crpc

crpc

  • इस संहिता में कुल 484 धाराएँ है, जो 37 अध्यायों में विभक्त हैं
  • इसमें दो अनुसूची हैं
  1. अपराधों का वर्गीकरण
  2. प्रारूप
  • सबसे बड़ा अध्याय अध्याय – 6 है, हाजिर होने को विवश करने के लिए आदेशिकाएं है, धारा 61-90
  • यह 1 अप्रैल 1974 से प्रवर्तन में आई है!
  • नवीनतम संसोधन इसमें 2013 में हुआ है, जिसका परवर्तन 3 फरवरी 2013 से हुआ है!
  • धारा 1 के अनुसार ये जम्मू – कश्मीर को लागु नहीं है
  • धारा 1 के अनुसार सिर्फ अध्याय -9,10,11 ही नागालैंड और क्षेत्रों पर लागु है, शेष अध्याय वहाँ लागु नहीं होते है!
  • धारा 2 में कुल 25 परिभाषाएं है!

 

  • दण्ड प्रक्रिया संहिता का मुख्य उद्देश्य एवं विशेषताएँ

 

  1. इसमें पूर्व विधियों की अपेक्षा प्रचुर मानव मूल्य अंतर्ग्रस्त है!
  2. नैसर्गिक न्याय के सिधान्तों के अनुसार अभियुक्त के ऋजु विचारण (Fair Trial) का अपबंध किया गया है!
  3. इसमें नयायपालिका का कार्यपालिका से प्रथक्करण है!
  4. शीघ्र विचारण
  5. मुफ्त विधिक सहायता
  6. प्रति परीक्षा का अधिकार
  7. अग्रीम
  8. चिकित्सीय परीक्षा
  9. बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के 24 घंटे से ज्यादा पुलिस की अभिरक्षा में नहीं रखना, इत्यादि

 

  • अब तक का संसोधन

 

  • सर्वप्रथम दण्ड प्रक्रिया संहिता 1898 लागु हुआ!
  • 1898 के बाद दण्ड प्रक्रिया संहिता – 1973
  • 1973 की संहिता में प्रथम संशोधन – 1978 में हुआ!
  • 1978 के बाद फिर 2005/2006 में मलिमथ कमिटी का सुझाव लाया गया!
  • उसके बाद 2009 में संसोधन किया गया!
  • नवीनतम संसोधन अभी 2013 में किया गया जो की 3 फरवरी 2013 से प्रवृत हुआ!

 

    दण्ड प्रक्रिया संहिता – 1973

Image 1

 

विचारण के बाद की प्रक्रिया – 27-32                                                  पहला – 7 अध्याय

  1. 27. निर्णय                                                              प्रारंभिक
  2. मृत्यु दंडादेशों की पुष्टि के लिए प्रस्तुत किया जाना                         2. दण्ड न्यायालयों और कार्यालयों का गठन
  3. अपीलें                                                              3. न्यायालयों की शक्ति
  4. निर्देश और पुनरीक्षण                                                  4. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की शक्तियां – (क)
  5. अपराधिक मामलों का अंतरण                                              मजिस्ट्रेटों और पुलिस की सहायता –    (ख)
  6. दंडादेशों का निष्पादन, निलंभन, परिहार और लघुकरण                       5. व्यक्तियों की गिरफ्तारी
  7. हाजिर होने की लिए विवश करने की आदेशिकाएं
  8. चीजें पेश करने के लिए आदेशिकाएं

अंतिम – 5 अध्याय

 

  1. जमानत और बंधपत्र
  2. संपत्ति का व्ययन
  3. अनियमित कार्यविधियाँ
  4. कुछ अपराधों का संज्ञान करने के लिए परिसीमा

Image 2

Image 1

Image 2

Image 3

  • अजमानतीय अपराध के अतिरिक्त मुख्य बिंदु
  • जमानत अधिकार के तहत नहीं मांग सकते है
  • अजमानतीय अपराध में न्यायालय अपने स्वविवेक से जमानत दे भी सकती है और नहीं भी दे सकती है!

 

जमानतीय अपराध एवं अजमानतीय अपराध में अंतर

  1. जमानत अधिकार के तहत या न्यायालयों के स्वविवेक के आधार पर
  2. बेल पुलिस द्वारा या न्यायालय द्वारा
  3. अपराध की प्रक्रति के आधार पर
  4. दण्ड के आधार पर, परन्तु अन्य विधि द्वारा

 

 

संज्ञेय तथा असंज्ञेय अपराध 

  • संज्ञेय अपराध 2() – संज्ञेय अपराध दिखाया गया हो प्रथम अनुसूची में और पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है

 

  • असंज्ञेय अपराध 2() – ऐसा मामला जिसमे पुलिस अधिकारी बिना वारंट गिरफ्तार करने का प्राधिकार नहीं होता है

 

  • संज्ञेय एवं असंज्ञेय अपराध में अंतर
  1. अन्वेषण के आधार पर अंतर
  2. अपराध की प्रकृति के आधार पर अंतर
  3. अभियोजन के आधार पर अंतर
  4. दण्ड के आधार पर अंतर

 

समन मामला और वारंट मामला

2(ब)              2(भ)

 

वारंट मामला – जो मृत्यु आजीवन कारावास या दो वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय किसी अपराध से सम्बंधित है!

 

समन मामला – ऐसे अपराध से सम्बंधित है जो की वारंट मामला नहीं है!

 

  • समन मामला और वारंट मामलो में अंतर
  1. दण्ड के अपराध पर
  2. आदेशिका के जारी करने के आधार पर
  3. विचारण प्रक्रिया के आधार पर
  4. अभियोग पत्र जारी करने के आधार पर

Formal Chargesheet

 

शमनीय अपराध और अशमनीय अपराध

  • शमनीय अपराध – ऐसे अपराध जो की दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा-320 की सारणी में भारतीय दण्ड संहिता के आधीन शमनीय दर्शाए गये है!
  • अशमनीय अपराध – धारा-320 की सारणी के अलावा जितने भी अपराध है वो अशमनीय प्रक्रति के होते है!

 

Questions of Main Examination (लिखित परीक्षा के सकल)

 

  1. अपराध को परिभाषित करें एवं प्रक्रियात्मक उद्देश्य के लिए अपराधों का वर्गीकरण करें
  • Define offences and classified offences for the Procedural purpose.

 

  1. जमानतीय एवं अजमानतीय अपराध है एवं इनके मध्य का अंतर दर्शाएँ
  • What is Bailable offence and Non-Bailable offences and what are the differences between them.

 

  1. निम्नलिखित के मध्य का अंतर समझाएं

 

  1. संज्ञेय अपराध तथा असंज्ञेय अपराध

Cognizable offence & Non-Cognizable offence.

 

  1. समन मामला और वारंट मामला

Summon Case & Warrant Case.

 

  1. शमनीय अपराध एवं अशमनीय अपराध

Compoundable offence and Non-Compoundable offences.

Image 1

Image 2

Image 3Image 4

Image 5

परिवाद (Complaint), प्रथम सूचना रिपोर्ट (F.I.R), सूचना (Information) एवं इनके मध्य अंतर

  1. परिवाद (Complaint) – परिवाद धारा 2 (घ) में परिभाषित किया गया है! इसके अनुसार:
  • एक लिखित या मौखिक अभिकथन है
  • जिसमे किसी अपराधिक घटना के तथ्य सम्मिलित रहते है
  • यह अभिकथन सदैव मजिस्ट्रेट के समक्ष ही किया जाता है
  • इस अभिकथन द्वारा मजिस्ट्रेट से किसी ज्ञात अथवा अज्ञात व्यक्ति के द्वारा किये गए अपराध के बारे में कहा जाता है!
  • इस अभिकथन द्वारा मजिस्ट्रेट से यह निवेदन किया जाता है की वह ऐसे ज्ञात अथवा अज्ञात व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही करे!
  • जो व्यक्ति मजिस्ट्रेट से कार्यवाही करने का निवेदन करता है वो परिवादी कहलाता है!
  • परिवाद के अंतर्गत पुलिस रिपोर्ट को सम्मिलित नहीं किया गया है!

 

स्पस्टीकरण = ऐसे किसी मामले में पुलिस अधिकारी द्वारा की गयी रिपोर्ट परिवाद समझी जाएगी जहाँ अन्वेषण के पश्चात किसी असंज्ञेय अपराध का किया जाना प्रकट होता है! इस तरह के मामले में वह पुलिस अधिकारी परिवाद समझा जाता है, जिसके द्वारा ऐसी रिपोर्ट की गयी है

 

परिवाद करने की पात्रता

  • परिवाद करने के लिए किसी शर्त अथवा स्थिती का विद्दमान होने आवश्यक नहीं है
  • समाज का कोई भी व्यक्ति परिवाद कर सकता है, चाहे भले ही वह व्यक्ति अपराधिक तथ्य का साक्षी हो, या न हो, अथवा चाहे भले ही व्यक्ति पीड़ित पक्षकार हो या न हो
  • धारा – 195, 198, 199 अपवाद है इनके अनुसार कुछ विशेष व्यक्ति ही परिवाद कर सकते है!

इत्तिला/सूचना (Information)

  • इत्तिला में मजिस्ट्रेट को केवल सूचना दी जाती है, कोई निवेदन नहीं किया जाता है
  • इत्तिला मिलने पर मजिस्ट्रेट चाहे तो कार्यवाही कर सकता है अथवा नहीं भी कर सकता है!
  • इत्तिला के आधार पर कार्यवाही करने के मार्ग में दो प्रकार की रूकावटे आती है!

 

प्रथम = यह की इत्तिला के आधार पर कार्यवाही करने का अधिकार प्रथम तथा विशेष रूप से शशक्त किये गए द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट को हो!

द्वितीय = यदि इत्तिला के आधार पर कार्यवाही की जाती है जो अभियुक्त को यह अधिकार प्राप्त है की वह चाहे तो मामले को दूसरे द्वितीय के यहाँ अंतरित करवा सकता है!

Image 6

प्रारंभिक परीक्षा के प्रश्न

  1. अपराधो का वर्गीकरण निम्न में से किसके अंतर्गत किया गया है!

(a) धारा -320

(b) प्रथम अनुसूची

(c) द्वितीय अनुसूची

(d) धारा -482

 

  1. अपराधों का कौन सा वर्गीकरण दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आता है!

(a) संज्ञेय एवं असंज्ञेय अपराध

(b) जमानतीय एवं अजमानतीय अपराध

(c) समन मामला एवं वारंट मामला

(d) उपर्युक्त सभी

 

  1. निम्न में से दण्ड प्रिक्रिया संहिता के लिए कौन सा कथन सत्य है!

(a) यह मुख्यत: प्रक्रियात्मक विधि है

(b) कुछ उपबंध इसमें मूल विधि प्रक्रति के भी सम्मिलित किये गए है!

(c) उपर्युक्त क एवं ख दोनों

(d) इनमे से कोई भी नहीं

 

  1. संज्ञेय अपराध किसी धारा में परिभाषित है (दण्ड प्रक्रिया के)

(a) धारा – 2(a)

(b) धारा – 2(c)

(c) धारा – 2(i)

(d) धारा – 2(1)

 

  1. संज्ञेय अपराध में पुलिस अधिक्रत होता है

(a) व्यक्ति को बिना वारंट गिरफ्तार करने के लिए

(b) बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के अन्वेषण करने के लिए

(c) उपर्युक्त दोनों

(d) इनमे से कोई नहीं

  1. जमानतीय अपराधो में जमानत अधिकार स्वरुप दिया जाता है!

(a) पुलिस ऑफिसर द्वारा

(b) न्यायालय द्वारा

(c) पुलिस ऑफिसर और न्यायालय दोनों द्वारा

(d) या तो पुलिस द्वारा या न्यायलय द्वारा

 

  1. धारा 2(x) के अंतर्गत वारंट मामलो को परिभाषित किया गया है की मृत्यु, आजीवन कारावास या………….से अधिक की अवधि के कारावास से दण्डनीय किसी अपराध से सम्बंधित है

(a) तीन साल

(b) दो साल

(c) एक साल

(d) एक साल से अधिक किन्तु दो साल से कम

 

  1. समन मामला और वारंट मामला का वर्गीकरण:

(a) उपयोगी है विचरण की प्रक्रिया प्रारंभ के लिए!

(b) उपयोगी है अन्वेषण की प्रक्रिया निश्चित करने के लिए!

(c) उपयोगी है आदेशिका जारी करने के उद्देश्य के लिए!

(d) उपयुक्त (क) एवं (ग) दोनों!

 

  1. भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता संसोधन 2013 कब से प्राकृत हुआ

(a) 13 फरवरी 2013

(b) 1 जून 2014

(c) 3 फरवरी 2013

(d) 1 अप्रैल 201

1). अन्वेषण (Investigation): Sec-2 (H)

  • अन्वेषण के अंतर्गत वे सब कार्यवाहियां है जो
  • इस संहिता के अधीन पुलिस अधिकारी द्वारा साक्ष्य एकत्र करने के लिए किया जाये या
  • कोई ऐसा व्यक्ति जो मजिस्ट्रेट द्वारा साक्ष्य संग्रह के लिए प्राधिकृत किया गया है!

 

  • ये कर्येवाहियाँ इस धारणा निर्माण के साथ समाप्त हो जाती है की क्या संग्रहित सामग्री के आधार पर ऐसे किसी मामले का निर्माण हो रहा है की अभियुक्त को विचारण के लिए मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाये और यदि ऐसा है, जो धारा १७३ के आधीन आरोप पत्र फाइल करने के लिए आवश्यक कदम उठाये जाएँ!

 

अन्वेषण की कार्यवाही में निम्न कार्यवाहियां सम्मिलित रहती है:

  1. अपराध स्थल का परिदर्शन
  2. मामले के तथ्य और परिस्थियों को सुनिश्चित करना
  3. संदेहप्रद अपराधी की खोज और गिरफ्तारी
  4. अपराध के किये जाने से संबधित साक्ष्यों को एकत्रित करना
  5. अभियुक्त सहित विभिन्न व्यक्तियों का परिक्षण करना और यदि अन्वेषणकर्ता ठीक समझे तो ऐसे परीक्षित व्यक्तियों के कथन को लेखबद्ध करना
  6. अन्वेषण या विचारण के लिए आवश्यक समझे जाने वाले स्थानों की तालाशी और समानो को जब्त करना
  7. एकत्रित सामग्री एवं पूछताछ आदि के आधार पर रिपोर्ट तैयार करना
  8. संदभीर्त रिपोर्ट, धारा 173 (2) में पुलिस रिपोर्ट के रूप में प्रस्तुत करना

जांच (Enquiry)-2(g) या 2 (छ)

  • ऐसे प्रत्येक जांच जो इस संहिता के आधीन मजिस्ट्रेट या न्यायालय द्वारा की जाए जो की विचारण नहीं है!

दण्ड प्रक्रिया संहिता में विचारण शब्द की परिभाषा नहीं दी गयी है! इसका तात्पर्य विधिसम्मत वह न्यायिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के दोष या निर्देश का विनिश्चय किया जाता है!

अत: जहाँ कोई मजिस्ट्रेट या न्यायलय किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के दोषी या निर्दोश्पन के विनिश्चयन हेतु जांच कार्य संपादित करता है वहाँ ऐसी जांच को धारा 2(g) के भावबोध के अंतर्गत “जांच” नहीं समझा जाएगा, अपितु उसे सरल और सुध रूप से विचारण समझा जाएगा! परन्तु जहाँ जांच कार्य ऐसी विषय वास्तु से सम्बंधित है, जो किसी अभिकथित अपराध के सम्बंध में दोषी अथवा निर्दोश्पन के विनिश्चय से सम्बंधित नहीं है, वहाँ ऐसे जांच कार्य को विहरण न कह कर सरल और शुद्ध रूप से “जांच” कहा जाएगा!

      Inquiry

 

इस तरह मजिस्ट्रेट न्यायालय द्वारा की गयी वे समस्त कार्यवाहियां, जो विचारण के पूर्व सम्पादित की जाती है, जांच कहलाती है!

Image 1

Image 2

Image 1

गिरफ्तारी क्या है ?

  • गिरफ्तारी न ही दण्ड प्रक्रिया संहिता में परिभाषित है और न ही दण्ड संहिता में!

सामान्य शब्दों में गिरफ्तारी से तात्पर्य किसी व्यक्ति को विधिक प्राधिकारी की अभिरक्षा में लेना है! गिरफ्तारी न्यायालय के आदेश पालन के लिए बाध्य करने, अपराध होने से रोकने या आरोपित व्यक्ति या अपराध के संधिग्ध व्यक्ति को जवाब देने के लिए उसकी स्वतंत्रता पर अवरोध है!

 

UOI vs Padam Narayan के बाद में Arrest को AIR-2008 S.C

 

Define किया गया है – गिरफ्तारी न्यायालय या सभ्यक प्राधिकृत अधिकारी के समादेश का निष्पादन है!

 

गिरफ्तारी के मुख्य बिंदु

  • गिरफ्तारी में Custody होती है पर हर Custody गिरफ्तारी हो ये जरुरी नही
  • अरेस्टेड व्यक्ति की Custody (अभिरक्षा) में लेने के साथ शुरू होता है तथा उसके छोड़े जाने तक निरंतर रहता है!
  • गिरफ्तार न्यायलय के आदेश पर समादेश पर किसी व्यक्ति को Custody में लेना है!

Image 2

Arrest without Warrant (गिरफ्तारी बिना वारंट के U/S-41)

CIPSODERR

 

C = Cognizable offence – Commit in the presence of the police officer (a)

Image 3

P  = C – Proclaimed offender (उद्घोषित अपराधी)

S  =  D – Stolen Property (चुराई गयी संपत्ति)

O = E – Obstructor (बाधा पहुचाने वाला)

D = F – Deserter (अभित्याजक)

E = G – Extradition (प्रत्यर्पण)

R = H – Realesed conuict (छोड़ा गया सिध्दोश व्यक्ति)

R = I – Requstion (गिरफ्तारी की अध्यपेक्षा)

 

 

 

 

 

Sec-42 – नाम और निवास स्थान बताने से इनकार करने पर गिरफ्तारी ( असंज्ञेय मामले में बिना वारंट गिरफ्तारी)

Sec-43 – प्राइवेट व्यक्ति द्वारा गिरफ्तारी

  • Without arrest warrant-43
  • With arrest warrant-73

 

  • बिना वारंट गिरफ्तारी कब:-
  • PVT व्यक्ति की उपस्थिति में अजमानतीय+संज्ञेय अपराध किया है!
  • जब कथित व्यक्ति उद्घोषित अपराधी है!

