विवाह करने भाग के ली इस्लाम धर्म में संपरिवर्तन को दुर्भावपूर्ण माना|

 

पैगम्बर मुहम्मद – जन्म 571 ई मक्का में पिता – अब्दुल्ला, माता – अमीजा,

जन्म के समय पिता मर गये थे, तथा 6 वर्ष की आयु मां की मृत्यु, तत्पश्चात इनका पालन पोषण उनके पितामह (दादा) अब्दुल मुत्तालिव), इनके बाद चाचा – अबूतालिब 13 वर्ष की आयु में चाचा का व्यवसाय करते थे|

  • 25 वर्ष की आयु में सम्पन्न विधवा खदिजा के यहाँ नौकरी के बाद में उससे निकाह किया,
  • खदिजा की मृत्यु के पश्चात अन्य महिलाओं से निकाह किया, चौथी पत्नी आएशा बेगम से हुयी जो इनके मित्र तथा अनुयायी अबूबकर की पुत्री थी
  • हिरा नामक गुफा पहाड़ी में ध्यान लगाते थे|
  • 609 ई में रमजान के महीने में जिब्राइल नामक फ़रिश्ते ने अल्लाह के संदेश भेजे [कुरान सुरा 96, आपत 1-5]
  • यही संदेहवाद में * कर लिया| जो कुरान या अलफुरकान कहा गया|
  • मक्का में विरोध शुरू हो गया जो बादशाह (उनके चचा) ने देश निकाला कर दिया 622 ई में मदीना चले गये यही धार्मिक यात्रा हिजरत कहा गया, मुस्लिम कलेंडर हिजरी संवत पर आधारित है|

मुस्लिम विधि की विचार धाराए Schools of Muslim Law

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  • सुन्ना/अहदिस Traditions of the Prophet

पैगम्बर मुहम्मद की परम्पराओं को सुन्ना अथवा अहादिस कहा जाता है| मुहम्मद साहब के अपने कथन जो उनके स्वयं के शब्दों में थे, सुन्ना कहलाते है|

 

सुन्ना किससे निर्मित है (What Constituted Sunna?)

मु. साहब ने जो कुछ कहा, किया अथवा किसी प्रश्न के उत्तर में उसका मौन सब पैगम्बर की परम्परा के अंतर्गत आते हैं|

सुन्ना में पैगम्बर की निम्नलिखित परम्पराएं निहित है –

  • सुन्नत-उल-कौल-स्वयं के शब्दों में कथन (अर्थात उनके उपदेश)
  • सुन्नत-उल-कैल-मु. साहब के व्यवहार अथवा कार्य-कलाप
  • सुन्नत-उल-तकरीर-पैगम्बर का मौन समर्थन

 

 

 

सुन्ना का वर्गीकरण classification of Traditions – उसकी प्रमाणिकता तथा महत्त्व के

  • अहादिरा-ए-मुतवातिर (Universal Tradition)- मुस्लिम दुनिया में कही गयी इन्हें मानेगा
  • अहादिस-ए-मशहूर – Popular-Tradition-बहुमत द्वारा मान्यता प्राप्त है|
  • अहादिस-ए-अहद – अल्पसंख्यक वर्गों द्वारा समर्थन प्राप्त है|

 

इज्मा:- विधिवेत्ताओं के मतैक्य निर्णय द्वारा नया क़ानून प्राप्त कर लिया जाता है| किसी समस्या का निराकरण यदि कुरान नया सुन्ना में नहीं है तब इज्मा का प्रयोग किया जाता है|

इज्मा का सृजन:- विधिशास्त्री (मुजतहिद) की योग्यता –

  • उन्हें मुस्लिम होना चाहिए
  • उन्हें (फिकह) अथवा क़ानून का ज्ञान होना चाहिए
  • उनमें स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए

 

इज्मा का वर्गीकरण Classification of Ijma          

  • सहयोगियों का इज्मा – मुहम्मद के निकटतम सबसे उत्तम कोटि के विधिवेता मानेगी|
  • विधि शास्त्रियों का इज्मा – जो पैगम्बर के सहयोगी नहीं
  • जनसाधारण का इज्मा – मुस्लिम जनता का इज्मा

 

इज्मा का महत्व – दिन प्रति दिन बदलते समाज की नयी परिस्थितियों के सन्दर्भ में कुरान तथा सुन्ना मेने निहित क़ानून के निर्णय अपूर्ण एवं असक्षम पाये जाते है|

फैजी – कुरान तथा सुन्ना अतीत का बोध कराते है जब कि इज्मा तथा कपास इस्लामी विधिशास्त्र के भविष्य की चर्चा करने वाले है|

जोसेफ साख्त – इज्मा को जीवित सुन्ना की संज्ञा दी है|

कयास अर्थ ‘माप’ एक प्रतिमान से किसी दूसरी वस्तु की ‘समानता का माप करना’ कुरान, हदीस और इज्मा से सदृश्यता और तर्क के आधार पर नियम निकालना कयास कहलाता है|

कयास का वर्गीकरण

इस्तिहसान

इस्तिरलाह-

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शिया – विधि के प्राथमिक स्रोत 

  • कुरान
  • सुन्ना (केवल ऐसे सुन्ना जिसके वाचक पैगम्बर के कुटुंब के थे)
  • इज्मा (जिसकी पुष्टि किसी इमाम ने की हो)
  • अकल (reason)

 

कुरान :- अरबी भाषा ‘कुर्रा’ से हुयी – शाब्दिक अर्थ ‘पढ़ना’ अथवा ‘जो पढ़ा जाना चाहिये’| 609 में प्रथम संदेश प्राप्त हुए 632 तक प्राप्त होते रहे|

कुरान के प्रमुख लक्षण

  • दैवी उत्पत्ति – प्रत्येक शब्द सर्वशक्तिमान ईश्वर की देन है| इस कारण प्रत्येक शब्द अपरिवर्तनीय आपत्ति रहित या अप्रतिशोधनीय है|
  • प्रथम स्रोत – काल गवना के अनुसार मुस्लिम विधि का प्रथम स्रोत है
  • संरचना :- रचना ‘पद्ध’ में है| प्रत्येक छन्द (verpe) आयत कहलाता है

6237 आयते, 114 अध्याय, प्रत्येक अध्याय ‘सुरा’ कहते है| प्रत्येक अध्याय का नामकरण कर दिया गया है जैसे प्रथम सुरा (अध्याय) ‘सुरात-उल-फतीहा’ जो कुरान प्रस्तावना माना गया है|

 

धर्म, कानून तथा नैतिक नियमों का सम्मिश्रण –

200 आयते ही विधि से सम्बद्ध है और इसमें 80 आयते पारिवारिक विधि, तलाक, विवाह, मेहर, विरासत आदि से है|

विधिक नियमों के विभिन्न रूप – 

कुछ आयतें आपत्तिजनक और बुरी प्रयाओं जैसे बहु विवाह, जुआ, ऊंचे दर पर ब्याज वसूलना तथा नवजात कन्याओं की हत्या आदि को समाप्त करने के लिए है|

अपरिवर्तनशीलता संक्षिप्ता व्याख्या – कुरान पूर्ण संहिता नहीं है अधिकार आयतें धर्म, दर्शन आदि कुरान का मौन|

 

बहुविकल्पीय प्रश्न

  1. मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एक्ट, 1937 की धारा 2 में वैयक्तिक मामले माने गये हैं-

A. निर्वसीयत उत्तराधिकार (विरासत)

B. विवाह

C. दान

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. सुन्नी सम्प्रदाय की मुस्लिम विधि में उपसम्प्रदाय है-

A. हनफी

B. मलिकी

C. शफी व हनबली

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. शिया सम्प्रदाय के उपसम्प्रदाय है-

A. अथना-अशरिया

B. इस्माइलिया

C. जैदिया

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. मुस्लिम विधि के प्राथमिक स्रोत है-

A. कुरान

B. सुन्ना अथवा अहदिस

C. इज्मा एवं कयास

D. कयास

E. उपर्युक्त सभी

 

 

  1. मोहम्मद साहब के मरने के बाद सारे दैवी संदेश एकत्र किया गया तथा इनका संकलन करके व्यवस्थित पुस्तक का रूप दिया गया जो कहललाता है-

A. कुरान

B. इज्मा

C. कयास

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. कुरान पद्द में है जिनमें ईश्वरीय शब्दों का संकलन है इसमें कुल कितनी आयतें हैं-

A. 6238

B. 6237

C. 6239

D. 6240

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वैयक्तिक विधि (Personal Law)

मुस्लिम विधि के शिया सम्प्रदाय तथा सुन्नी सम्प्रदाय की प्रमुख भिन्नताओं का वर्णन निम्नलिखित है|

  1. विवाह

शिया शाखा                                      सुन्नी शाखा

  • शिया विधि में मुता विवाह वैध है|        (1) सुन्नी विधि में मुता विवाह वैध नहीं
  • शिया विधि में सिर्फ मान्य एवं शून्य दो    (2) सुन्नी विधि में मान्य, एवं शून्य एवं अनियमित विवाह

दो प्रकार के विवाहों को मान्यता प्राप्त है|         को भी मान्यता प्राप्त है|

  • शिया विधि में निकाह की वैधता के लिए     (3) सुन्नी विधि में विवाह की वैधता के लिए दो पुरुष गवाह

गवाहों की आवश्यकता नहीं है|                  या 1 पुरुष तथा दो स्त्री गवाह की मौजूदगी आवश्यक है|

  • शिया विधि में गैर-मुस्लिम स्त्री से सिर्फ    (4) सुन्नी विधि में गैर इस्लामी औरत जो किताबिक (ईसाई

मुता विवाह होना सम्भव है|                     या यहूदी) है से विवाह वैध है|

  • शिया विधि में जब हज के वस्त्र पतन लिए (5) सुन्नी सम्प्रदाय में हज के दौरान किया गया विवाह वैध

गये तो विवाह निषिद्ध माना जाता है|              है|

  • शिया शाखा में ऐसी दो स्त्रियों को पत्नी     (6) सुन्नी विधि में चाची तथा भतीजी दोनों एक|

बनाया जा सकता है जो चाची और भतीजी

हो|

 

 

  1. मेहर

    शिया शाखा                                      सुन्नी शाखा

  • शिया विधि में मेहर की न्यूनतम सीमा निर्धारित (1) सुन्नी विधि में न्यूनतम मेहर 10 दिरहम है, परन्तु

यही है परन्तु अधिकतम सीमा 500 दरहम         अधिकतम मेहर की सीमा निर्धारित नहीं है|

अरबी मुद्रा निर्धारित है|

  • शिया विधि में मेहर की सम्पूर्ण राशि तुरंत देय (2) सुन्नी में मेहर का कुछ भाग तुरंत देय होता है तथा कुछ

मानी जाती है|                                भाग स्थगित मेहर के रूप में होता है कितना अंश तुरंत

देय है तथा कितना स्थगित यह रीती रिवाज के आधार

पर निर्धारित होता है|

  • शिया में पक्षकारों द्वारा यह करार कि मेहर देय (3) सुन्नी में यह करार कि कोई मेहर देय नहीं होगी, शून्य

नहीं होगी व्यस्क तथा स्वस्थचित पत्नी द्वारा      होता है|

किया जा सकता है|

  • शिया में मेहर की विषय-वस्तु का करार के अद्ध (4) सुन्नी में मेहर की विषय-वस्तु का विवाह या करार के अस्तित्व में होना आवश्यक नहीं है|                     समय अस्तित्व में होना आवश्यक है
  1. तलाक

शिया शाखा                                      सुन्नी शाखा

  • शिया में तलाक मौखिक घोषणा द्वारा मान्य (1) सुन्नी में तलाक की घोषणा लिखित या मौखिक

होता है किन्तु पति बोलने में असमर्थ है तो         मान्य है|

लिखित माना जाएगा अन्यथा लिखित तलाक

शून्य है|

  • शिया में नशे या हंसी मजाक में दिया गया (2) सुन्नी में नशे की हालात, हसी मजाक तथा पिता    तलाक शून्य होता है|                           को खुश होने के लिए दिया गया तलाक मान्य एवं

प्रभावी होता है|

 

  1. दान (हिबा)

शिया शाखा                                                                                      सुन्नी शाखा

  • शिया में आजीवन हित का दान किया जा (1) सुन्नी में आजीवन हक़ का दान नहीं हो सकता यदि होता सकता है|                                   है तो दान ग्रहीता उस सम्पत्ति में पूर्ण-स्वामित्व प्रदान

करता है|

  • शिया में सम्पत्ति के अविभाजित भाग का दान (2) जिस सम्पत्ति का विभाजन सम्भव नहीं है उसका

मान्य है, चाहे सम्पत्ति विभाजन योग्य हो या      अविभाज्य दान मान्य है परन्तु जिस सम्पत्ति का

नहीं|                                     विभाजन सम्भव है उस सम्पत्ति का अविभाज्य भाग का

दान अनियमित होता है|

 

  1. वसीयत

शिया शाखा                                      सुन्नी शाखा

  • शिया में उत्तराधिकारी के पक्ष में की गई (1) सुन्नी में किसी उत्तराधिकारी के पक्ष में की गयी वसीयत

वसीयत उत्तराधिकारियों की सहमति के बिना      मान्य नहीं है| जब तक कि अन्य उत्तराधिकारीगण

भी मान्य है, बशर्ते कि सम्पूर्ण सम्पदा के 1/3     वसीयतकर्ता के मरणोपरांत अपनी सहमति न दे दे|

से अधिक सम्पत्ति वसीयत के रूप में न दी

गई हो|

  • शिया के अंतर्गत वसीयतकर्ता के जीवन काल (2) सुन्नी में किसी अजनबी के पक्ष में की गयी वसीयत यदि

में भी उत्तराधिकारी अपनी सहमति दे सकते       सम्पत्ति के 1/3 भाग से अधिक है तो तब तक मान्य यदि ऐसा है तो उत्तराधिकारियों की उस के        नहीं है; जब तक कि वसीयतकर्ता के मरणोपरांत पुष्टिकरण की आवश्यकता नहीं है तथा           उत्तराधिकारीगण उसके लिए अपनी सहमति न दे दे|    1/3 से अधिक की, की गई वसीयत मान्य

होगी|

 

  1. उत्तराधिकार

शिया शाखा                                      सुन्नी शाखा

  • शिया में ज्येष्ठ उत्तराधिकार का नियम सिर्फ (1) सुन्नी में ज्येष्ठ पुत्रधिकार का नियम लागू नहीं होता|

मृतक के वस्त्र, घोड़ा, अंगूठी, तलवार तथा

कुरान के सम्बन्ध में ही लागू होता है|

  • शिया में प्रथम तथा दोनों वर्गों के उत्तराधिकारी (2) सुन्नी में प्रथम वर्ग के उत्तराधिकारी दुसरे वर्ग को तथा

साथ साथ उत्तराधिकारी ग्रहण करते हैं|           दूसरे वर्ग के उत्तराधिकारी तीसरे वर्ग को अपवर्जित या

बहिष्कृत करते हैं|

  • शिया के अंतर्गत प्रतिनिधित्व का सिद्धांत अंशत: (3) सुन्नी में प्रतिनिधित्व का सिद्धांत लागू नहीं होता|

लागू होता है|

  • शिया के अंतर्गत सन्तान-विहीन विधवा अपने (4) सुन्नी में सन्तान-विहीन विधवा अपने पति की सम्पत्ति

पति की सम्पत्ति में उत्तराधिकार प्राप्त नहीं       में उत्तराधिकार प्राप्त कर सकती है|

कर सकती|

  • शिया में कोई व्यक्ति मृतक की सम्पत्ति में (5) सुन्नी में यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति की हत्या

उत्तराधिकार से तभी वंचित किया जा सकता है     जानबूझकर या अनजाने में कर देता है तो वह मृतक की

जब अपने हत्या जानबूझकर की हो|               सम्पत्ति में उत्तराधिकार प्राप्त नहीं कर सकता|

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विवाह

  • हेदाया के अनुसार – विवाह एक विधिक प्रक्रिया है जो पति-पत्नी के समागम और पुत्र के औरसीकरण को विधिमान्य बनाते हैं|
  • बेली के अनुसार – विवाह पति-पत्नी के समागम को वैध बनाने एवं संतानोत्पत्ति के लिए किया गया संविदा है|
  • सबरून्निशा के मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मित्तल ने कहा कि – “मुस्लिम विधि में विवाह विक्रिय संविदा के समान सिविल संविदा है जिस प्रकार विक्रय की संविदा में कीमत के बदले वस्तु का अंतरण किया जाता है उसी प्रकार विवाह में पत्नी, सम्पत्ति होती है उसको दिया जाने वाला मेहर कीमत|
  • विवाह की प्रकृति-अब्दुल कादिर बनाम सलीमा (1986) 8 इलाहाबाद 449 (पूर्ण पीठ) न्यायमूर्ति महमूद के वाद में विवाह को संविदा माना गया है तथा इसमें अधिकार व दायित्व तुरंत उद्भूत हो जाते हैं|
  • अनीस बेगम बनाम मुहम्मद इस्तिफा बेगम (1933) के मामले में न्यायमूर्ति शाह सुलेमान ने कहा कि – विवाह संविदा होने के साथ-साथ श्रद्धात्मक कार्य भी है|
  • विवाह के आवश्यक तत्व – मुस्लिम विधि में विवाह के आवश्यक तत्व निम्नांकित हैं –
  1. प्रस्ताव एवं स्वीकृति एक बैठक          3. सक्षक पक्षकार हो,
  2. निषिद्ध सम्बन्धी न हो 5. साक्षियों की उपस्थिति

 

  1. प्रस्ताव एंव स्वीकृति – विवाह के लिए प्रस्ताव (इजब) एवं स्वीकृति (कबूल) होना चाहिए| पति द्वारा प्रस्ताव किया जाना चाहिए एवं पत्नी द्वारा स्वीकृति दी जानी चाहिए|
  • ऐसी, स्वीकृति स्वतंत्र सहमति से दी जानी चाहिए, यहाँ स्वतंत्र सम्पत्ति से तात्पर्य भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 14 में यथा परिभाषित सम्पत्ति से है अर्थात वह प्रपीडन (धारा 15), असम्यक असर (धारा 16), कपट (धारा 17,) मिथ्या व्यपदेशन (धारा 18), भूल (धारा 20, 21, 22) से न प्राप्त की गई हो|
  • सम्पत्ति चुप रहने, मौन रहने एवं मुस्काने से भी मान ली जाती है तो प्रस्ताव (इजब) द्वारा प्रयुक्त शब्द स्पष्ट हो एवं विवाह सम्बन्ध स्थापित करने के आशय से हो|

 

 

  1. एक बैठक – प्रस्ताव एवं स्वीकृति एक ही बैठक में होनी चाहिए|
  • यदि प्रस्ताव एक बैठक में किया जाता है तथा स्वीकृति दूसरी बैठक दी जाती है, तो विवाह मान्य नहीं होगा|
  • पत्र-व्यवहार द्वारा विवाह मान्य नहीं होगा|

साक्षियों की उपस्थिति – विवाह के समय कम से कम दो साक्षियों उपस्थिति जरुरी है, अर्थात दो पुरुष साक्षी हों| साक्षी महिला भी हो सकती है|

  • साक्षी के लिए दो महिला और एक पुरुष विवाह के समय साक्षी के रूप में रहते हैं तभी विवाह माना जाएगा|
  • यदि दो से अधिक महिला है तथा उनके साथ एक पुरुष साक्षी नहीं है तो विवाह अनियमित हो|
  • यहाँ यह उल्लेखनीय है कि विधि में सुन्नी विधि की तरह विवाह के समय साक्षियों की उपस्थिति आवश्यक नहीं होती अपितु विवाह-विच्छेद के समय गवाहों की आवश्यक होती है|

 

  1. सक्षम पक्षकार हो – विवाह समय पक्षकार सक्षम हो, अर्थात व्यस्क हो तथा स्वस्थचित्त हो|
  • यहाँ वयस्कता से तात्पर्य भारतीय वयस्कता अधिनियम 1875 में विहित 18 वर्ष से नहीं है|
  • मुस्लिम विधि में विवाह के समय में वयस्कता की उम्र 15 वर्ष निर्धारित है|
  • अभिकर्ताओं की उपस्थिति में भी विवाह सम्पन्न किया जा सकता है यथा यदि पुरुष अवयस्क है या विकृतचित्त है तो उसका विवाह-अभिकर्ता स्वरूप विवाह के संरक्षक के माध्यम से होगा|
  • विवाह के सन्दर्भ में संरक्षक पिता पितामह भाई, माता, मामा, मामी एवं सरकार होगी|

 

  1. निषिद्ध सम्बन्धी न हो – विवाह सम्बन्धी, रक्त सम्बन्धी, धात्रेय सम्बन्धी विवाह के पक्षकार न हों|
  • विवाह सम्बन्धी पूर्ण प्रतिषेध – कोई व्यक्ति निम्न से विवाह नहीं करेगा –
  • पत्नी की माता एवं दादी से विवाह
  • अपने पिता या पितामह की पत्नी से,
  • अपनी पुत्र, पौत्र की पत्नी से, पत्नी की पुत्री या प्रपौत्री से विवाह,
  • रक्त सम्बन्ध –
  • कोई व्यक्ति अपनी माता या दादी से विवाह नहीं करेगा,
  • अपनी पुत्री या पौत्री से विवाह नहीं करेगा
  • अपनी भतीजी से विवाह नहीं करेगा
  • अपनी मौसी, परमौसी, बुआ एवं परबुआ से विवाह नहीं करेगा
  • अपनी बहन से विवाह सगी, सहोदरा एवं एकोदर नहीं करेगा
  • धात्रेय सम्बन्ध – विवाह के पक्षकार धात्रेय सम्बन्धी न हो
  • जिस औरत ने 2 वर्ष की अवस्था से कम उम्र में दूध किसी बच्चे को पिलायी हों तथा उसने उस बच्चे को जन्म न दी हो तो वह धाय माँ कहलायेगी|
  • बहुपति सम्बन्धी निषेध –
  • कोई विवाहित महिला, यदि उसका पति जीवित हो तो दूसरा विवाह नहीं कर सकती है|

निम्न दशाओं में विवाह अनियमित होता है –

  1. इद्दत पालन के दौरान विवाह करने पर,
  2. पांचवी शादी करने पर,
  3. साक्षियों की अनुपस्थिति में शादी करने पर,
  4. अवैध संयोगी की दशा में, कोई पुरुष एक ही समय में ऐसी दो पत्नियों से शादी नहीं कर सकता यदि उनमें से एक पुरुष हो तो उनके बीच विवाह अविध होता|
  • धर्म में भिन्नता – मुल्सिम स्त्री हिन्दू पुरुष से विवाह नहीं कर सकती किन्तु वह विवाह मान्य हो सकता है जब वह हिन्दू पुरुष मुस्लिम धर्म ग्रहण कर ले|
  • मुसलमान पुरुष गैर मुस्लिम स्त्री यदि वह किताबिया ईसाई या यहूदी है तो विवाह कर सकता है किन्तु मूर्तिपूजक (हिन्दू) या अग्निपूजक (पारसी) से नहीं|
  • ऐसी महिलाएं किताबियाँ कहलाती है जो ऐसे घर्म में निष्ठा रखती है जिसमें दैवीग्रस्थ (किताब) मान्य हो|
  • मुस्लिम पुरुष द्वारा गैर मुस्लिम एवं गैरकितबिया स्त्री से विवाह जहाँ शून्य एवं अविधिमान्य न होकर अनियमित (फासिद) विवाह होता है, वही मुस्लिम महिला (शिया या सुन्नी) का किताबियाँ या अन्य गैर-मुस्लिम से विवाह शून्य (void) होगा|

 