 

  • गिरफ्तारी कैसे:-
  • स्वयं कर सकता है या
  • करवा सकता है

 

  • गिरफ्तारी के बाद की प्रक्रिया:-
  • निकटतम पुलिस अधिकारी के पास ले जायेगा / भिजवा देगा
  • निकटतम पुलिस थाने में ले जायेगा या भिजवा देगा

 

Sec-43 – PVT व्यक्ति पर यह duty impose नहीं करती की वह किसी अपराधी को गिरफ्तार करके उसे थाने तक पहुंचाए ही पहुंचाए!

 

Sec-44 – मजिस्ट्रेट द्वारा गिरफ्तारी:-

Image 4

कब                   (स्थानीय अधिकारिता+उपस्तिथि) +कोई अपराध

 

  • यदि मजिस्ट्रेट अपनी स्तानीय अधिकारिता से बाहर जाकर गिरफ्तारी करता है तो as a put person करेगा

Mains Questions (मुख्य परीक्षा के प्रश्न)

 

  1. गिरफ्तारी से आप क्या समझते है? गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकारों की चर्चा करें!
  2. गिरफ्तारी कैसे किया जाता है? स्त्री को गिरफ्तारी के लिए के लिए क्या नियम बताये गए है!

 

Important Case Law Regarding to the Arrest

 

  1. Prem Shankar Shukla vs Delhi Administration

 

कारागार से न्यायालय के बिच कैदी को लाने और ले जाने के समय हथकड़ी से छुट होनी चाहिए! हथकड़ी अपवाद स्वरुप ही लगाई जाए और हथकड़ी लगाने के कारणों को अभिलिखित किया जाए!

 

  1. K. Basu vs West Bengal

 

गिरफ्तारी और निरोध में रखे गए व्यक्ति के सम्बंध में नूतन संरक्षात्मक निर्देश

इस बाद में पुलिस करमचारियों के लिए अनुपालन हेतु निर्देश जारी किया है, जिसे उन्हें ऐसे व्यक्ति के सम्बंध में पालन करना है, जिसकी वे गिरफ्तारी कर रहे है, अथवा जिसे वे निरोध में रख रहे है!

 

  1. UOI vs Padam Narayan – 2008

 

गिरफ्तारी को परिभाषित किया गया है

                                                        Rights of Arrested person

 

  1. विधि के अनुसार गिरफ्तार किये जाने का अधिकार – 60(A)
  2. अपराध के विवरण या गिरफ्तारी के अन्य आधार बताये जाने का अधिकार Sec-50(1) R/W-22(1) constitution
  3. जमानत के आधिकार के बारे में बताये जाने का अधिकार -50(2)
  4. विधि के अनुसार जमानत पर रिहा करने का अधिकार Sec-436
  5. स्वास्थ्य एवं सुरक्षा का अधिकार 55(A)
  6. अन्वेषण के दौरान अपने अधिवक्ता को उपस्थित रखने का अधिकार 41(D)
  7. 24 घंटे से अधिक बिना मजिस्ट्रेट के हिकार के विरुद्ध गिरफ्तारी – 57
  8. बिना विलंभ मजिस्ट्रेट के समाख प्रस्तुत किये जाने का अधिकार – 56
  9. विधि के अनुसार तलाशी तथा जब्ती का अधिकार – 51,52
  10. विधि के अनुसार चिकत्सीय परिक्षण का अधिकार – 53
  11. चिकित्सा परिक्षण रिपोर्ट सीधे प्राप्त करने का अधिकार – 54
  12. अपनी पसंद के अधिवक्ता से परामर्श करने तथा उसके माध्यम से प्रतिरक्षा का अधिकार – Art-22(2), R/W-303 CRPC
  13. मुफ्त विधिक सहायता का अधिकार – 304 CRPC

प्रक्रिया – गिरफ्तार करके अभिरक्षा में भेज देना

 

गिरफ्तारी किसी:- जिसकी गिरफ्तारी के लिए वह उस समय और उन परिस्तिथियों में वारंट जारी करने में सक्षम है!

 

Sec-45सशस्त्र बालो के सदस्यों का गिरफ्तारी से संरक्षण

 

  • बिना केन्द्रीय सरकार की सहमती के कोई भी सशस्त्र बल का सदस्य धारा – 41-44 के अंतर्गत गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है!

 

Sec-46गिरफ्तारी कैसे की जाएगी

 

  1. व्यक्ति के शारीर को वस्तुतः हुएगा या परिरुध करेगा परन्तु महिला को गिरफ्तार करने के लिए कोई पुरुष अधिकारी महिला को स्पर्श नहीं करेगा, महिला पुलिस अधिकारी ही उसको गिरफ्तार करने के लिए स्पर्श कर सकती है!

 

  1. अगर कोई व्यक्ति बल का प्रयोग करता है गिरफ्तारी का बलात प्रतिरोध करता है तो पुलिस अधिकारी आवश्यक सभी साधनों को उपयोग में ला सकता है!

 

  1. अगर व्यक्ति ने ऐसा कोई अपराध नहीं किया है जो की मृत्युदण्ड या आजीवन कारावास से दंडनीय है तो उस स्थिति में गिरफ्तारी के लिए व्यक्ति का मृत्यु कारित नहीं किया जा सकता है!

 

  1. साधारण पारिस्थिती में किसी भी स्त्री को सूर्योदय के पहले और सूर्यास्त के बाद गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है परन्तु अगर आसाधारण परिस्थियां विद्यमान है तो स्त्री पुलिस अधिकारी ऐसे प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुज्ञा अभिप्राप्त करेगी, जिसकी स्थानीय अधिकारिता के भीतर अपराध किया गया है या गिरफ्तारी की जानी है!

संज्ञेय तथा असंज्ञेय अपराध में अन्तर

 

संज्ञेय अपराध की परिभाषा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 2 (ग) में डी गयी है| धारा 2 (ग) के अनुसार –

‘संज्ञेय अपराध’ से ऐसा अपराध अभिप्रेत है जिसके लिए और ‘संज्ञेय मामला’ से ऐसा मामला अभिप्रेत है जिसमें पुलिस अधिकारी प्रथम अनुसूची के या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अनुसार वारंट के बिना गिरफ्तार कर सकता है|

यहाँ संज्ञेय अपराध व संज्ञेय मामला दोनों शब्द प्रयुक्त हुए हैं| अर्थात जब अपराध घटित हो तब या जब प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो तब दोनों परिस्थितियों में पुलिस बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है|

 

असंज्ञेय अपराध धारा 2(ठ)

‘असंज्ञेय अपराध’ से ऐसा अपराध अभिप्रेत है जिसके लिए और ‘असंज्ञेय मामला’ से ऐसा मामला अभिप्रेत है जिसमें पुलिस अधिकारी को वारंट के बिना गिरफ्तार करने का प्राधिकार नहीं होता है|

कोई मामला संज्ञेय है या असंज्ञेय यह जानने के लिए दण्ड प्रक्रिया संहिता की प्रथम अनुसूची का अवलोकन करना पड़ेगा| प्रथम अनुसूची में बताया गया है कि कौन से मामले संज्ञेय है और कौन से असंज्ञेय|

संज्ञेय व असंज्ञेय मामलों का वर्गीकरण दण्ड के आधार पर नहीं किया जा सकता है जैसे धारा 279 में सजा मात्र 6 माह की है लेकिन मामला संज्ञेय है जबकि धारा 495 में सजा दस वर्ष है लेकिन वह असंज्ञेय है|

जहाँ पर यह वर्णित न हो कि मामला संज्ञेय है या असंज्ञेय वहां 3 वर्ष तक के मामलों को असंज्ञेय एवं 3 वर्ष या अधिक के मामलों को संज्ञेय माना जाता है|

Image 1

परिवाद एवं प्रथम सूचना रिपोर्ट

परिवाद की परिभाषा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 2 (घ) में दी गयी है| धारा 2 (घ) के अनुसार –

परिवाद से दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन मजिस्ट्रेट द्वारा कार्यवाही किये जाने की दृष्टि से मौखिक या लिखित रूप में किया गया अभिकथन अभिप्रेत है कि किसी व्यक्ति ने चाहे वह ज्ञात हो या अज्ञात अपराध किया है, किन्तु इसके अंतर्गत पुलिस रिपोर्ट नहीं है|

स्पष्टीकरण– यदि किसी मामले के अन्वेषण के पश्चात असंज्ञेय अपराध का किया जाना प्रकट होता है तो पुलिस अधिकारी द्वारा की गयी रिपोर्ट परिवाद तथा पुलिस अधिकारी परिवादी समझा जाएगा|

अत: परिवाद का तात्पर्य ऐसी शिकायत से है जो मजिस्ट्रेट को इसलिए की जाती है कि वह उस शिकायत पर कार्यवाही करे|

प्रथम सूचन रिपोर्ट (F.I.R.)

प्रथम सूचना रिपोर्ट की संहिता में परिभाषा नहीं दी गयी है| धारा 154 में यह बताया गया है कि संज्ञेय मामलों की सूचना थाने में दी जाती है जिसको थाना प्रभारी लिखकर आगे कार्यवाही करता है|

अत: प्रथम सूचना रिपोर्ट से तात्पर्य है-

  • अपराध के बारे में प्रथम सूचना रिपोर्ट|
  • ऐसा अपराध संज्ञेय होना चाहिए|
  • ऐसी सूचना अपराध घटित होने के बाद सर्वप्रथम थाने में दी जाती है|
  • ऐसी सूचना मौखिक या लिखित हो सकती है|

Image 2

अन्वेषण, जांच एवं विचारण में अंतर

अन्वेषण की परिभाषा धारा 2 (ज) में दी गयी है|

अन्वेषण के अंतर्गत वे सब कार्यवाहियां सम्मिलित हैं जो इस संहिता के अधीन-

  • पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट से भिन्न किसी व्यक्ति द्वारा जिसे मजिस्ट्रेट सशक्त करे|
  • साक्ष्य एकत्र करने के लिए की जाए|

अत: अन्वेषण साक्ष्य एकत्र करने के लिए किया जाता है जिसे पुलिस अधिकारी या धारा 202 में किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट सशक्त करे वह भी कर सकता है|

जांच धारा 2 (छ)

जांच से अभिप्रेत है –

  • विचारण से भिन्न
  • मजिस्ट्रेट या न्यायालय द्वारा की जाए|

अत: जांच हमेशा मजिस्ट्रेट या न्यायालय ही कर सकता है, पुलिस अधिकारी जांच नहीं कर सकता| जांच का उद्देश्य भी किसी भी व्यक्ति की दोषसिद्धि या दोषमुक्ति न होकर या होता है कि प्रथम दृश्या उस मामले में कार्यवाही की जाए या नहीं| इसलिए धारा 107, 108, 109, 110, 125, 190, 200 आदि को जांच ही माना जाता है विचारण नहीं|

विचारण

विचारण की अधिनियम में परिभाषा नहीं दी गयी है| सामान्य अर्थों में विचारण से तात्पर्य है साक्ष्यों को लेने और उन पर विचार करने के पश्चात दोषसिद्धि एवं दोषमुक्ति का निर्णय करना| विचारण भी सदैव मजिस्ट्रेट या न्यायालय कर सकता है क्योंकि यह शुद्ध न्यायिक कार्य होता है|

Image 3

समन मामला व वारंट मामला में अन्तर

समन मामला – धारा 2 (ब)

समन मामला से ऐसा मामला अभिप्रेत है जो वारंट मामला नहीं है|

वारंट मामला – धारा 2 (भ)

वारंट मामला से ऐसा मामला अभिप्रेत है जो-

  • मृत्यु,
  • आजीवन कारावास, या
  • दो वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय किसी अपराध से सम्बन्धित है|

अत: 2 वर्ष से कम के कारावास से दंडनीय मामले समन मामले होते हैं| यदि कई समन मामले साथ में हों चाहे उन सभी का दण्ड मिलाकर 2 वर्ष से ऊपर ही क्यों न हो जाये वह समन मामला ही माना जायेगा किन्तु यदि एक से अधिक समन मामला हो और उनमें एक वारंट भी हो तो पूरा मामला वारंट मामला ही माना जायेगा|

Image 4

समन और वारंट

समन एवं वारंट की परिभाषा संहिता में नहीं दी गयी है| समन एवं वारंट दोनों व्यक्तियों की हाजिरी के लिए जारी किये जाते हैं| सामान्यत: किसी मामले में व्यक्ति की उपस्थिति के लिए समन तत्पश्चात वारंट जारी किये जाते हैं| फिर भी दोनों में निम्न अन्तर है –

Image 5

भूमि के कब्जे एवं उपयोग से सम्बन्धित विवाद जिससे शान्ति भंग होने की सम्भावना हो

(धारा 145 एवं धारा 147)

धारा 145 एवं धारा 147 दोनों भूमि या जल से सम्बन्धित विवाद की दशा में जहाँ शान्ति भंग होने की सम्भावना हो निवारण का उपबन्ध करते हैं|

जहाँ धारा 145 में भूमि के कब्जे से सम्बन्धित विवाद होता है जिससे शान्ति भंग होने की सम्भावना होती है वहीं धारा 147 में भूमि के उपयोग को लेकर शान्ति भंग की सम्भावना होती है|

आचार्य जगदीश्वरानन्द अवधूत बनाम पुलिस आयुक्त, कलकत्ता, ए. आई. आर. 1984 एस. सी. 51 में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिकथित किया कि इन धाराओं में मजिस्ट्रेट द्वारा पारित किया गया आदेश केवल अस्थायी प्रकृति का होता है तथा यह तब तक अस्तित्व में रहता है जब तक कि समक्ष अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा विवाद का निस्तारण नहीं कर दिया जाता|

Image 6

Image 7

पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित और परिवाद पर संस्थित वारंट मामले

पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित वारंट मामले

 

पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित वारंट मामले वे मामले होते हैं जिनमें पुलिस अन्वेषण करने के पश्चात धारा 173 में आरोप-पत्र प्रेषित करती है और मजिस्ट्रेट धारा 190 (1) (ख) के अधीन संज्ञान लेता है| इन मामलों के विचारण की प्रक्रिया भिन्न है| इन मामलों में धारा 207 के अनुसार पहले प्रथम सूचना रिपोर्ट, 161 का बयान आदि की नक़ल अभियुक्त को दी जाती है तत्पश्चात आरोप विरचित किया जाता है|

परिवाद पर संस्थित मामले वे होते हैं जिनमें मजिस्ट्रेट धारा 190 (1) (क) में परिवाद के आधार पर संज्ञान लेता है एवं धारा 200 में परिवादी का बयान और आवश्यक हो तो धारा 202 में परिवादी के अन्य साक्षियों के बयान दर्ज करने के बाद धारा 204 में आदेशिका जारी करता है| परिवाद पर संस्थित मामलों में सर्वप्रथम परिवादी के साक्षियों का बयान धारा 244 में होता है और यदि मामला बनता है तब धारा 245 में आरोप विरचित किये जाते हैं|

Image 8

समन विचारण एवं वारन्ट विचारण

समान विचारण उन मामलों का होता है जो समान मामले होते हैं अर्थात् वे मामले जो 2 वर्ष से कम के दण्ड से दण्डनीय हैं| चूंकि यह छोटे मामले होते हैं अतः इनके विचारण के लिये संक्षिप्त प्रक्रिया अपनायी जाती है|

वारंट विचारण उन मामलों का होता है जो वारंट मामले होते हैं अर्थात् वे मामले जो 2 वर्ष से अधिक, आजीवन कारावास या मृत्युदण्ड से दण्डनीय हैं| इन मामलों में विचारण की विस्तृत प्रक्रिया अपनायी जाती है|

Image 9

अपराधों का शमन एवं सौदा अभिवाक् (Plea Bargaining)

अपराध का शमन- अपराध के शमन का अर्थ है आपसी समझौते से मामले का निपटारा|

उ.प्र. राज्य बनाम चन्द्रपाल सिंह, (1968)क्रि.लॉ ज. 1342 में न्यायालय ने अपराध के शमन का अर्थ स्पष्ट करते हुये कहा कि शमन वह सुभिन्न बन्दोबस्त है जिसके अधीन व्यथित व्यक्ति तथा व्यक्ति के मध्य जिसके विरुद्ध परिवाद किया गया है समझौता सम्मिलित होता है|

कोई अपराध शमनीय है या नहीं इसके लिए धारा 320 में दो सूचियां दी गयी हैं जिसमें प्रथम सूची में जो अपराध दिये गये हैं उसको न्यायालय की अनुमति के बिना शमन किया जा सकता है जबकि दूसरी सूची में जो अपराध दिये गये हैं उनको न्यायालय की अनुमति से शमन किया जा सकता है| सामान्यतः शमन उन्हीं अपराधों का होता है जो समाज का सन्त्रास उत्पन्न नहीं करते एवं व्यक्तिगत प्रकृति को होते हैं|

सौदा-अभिवाक् (Plea Bargaining)

सौदा अभिवाक् सन् 2006 के संशोधन अधिनियम द्वारा संहिता में जोड़ा गया जो धारा 265-क से 265-ठ तक में है|

सौदा अभिवाक् की परिभाषा संहिता में नहीं दी गयी है किन्तु जैसा नाम से ही स्पष्ट है कि सौदा अभिवाक् अर्थात् इन मामलों में दण्ड के प्रश्न पर परिवादी एवं अभियुक्त के बीच सौदेबाजी होती है और दोनों पक्षकारों में जो तय होता है उस आधार पर न्यायालय निर्णय करता है, किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि निम्न औप्रधों में अभिवाक् सौदेबाजी नहीं होगी जो मृत्यु, आजीवन कारावास, 7 वर्ष से अधिक के कारावास से दण्डनीय है या जो सामाजिक-आर्थिक अपराध हो या 14 वर्ष से कम आयु के बालक या स्त्री के विरुद्ध हो|

Image 10

उन्मोचन एवं दोषमुक्ति

उन्मोचन एवं दोषमुक्ति की परिभाषा संहिता में नहीं दी गयी है| उन्मोचन का तात्पर्य होता है जब अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है तो उसको उन्मोचित कर दिया जाता है किन्तु तत्पश्चात् नये साक्ष्य आने पर उसका विचारण दुबारा हो सकता है|

दोषमुक्ति का अर्थ होता है कि अभियोजन एवं अभियुक्त का साक्ष्य लेने के पश्चात् मजिस्ट्रेट द्वारा गुण-दोष के आधार पर जब अभियुक्त के विरुद्ध अपराध साबित न हो पाये तब उसे दोषमुक्त करना| एक बार अभियुक्त की दोषमुक्ति के बाद उसका दुबारा उसी अपराध के लिये विचारण नहीं हो सकता|

Image 11

फरार व्यक्ति के लिए उद्घोषणा धारा -82

यदि किसी न्यायालय को यह विश्वास हो गया है की जिसके विरुद्ध वारेंट जारी किया गया है फरार है या अपने आप को छिपा रहा है जिसमे वारेंट जारी निस्पायण नहीं हो सकता है तब न्यायालय उसे अपेक्षा जारी कर सकेगा की विर्निद्रिष्ट समय पर जो उस उद्घोषणा से कम से कम 30 दिन पश्चात् का है हाज़िर हो, यह उद्घोषणा निम्न रूप से प्रकाशित की जायगी –

  • उस नगर या ग्राम के जिसमे व्यक्ति साधारणतया निवास करता हो, सहज द्रश्य भाग मे सार्वजनिक रूप से पढ़ी जायगी
  • निवास स्थान के सहज द्रश्य भाग मे या उस नगर के सहज द्रश्य भाग मे लगाई जायगी
  • एक प्रति सहज द्रश्य भाग मई लगाई जायगी
  • यदि न्यायालय ठीक समझता है तो निर्देश दे सकेगा की उसकी एक प्रति किसी देनिक समाचार पत्र जो उसके निवास के स्थान मे प्रचिलित है प्रकाशित की जायगी

फरार व्यक्ति के संपत्ति की कुर्की धारा- 83

धारा-82 के पश्चात लेखबद्ध कारणों से उद्घोषणा जारी करने वाला न्यायालय उद्घोषित व्यक्ति को चल या अचल दोनों संपत्ति के कुर्की के आदेश दे सकता है, जबकि न्यायालय को सपथ पत्र द्वारा अन्यथा

  • समाधान हो जाये की वह अपनी संपत्ति पूरी या भागत: व्ययन करने वाला है |
  • संपत्ति उस न्यायालय की सीमा से हटाने वाला है|
  • स्थावट संपत्ति, जो राजस्व देती है, की कुर्की कलेक्टर माध्यम से की जायगी|
  • जीवधन या नष्ट होने वाली संपत्ति की कुर्की के बाद सम्पत्ति देखने का आदेश देगा व विक्रय आगम न्यायालय के अधीन रहे
  • इस कुर्क सम्पत्ति पर अपने हित का दावा अन्य व्यक्ति द्वारा 6 मास के अंदर की जायगी धारा-84
  • दावा नामंजूर होने पर एक वर्ष के अंदर वाय संश्थित कर सकता है-84

धारा -85 के अनुसार उद्घोषित व्यक्ति यदि दिए गए समय के अंदर हाज़िर हो जाये, तब न्यायालय संपत्ति को निर्मुक्त का आदेश देगा|

धारा -86 धारा 85(3) के अंतर्गत पुनः स्थापना अस्वीकार किये जाने से पीड़ित व्यक्ति सक्षम न्यायालय मई अपील कर सकेगा

धारा -87 समन के स्थान पर या उसके अतिरिक्त वारेंट जारी किया जाना न्यायालय निम्न स्थानों पर वार्रेंट जारी कर सकेगा –

  • जब यह विश्वास का कारण दिखाई दे की वह करार हो गया है
  • समन का पालन न करेगा
  • समन मे दिए गए समय पर हाज़िर न होता हो

न्यायालय मे उपस्थित व्यक्ति से हाज़िर होने का बंधपत्र-88 R/W 89

  • यदि वह व्यक्ति जिसके हाज़िर होने या जिसकी गिरफ्तारी हेतु पीठासीन अधिकारी समन्स या वार्रेंट जारी कर सकता है न्यायालय मे ही उपस्थित है तब धारा -88 लागू होगी|
  • पीठासीन अधिकारी समन या वार्रेंट जारी करने के बजाय संबंधित व्यक्ति से हाज़िर होने के लिए बंधपत्र निस्यपित करने की अपेक्षा कर सकता है,
  • धारा- 89 जब कोई व्यक्ति, जो इस संहिता के अधीन लिए गए किसी बंधपत्र द्वारा न्यायालय के समक्ष हाज़िर होने के लिए आबद्ध है, हाज़िर नही होता है तब न्यायालय के समक्ष देश करवा सकता है|

धारा-90 अध्याय-6 के अबंध, संहिता के अंतर्गत जारी किये गए प्रत्येक समन तथा प्रत्येक गिरफ्तारी के वारेंट पर लागू होंगे

सामान्य

  1. अध्याय-9 [धारा -125-128] पत्नियों, संतानों तथा माता- पिता के भरन पोषण से संबधित है

उद्देश्य: धारा-125 से प्रारंभ होने वाले इस अध्याय का उद्देश्य उन व्यक्तियों के विरुद्ध त्वरित प्रभावी और कम व्ययशील उपचार प्रदान करता है, जो अपनी आश्रित पत्नी , संतानों और माता-पिता के भरन-पोषण करने से इनकार कर देते है|

इस अध्याय के अबन्धो की विषय-वस्तु, यधपि सिवल प्रक्रति की है, परन्तु दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत इन्हें सम्मिलित करने का प्रारम्भिक उदेश्य यह है की इसमें उलिखित व्यक्तियों को सिवल न्यायालयों मई उपलब्ध उपचारों की अपेक्षा कहीं अधिक त्वरित और कम खर्चीला उपचार मिल सके| इस तरह इन उपबंधो का भरण-पोषण के आभाव मे होने वाली उस भुखमरी और आवारागर्दी का निवारण कराना है, जिसमे अपराध का प्रसार होता है|

इस अध्याय मे  धारा-125-128 तक जितने भी उपबंध है, वे सब हर व्यक्ति पर लागू होते है, चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हों,

चुकि इस अध्याय के अंतर्गत दिया गया अनुतोष सिविल प्रक्रति का है, अत: मजिस्ट्रेट द्वारा दिया गया अंतिम नहीं है और कोई भी पक्षकार मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद भी अपने अधिकारों के लिए सिविल न्यायालय मे वाद चल सकता है|

 

भरण-पोषण के लिए दावा करने का कौन व्यक्ति हकदार है-

  • पत्नी किसी भी आयु की – अवयस्क तथा व्यसक हो सकती है
  • मुस्लिम पत्नी इद्धत के बाद भी धारा -125 के अंतर्गत भरण-पोषण का दावा कर सकती है, जब तक वह अपना विवाह न कर ले
  • सिविल न्यायालय द्वारा भरण-पोषण की धनराशी निर्धारित हो जाने के बाद धारा-125 के अधीन उसका नियत किया जाना सुसंगत नही है|
  • पति का धर्म परिवर्तन = liable for maintenance
  • पति द्वारा दूसरा विवाह करना = जिस दिन से दूसरा विवाह किया है maintenance तब से देनी होगी|
  • पत्नी का तात्पर्य विधिकत: विवाहित महिला
  • दूसरी पत्नी को भरण-पोषण

अपनी धर्मज या अधर्मज अव्स्यक संतान-

  • संतान अवयस्क पुत्र या पुत्री
  • पिता का धर्म परिवर्तन
  • संतान जिसका उद्भव जारकर्म के परिणामस्वरूप हुआ है |
  • अवयस्क मुस्लिम संतान का अधिकार पुत्री के केस मे जब तक उसका विवाह नहीं हो जाता|
  • व्यस्य्क संतान जो मानसिक एवं शारीरिक रूम से विकृत है
  • व्यस्य्कता प्राप्ति से लेकर विवाह होने तक पुत्री का भरण-पोषण- hindu adoption and maintenance act 1956 धारा-20(3)

अपने माता-पिता का भरण-पोषण

  • वास्तविक एवं नेर्संगिक माता
  • दत्तक माता
  • सोतेली माता सम्मिलित नहीं है-

किर्तिकांत डी. वादोदारिया vs गुजरात

  • पुत्र इस आधार पर पिता को भरण-पोषण देने से इनकार नहीं कर सकता की पिता ने उसके प्रति अपनी पेत्रक बाध्यता को पूरा नही किआ जा सकता
  • पिता द्वारा विवाहिता पुत्री से भरण-पोषण का दावा करना

 

भरन-पोषण को मंजूर करने की आवश्यक शर्ते

  • व्यक्ति जिसके विरुद्ध भरण-पोषण का दावा किया गया है, पर्याप्त साधनों वाला हो
  • भरण-पोषण करने मई उपेक्षा या भरण-पोषण करने से इन्कार
  • भरण-पोषण का दावा करने वाला व्यक्ति अपना भरण-पोषण करने मे असमर्थ हो

 

कब भरण-पोषण नामंजूर किया जा सकता है

  • जब पत्नी जरता की दिशा मे रह रही हो (125(4))
  • पर्याप्त कारण के बिना अपने पति के साथ रहने से इनकार कर देना
  • बिना कारण पत्नी द्वारा वैवाहिक घर का छोड़ देना
  • पत्नी अगर पति की पारस्परिक सहमति से प्रथक रह रही हो

 

संक्षिप्त उपचार = धारा-125 केवल संक्षिप्त उपचार का उपबंध करती है और इसके अधीन जारी किया गया आदेश अंतिम रूप से पक्षकारो की हसियत उनके अधिकार और उनके ददित्यो का अभिनिर्धारण नही करता

इस धारा के अंतर्गत केवल साधन विहीन पत्नी, संतान और माता- पिता के भरण-पोषण का उपबंध किया गया है

  • संहिता मे भरण-पोषण शब्द परिभाषित नही है अत: इस शब्द को इसके सामान्य भाव मे लिया जायेगा अपने सामान्य अर्थो मे भरण-पोषण मे निम्नलिखित अर्थ शामिल है-
  • भोजन
  • वस्त्र
  • निवास
  • शिक्षा
  • चिकित्सक देखभाल

 

NOTEपत्नी द्वारा यदि विवाह-विचेद्ध सम्बन्धी कार्यवाहियों के लंबित रहते हुए भरण-पोषण हेतु अपने लिए और अपनी-संतान के लिए यदि दावा किया जाता है बोर हिन्दू विवाह अधिनियम- 1956 की धारा 24 के अधीन यदि सिविल न्यायालय द्वार भरन-पोषण नियत किया जाता है, तो इस संहिता की धारा 125 के अधीन भरन-पोशंनियत किया जाना सुसंगत नही है |

 

 

धारा 125 की प्रक्रति धर्म-निरपेक्ष है:

धारा 125 के उपबंध प्रक्र्तिश धर्म निरपेक्ष है और इसका किसी धर्म विशेष अथवा वैक्तिक विधि से कोई विरोध नही है,

यह अभिनिर्धर्ण मोहम्मद अहमद खान vs शाहबनो बेगम के प्रकरण किया गया है

 

धारा-126 प्रक्रिया=

धारा-126 का उद्देश्य धारा-125 के अधीन की जाने वाली कार्यवाही की प्रक्रिया का उपबंध करना है, प्रक्रिया के व्यापक अर्थ मई न्यायालय की अधिकारिता भी सम्मिलित की गयी है

अत: धारा-126 की उपधारा (1) मजिस्ट्रेट की अधिकारिता विहित करती है और उसकी उपधारा बी(२), (3) मई भरण-पोषण की कार्यवाही की प्रक्रिया विहित की गयी है

  • 126 = किसी व्यक्ति के विरुद्ध निम्नलिखित नै से किसी जनपद मई धारा-125 की कार्यवाही संश्थित की जा सकेगी
  • जहां विपक्षी है
  • जहां वह या उसकी पत्नी निवासी है
  • जहां वह अपनी पत्नी की माता के साथ अंतिम बार निवास किया था
  • भरण-पोषण कार्यवाही मई समस्त साक्ष्य उस व्यक्ति या उसके लीडर की उपस्थिति मई लिया जायगा, जिसके विरुद्ध भरण-पोषण का वाद प्रस्तावित है|
  • धारा 126 (2) के परन्तुक के अंतर्गत एक पक्षीय आदेश किया जा सकता है 3 माह जके भीतर उचित कारण दर्शाने पर ऐसा आदेश वापिस किया जा सकेगा
  • न्यायालय उचित वाद व्यय आदेशित कर सकता है

 

भरन-पोषण के लिए माता-पिता का दावा और कार्यवाही

स्थान:  पत्नी और संतान को उस स्थान पर कार्यवाही प्रारंभ करने के लिए, जहां पर वे निवास करती है, जो सुविधा प्रदान की गयी है वह माता-पिता को नही प्रदान की गयी है

धारा-126(1) (ख) और (ग) के ठीक विपरीत भरण-पोषण के लिए दावा करने वाला माता अथवा पिटा के लिए केवल उसी स्थान पर दावा करने वाला होगा जहां वह व्यक्ति है जिसके विरुद्ध भरण-पोषण का दावा किया गया है|

 

NOTE: धारा -125-126 के अधीन की गयी कार्यवाही की गयी कार्यवाही न तो विचरण की कार्यवाही है और न ही ऐसी कार्यवाही के पर्रिनाम दोषसिद्धि अथवा दोषमुक्ति ही मानी जा सकती है अत: इस संहिता की धारा-३०० इस कार्यवाही पर लागू नही होती और धारा -125 के अधीन भारपोषण के लिए दिया गया द्वितीय आवेदन बाधित नही होता |

भरण-पोषण के भत्तो मई परिवर्तन धारा-127

उद्देश्य: इस धारा का उद्देश्य भरण-पोषण की स्वीक्रत की गई धनराशी मई परिवर्तन परिस्थितियों के सन्धर्भ मे परिवर्तन करने का उपबंध करना है|

धारा 127 के मुख्य बिंदु

  • परिस्थितियों मे परिवर्तन सिद्ध हो जाने पर भरण-पोषण या अंतरिम भरण-पोषण के आदेश मे उचित परिवर्तन किया जा सकता है परिवर्तन मे वृधि या कमी दोनों शामिल है
  • सक्षम सिविल न्यायालय के निर्णय परिणाम स्वरुप धारा125 के अंतर्गत पारित आदेश निरसित या परिवर्तित किया जा सकेगा
  • विवाह विच्छेदित महिला के पुनेर्विवः कार लेने पर पुनर्विवाह की तिथि से भरण-पोषण का आदेश निरस्त किया जा सकेगा {127(3)}

निर्णय

  • कृष्ण गोपाल vs उषा रानी 1982 : विवाह विच्छेदित पत्नी मे वह महिला शामिल नही है जिसका विवाह निरस्त कर दिया
  • अब्दुल मुनाफ vs सलीमा धारित: ऐसी पत्नी जो आय करने मे समर्थ होते हुए भी आय करने के बजाय भरण पोषण का दावा करती है उसका दावा मानी होगा किन्तु उसकी पत्नी यह सामर्थ्य भरण पोषण की राशी निपत करते समय विचार्नर्नार्थ होगी
  • रीबा लाल vs कमला बाई 1986 : माता शब्द मे नेर्संगिक तथा दत्तक माताए शामिल है किन्तु सोतेली माता शामिल नही है
  • नारायण साबू vs सुषमा साहू धारित : ‘इनकार करना’ से तात्पर्य मांग के बाद भी भरण पोषण देने मे विफलता से है “उपेक्षा करना”  से तात्पर्य लोप या व्यतिक्रम से है
  • बिजय मनहोर आबित धारित : धारा 125 (1) (d) मे his शब्द का प्रयोग हुआ है his मे हेर शामिल है अत: पुबी विवाहित या अविवाहित माता पिता को भरण पोषण देने हेतु बाध्य होगी
  • बीना वेन vs रज्जन बेन held: धारा 125(1) (a) के अंतर्गत माता भी पोषण देने हेतु बाध्य की जा सकती है
  • बसंत कुमारी बनाम शरद चन्द्र धारित : पर्याप्त साधन मे वह व्यक्ति शामिल जो स्वस्थ शारीर धारक है

दुली सिंह लोधी धारित : भरन पोषण पार्थना पत्र पर विचार करते हुए न्यायालय को व्यवहारिक द्रष्टिकोण अपनाना कहिये

Image 1

 अध्याय 10

                          लोक व्यवस्था और प्रशांति बनाये रखना

विषय प्रवेश :    दंड प्रक्रिया संहिता का प्रारंभिक उद्देश्य मौलिक दंड विधि के प्रशासन को यन्त्र प्रदान करना है|

इस हेतु इस संहिता मे प्रत्येक अपराध के अन्वेषण, जांच और विचारण के लिए विस्तृत उपबंधो का अधिनियम किया जाता है|

इसके अतिरिक्त अपराध के निवारण और समाज की सुरक्षा तथा संरक्षा के लिए कुछ अन्य पुर्वाधनात्मक उपायों को भी इस संहिता मे सम्मिलित किया जाना हितकारी और आवश्यक समझा गया है

अध्याय 8,9,10,11 इन्ही उद्देश्यो की पूर्ति के लिए इस संहिता मे अधिनियमित किये गये है|

अध्याय 10 धारा 129-148 तक चार भागो मे विभक्त किया गया है

  1. विधि विरुद्ध जमाव (sec 129-132)
  2. लोक उपताप (नुसेन्स) (धारा 133-143)
  • उपताप तथा आशंका जनित संकट के आत्यिक प्रकरण (धारा 144-144A)
  1. अचल संपत्ति सम्बन्धी विवाद (SEC 145-148)
  • विधि विरुद्ध जमाव (SEC 129-132 r/w 187 i.p.c.)