मुता विवाह     

  • मुता विवाह शिया विधि की अथना अशरिया शाखा में प्रचलित है|
  • यह अस्थाई विवाह है|
  • मुता का शाब्दिक अर्थ है उपयोग एवं उपभोग|
  • हेफनिंग के अनुसार कानूनी सन्दर्भ में इसको आनन्द के लिए विवाह कहा जा सकता है|
  • भारत में यह बहुत कम प्रचलित है तथा कुलीन परिवार के मुस्लिम वर्ग इसे पसंद नहीं करते हैं|
  • परशिया एवं इराक में इसे वैध वैश्यावृत्ति का दर्जा मिल चुका है|
  • इसके मुख्य तत्व अवधि का निर्धारण है अर्थात यह एक दिन एक, मॉस या एक वर्ष आदि के लिए विवाह हो सकता है|

 

 

 

मुता विवाह के आवश्यक तत्व –

  1. इससे अवधि निश्चित होनी चाहिए,
  2. इसमें मेहर निश्चित होनी चाहिए – यदि विवाह पूर्णावस्था को नहीं प्राप्त हुआ है तो आधी मेहर की हकदार पत्नी होगी, यदि पूर्णावस्था को प्राप्त हो चुका है तो पूरी मेहर की|
  3. इसमें पति एवं पत्नी के मध्य पारस्परिक उत्तराधिकार का उदय नहीं होता है किन्तु स्पष्ट संविदा होने पर सम्भव होगा|
  4. इसमें विवाह के सन्तान वैध होंगे तथा अपने पिता व माता से उत्तराधिकार में सम्पत्ति पाने के हकदार होते हैं|
  5. इस विवाह में तलाक मान्य नहीं है किन्तु पति शेष अवधि का दान कर सकता है जिसे हिबा-ए-मुद्दत कहते हैं|
  6. विवाह की समाप्ति निम्न तरीके से हो सकती है –
  • पारस्परिक सहमति से, या
  • समय पूरा होने पर,
  • किसी पक्षकार के मरने पर
  1. पति निर्वाह धन देने के लिए उत्तरदायी नहीं होता,
  2. पति पृथक निवास की व्यवस्था करने के लिए दायी नहीं होता|
  3. मुता ढंग से विवाहित पत्नियों की संख्या की कोई सीमा नहीं है|
  4. पति के मरने की दशा में ‘इद्दत पालन अगर्भवती की दशा में 4 महीने 10 दिन तक तथा गर्भवती की दशा में बच्चे के जन्म तक जरूरी होता है एवं पति के न मरने की दशा में महिला को इद्दत पालन दो मासिक धर्म तथा मासिक धर्म न होने की दशा में 45 दिन तक करना पड़ता है|

 

इद्दत

  • अमीर अली के अनुसार – विवाह विच्छेद के बाद तथा पुर्नविवाह के पूर्व की यह अवधि अवकाश की अवधि हुआ करती है, इसका पालन करना जरूरी होता है|
  • जस्टिस महमूद के अनुसार – इद्दत पालन प्रतीक्षा की अवधि है|
  • पति मृत्यु की दशा में इद्दत पालन 1. 4 माह 10 दिन (गर्भवती की दशा में) या 2 गर्भवती है तो प्रसव होने तक तथा 4 माह 10 दिन के पूर्व जन्मजाय तो 4 माह 10 दिन की अवधि पूरी करनी होगी|
  • तलाक की दशा में इद्दतलन- तीन रजो धर्म या 2. 3 चंद्रमास (रजोधर्म न होने दशा में)
  • अनियमित विवाह की दशा इद्दत पालन- तीन रजोधर्म या 2. तीन चंद्रमास

मुता विवाह में इद्दत पालन – मृत्यु की दशा में 4 माह 10 दिन 2. 2 रजो धर्म (रजो धर्म की दशा)

  1. 45 दिन (रजो धर्म के अभाव में)

 

इद्दत पालन के दौरान पति व पत्नी के कर्तव्य-

  1. इद्दत पालन के दौरान पत्नी निर्वाहधन पति से पाने की अधिकारिणी होगी|
  2. इद्दत पालन के दौरान पत्नी विवाह नहीं करेगी, इसी प्रकार पुरुष भी यदि तलाक शुदा पत्नी को मिलाकर चार पत्नियाँ हैं तो शादी नहीं कर सकेगा,
  3. अवैध संयोग का नियम लागू रहेगा,
  4. मेहर मुअज्जल मेहर तुरंत देय हो जाता है|
  5. पत्नी सादा जीवन बितायेगी अर्थात शौक का परित्याग कर देगी|

 

इद्दत पालन अवधि कब से शुरू होगी-

  1. पति की मृत्यु होने की तिथि से, या
  2. पति के तलाक देने की तिथि से,

 

  • पति के मरने की सूचना मिलने से एवं तलाक देने की तिथि के बारे में सूचना देने की तिथि से इद्दत पालन की अवधि शुरू नहीं होती है| यदि उपर्युक्त सूचना इद्दत पालन की अवधि बीत जाने के बाद मिलती है तो इद्दत पालन जरूरी होता है|

 

ख्याल-उल-बुलूग

  • यदि किसी अवयस्क (लड़के या लड़की) का विवाह पिता एवं पितामह से भिन्न किसी विवाह के संरक्षक द्वारा किया जाता है तो विवाह, अवयस्क जिसका इस तरह से विवाह किया जाता है, व्यस्क होने के बाद वह विवाह को स्वीकृत या अस्वीकृत कर सकता है|
  • यहाँ विवाह के सन्दर्भ में वयस्कता की अवधि 15 वर्ष है तथा भारतीय वयस्कता अधिनियम 1875 की धारा 3 में विहित वयस्कता की अवधि 18 वर्ष (लड़की) एवं 21 वर्ष (लड़का) सम्बन्धी नियम लागू नहीं होती है|
  • यदि अवयस्क का 15 वर्ष से पहले विवाह हो गया है, तो 15 वर्ष पूरा करने के बाद यदि वह चाहे तो संरक्षक द्वारा कराए गये विवाह को पुष्टि या अस्वीकृत कर सकता है किन्तु उसे अपने इस विकल्प का प्रयोग 15 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद तथा 18 वर्ष की उम्र पूरी करने से पूर्व करना पड़ेगा|
  • पीर मोहम्मद ब. म.प्र., A.I.R. 1960 के मामले में कहा गया कि यदि अवयस्क विवाह को निराकृत कर देता है तो वैवाहिक सम्बन्ध तब तक शून्य नहीं माना जाएगा, जब तक न्यायालय की पुष्टि न ले ली जाय न्यायालय द्वारा इस सम्बन्ध में डिक्री देना जरूरी नहीं है केवल औपचारिक पुष्टि ही पर्याप्त है|
  • मनुष्य के जीवन को निम्नलिखित तीन अवस्थाओं में बांटा जा सकता है-
  • सगीर – 7 वर्ष से पूर्व विवाह आरम्भत: शून्य होगा, भले ही विवाह संरक्षक द्वारा किया जाए|
  • शरीरी – 7 वर्ष से अधिक उम्र की दशा में 15 वर्ष से पूर्व की दशा में संरक्षक द्वारा विवाह करने पर,
  • बुलूग – 15 वर्ष से अधिक होने पर एवं 18 वर्ष से पूर्व अवयस्क (पति/पत्नी) अपने विकल्प का प्रयोग कर सकता है अर्थात चाहे तो विवाह स्वीकार करे या अस्वीकार|
  • जहाँ इस विकल्प के प्रयोग के अधिकार का उद्भव सरीरी में होता है वहीं इसका प्रयोग बुलूग में किया जाता है|
  • यधपि हिन्दू विधि एवं मुस्लिम विधि दोनों में वयस्कता के विकल्प (ख्याल-उल-बुलूग) सम्बन्धी प्रावधान किया गया है किन्तु मुस्लिम विधि इस दृष्टि से इस सन्दर्भ में हिन्दू विधि से आगे है|
  • हिन्दू विधि में जहाँ केवल लड़की को ही यह अधिकार दिया गया है (हिन्दू विवाह विधि संशोधन अधिनियम, 1976 की धारा 13(2) दो का खंड 4) वही मुस्ल्लिम विधि में लड़की एवं लड़का दोनों को वयस्कता के विकल्प का अधिकार प्राप्त है|
  • पिता एवं पितामह द्वारा अवयस्क का विवाह करने की दशा में – पिता एवं पितामह द्वारा संविदाकृत विवाह निम्न दशाओं में अस्वीकृत हो सकेगा –
  1. घोर उपेक्षा की दशा में,
  2. विवाह से अवयस्क के स्वास्थ पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की दशा में,

 

  • उपर्युक्त आधारों (पिता एवं पितामह) को छोड़कर अन्य संरक्षकों द्वारा अवयस्क का विवाह करने पर अवयस्क बिना किसी कारण के विवाह का अस्वीकार या अनुसमर्थन कर सकता है|
  • मुस्लिम विधि में लडकों के सन्दर्भ में पुरानी विधि अब भी लागू है किन्तु लड़कियों के सन्दर्भ में मुस्लिम विवाह विधि संशोधन अधिनियम 1939 की धारा 2(7) के द्वारा कुछ नये प्रावधान कर दिए गये है तथा पूर्व की स्थिति समाप्त कर दी गयी है| जो इस प्रकार हैं-
  1. प्राचीन विधि में यह व्यवस्था थी कि ज्यों ही लड़की 15 वर्ष की उम्र पूरा करे एवं ज्यों ही उसे विकल्प के बारे जानकारी मिले त्यों ही उसे विकल्प का प्रयोग करना चाहिए, किन्तु अब ऐसा नहीं है अब वह 18 वर्ष से पहले कभी भी इसका प्रयोग कर सकती है बशर्ते 15 वर्ष की अवधि पूरी कर ले|
  2. पिता व पितामह द्वारा किये गये विवाह को किसी भी आधार पर स्वेच्छा से निराकृत कर सकती है अर्थात घोर उपेक्षा व शरारत को साबित करने की कोई आवश्यकता नहीं है|
  3. इस विकल्प के प्रयोग द्वारा विवाह के निराकृत कर देने के बावजूद विवाह तब तक मान्य रहेगा जब तक इस सन्दर्भ में न्यायलय से औपचारिक पुष्टि न प्राप्त कर ली जाए|
  4. इस संशोधन अधिनियम के उपर्युक्त प्रावधान केवल लड़कियों के सन्दर्भ में लागू होते हैं|

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बहुविकल्पीय प्रश्न

  1. मुस्लिम-विधि में एक मुस्लिम पुरुष एक साथ अधिक-से-अधिक कितनी स्त्रियों से विवाह कर सकता है–

A. 5

B. 6

C. 4

D. 1

 

  1. मुस्लिम विधि में विवाह की निम्न परिभाषा किसने दी है- मुस्लिमों में विवाह शुद्ध रूप से एक संविदा है; यह कोई संस्कार नहीं है-

A. न्यायमूर्ति अमीर अली

B. न्यायमूर्ति महमूद

C. न्यायमूर्ति मित्तर

D. उपर्युक्त में से कोई नहीं

 

  1. मुस्लिम विधि संस्कार है या संविदा-

A. संस्कार

B. संविदा

C. न तो संस्कार और न ही संविदा

D. संस्कार एवं संविदा दोनों

 

  1. किस न्यायमूर्ति ने अनीस बेगम ब. मुहम्मद इस्तफा, 1935 के मामले में यह कहा कि मुस्लिम विवाह एक सिविल संविदा और धार्मिक संस्कार दोनों है-

A. न्यायमूर्ति शाह सुलेमान

B. न्यायमूर्ति अमीर अली

C. न्यायमूर्ति महमूद

D. न्यायमूर्ति सुब्बाराव

 

  1. मुस्लिम विधि में विवाह के आवश्यक तत्व है-

A. प्रस्ताव

B. स्वीकृति

C. सक्षम पक्षकार

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. विवाह के लिए प्रस्ताव एक बैठक में किया जाए तथा स्वीकृति दूसरी बैठक में दी जाए तो विवाह होगा-

A. मान्य विवाह

B. अमान्य विवाह

C. अनियमित विवाह

D. उपर्युक्त में से कोई नहीं

 

  1. सुन्नी विधि में विवाह के समय कितने साक्षियों की उपस्थिति आवश्यक है-

A. दो पुरुष साक्षियों

B. एक पुरुष साक्षी तथा दो स्त्री साक्षी

C. एक पुरुष साक्षी तथा दो या दो से अधिक स्त्री साक्षी

D. उपर्युक्त सभी सत्य है

 

  1. साक्षियों की अनुपस्थिति में सम्पन्न विवाह होगा-

A. शून्य

B. शून्यकरणीय

C. अनियमित

D. उपर्युक्त में से कोई नहीं

 

  1. मुस्लिम विधि की किस शाखा में विवाह के समय नहीं अपितु तलाक के समय साक्षियों को उपस्थिति आवश्यक होती है-

A. सुन्नी विधि

B. शिया विधि

C. न तो शिया विधि और न तो सुन्नी विधि

D. उपर्युक्त में से कोई नहीं

 

 

 

 

  1. मुस्लिम विधि में अवयस्क एवं पागल के विवाह में संरक्षक कौन हो सकते हैं-

A. पिता

B. पितामह

C. भाई

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. मुस्लिम विधि में विवाह पर पूर्ण प्रतिषेध माना जाता है-

A. रक्त सम्बन्धी

B. विवाह सम्बन्धी

C. धात्रेय सम्बन्धी

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. किन दशाओं में विवाह अनियमित माना जाएगा-

A. 4 पत्नियों से अधिक शादी करने पर

B. उचित साक्षियों की अनुपस्थिति में विवाह करने पर

C. धर्म में भिन्नता होने पर

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. एक मुस्लिम पुरुष गैर मुस्लिम स्त्री यदि वह किताबिया है तो उससे शादी कर सकता है किन्तु इनमें से किससे नहीं कर सकता-

A. मूर्ति पूजक

B. अग्निपूजक

C. मूर्ति पूजक और अग्नि पूजक

C. उपर्युक्त सभी से

 

  1. मुस्लिम महिला (शिया या सुन्नी) का किताबिया या अन्य गैर-मुस्लिम पुरुष से विवाह होगा-

A. शून्य

B. वैध

C. अनियमित

D. शून्यकरणीय

 

  1. मुता विवाह मुस्लिम विधि में किस मुस्लिम धर्म की किस शाखा में मान्य है-

A. सुन्नी विधि

B. शिया विधि

C. न तो सुन्नी विधि और न ही शिया विधि

D. सुन्नी एवं शिया विधि दोनों

 

  1. मुता विवाह के बारे में क्या सत्य है-

A. यह अस्थायी विवाह है

B. अवधि का निर्धारण आवश्यक लक्षण है

C. मेहर की धनराशि निश्चित होता है

D. उपर्युक्त सभी सत्य है

 

  1. मुता विवाह के बारे में क्या सत्य है-

A. 4 पत्नी रखने की सीमा नहीं लागू

B. पक्षकारों के बीच पारपरिक उत्तराधिकार का उद्भव नहीं होता

C. तलाक मान्य नहीं किन्तु पति शेष अवधि का दान कर सकता है

D. उपर्युक्त सभी कथन सत्य है

 

  1. मुता विवाह के बारे में क्या सत्य है?

A. पत्नी निर्वाह वृत्ति पति से पाने की हकदार नहीं

B. विवाह को अवधि कि न्यूनतम सीमा नियत नहीं

C. मुता विवाह की सन्तान वैध तथा पिता व माँ दोनों से उत्तराधिकार में सम्पत्ति प्राप्त करेंगे

D. उपर्युक्त सभी कथन सत्य हैं

 

  1. मुता विवाह का स्वत: विवाह विच्छेद हो जायेगा-

A. नियत अवधि की समाप्ति पर

B. पारस्परिक सम्मति से

C. पति-पत्नी में से किसी की मृत्यु पर

D. उपर्युक्त सभी कथन सत्य है

 

  1. किसने कहा है कि इद्दत एक ऐसी अवधि है जिसमें पहले विवाह का विच्छेद हो जाने के बाद कोई स्त्री दूसरा विवाह नही कर सकती-

A. न्यायमूर्ति महमूद

B. न्यायमूर्ति सुलेमान

C. अमीर अली

D. उपर्युक्त में से कोई

 

  1. इद्दत के बारे में क्या सही है?

A. विधवा की दशा में इद्दत पालन की अवधि 4 माह 10 दिन

B. विधवा की दशा में मृत्यु की तिथि पर गर्भवती हो तो बच्चे के जन्म लेने तक,

C. विवाह-विच्छेद की दशा में मासिक धर्म से ग्रस्त होने पर 3 मासिक घर्म तथा मासिक धर्म के अभाव में 3 चंद्रमास

D. उपर्युक्त सभी कथन सत्य है

 

  1. इद्दत के बारे में क्या सत्य है-

A. पति इद्दत अवधि के दौरान पत्नी के निर्वाह के लिए उत्तरदायी होगा

B. इद्दत बिना पूरा किये पत्नी पुन: विवाह नहीं करेगी

C. पत्नी मुवज्ज्ल मेहर की हकदार हो जाती है

D. उपर्युक्त सभी कथन सत्य है

  1. ख्यार-उल-वुलुग के अधिकार का प्रयोग कोई स्त्री कर सकेगी-

A. 15 वर्ष के उम्र पूर्व विवाह होने की दशा में 15 वर्ष आयु पूरा करने के बाद तथा 18 वर्ष की उम्र के पूर्व

B. 14 वर्ष के पूरा होने के बाद तथा 17 वर्ष के पूर्व

C. 15 वर्ष पूरा होने के बाद तथा 20 वर्ष के पूर्व

D. उपर्युक्त सभी कथन असत्य है

 

  1. निम्नलिखित में से क्या सत्य है-

A. सगीर जीवन की पहली अवस्था है जिसमें लड़के व लड़की की आयु 7 वर्ष से कम होती है

B. सरीरी द्वितीय अवस्था है जिसमें लड़के/लड़की की आयु 7 से अधिक व् 15 वर्ष से कम होती है

C. वुलुग तीसरी अवस्था है जिसमें लड़के/लड़की की आयु 15 वर्ष से अधिक होती है

D. उर्युक्त सभी कथन सत्य है

 

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मेहर

  • पत्नी के सम्मान स्वरूप पति पर दायित्व आरोपित करना तथा पति द्वारा पत्नी के तलाक देने के अधिकार के मनमाने तरीके से प्रयोग करने पर रोक लगाना मेहर का उद्देश्य रहा है –

 

मेहर की परिभाषा

  • विल्सन के अनुसार :- मेहर पत्नी द्वारा शरीर के समपर्ण का प्रतिकर है|
  • अमीर अली :- मेहर पत्नी के शरीर के अनन्य उपयोग एवं लाभ के लिए प्रतिकर है|
  • अब्दुल कादिर बनाम सलीम A.I.R. इलाहाबाद (1886) जस्टिस महमूद – मेहर वह धनराशि है जो पत्नी को प्रतिकर स्वरूप दिया जाता है| यदि विवाह के समय इसका जिक्र न हो तो भी विधि पत्नी को मेहर पाने की अधिकारिणी बनाता है|
  • हमीदा बीबी बनाम जुनैदा बीबी, I.L.R. (1916) P.C. मेहर विवाह की आवश्यक प्रसंगति है, यदि विवाह के समय इसका उल्लेख न हो तो इसका निर्धारण निश्चित सिद्धांतों के अनुसार किया जाना चाहिये, इसके उल्लेख न होने पर भी पूर्वधारण कर ली जाती है कि मेहर उल्लिखित था|

 

मेहर की विषयवस्तु

  • मेहर की विषयवस्तु निम्नलिखित सम्पत्ति हो सकती है – चल, अचल, मूर्त एवं अमूर्त| कोई भी निश्चित की गयी वस्तु जिसका कुछ मूल्य हो एवं जो माल की परिभाषा में आती हो तथा जो वर्तमानगत (अर्थात जो अस्तित्व में है) मेहर की विषयवस्तु बन सकती है| मेहर की विषयवस्तु निम्न वस्तुएं हो सकती है-
  • खेत या बाग़ का पैदावार
  • मकान का किराया
  • व्यापार या जीवन बीमा पालिसी के तहत प्राप्त लाभ आदि
  • मेहर की विषयवस्तु निम्न सम्पत्तियां नहीं हो सकती है
  • मेहर के निश्चय के समय जो अस्तित्व में न हों अर्थात अगले वर्ष की फसल,
  • शराब या सुअर का मांस,
  • पति की स्वयंकृत सेवा (सुन्नी में नहीं है किन्तु शिया विधि में मान्य है)
  • सम्पत्ति में कुछ अवैध एवं कुछ वैध हों तो वैध सम्पत्ति मेहर की विषय-वस्तु होगी, अवैध सम्पत्ति नहीं|

मेहर के प्रकार :-

  1. मेहर ए मुसम्मा (निर्धारित मेहर)
  2. मेहर ए मिस्ल (अनिर्धारित मेहर अर्थात रिवाजी मेहर)
  3. मुअज्जल मेहर (मांग पर तत्काल देय)
  4. मुवज्जल मेहर (आस्थगित मेहर)

 

  • मेहर ई मुसम्मा – यह मेहर विवाह के समय निर्धारित किया जाता है, यदि पक्षकार व्यस्क एंव स्वस्थचित्त है तो स्वत: मेहर निर्धारित कर सकेंगे किन्तु यदि अवयस्क या विकृतचित्त है तब उसके संरक्षक मेहर निर्धारित करते है ऐसे मेहर देने के लिए अवयस्क दायी होता है किन्तु यदि मेहर उसके द्वारा नहीं दिया जाता तो संरक्षक द्वारा दिया जायेगा|
  • मेहर निर्धारित करते समय पति यदि चाहे तो अपनी क्षमता से बाहर जाकर मेहर निर्धारित कर सकता है चाहे उसके पास कुछ बचे या न बचे|
  • हनफी विधि में दस दिरहम से कम और मलिकी विधि में तीन दिरहम से कम नहीं नियत होगा|
  • शिया विधि में मेहर नियत करने की न्यूनतम सीमा निर्धारित नहीं है|
  • मुहम्मद साहब – का कथन है कि यदि पति निर्धन है तो मेहर के बदले पत्नी को कुरान की शिक्षा दे|
  • मेहर ई मिस्ल (रिवाजी मेहर) – यह ऐसा मेहर होता है जो अनिर्धारित होता है किन्तु इसका निर्धारण करना पड़ता है| इसे रिवाजी मेहर भी कहते हैं इसका निर्धारण निम्न आधारों पर किया जाता है|

 

  • निर्धारण का ढंग –
  • पत्नी की निजी योग्यता – आयु, सुन्दरता, सदाचरण, समृद्धि एवं समझदारी आदि|
  • पत्नी के पिता के सम्बन्धित स्त्रियों को मिलने वाला मेहर,
  • पिता के खानदान की सामाजिक स्थिति,
  • पति की आर्थिक स्थिति,
  • तत्कालीन परिस्थितियां,

 

  • विवाह के बाद पति मेहर की राशि में वृद्धि कर सकता है तथा पत्नी पति द्वारा दिया जाने वाले मेहर की राशि में कमी कर सकती है तथा इस सम्बन्ध में उसे यह तक की पूर्णत: माफ़ कर सकती है|

 

 

  • निम्न स्थितियों में भी पत्नी पति से मेहर की राशि प्राप्त कर सकेंगे-
  1. यदि पत्नी आत्महत्या कर ले फिर भी मेहर देय योग्य होता है| ऐसी स्थिति में उसके उत्तराधिकारी या विधिक प्रतिनिधि मेहर पा सकते है|
  2. यदि पत्नी पति की हत्या कर दे,
  3. यदि पति पत्नी की हत्या कर दे,
  4. यदि वहां पर पुरुष गमन में लिप्त हो,
  5. यदि वह धर्म परिवर्तन कर ले,