सिविल बल के प्रयोग द्वारा जमाव को तितर-बितर करना

कोई कार्यपालक मजिस्ट्रेट या थाना प्रभारी उपनिरीक्षक से अनिम्न श्रेणी का कोई पुलिस अधिकारी समादेशन कर सकेगा

Image 2

  • समादेशित व्यक्ति तितर बितर होने के कर्तव्य के अधीन होंगे
  • कर्तव्य भंग होने पर या अन्यथा तितर-बितर न होने की द्रढ़ता दर्शाने पर बल पूर्वक जमाव का तितर बितर किया जायेगा
  • किसी पुरुष से सहायता की अपेक्षा की जा सकेगी अभ्यर्थना का अपालन धारा 187 i.p.c के अंतर्गत दंडनीय होगा
  • तितर-बितर या दण्डित करने के प्रयोजनों से गिरफ्तारी या निरोध भी किया जा सकता है

जमाव को तितर-बितर करने के लिए सशस्त्र बल का प्रयोग:

इस धारा का उद्देश्य जमाव को तितर-बितर करने के लिए सशस्त्र बल के प्रयोग की अनुमति प्रदान करना है सशस्त्र बल का प्रयोग केवल उसी दशा मे किया जा सकता है, जब वह अन्यथा अर्थात सिविल बल के प्रयोग से नही किया जा सकता है

जमाव को तितर बितर करने की सशस्त्र बल के कुछ अधिकारियो की शक्ति

  • लोक सुरक्षा के प्रकटत: संकटग्रस्त हो जाने पर तथा EX. MAG. से संसूचना न हो पाने कमीशन अधिकारी या राजपत्रित सैन्य अधिकारी सशस्त्र बल के प्रयोग द्वारा जमाव को तितर बितर कर सकेगा
  • सैन्य अधिकारी गिरफ्तारी तथा निरोध भी कर सकेगा किन्तु जैसे ही EX. MAG. से संसूचना करना व्यावहारिक हो जाता है वह संसूचना करेगा तथा EX. MAG. के निर्देशों का पालन करेगा|

              धारा 132 – अभियोजन के विरुद्ध संरक्षण

  • धारा 129,130,131 के अंतर्गत किये गये कृत्य हेतु अभियोजन यथास्थिति या तो केंद्र शासन या राज्य शासन की अनुमति से ही संचालित किया जायेगा

पुलिस अधिकारी या MAG. या सशस्त्र बल का सदस्य अपराध का दोषी नही मन जायेगा सद्भावना पूर्वक किये गये कृत्य आपराधिक दायित्व उत्पन्न नही करेंगे |

अध्याय 11

पुलिस का निवारक कार्य 

उदेश्य:   दंड प्रक्रिया संहिता का उदेश्य न केवल दंड प्रक्रिया प्रस्तुत करना है, अपितु अपराध का निवारण भी करना है और इस निमित वह इस सिधांत को मानकर चलती है की “ चिकिसा से अच्छा निवारण है” इस अध्याय मे इसी निमित पुलिस को निवारक कार्य करने की शक्तिया प्रदान की गयी है

इन निवारक कार्यो को निम्न श्रेणियों मे वर्गीक्रत किया गया है

  1. संज्ञेय अपराधो का निवारण धारा -149 से 151 तक
  2. लोक संपत्ति की हानि का निवारण धारा 152
  3. बाटो और मापों का निरिक्षण धारा-153

टिप्पणी: धारा 149-151 का उदेश्य संज्ञेय अपराधो के निवारण के लिए पुलिस को शक्ति प्रदान करना है धारा 151(1) के  अधीन जब किसी व्यक्ति को वारंट के बिना गिरफ्तार किया जाता है तब इस संहिता के वे समस्त उपबंध लागू होंगे जो वारंट के बिना गिरफ्तारी के आधारों को बतलाया जायेगा आदि|

धारा 151(1) का उद्देश्य यह है की यदि गिरफ्तारी के बाद गिरफ्तार किये गये व्यक्ति के विरुद्ध प्रति भूति अथवा बंधपत्र मांगने की अथवा किसी अपराध के सम्बन्ध मे अभियुक्त व्यक्ति के रूप मे उसके विरुद्ध कोई कार्य्वाह्ही नही की जाती, तो उसे उन्मेचित कर दिया जाना चाहिये |

  1. उपताप के निवारण हेतु सशर्त आदेश
  • m. or S.D.m. या राज्य साशन द्वारा विशेषत: सश्वत EX mag धारा 133(1) के अंतर्गत सशर्त आदेश पारित कर सका |
  • धारा 133 (1) (a) – (1) मे वर्णित परिस्थितियों के प्रति संतुष्ट हो जाने पर ही सशर्त आदेश पारित किया जायगा|
  • सशर्त आदेश द्वारा सम्बंधित व्यक्ति को निपत समय के भीतर अपेक्षित कार्य करने का निर्देश दिया जा सकेगा
  • सम्बंधित व्यक्ति को उपस्थित होकर कारण दर्शाने का विकल्प भी होगा
  • धारा 133 (1) के अंतर्गत पारित आदेश को सिविल न्यायालय द्वारा पारित प्रश्नगत नही किया जायेगा
  • ऐसा mag. जिसे सशर्त आदेश पारित आदेश करने की शक्ति न हो. द्वारा पारित आदेश विधि- विरुद्ध होगा यह कार्यवाही को द्व्षित करेगा s.461 (h)
  1. सशर्त आदेश की तामील (धारा 134)
  • सशर्त आदेश यदि व्यवहारिक हो, सम्बंधित व्यक्ति पर स्मन्न्स की भांति तामील किया जायगा
  • तामील न हो पाने पर सशर्त आदेश को उद्घोषणा द्वारा उद्घोषित किया जायेगा | उद्घोषणा नियमानुसार प्रकाशित की जायगी इसे सर्वोत्तम स्थानों पर चिपकाया भी जायेगा|
  1. सशर्त आदेश का पालन या उसके विकट कारण दर्शाया जाना (धारा 35 r/w 136
  • सम्बंधित व्यक्ति का यह कर्त्तव्य होगा की वह सशर्त आदेश मे निदृष्ट समय मे निदृष्ट दहंग से सम्पादित कर दे
  • सम्बंधित व्यक्ति को आदेश के अनुसार उपस्थित होकर आदेश के विकट आपत्ति करने तथा कारण दर्शाने का विकल्प भी होगा
  • सम्बंधित व्यक्ति द्वारा निदृष्ट कृत्य करने या कारण दर्शाने मे विफल रहने पर धारा 188 i.p.c के अंतर्गत सश्ती आरोपित होगी सशर्त आदेश पूर्ण हो जायेगा|
  1. लोक अधिकार से इनकार करने पर प्रक्रिया धारा 137 r/w 139 .140
  • सम्बंधित व्यक्ति द्वारा लोक अधि. के अधिकारी के अस्तित्व से इनकार करने पर मजि. धारा 138 के अंतर्गत कार्यवाही करने से पूर्व मामले की जांच करेगा
  • यदि लोक अधिकारी के अस्तित्व का साक्ष्य पाया जाता है तब कार्यवाही स्थगित कर डी जायगी सक्षम न्याय. द्वारा अधिकारी विनिश्चित किये जाने तक
  • यदि कोई साक्ष्य नही मिलता है तब धारा 138 के अनुसार कार्यवाही होगी
  • धारा 137 व 138 के अंतर्गत जांच के प्रयोजनों हेतु स्थानीय अन्वेषण निर्देशित किया जा सकेगा विशेषज्ञ की परीक्षा भी की जा सकेगी
  • धारा 139 के अंतर्गत स्थानीय अन्वेषण के सम्बन्ध मे या विशेषज्ञ की परीक्षा के सम्बन्ध मे मजिस्ट्रेट आवश्यक दिशा निर्देश दे सकेगा
  1. कारण दर्शाने हेतु हाज़िर होने पर प्रक्रिया (s.138 r/w 139.140)
  • मजिस्ट्रेट सम्मंस मामले की भांति साक्ष्य लेगा|
  • सशर्त आदेश को मूल रूप मे या परिवर्तित रूप मे पूर्ण बना सकेगा ( यदि ऐसा करना उचित तथा युक्तिसंगत है )
  • यदि मजिस्ट्रेट सशर्त आदेश को युक्ति युक्ति तथा उचित नही पता है तब आगे कार्यवाही नही करेगा
  1. स्थानीय अन्वेशान तथा विशेषज्ञ की परीक्षा
  • धारा 137 तथा 138 के प्रयोजनों हेतु स्थानीय अन्वेषण आदेशित किया जा सकता है विशेषज्ञ को आहूत करके उसकी परीक्षा भी की जाती है
  • स्थानीय अन्वेषण के प्रयोजनों हेतु लिखित निर्देश दिया जा सकेगा स्थानीय अन्वेषण तथा विशेषज्ञ की परीक्षा से सम्बंधित व्यय आदेशित किया जा सकेगा रिपोर्ट साक्ष्य मे पठनीय होगी
  1. आदेश का पूर्ण किया जाना तथा अवज्ञा के परिणाम
  • धारा 136 या 138 के अंतर्गत सशर्त आदेश को पूर्णता या अन्तिमता डी जा सकती है
  • आदेश सशर्त अंतिम घोषित किये जाने के बाद सम्बंधित व्यक्ति को उसकी सुचना दी जायगी
  • अंतिम आदेश द्वारा निदृष्ट कृत्य को नियत समय पूर्ण करने की अपेक्षा की जायगी यह भी सूचित किया जायेगा की अवज्ञा की स्थिति मे धारा 188 i.p.c के अंतर्गत दण्डित किया जायगा
  • नियत समय मे कार्य कर देने पर आगे कोई कार्यवाही नही की जायगी किन्तु यदि कार्य नही किया जाता है तब मजिस्ट्रेट अपने स्तर से कार्य करा लेगा व्यय की वसूली हेतु सम्बंधित व्यक्ति की सम्पन्ति की विक्रय तथा कुर्की की जा सकेगी|
  • धारा 141 के अंतर्गत सद्भावना पूर्वक किये गये कृत्य के अंतर्गत कोई वाद संसिस्थ नही किया जायेगा
  1. जाँच के ल्म्बन के दौरान व्यादेश
  • तात्कालिक कार्यवाही आवश्यक होने पर, सशर्त आदेश पारित करने वाला मजिस्ट्रेट तात्कालिक जोखिम या क्षति से लोक को बचाने के लिए बयादेश जारी कर सकता है
  • व्यादेश के उल्लंघन पर मजिस्ट्रेट स्वयं कार्यवाही कर सकेगा धारा 142 के अंतर्गत सद्भाविक कार्यवाहिक के विरुद्ध कोई वाद संसिथ नही किया जायेगा
  1. लोक उपताप की पुनरावर्ती या उसके जारी रहने का निषेध (s.143)
  • m., s.d.m. या राज्य शासन या dm द्वारा सशक्त कोई अन्य ex mag. किसी भी व्यक्ति को लोक उपताप की पुनरावर्ती या उसके जारी रखने से रोक सकता है
  • क्षेत्राधिकार विहीन मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 143 के अंतर्गत पास किया गया आदेश शून्य होगा
  1. उपताप या आशंका जनित जोखिम हेतु आत्यिक मामलो मे आदेश
  • सक्षम प्राधिकारी
  1. M.
  2. D.M.
  3. कार्यपालक मजिस्ट्रेट ( राज्य सरकार द्वारा विशेषत: सशक्त मजिस्ट्रेट )
  • आधार-
  1. धारा 144 के अंतर्गत कार्यवाही करने हेतु पर्याप्त आधार होना
  2. तत्काल निवारण या त्वरित उपचार वाहनीय होना
  • आदेश की विशिस्तिया
  1. आदेश लिखित होगा
  2. इसमें सारवान तथ्यों का कथन होगा
  3. आदेश धारा 134 CRPC के अनुसार तामील किया जायेगा
  4. आदेश द्वारा किसी व्यक्ति को-
  • कृत्य विशेष करने से विरत रहने या
  • अपने प्र्बंधाधीन या कब्जधीन सम्पत्ति के सम्बन्ध मे कोई आदेश लेने हेतु निर्देशित किया जायेगा
  • निर्देश से अपेक्षाए
  • विधित नियोजित व्यक्ति को व्यवधान, क्षोभ,या क्षति से बचना
  • लोक शांति या लोक व्यवस्था के अनुरक्षण हेतु आवश्यक प्रतीत होने पर dm लोक सुचना या आदेश द्वारा निषेद आरोपित कर सकता है
  • निषेध dm की स्थानीय क्षेत्राधिकारीता तक सिमित होगा
  • निषेध आदेश द्वारा जुलुस मे हथियार लेकर चलना रोका जा सकेगा किसी लोक स्थल पर सामूहिक व्यायाम या सामूहिक प्रशिक्षण रोक जा जा सकेगा
  • धारा 144-a (1) के अंतर्गत जारी की गयी लोक सुचना या आदेश नि. को संदर्भित हो सकेगा|
  • धारा 144.a के अंतर्गत पारित आदेश या जारी की गयी सुचना 3 माह से अधिक अवधि तक प्रवर्तन मे नही रहेगी
  • राज्य शासन , अधिसूचना जारी करके dm के आदेश या उसके द्वारा जारी गयी लोक सुचना को 6 माह तक का अतिरिक्त विस्तार दे सकेगा|
  • राज्य शासन विस्तार देने की अपनी शक्ति dm के पक्ष मे प्रत्योजित कर सकता है
  • धारा 144.a मे हथियार शब्द का वही अर्थ है जो धारा 153A-A IPC के अंतर्गत प्रावधानित है
  • अध्याय 10 के भाग के c तथा d के अंतर्गत शाश्क्त न होते हुए भी मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश शून्य होगा
  1. अचल संपत्ति से सम्बंधित विवाद
  • धारा 145 तथा 147 प्र्क्रियायात्म्क है धारा 145 हेतु विहित प्रक्रिया ही यथासंभव धारा 147 की कार्यवाही को धारा 145 मे रूपांतरित किया जा सकता है
  • धारा 145 तथा 147 मे मूल अंतर विवाद की प्रकृति का है धारा 145 कब्ज़े के विवाद से सम्बंधित है धारा 147 प्रोजनाधिकार से सम्बंधित विवादों के बारे मे है
  • धारा 144(1) के अंतर्गत एक पक्षीय आदेश किया जा सकता है ( यदि परिस्थितिया आदेश के तामील की अनुमति न दे रही हो
  • धारा 144(1) के अंतर्गत पारित आदेश नि . को निदृष्ट
  1. किसी व्यक्ति को
  2. स्थान विशेष के समस्त निवासियो को
  3. स्थान विशेष का भ्रमण करने वाले समस्त व्यक्तियों की
  • आदेश का जीवन काल

1.सामान्यत दो माह

  1. छ: माह का अतिरिक्त विस्तार
  • आदेश मे परिवर्तन या आदेश या विखंडन:

1.मजिस्ट्रेट स्वप्रेरणा से या पीड़ित व्यक्ति के आवेदन पर अपना आदेश परिवर्तित या खंडित कर सकेगा|

  1. राज्य शासन स्वप्रेरणा से या पीड़ित व्यक्ति की आवेदन पर अपना आदेश परिवर्तित या खंडित कर सकेगा|
  • श्रवण का अवसर: मजिस्ट्रेट या राज्य शासन आवेदन को अस्वीकार करने से पूर्व आवेदक को श्रवण का अवसर प्रदान करेंगे
  1. जुलुस या सामूहिक व्यायाम या सामूहिक प्रशिक्षण निषिद्ध करने की शक्ति:
  • धारा144.a अधि. क्रमांक 25 वर्ष 2005 द्वारा अथ्स्थापित की गयी है इसका उद्देश्य सामूहिक रूप से आपुधो के प्रदर्शन तथा उससे संभावित संकट का निवारण करना है
  • धारा 144 A के अंतर्गत आवश्यक शर्ते DM को डी गयी है
  • धारा 145 तथा 147 दोनों मे भूमि या जल सब्दो का विशेष तथा अतिव्यापक अर्थ है धारा 145

(2) व्यवहारत एक स्पस्टीकरण है इसमें भूमि या जल शब्दों मई निम्नलिखित शब्दों को शामिल बताया गया है

  • भवन
  • बाज़ार
  • मिन्श्रोत
  • फसल
  • भूमि के अन्य उत्पाद
  • भाटक तथा लाभ

Image 1

Image 2

Meaning of f.i.r.=   f.i.r. crpc 1973 मे कहीं भी परिभाषित नही है |

  • यह एक सुचना है |
  • जो पुलिस अधिकारी को दी जाती है |
  • समय की द्रष्टि से प्रथम सुचना होती है किसी अपराध को घटने की
  • यह संज्ञेय अपराध से सम्बंधित होता है
  • यह अपराधिक विधि को गति मे लाने का एक तरीका है

F.I.R का उद्देश्य = अपराधिक विधि को गति प्रदान करना इसका मुख्या उद्देश्य है ये हासिब vs बिहार राज्य के वाद में कहा गया था |

धारा -154 का विश्लेषण करने पर इस सन्दर्भ मे मुख्य बिंदु

1.

2.

3.

4.

5.

6.

F.I.R. 3 प्रतियों मे होती है

  1. चेक रजिस्टर मे पुलिस के पास
  2. सूचनादाता को दी जाती है
  • मजिस्ट्रेट को u/s – 157
  1. क्या पुलिस अधिकारी F.I.R. लेखबद्ध करने के लिए बाध्य

ANS. हाँ, धारा -154 के प्रावधान MANDATRY है वह f.i.r. लेखबद्ध करने के लिए बाध्य होता है, पुलिस अधिकारी f.i.r. लिखने से इंकार नही कर सकता है|

ये अभिकथन हरयाणा राज्य vs भजन लाल के बाद मे दिया गया है

और जो पुलिस अधिकारी f.i.r. लिखने से मना कर देंगे वो धारा-166(a) भा.द.स. के अंतर्गत दंडनीय होंगे

STATE OF A.P VS PUNATI RAMULU-AIR 1993 S.C –

के बाद मे कहाँ गया की यदि घटनास्थल स्थानीय क्षेत्राधिकार मे नही आने के आधार पर f.i.r. लिखने से मना कर देता है तो वह उसके कर्तव्य का उलंघन मन जायेगा धारा-154 के अंतर्गत न्यायालय ने यह भी कहा की संज्ञेय अपराध से सम्बंधित प्रत्येक इत्तिला अभिलिखित करनी होगी और उसके बाद क्षेत्राधिकार वाले थाने को प्रेषित की जायगी

  1. क्या दूरभाष के द्वारा की गयी इत्तिला f.i.r हो सकती है ?