 

  • हनफी विधि में मेहर की न्यूनतम सीमा निर्धारित है किन्तु अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं है,
  • हनफी विधि के अनुसार कम से कम 10 दिरहम देना पड़ेगा अधिकतम सीमा कुछ भी हो सकती है|
  • शिया विधि में मेहर की अधिकतम सीमा निर्धारित है जो 500 दिरहम है किन्तु न्यूनतम सीमा निर्धारित नहीं है|
  • मुअज्ज्ल मेहर – यह विवाह होने पर मांग पर तत्काल देय होता है यदि पति मेहर नहीं देता है तथा विवाह पूर्णावस्था को प्राप्त नहीं हुआ है तथा पति दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यस्थापन के लिए वाद लाता है तो पत्नी द्वारा अदत्त मेहर का न्यायलय में लिया गया बचाव पूर्ण प्रतिरक्षा होगी|
  • यदि पत्नी अवयस्क या विकृतचित्त है तो उसके पिता मेहर न देने की दशा में उसे पति के घर जाने से रोक सकते है|
  • मुअज्ज्ल मेहर मांग पर देय होता है, इसलिए अवधि की गणना मांग और इनकार के समय से शुरू होती है|
  • इस प्रयोजन के लिए अवधि 3 साल की होती है| यदि पत्नी विवाहिता अवस्था में मांग न करे तो केवल मृत्यु या तलाक द्वारा विवाह विच्छेद की तारीख से अवधि की गणना आरम्भ होती है|
  • मुवज्जल मेहर – पति द्वारा तलाक देने के बाद या पति के मरने के बाद देय होता है अथवा करार द्वारा निर्धारित किसी निश्चित घटना के घटित होने पर देय होता है|

 

  • अपवाद-उपर्युक्त स्थिति से पहले भी मुवज्जल वसूला जा सकता है-
  • जब पक्षकारो के मध्य करार हो तो पति के मरने एवं तलाक देने के पूर्व आस्थगित मेहर पत्नी या सकेगी, या
  • यदि पति मरने व तलाक देने के पूर्व ही स्वेच्छा से दे देता है|

 

  • मेहर के सन्दर्भ में पत्नी के अधिकार – मेहर के सन्दर्भ में पत्नी के अधिकार निम्नलिखित है –
  • समागम से इंकार – यदि पति मुअज्ज्ल मेहर को प्रदान नहीं करता है तो पत्नी समागम से इनकार कर सकती है बशर्ते विवाह पूर्णावस्था को न प्राप्त हुआ हो, यदि पूर्णावस्था को प्राप्त हो चुका है तो अदत्त मेहर के लिए पत्नी समागम से इंकार नहीं कर सकती है, किन्तु यदि पत्नी अवयस्क एवं विकृत चित्त है तो पूर्णावस्था के बावजूद अदत्त मेहर के लिए समागम से इंकार कर सकती है| पति, पत्नी के विरुद्ध दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यस्थापन के लिए वाद लाता है तो पत्नी अदत्त मेहर को पूर्ण प्रतिरक्षा के रूप में न्यायालय में ले सकेगी|

 

  • मेहर ऋण के तौर पर वसूलनीय होगा – पत्नी अदत्त मेहर के लिए एक प्रकार से ऋणदाताओं की श्रेणी में मानी जायेगी, किन्तु वह पति की सम्पदा (स्थावर सम्पत्ति) पर भार आरोपित नहीं कर सकेगी, यदि भार के सम्बन्ध में करार हो तो ऐसा सम्भव है|
  • हमीरा बीवी बनाम जुबैदा बीवी (1916) के मामले में प्रिवी कौंसिल ने यह अधिनियम किया कि मेहर ऋण की श्रेणी में आता है तथा अदत्त मेहर के लिए पत्नी अन्य ऋणदाताओं के समान मेहर की राशि को वसूल कर सकेगी|
  • कपूरचन्द्र बनाम कदरून्निशा 1950 के प्रकरण में उच्चतम न्यायलय ने यह अभिनिर्धारित किया कि अदत्त मेहर एक साधारण अप्रतिभूति ऋण की श्रेणी में आता है तथा पत्नी को अन्य ऋणदाताओं की तुलना में मेहर की राशि को वसूल करने के लिए वरीयता नहीं प्राप्त हुआ करती है|
  • मो. जैनुल हक़ बनाम जुबैदा हैदर, ए.आई.आर. 1981 पटना के मामले में यह कहा गया कि विधवा की मृत्यु के बाद मेहर ऋण की वसूली के लिए वाद दायर करने का अधिकार उस स्त्री के उत्तराधिकारियों या वैध प्रतिनिधियों को प्राप्त हो जाता है|

 

  • पति की सम्पत्ति को कब्जा में बनाये रखने का अधिकार-अदत्त मेहर के एक्ज में पत्नी को पति की सम्पदा को कब्जा में बनाये रखने का अधिकार है अंदाज उसे कब्जा प्राप्त करने का अधिकार न होकर कब्जा बनाये रखने का अधिकार है, इसे कभी कभार पत्नी का धारणाधिकार भी कह दिया जाता है किन्तु ऐसा कहना न्यायोचित नहीं है|
  • पत्नी को पति की सम्पत्ति पर उसकी स्वतंत्र सम्पत्ति से कब्जा प्राप्त करना चाहिए, न कि भूल, प्रपीडन, कपट, आदि से (मैना बीवी बनाम चौ. वकील अहमद (1925) P.C.)
  • पति की सम्पत्ति को कब्जा में बनाये रखने के साथ ही साथ पत्नी पति से अदत्त मेहर के लिए वाद ला सकती है, यदि पत्नी मर जाती है तो उसके उत्तराधिकारी या विधिक प्रतिनिधि अदत्त मेहर की वसूली के लिए पति के विरुद्ध वाद ला सकते है क्योंकि अदत्त मेहर दाय योग्य होता है|
  • पत्नी यदि पति मर जाता है तब उसके पुत्रो से अर्थात उत्तराधिकारियों से अदत्त मेहर की धनराशि वसूलने की हकदार होती है|
  • उत्तराधिकारी मेहर की धनराशि को देने के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं होते बल्कि पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पत्ति की सीमा तक अपने-अपने अंश के अनुपात में मेहर की धनराशि की अदायगी के लिए उत्तरदायी होते हैं|
  • पत्नी भी उत्तराधिकारियों में शामिल होती है अत: जिस अनुपात में उसे उत्तराधिकार में सम्पत्ति प्राप्त होती है उसी अनुपात में उसे प्राप्त होने वाले मेहर राशि में कटौती कर दी जाती है|
  • अदत्त मेहर के एवज में संपत्ति को कब्जे में बनाये रखने पर सम्पत्ति के सम्बन्ध में पत्नी को स्वत्त नहीं प्राप्त होता है|
  • मेहर की राशि एंव बंधक के मध्य विभेद है| अदत्त मेहर की एवज में सम्पत्ति को कब्जे में बनाये रखने पर पत्नी को कब्जाकृत सम्पत्ति में कोई हित प्राप्त नहीं होता है किन्तु बंधक में बन्धकी को बंधक की गई स्थावर सम्पत्ति में हित प्राप्त होता है|
  • बंधक जहाँ करार का परिणाम होता है वहीँ अदत्त मेहर के एवज में सम्पत्ति का पत्नी द्वारा कब्जे में बनाये रखना विधि का परिणाम होता है|
  • अत: यह स्पष्ट है कि अदत्त मेहर के एवज में सम्पत्ति को कब्जा में बनाये रखने का अधिकार उसे बंधकी का रूप नहीं प्रदान करता है|

 

  • हिसाब देने का अधिकार – सम्पत्ति को कब्जा में बनाये रखने पर पत्नी को हिसाब एवं लेखा जोखा देना पड़ेगा यदि कब्जाकृत सम्पत्ति से प्राप्त लाभ एवं भाटक से अदत्त मेहर की धनराशि मुजरा हो जाती है तो पत्नी सम्पत्ति पर से कब्जा छोड़ देगी|
  • अदत्त मेहर दाय योग्य होता है|
  • यदि पत्नी बिना वसूले मर जाती है तो उसके उत्तराधिकारी या विधिक प्रतिनिधि पति की सम्पत्ति से अदत्त मेहर वसूल कर सकेंगे|
  • यदि पत्नी कब्जा में बनाये रखे हुए सम्पत्ति पर कब्जा स्वेच्छा से छोड़ देती है तो उस पर पुन: कब्जा नहीं प्राप्त कर सकती है किन्तु यदि बल एवं कपट के सहारे उसे सम्पत्ति से बेकब्जा किया गया है तो कब्जा में बनाये रखने के लिए वाद ला सकती है|

 

  • अन्य संक्रामण का अधिकार – अपने मेहर के दाये के अंतर्गत अपने पति की संपत्ति पर विधवा के काबिज रहने का अधिकार विधवा को विक्रय, बंधक, हिबा या अन्य ढंग से सम्पत्ति के अंतरण का अधिकार नहीं देती किन्तु यदि पत्नी अदत्त मेहर के बदले में सम्पत्ति को कब्जा में बनाये रखने के दौरान सम्पत्ति का अंतरण करती है तो अंतरण वहीं तक मान्य व प्रभावी होगा जहाँ तक वह उत्तराधिकारिणी के रूप में उक्त सम्पत्ति में अपना अंश पाने की हकदार होती है और अंतरित सम्पत्ति के शेष हिस्से के सन्दर्भ में अंतरण अमान्य होगा तथा ऐसे अंतरण की दशा में उत्तराधिकारी बिना मेहर की धनराशि दिए सम्पत्ति को कब्जा में पा लेने के लिए अधिकारी हो जायेंगे|

 

बहुविकल्पीय प्रश्न

  1. किसने कहा है कि मेहर पत्नी के अनन्य उपभोग और लाभ के लिए प्रतिकर है-

A. अमीर अली

B. न्यायमूर्ति महमूद

C. न्यायमूर्ति सुलेमान

D. इनमें से कोई नहीं

 

  1. किस मामले में यह कहा गया कि मुस्लिम विधि में मेहर वह धनराशि या सम्पत्ति होती है जिसे पति विवाह के प्रतिकर के रूप में पत्नी को देने का वादा करता है तथा यदि विवाह के समय इसे नियत न किया जाए या इसका जिक्र न किया जाए तो भी क़ानून पत्नी को मेहर का हक़ प्रदान करता है-

A. सब रून्निशा ब. सब्दू

B. अब्दुल कादिर ब सलीमा

C. हमीर बीबी ब. जुबैदा बीबी

D. उपर्युक्त में से कोई नहीं

 

  1. मेहर के बारे में क्या सत्य है?

A. सुन्नी विधि में मेहर की राशि कम-से-कम 10 दिरहम नियत है

B. शिया विधि में मेहर के राशि की न्यूनतम सीमा नियत नहीं है

C. शिया विधि में मेहर की अधिकतम सीमा 500 दिरहम नियत है जबकि सुन्नी विधि में अधिकतम सीमा नहीं नियत है

D. उपर्युक्त सभी कथन सत्य है

 

  1. किस मामले में यह कहा गया कि मुस्लिम विधि के अंतर्गत मेहर विवाह की हैसियत की आवश्यक प्रसंगति है और यहाँ तक कि विवाह के समय उसका उल्लेख नहीं किया गया है तो भी उसका निर्णय निश्चित सिद्धांतों के अनुसार किया जाना आवश्यक है-

A. हमीर बीबी ब. जुबैदा बीबी

B. कपूर चन्द्र ब. कररुन्निसां

C. मोहम्मद जैनुल हक़ ब. जुबैदा हैदर

D. मैना बीबी ब. चौधरी वकील अहमद

 

  1. मेहर की विषय-वस्तु हो सकती है-

A. खेत या बाग़ का पैदावार

B. मकान का किराया

C. व्यापार या जीवन बीमा पॉलिसी से प्राप्त लाभ

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. मेहर की विषय-वस्तु नहीं हो सकती-

A. मेहर के निश्चित के समय जो अस्तित्व में न हों,

B. शराब और सुअर का मांस

C. पति की स्वयं कृत सेवा (सुन्नी विधि में नहीं किन्तु शिया विधि में मान्य)

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. मेहर के वर्गीकरण के बारे में क्या सत्य है?

A. निश्चित मेहर (मेहर-इ-मुसम्मा)

B. उचित मेहर (मेहर-इ-मिस्ल)

C. मुअज्जल (तात्कालिक) मेहर व मुअज्जल मेहर (आस्थगित मेहर)

D. उपर्युक्त सभी सत्य हैं

 

  1. निश्चित मेहर के बारे में क्या सत्य है?

A. मेहर इतना नियत किया जा सकता है कि नियतकर्ता उत्तराधिकारियों के लिए कुछ न बचे

B. हनफी विधि में मेहर 10 दिरहम से कम नहीं नियत होगा

C. मलिकी विधि में 3 दिरहम से कम नहीं नियत होगा

D. उपर्युक्त सभी कथन सत्य है

 

  1. निम्न लिखित में से कौन कथन सत्य है-

A. मुअज्जल मेहर विवाह होने पर मांग पर तत्काल देय होता है,

B. मुवज्जल मेहर मृत्यु या विवाह विच्छेद द्वारा विवाह की समाप्ति पर देय होता है

C. मुवज्जल मेहर पत्नी विघटन अथवा निश्चित घटना के घटित होने के पूर्व (करार द्वारा) नहीं मांग सकती परन्तु पति इसके पूर्व दे सकता है

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. रिवाजी (उचित) मेहर (मेहर-इ-मिस्ल) को नियत करने पर किन पर ध्यान दिया जाता है-

A. पत्नी की निजी अर्हताएं यथा उम्र, सौन्दर्य एवं समृद्धि

B. पिता के खानदान की सामाजिक स्थिति

C. पितृ पक्ष की अन्य स्त्रियों को देय मेहर

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. मेहर पति द्वारा पत्नी को न देने की दशा में पत्नी को अधिकार प्राप्त है-

A. समागम से इनकार

B. ऋण के रूप में मेहर की धनराशि पाने का अधिकार

C. मृतक परि की सम्पत्ति पर कब्जा रखने का अधिकार

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. किस प्रकरण में यह कहा गया कि अदत्त मेहर एक साधारण अप्रतिभूत ऋण की भाँति है जिसे वसूलने में अन्य ऋणदाताओं की तुलना में पत्नी को कोई वरीयता नहीं मिलती है-

A. कपूरचन्द्र ब. कदरून्निसा

B. अमजुद हसन सिद्दीकी ब. सलमा बीबी

C. मैना बीबी ब. चौधरी वकील अहमद

D. उपर्युक्त सभी में से कोई नहीं

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तलाक

  • तलाक अरबी शब्द है इसका अर्थ है विवाह बंधन से मुक्त करना|
  • कोई भी वयस्क एवं स्वस्थचित्त मुस्लिम जब चाहे बिना किसी कारण के अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है|
  • किन्तु यदि वह अवयस्क 15 वर्ष से कम, (यहाँ भारतीय वयस्कता अधिनियम, 1875 की धारा 3 में विहित वयस्कता सम्बन्धी 18 वर्ष नहीं लागू होगा) एवं विकृतचित्त है तो तलाक नहीं दे सकता|
  • जहाँ निकाह में संरक्षक अवयस्क एवं विकृतचित्त व्यक्ति की ओर से उसकी पत्नी को तलाक नहीं दे सकता|
  • शफई एवं हनफी विधि में नशे में (स्वैच्छिक नशे में) मजाक में, क्रोध में, विवशता में तथा पिता को खुश करने के लिए तथा जिहवा की भूल से दिया गया तलाक मान्य एवं प्रभावी होता है किन्तु शिया विधि इसे मान्यता नहीं देती है शाहिद बेगम बनाम अब्दुल माजित|
  • सुन्नी विधि- सुन्नी विधि में तलाक मौखिक या लिखित (तलाकनामा) रूप में दिया जा सकता है|
  • लिखित (तलाकनामा)- तलाकनामा काजी (मौलवी), या पत्नी के संरक्षक या साक्षियों की उपस्थिति में लिखा जा सकता है|
  • तलाकनामा के तैयार किये जाने के समय पत्नी की उपस्थिति जरूरी नहीं होती है| पति द्वारा पत्नी को तलाक देते समय उसको संबोधित होना भी जरूरी नहीं होता है, केवल उसका नाम निर्देशन या नामांकन ही पर्याप्त हुआ करता है|
  • इस स्थिति में तलाक उस दिन से प्रभावी होगा जिस दिन तलाकनामा तैयार किया गया है| यह उस दिन से प्रभावी नहीं होता जब पत्नी को तलाकनामा प्राप्त होता है|
  • यदि करार द्वारा यह विहित किया जाय कि तलाक अमुक दिन से प्रभावी होगा अथवा अमुक घटना के घटने पर प्रभावी होगा, तो उक्त दिन या अमुक घटना के घटित होने पर तलाक प्रभावी होगा|

शिया विधि में तलाक-

  • मौखिक होगा (लिखित तलाक मान्य नहीं)
  • अरबी भाषा में तलाक दिया जायेगा, (अरबी भाषा न जानने वाला पति निर्धारित शब्दावली के भावार्थ को किसी अन्य भाषा में भी उच्चारित कर सकता है|
  • यदि विषम स्थिति (मौखिक तलाक देने में असमर्थता की दशा में) है तो लिखित तलाक देय होगा,
  • तलाक के समय 2 साक्षियों की उपस्थिति जरूरी होगी|
  • साक्षी वयस्क हो एवं स्वस्थचित्त हो तथा मुस्लिम हो| साक्षी दो पुरुष या एक पुरुष और दो स्त्री हो सकते हैं|

तलाक के तरीके-

  • तलाक को सदैव एक बुरा कार्य माना गया है परन्तु यदि किसी कारणवश तलाक अपरिहार्य हो जाये तो इसकी सर्वोत्तम विधि वह होती जिसमें तलाक देने के पश्चात् प्रतिसंहरण की संभावना बनी रहे ताकि तलाक के बुरे परिणामों को प्रभावी होने से रोका जा सके|
  • इसीलिए पैगम्बर साहब ने केवल प्रतिसंहरणीय तलाक का अनुमोदन किया है| इसके दो प्रकार हैं-

 

  1. तलाक-ए-सुन्नत (तलाक-ए-राजे) (प्रतिसंहरणीय)-
  • तलाक-ए-अहसन
  • तलाक-ए-हसन

 

  1. तलाक-ए-विद्दत (तलाक-ए-वैन) – अप्रतिसंहरणीय|

 

तलाक-ए-अहसन

  • यह तलाक का सबसे अच्छा तरीका है क्योंकि इसमें तलाक देने के बाद भी पत्नी के इद्दत पालन की अवधि तक पति तलाक का खंडन कर सकता है अर्थात् अपने द्वारा दिये गये तलाक को पत्नी के इद्दत पालन तक तोड़ सकता है|

आवश्यक शर्तें-

  1. तलाक एक ही वाक्य में दिया जाय|
  2. तलाक तुह (पाक अर्थात् पवित्र) अवस्था में दिया जाय|
  3. इद्दत पालन के दौरान समागम से विरत रहें|

 

तलाक-ए-हसन

  • अरबी में ‘हसन’ का अर्थ होता है ‘अच्छा’ लेकिन हसन रूप में उच्चारण किया गया तलाक-ए-अहसन रूप में उच्चारण किये गये तलाक से कम अनुमोदित होता है|

 

आवश्यक शर्तें-

  1. तलाक शब्द का उच्चारण तीन बार हो परन्तु हर उच्चारण अलग-अलग तुहों में हो,
  2. तलाक तुह की दशा में किया जाय,
  3. रजोधर्म की दशा में न हो तो 30 दिन के अन्तराल पर 3 बार अर्थात् (90 दिन में)
  4. उपर्युक्त अवधि में समागम से विरत रहे|

 

तलाक का खंडन या प्रतिसंहरण

  • तलाक-ए-सुन्नत को प्रतिसंहरणीय तलाक भ कहते हैं अर्थात् तलाक देने के बाद पति तलाक का खण्डन कर सकता है|
  • तलाक-ए-अहसन में इद्दत पालन की अवधि के दौरान तलाक दिया जा सकता है| इद्दत की अवधि पूरी कर देने के बाद नहीं|
  • तलाक-ए-हसन में अंतिम बार (तीसरी बार उच्चारण) जब तलाक न दिया जाये तब तक उससे पूर्व तलाक का खण्डन किया जा सकता है|

 

तलाक-ए-विद्दत

  • इसे अप्रतिसंहरणीय तलाक कहते हैं| इसमें तलाक देने के बाद पति तलाक का खंडन नहीं कर सकता है| तलाक देने से तलाक पूर्ण हो जाता है|
  • यह तलाक देने का निन्दित, कुत्सित तरीका है|
  • पैगम्बर मोहम्मद साहब के समय में इस तलाक का प्रचलन नहीं था क्योंकि वे इसे मान्यता नहीं देते थे|
  • हिजरी संवत् के द्वितीय शताब्दी में इस तलाक का प्रचलन हुआ|
  • रहमतुल्ला बनाम उ.प्र. राज्य, (1994) यू.पी. सिविल एण्ड रेवेन्यू केसेज रिपोर्टर 1994 के मामले में न्यायमूर्ति तिलहरी ने कहा कि “तलाक-ए-विद्दत” अवैध है, क्योंकि यह पवित्र कुरान के आदर्शों के विपरीत है|
  • इसे शिया एवं मलकी विधि मान्यता नहीं देते हैं| शफई एवं हनफी विधि इसे मान्यता देते हैं किन्तु उनका इस संदर्भ में यह मत है कि जो लोग यह तलाक देते हैं वह पाप के भागी होते हैं|

आवश्यक तत्व-

  1. यह कहे कि- “मैं तुम्हें तीन बार तलाक देता हूँ|” अथवा
  2. यह कहे कि- “मैं तुम्हें तलाक देता हूँ, तलाक देता हूँ, तलाक देता हूँ|

 

  • प्रभाव- तलाक देने के बाद यह तुरंत अप्रतिसंहरणीय तलाक हो जाता है अर्थात् इसका खण्डन नहीं किया जा सकता है| एक बार तलाक का उच्चारण करने पर तलाक पूर्ण हो जाता है तथा समझौते की कोई गुंजाइश नहीं होती| तलाक की घोषणा के बाद तलाक तुरन्त प्रभावी हो जाता है|

इला

  • इसमें पत्नी को ‘मुला’ तथा पति को ‘मुली’ कहा जाता है|

 

आवश्यक तत्व-

  1. वयस्क व स्वस्थचित्त व्यक्ति,
  2. ईश्वर की शपथ लेकर कहे,
  3. मैं चार माह या उससे अधिक समागम नहीं करूंगा,
  4. शपथ का पालन करे,
  • इला निम्नलिखित आधार पर रद्द होगा-
  1. 4 महीने के भीतर पति के संभोग शुरू करने पर,
  2. 4 महीने के भीतर मौखिक रूप से इला का खण्डन करने पर,

 

जिहार (आपत्तिजनक तुलना)

यदि कोई वयस्क एवं स्वस्थचित्त मुस्लिम अपनी पत्नी की तुलना अपनी माँ से करे या निषिद्ध आसत्तियों के भीतर की किसी भी स्त्री से करे तो उसे प्रायश्चित करना पड़ेगा यदि वह ऐसा नहीं करता है तो पत्नी को उससे संभोग करने से इन्कार करने का अधिकार है|

  • प्रायश्चित द्वारा आत्मशुद्धि न करने पर पत्नी को न्यायिक विवाह-विच्छेद के लिए आवेदन करने का अधिकार हो जाता है|
  • यदि तुलना का आशय तिरस्कार करना रहा हो, पत्नी के प्रति सम्मान प्रकट करना आशय हो तो ऐसी दशा में शुद्धि नहीं करना पड़ेगा|