ANS. हां, दूरभाष के द्वारा की गयी इत्तिला f.i.r हो सकती है यदि वह संज्ञेय अपराध इए जाने का खुलासा करती हो

वाद- सोमाभाई vs गुजरात राज्य- f.i.r.-१९७३ s.c

नोट- हर प्रकार का टेलीफोन f.i.r. नही होगी

  1. F.I.R. कौन दर्ज करवा सकता है

ANS. कोई भी, जरूरी नही की वह पीड़ित व्यक्ति ही हो अभियुक्त के द्वारा भी F.I.R. दर्ज करायी जा सकती है

NOTE- प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार है की वह अपराध विधि को अभिकरण को गति मे लाये तथा अपराधो को अभिलेखों मे दर्ज कराये

वाद- शियानंदन पासवान vs बिहार राज्य f.i.r -१९८७ SC

प्रथम इत्तिला रिपोर्ट का साक्ष्य सम्बन्धी महत्व-

प्रथम इत्तिला रिपोर्ट यधपि मौलिक साक्ष्य नही है, फिर भी भारतीय साक्ष्य अधिनियम १८७२ की धारा-157 के अंतर्गत इसका प्रयोग इत्तिलाकर की संपुष्टि के लिए अथवा उसी अधिनियम की धारा-145 के अंतर्गत उसका खंडन करने के लिए किया जा सकता है, यदि इत्तिलाकर को विचारण के समय एक सक्श्य्कर के रूप मे बुलाया गया है|

CONCEPT OF CONFESSIONAL& IT’S EVEDENTIARY VALUE

जब f.i.r. अभियुक्त के द्वारा स्वयं दर्ज कराया जाता है तब ऐसा f.i.r. कंफ़ेसियनल f.i.r. कहलाता है

f.i.r. अभियुक्त द्वारा दो दिशाओ मे हो सकती है

  1. जब f.i.r. संस्विक्र्ती प्रक्रति का है-
  2. जब f.i.r. संस्विक्रती प्रक्रति का नही हैं
  3. स्वयं ने मारकर f.i.r करवादिया हो की पता नही किसने मारा

संस्विक्र्ट f.i.r. का साक्ष्य मे महत्व:

f.i.r. जो संस्विक्र्ती प्रकृति के विसंगत हो है भा. साक्ष्य अधिनियम -१८७२ की धारा 25,26 के अनुसार और ऐसी संस्विक्र्ती को अभियुक्त के विरुद्ध साबित नही किया जा सकता है  सिवाय उस तथ्य के जिससे कोई जानकारी प्राप्त की जाती है धारा-27 भारतीय साक्ष्य अधिनियम-१८७२ ए अवधारणा- फूदी vs मध्यप्रदेश राज्य-१९६४ मे की गयी थी|

f.i.r. दर्ज कराने मे विलम्ब

  • कोई समय की परिसीमा नही है f.i.r दर्ज कराने के लिए
  • i.r. मे देरी हो जाना, तात्विक नही है लेकिन लम्बा एवं अस्प्श्तिक्र्ट विलम्ब संदेह उत्तपन कर सकता है

अमर सिंह vs बलविन्द्र सिंह

AIR २००३ s.c

  • साधारणतया लैंगिक अपराधो के मामलो मे लोक लाज के डर से विलम्ब स्वभाविक है

ZERO FIR = जब हम f.i.r. को स्थानीय क्षेत्राधिकार से भिन्न थाने मे लिखवाता है तो लिख तो देता है पर उसको NUMBRING नही करता और उसको वह स्थानीय क्षेत्राधिकार वाले थाणे मे अंतरण करेगा

धारा-१६४ = संस्कृतियों और कथनों को अभिलिखित करना

Admissible Confession

  • कौन अभिलिखित करेगा- MM/JM

चाहे अधिकारिता हो या न हो

  • कौन नही करेगा- 1. 164 (1) का दूसरा परन्तु कोई पुलिस अधिकारी जिसे मजिस्ट्रेट की कोई शक्ति किसी विधि के अधीन दी गयी है
  1. Executive mag.

अगर ये लिख भी लेंगे तो उसका कोई महत्त्व नही होगा

कब अभियुक्त करेगा: अन्वेषण के दौरान या पश्चात् लेकिन जाँच और विचारण प्रारंभ होने से पूर्व

 

 

POWER OF RECORDING – 164(1)

CONFESSION                     -164 (2) (3) (4) (6)

STATEMENT                      – 164 (5) (6)

RECORDING का MANNER- वही जो 281 का होगा

  • 164(2)- सावधानियाँ-
  1. संस्वीक्रितिकर्ता को चेतावनी- समझायेगा की वह संस्वीकृति करने हेतु बाध्य नही है
  2. यदि करता है तो उसके खिलाफ उपयोग किया जायेगा

Image 3

164(4) लिखने का तरीका प्रक्रिया — 281 की तरह

—- प्रश्नोत्तर क्रम ने

—- उसी के शब्दों में

—- मजिस्ट्रेट स्वयं लिखेगा

—- न्यायालय की भाषा में

—- संस्वीकृति हस्ताक्षर किये जायेंगे

—- अभिलेख के नीचे मजिस्ट्रेट एक ज्ञापन लिखे

Image 4

                                 अध्याय 12

             पुलिस को इत्तिला और उसकी अन्वेषण करने की शक्तियाँ

विषय प्रवेश:इस धारा से प्रारंभ होने वाले इस अध्याय का उद्देश्य अपराध के किये जाने से सम्बंधित घटनाओ को इत्तिला पुलिस को देने और उस अपराध पर पुलिस द्वारा किये जाने वाले अन्वेषण के सम्बन्ध मे उपबंध करना है| धारा (2)((ज) के अनुसार “अन्वेषण” के अंतर्गत वे सब कार्यवाहीया सम्मिलित है, जो इस संहिता के अधीन पुलिस अधिकारी द्वारा या किसी भी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जो मजिस्ट्रेट द्वारा इस निमित प्रधिकर्त किया गया है, साक्ष्य एकत्र करने के लिए की जाय|

संज्ञेय मामलो के सम्बन्ध मे पुलिस को इत्तिला : किसी संज्ञेय अपराध के घटित होने पर उसके सम्बन्ध मे कोई भी व्यक्ति पुलिस को इत्तिला दे सकता है| धारा 154 का विश्लेषण करने पर इस सन्दर्भ मे इत्तिला दे सकता है| धारा 154 का विश्लेषण करने  पर इस सन्दर्भ मे निम्र मुख्य बिंदु उभरते है

  1. यह कि, इत्तिला उस पुलिस थाणे के भारसाधक अधिकारी को देनी चाहिये, जिसको उन मामलो मे अन्वेषण की अधिकारिता प्राप्त हो|
  2. यह कि, इत्तिला यदि ऐसे अधिकारी को मौखिक दी गई है, तोह वह या तो उस अधिकारी द्वारा स्वयं अथवा उसके निदेशाधीन किसी अन्य व्यक्ति द्वारा लेखबद्ध की जायगी|
  3. यह की, इत्तिला यदि लिखित दी गयी है, अथवा उपर्युक्त तरीके से लेखबद्ध की गयी है, तो उस पर इत्तिला देने वाले व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किया जायेगा
  4. यह कि, वह इत्तिला, जिसे मौखिक होने के नाते लेखबद्ध किया गया है, इत्त्लाकर को पढ़कर सुनाया जायेगा
  5. यह कि, इसके बाद ईतिला के सार को पुलिस अधिकारी द्वारा एक ऐसी पुस्ताक मे प्रविष्ट किया जायेगा, जिसे ऐसे अधिकारी द्वारा उस रूप मे रखा गया हो जैसा की सरकार ने इस निमित्त विहित किया हो | पुलिस अधिनियम 1861 की धारा 44 के अनुसार ऐसी पुस्तक को स्टेशन डायरी अथवा साधारण रोजनामचा के नाम से जाना जाता है
  6. यह कि, इत्त्लिकार को इसके बाद उप्रुक्त रीति से अभिलिखित इत्तिला की प्रतिलिपि तत्काल नि:शुल्क दी जायगी

 

 

              प्रथम इत्तिला रिपोर्ट- परिभाषा और प्रक्रति

 अर्थ और मूल्य- प्रथम इत्तिला रिपोर्ट, किसी अपराध की इत्तिला या सुचना से सम्बंधित केवल एक रिपोर्ट है| यह एक मौलिक साक्ष्य नही है, क्योकि पुलिस को इस इत्तिला के बाद भी अपराध का अन्वेशान करना होता है| धारा 154 के अधीन अभिलिखि किये गये इत्त्लाकर के कथन को सामान्य व्यवहार के अंतर्गत “प्रथम इत्तिला रिपोर्ट” या “फर्स्ट इन्फोर्मेशन रिपोर्ट” या “रपटे इब्तदाई” अथवा प्रारंभिक रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है और प्रथम इत्तिला रिपोर्ट का तात्पर्य अभिकथित अपराध की वह प्रथम रिपोर्ट है, जो पुलिस को दाखिल की गयी है इत्तिलाकर्ता के द्रष्टिकोण से प्रथम इत्तिला रिपोर्ट का मुख्य उद्देश्य दंड विधि को गतिशील बना देता है, तो रिपोर्ट का उद्देश्य दंड विधि गतिशील बना देना है| धारा 154(1) तथा (2) के उप्प्बंधो द्वारा अपेक्षित इत्तिला को अभिलिखित करने से याद पुलिस अधिकारी इनकार कर देता है, तो रिपोर्ट का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है क्योकि दंड विधि सक्रिय नही हो पाती है| इसलिय धारा 154(3) मे इन्ही परिस्थितियों के लिए उपचार की व्यवस्था कीगयी है |इसकी अनुसार इत्तिला को अभिलिखित करने से इनकार करने पर व्यथित व्यक्ति इत्तिला का सार लिखित रूप और डाक द्वारा सम्बन्ध पुलिस अधीक्षक को भेज सकता  है, जो की यदि उसका यह समाधान हो जाता है की ऐसी इत्तिला से किसी संज्ञेय अपराध का किया जाना प्रकट होता है तो, या तो स्वयं मामले का अन्वेषण करेगा या अपने अधीनस्थ किसी पुलिस अधिकारी द्वारा अन्वेषण किये जाने का निदेश देगा| इस तरह के अधिकारों को उस अपराध के सम्बन्ध मे पुलिस थाणे के भारसाधक अधिकारी की समस्त शक्तिया प्राप्त रहती है|

प्रथम इत्तिला रिपोर्ट का साक्ष्य सम्बन्धी महत्व- किसी दांडिक प्रकरण मे विचारण के समय प्रस्तुत किये गये मौखिक साक्ष्य के सम्पोषण के प्रयोजन के लिए प्रथम इत्तिला रिपोर्ट एक नितांत रिपोर्ट एक नितांत मार्मिक और मूल्यवान साक्ष्य का अंश होता है| अत: प्र.इ.रि. को उसकी सम्पूर्णता मे पढ़ा जाना चाहिये, क्योकि यह उन परिस्थितियों से सम्बंधित वह पूर्वोत्तार सुचना होती है, जिसके अंतर्गत अपराध को किया गया होता है, जिसमे वास्तविक अभियुक्तों का नाम, उनके द्वारा निर्वाहित भूमिका, यदि कोई हो|

विलम्ब-

 प्रथम इत्तिला रिपोर्ट दाखिल करने मे यदि असम्यक अथवा अयुक्तियुक्त विलम्ब होता है तो इससे न्यायालय को इत्तिलाकर के संभाव्य प्रयोजन और उसके स्पष्टीकरण की और अत्यंत सतर्क निगाह रखने की आवश्यकता महसूस होने लगती है और तब वह अभियोजक विश्वसनीयता पर कठोर द्रष्टि रखने को बाध्य हो जाता है अवधेश बनाम मध्य प्रदेश राज्य के प्रकरण मे प्रथम रिपोर्ट मे विलंब किया गया था की प्रत्यक्ष्दर्शी साक्षीगण वहाँ विधमान थे, अभियोजन द्वारा विलम्ब का कोई संतुष्टीकरण स्पष्टीकरण न दिए जाने के कारण उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया की परिस्थियाँ घटनास्थल और घटना के समय साक्षियों की उपस्थिति को संदेह्म्य बना देती है, परन्तु प्रथ्वी चंद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य के प्रकरण मे एक अवयस्क बालिका के साथ बालसत्संग किया गया था| इस घटना के तत्काल बाद अभियोक्ति ने सारी बात अपनी माँ और अन्य स्त्रियों को बतला दिया था, परन्तु कार्यवाही के बारे मे अभियोक्ति के पिता के आ जाने के बाद ही निर्णय लिया गया| इसके बाद सरपंच से राय ली गई, जिसने शाम और अँधेरा हो जाने के कारण दुसरे दिन प्रात: पुलिस स्टेशन जाने की सलाह दी और दुसरे दिन प्रात: काल प्रथम इत्तिला रिपोर्ट दाखिल की गई| इन परिस्थितियों के आधार पर न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया की प्रथम इत्तिला रिपोर्ट दाखिल करने मे कोई विलम्ब नही किया गया

लैंगिक अपराधो से सम्बंधित प्रथम इत्तिला रिपोर्ट मे, चुकि अपराध की शिकार स्त्री सदाचार और नारी पावित्र्य से सम्बंधित प्रश्न अन्तर्वलित होता है, अत: उसको दाखिल करने मे किये गये विलम्ब के पीछे प्रारम्भिक हिचकिचाहट या संकोच का अनुमान किया जा सकता है | पंजाब राज्य बनाम गुरुमीत सिंह के प्रकरण मे लेंगिक अपराधो मे प्रथम इत्तिला रिपोर्ट दाखिल करने मे विलम्ब का प्रश्न अंतर्ग्रस्त था| यह अभिनिर्धारित किया गया की इस तरह के  मामलो मे प्रथम इत्तिला रिपोर्ट दाखिल करने मे अभियोक्ति अथवा उसके परिवार के सदस्यों की हिचकिचाहट और संकोच को अवश्य ही ध्यान मे रखा जाना चहियें| तथ्यों के आधार पर जहाँ विलम्ब के कारण को समुचित रूप से न केवल स्पष्ट किया गया हो, अपितु उसे स्वभाविक भी पाया गया हो, वह विलंबन को अनदेखा किया जा सकता है|

असंज्ञेय अपराध के बारे मे पुलिस को इत्तिला-  धारा 155 के अधीन असंज्ञेय अपराध की रिपोर्ट शब्दशः नही लिखी जाती, वरन उसमे इत्तिला देने वाले वाले व्यक्ति के कथन का सार मात्र दिया जाता है|

इस प्रकार, जब कोई व्यक्ति पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को किसी संज्ञेय अपराध के घटित होने की सुचना देता है तब वह अधिकारी सुचना के सार को इस प्रयोजन के लिए विहित पुस्तक मे प्रविष्ट करेगा या कराएगा और इत्तिला देने वाले को मजिस्ट्रेट के पास को निर्देशित करेगा | इस तरह के मामलो मे पुलिस का आगे कोई कर्तव्य नही रह जाता, जब तक उसे मजिस्ट्रेट द्वारा अन्वेषण का आदेश नही दिया जाता

असंज्ञेय अपराध पर अन्वेषण करने की पालिक की शक्ति मजिस्ट्रेट के आदेश पर निर्भर करती है- इस सम्बन्ध मे मूल नियम यह है कि कोई भी पुलिस अधिकारी किसी असंज्ञेय अपराध का अन्वेषण तब तक नही करेगा जब तक की उसे मजिस्ट्रेट का आदेश प्राप्त नही हो जाता, जिसे उस मामले मे विचारण के निमित्त सुपुर्द करने की शक्ति प्राप्त है इस संहिता मे अभिव्यक्त रूप से किसी असंज्ञेय मामले मई अन्वेषण के निमित्त आदेश देने की शक्ति मजिस्ट्रेट को नही दी गयी है, तथापि, धारा 155(2) की भाषा से इस शक्ति का विविक्षित अनुमान किया जा सकता है| संहिता मे मजिस्ट्रेट को इस निमित्त कोई निर्देश अथवा मार्गदर्शन नही दिया गया है कि वह कैसे और किन परिस्थितियों मई अन्वेषण के लिए आदेश देने की शक्ति प्रयोग कर सकता है  निश्चित ही इस शक्ति का प्रयोग वह निरकुंशता अथवा अविचारिता के साथ नही कर सकता है |

यदि कोई मजिस्ट्रेट जो शसक्त नही है, गलती से किसी अपराध का अन्वेषण करने के लिए पुलिस को आदेश देता है, तो उसकी कार्यवाही को केवल इस आधार पर की वह ऐसे शसक्त नही था अपास्त नही किया जायेगा|

असंज्ञेय मामले मे अन्वेषण की शक्ति-  धारा 155(2) के अधीन जब कोइ मजिस्ट्रेट पुलिस को किसी असंज्ञेय मामले मे अन्वेषण का आदेश देता है, तब ऐसा आदेश प्राप्त करने पर वह पुलिस अधिकारी धारा 155 (3) के उपबंधो के अनुसार अन्वेषण के बारे मे वैसी ही शक्तियों का प्रयोग कर सकता है, जैसा पुलिस भारसाधक अधिकारी संज्ञेय मामले मे कर सकता है |

जहाँ किसी मामले मे संज्ञेय और असंज्ञेय दोनों ही अपराध सम्मिलित है – ऐसी किसी स्थिति मे जहाँ किसी आपराधिक मामले मे संज्ञेय और असंज्ञेय दोनों ही अपराध सम्मिलित है, यह प्रश्न उठ सकता है की क्या मामले को संज्ञेय माना जायेगा, चाहें भले ही उसमे सम्मिलित अन्य अपराध असंज्ञेय हो|

गिरफ्तारी और निरोध मे रखे गये व्यक्ति के सम्बन्ध मे नूतन संरक्षात्मक निर्देश- उच्चतम न्यायालय ने दिलीप के. बसु बनाम पच्छिम बंगाल राज्य के प्रकरण के पुलिस कर्मचारियों के लिए अनुपालन हेतु निम्रलिखित निर्देश जारी किया है, जिसे उन्हें ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध मे पालन करना होता है, जिसकी वे गिरफ्तारी कर रहे है अथवा जिसे वे अपने विरोध मई रख रहे है