प्रायश्चित के तरीके-

  1. एक गुलाम को मुक्त करना,
  2. दो माह का रोजा रखना,
  3. साठ गरीबों को भोजन कराना|

 

प्रत्यायोजित तलाक अर्थात् तलाक-ए-तफवीज

  • कोई व्यक्ति तलाक देने के अपने अधिकार निम्न को प्रत्यायोजित कर सकता है-
  • अपनी पत्नी को या किसी तृतीय व्यक्ति को या स्वयं को तलाक देने की अपनी शक्ति के प्रत्यायोजित किये जाने के बाद भी पति तलाक देने की अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकता है|
  • इसमें पांति पति को तलाक नहीं देती बल्कि पति की ओर से पति द्वारा उसकी शक्ति का प्रयोग करके स्वयं को तलाक देती है|
  • खुला- खुला का शाब्दिक अर्थ हटाना या उतारना या खोलना|
  • इसमें पति अपनी पत्नी के प्रति अपने अधिकारों का परित्याग कर देता है| यदि पति पत्नी के मध्य संबंध ऐसे नाजुक दौर में पहुंच चुका हो कि ईश्वरीय आदेशों द्वारा विहित कर्तव्यों का पालन करना असंभव हो गया हो तो पत्नी पति को प्रतिफल देकर अपने आपको विवाह-बन्धन से मुक्त करा सकती है|

 

आवश्यक तत्व-

  1. पत्नी द्वारा पति को प्रतिफल दिया जाय,
  2. पत्नी द्वारा तलाक देने की प्रस्तावना पति से करना,
  3. पति द्वारा ऐसे प्रस्ताव पर स्वीकृति देना,

मुबारत (पारस्परिक छुटकारा)

  • इसमें पति-पत्नी के मध्य पारस्परिक अरुचि रहती है तथा दोनों अलग रहने के लिये रजामंद रहते हैं| इसमें पति या पत्नी आपसी सम्मति से एक-दूसरे से तलाक ले सकते है|

खुला व मुबारत में अंतर-

  1. खुला में अरुचि एक पक्षीय होती है जबकि मुबारत में अरुचि उभयपक्षीय होती है|
  2. खुला में पत्नी पति को प्रतिफल देती है जबकि मुबारत में पत्नी पति को प्रतिफल नहीं देती|
  3. खुला में प्रस्ताव केवल पत्नी द्वारा किया जाता है जबकि मुबारत में तलाक देने का प्रस्ताव पति या पत्नी किसी की ओर से हो सकता है|
  4. खुला में विवाह की संविदा से पत्नी की निर्मुक्ति होती है जबकि मुबारत में विवाह-बन्धन से पारस्परिक विमुक्ति होती है|

लियन (परपुरुष गमन का झूठा आरोप) – पति द्वारा पत्नी पर

  1. पर पुरुष गमन का आरोप लगाना,
  2. ऐसा लगाया गया आरोप झूठा हो,
  3. पत्नी न्यायालय से विवाह विच्छेद कराने की अधिकारिणी होती है|

मुस्लिम महिला विवाह विच्छेद अधिनियम 1939 की धारा 2 के अनुसार तलाक के आधार निम्नलिखित हैं जो पत्नी को प्राप्त हैं-

  1. पति 4 वर्ष से लापता हो, (विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करने पर डिक्री 6 माह तक निलंबित अर्थात् प्रभावहीन होती है ऐसा इसलिए कि यदि इस बीच पति आकर साथ रहने की इच्छा व्यक्त कर दे तो विवाह विच्छेद की डिक्री समाप्त हो जायेगी|)
  2. पति दो वर्ष तक भरण पोषण में उपेक्षा करे या असफल रहे|
  3. 7 वश या उससे अधिक अवधि के कारावास का दण्ड पति को दिया गया हो,
  4. 3 वश तक दाम्पत्य अधिकारों का बिना उचित कारण के पालन न करे,
  5. दो वर्ष से पागल हो, या कुष्ठ रोग या उग्र रतिज रोग से ग्रस्त हो|
  6. पति नपुंसक हो|
  7. पति द्वारा क्रूरता करना-
  • पत्नी को पीटना,
  • उसकी संपत्तियों को अन्तरित कर देना,
  • उसे अपना धर्म पालन करने से रोकना,
  • उसे अनैतिक जीवन बिताने के लिये विवश करना,
  • कई स्त्रियां हो अर्थात् 4 स्त्रियां हो तो उनके प्रति समतापूर्ण व्यवहार न करना|
  • कुख्यात स्त्रियों के साथ रहना|
  1. पत्नी द्वारा ख्याल-उल-वुलूग (वयस्कता के विकल्प) के अधिकार का प्रयोग करना,
  2. अन्य आधार जो मुस्लिम विधि में मान्य हो अर्थात्-

खुला          मुबारत        जिहार आदि

विवाह विच्छेद के विधिक प्रभाव-

  • पुनर्विवाह करने का- (A) यदि विवाह पूर्णावस्था को प्राप्त हो गया हो तो पत्नी इद्दत पालन के दौरान पुन: विवाह नहीं करेगी| इद्दत पालन के पश्चात् पत्नी पुनर्विवाह करेगी| पति भी जब तक पत्नी इद्दत पालन करती है तब तक उसको मिलाकर कुल चार पत्नियाँ हैं तो वह शादी नहीं करेगा यदि 4 पत्नियों से कम हैं (तलाकशुदा पत्नी को लेकर) जो इद्दत पालन कर रही है, को मिलाकर तो शादी कर सकेगा|

(B) यदि विवाह पूर्णावस्था को प्राप्त न हुआ हो तो तलाक शुदा पत्नी बिना इद्दत पालन के पुन: विवाह कर सकेगी|

(2) मेहर तत्काल देय होगा-

  • पूर्णावस्था की दशा में:
  • मुअज्जल मेहर जो बकाया हो तत्काल देय होगा
  • मुअज्जल (आस्थगित) मेहर भी तत्काल देय होगा

 

  • अपूर्णावस्था की दशा में-
  • आधी मेहर देय होगा (यदि मेहर का उल्लेख हो)
  • तीन कपड़े देय होंगे (अगर मेहर का उल्लेख न हो)
  • तलाकशुदा दंपत्ति के मध्य संभोग अवैध होगा तथा उत्पन्न संतान अधर्मज होगी तथा अभिस्वीकृति द्वारा भी धर्मज नहीं होंगे|
  • पति व पत्नी एक दूसरे से उत्तराधिकार में संपत्ति प्राप्त नहीं कर सकेंगे|
  • पत्नी केवल इद्दत पालन के समय तक भरणपोषण प्राप्त कर सकेगी|
  • तलाक शुदा दंपति के मध्य पुन: विवाह पर रोक|
  • यदि पति अपनी पत्नी को तलाक देता है तो तलाक के बाद तथा पत्नी के इद्दत पालन के बाद उन दोनों के मध्य वैवाहित संबंध स्थापित नहीं हो सकता है इस दशा में पत्नी को किसी दूसरे पुरुष से शादी करनी पड़ेगी तत्पश्चात उनमें भी तलाक होना चाहिये व तलाक के बाद इद्दत पालन करके पत्नी अपने पहले पति से पुन: विवाह कर सकेगी|

 

 

 

 

 

 

 

  1. किस शाखा में नशे में, मजाक में, क्रोध में, विवशता में तथा पिता को खुश करने के लिए एवं जिहवा की भूल से दिया गया तलाक मान्य एवं प्रभावी होता है-

A. शफई

B. हनफी

C. शफई व हनफी दोनों

D. शिया विधि

  1. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है-

A. तलाकनामा काजी (मौलवी), या पत्नी के संरक्षक या साक्षियों की उपस्थिति में तैयार किया जा सकता है

B. तलाकनामा के तैयार किये जाने के समय पत्नी की उपस्थिति जरुरी नहीं होती

C. पति द्वारा पत्नी को तलाक देते समय उसको संबोधित होना जरुरी नहीं है केवल उसका नाम-निर्देशन या नामांकन ही पर्याप्त हुआ करता है|

D. उपर्युक्त सभी कथन सत्य है|

  1. शिया विधि में तलाक के सन्दर्भ में क्या सही है?

A. तलाक मौखिक होगा, लिखित तलाक मान्य नहीं,

B. अरबी भाषा में तलाक देय होगा,

C. तलाक के समय 2 साक्षियों की उपस्थिति आवश्यक है|

D. उपर्युक्त सभी कथन सत्य है|

  1. तलाक-ए-अहसन के बारे में क्या असत्य है?

A. तलाक तुह (पाक) अवस्था में दिया जाये,

B. इद्दत पालन के समय समागम से विरत रहे

C. यह तलाक का सबसे अच्छा तरीका नहीं है|

D. यह प्रति संहरणीय तलाक है|

  1. तलाक-ए-हसन के बारे में सत्य है-

A. तलाक शब्द का उच्चारण तीन बार हो परन्तु हर उच्चारण अलग-अलग तुहों में

B. तलाक तुह की दशा में दिया जाये,

C. रजोधर्म की दशा में न हो तो 30 दिन के अन्तराल पर 3 बार अर्थात् (90 दिन में)

D. उपर्युक्त सभी कथन सत्य है|

  1. तलाक-ए-विद्दत के बारे में क्या असत्य है?

A. प्रति संहरणीय होता है

B. यह तलाक देने का निन्दित एवं कुत्सित तरीका है|

C. इसमें ‘मैं तुम्हें तीन बार तलाक देता हूँ’, अथवा मैं तुम्हें तलाक देता हूँ, तलाक देता हूँ, तलाक देता हूँ

D. शफी एवं हनफी विधि इसे मान्य देते हैं, शिया एवं मलिकी विधि नहीं|

  1. इला तलाक के बारे में कौन कथन सही है-

A. इसमें पत्नी को मुला तथा पति को मुली कहा जाता है|

B. तलाक देने वाला ईश्वर का शपथ लेता है कि वह 4 माह या उससे अधिक समय तक समागम नहीं करेगा|

C. शपथ का पालन करना होता है|

D. उपर्युक्त सभी कथन सत्य है|

  1. यदि कोई मुस्लिम अपनी पत्नी की तुलना अपनी माँ या निषिद्ध आसत्तियों के भीतर किसी भी स्त्री से करे तो प्रायश्चित द्वारा शुद्धि न करने पर पत्नी को विवाह-विच्छेद का आधार प्राप्त हो जाता है प्रायश्चित्त में शामिल है-

A. एक गुलाम को मुक्त करना,

B. दो माह का रोजा रखना,

C. साठ गरीबों को भोजन कराना,

D. उपर्युक्त सभी|

  1. खुला तलाक के बारे में क्या सत्य है?

A. पत्नी द्वारा पति को प्रतिफल दिया जाता है

B. पत्नी द्वारा पति से तलाक देने का प्रस्ताव करना

C. पति द्वारा पत्नी के प्रस्ताव पर स्वीकृति देना

D. उपर्युक्त सभी|

  1. निम्नलिखित कथनों में कौन-सा असत्य है-

A. खुला में अरुचि उभयपक्षीय होता है|

B. मुबारत में तलाक देने का प्रस्ताव पति या पत्नी किसी भी ओर से हो सकता है|

C. खुला में विवाह की संविदा से पत्नी की निर्मुक्ति होती है

D. मुबारत में विवाह बन्धन से पारस्परिक विमुक्ति होती है|

  1. मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम 1939 की धारा 2 में पत्नी को तलाक देने का कौन-सा आधार प्राप्त नहीं है-

A. पति 4 वर्ष से लापता हो

B. पति 3 वर्ष से भरण-पोषण करने में उपेक्षा करे

C. पति को 7 वर्ष या उससे अधिक अवधि के कारावास का दण्ड प्राप्त हो

D. पति 3 वश तक बिना उचित कारण के दाम्पत्य अधिकारों का पालन न करे|

  1. पति द्वारा पत्नी के प्रति क्रूरता करना पत्नी को तलाक देने का अधिकार मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम 1939 देती है| क्रूरता में शामिल है-

A. पत्नी को पीटना,

B. उसे अपना धर्म पालन करने से रोकना,

C. अनैतिक जीवन जीने के लिए पत्नी को विवश करना,

D. उपर्युक्त सभी|

  1. विवाद यदि अपूर्णावस्था में है तो उसके बारे में कौन-सा कथन सत्य नहीं है-

A. यदि मेहर का उल्लेख हो तो आधी मेहर देय होगा

B. पति एवं पत्नी एक दूसरे से उत्तराधिकार में सम्पत्ति प्राप्त कर सकेंगे,

C. पत्नी केवल इद्दत पालन तक भरण-पोषण पा सकेगी

D. तलाक शुदा दम्पत्ति के मध्य पुन: विवाह पर रोक|

 

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हिबा

  • मुल्ला के अनुसार – दो जीवित व्यक्तियों के मध्य सम्पत्ति का अंतरण जो तुरंत और बिना किसी विनिमय के होता है तथा कब्जे का परिदान तुरंत किया जाता है जिसे आदाता द्वारा या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा स्वीकार किया जाता है|
  • देदाया के अनुसार – एक व्यक्ति द्वारा दूसरे को तुरंत और बिना किसी विनिमय या बदले में किया गया बिना शर्त सम्पत्ति का अंतरण, जिसे दूसरा स्वीकार करता है या उसकी ओर से स्वीकार किया जाता है|
  • बी.पी. कथेसा उम्मा बनाम नारायनाथ कुम्हामा A.I.R. 1964 S.C. के मामले में न्यायमूर्ति हिदायतुल्ला ने हिबा के बारे में कहा कि “हिबा किसी विशिष्ट वस्तु पर बिना एवज के अधिकार प्रदान करने को कहा जाता है|

 

  • दान की प्रसंगतियां – दान की प्रसंगतियां निम्न है-
  • दो जीवित व्यक्तियों के मध्य अंतरण (दाता व आदाता)
  • अंतरण बिना प्रतिफल के हो,
  • कब्जे का तुरंत परिदान,
  • कब्जे का बिना शर्त परिदान,
  • आदाता द्वारा या उसकी ओर से प्रतिग्रहण,

 

  • दाता कौन होगा- निम्न लोग दाता हो सकेंगे,
  1. वयस्क हो (भारतीय वयस्कता अधिनियम, 1875 की धारा 3 के अनुसार 18 एवं संरक्षक तथा प्रतिपाल्य अधिनियम 1890 के अनुसार 21 वर्ष का हो| वयस्कता 15 वर्ष मुस्लिम विधि में विवाह, विवाह-विच्छेद एवं मेहर में मानी गयी है|
  2. स्वस्थचित्त हो,
  3. सम्पत्ति का स्वामी हो,
  4. वह स्वतंत्र सहमति से दान करे

निम्न लोग भी दाता हो सकेंगे-

  1. महिला,
  2. पर्दानशीन महिला- इसमें यह साबित करने का भार आदाता पर होता है कि दाता महिला दान सम्बन्धी संव्यवहार को समझती थी तथा उसको अपने ऊपर पड़ने वाले प्रभाव को जानती थी|
  3. दिवालिया-भी दाता हो सकता है, यदि इसका आदाता को धोखा देने का आशय न हो|

 

  • आदाता कौन हो सकेंगे-निम्नलिखित लोग आदाता हो सकेंगे-
  1. सम्पत्ति को धारण करने के योग्य हो,
  2. किसी भी लिंग (स्त्री या पुरुष) का हो,
  3. किसी भी धर्म- (हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि) का हो|

 

  • आदाता किसी भी उम्र का हो सकता है तथा अवयस्क या अस्वस्थचित्त अदाता की दशा में कब्जा वैध संरक्षक को दिया जाएगा|
  • दान देते समय दानग्रहीता का अस्तित्व में होना जरुरी है
  • अजन्मा जो गर्भ में आ चुका है उसके पक्ष में दान किया जा सकता है उसे एक समक्ष दानग्रहीता मना गया है किन्तु उसे दान करने की तिथि से छ: माह के अन्दर जीवित उत्पन्न होना चाहिए|
  • इस प्रकार दान की वैधता के लिए दानग्रहीता का धर्म, लिंग, आयु तथा मानसिक स्थिति आदि का कोई महत्व नहीं रहता है|
  • दानग्रहीता मुस्लिम, गैर-मुस्लिम स्त्री-पुरुष, वयस्क-अवयस्क, स्वस्थचित्त अथवा अस्वस्थचित्त मस्तिष्क का कोई भी व्यक्ति हो सकता है|
  • गैर-मुस्लिम, अवयस्क तथा पागल व्यक्ति के पक्ष में किया गया हिबा पूर्णतया वैध होता है|

 

निम्नलिखित हिबा शून्य होती है-

  1. अजन्मे व्यक्ति को हिबा- अजन्मे को हिबा शून्य होगा किन्तु यदि दान की तिथि से वह 6 माह के भीतर पैदा होता है तो यह माना जाएगा कि अस्तित्व में है तथा आदाता हो सकेगा, और दान मान्य होगा|
  2. भावी हिबा- अगले वर्ष में होने वाले फसल का हिबा|
  3. आकस्मिक हिबा – जो किसी अनिश्चित या समाश्रित घटना के घटने या न घटने पर दान की जाए क्योंकि यह सम्भावना, एक संयोग है जो घट भी सकती है नहीं भी| जैसे क द्वारा ख को आजीवन हिबा जो क के नि:सन्तान मरने पर ख के पक्ष में जाना निर्देशित है| यहाँ जहाँ तक ख का सम्बन्ध है घटनापेक्ष होने के कारण शून्य है|
  4. सशर्त हिबा- यदि शर्त उसे पूर्णया से नीचे लाये तो हिबा मान्य होगा तथा शर्त शून्य होगी| यह ऐसे प्रभाव में आएगी मानो शर्त लगी ही न, हो|
  5. आजीवन हित का हिबा|

 

  • हिबा का प्रतिसंहरण –
  1. कब्जे के परिदान के पूर्व- सम्पत्ति का कब्जा अदाता को देने के पूर्व दाता का निरपेक्ष अधिकार रहता है, कि वह दान का प्रतिसंहार कर सके|
  2. कब्जे के बाद- अदाता की सम्पत्ति से या न्यायलय की डिक्री से दान का प्रतिसंहरण किया जा सकेगा|

 

  • न्यायालय कब हिबा के प्रतिसंहरण की डिक्री नहीं देगा- निम्नलिखित दशाओं में न्यायलय दान के प्रतिसंहरण की डिक्री नहीं प्रदान करेगा तथा दान का अप्रतिसंहरणीय होगा-
  1. दाता की मृत्यु पर
  2. अदाता की मृत्यु पर
  3. जब दाता एवं अदाता निषिद्ध सम्बन्धी हों जैसे भाई और बहन के मध्य हुआ दान
  4. जब दान पति द्वारा पत्नी को या पत्नी द्वारा पति को किया जाए अर्थात विवाहित सम्बन्धी हो|
  5. जहाँ वह विनिमय के एवज में दी गई हो,
  6. जहाँ दान की विषयवस्तु के मूल्य में वृद्धि हो गई हो, और उन कीमत सम्बन्धी वृद्धि को उससे अलग न किया जा सके|
  7. जब दानग्रहीता ने विषयवस्तु का विक्रय, हिबा या अन्य रूप से अंतरण किया हो|
  8. जहाँ दानगत विषयवस्तु अपहचान योग्य हो गई हो, खो गई, नष्ट हो गई|
  9. जब दान सदका हो|

 

  • आवश्यक शर्ते-हिबा के आवश्यक शर्तें निम्न है-

इजब (प्रस्ताव)

  • दान की घोषणा से तात्पर्य है दानकर्ता द्वारा दानग्रहीता के पक्ष में सम्पत्ति को दान करने के मन्तव्य की अभिव्यक्ति|
  • दान की घोषणा मौखिक हो सकती है या लिखित|
  • मुस्लिम विधि के अंतरण दान की वैधता के लिए इसका लिखत अथवा रजिस्टर्ड होना आवश्यक नहीं है|
  • सम्पत्ति चाहे चल हो अथवा अचल, कम मूल्य की हो अथवा अत्यधिक मूल्य की, मात्र मौखिक घोषणा द्वारा ही इसका हिबा किया जा सकता है|
  • मैकनाटक के अनुसार हिबा विवक्षित नहीं हो सकता| इसे स्पष्ट तथा असंदिग्ध होना चाहिए तथा दानकर्ता का दान दी गई वस्तु को पूर्णतया त्याग करने के आशय का प्रदर्शन होना चाहिए|
  • यदि दानकर्ता स्वामित्व का कोई अधिकार बनाए रखना है तो दान शून्य होगा|
  • लिखित हिबा हिबानामा कहलाता है|
  • दान की घोषणा में दान की स्वेच्छा तथा स्वतंत्र सम्पत्ति आवश्यक है अन्यथा दान शून्य होगा| दान की घोषणा यदि बलपूर्वक, दबाव डालकर अथवा धोखा देकर करा ली गई हो तो दान शून्य होता है|

 

कबूल (स्वीकृति) – विधिमान्य दान की घोषणा के साथ हो इसकी स्वीकृति भी अनिवार्य है| दान की स्वीकृति न होने पर दान शून्य होगा|

  • किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध दान द्वारा कोई सम्पत्ति नहीं दी जा सकती है|
  • यदि पिता अपनी अवयस्क सन्तान को दान करता है तो ऐसी स्थिति में स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती है|

 

कब्जे का परिदान-

  • दान में कब्जे का परिधान अनिवार्य है|
  • दानकर्ता द्वारा दान की घोषणा तथा दानग्रहीता अथवा उसके संरक्षक की स्वीकृति के पश्चात सम्पत्ति का स्वामित्व तो दानग्रहीता में निहित हो जाता है परन्तु इसका वास्तविक लाभ, अर्थात उपभोग उसे तब तक नहीं मिल सकता जबतक कि वह सम्पत्ति का कब्जा न प्राप्त कर ले|
  • अत: मुस्लिम विधि निर्धारित करती है कि दान तब तक पूर्ण नहीं होता जब तक दानग्रहीता (या उसके संरक्षक) को सम्पत्ति का कब्जा न दे दिया जाए|
  • दान की पूरी प्रक्रिया में कब्जे का परिदान तीसरा और अंतिम चरण है| कब्जे के परिदान के पश्चात ही दान प्रभावी माना जाता है| इससे पहले यह अपूर्ण रहता है|
  • दाता द्वारा दान की गई सम्पत्ति का कब्जा अदाता को दिया जाए|
  • सम्पत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 123 के अनुसार स्थावर सम्पत्ति के दान की दशा में दान का रजिस्टर्ड होगा जरुरी होता है किन्तु यह प्रावधान मुस्लिम विधि में उल्लिखित हिबा के सन्दर्भ में लागू नहीं होता है अर्थात हिबा में दान का रजिस्टर्ड होना जरूरी नहीं होता है| केवल कब्जे का परिदान ही पर्याप्त होता है|

 

निम्नलिखित दशाओं में कब्जे का परिदान आवश्यक नहीं होता-

  1. पिता, माता या संरक्षक द्वारा अपने अवयस्क या विकृतचित्त सन्तान को हिबा किये गये की दशा में,
  2. जहाँ दानगत विषयवस्तु में दाता एवं अदाता एक साथ रहते हों, जैसे माता द्वारा पुत्री को दिया गया दान,
  3. पति द्वारा पत्नी को या पत्नी द्वारा पति को स्थावर सम्पत्ति का हिबा,
  4. न्यासधारी, बन्धकी तथा उपनिहिती को किया गया हिबा,
  5. आंशिक परिदान,
  6. जमींदारों के ग्राम,
  7. किरायेदार के अधिभोग में रहने वाली सम्पत्ति का हिबा,
  8. अमूर्त अधिकार,

 

दान की विषयवस्तु क्या हो सकती है?

  1. मूर्त सम्पत्ति- स्थावर सम्पत्ति यथा मकान, धन या भूमि (भौतिक अस्तित्व जिनका है) आदि|
  2. अमूर्त सम्पत्ति- बंधक या मोचन का अधिकार, ऋण वसूल करने का अधिकार आदि,

 

  • दिये गये निर्णयों के अनुसार – निम्नलिखित सम्पत्तियां दान की विषयवस्तु हो सकती है-
  1. ऋण वसूल करने का अधिकार
  2. भू-राजस्व वसूल करने का अधिकार
  3. बंधक मोचन का अधिकार
  4. मेहर
  5. आजीवन हित
  6. सरकारी प्रतिभूतियाँ आदि
  7. धन (माल) आदि|
  • हिबा उस सम्पत्ति का हो सकता है या होगा जो वर्तमान में अस्तित्व में हो, ऐसी सम्पत्ति का हिबा नहीं होगा जो भविष्य में अस्तित्व में आयेगी|

 

हिबा के प्रकार-

  • हिबा निम्नलिखित प्रकार का होता है-
  1. हिबा
  2. हिबा-विल-एवज
  3. सदका
  4. अरियत

 

हिबा-विल-एवज –

  • मुस्लिम विधि में हिबा से तात्पर्य है बिना प्रतिफल या प्रतिकर रहित दान अर्थात दाता द्वारा अदाता को दान के बदले कोई वस्तु नहीं दिया जाना चाहिए|
  • किन्तु हिबा-विल-एवज दान के उक्त स्वरूप के विपरीत अपना रुख रखता है अर्थात इसमें दाता अपने द्वारा दान की गई सम्पत्ति के बदले में अदाता से प्रतिफल लेता है|
  • इस प्रकार यह एक प्रकार से पारस्पिक दानों का एक संव्यवहार गठित करता है|
  • हिबा-विल-एवज एक प्रकार से विक्रय भी हुआ करता है क्योंकि इसमें विक्रय की संविदा की सारी प्रसंगतियाँ पायी जाती है, इसमें अदाता स्वेच्छया में दाता को उसके द्वारा किये गये दान के एवज में सम्पत्ति देता है|

 

हिबा-व-शर्तुल-एवज –

  • हिबा-व-शर्तुल-एवज- शर्त का अर्थ है ‘अनुबंध’|
  • ‘हिबा व शर्तुल’ एवज का अर्थ है – अनुबंध के साथ किसी प्रतिफल के लिए किया गया हिबा|
  • जहाँ कोई दान इस शर्त के साथ किया जाता है कि दानग्रहीता इस दान के उपलक्ष्य में दाता को कोई निश्चित सम्पत्ति प्रदान करेगा तो ऐसे संव्यवहार को हिबा-व-शर्तुल एवज खा जाता है|
  • यधपि हिबा-विल-एवज एवं हिबा-व-शर्तुल एवज के बीच लगभग शब्दसाम्यता दृष्टिगोचर होती है किन्तु दोनों के मध्य अन्तर है| चूंकि प्रतिफल इसमें तत्काल नहीं दिया जाता इसलिए हिबा-व-शर्तुल एवज में कब्जे का परिदान आवश्यक होता है तथा दाता एवं अदाता के मध्य शर्तस्वरूप संविदा हुआ करती है|

 

सदका

  • यह धार्मिक दान हुआ करता है इसमें भी कब्जे का परिदान आवश्यक होता है|
  • जिस प्रकार हिबा एवं हिबा-व-शर्तुल एवज में सम्पत्ति में मुशा (अविभाज्य हिस्सा) का दान अमान्य होता है उसी प्रकार सदका में भी मुशा का दान अमान्य होता है|
  • सदका व हिबा में मूलभूत अंतर यह है कि सदका का उद्देश्य एवं प्रयोजन जहाँ धार्मिक होता है वहीँ हिबा का प्रयोजन सांसारिक होता है|
  • सदका में जहाँ काय एवं लाभ दोनों का उपभोग किया जा सकता है वहीं यदि हिबा वक्फ को किया गया है तो केवल लाभ का उपभोग किया जा सकेगा न कि काय का, क्योंकि काय ईश्वर में निहित हो जाया करती है|

 

अरियत

  • अरियत में स्वामित्व का अंतरण नहीं किया जाता अर्थात लाभ का अंतरण किया जाता है| कब्जे का परिदान जरुरी होता है| एक निश्चित समय के लिए किया जाता है| यह दाय योग्य नहीं होता है|

 

आजीवन हिबा

  • आजीवन हित का हिबा शिया विधि में मान्य होता है तथा मुस्लिम धर्म के अन्य सम्प्रदायों में नहीं क्योंकि सुन्नी विधि में आजीवन हित पूर्ण दान के रूप में प्रभावी होता था किन्तु शेख मस्तान बनाम शेखभिकारी साहब के मामले में दिए गये विनिश्चय से अब आजीवन हित का हिबा मुस्लिम धर्म के सभी सम्प्रदाय के लोगों में मान्य एवं प्रभावी होता है चाहे वह शिया हो या सुन्नी आदि|
  • आजीवन हित के हिबा का स्रोत नवाजिश अली खां बनाम अलीरजा खां, A.I.R. 1945 P.C. का वाद है|
  • सम्पत्ति शब्द में सम्पत्ति का काय एवं उसका फ़लोपभोग अर्थात लाभांश दोनों शामिल होता है किन्तु विधि की तकनीकी दृष्टि से काय एवं लाभांश को अलग किया जा सकता है| उपर्युक्त वाद में प्रिवी कौंसिल ने यह व्यवस्था दी कि आजीवन हित का हिबा मान्य एवं प्रभावी होगा तथा दानकर्ता लाभांश का सीमित समय के लिए किसी व्यक्ति को दान कर सकता है किन्तु वह एसे लाभांश

का पूर्ण स्वामी होगा तथा उसके मरने के बाद या परिसीमित समय, यथा स्थिति लाभांश पुनः दाता के पास वापिस हो जायेगा|

  • आजीवन हित के हिबा में सम्पत्ति  के कार्य  का परिसीमित समय के लिए अंतरण नित तो सकता| नवाजिश अली बनाम अली खां, A.I.R.1948 P.C के प्रकरण में निम्नलिखित दो

बिन्दुओं पर विनिश्चय दिया गया –

  1. क्या आजीवन हित का हिबा मान्य व प्रभावी होगा,
  2. सम्पत्ति में निहित शेष के संकल्प के बारे में,

 

  • प्रिवी काउन्सिल ने उपयुक्त दोनों प्रश्नों का विनिश्चय करते हुए कहा की मुस्लिम विधिमें अर्थात शिया विधि में आजीवानाहितका हिबा मान्य होता है तथा निहित शेष की संकल्पना अमान्य होगी| निहित शेष से तात्पर्य यह है क, ख, ग, घ को  आजीवनाहित  का हिबा  करता है तथा अंतिम उत्तरजीवी अदाता को यह अधिकार देता है की वह दानगतविश्य्वाशु की लिए अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर सकेगा तो वह ऐसा नही कर सकता है|
  • प्रिवी कौंसिल द्वारा दिए गए विनिश्चय का अनुसरण अंजुमन आरा बनाम आसिफ कदार A.I.R. 1955 में किया गया तथा यह का गया की आजीवन हित का हिबा शिया विधि में मान्य है किन्तु शिया विधी की यह परिकल्पना मुस्लिम संप्रदाय के अन्य संप्रदायों में लागु होने लगी है|
  • आजीवन हित का हिबा कैसे किया जा सकता है?
  • निम्नलिखित तरीके से आजीवन हित का हिबा किया जा सकता है –
  1. 1. वक्फ-ए-अलल-औलाद (परिवारिक वक्फ )
  2. 2. वसीयती वक्फ
  3. 3. आय को अपने लिए आरक्षित करते हुए काये करते हुए

 

 

बहुविकल्पीय प्रश्न 

 

  1. हिबा के बारे में क्या असत्य है?

A. हिबा दो जीवित व्यक्तियो के बीच सम्पत्ति का अंतरण है

B. हिबा तुरन्त प्रभावी होने वाला अंतरण है

C. भविष्य की सम्पत्ति का हिबा मान्य होता है

D. हिबा प्रतिफल रहित अंतरण है

 

  1. हिबा के बारे में क्या सही नहीं है?

A. दान की घोषणा मौखिक या लिखित हो सकती है

B. दान की वैधता के लिए इसका लिखित अथवा रजिस्टर्ड होना आवश्यक है

C. दान की स्वीकृति न होने पर दान शून्य होगा

D. दान ग्रहीता गैर मुस्लिम भी हो सकता है

 

  1. वैध दान के लिए क्या अनिवार्य है?

A. दानकर्ता वयस्क हो,

B. दानकर्ता स्वस्थचित्त हो,

C. दानकर्ता मुस्लिम हो,

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. हिबा के बारे में क्या सही नहीं है?

A. सम्पत्ति नहीं दी जा सकती

B. दान ग्रहीता अवयस्क है तो स्वीकृति संरक्षक द्वारा दी जा सकती है

C. पिता द्वारा अपने अवयस्क पुत्र को दान की दशा में हिबा की स्वीकृति आवश्यक होती है

D. गैर-मुस्लिम, अवयस्क तथा पागल को किया गया हिबा पूर्णत: विधिमान्य होता है

 

  1. हिबा के बारे में क्या सही है?

A. गर्भस्थ शिशु एक सक्षम दान ग्रहीता होता है

B. गर्भस्थ शिशु के पक्ष में हिबा वैध है बशर्तें वह दान करने की तिथि से 6 माह के भीतर पैदा हो

C. दान की घोषणा के समय जो गर्भ में न हो उसके पक्ष में किया गया दान प्रारम्भत: शून्य होता है

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. अवयस्क तथा पागल सक्षम दानग्रहीता होता है किन्तु उनकी ओर से स्वीकृति देने के लिए वरीयता क्रम में कौन व्यक्ति संरक्षक माने गये हैं-

A. पिता तथा पिता का निष्पादक

B. पितामह तथा पितामह का निष्पादक

C. क और ख दोनों सही है

D. उपर्युक्त में से सभी असत्य है

 

  1. विधि मान्य हिबा की अनिवार्य शर्तें है-

A. दान की घोषणा

B. दान की स्वीकृति

C. सम्पत्ति के कब्जे का परिदान

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह कहा कि दान की गयी सम्पत्ति किसी अतिचारी के अवैध कब्जे में हो और स्वयं दानकर्ता का उस पर कब्जा न हो तो भी मात्र घोषणा तथा स्वीकृति से दान वैध नहीं होगा ऐसी दशा में दानकर्ता को या तो वास्तविक कब्जा प्रदान कर देना चाहिए अथवा कोई भी ऐसा कार्य कर देना चाहिए जिससे दान ग्रहीता उससे कब्जा प्राप्त कर सकने की स्थिति में आ जाए-

A. मकबूल आलम खां ब. मुसम्मात खदीजा

B. आगा मुहम्मद जफ़र ब. कुलसुम बीबी

C.  वाई. एस. चेन ब. बातुल वाई

D. मुहम्मद अयूब ब. अमीर खां

 

  1. निम्नलिखित वादों में से कौन-सा वाद हिबा से सम्बन्धित है-

A. कथीसा उम्मा ब. नरयनाथ कुन्हामू

B. सादिक हुसैन ब. हाशिम अली

C. अमीना बीबी ब. खतीजा बीबी

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. निम्न में से कौन-सा कथन असत्य है-

A. मेहर का दान वैध है

B. बीमा पालिसी का हिबा वैध है

C. बंधक मोचन की साम्या का हिबा वैध है

D. भावी सम्पत्ति का दान व उत्तराधिकार की सम्भावना का हिबा वैध है

 

  1. हिबा की दशा में कब्जे का परिदान आवश्यक नहीं होता है-

A. जब दानकर्ता तथा दानग्रहीता दान में दिए गये मकान में रहते हो

B. पति-पत्नी द्वारा परस्पर एक-दूसरे को किया गया दान

C. दान की विषय-वस्तु जब स्वयं दानग्राही के कब्जे में हो

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. निम्न के बारे में क्या असत्य है?

A. मुशा शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा शुयू अ से हुई है

B. मुशा से तात्पर्य है संयुक्त सम्पत्ति का अविभाजित हिस्सा

C. हनफी विधि शास्त्रियों ने मुशा के सिद्धांत का विकास किया

D. मुशा का सिद्धांत शिया विधि में मान्य है

 

  1. विभाजन योग्य संयुक्त सम्पत्ति के दान में हनफी विधि का मुशा का सिद्धांत लागू नहीं होगा-

A. किसी सह-उत्तराधिकारी को मुशा का दान

B. जमींदारी के किसी हिस्से का दान

C. किसी भू-कम्पनी के शेयर का दान

D. उपर्युक्त सभी में

 

  1. आजीवन (सम्पदा) का दान के बारे में क्या सही है?

A. आजीवन हित का हिबा शिया विधि में मान्य है

B. शिया विधि के इस नियम का स्रोत नवाजिश अली खां ब. अली रजा खां का वाद

C. शेख मस्तान ब. शेख बिकारी साहब के मामले में दिए गये निर्णय से आजीवन हित का हिबा सभी मुस्लिम सम्प्रदाय में लागू है चाहे शिया हो या सुन्नी

D. उपर्युक्त सभी

 

  1. निम्न में से क्या असत्य है?

A. हिबा विक्रय की संविदा होती है

B. हिबा-बिल-एवज विक्रिय की संविदा है

C. हिबा-विल-एवज में बदले में प्रतिफल दाता, आदाता से लेता है

D. हिबा-ब-शर्तुल-एवज में कब्जे का परिदान जरूरी होता है

 

  1. निम्न में से क्या असत्य है?

A. सदका का उद्देश्य ईश्वर को प्रसन्न करना है

B. अरियत प्रतिफल रहित अस्थायी अनुदान है

C. अरियत दानकर्ता द्वारा कभी भी निरस्त किया जा सकता है

D. अरियत अन्तरण योग्य और दाय योग्य है

 

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  • विधि अवयस्क के कार्य को विधिक मान्यता नहीं प्रदान करती क्योंकि अवयस्क विधि की नजर में स्वतंत्र निर्णय लेने में असमर्थ होता है तथा किये गये कार्य के विधिक प्रभाव को जानने में असमर्थ हुआ करता है|

वयस्कता के सन्दर्भ में आयु सीमा जो विध के अन्तर्गत नियत की गयी है-

  • मुस्लिम विधि में 15 वर्ष का होने पर वयस्क माना जायेगा निम्न मामलों में – विवाह, विच्छेद-विच्छेद, मेहर

भारतीय वयस्कता अधिनियम 1875 की धारा 3 के अनुसार-

  • 18 वर्ष की दशा में तथा संरक्षक व प्रतिपाल्य अधिनियम 1890 के अनुसार- 21 वर्ष की अवस्था को वयस्क की अवस्था मानी गयी है| विवाह, विवाह विच्छेद व मेहर को छोड़कर अन्य मामलों में|
  • मुस्लिम विधि के अवयस्क के संरक्षक अलग-अलग होते हैं जो इस प्रकार से हैं-
  1. सम्पत्ति के संरक्षक,
  2. शरीर के संरक्षक एवं
  3. विवाह के संरक्षक|

अवयस्क के सम्पत्ति के संरक्षक

  • संरक्षक के प्रकार –
  1. नैसर्गिक संरक्षक
  2. वसीयती संरक्षक
  3. न्यायालय द्वारा नियुक्त संरक्षक
  4. तदर्थ संरक्षक
  • नैसर्गिक संरक्षक –
  1. पिता
  2. पिता का निष्पादक
  3. पितामह
  4. पितामह का निष्पादक
  5. नैसर्गिक संरक्षक के अधिकार- स्थावर सम्पत्ति का विक्रय नहीं कर सकेगा केवल असामान्य परिस्थितियों में विक्रय कर सकेगा| जैसे-
  • सम्पत्ति को बेचने से दो गुना आय मिले|
  • सम्पत्ति नष्ट हो रही हो|
  • सम्पत्ति दूसरे के कब्जे में है और उससे कब्जा आसानी से प्राप्त नहीं किया जा सकता है|
  • उस सम्पत्ति पर आय से अधिक व्यय हो रहा हो (देख रेख में)|
  • ऐसा ऋण जो मृतक द्वारा लिया गया है तथा अवयस्क द्वारा देय है|
  • अवयस्क के भरण पोषण के लिये बन्धक करने का अधिकार संरक्षक को है|
  • सम्पत्ति की रक्षा के लिये|
  • संरक्षक को स्थावर सम्पत्ति का पट्टा निम्न दशाओं में करने का अधिकार है|
  • भरण-पोषण के लिये|
  • हकशुफा का वाद लाने का अधिकार
  • अवयस्क का संरक्षक अवयस्क की जंगम सम्पत्ति का अवयस्क की शिक्षा, स्वास्थ्य व भरण पोषण के लिये बेच सकता है|
  1. न्यायालय द्वारा नियुक्त संरक्षक- यदि नैसर्गिक संरक्षक नहीं है तो न्यायालय यदि उचित समझता है तो अवयस्क के कल्याण के लिये वसीयती संरक्षक नियुक्त कर सकेगा इसे परनियमित संरक्षक भी कहते हैं| यदि न्यायालय द्वारा संरक्षक नियुक्त किया जाता है तथा इस सन्दर्भ में मुस्लिम विधि तथा संरक्षक व प्रतिपाल्य अधिनियम 1890 के मध्य मतभेद है तो संरक्षक व प्रतिपाल्य अधिनियम के प्रावधान लागू होंगे|
  • संरक्षक व प्रतिपाल्य अधिनियम के अनुसार निम्न लोग संरक्षक बनने हेतु आवेदन कर सकेंगे-
  1. संरक्षक बनने के इच्छुक व्यक्ति
  2. अवयस्क का संबंधी व रिश्तेदार
  3. कलेक्टर (राज्य सरकार के प्रतिनिधि के रूप में)
  • न्यायालय संरक्षक नियुक्त करते समय निम्न बिन्दुओं पर विचार कर सकेगा-
  1. आयु, लिंग व धर्म
  2. आवेदक की योग्यता
  3. आवेदक का चरित्र
  4. अवयस्क के साथ आवेदक का संबंध
  5. मृत माता पिता की इच्छा
  6. वसीयती संरक्षक – पिता व पितामह वसीयती संरक्षक नियुक्त कर सकते हैं, जो व्यक्ति

संरक्षक नियुक्त किया जायेगा वह वयस्क हो एवं स्वस्थचित्त हो| वसीयती संरक्षक गैर मुस्लिम एवं महिला भी नियुक्त हो सकती है किन्तु शिया विधि के अनुसार गैर मुस्लिम वसीयती संरक्षक नहीं हो सकता है|

  1. तदर्थ संरक्षक- वह विधि द्वारा मान्य संरक्षकों की सूची में नहीं आता है| यह ऐसा संरक्षक होता है जो स्वयं अपने को अवयस्क के शरीर व सम्पत्ति का संरक्षक घोषित कर देता है|

शरीर के संरक्षक (विलायत-ए-नफ्श)

  • संरक्षक व अभिरक्षा शब्द पर्यायवाची नहीं है इन दोनों शब्दों में मूलभूत अन्तर है| संरक्षकता की स्थिति में अवयस्क के पूरे अवयस्कता के समय तक उसके शरीर पर देखभाल करने का नैसर्गिक संरक्षक का अधिकार हुआ करता है किन्तु अभिरक्षा की स्थिति में बच्चा एक नियत समय तक माँ की अभिरक्षा में रहता है| भले ही वह नैसर्गिक संरक्षक न हो|
  • हनफी विधि में माँ की हिजानत-
  • पुत्र के सन्दर्भ में 7 वर्ष
  • पुत्री के सन्दर्भ में 15 वर्ष तक| शफी एवं मलिकी विधि में माँ लड़की के विवाह तक उसके संरक्षण की हकदार होती है|
  • शिया विधि के अनुसार माँ की हिजानत- 2 वर्ष – पुत्र के संदर्भ में, 7 वर्ष पुत्री के संदर्भ में|

 

माँ को शिशु की अभ्रक्षा इसलिए दी गई  है, कि प्राकृतिक नियम के अनुसार शिशु माँ के साथ गर्भावस्था से ही रहता है तथा उसके जन्म लेने के बाद वह उसे दुग्धपान कराती है तथा उसकी देखभाल तत्परता व तल्लीनता से करती है|

निम्नलिखित दशाओं में माता की हिजानत बनी रहेगी-

  1. माता के विधवा एवं तलाकशुदा होने पर किन्तु उसके पुनर्विवाह करने पर हिजानत समाप्त हो जायेगी,
  2. माता अपने इस अधिकार का परित्याग नहीं कर सकती|
  3. यदि माँ धर्म परिवर्तन कर दे तो भी अभिरक्षा बनी रहेगी,
  4. यदि माँ पालन-पोषण के लिये आर्थिक रूप से असमर्थ है तो भी यह अधिकार बना रहेगा, पिता को इस दशा में सारी सुविधा उपलब्ध कराना होगा|

पिता वसीयती संरक्षक नियुक्त करके माता के हिजानत के अधिकार को नहीं ले सकता है|

  • निम्नलिखत दशाओं में माता की हिजानत समाप्त हो जायेगी-
  1. यदि माता पुनर्विवाह कर लेती है|
  2. यदि माँ परपुरुष गमन की हो|
  3. यदि अनैतिक जीवन बिता रही है|
  4. यदि माँ पिता से बहुत दूर बच्चे को लेकर रह रही हो|
  5. यदि माँ बच्चे के अच्छे देखभाल में असावधानी या उपेक्षा बरतती है|
  6. यदि वह निषिद्ध आसत्तियों के भीतर के अवयस्क के रिश्तेदार से विवाह न करे (अर्थात् अजनबी से करे)
  • यदि माँ अयोग्य हो जाती है या मर जाती है तो उस स्थिति में 7 वर्ष से कम आयु के बालक और यौवनावस्था को न प्राप्त हुई बालिका का हिजानत निम्न स्त्री सम्बन्धियों में निहित होगी-
  1. माँ की माँ (नानी) चाहे जितनी पीढ़ी ऊपर हो
  2. पिता की माँ चाहे जितनी पीढ़ी ऊपर हो
  3. सगी बहन
  4. सहोदरा बहन
  5. सगोत्री बहन
  6. सगी बहन की लड़की
  7. सहोदर बहन की लड़की
  8. सगोत्री बहन की लड़की
  9. माता की बहन (मौसी) बहिनों के समान क्रम में,
  10. पिता की बहन (बुआ) बहिनों के समान क्रम में,