  • उन पोलिसकर्मियों को जो गिरफ्तारी कर रहे हाई और जो गिरफ्तार व्यक्ति से पूछताछ कर रहे है अपने पदनाम के साथ साथ अपने नाम के टैग और यथार्त, दृष्टिगोचर और स्पष्ट पहचान धारण करना होगा| ऐसे समस्त पुलिस कर्मिओ की जो गिरफ्तार किये गये व्यक्ति से पूछताछ कर रहे हो, विवरणियो को एक रागिस्टर मे अभिलिखित करना होगा|
  • ऐसे पुलिस अधिकारिओ को जो गिरफ्तारी का कार्य कर हो, गिरफ्तारी के समय एक ज्ञापन तेयार करना होगा और ऐसे ज्ञापन को कम से कम एक ऐसे साक्षी द्वारा साक्ष्यांकित करना होगा जो की या तो गिरफ्तार किये गये व्यक्ति के कुटुंब का एक सदस्य होगा अथवा उस स्थान का एक प्रतिष्ठित व्यक्ति होगा जहा गिरफ्तारी की गयी है| वह ज्ञापन गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा भी प्रतिहस्ताक्षरित होगा और और  उसमे गिरफ्तारी का समय और उसकी तारीख भी समविष्ट होगी |
  • वह व्यक्ति जिसे गिरफ्तार किया गया है अथवा जिसे निरोध मे रखा गया है और जिसे पुलिस स्टेशन अथवा पूछताछ केंद्र अथवा हवालात मे आभिरक्षा मे रखा गया है इस बात का हकदार होगा की व्यवहार्यत यथाशीग्र उसके किसी मित्र अथवा नातेदार अथवा अन्य किसी ऐसे व्यक्ति को जो  उसे ज्ञात है अथवा जिसे उसके कल्याण मे अभिरुचि है यह सूचित कर दिया जाय की उसे गिरफ्तार कर लिया गया है और विशेष स्थान पर निरुद्ध कर रखा गया है जब तक की गिरफ्तारी के ज्ञापन का साक्ष्यांकन साक्षी स्वयं उस गिरफ्तार किये गये व्यक्ति का मित्र अथवा नातेदार न हो |
  • गिरफ्तार किये गये व्यक्ति का समय का समय और स्थान और उसकी अभिरक्षा का स्थान भी पुलिस द्वारा वहा अवश्य अधिसूचित किया जाना चाहिये , जहा उस गिरफ्तार किये गये व्यक्ति का निकटतम मित्र अथवा नातेदार उस जिले अथवा नगर के बहार रहते हो | अधिसूचना का यह कार्य उस जिले के और सम्बंधित क्षेत्र के पुलिस स्टेशन के विधिक सहायता संघटक के माध्यम से तार द्वारा गिरफ्तारी के बाद 08 से 12 घंटे की अवधि के भीतर किया जाना चाहिये|
  • गिरफ्तार किये गये व्यक्ति का गिरफ्तारी अथवा निरोध के बाद यथासिघ्र उसके इस अधिकार से अवश्य अवगत करा देना होगा की वह अपनी गिरफ्तारी अथवा निरोध की सुचना किसी को दे सकता है
  • निरोध के स्थान पर एक डायरी मे गिरफ्तार व्यक्ति के सम्बन्ध मे अवश्य ही पृविष्टि की जायगी जिसमे गिरफ्तार व्यक्ति के उस निकटतम मित्र का नाम उल्लिखित होगा जिसे गिरफ्तारी की सुचना डी गयी थी | इसके अतिरिक्त उन पुलिस अधिकारियो का नाम और विवरण भी होगा जिसकी अभिरक्षा मे गिरफ्तार व्यक्ति रखा गया है|
  • गिरफ्तार व्यक्ति, यदि निवेदन करता है तो गिरफ्तारी के समय उसकी उन बड़ी और छोटी क्षतियो की परीक्षा कराई जायगी जो की यदि कोई हो , उसके शरीर पर जाय और उसे उस समय अभिलिखित भी किया जायगा उस निरिक्षण ज्ञापन पर गिरफ्तार व्यक्ति और गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी दोनों का अवश्य हस्ताक्षर होगा और उसकी एक प्रति गिरफ्तार व्यक्ति को डी जायगी |
  • गिरफ्तार व्यक्ति की प्रति 48 घंटे पर अभिरक्षा मे उसके निरोध के दोरान एक प्रशिक्षित चिकित्सक द्वारा चिकित्सीय परीक्षा कराई जायगी और यह परीक्षा जिस चिकित्सक द्वारा कराई जायगी वह उस सम्बंधित राज्य अथवा संघ राज्य क्षेत्र के निदेशक स्वास्थ्य सेवाओ द्वारा नियुक्त अनुमोदित, चिकित्सको के पेनल का एक चिकित्सक होगा | निदेशक स्वास्थ्य सेवायें इसी तेरह का एक पेनल समस्त तहसीलों और जिलो के लिए भी तय्यार करेगा
  • समस्त दस्तावेजो की प्रतियाँ, जिसमे ऊपर उल्लिखित गिरफ्तारी का ज्ञापन भी सम्मिलित है, इलाका मजिस्ट्रेट को भी उसके अभिलेख के लिए भेजी जायगी
  • गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को पूछताछ के दोरान न की उस सम्पूर्ण अवधि मे अपने वकील से मिलने की अनुमति दी जा सके
  • एक पुलिस नियंत्रण कक्ष प्रत्येक जिले और राज्य मुख्यालय पर स्थापित करना होगा और वहा पर गिरफ्तारी और गिरफ्तार किये गये व्यक्ति की अभिरक्षा के स्थान से उस अधिकारी द्वारा जिसने गिरफ्तारी का कार्य किया है, सुचना भेजनी होगी यह गिरफ्तारी के 12 घंटे के भीतर किया जायगा और पुलिस नियंत्रण कक्ष पर उसे किसी सहज द्रश्य सुचना पटल पर चिपकाया जायगा| …

Image 1

-किसी वाद को सुनकर उसका निर्णय करने के लिए उस वाद का संज्ञान लेकर |

जांचों और विचारनो मे दंड न्यायालयों की अधिकारिता 177-189

विषय प्रवेश :  यह अध्याय इस निर्धारण के निमित्त सामान्य सिद्धांत का प्रतिपादन करता है की किसी अपराध की जांच      अथवा विचारण के लिए कौन-सा न्यायालय सक्षम होगा |

न्यायालयों की स्थानिक अधिकारिता के सन्दर्भ मे मूल सिद्धांत उपरोक्त धारा-177 मे संनिविष्ट किया गया है, जिसके          अनुसार प्रत्येक अपराध की जाँच और विचारण मामूली तौर पर ऐसे न्यायालय द्वारा किया जायेगा, जिसकी स्थानीय      अधिकारिता के अन्दर वह अपराध किया गया है|

धारा-177 के बाद की धाराएँ न्यायालय की “स्थानीय अधिकारिता” के  क्षेत्र को जिसमे किसी अपराध की जाँच अथवा             उसका विचारण किया जा सकता है, विशेष रूप से विस्तृत करती है|

इस अध्याय मे समविष्ट नियम परस्प्रिक्रत अनन्य नही है, वरन वे अपने प्रभाव मे संग्रहित प्रकृति की है और उनका आशय     जाँच अथवा विचारण को प्रारंभ करने के लिए न्यायालयों के विस्तृत अनुकताप का उपबंध निर्मित कर अपराधियों के        अभियोजन को सुविधाजनक बनाना है|

जाँच और विचारण का सामान्य सिद्धांत

1.धारा-177 :

  • धारा -177 एक सामान्य सिद्धांत है जांच और विचारण के बारे मे,
  • धारा 177 के अनुसार हर एक अपराध का जांच और विचरण मामूली तौर पर उस न्यायालय द्वारा किया जायेगा, जिसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर वह अपराध किया गया है
  • यह एक उपयुक्तता का सिद्धांत है

व्याख्या: मामूली तौर पर शब्द यह अर्थ ध्वनित करता है की यह धारा एक साधारण धारा है और इस संहिता            अथवा किसी अन्य विधि के अन्य विशेष उपबंधो के अधीन है

 

जांच और विचारण के अन्य नियम :

  • धारा-१७८ से १८४ के उपबंध सामान्य नियम के अपवाद है
  • ये उपबंध दांडिक न्यायालयों की स्थानीय अधिकारिता को विस्तरित करते है और
  • धारा-177 के अंतर्गत जो सामान्य सिद्धांत है, अगर उससे कोई असुविधाजनक स्थिति मे ये उपबंध समस्या  को कम करने मे कारगार होते है

जाँच और विचारण के अन्य नियम:

  • धारा-१७८ से १८४ के उपबंध सामान्य नियम के अपवाद है
  • ये उपबंध दांडिक न्यायलयों की स्थानीय अधिकारिता को विस्तारित करते है और
  • धारा-177 के अंतर्गत जो सामान्य सिद्धांत है, अगर उसे कोई असुविधाजनक स्थिति उत्पन्न होती है, तो उस स्थिति मे ये उपबंध समस्या को कम करने मे कारगर होते है

जाँच और विचारणों के विशेष प्रावधानों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है:

  1. जहाँ यह अनिश्चित है की कई स्थानीय क्षेत्रो मे से किसमें अपराध किया गया है |
  2. जहाँ अपराध अंशत: एक स्थानीय क्षेत्र मे और अशंत: किसी दूसरे मे किया गया है|
  3. अपराध चालु रहने वाला हो और वह एक से अधिक स्थानीय क्षेत्रो मे चालु रहता है
  4. अपराध का निर्माण विभिंत स्थानीय क्षेत्रो मे से किये गये कई कार्यो से मिलकर होता है

पहली परिस्थिति का द्रष्टान्त : जब अपराध का स्थानीय क्षेत्र अनिश्चित है-

अ के ऊपर अपराधिक न्यास को भंग करने का आरोप है| संपत्ति उसको क जगह पर न्यस्त किया      गया उसका व्ययत करने के लिए वह सम्पत्ति का बेईमानी से व्ययत करता है और यह अनिश्चित      नही है की संपत्ति का गबन स्थान क पर हुआ या ख पर

तब अपराध की जांच और विचरण किसिस भी स्थान पर हो सकता है क पर अथवा ख पर |

दूसरी परिस्थिति का दृष्टान्त : जहाँ अपराध अशंत एक स्थानीय क्षेत्र मे अशंत किसी दुसरे स्थानीय     क्षेत्रो मे चालू रहता है

‘अ’ ने अपमिश्रित खाद्य पदार्थ क जगह पर निर्मित किया और ग्राहक को अपमिश्रित खाद पदार्थ ख जगह पर बेच दिया

अत: ‘क’ और ‘ख’ दोनों की स्थानीय अधिकारिता के न्यायालय मे जांच और विचारण किया जा         सकता है

तीसरी परिस्थिति का द्रष्टांत :  अपराध चालु रहने वाला हो और वह एक से अधिक स्थानीय                क्षेत्रो मे चालु रहता है

a ने b का अपहरण x जगह पर से किया फिर उसको y जगह पर लेकर गया फिर z अपराध                का जांच और विचारण x या y या z किसी भी स्थान पर किया जा सकता है

चौथी परिस्थिति का द्रष्टांत: अपराध का निर्माण विभिन्न स्थानीय क्षेत्रो मे से किये गये कार्यो से       मिलकर होता है|

एक कूटकृत रसीद का निर्माण क नामक स्थान पर किया गया और उसे प्रयोग मे लाने के लिए               ख नामक स्थान पर भेजा गया था|

अत: क और ख दोनों ही स्थानों पर कूटकृत रसीद देने का कार्य हुआ है अत: इन स्थानों मे से           किसी भी क्षेत्र के न्यायालय मे अपराध की जांच और विचारण का कार्य सम्पादित किया जा सकता है

  1. धारा-179 : अपराध वह विचारणीय होगा जहाँ कार्य किया गया या जहाँ परिणाम निकला

द्रष्टांत : एक व्यक्ति च को क नामक न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता के अन्दर घायल किया        गया और उसकी म्रत्यु ख नामक न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता के भीतर हुई | यहाँ च पर          किया गया आपराधिक मानव-वध का विचारण क अथवा ख किसी भी न्यायालय द्वारा किया जा       सकता है

3.धारा-180 :  जहाँ कार्य अन्य अपराध से सम्बंधित होने के कारण अपराध है|

द्रष्टांत : चोरी अपने आप मे एक अपराध है अत: चोर्य वस्तु को प्राप्त करने अथवा अपने पास             रोक रखना एक ऐसा कार्यं है जो चोरी नामक अपराध से सम्बंधित है और इसलिये अपराध है इस      प्रकार चोर्य वस्तु को लेने अथवा अपने रोक रखने के आरोप की जांच या विचारण ऐसे किसी भी न्यायालय द्वारा किया जा सकता है, जिसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर माल चुराया गया है            या अथवा उसे प्राप्त किया गया था, या अपने पास रोक रखा गया था|

4.धारा 181 कुछ अपराधो की दशा मे विचारण का स्थान

  • ठगी, डकेती या अभिरक्षा से निकल भागने वाले अपराधो मे- जांच या विचारण का    कार्य उस न्यायालय द्वारा किया जा सकता है, जिसकी स्थानीय अधिकारिता के      अन्दर अपराध किया गया है, या अभियुक्त मिला है |
  • व्यपहरण और अपहरण –जिसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर कोई व्यक्ति व्यय्ह्त या अप्ह्य्त किया गया
  • जहाँ ले जाया गया
  • जहाँ छिपाया गया था
  • जहाँ निरुद्ध किया गया है
  • चोरी,उद्यापन या लूट – जहाँ अपराध किया गया या चुराई हुई संपत्ति किसी        व्यक्ति के कब्ज़े मे रखी गयी
  • आपराधिक दुर्विनियोग या आपराधिक न्यास भंग – जिसकी स्थानीय अधिकारिता  के अन्दर
  • अपराध किया गया है
  • उस संपत्ति का कोई भाग अभियुक्त द्वारा प्राप्त किया गया है
  • संपत्ति रखा गया है
  • संपत्ति लौटाया गया है या
  • उसका लेखा दिया है

चुराई हुई संपत्ति – जिसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर

  • अपराध किया गया है
  • चुराई हुई संपत्ति किसी व्यक्ति के कब्ज़े मे रखी गयी
  1. पत्रों,आदि द्वारा किया गया अपराध-धारा -182
  • जिसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर
  • ऐसे पत्र या सन्देश भेजे गये हो
  • या प्राप्त किये गये है
  • जिसकी अधिकारिता के अन्दर संपत्ति, प्रवंचित व्यक्ति द्वारा परिदत्त की गयी है  या अभियुक्त द्वारा की गयी है

6.द्रिविवः अपराध की जांच या विचारण-182

  • विशिष्ट अबंध की अनुपस्थिति मे द्विवः अपराध की जांच विचारण केवल उसी स्थान पर किया जा सकता है:-
  • जहा पर अपराध किया गया था
  • जिसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दत अपराधी ने प्रथम विवाह की अपनी पत्नी के साथ अंतिम बार निवास किया है,
  • अपराध कारित होने के बाद प्रथम विवाह की पत्नी ने स्थायी निवास कर लिया है

7.यात्रा या जल यात्रा मे किया गया अपराध: धारा -183 जिसकी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर

  • व्यक्ति या चीज़ होकर गुजरी है, या
  • वह व्यक्ति या चीज़ या जल यात्रा के दौरान गया है, या गयी है

8.एक साथ विचारणीय अपराधो के लिए विचारण का स्थान धारा-184 :

Image 2

अनुकाल्पित अबंध

  1. राज्य सरकार की विभिन्न सेशन खंडो मे मामलो के विचारण का आदेश देने की शक्ति- धारा 185

इस धारा द्वारा राज्य सरकार को जो शक्ति प्रदान की गयी है, वह एक असाधारण शक्ति है, जिसका प्रयोग          लोकहित मे किया जाना आशयित है,

उदहारण के लिए खलबली मचा देने वाले किसी मामले का विचारण इस तरह की स्थिति मई किसी अन्य                    सेशन खंड मे विचारण के लिए सुपुर्य करने का आदेश न्यायामुक्त माना गया है

परन्तु उच्च न्यायालय एवं उच्त्तम नयायालय के निदेश राज्य सरकार द्वारा दिए गये निर्देश के अधीन नही               रहेंगे|

  1. संदेह की दिशा मे उच्च न्यायालय का वह जिला विनिच्चित करना जिसमे जांच विचारण होगा धारा-186

जहाँ एक ही अपराध के लिए विभन्न व्यक्तियों के विरुद्ध विभिन्न न्यायालयों मे कार्यवाहिया संस्थित की गयी है      जिसमे से कुछ परिवाद पर और कुछ पुलिस रिपोर्ट पर आधारित है, वह यह आवश्यक नही है की वह न्यायालय             ही समुचित वाद-स्थल है, जिसने अपराध का सर्वप्रथम संज्ञान ग्रहण करने की शक्ति उच्च न्यायालय के पास               होनी चाहिए|

परिस्थिति 1. यदि वे न्यायालय एक ही उच्च न्यायालय के अधीनस्थ है, तो उस उच्च न्यायालय द्वारा

-2.  यदि वे एक ही उच्च न्यायालय के अधीनस्थ नही है, तो उस उच्च न्यायालय द्वारा जिसकी           अपीलीय दांडिक अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर कार्यवाही पहले प्रारंभ की गयी है, विनिचित                       किया  जायेगा और तब उस अपराध के सम्बन्ध मे अन्य सब कार्यवाहियां बंद कर डी जायगी|

 

अधिकारिता से बहार किये गए अपराध का जांच और विचारण

  1. मजिस्ट्रेट द्वारा ऐसे मामलो मे जांच और विचारण करना जिसकी अधिकारिता उसके पास नही है|

 धारा -187

 

जब अपराधो उसकी अधिकारिता से बहार अपराध करता है और चाहे अपराध संज्ञेय हो या असंज्ञेय हो, चाहे भाप्त के                 अंदर  हो या बाहर हो, और वह व्यक्ति उसकी अधिकारिता के अन्दर है तब मजिस्ट्रेट के अधिकारिता के भीतर किया                 गया है चाहे  तो वह उस अभियुक्त को उस मजिस्ट्रेट के पास भी भेज सकता है जिसकी अधिकारिता के अन्दर                      अपराध  किया गया है

  1. भारत से बाहर किया गया अपराध धारा-188

जहाँ अपराधी पाया जाता है

लेकिन केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना जांच और विचारण नही किया जा सकता है

  1. भारत के बहार किये गये अपराधो के बारे मे साक्ष्य लेना धारा-189

यह धारा साक्ष्य का एक विशेष नियम प्रस्तुत करती है और धारा-188 के अधीन किसी मामले से                 संव्यवहार  करने वाले न्यायालय को सक्षम बनाती है की वह ऐसे मामले मे सम्बंधित विदेशी राष्ट्र के                 किसी न्यायिक  अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किये गये परदेशो की प्रतियों को साक्ष्य के रूप मे ग्रहण कर सके

NOTE: उप्रुक्त उपबंधो पर विचार किये बिना कुछ ऐसे विशेष अबंध है जो धारा-406-412 तक दिए                      गए है अध्याय 31 के अंतर्गत जो विभिन्न न्यायालयों को शक्ति प्रदान करने है वादों के अंतरण के लिए |

Image 3

विषय प्रवेश : ऋजू  और भेदभाव रहित विचरण के लिए कभी कभी मामले का अंतरण आवश्यक हो जाता है यदि किसी   अभियुक्त व्यक्ति के पास इस विश्वास का युक्तियुक्त कारण है वह किसी न्यायधीश विशेष के हाथो ऋजु विचारण नही           प्राप्त कर सकता है, तो उसे यह अधिकार मिलना चहिये की वह अपने मामले का अंतरण किसी अन्य न्यायालय मे करा ले|

इस सिद्धांत पर आपत्ति नही की जा सकती है और इसे विस्त्रीं मान्यता मिल चुकि है| यह अध्याय इसी           सिद्धांत को प्रभाव मे लाता है और उसके संभावित दुरूपयोग के विरुद्ध संरक्षी प्रदान करता है| इस अध्याय                मे इस प्रकार छ: प्रकार के मामलो का अंतरनो का अनुचिंतन किया गया है-

  1. उच्चतम न्यायालयों द्वारा मामलो और अपीलों का अंतरित करना
  2. उच्च न्यायालय द्वारा मामलो और अपीलों का अंतरण
  3. सेशन न्यायधीश द्वारा मामलो और अपीलों का अंतरण
  4. सेशन न्यायधीश द्वारा मामलो का वापिस लेना
  5. न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा मामलो का वापिस लेना
  6. कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा मामलो का अपने-अपने अधीनस्थ मजिस्ट्रेट के हवाले करना या वापस करना|

कार्यवाहियां शुरू करने के लिए अपेक्षित शर्ते

धारा 190-199

संज्ञान लेने का तात्पर्य : संज्ञान लेने का तात्पर्य, संधिग्ध अपराध के होने के सन्दर्भ मे मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक मस्तिष्क का प्रयोग करना है

वाद: अजितपुश vs वेस्ट बंगाल राज्य-१९६३ s.c

NOTE: संज्ञान सदैव अपराध का होता है न कि अपराधी का|

संज्ञान धारा-468(2) मे विहित परिसीमा काल के भीतर ही लिया जाना चहिये

संज्ञान लेने के पीछे का उद्धेश्य : पुलिस की ज्यादतियों के विरुद्ध नागरिको के हितो की रक्षा करना और उन्हें बचाना

वाद: किशन सिंह vs बिहार राज्य-१९९३ s.c वाद मे s.c. ने कहा संहिता की धारा 190 परिवादी को सीधे मजिस्ट्रेट तक पहुँच के अधिकार को प्रदत्त करता है | यदि वह अनुभव करता है की पुलिस उसकी शिकायत पर कोई कार्यवाही नही करेगी या पुलिस उसकी शिकायत दर्ज करने से इनकार करती है

कितने समय के भीतर संज्ञान लेगा?