उपर्युक्त सूची वरीयता क्रम से चलेगी|

  • पिता की हिजानत में अवयस्क कब माना जायेगा-
  • प्रारंभिक अवस्था में- पुत्र 7 वर्ष से कम है तथा, पुत्री 15 वर्ष से कम है तो यदि महिला एवं महिला के संबंधी मत गये हों, या अयोग्य हों तो पिता के हिजानत में अवयस्क माना जायेगा|
  • द्वितीय अवस्था – पुत्र की उम्र 7 वर्ष से अधिक होने पर, पुत्री की उम्र 15 वर्ष से अधिक होने पर|
  • पिता प्राकृतिक संरक्षक होने के कारण उनकी हिजानत में पुत्र/पुत्री हो जाते हैं|
  • यदि पिता अयोग्य हो जाता है या मर जाता है तो संतान पिता के निम्नलिखित संबंधियों के हिजानत में माने जायेंगे
  1. पितामह,
  2. सगा भाई
  3. सगोत्री भाई
  4. सगा भाई का लड़का
  5. सगोत्री भाई का लड़का
  6. पिता का सगा भाई
  7. पिता का सगोत्री भाई
  8. पिता के सगे भाई का लड़का
  9. पिता का सगोत्री भाई का लड़का
  • यदि पिता पुनर्विवाह कर लेता है तो संतान को अपने हिजानत में रखने से अयोग्य नहीं हो जायेगा|
  • अयोग्यता का निर्धारण अवयस्क के हित को देखते हुए किया जायेगा किन्तु कोई विधवा महिला या तलाकशुदा महिला पुनर्विवाह करती है तो वह हिजानत के अधिकार को खो देगी|
  • यदि पिता व पिता के उपर्युक्त संबंधी मर जाते है या अयोग्य हो जाते है तो संरक्षक व प्रतिपाल्य अधिनियम 1890 के अनुसार, न्यायालय (जिला न्यायाधीश) अवयस्क के शरीर का संरक्षक नियुक्त कर सकता है|

 

विलायत-ए-जबर (विवाह के संरक्षक)

  • यदि विवाह के संरक्षक के बिना अवयस्क व विकृतचित्त का विवाह कराया जाता है तो विवाह अमान्य होगा|
  • संरक्षक द्वारा कराया गया विवाह शून्य न होकर शून्यकरणीय होता है अर्थात् अवयस्क वयस्क होकर और अस्वस्थचित्त स्वस्थचित्त होकर विवाह को चाहे प्रवर्तित कराये या उसे शून्य घोषित करा दे|
  • विवाह के संरक्षक के संबंध में मुस्लिम विधि ही लागू होगी| संरक्षक व प्रतिपाल्य अधिनियम द्वारा विवाह के लिये संरक्षक की नियुक्ति नहीं की जा सकती है|
  • निम्न लोग विवाह के संरक्षक हो सकते हैं-
  1. पिता, 2. पितामह, 3. भाई, 4. मातृ, 5. मातृपक्ष के संबंधी – मामा, मौसी अन्य, 6. न्यायालय.
  • शिया विधि में विवाह के संरक्षक-
  1. पिता, 2. पितामह,
  • धर्म परिवर्तन पर पिता का विवाह की संरक्षकता पर प्रभाव- जाति निर्योग्यता अधिनियम के अनुसार यदि कोई व्यक्ति अपना धर्म बदल देता है तो उसके अधिकार समाप्त नहीं हो जाते हैं|
  • मोहिन बीवी 1874 न्यायमूर्ति मैकफर्सने – इसमें बम्बई उच्च न्यायालय ने यह कहा कि यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति अपना धर्म परिवर्तन कर देता है तो वह अपनी अवयस्क पुत्री के विवाह की संरक्षकता के अधिकार को खो देता है|
  • गुल मोहम्मद बनाम मुसम्मात वजीर 1901 के मामले में यह कहा गया कि धर्म पर्तिवर्तन से कोई मुस्लिम व्यक्ति विवाह की संरक्षकता के अधिकार को नहीं खो देता है|

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  • वसीयत अपनी सम्पत्ति के बारे में विधिक अधिकार की घोषणा है जो वसीयतकर्ता अपनी मृत्यु के बाद क्रियान्वित कराना चाहता है|
  • अमीर अली के अनुसार- वसीयत एक दैवी कृत्य है, जो कुरान से नियंत्रित होता है| यह 0उत्तराधिकार से रहित अपने संबंधियों को उत्तराधिकारी बनाने तथा अजनबी व्यक्ति को अपनी सेवा करने के बदले में प्रत्युपकार करने का तथा अपने जीवन के अन्तिम समय में सेवा, सुश्रुषा करने वाले व्यक्ति का प्रत्युपकार करने का अवसर प्रदान करती है|
  • यदि कोई हिन्दू एपीआई सम्पत्ति वसीयत करता है, या कोई मुस्लिम अपनी सम्पत्ति वसीयत करता है तो ऐसी स्थिति में वह अपनी निजी विधियों से अधिशासित होगा (वसीयत संबंधी विषयों के बारे में)|
  • कोई पक्षकार चाहे वह किसी धर्म का हो यदि उसका विवाह विशेष विवाह अधिनियम 1954 के अधीन हुआ है तो ऐसा विवाहित व्यक्ति अपनी संपत्ति की वसीयत करता है तो ऐसी वसीयत के बारे में वह भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 में विहित वसीयती प्रावधानों से अधिशासित होगा|
  • लगभग प्रत्येक विधि में वसीयत को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है तथा यह विहित किया गया है, वसीयत उत्तराधिकार पर अधिभूत (Prevail) करेगी अर्थात् वसीयत द्वारा उत्तराधिकारियों को उत्तराधिकार में संपत्ति पाने से वंचित किया जा सकता है या दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि वसीयत द्वारा उत्तराधिकार के अधिकार को परिसीमित किया जा सकता है| किन्तु समस्त विधियों में मुस्लिम विधि इस मामले में सबसे विलक्षण है|
  • कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति के 1/3 भाग से अधिक संपत्ति की वसीयत उत्तराधिकारियों की अनुमति के बिना नहीं कर सकता है अर्थात् 1/3 भाग तक ही वसीयत कर सकता है|
  • ऐसा प्रावधान इसलिए किया गया है कि जिससे उत्तराधिकारियों को अपनी जीविका चलाने में सुविधा हो सके और वह भुखमरी का शिकार न हो सके|
  • सुन्नी तथा शिया दोनों विधियों में समान नियम यह है कि सम्पत्ति के तिहाई भाग तक की वसीयत के लिए वसीयतकर्ता को अप्रतिबन्धित वसीयती अधिकार प्राप्त है|
  • किसी गैर उत्तराधिकारी वसीयतदार के पक्ष में 1/3 सम्पत्ति तक की वसीयत में उत्तराधिकारियों की सहमति अनिवार्य नहीं है| 1/3 से अधिक सम्पत्ति की वसीयत में उत्तराधिकारियों की सम्मति आवश्यक है|
  • दूसरे शब्दों में सुन्नी तथा शिया दोनों विधियों में किसी गैर उत्तराधिकारी के पक्ष में की गई 1/3 से अधिक की वसीयत बिना वसीयतकर्ता के उत्तराधिकारियों की सहमति लिए प्रभावी नहीं होती है|
  • इस सन्दर्भ में निम्नलिखित नियम उल्लेखनीय है-
  1. यदि वसीयतकर्ता ने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति किसी गैर उत्तराधिकारी के पक्ष में कर दी हो तथा उसके उत्तराधिकारियों ने वसीयत की सहमति प्रदान कर दी है तो वसीयतदार को संपूर्ण सम्पत्ति प्राप्त हो जाएगी|
  2. यदि उत्तराधिकारीगण पूरी वसीयत से ही इंकार कर दे तो भी वसीयतदार को संपत्ति का 1/3 भाग जरूर मिलेगा क्योंकि प्रत्येक मुस्लिम को किसी गैर उत्तराधिकारी के पक्ष में अपनी संपूर्ण सम्पत्ति का 1/3 भाग वसीयत द्वारा हस्तांतरित कर देने का अप्रतिबन्धित अधिकार है|
  3. यदि उत्तराधिकारीगण अपनी सहमति 1/3 से कुछ अधिक तथा 1/2 अथवा 2/3 आदि के लिए कर दें तो संपत्ति के जितने भाग के लिए इनकी सहमति है उतना भाग वसीयतदार को मिल जाएगा|
  • वसीयत की गई संपत्ति की मात्रा कुछ भी हो, वसीयतदार यदि वसीयतकर्ता का उत्तराधिकारी है तो उसके पक्ष में की गई वसीयत की वैधता के लिए अन्य उत्तराधिकारियों की सम्मति अनिवार्य है अर्थात् 1/3 से कम संपत्ति भी यदि किसी उत्तराधिकारी के पक्ष में वसीयत की जाय तो वसीयतकर्ता के अन्य उत्तराधिकारीगण जब तक अपनी सम्मति नहीं प्रकट कर देते वसीयत प्रभावी नहीं होती है|
  • शिया विधि के अन्तर्गत उत्तराधिकारी तथा गैर उत्तराधिकारी के पक्ष में की गई वसीयतों में कोई अन्तर नहीं है|
  • शिया मुस्लिम द्वारा की गई किसी उत्तराधिकारी के पक्ष में 1/3 भाग तक की वसीयत में अन्य उत्तराधिकारियों की सहमति अनिवार्य नहीं है जो नियम किसी गैर उत्तराधिकारी के पक्ष में की गई वसीयत का है वही नियम उत्तराधिकारी के पक्ष में 1/3 भाग से अधिक की वसीयत में लागू होता है अर्थात् अन्य उत्तराधिकारियों की सहमति 1/3 से अधिक होने पर ही आवश्यक है|
  • वसीयत व हिबा में अन्तर- निम्नलिखित अन्तर है-
  1. हिबा में हिबा करते समय सम्पत्ति का अस्तित्व में होना जरूरी है, जबकि वसीयत में ऐसा नहीं है| वसीयत में वसीयतकर्ता की मृत्यु के समय संपत्ति का अस्तित्व में होना आवश्यक है|
  2. हिबा में कब्जे का परिदान आवश्यक शर्त होता है जबकि वसीयत में नहीं क्योंकि वसीयत वसीयतकर्ता के मरने के बाद प्रभावी होता है|
  3. हिबा में मुसा का सिद्धान्त लागू होता है (हिबा के कुछ प्रकारों में) जबकि वसीयत में यह सिद्धान्त लागू नहीं होता है|
  4. हिबा प्रसिंहरणीय तब तक नहीं होता जब तक न्यायालय द्वारा यथाविधि डिक्री प्रतिसंहरण के बारे में न प्राप्त कर ली गयी हो जबकि वसीयत प्रसिंहरणीय हुआ करता है|
  5. हिबा में हिबाकर्ता को अपनी संपत्ति की हिबा करने के बारे में कोई परिसीमायें नहीं है तथा इस बारे में उसे निरपेक्ष अधिकार होता है तथा वसीयत में वसीयतकर्ता को वसीयत करते समय कुछ परिसीमाओं का अनुपालन करना पड़ता है अर्थात् वह अपनी संपत्ति के 1/3 हिस्से से अधिक की वसीयत नहीं कर सकता (बिना उत्तराधिकारियों की सम्मति के)|

वसीयत करता द्वारा आत्म हत्या का प्रयास

  • शिया विधि के अन्तर्गत यदि किसी वसीयतकर्ता ने आत्महत्या का प्रयास करने के बाद वसीयत की हो तो वसीयत शून्य होगी|
  • जैसे यदि कोई शिया मुस्लिम आत्म हत्या करने के उद्देश्य से विषपान कर लेता है अथवा गम्भीर रूप से अपने को घायल कर लेता है और मृत्यु के पूर्व किसी तरह वसीयत भी कर जाता है तो वसीयत शून्य मानी जाएगी क्योंकि आत्महत्या का प्रयास कर चुकने पर उसकी मानसिक दशा एक सामान्य स्वस्थचित्त वाले व्यक्ति की तरह नहीं रह जाती|
  • सम्भावना यह रहती है कि वसीयत करते समय वसीयतकर्ता की स्वस्थचित्तता वाली अनिवार्य शर्त का पालन विधिवत् नहीं हुआ है|
  • परन्तु सुन्नी विधि में आत्म हत्या का प्रयास करने के बाद की गई वसीयत पूर्णतः वैध मानी गयी है|
  • वसीयतकर्ता यदि आत्म हत्या के प्रयास के पूर्व ही वसीयत कर देता है तो वसीयत शिया तथा सुन्नी दोनों विधियों के अन्तर्गत वैध मानी जाएगी|

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  • जनकता तात्पर्य है संतान का ‘पिता व माता’ के साथ विधिक संबंध| भरणपोषण एवं उत्तराधिकार के बारे में पितृत्व व मातृत्व का महत्वपूर्ण स्थान हुआ करता है|
  • सुन्नी विधि के अनुसार अधर्मज संतान का मातृत्व स्थापित रहता है अर्थात् वह अपनी माँ से सम्पत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त कर सकता है किन्तु पितृत्व स्थापित नहीं होता है अर्थात् अधर्मज संतान पिता से उत्तराधिकार में सम्पत्ति नहीं प्राप्त कर सकेगा|
  • किन्तु शिया विधि में अधर्मज संतान का मातृत्व व पितृत्व दोनों मान्य नहीं होता| इस विधि में अधर्मज संतान पिता व माता से सम्पत्ति उत्तराधिकार में नहीं प्राप्त करेंगे अर्थात् अधर्मज संतान व माता-पिता के बीच विधिक संबंध नहीं स्थापित हो पाता|
  • मातृत्व तथ्यगत हुआ करता है जबकि पितृत्व उपधारणाजन्य होता है|
  • मातृत्व इसलिए तथ्यगत हुआ करता है कि किसी संतान का जन्म किस माता से हुआ करता है, यह स्पष्ट होता है किन्तु पितृत्व के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है, इसीलिए इसे उपधारणाजन्य कहा जाता है|

संतान कब धर्मज मानीं जायेगी-

विवाह के बाद की स्थिति-

  1. विवाह के बाद 6 मास के अन्दर पैदा होने पर संतान अधर्मज माने जायेंगे| जब तक पिता अभिस्वीकृति न कर दे|
  2. विवाह के 6 माह बाद उत्पन्न संतान धर्मज होंगे जब तक पिता अभिस्वीकृति द्वारा इन्कार न कर दे|

विवाह विच्छेद के बाद स्थिति- विवाह-विच्छेद के बाद निम्न स्थितियों में जन्म लेने वाले संतान धर्मज माने जायेंगे-

  1. विवाह विच्छेद के बाद 10 चन्द्रमास के भीतर जन्म होने पर (शिया विधि)|
  2. विवाह विच्छेद के बाद दो चन्द्रवर्ष के भीतर जन्म लेने पर (हनफी विधि)|
  3. विवाह विच्छेद के बाद 4 चन्द्रवर्ष के भीतर जन्म लेने पर (शफी व मलिकी)|
  • मुस्लिम विधि का धर्मज के बारे में उपर्युक्त प्रावधान अब अप्रसांगिक हो गया है तथा इसका केवल शैक्षणिक महत्व रह गया है क्योंकि भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 112 के प्रावधान उपर्युक्त बिन्दुओं को अधिभूत करते हैं अर्थात् जन्म के समय जो पिता होता है वही उसका विधिक पिता हुआ करता है|

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  • अभिस्वीकृति से तात्पर्य है पिता द्वारा संतान को पुत्र के रूप में स्वीकार करना|
  • जहाँ पैतृकता अनिश्चित हुआ करती है वहाँ उसे निश्चित करने के लिये इसका सहारा लिया जाता है|
  • यह अभिव्यक्त भी हो सकता है व विवक्षित भी हो सकता है|
  • मो. अल्लाहदाद बनाम मो. इस्माइल 1888 (न्यायमूर्ति महमूद) के प्रकरण में मोती बेगम और गुलाम गौस साथ-साथ रहते थे, ऐसी स्थिति में जब वे साथ रहते थे उसी समय अल्लाहदाद माँ के गर्भ में आया तथा उसके जन्म लेने के बाद पिता उसे पुत्र के रूप में संबोधित करता था किन्तु आगे चलकर मोतीबेगम को इस्माइल सहित 4 संतान पैदा हुये| सम्पत्ति के बारे में विवाद पैदा होने पर इस्माइल ने यह कहा कि अल्लाहदाद मेरे पिता का संतान नहीं है| संबंधित विवाद के बारे में वाद लाने पर न्यायमूर्ति महमूद ने यह कहा कि पति पत्नी का साथ-साथ रहना तथा अल्लाहदाद को पुत्र के रूप में संबोधित करना अभिस्वीकृति का पक्का प्रमाण है| अल्लाहदाद अपने पिता का धर्मज संतान है|
  • आवश्यक शर्तें-
  1. अधर्मज संतान के बारे में अभिस्वीकृति नहीं की जा सकती अर्थात् अभिस्वीकृति द्वारा अधर्मज संतान को धर्मज नहीं बनाया जा सकता है| कभी कभार पुत्रवत व्यवहार व पुत्रवत संबोधन अभिस्वीकृति का गठन नहीं करता है|
  2. अभिस्वीकृति धर्मज संतान की ही की जा सकेगी तथा यह उसी दशा में की जायेगी जहाँ पैतृकता अनिश्चित हो|
  3. अभिस्वीकृति के साथ ही साथ पुत्र द्वारा उसका अनुमोदन होना आवश्यक है|
  4. अभिस्वीकृतिकर्ता का कम से कम उम्र 12½ वर्ष अधिक होनी चाहिये उससे जिसे वह पुत्र के रूप में स्वीकार करता है|
  • अभिस्वीकृति व दत्तक ग्रहण में अन्तर- अभिस्वीकृति व दत्तक ग्रहण में निम्नलिखित अन्तर है-
  1. अभिस्वीकृति में जहाँ अभिस्वीकृतिकर्ता का उम्र जिसकी अभिस्वीकृति की जाय उससे 12½ वर्ष अधिक होनी चाहिये वही दत्तक ग्रहण में दत्तक ग्रहणकर्ता का दत्त्कग्रहीता से उम्र 21 वर्ष अधिक होनी चाहिये|
  2. पैतृत्व अभिस्वीकृति में हस्तांतरित नहीं हुआ करती किन्तु दत्तकग्रहण में हस्तांतरित हो जाया करती है|
  3. अभिस्वीकृति में अभिस्वीकृतिकर्ता के पास अन्य पुत्र, पौत्र एवं पुत्री हो सकती है किन्तु दत्तकग्रहण में दत्तकग्रहीता के (जब दत्तक ग्रहण पुत्र का हो तो) पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र एवं पुत्री के दत्तक ग्रहण की दशा में पुत्री व प्रपौत्री नहीं होनी चाहिये|
  4. अभिस्वीकृति पिता द्वारा जहाँ की जाती है वहीँ दत्तकग्रहण पिता व माता द्वारा लिया जा सकता है|
  5. दत्तकग्रहण में जहाँ उद्देश्य धार्मिक होता है वहीँ अभिस्वीकृति का उद्देश्य अधार्मिक हुआ करता है|

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वक्फ

  • वक्फ से तात्पर्य है “बांधना अथवा रोक रखना|”
  • विधि की भाषा में वक्फ का तात्पर्य संपत्ति की एक ऐसी व्यवस्था करने से है जिसमें सम्पत्ति अहस्तान्तरणीय होकर सदैव के लिए बंध जाती हो जिससे इससे प्राप्त लाभ धार्मिक अथवा पुण्य के कार्यों के लिए निरन्तर प्राप्त होता रहे|
  • अबू युसूफ- वक्फ खुदा में वक्फकर्ता के सम्पत्ति का स्थाई निरोध है जिसमें वाकिफ (वक्फकर्ता) का स्वामित्व समाप्त हो जाता है तथा उससे प्राप्त आय सृष्टि की भलाई में व्यय की जाती है|
  • जीवन लाल साहू बनाम कबीरूद्दीन 1840 के प्रकरण में कहा गया कि जैसे ही सम्पत्ति पवित्र या खैराती कार्यों के लिए दान की जाती है उसी क्षण से वाकिफ का सम्पत्ति पर से अधिकार समाप्त हो जाता है और सम्पत्ति का स्वामित्व खुदा में निहित हो जाता है|
  • वक्फ अधिनियम 1913 के अन्तर्गत परिभाषा- “इस अधिनियम की धारा 2(1) के अनुसार वक्फ से तात्पर्य है इस्लाम धर्म में निष्ठा प्रकट करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा किसी सम्पत्ति का मुस्लिम विधि के अन्तर्गत धार्मिक, पवित्र या खैराती समझे जाने वाले प्रयोजन के लिए स्थाई समर्पण|”
  • वक्फ के तत्व- वक्फ के आवश्यक तत्व निम्नलिखित हैं-
  • किसी सम्पत्ति का स्थाई समर्पण|
  • इस्लाम धर्म में निष्ठा रखने वाले व्यक्ति द्वारा|
  • धार्मिक, पवित्र या खैराती समझे जाने वाले प्रयोजन के लिए|

स्थाई समर्पण

  • मोहम्मद इस्माइल बनाम ठाकुर साबिर अली, A.I.R. 1962 S.C. के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह कहा कि वक्फ अधिनियम 1913 धारा 2(1) में प्रयुक्त शब्द स्थाई समर्पण का तात्पर्य है वक्फ सम्पत्ति खुदा में सृजित है|
  • वक्फ प्रतिफल रहित स्वामित्व का ऐसा अन्तरण है जो सामान्यतः धार्मिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है|
  • धामिक उद्देश्य की पूर्ति निरन्तर होती रहे इसके लिए जरूरी यह है कि मूल सम्पत्ति सदैव अस्तित्व में रहे, न तो यह कभी समाप्त हो और न ही नष्ट होने पाये|
  • वक्फ करने का मतलब होता है ईश्वर के पक्ष में प्रतिफल रहित स्वामित्व का हस्तान्तरण| समर्पण स्थायी होता है क्योंकि ईश्वर की सम्पत्ति बन जाने पर इसका हस्तान्तरण मानवीय क्षमता से परे है|
  • एक बार वक्फ का सृजन हो जाने के बाद इसे प्रतिसंह्रत नहीं किया जा सकता| स्थाई समर्पण की विशेषता है की समर्पण पूर्ण एवं बिना शर्त होना चाहिए|
  • सम्पत्ति- सभी विधिशास्त्री इस बात पर अब एकमत हैं कि चल-अचल एवं मूर्त-अमूर्त सभी प्रकार की सम्पत्तियों का वक्फ किया जा सकता है| परिणामतः 1. पशु, 2. कृषि कर्म से सम्बन्धित उपकरण, 3. मस्जिद में पाठ करने हेतु कुरान तथा अन्य चल सम्पत्तियाँ जिनकी मात्र उपयोग द्वारा खपत न हो सके| 4. युद्ध में प्रयुक्त होने वाले घोड़े तथा तलवार वक्फ की सम्पत्तियाँ होंगी| सम्पत्ति ऐसी नहीं होनी चाहिए जो उपयोग करने से समाप्त हो जाए| नष्ट होने वाली सम्पत्ति वक्फ की विषय वस्तु नहीं हो सकती|
  • अदालतों ने विशेष रूप से निम्नलिखित संपत्तियों का वक्फ वैध माना है-
  1. राजकीय बचत पत्र, दरगाह पर चढ़ावा,  3. वाटिका-धारक का साम्पत्तिक अधिकार,
  2. राजकीय प्रतिभूति, कम्पनी का शेयर,   6. नकद रुपया |
  • वक्फ कौन कर सकता है?
  • मुस्लिम धर्म में निष्ठा रखने वाला जो-
  • वयस्क हो,
  • 18 वर्ष भारतीय वयस्कता अधिनियम,
  • 21 वर्ष संरक्षकता एवं प्रतिपाल्य अधिनियम,
  • स्वस्थचित्त हो,
  • सम्पत्ति का स्वामी हो, वक्फ कर सकता है|

 

  • अवयस्क द्वारा किया गया वक्फ प्रारम्भत: शून्य होता है| वयस्क होने के बाद उसके द्वारा किया गया अनुसमर्थन भी इसे वैध नहीं बना सकता है|
  • अवयस्क की सम्पत्ति का उसके संरक्षक द्वारा किया गया वक्फ शून्य होता है| इसी प्रकार पागल व्यक्ति द्वारा किया गया वक्फ भी शून्य है|