धारा-468 crpc

परिसीमा काल कब से शुरू होगी धारा-467

विषय वस्तु: अपराधियों को कसौटी पर कसना एक सामाजिक आवश्यकता है इस धारा मे प्रारम्भ इस अध्याय का उद्देश्य उन तरीको और परिसिमाओ का परिवर्तन करता है जिनसे और जिनके अधीन रहते हुए विभिन्न दंड न्यायालयों को अपराधो का संज्ञान ग्रहण करने के लिए सशक्त किया गया है ताकि अपराधकर्ता को विचारण की कसोटी पर करना जा सके

संज्ञान ग्रहण करना बचा है यह इस संहिता मे परिभाषित नही है और संज्ञान शब्द का दंड विधि अथवा प्रक्रिया मे कोई गोपनीय महत्त्व भी नही है | इसका सीधा सरल अर्थ है अवगत होना और अब इसका प्रयोग न्यायालय अथवा न्यायधीश के सन्दर्भ मे होता है तो इसका तात्पर्य न्याय्पिकत सुचना या प्रज्ञान ग्रहण करना है |

संज्ञान ग्रहण करने के लिए किसी प्रकार की ओपचारिकता कार्यवाही अन्तर्विलित नही है, वरन कार्यवाही तो वस्तविकत: तब की जाती है, जब मजिस्ट्रेट अपना मस्तिष्क किये गये अपराध की और ले जाता है|

 

 

संज्ञान लेने का सामान्य सिद्धांत : धारा-190 संज्ञान लेने के सामान्य सिद्धांत के बारे मे बताता है |

धारा 190 को दो वर्गों मे बांटा गया है|

  • कौन-कौन से न्यायिक मजिस्ट्रेट संज्ञान लेने के लिए समक्ष है
  • वे किन किन बाटो पर या किस तरह से किसी वाद का संज्ञान ले सकते है

धारा-190(2) :

  • बताता है की कौन कौन मजिस्ट्रेट संज्ञान ले सकते है इस धारा के अनुसार निम्न लिखित मजिस्ट्रेट संज्ञान लेने के लिए सक्षम है
  • मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट
  • न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी
  • न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय वर्ग ( अगर CJM संज्ञान लेने के लिए शसक्त करता है तब

धारा – 190(1):

  • बताता है की किन किन बाटो पर मजिस्ट्रेट संज्ञान लेने के लिए सक्षम है-
  • परिवाद पर
  • पुलिस रिपोर्ट पर
  • किसी व्यक्ति के सुचना पर या स्वयं अपनी जानकारी पर

धारा-191 :

  • धारा 190(1) के उपधारा (c) से सम्बंधित है यह ये बताता है की अगर मजिस्ट्रेट अपनी स्वयं की जानकारी से किसी अपराध का संज्ञान लेता है तो अभियुक्त व्यक्ति मामले अंतरण किसी दुसरे मजिस्ट्रेट के पास करवा सकता है

धारा-192 :

इस धारा के अधीन मामलो को मजिस्ट्रेट हवाले करने के लिए मुख्य मजिस्ट्रेट और मजिस्ट्रेट और किसी वर्ग मजिस्ट्रेट को शसक्त किया गया है, जो अपने कृत्य को निम्न रीतियों से सम्पादित करते है-

  • मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अपराध का संज्ञान लेने के बाद मामले को जाँच या विचारण के लिए अपने अधीनस्थ किसी सक्षम मजिस्ट्रेट के हवाले कर सकता है
  • CJM यदि चाहे तो प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को भी अपनी जैसी शक्तियों से युक्त कर सकता है| ऐसा वे इसलिये भी कर सकते है ताकि उनके ऊपर जो आवश्यक कार्य का बोझ है, उससे छुटकारा पा जाये |

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा इस प्रकार सशक्त किया गया कोई प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट अपराध का संज्ञान करने के पश्चात मामले को जाँच या विचारण के लिए अपने अधीनस्थ किसी ऐसे सक्षम मजिस्ट्रेट के हवाले कर सकता है, जिसे CJM साधारण या विशेष आदेश द्वारा विनिद्रिष्ट करे और तब ऐसा मजिस्ट्रेट जांच या विचारण कर सकता है

NOTE: इस संहिता की धारा-410 मे न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा मामलो को वापस लिए जाने का उपबंध किया गया है

धारा-194

  • साधारणत: सेशन न्यायालय किसी भी मामले का संज्ञान नही ले सकता है
  • जब तक किसी मजिस्ट्रेट द्वारा उसके सुपुर्द नही कर दिया जाय

अपवाद: धारा 199(2) धारा 193 का अपवाद है जो मानहानि के अपराध के बारे मई बात करता है 6 विशिष्ट व्यक्तियों के मानहानि का वाद आता है तो सेशन न्यायालय उस पर सीधा संज्ञान ले सकती है वे 6 विशिष्ट व्यक्ति इस प्रकार है-

  1. राष्ट्रपति
  2. उपराष्ट्रपति
  3. राज्य का गवर्नर
  4. संघ राज्य क्षेत्र का प्रशासक
  5. कोई संघ राज्य क्षेत्र का मंत्री
  6. राज्य के कार्यकलापो से सम्बंधित अन्य लोक सेवक

धारा-194

इस धारा के अनुसार अपर सेशन न्यायधीश या सहायक सेशन न्यायधीश ऐसे मामलो का विचारण कर सकते है

  1. जिन्हें उस सेशन खंड का सेशन न्यायधीश साधारण या विशेष आदेश द्वारा विचारण करने के लिए उसके हवाले करता है |
  2. उच्च न्यायालय विशेष आदेश द्वारा विचारण करने के लिए उसे निदेश देता है |

मजिस्ट्रेट से परिवाद

धारा-200 से धारा-203

विषय प्रवेश: धारा-200 के सथ प्रारंभ यह अध्याय धारा-203 तक ऐसे उपयोगी उपबंध प्रस्तुत करता है, जिसकी मदद से ऐसे मिथ्या, असार और परिक्लेश्कारी परिवादों को खारिज किया जा सकता है जिनका लक्ष्य अभियुक्त व्यक्ति को परेशान करना है | न्यायालयों को दिन-प्रतिदिन के अनुभव यह प्रदर्शित करते है की अनेको परिवाद वैमनस्य पर आधारित होते है| अत: यह आवश्यक है की प्रारंभ मे ही उन पर विचार कर लिया जाय और जो परिवाद मामले का दृढ आधार प्रस्तुत करते, उनका परिनिरीक्षण किया जाय, ताकि न्यायालय सारवान मामलो मे ही अभियुक्त व्यक्ति को समन कर सके|

परिवाद की परिभाषा: धारा-200 मे परिवाद की परिभाषा नही दी गयी है, परन्तु धारा (2) घ के अनुसार परिवाद से इस संहिता के अधीन मजिस्ट्रेट द्वारा कार्यवाही किये जाने की द्रष्टि से मौखिक या लिखित रूप मे उससे किया गया यह अभिकथन अभिप्रेत है की किसी व्यक्ति ने, चाहे वह ज्ञात हो या अज्ञात अपराध किया है किन्तु उसके अंतर्गत पुलिस रिपोर्ट नही है

परिवाद की अपेक्षित शर्ते: धारा 200 के अधीन परिवाद की आवश्यक शर्ते निम्न है:-

  1. यह कि, परिवाद पर अपराध का संज्ञान करने वाले मजिस्ट्रेट द्वारा परिवादी की और यदि कोई साक्षी उपस्थित तो उनकी शपथ पर परीक्षा की जाए|
  2. यह कि, ऐसी परीक्षा सारांश लेखबद्ध किया जाये
  3. यह कि, उस लेखबद्ध किये गये सारांश पर परिवादी, और साक्षियों द्वारा तथा मजिस्ट्रेट द्वारा हस्ताक्षर किया जाय

परिवाद यदि लिखित है : परिवाद यदि लिखकर किया गया है तो मजिस्ट्रेट द्वारा निम्न स्थितियों मे परिवादी या साक्षियों की परीक्षा करना आवश्यक नही है-

  1. यदि परिवाद अपने पदीय कर्तव्यों के निर्विघ्न मे कार्य करने वाले या कार्य करने का तात्पर्य रखने वाले लोक-सेवक द्वारा या न्यायालय द्वारा किया गया है, अथवा
  2. यदि मजिस्ट्रेट जांच या विचरण के लिए मामले को धारा-192 के अधीन किसी अन्य मजिस्ट्रेट के हवाले करता है, तो बाद वाले मजिस्ट्रेट के लिए उनकी फिर से परीक्षा करना आवश्यक नही है|

धारा-200: परीक्षा कब- मजिस्ट्रेट द्वारा परिवाद पर अपराध का संज्ञान लेने के बाद

Image 1

  • परीक्षा किसकी आवश्यक नही है :-
  • जब परिवाद लिखित है

+

परिवादी लोक सेवक या न्यायालय

+

परिवाद पदीय निर्विघ्न मे कार्यकर्ता द्वारा हो

या

जब परिवाद लिखित हो

  • मामला 192 मे cjm द्वारा उसे अंतरित किया गया है, परन्तु जब मामला 192 मे अंतरिम करने से पहले परिवादी या साक्षी की परीक्षा की जा चुकि है

धारा 201:

Image 2

धारा-२०२:                       परिवाद प्राप्त होने पर संज्ञान

या

१९२ में मामला उसे भेजे जाने पर

यदि ठीक समझता है तो आदेशिका (समन/वार्रेंट ) जारी करेगा

Image 3

  • ये दोनों न करने पर धारा 202 मे कार्यवाही करेगा और यह सुनिश्चित करने हेतु पर्याप्त आधार है या नही

Image 4

  • संज्ञान से पहले अन्वेषण का निदेश धारा-१५६(3) मे और
  • मजिस्ट्रेट के संज्ञान लेने के बाद अन्वेषण का निदेश धारा 202(1) मे कर सकता है

Image 5

Image 6

question. अगर परिवाद 203 मे खारिज हो जाता तो क्या दोबारा उसी बात के लिए परिवाद किया जा सकता है?

answer. धारा-203 के अधीन मजिस्ट्रेट द्वारा परिवाद को खारिज करने का आदेश न तो उन्मोचन का आदेश है और न ही दोषमुक्ति का| अत: यह धारा ३०० मे समाविष्ट पूर्व-दोष्सिधि अथवा पूर्व दोषमुक्त का सिद्धांत यहाँ लागू नही होता है और प्रथम परिवाद के खारिज हो जाने के बाद दूसरा परिवाद किया जा सकता है, परन्तु धारा 203 के अधीन यदपि प्रथम परिवाद का खारिज किया जाना उसी विषय के बारे में द्वितीय परिवाद फाइल किये जाने को वर्जित नही करता किन्तु द्वितीय परिवाद तभी ग्रहण किया जा सकता है, जबकि यह सिद्ध कर दिया जाय की द्वितीय परिवाद के सथ पेश की गयी सामग्री पर्याप्त कारणों से प्रथम परिवाद के समय पेश नही की जा सकती थी और पेश की जाने वाली नै सामग्री मामले को प्रथम दृष्टया सिद्ध करने मे सहायक होगी|

मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही का प्रारंभ किया जाना

धारा-204 धारा-210

परिचय: धारा 204 से प्रारंभ इस अध्याय मे मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही प्रारंभ करने की प्रक्रिया निर्धारित की गयी है धारा 204 के अनुसार यदि किसी अपराध का संज्ञान करने वाले मजिस्ट्रेट की राय मे कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है तोह वह आदेशिका जारी करके अभियुक्त को न्यायालय मे हाज़िर होने के लिए कार्यवाही करेगा |

धारा-204 के अनुसार वह निम्न कार्यवाहियां कर सकता है

  1. यदि मामला समन-मामला प्रतीत होता है, तो अभियुक्ति की हाजिरी के लिए समन जारी करेगा

अथवा

  1. यदि मामला वारेंट मामला प्रतीत होता है तो, वह अपने समक्ष या अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष अभियुक्ति की हाजिरी के लिए वारेंट या समन जारी करेगा|

इन कार्यवाहियों के साथ साथ मजिस्ट्रेट को निम्न अपेक्षाओ की भी पूर्ति करनी पड़ती है |

  • यह कि, अभियुक्ति के विरुद्ध तब तक कोई समन या वारंट जारी न किया जाये जब तक अभियोजन के साक्षियों की सूचि फाइल नही कर दी जाती है|
  • यह कि, लिखित परिवाद पर संसिस्थ कार्यवाही मे जारी किये गये समन या वारंट के सथ उस परिवाद की एक प्रतिलिपि भी लगे जाये
  • यह कि, यदि तत्समय प्रवृत किसी विधि के अधीन कोई आदेशिका फीस या संदेय है तो आदेशिका तब तक जारी न की जाय जब तक फीस नही डी जाती है, और यदि ऐसी फीस उचित समय के अन्दर नही दी जाती है तो मजिस्ट्रेट परिवाद खारिज कर सकता है

धारा-205 : मजिस्ट्रेट द्वारा अभियुक्त को व्यैक्तिक हाजिरी से अभियुक्ति दे सकना

  • यह धारा मजिस्ट्रेट को अभियुक्त की व्यैक्तिक हाजिरी से अभियुक्ति दे सकने के लिए शसक्त करती है|
  • मजिस्ट्रेट यह व्यवस्था कर सकता है की अभियुक्त न्यायालय मे स्वयं हाज़िर न होकर अपने प्लीडर द्वारा हाज़िर हो सकता है
  • परन्तु कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम मे अभियुक्त की व्यैक्तिक हाजिरी को निर्देश दे सकता है |

वैसे मामलों मे जो प्रकृति से ही गंभीर है, जिसमे नैतिक दृष्टता अन्त्रिवालित है, व्यैक्तिक हाजिरी ही नियम है|

धारा-206 छोटे अपराधो मे विशेष समन

इस धारा का उद्देश्य छोटे अपराधो के मामलो मे विशेष समन जारी करके मामले को त्वरित निस्तारण करना है और अभियुक्त को न्यायालय मे हाज़िर होने आदि की परेशानियों से अभियुक्ति प्रदान करना है

समूची धारा का विश्लेषण करने से निम्न नियम उभर कर सामने आते है:-

  • इस धारा का प्रवर्तत उन्ही मामलो मे हो सकता है, जिनमे अभिकथित अपराध केवल 1000 रुपए तक के जुर्माने से दंडनीय है
  • जहाँ मजिस्ट्रेट की यह राय है की मामले को धारा २६० के अधीन संक्षिप्त निस्तारित किया जा सकता है धारा २६० कुछ विशेष मजिस्ट्रेट को कुछ विशेष अपराधो के संक्षिप्त विचारण के लिए सशक्त करती है,
  • भले ही उप्रुक्त दोनों शर्ते की पूर्ति हो गई हो, फिर भी यह धारा ऐसे किसी मामले मे लागू नही हो सकती है जहाँ कारणों को अभिलिखित करते हुए मजिस्ट्रेट इस धारा के अधीन विशेष समन जारी करने के पक्ष मे नही है
  • यह विशेष समन की प्रक्रिया ऐसी किसी मामले मे लागू नही होगी जहाँ अपराध मोटर यान अधिनियम १९३९ के अधीन दंडनीय है
  • विशेष समन मे अभियुक्त व्यक्ति को यह विकल्प प्रदान किया गया है कि-
  • वह स्वयं हाज़िर हो सकता है
  • प्लीडर द्वारा हाज़िर हो सकता है
  • मजिस्ट्रेट के समक्ष हाज़िर हुए बिना आरोपी दोषी होने का अभिवचन कर सकता है
  • अगर अभियुक्त प्लीडर द्वारा हाज़िर होना चाहता है और ऐसे प्लीडर को लिखित प्राधिकार देकर और उस प्लीडर के माध्यम से जुर्माने का संदाय करके ऐसा कर सकता है
  • समन मे विनिद्रिष्ट की जाने वाली जुर्माने की धनराशी को 100 रुपए से अधिक नही होना चहिये
  • यदि अभियुक्त व्यक्ति मजिस्ट्रेट के समक्ष हाज़िर हुए बिना दोषी का अभिवचन करना चाता है तो वह विनिद्रिष्ट समय के भीतर अभिवचन लिखकर और समन मे उल्लिखित जुर्माने की राशि मजिस्ट्रेट को भेज सकता है|

धारा 207 :अभियुक्त को पुलिस रिपोर्ट या दस्तावेजो की प्रतिलिपि देना:

धारा-207 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट का यह आज्ञापक कर्तव्य है की वह अभियुक्त को उन समस्त कथनों की जो पुलिस को किये गये है और अन्य ऐसे दस्तावेजो की जिन पर अभियोजन निर्भर करता है प्रतिलिपियाँ नि:शुल्क प्रदान करे जैसे:-

  • पुलिस रिपोर्ट
  • 154 के अधीन f.i.r
  • 161 (3) के अधीन व्यक्तियों के कथन जिसकी अपने साक्षियों के रूप- मे परीक्षा करने के अभियोजन का विचार है
  • 164 के अधीन संस्विक्रितियां
  • 173(5) के अधीन मजिस्ट्रेट को भेजे गये दस्तावेज r.r. के साथ

उद्देश्य : अभियुक्त व्यक्ति को कथनों और दस्तावेजो की प्रतियाँ देने का उद्देश्य उसे इस बात की जानकारी करना है की उसे जांच अथवा विचारण के समय किस बात का सामना करना है और यह भी की वह अपने को प्रतिरक्षा के लिए तैयार रखे |