गैर मुस्लिम द्वारा वक्फ-

  • किसी गैर मुस्लिम द्वारा सृजित वक्फ भी विधिमान्य है बशर्ते वह व्यक्ति इस्लाम धर्म में आस्था रखता हो| वक्फ चूंकि मुस्लिम वैयक्तिक विधि की संस्था है अत: प्रत्येक मुस्लिम चाहे वह किसी किसी भी सम्प्रदाय का हो, अपनी सम्पत्तियों का वक्फ सृजित कर सकता है| परन्तु गैर-मुस्लिम भी वक्फ करने के लिए सक्षम है| वक्फ वैलीडेटिंग एक्ट, 1913 तथा वक्फ एक्ट, 1914 दोनों अधिनियम में वाकिफ के सम्बन्ध में यह उपबंधित है कि कोई भी व्यक्ति जो इस्लाम में आस्थावान हो अपनी सम्पत्ति का समपर्ण कर सकता है|
  • अमीर अली के अनुसार एक गैर मुस्लिम भी वक्फ कर सकता है यदि जिस उद्देश्य के लिए वक्फ किया जाता है वह समपर्णकर्ता के धर्म के अनुसार और इस्लाम के सिद्धांतों के अनुसार वैध हो|
  • पर्दानशीन महिला द्वारा वक्फ- पर्दानशीन महिला वह होती है जो सामान्यत: पर्दे में रहती है तथा वाह्य समाज से सम्पर्क कम होने के कारण लोक व्यवहार में अधिक कुशल नहीं हो पाती|
  • कोई पर्दानशीन महिला भी अन्य व्यक्तियों की तरह अपनी सम्पत्तियों का वक्फ कर सकती है बशर्ते वह सम्पत्ति की स्वामिनी हो परन्तु वाकिफ यदि पर्दानशीन महिला है तो मुतवल्ली तथा हितग्राहियों को अलग से यह सिद्ध करना पड़ता है कि महिला वक्फ करते समय अंतरण की प्रकृति को भली-भाँति समझती थी और वक्फ करने में उसका निर्णय स्वतंत्र था|
  • विधिमान्य प्रयोजन- वक्फ अधिनियम, 1913 की धारा 3 वक्फ के कुछ प्रयोजनों का उल्लेख करती है| विनिश्चय वादों और प्रमुख मुस्लिम विधिवेत्ताओं के ग्रन्थों के आधार पर कुछ मान्य उद्देश्य निम्न है जिनके लिए वक्फ किया जा सकता है-
  1. मस्जिद में नमाज पड़ने हेतु इमाम की व्यवस्था,
  2. इमामबाड़ों की मरम्मत,
  3. अलीमुर्तजा का जन्मोत्सव,
  4. खानकाहों का संरक्षण,
  5. मस्जिद में चिराग जलाना,
  6. फकीरों को दान,
  7. ईदगाह को दान,
  8. गरीब रिश्तेदारों और गरीबों का भरणपोषण,
  9. स्कूल/कॉलेजों हेतु दान,
  10. हज जाने वाले यात्रियों के लिए धन की व्यवस्था,
  11. मक्का में नि:शुल्क भोजनालय (कोबट) की व्यवस्था,
  12. कारवां सरायों की व्यवस्था,
  13. मोहर्रम में ताजिये रखना,
  14. परिवार की दरगाह या मजार के लिए सम्पत्ति लगाना

अमान्य प्रयोजन- निम्न प्रयोजन के लिए वक्फ नहीं किया जा सकता-

  1. इस्लाम द्वारा निषिद्ध उद्देश्य जैसे – गिरजाघर, मंदिर का निर्माण, मरम्मत,
  2. वाकिफ (वक्फकर्ता) की सांसारिक सम्पत्ति की मरम्मत
  3. ऐसा उद्देश्य जो अनिश्चिय हो,
  4. वक्फकर्ता के मृत्यु दिवस पर कच्छी मेनन लोगों की दावत में कुछ रुपया खर्च करने का उद्देश्य|
  5. शराब की दुकान, जुआघर अथवा सूकर मांस की दूकान का निर्माण या इनकी देख-रेख|
  6. किसी अज्ञात अजनबी को लाभान्वित करने की व्यवस्था,
  7. वकीलों की लाभान्वित करने की व्यवस्था,
  8. केवल धनवान व्यक्तियों को लाभान्वित करने की व्यवस्था,
  9. केवल सैयदों को लाभान्वित करने की व्यवस्था|

यथासम्भव सामीप्य का सिद्धांत

  • न्यास तथा वक्फ के मामले में यह सिद्धांत लागू होता है| साइप्रस का शाब्दिक अर्थ है- जितना समीप सम्भव हो|
  • जिस प्रयोजन के लिए वक्फ का गठन होता है यदि वह प्रयोजन अक्षरश: पूरा नहीं होता तो वक्फ को असफल नहीं होने दिया जाता है तथा उसका उपयोग वक्फकर्ता के प्रयोजन से मिलते-जुलते प्रयोजन में किया जाएगा|
  • साले भाय बनाम साफिया 1911 के मामले में बम्बई उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि किंही कारणों से वक्फ में निर्दिष्ट उद्देश्य असफल हो जाय तो वक्फ समाप्त नहीं किया जाता, यह प्रभावी रहेगा तथा सम्पत्ति का लाभ उस उद्देश्य से यथासम्भव समीप किसी अन्य उद्देश्य की पूर्ती में लगाया जा सकता है|
  • जैसे यदि वक्फ का उद्देश्य किसी क्षेत्र विशेष के प्रौढ़ निवासियों में अशिक्षा का उन्मूलन हो परन्तु कुछ समय बाद यह पाया जाय कि उस स्थान विशेष का कोई भी प्रौढ़ अशिक्षित नहीं रह गया तो वक्फ को समाप्त करने के बजाय इसे चालू रखकर लाभांश का उपयोग इन प्रौढ़ों को और अधिक शिक्षा देने अथवा वहाँ के बच्चों को शिक्षित करने में किया जा सकता है|
  • कुलसुम बेगम बनाम गुलाम हुसैन 1905 के मामले में कहा गया कि यदि वक्फ का उल्लिखित प्रयोजन पूरा न हो तो उसे गरीबों के लाभ प्रयोग किया जाए|
  • आवश्यक तत्व- वक्फ मान्य हो, वक्फ के प्रलेख में खैरात का स्पष्ट आशय हो,

वक्फ की वैध प्रसंगतियाँ

  1. अप्रतिसंहरणीय- वक्फ अप्रतिसंहरणीय होगा| यदि प्रतिसंहरण की शर्त हो तो वक्फ शून्य होगा| वाकिफ विधिपूर्ण ढंग से समय समय पर हिताधाकारियों में परिवर्तन कर सकता है|
  2. शाश्वतता- अनिवार्य शर्त है सीमित काल के लिए किया गया वक्फ मान्य नहीं|
  3. अहस्तान्तरणीयता- वक्फ सम्पत्ति का अंतरण नहीं होता, परन्तु मुतवल्ली किन्हीं स्थितियों में न्यायालय की पूर्व अनुमति द्वारा सम्पत्ति का अंतरण का सकता है, पट्टे इत्यादि पर दे सकता है|
  • वक्फ कैसे किया जा सकता है?
  1. जीवित लोगों के बीच किसी कार्य द्वारा
  2. वसीयत द्वारा 1/3 भाग से अधिक सम्पत्ति का वक्फ उत्तराधिकारियों की सहमति से होगा
  3. मृत्युदायी रोग (मर्जुलमौत) के दौरान सम्पत्ति के (1/3) भाग तक
  4. स्मरणातीत उपयोग द्वारा जैसे कब्रिस्तान के रूप में इस्तेमाल होती आई है तो वक्फ सम्पत्ति है|
  • वक्फ के प्रकार-
  • लोक वक्फ- खैरात के प्रयोजन के लिए होता है|
  • निजी वक्फ- यह संस्थापक के निजी वंशज के लिए होता है| परिवार के लिए किया गया वक्फ वक्फ-अलल-औलाद कहलाता है| पैगम्बर मोहम्मद साहब ने निजी वक्फ को ही उत्तम बताया है|
  • लोकवक्फ और लोकवत वक्फ –
  1. मस्जिद और नमाज के मैदान, 2. इमामबाड़े, 3. रोजे और दरगाह, 4. कारवां-सरायें, 5. खानकाह, 6. स्कूल और कॉलेज, 7. अस्पताल और दवाखाने, 8. छात्रवास, मकान, 9. कब्रिस्तान,
  • मोहम्मद अली बनाम बचावन साहिबा 1955 इलाहाबाद के मामले में कहा गया कि कोई मस्जिद शिया मस्जिद या सुन्नी मस्जिद नहीं होती| कोई मस्जिद किसी एक फिरके या स्कूल के लिए नहीं बनाई जाती है|
  • पारिवारिक वक्फ अथवा वक्फ आलल औलाद
  • वक्फ निम्न दो प्रकार का होता है-
  1. सार्वजनिक वक्फ एवं 2. पारिवारिक वक्फ अथवा निजी वक्फ|
  • सार्वजनिक वक्फ वह होता है जिसमें हितग्राही जनसाधारण अथवा सामान्य जनता हुआ करती है|
  • इसके विपरीत वक्फ के हितग्राही यदि केवल संस्थापक (वाकिफ) के परिवार के सदस्य हों तो वक्फ पारिवारिक अथवा निजी वक्फ कहलाता है|
  • इसे वक्फ-अलल-औलाद की संज्ञा भी दी गई है|
  • पारिवारिक वक्फ के माध्यम से कोई भी मुस्लिम अपने परिवार के सदस्यों तथा आगे आने वाली पीढ़ियों में में भविष्य के वंशजों के भरण-पोषण की व्यवस्था निर्धारित कर सकता है|
  • सामान्य धारणा की परोपकार ‘दूसरों के लिए’ होता है से हटकर मुस्लिम विधि का सिद्धांत यह है कि अपने स्वजन के भरण-पोषण की व्यवस्था करना परोपकार ही है|
  • पारिवारिक वक्फ में अंतत: वक्फ का लाभ ईश्वर के लिए सुरक्षित रहता है| परन्तु सम्पति हितग्राहियों में निहित होकर इसको आय का उपयोग संस्थापक (वाकिफ) तथा उसकी संतानों के भरण-पोषण के लिए किया जाता है| परिवार के सभी वंशजों के समाप्त हो जाने पर सम्पत्ति ईश्वर में निहित हो जाती है और वक्फ सार्वजनिक वक्फ में परिवर्तित हो जाता है अर्थात इसका लाभ आम जनता को मिलने लगता है|
  • इस मुद्दे को लेकर कि केवल परिवार के हित को ही परोपकार माना जाय अथवा परिवार के लोगों के साथ अन्य लोगों का हित भी परोपकार के लिए आवश्यक है, भारतीय आंग्ल अदालतों में काफी न्यायिक विवेचन हुआ|
  • अदालतों ने आंग्ल विधि से प्रेरित होकर वक्फ-अलल-औलाद की वैधता के लिए कई न्यायिक सीमाएं निर्धारित कर दी परन्तु पारिवारिक वक्फ के सृजन के लिए इन न्यायिक-सीमाओं को मुस्लिम समाज में अपनी निजी विधि पर अदालतों द्वारा प्रहार समझा|
  • अंतत: संसद द्वारा मुसलमान वक्फ विधिमान्यकरण अधिनियम, 1913 पारित किया गया जिसने आंग्ल अदालतों द्वार आरोपित न्यायिक सीमाओं को हटाकर पारम्परिक मुस्लिम वैयक्तिक विधि को फिर से स्थापित कर दिया है|
  • वक्फ विधिमान्यकरण अधिनियम, 1913 के लागू होने से पूर्व भारतीय आंग्ल अदालतों ने वक्फ-अलल-औलाद की वैधता के लिए परिवार तथा वंशजों के भरण-पोषण के साथ-ही साथ किसी अन्य धार्मिक अथवा परोपकारी कार्यों की व्यवस्था किये जाने को अनिवार्य माना|
  • केवल संस्थापक के परिवार के भरण-पोषण का व्यवस्था करने वाले निजी वक्फ शून्य माने जाते थे|
  • अब्दुल-गफूर बनाम निजामुद्दीन, 1892 के प्रकरण में किसी मुस्लिम ने अपनी पत्नी, पुत्री तथा पुत्री की संतानों के लाभ के लिए एक वक्फ गठित किया| वक्फनामे में न तो वक्फ की आय को किसी अन्य परोपकारी अथवा धार्मिक कार्य में उपयोग में लाए जाने का उल्लेख था और न ही यही स्पष्ट किया गया था कि परिवार के सभी सदस्यों के समाप्त हो जाने पर आय का उपयोग किस प्रकार होगा| उक्त प्रकरण में प्रिवी कौंसिल ने वक्फ को शून्य घोषित किया|
  • अब्दुल फता मोहम्मद बनाम रसमय चौधरी के प्रकरण में दो मुस्लिम भाइयों ने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्तियों से एक निजी वक्फ का गठन किया| वक्फ इन दो भाइयों की संतानों, संतानों की संतानों तथा परिवार की महिला तथा पुरुष सदस्यों के भविष्य के सभी वंशजों के लाभ के लिए सृजन किया गया था| वक्फनामे में यह प्रावधान था कि उपर्युक्त सभी सदस्यों के समाप्त हो जाने पर ही वक्फ की आय विधवाओं, अनाथो, भिखारियों तथा गरीबो के लाभ के लिए प्रयुक्त होगी| प्रिवी कौंसिल ने वक्फ को शून्य घोषित करते हुए यह कहा कि निजी वक्फ की वैधता के लिए आय का पर्याप्त अंश धार्मिक तथा परोपकारी कार्यों के लिए उपयोग में लाए जाने की व्यवस्था करना ही पर्याप्त नहीं है इसे वंशजों के लाभ के साथ साथ अर्थात समवर्ती भी होना चाहिए| विधवाओं, अनाथों तथा भिखारियों को मिलने वाला लाभ परिवार के वंशजों के लाभ के साथ साथ न मिलकर अत्यंत दूरस्थ माना गया|
  • वर्तमान में मुल्सिम वक्फ विधिमान्यकरण अधिनियम, 1913 ने आंग्ल अदालतों द्वारा लगाए गये कठोर प्रतिबंधों को समाप्त कर दिया है|
  • कोई भी मुस्लिम अब अपने वंशजों के लाभार्थ वक्फ की आय के पर्याप्त अंश तथा इसके समवर्ती होने की व्यवस्था किये बगैर भी विधिमान्य पारिवारिक वक्फ का सृजन कर सकता है|
  • उक्त अहिनियम की धारा 4 के अनुसार धर्माथ-दान अर्थात परोपकारी कार्यों की दूरस्थता के कारण निजी वक्फ अब शून्य नहीं माना जाएगा|
  • इस प्रकार धारा 4 ने अब्दुल फतह मुहम्मद के निर्णय को निष्प्रभावी कर दिया है|
  • यदि किसी निजी वक्फ में धर्मार्थ अथवा परोपकारी कार्यों के लिए व्यवस्था परिवार के सभी वंशजों के पूर्णतया समाप्त हो जाने के बाद भी की जाए तो भी वक्फ वैध होगा|
  • धार्मिक अथवा परोपकारी कार्यों के साथ-साथ अथवा समवर्ती होना अब अनिवार्य नहीं है|

मुतवल्ली

  • मुतवल्ली- वक्फ के प्रबन्धक या अधीक्षक को मुतवल्ली कहते हैं|
  • वक्फ के गठन के समय ही वक्फकर्ता मुतवल्ली नियुक्त करता है जो वाकिफ के निर्देशों पर कार्य करता है|
  • मुतवल्ली को वक्फ में स्वामित्व प्राप्त नहीं होता वह अधीक्षक या प्रबन्धक मात्र होता है|
  • मुतवल्ली का पद किसी ट्रस्टी के ही समान है परन्तु इन दोनों के अधिकारों तथा कर्तव्यों में भिन्नता है| मुतवल्ली वस्तुत: वक्फ सम्पत्ति तथा इसके हितग्राहियों दोनों के हितों के रक्षक के रूप में कार्य करता है|
  • कौन व्यक्ति मुतवल्ली नियुक्त किया जा सकता है?
  • व्यस्क, स्वस्थचित्त और आवश्यक कर्तव्यों का पालन करने वाले निम्न लोग मुतवल्ली नियुक्त हो सकेंगे-
  • वाकिफ स्वयं
  • उसके बच्चे (अवयस्क भी हो सकता है यदि वाकिफ अपने पुत्र को नियुक्त करें),
  • स्त्री (शाहबानों बनाम आगा खान 1907 पी.सी. – धार्मिक प्रकृति के वक्फ में से नियुक्त नहीं हो सकते सिर्फ सांसारिक वक्फ में)
  • गैर मुस्लिम,
  • शिया वक्फ में सुन्नी मुसलमान,
  • सुन्नी वक्फ में शिया मुसलमान,
  • सामान्य नियम यह है कि अवयस्क मुतवल्ली नहीं होगा किन्तु यदि मुतवल्ली पद पैतृक हो तथा अंतिम मुतवल्ली की मृत्यु हो जाने पर वंश में अगला व्यक्ति अवयस्क हो तो वह अवयस्क भी मुतवल्ली का पद भार ग्रहन कर सकता है|
  • इसी प्रकार महिला एवं गैर मुस्लिम भी यदि मुतवल्ली का कार्य लौकिक अथवा गैर-धार्मिक प्रकृति का हो तो वे मुतवल्ली हो सकते हैं|
  • कभी-कभी मुतवल्ली को लौकिक कृत्यों के अतिरिक्त कुछ धार्मिक कृत्य भी करने पड़ते हैं|
  • यदि वक्फ के अंतर्गत मुतवल्ली द्वारा इन धार्मिक कृत्यों के लिए जाने का भी उल्लेख किया गया हो या महिला तथा गैर-मुस्लिम व्यक्ति मुतवल्ली नहीं नियुक्त हो सकेंगे|
  • निम्न दशाओं में की महिला तथा गैर मुस्लिम व्यक्ति मुतवल्ली नहीं नियुक्त होगा-
  1. मुतवल्ली को यदि सज्जादानशीन अथवा धार्मिक प्रमुख के रूप में कार्य करना पड़े|
  2. मुतवल्ली को यदि इमाम जो धार्मिक प्रार्थनाओं का नेतृत्व करता है, के रूप में कार्य करना पड़े|
  3. मुतवल्ली को यदि मुल्ला के रूप में कार्य करना हो|
  4. मुतवल्ली को यदि कातिब अथवा धर्मोपदेशक के रूप में कार्य करना हो|
  5. मुतवल्ली को यदि किसी दरगाह के मुजावर के रूप में कार्य करना हो|
  • कासिम बनाम हजारा बेगम, ए.आई.आर. 1920 कलकत्ता के मामले में यह कहा गया कि किसी धार्मिक अनुष्ठान में धार्मिक कृत्यों को यदि महिला मतवल्ली किसी पुरुष द्वारा करा सके तो मुतवल्ली के कार्यों में धार्मिक कृत्य सम्मिलित होने के बावजूद भी महिला मुतवल्ली की नियुक्ति भी हो सकती है|
  • कौन नियुक्त कर सकता है? – मुतवल्ली की नियुक्ति वरीयताक्रम में निम्नलिखित व्यक्तियों में से किसी एक के द्वारा हो सकती है-
  1. वाकिफ स्वयं, न हो तो
  2. वाकिफ का वसियती निष्पादक,
  3. अपनी मृत्यु शैय्या पर मुतवल्ली
  4. न्यायालय
  5. जन समूह द्वारा
  • वाकिफ- मुतवल्ली को नियुक्त करने का पूर्ण अधिकार मुख्यत: वाकिफ को है|
  • वह स्वेच्छा से किसी भी समक्ष व्यक्ति को वक्फ सम्पत्ति का मुतवल्ली बना सकता है| यदि चाहे तो वह स्वयं अपनी नियुक्ति भी वक्फ के प्रथम मुतवल्ली के रूप में कर सकता है|
  • वह उन व्यक्तियों की एक क्रमबद्ध सूची भी तैयार कर सकता है जिन्हें एक के बाद दूसरे मुतवल्ली के रूप में नियुक्त किया जा सके| भविष्य में मुत्वल्लियों के रूप में कार्य करने वाले व्यक्तियों की नियुक्ति अथवा उनके चयन के लिए किसी भी विस्तृत योजना का उल्लेख भी वाकिफ कर सकता है|
  • वह किसी वर्तमान मुतवल्ली को ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने का अधिकार दे सकता है या चाहे तो इस पद को पैतृक बना दे|
  • वाकिफ के निष्पादक द्वारा मुतवल्ली की नियुक्ति- वाकिफ यदि मुतवल्ली की नियुक्ति करने से पूर्व ही दिवंगत हो जाय और वक्फनामा भी इसकी नियुक्ति के बारे में मौन हो तो वाकिफ के निष्पादक को वाकिफ की भाँति मुतवल्ली की नियुक्ति का प्राधिकार प्राप्त है|

मुतवल्ली द्वारा नियुक्ति-  

सामान्यत: किसी मुतवल्ली को अपना उत्तराधिकारी स्वत: नियुक्त करने का अधिकार नहीं है

क्योंकि मुत्व्वल्ली की नियुक्ति वाकिफ अथवा इसके निष्पादक अथवा न्यायालय द्वारा ही हो सकती है

यदि वर्तमान मुतवल्ली मरणासन्न हो और अपने जीवन की आशा छोड़ चूका हो तथा उपयुक्त विधियों द्वारा दूसरे मुतवल्ली की नियुक्ति तुरंत सम्भव न हो सके तो वह मृत्युशय्या से ही अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति कर सकता है|

 

न्यायालय द्वारा-

  • यदि उपर्युक्त पंक्तियों में किसी उपयुक्त प्राधिकारी द्वारा मुतवल्ली की नियुक्ति सम्भव न हो तो उसकी नियुक्ति न्यायलय द्वारा होगी|
  • न्यायालय से तात्पर्य जिला जज की अदालत से है| जिसे अपने अधिकार क्षेत्र में विद्यमान सभी वक्फों के प्रबंध तथा निरिक्षण का अधिकार रहता है|
  • धर्मसभा द्वारा- किसी स्थान विशेष के उन सभी व्यक्तियों जिनका वक्फ की सम्पत्ति में कोई हित हो, की आमसभा द्वारा भी मुतवल्ली की नियुक्ति हो सकती है|
  • मुत्व्वल्ली की शक्तियाँ एवं कर्तव्य- मुतवल्ली वक्फ सम्पत्ति का प्रबन्धक मात्र होता है तथा उसे वाकिफ के द्वारा निर्धारित उद्देश्यों एवं निर्देशों के अनुसार प्रबंध करना होता है| आवश्यकता हो तो वह अभिकर्ता भी रख सकता है|
  • मुतवल्ली सम्पत्ति को भारित, पट्टा, या अंतरित तभी कर सकता है जब
  • वक्फ नामे में ऐसा प्रावधान हो,
  • न्यायालय से अनुमति प्राप्त कर ली हो,
  • तात्कालिक आवश्यकता के कारण विवश हो, अन्यथा नहीं कर सकता|
  • यदि वाकिफ और उसका निष्पादक दोनों मर गया हैं तो मुतवल्ली अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर सकता है बशर्ते वह मृत्यु शैय्या पर हो|

 

  • मुतवल्ली की पद्च्युति- मुतवल्ली को उसके पद से निम्न में से किसी आधार पर हटाया जा सकेगा-
  • वक्फ- सम्पत्ति पर अपना दावा करे|
  • वक्फ-सम्पत्ति को अपने उपयोग में लाये,
  • वक्फ सम्पत्ति को जानबूझकर क्षति पहुंचाएं,
  • मरम्मत न करवाये, कुप्रबंध करे,
  • दिवालिया हो जाए,
  • असमर्थ हो जाए- शारीरिक, मानसिक रूप से
  • धार्मिक कर्तव्यों को करने में विफल हो,
  • आमदनी को निर्देशों के विरुद्ध व्यय करे|
  • क्या वक्फ का प्रतिसंहरण हो सकता है?
  • वसीयत के द्वारा किया गया वक्फ वाकिफ द्वारा अपनी मृत्यु के पहले प्रतिसंहृत किया जा सकता है, चूंकि वसीयत मरने के बाद प्रभाव में आती है| अत: प्रतिसंहरण वस्तुत: वसीयत का होता है न कि वक्फ का|
  • वैध वक्फ को प्रतिसंहृत नहीं किया जा सकता क्योंकि सम्पत्ति खुदा में निहित हो जाती है|
  • मस्जिद विधिक-व्यक्तित्व नहीं?
  • मस्जिद विधिक-व्यक्ति नहीं है| विधिक व्यक्ति शख्सियत-ए-एतबारी) की संकल्पना मुस्लिम विधि-शास्त्र में है अवश्य परन्तु, विधिवेत्ताओं ने मस्जिद को विधिक व्यक्तित्व प्रदान करना उचित नहीं समझा| मस्जिद शाहिद गंज बनाम गुरुद्वारा कमेटी, ए.आई.आर. (1940) पी.सी. 1569 के मामले में प्रिवी काउंसिल ने इस मुद्दे पर कोई निर्णय नहीं दिया, परन्तु फिर भी अपना मत व्यक्त करते हुए कहा है कि मस्जिद न तो अपने नाम से कोई वाद प्रस्तुत कर सकती है और न ही इसके नाम के विरुद्ध कोई वाद प्रस्तुत करने में समक्ष माना जाए| प्रिवी काउंसिल के उक्त कथन का आशय यदि है कि मस्जिद विधिक व्यक्ति नहीं है| मुहम्मद शफीउद्दीन बनाम चतुर्भुज के वाद में राजस्थान उच्च न्यायालय ने मस्जिद को विधिक व्यक्ति नहीं माना है|

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  • पैगम्बर मुहम्मदसाहब के निम्न शब्दों से इस विधि का अभ्युदय माना जाता है- “किसी भूमि के पड़ोसी को या किसी मकान के पड़ोसी को किसी अज्ञात व्यक्ति की उपेक्षा उक्त भूमि या मकान पर श्रेष्ठ अधिकार होता है अत: यदि पड़ोसी अनुपस्थित है तो विक्रेता को उसके आने तक प्रतीक्षा करनी चाहिए|
  • दिगम्बर सिंह बनाम अहमद (1941) के प्रकरण में यह कहा गया कि शुफ़ा का दावा निम्न चार आधारों पर आधारित किया जा सकता है|
  1. अधिनियम द्वारा- यदि इस सन्दर्भ में क़ानून प्रचलित हो तो शुफ़ा उसके द्वारा शासित होगा| इसके लिए निम्नलिखित कानून सम्बन्धित क्षेत्रों के लिए बनाये गये हैं-
  • अवध अग्रक्रयाधिकार अधिनियम, 1876
  • आगरा अग्रक्रयाधिकार अधिनियम, 1922
  • पंजाब अग्रक्रयाधिकार अधिनियम, 1923
  • भोपाल अग्रक्रयाधिकार अधिनियम, 1934
  • रीवा अग्रक्रयाधिकार अधिनियम, 1948
  • राजस्थान राज्य अग्रक्रयाधिकार अधिनियम, 1956
  • उक्त क्षेत्र में निवास करने वाले सभी सम्प्रदाय के लोगों पर अर्थात सभी निवासियों पर अग्रक्रयाधिकार सम्बन्धी उक्त विधियाँ लागू होंगी|
  1. रूढ़ी द्वारा- शुफ़ा कभी हिन्दू वैयक्तिक विधि का अंग नहीं रहा और न ही सामान्य विधि के रूप में स्वीकार था| इसे हिन्दुओं पर स्थानीय प्रथा के आधार पर क्षेत्रीय विधि के रूप में लागू किया गया| कोलाबा, खानदेश, मालाबार, दिल्ली, अहमदाबाद में सभी निवासियों पर यह लागू है|
  2. संविदा द्वारा- यदि हकशुफा का सृजन करने वाली कोई संविदा हो तो संविदा के अंतर्गत ऐसे अधिकार की याचना की जा सकती है|
  3. मुस्लिम विधि- अग्रक्रयाधिकार का नियम मुस्लिम विधि से सम्बन्धित है| अत: सामान्य नियम के आधार पर भारत में सभी मुस्लिम धर्म के लोगों पर लागू होता है किन्तु मद्रास उच्च न्यायालय ने यह कहा कि मुस्लिम विधि का यह नियम न्याय एवं साम्या के विरोध में है| अत: शुफ़ा मद्रास में रूढ़ी के आधार पर लागू है|
  • अग्रक्रयाधिकार सम्बन्धी मांग विषयक औपचारिकताएँ –
  • अग्रक्रयाधिकार का नियम स्वामित्व की संकल्पना एवं संविदा की स्वतंत्रता पर कुठाराघात पहुंचाता है अत: जरा सी चूक एवं असावधानी इस उपचार को पाने से वंचित कर देगी| अत: सभी औपचारिकताओं का कड़ाई से पालन किया जाना अनिवार्य है|

प्रथम मांग – (तलब-ए-मुबासिबत)

  1. विक्रय पूर्ण होने के बाद शफी द्वारा मांग की जानी चाहिए| उससे पूर्व नहीं| मुस्लिम विधि के अनुसार विक्रय तब पूर्व होता है जब क्रेता विक्रेता को कीमत दे दे और विक्रेता क्रेता को कब्जा दे दे| किन्तु मुस्लिम विधि का उक्त नियम यहाँ नहीं लागू होता| यहाँ सम्पत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 के विक्रय के पूर्णता के बारे में प्रावधान लागू होंगे|
  • सम्पत्ति अंतरण अधिनियम के अनुसार स्थावर सम्पत्ति का विक्रय तब पूर्ण माना जाता है जब वह रजिस्टर्ड हो जाय| उपर्युक्त बिन्दुओं से यह स्पष्ट होता है कि रजिस्ट्री के बाद शफी को अग्रक्रयाधिकार की मांग करनी चाहिए|
  1. सूचना मिलने पर तत्काल शफी को मांग करनी चाहिए- अनावश्यक विलम्ब शफी को उपचारविहीन कर देगी|
  2. मांग या तो शफी स्वयं करेगा या जिसे अधिकृत करे वह कर सकेगा यदि अधिकृत नहीं है तो भले ही उसका धनिष्ठ सम्बन्धी हो मांग नहीं कर सकेगा| यदि अवयस्क है तो उसके संरक्षक मांग कर सकेंगे| शफी स्वयं या यदि अवयस्क है तो उसके लिए संरक्षक प्रथम मांग की औपचारिकताओं को पूरा कर सकते हैं|
  3. मांग- मौखिक या, लिखित या पत्र द्वारा की जाएगी|
  4. मांग के समय साक्षियों की उपस्थिति जरूरी नहीं है|

तलब-ए-इशहाद (द्वितीय मांग)

  • दावे को प्रभावी कराने के लिए द्वितीय मांग प्रस्तुत किया जाना भी अनिवार्य है| द्वितीय मांग वस्तुत: प्रथम घोषणा की पुनरावृत्ति है| इसे पुष्टिकरणीय मांग या तलब-ए-तकरीर भी कहते हैं| द्वितीय मांग प्रथम मांग की विधिक औपचारिकता पूर्ण होने के बाद प्रस्तुत होगी|
  1. प्रथम मांग के तत्काल बाद द्वितीय मांग की जानी चाहिए|
  2. इस मांग में यह बताया जायेगा कि प्रथम मांग अमुक तिथि को की गई थी|
  3. द्वितीय मांग प्रस्तुत करते समय दो सक्षम गवाहों की उपस्थिति अनिवार्य है|
  4. मांग का तरीका- मौखिक, लिखित या पत्र परिदान द्वारा हो सकेगा|
  5. मांग कौन करेगा- शफी स्वयं या यदि अवयस्क है तो उसका संरक्षक मांग करेगा|
  • शफी द्वारा यदि कई क्रेता है तो सभी के विरुद्ध इस अधिकार की मांग की जानी चाहिए, अगर कुछ क्रेताओं के विरुद्ध मांग नहीं करता हो तो जिनके विरुद्ध मांग नहीं करता उनके द्वारा खरीदी सम्पत्ति को नहीं पा सकेगा अर्थात वह उनके द्वारा खरीदी हुई सम्पत्ति को ही पा सकेगी जिनके विरुद्ध मांग करता है|
  • यदि कई शफी है तो सभी को संबोधित कर मांग करनी पड़ेगी तभी सभी शफी सम्पत्ति पायेंगे, यदि केवल कुछ शफी ही मांग करते है तो जो मांग करते हैं केवल वही सम्पत्ति पायेंगे अन्य शफी नहीं|
  • अपवाद- यदि शफी विक्रेता या सम्पत्ति को सम्बोधित कर मांग करता है तो शफी सभी क्रेताओं से सम्पत्ति पा सकेंगे|
  • यदि क्रेता एवं विक्रेता नहीं है तो शफी सम्पत्ति को स्पर्शकर द्वितीय मांग कर सकता है, इसके लिए यह जरुरी नहीं है कि वह सम्पत्ति पर प्रवेश करे और कब्जा में ले| सम्पत्ति के समीप खड़े होकर दीवालों को मात्र स्पर्श करके द्वितीय मांग की घोषणा कर देना ही पर्याप्त है|

तलब-ए-तमलीक (तृतीय मांग)   

  • यदि द्वितीय मांग के बाद क्रेता शफी को अपने स्थान पर प्रत्यस्थापित कर देता है तो किसी प्रकार की औपचारिकता का निर्वहन करना जरूरी नहीं होता है|
  • यदि उपर्युक्त तरीके से शफी प्रत्यस्थापित नहीं हो पाता है तो वह इसके लिए न्यायालय में वाद प्रस्तुत करेगा|
  • तीसरी मांग के रूप में प्रस्तुत किये गये वाद के प्रमुख लक्षण निम्न हैं
  1. विक्रय पूर्ण होने की तिथि से वाद एक वर्ष के भीतर प्रस्तुत किया जाय|
  2. वाद सम्पूर्ण सम्पत्ति के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया जाय|
  3. यदि शफी अवयस्क है तो उसका संरक्षक वाद प्रस्तुत करने में समक्ष होगा|
  • यदि प्रथम मांग करने पर या द्वितीय मांग करने पर या विधिक कार्यवाही के दौरान शफी की मृत्यु हो जाती है तो उनके विधिक प्रतिनिधि मांग नहीं कर सकेंगे किन्तु भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 306 के अनुसार विधिक प्रतिनिधि ऐसी मांग कर सकेगी|

अग्रक्रयाधिकार का प्रभाव

  1. शफी उन्हीं निबन्धनों और मूल शर्तों पर सम्पत्ति क्रेता से प्राप्त करेगा जिन निबन्धनों व शर्तों पर क्रेता विक्रेता से सम्पत्ति प्राप्त किया है|
  2. शफी को स्वामित्व कब्जा प्राप्त होने के बाद प्राप्त होगा| न्यायालय सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के आदेश 20 नियम 14 के तहत शफी को कब्जा देने की डिक्री पारित कर सकता है|
  3. कब्जा देने से पूर्व क्रेता उन फायदों एवं लाभों को पाता रहेगा जो उसे खरीदी गयी सम्पत्ति से प्राप्त हो|
  4. शफी उसी दशा में सम्पत्ति क्रेता से प्राप्त करेगा जिस दशा में उसने (क्रेता) विक्रेता से प्राप्त किया है अर्थात यदि क्रेता ने उस सम्पत्ति पर अस्थाई प्रकृति का निर्माण किया है तो उसे शफी हटाने के लिए बाध्य कर सकेगा किन्तु यदि स्थाई प्रकृति का निर्माण किया है तो उस निर्माण की एवज में शफी क्रेता को कीमत देगा|
  5. शफी स्वामित्व विधित: क्रेता से नहीं प्राप्त करता है वह क्रेता को कीमत देकर उसके स्थान पर प्रत्यस्थापित हो जाता है तथा उन दायित्वों का वहन करेगा जो उस सम्पत्ति पर हो अर्थात यदि सम्पत्ति पूर्व में बंधक व भारग्रस्त है तो शफी को मुक्त कराना होगा|
  6. यदि क्रेता ने सम्पत्ति क्रय कर लिया है व विक्रय पूर्ण हो गया है तथा पूर्ण कीमत या अवशिष्ट कीमत क्रेता नहीं दिया है तो उक्त राशि शफी विक्रेता को देकर सम्पत्ति को पा लेगा|
  7. शफी का यह अधिकार उस अन्तरिती के विरुद्ध भी होगा, जिसने सम्पत्ति को मूल क्रेता से खरीद लिया है, इस दशा में शफी को द्वितीय क्रेता के विरुद्ध प्रथम मांग एवं तृतीय मांग जैसी औपचारिकताओं को पूरा नहीं करना पड़ेगा, यदि मूल क्रेता मर जाता है तो उसके उत्तराधिकारियों के खिलाफ अपने इस अधिकार का प्रयोग शफी कर सकेगा|

शफी (अग्रक्रयाधिकारी) की मृत्यु          

  • यदि प्रथम मांग शफी करता है और उसके बाद वह मर जाता है तो उसके प्रतिनिधि द्वितीय मांग नहीं करेंगे|
  • यदि द्वितीय मांग करके शफी मर जाता है तो उसके प्रतिनिधि तृतीय मांग नहीं करेंगे|
  • यदि तृतीय मांग शफी कर चुका है तो उसके विधिक प्रतिनिधि शफी के स्थान पर प्रतिस्थापित नहीं होंगे| यदि न्यायालय में कार्यवाही के दौरान शफी मरता है तो उसके विधिक प्रतिनिधि उसके स्थान पर वाद में प्रतिस्थापित हो जायेंगे|
  • भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 की धारा 306 सभी धर्म के लोगों पर समान रूप से लागू हुआ करती है अर्थात यदि अग्रक्रयाधिकारी मर जाता है तो उत्तराधिकारी उसके स्थान पर प्रतिस्थापित हो जायेंगे|

 

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  • भरण पोषण में शामिल वस्तुयें-
  • रोटी (2) कपड़ा  (3) मकान  (4) अन्य आवश्यक वस्तुएं (इसी तरह की)

 

  • भरण पोषण प्राप्त करने का आधार-
  1. पत्नी
  2. अभावग्रस्त माता-पिता
  3. अवयस्क सन्तान
  4. असमर्थ निषिद्ध संबंधी

 

  1. पत्नी- मुस्लिम विधि में पति का विधिक कर्तव्य है कि पत्नी का भरण पोषण करे, पति भले ही साधन सम्पन्न न हो फिर भी पति को अपनी पत्नी का भरण पोषण करना पड़ेगा, यदि पत्नी साधन सम्पन्न है फिर भी भरण पोषण प्राप्त कर सकती है|
  • पत्नी निम्न आधारों पर भी भरण-पोषण से वंचित नहीं होगी –
  • गैर मुस्लिम हो यथा ईसाई या यहूदी
  • साधन सम्पन्न हो,
  • वृद्ध एवं निर्बल हो,
  • अस्वस्थ या स्वस्थ हो|
  • मुस्लिम महिला का भरण पोषण निम्नलिखित शर्तों के अधीन है-
  • विवाह वैध होना चाहिए| अनियमित एवं शून्य विवाह की पत्नी भरण पोषण प्राप्त नहीं कर सकेगी|
  • यदि कोई पुरुष पांचवी शादी करता है तो पांचवी शादी की पत्नी अपने पति से भरण पोषण नहीं पाएगी क्योंकि ऐसा विवाह अनियमित विवाह होता है|
  • यदि कोई मुस्लिम पुरुष, साक्षियों की अनुपस्थिति में विवाह करता है तो ऐसे विवाह की पत्नी भरण पोषण पाएगी भले ही विवाह अनियमित हो (अपवाद)|
  • शिया विधि में मुता विवाह वैध हुआ करता है फिर भी मुता विवाह की पत्नी पति से भरण पोषण नहीं प्राप्त करेगी, किन्तु वह (सी. आर. पी. सी. की धारा 125 के अंतर्गत भरण पोषण प्राप्त करेगी|
  • पत्नी ने वयस्कता प्राप्त कर ली हो अर्थात 15 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली हो| (15 वर्ष के पूर्व पति का दायित्व नहीं होगा)
  • पत्नी पति के साथ रहे किन्तु युक्तियुक्त आधार पर पत्नी पति से अलग रहकर भरण पोषण प्राप्त कर सकेगी|
  • पत्नी पति के प्रति निष्ठा रखती हो अर्थात परपुरुष गमन में लिप्त न हो|
  • निम्नलिखित आधारों पर पत्नी अलग रहते हुए भी पति से भरण पोषण पाने की अधिकारी होगी-
  • पति रखैल रखता है अर्थात पति जारता की दशा में|
  • पत्नी से क्रूरता करता है
  • पति पहली पत्नी के अलावा दूसरी शादी कर्ता है तो पहली शादी की पत्नी पति से अलग रहकर भरण पोषण पाने की अधिकारिणी होगी (सायरा बानो बनाम अब्दुल गफूर ए.आई.आर. 1987)|
  • तलाकशुदा मुस्लिम महिला का भरण पोषण-
  • निजी विधि (मुस्लिम विधि),
  • द.प्र.सं. की धारा 125,
  • मुस्लिम महिला अधिकार अधिनियम 1986
  • निजी विधि- मुस्लिम महिला केवल इद्दत पालन तक भरण पोषण पति से प्राप्त करेगी, यदि पत्नी गर्भवती है तो बच्चे के जन्म तक वह भरण पोषण प्राप्त करेगी|
  • द.प्र.सं. की धारा 125 के अधीन- इसके तहत तलाक शुदा मुस्लिम पत्नी भरण पोषण प्राप्त कर सकेगी, किन्तु धारा 125 द.प्र.सं. 127 के अधीन होगी|
  • धारा 127 (3) सीआर पी. सी. के अधीन निम्न दशाओं में पत्नी पति से भरण पोषण नहीं पाएगी-
  • पत्नी ने पुनर्विवाह कर लिया हो|
  • किसी मान्य विधि के अधीन भरण पोषण राशि प्राप्त कर ली हो,
  • यदि पत्नी ने भरण पोषण करने के अधिकार का परित्याग कर दिया हो|
  • मोहम्मद अहमद खां बनाम शाहबानो बेगम, A.I.R. 1985 S.C. के प्रकरण में 1937 में शाहबानो ब मो. अहमद खां का विवाह हुआ जिससे दो पुत्र पैदा हुए| 1975 में शाहबानो को घर से निकाला गया, उसने अलग रहते हुए इंदौर के न्यायलय में 500 रुपए गुजारा भत्ता को मांग की| मजिस्ट्रेट द्वारा 25 रुपए मासिक गुजारा भत्ता का आदेश दिया गया| शाहबानो ने कम राशि होने के कारण उच्च न्यायालय में पुनरीक्षण याचिका दायर की गयी| मो. अहमद खां ने निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील की तथा बचाव में निम्न तथ्य दिया कि-
  • मुस्लिम विधि में भरण पोषण केवल इद्दत के दौरान तक के लिए देय है|
  • क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 125 इस्लाम विरुद्ध है|
  • उच्चतम न्यायलय ने उच्च न्यायालय के निर्णय की पुष्टि की तथा मो. अहमद खां की अपील निम्न तर्कों पर खारिज कर दी-
  • यह कि धारा 125 परिनियमित अधिकार की बात करती है तथा यह मुस्लिम विधि को अभिभूत करती है|
  • यह कि धारा 125 इस्लाम विरुद्ध नहीं| कुरान के सुरा 2 आयत 241, 242, में मुस्लिम तलाक शुदा पत्नी के भरण पोषण की बात दर्ज है|
  • प्रबुद्ध वर्ग व महिला संगठनों द्वारा निर्णय का स्वागत हुआ किन्तु कट्टरपंथियों के विरोध व दबाव के कारण सरकार ने मुस्लिम महिला (विवाह विच्छेद पर अधिकारों का) संरक्षण अधिनियम 1986 पारित किया|
  • मुस्लिम महिला (विवाह विच्छेद पर अधिकारों का) संरक्षण अधिनियम 1986 के अनुसार इद्दत के दौरान भरण पोषण-(1) तलाक शुदा पत्नी इद्दत के दौरान ही पति से भरण पोषण प्राप्त कर सकेगी [धारा 3 (1) खंड (क)]
  • तलाक के पहले या बाद में जन्में पुत्र या पुत्री जो माता की अभिरक्षा में है उसके लिए पत्नी पति से बच्चे के जन्म से 2 वर्ष तक की अवधि तक भरण पोषण प्राप्त करेगी (धारा 3(1) खंड (ख)
  • इद्दत पालन के पश्चात भरण पोषण प्राप्त करना –
  • इद्दत पालन के पश्चात तलाकशुदा महिला निम्न से भरण-पोषण पा सकेगी-
  • ऐसे व्यक्ति जो महिला की सम्पत्ति प्राप्त करेंगे- यदि पुत्र है तो उससे, अगर पुत्र साधन विहीन है तो
  • माता पिता से, अगर माता पिता साधन विहीन है तो
  • संबंधी से, अगर संबंधी भी साधन विहीन हैं तो
  • वक्फ बोर्ड से
  • सेक्रेटरी तमिलनाडु वक्फ बोर्ड बनाम सैयद फातिमा नची, ए.आई.आर. 1996 सु.को. के बाद में यह कहा गया कि कोई मुस्लिम महिला सीधे वक्फ बोर्ड के पास जा सकती है कि उसके माता, पिता, पुत्र, सम्बन्धी साधन विहीन हैं| अत: उसे गुजारा भत्ता दिया जाए|
  1. मेहर व अन्य स्त्री सम्पदा को प्राप्त करने के लिए दीवानी कार्यवाही से तलाक शुदा मुस्लिम महिला मुक्त होगी तथा वह आपराधिक प्रक्रिया के द्वारा उपचार पाने की अधिकारिणी होगी धारा (3)
  2. P.C. की धारा 125 का विकल्प :-
  • इस अधिनियम की धारा 5 Cr.P.C की धारा 125 का विकल्प है| इस अधिनियम के अनुसार यदि आवेदन भरण-पोषण के लिए दिया गया और प्रार्थना-पत्र की पहली सुनवाई पर पति व पत्नी दोनों यह आशय प्रकट करें कि वे Cr.P.C की धारा 125 के अनुसार कार्यवाही चाहते मजिस्ट्रेट धारा 125 की प्रक्रिया अपनायेगा|
  1. धारा 7 जो याचिकायें इस अधिनियम (1986) के बाद Cr.P.C 125-127 के तहत लंबित है उन पर इस अधिनियम के प्रावधान लागू होंगे|
  2. मुस्लिम महिला संरक्षण अधिनियम 1986 का भूतलक्षी प्रभाव नहीं होगा| महर्षि अवधेश बनाम भारत संघ 1994 S.C.C. के प्रकरण में याची ने उच्चतम न्यायालय में इस बात के लिए याचिका दायर की कि मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 38, 39a, 44 के विरोध में है| न्यायालय ने साथ में यह भी कहा कि न्यायालय समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए भारत सरकार को कहे| उच्चतम न्यायालय ने इस याचिका को यह कहकर खारिज कर दिया कि केंद्र सरकार के विधायी कृत्य में दखलंदाजी का हमें कोई अधिकार नहीं है|

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Free Demo Class Every Sunday - 10 AM & Every Wednesday - 04 PM                                    Free Demo Class Every Sunday - 10 AM & Every Wednesday - 04 PM