अभिलेख की प्रतियों की अनापूर्ति का परिणाम: सामान्यत: उस स्थिति मे जब अभियुक्त के लिए तात्विक साक्ष्य आवश्यक होते है और उसे अभिलेख की प्रतियों की आपूर्ति नही हो पाती, मामले की सुनवाई स्थगित कर डी जाती है ताकि सम्पूर्ण अभिलेख को तैयार किया जा सके,

तथापि जहाँ मामले के प्रयोजन के लिए साक्ष्य तात्विक नही है वहां न्यायालय मामले को स्थगित करने से इनकार कर सकता है

यही स्थिति धारा-208 के सन्दर्भ मे भी है |

धारा 208: सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय अन्य मामलो मे अभियुक्त को कथनों और दस्तावेजो की प्रतिलिपियाँ देना:-

उद्देश्य: इस धारा का उद्देश्य सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय पुलिस रोर्ट से भिन्न आधार पर संस्थित मामलो मे अभियुक्त को कथनों और दस्तावेजो की प्रतिलिपियाँ देने की व्यवस्था करना है |

ऐसे मामलो मे जहाँ अपराध का संज्ञान पुलिस रिपोर्ट द्वारा नही जहाँ अन्य किसी आधार पर किया गया है, वहाँ सामान्यत: अपराध का अन्वेषण पुलिस द्वारा नही किया जा सकता है और स्व्भाव्कित वहां ऐसे कथन दस्तावेज उपलब्ध नही रहते, जिन्हें पुलिस ने अभिलिखित तैयार अथवा उपलब्ध किया हो

अत: इस तरह के मामलो मे धारा 207 द्वारा अभियुक्त को जो मूल्यवान अधिकार प्रदान किया गया है, वह उपलब्ध नही रहता है

विचारण के पूर्व किसी प्रारंभिक जांच की अनुपस्थिति मे और जब अभियुक्त के पास कोई पुलिस अभिलेख भी उपलब्ध न कराया गया हो, तब उसके लिए यह कठिन कार्य हो जाता है की वह अपनी प्रतिरक्षा की तैयारी करे विशेषकर तब जब अभिकथित अपराध कोई गंभीर प्रकृति का हो और सेशन न्यायालय द्वारा अनन्यत विचारणीय हो|

धारा 208 इसी कठिनाई का निवारण का प्रयत्न करती है और अभियुक्त व्यक्ति को उसके विरुद्ध तैयार किये गये मामले को अवगत कराती है और उसे अपनी प्रतीक्षा के निमित्त तैयार होने के लिए समर्थ बनाती है

धारा 208 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट निम्नलिखित प्रतिलिपि अभियुक्त को अविलम्ब नि:शुल्क देगा

  1. धारा 200 या धारा 202 के अधीन लेखबद्ध कथन किये गये अभिकथन|
  2. 161 या 164 के अधीन लेखबद्ध कथन यदि कोई हो|
  • मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया दस्तावेज जिस पर अभियोजन का विचार है|

धारा 209:

  • जब अपराध अनन्यत: सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय ही तब मामला उसे सुपुर्द करना-
  • जब मजिस्ट्रेट के समक्ष अभियुक्त को लाने के बाद अगर यह प्रतीत होता है की अपराध अनन्यत: सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है तो वह-
  1. धारा 207 अथवा धारा 208 का अनुपालन करेगा और जब तक मामला सुपुर्द नही किया जाये तब तक के लिए अभियुक्त को अभिरक्षा मे भेज सकता है
  2. जमानत से सम्बंधित इस संहिता के उपबंधो के अधीन रहते हुए विचारण के दौरान और विचारण के समाप्त होने तक अभियुक्त को अभिरक्षा मे प्रतिप्रेषित करेगा
  • मामले का अभिलेख तथा दस्तावेजो और वस्तुए, यदि कोई हो जिन्हें साक्ष्य मे पेश किया जाना है, उस न्यायालय को भेजेगा
  1. मामले के सेशन न्यायालय को सुपुर्द किये जाने की लोक अभियोजक को सुचना देगा

धारा 210 : परिवाद वाले मामले मे अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया और उसी अपराध के बारे मे पुलिस अन्वेषण

उद्देश्य: इस धारा का उद्देश्य परिवाद वाले मामले मे अनुसरण की जाने वाले प्रक्रिया और उसी अपराध के बारे मे पुलिस अन्वेषण किये जाने की स्थिति मे मामलो के समेकन की व्यवस्था करना है |

धारा 210- परिवाद वाले मामले मे प्रक्रिया और उसी अपराध के बारे पुलिस अन्वेषण

  1. जब एक ही मामले मे परिवाद किया गया हो और पुलिस अन्वेषण भी हो रहा हो-
  • मजिस्ट्रेट परिवाद की कार्यवाही रोक देगा
  1. यदि पुलिस रिपोर्ट आने पर अब हियुक्त एक ही हुआ तो-
  • मजिस्ट्रेट मामले को पुलिस रिपोर्ट पर ( चलाएगा-238-243)
  • यदि अभियुक्त दोनों मामलो मे अलग हुए तो
  • मजिस्ट्रेट जैसे कार्यवाही पहले कर रहा था उसी के अनुसार चलाएगा |

आरोप- अध्याय-17

विषय-प्रवेश- अपराधिक मामलो में ऋजु विचारण की एक महत्वपूर्ण और मूल अपेक्षा यह है की अभियुक्त व्यक्ति को उसके विरुद्ध लगाये गये दोशारोपनो की सुत्थ्य सूचना दी जाय|

अभियुक्ति को उसकी प्रतिरक्षा की तैयारी के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण आवश्यकता है इस संहिता के अंतर्गत किये जाने वाले समस्त विचारानो में अभियुक्त को प्रारंभ से ही उसके विरुद्ध लगाये गये अभियोग को सूचित करने की व्यवस्था की गयी है गंभीर अपराधो में इस संहिता द्वारा यह अपेक्षा की गयी है की अभियोगों को अत्यंत सुव्य्था, सूक्षमता और स्पष्टता के साथ व्यवस्थित और लेखबद्ध किया जाये इस “आरोप” को उसके वाद पढ़ा जायेगा और अभियुक्त व्यक्ति को स्पष्ट किया जायेगा|

इस अध्याय में आरोप से सम्बंधित उपबंध समाविष्ट किये गये है| जो निम्नलिखित प्रकार से है:-

  1. धारा 211 से लेकर-214 तक यह बतलाया गया है की आरोप में कौन सी बात समाविष्ट होगी |
  2. धारा -216 और 217 तक आरोप में परिवर्तन करने के लिए न्यायालय की शक्ति और ऐसे परिवर्तन के बाद अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया का उल्लेख है |
  3. धारा-218 में यह मूल नियम बताया गया है की प्रत्येक पृथक अपराध के लिए पृथक आरोप होना चाहिए और हर उसे ऐसे आरोप का पृथक विचारण होना चाहिए |
  4. परन्तु, धारा-219,220,221 और 223 इस नियम नियम 218 का अपवाद प्रस्तुत करती है|
  5. धारा-222 उन परिस्थितियों से संव्यवहार करती है, जिनमे अभियुक्त को उस अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकता है जिसके निमित उस पर आरोप नहीं लगाया गया था|
  6. धारा- 224 में उस प्रभाव का उल्लेख किया गया है जिसमे विभिन्न आरोपों में से किसी एक आरोप पर दोषसिद्धि होने पर शेष आरोपों का प्रत्याहरण कर लिया गया है
  7. धारा-215 में उन गलतियों के प्रभाव को स्पष्ट किया गया है, जो आरोप में अपराध और एनी विवरणों को उल्लिखित करने में हुई है|

आरोपों की परिभाषा:- इस संहिता में “आरोप की कोई समुचित परिभाषा नहीं दी गई| केवल धारा 2(ख) में यह कहा गया है की “आरोप” के अंतर्गत जब आरोप में एक शीर्ष है | इससे “आरोप” शब्द का तात्पर्य स्पष्ट नही होता है |

सामान्य भावबोध के अंतर्गत “आरोप” का तात्पर्य अभियुक्त के विरुद्ध अपराध की जानकारी का ऐसा कथन है| जिसमे आरोप के आधारों के साथ साथ समय स्थान और उस व्यक्ति या वास्तु का उल्लेख रहता है , जब, जहाँ और जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है |

आरोप का उद्देश्य:- न्याय के मौलिक सिद्धांतो में से एक यह है की अभियुक्त को यह जानना चाहिए की उसके विरुद्ध कौन सा आरोप है , जिससे वः उस आरोप के सम्बन्ध में अपनी प्रतिरक्षा निर्मित कर सकता है |

NOTE: आरोप आपराधिक कार्यवाही में एक महत्वपूर्ण कदम है तथा जांच को विचारण के चरण से पृथक करता है|

Image 1

  • क्या हर मामले में चार्ज फार्म करना अनिवार्य है नही, हर मामले में चार्ज फ्रेम करना अनिवार्य नही है

Image 2

215:- इस धारा का उद्देश्य वहाँ न्याय को विफल होने से निवारित करना है, जहाँ आरोप के व्यवस्थापन मैं नियमो का अतिलंघन हुआ है | तथापि, यह धारा यह भी स्पष्ट करती है की आरोप में अपराध की विविष्टियों का उल्लेख करने में यदि कोई ऐसी अनियमिमता हुई है,जो महत्वपूर्ण नही है,तो उससे विचारण अथवा उसका परिणाम प्रभावित नही होगा |यदि आरोप अपूर्ण है,अथवा गलतियों से परिपूर्ण हैं अथवा जहाँ कोई आरोप है ही नही , वहां न्यायालय धरा 216 के अधीन विधमान आरोप में संशोधान्न अथवा परिवर्धन कर सकता है| यहह निश्चित करने के लिए की क्या गलतियों अथवा भूल के कारन न्याय नहीं हुआ है, न्यायालय को यह देखना चाहिए की अभियुक्त किस रीति से अपनी प्रतिरक्षा कर रहा है, और उसकी आपत्ति किस प्रकृति की है | इस संहिता की धारा 464 में आरोप-विरचित न करने या उसके अभाव या उसमे गलती का प्रभाव उल्लिखित किया गया है|

धारा 215 के अंतर्गत आरोप की किसी गलती अथवा लोप को केवल तभी तात्विक माना जा सकता है, जब उसके कारण अभियुक्त, वास्तव में भूलावे में पड़ गया है और उसके कारण न्याय नही हो पाया है| आरोप को पढने से जहाँ यह स्पष्ट हो जाता हो की उसमे प्रतिरूपण द्वारा छल करने का अपराध का अभियोग लगाया गया है, यधपि उसमे छल के षड्यंत्र के अपराध का ही उल्लेख है, वहां न्यायालय द्वारा यह निर्धारित किया गया है कि  अभियुक्त उस आरोप के कारण भूलावे में नही आ सकता था और उसके कारन अन्याय नही हुआ था धारा 215 के अधीन इस तरह यदि किसी आरोप में किसी गलती का अभिकथन किया गया है तो उसके सम्बन्ध में न्यायालय की शक्तियां बहुत व्यापक है| इस सम्बन्ध में न्यायालय को जो कुछ देखना है, वह यह है की क्या अभिकथित आरोप नही हुआ है, वहां इस बात की सम्भावना रहती है की अभियुक्त पर आरोप की अस्पष्टता अथवा संदिग्धता के कारण अपने विचारण में प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और इस सम्भावना को अस्वीकार नही किया जा सकता | इस तरह की स्थिति में अभियुक्त को दोषसिद्धि नहीं किया जा सकता |

216: इस धारा का उद्देश्य न्यायालय को आरोप मे परिवर्तित कर सकने के लिए सशक्त करना है| इस धारा को उपधारा (1) के अनुसार निर्णय सुनाये जाने के पूर्व न्यायालय किसी भी समय आरोप मे परिवर्तन या परिवर्धन कर सकता है | इस संहिता द्वारा , इस प्रकार न्यायालयों को आरोप मई परिवर्तन या परिवर्धन करने की अत्यंत विस्तृत शक्ति प्रदान की गयी है और यह कार्य विचारण न्यायालय द्वारा अपील न्यायालय द्वारा भी किया जा सकता है, बशर्ते की अभियुक्त को इस तरह के परिवर्तन या  परिवर्धन से किसी नये अपराध के आरोप का सामना करना न करना पड़े अथवा यह की उस आरोप के सन्दर्भ मे उसे अन्धकार मे रखे जाने के कारण अथवा यह की उसे अपनी प्रतिरक्षा का पूर्ण अवसर न मिल सकने के कारण प्रतिकूल प्रभाव का सामना न करना पड़े | न्यायालय को आरोप मे परिवर्तन या परिवर्धन करने की विस्तरित शक्ति तो प्राप्त है, परन्तु उसे इस शक्ति का प्रयोग न्यायिक ही करना है और अपने विवेक का प्रयोग अत्यंत बुद्धिमानी से करना है वह आरोप मे ऐसा परिवर्तन या परिवर्धन नही कर सकता, जो की अभियुक्त पर प्रतिकूल प्रभाव डाले |

“किसी भी आरोप मे परिवर्धन” का तात्पर्य किसी नूतन आरोप का परिवर्धन है और किसी आरोप मे परिवर्तन का तात्पर्य किसी भी विधमान आरोप मे परिवर्तन या रूप भेद या फेरफार करना है, अथवा किसी भिन्न आरोप का बनाना है धारा 216 के अधीन किसी आरोप मे परिवर्धन और परिवर्तन का तात्पर्य किसी विधमान एक या एक से अधिक आरोप मे या परिवर्धन या परिवर्तन करना है | अत जहाँ अभियुक्त को समस्त आरोपों से उन्मोचित कर दिया गया हो, उसके विरुद्ध कोई भी आरोप विधमान न हो, वहां उसके मामले मे धारा के अधीन 216 के अधीन आरोपों के परिवर्तन या परिवर्धन के लिए कोई भी आवेदन स्वीकार नही किया जा सकता है|

आरोप को जोड़ना /परिवर्तित करना- किसी आरोप को परिवर्तित करने या जोड़ने की न्यायालय की शक्ति अनिर्बंधित है, यदि ऐसा जोड़ना और या परिवर्तन निर्णय घोषित किये जाने के पूर्व किया जाता है | धारा 216 की उपधारा (2) से (5) अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया के सम्बन्ध मे प्रावधान करती है, यदि एक बार न्यायालय किसी आरोप को परिवर्तित करने या जोड़ने का विन्श्चिय करता है | आवेदन का सारभूत होना आवश्यक है | सारहीन आवेदन के आधार पर आरोपों को जोड़ना विधिमान्य नही है|

आरोप मे परिवर्तन या परिवर्धन के बाद की प्रक्रिया – आरोप मे परिवर्तन या परिवर्धन के बाद निम्न प्रक्रिया का अनुसरण किया जाना आवश्यक है, क्योकि ऋजु- विचारण के सुनिश्चयन के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक है-

  1. यह कि, ऐसा प्रत्येक परिवर्तन या परिवर्धन अभियुक्त को पढ़कर सुनाया और समझाया जायेगा |
  2. यह कि, यदि आरोप मे किये गये परिवर्तन या परिवर्धन से न्यायालय की आय अभियुक्त पर अपनी प्रतिरक्षा करने मे या अभियोजन पर मामले के संचालन मे कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना नही है, तो न्यायालय ऐसे परिवर्तन या परिवर्धन के पश्चात अपने विवेक से विचारण को आगे ऐसे चला सकता है, मानो परिवर्तन या परिवर्धित आरोप ही मूल आरोप है|
  3. यह कि, यदि परिवर्तन या परिवर्धन ऐसा है की न्यायालय की राय मे उसके कारण अभियुक्त या अभियोजक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, तो न्यायालय या तो विचारण का निदेश दे सकता है, या विचारण को आवश्यकतानुसार आगे की अवधि के लिए स्थगित कर सकता है|
  4. यह कि, यदि परिवर्तित या परिवर्धित आरोप के परिणामस्वरूप कथित अपराध के अभियोजन के लिए पूर्व-मंजूरी की आवश्यकता है, तो ऐसी मंजूरी प्राप्त किये बिना कोई कार्यवाही नही की जायेगी, यदि पहले ही यह मंजूरी अभिप्राप्त नही कर ली गई है |

217:  यह धारा पिछली धारा 216 की निरंतरता मे आरोप मे परिवर्तन या परिवर्धन करने के बाद न्यायालय द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया का विस्तार करते हुए यह व्यवस्था करती है की न्यायालय ऐसे साक्षियों को पुन: बुला सकता है जिनकी परीक्षा की जा चुकि है| वह ऐसे किसी अन्य साक्षी को भी बुलाने की अनुज्ञा दे सकता है, जिसे बुलाना वह आवश्यक समझे |

साक्षियों को वापिस बुलाना- संहिता की धारा-217 साक्षियों को वापस बुलाने के सम्बन्ध मे प्रावधान करती है, जब आरोप विचारण के प्रारम्भ के पश्चात न्यायालय द्वारा परिवर्तित किया जाता है या जोड़ा जाता है| उक्त के परिप्रेक्ष्य मे निर्णय के पूर्व किसी समय आरोप को जोड़ने या परिवर्तित करने के लिए न्यायालय की सक्षमता के बारे मई कोई संदेह नही हो सकता | यदि कोई आवेदन धारा 217 के अधीन साक्षियों के बुलाने या उनकी प्रतिपरीक्षा करने के लिए न्याय का उद्देश्य को विफल करने के परवर्ती हेतुक से दाखिल किया गया है तो उसे अनुज्ञात नही किया जा सकता है |

218: इस धारा का उद्देश्य सुभिन्न अपराधो के लिए पृथक और ऐसे प्रत्येक आरोप का विचारण पृथकत: कराना उपबंधित करना है| किसी भी अपराधिक मामले मे ऋजु विचारण की जो प्रारम्भिक अपेक्षा होती है, वह अभियोग का सत्ति ओए संक्षिप्त कथन है| संहिता मे इस अपेक्षा को निम्न रीतियों से पूरा करने का पयटन किया गया है-

प्रथम, यह कि प्रत्येक आरोप की अंतर्वस्तु क्या होगी , जो की धारा 211 से 214 तक उपबंधित है-

द्वितीय, यह कि प्रत्येक सुभिन्न अपराध के लिए पृथक आरोप होना चाहिये | इस अपेक्षा को पूर्ति धारा 218 द्वारा की गई है, और

तृतीय, यह कि, किन्ही विशेष मामलो को छोड़कर प्रत्येक आरोप का विचारण पृथकत किया जाना चाहिये| इस अपेक्षा की पूर्ति की धारा 218 द्वारा की गयी है| इस तरह पृथक विचारण की व्यवस्था की गयी है और उन्हें अनेको और एक दुसरे से असम्बन्ध आरोपों के संयोजन से शुन्यकृत होने से बचाया गया है|

नियम के अपवाद : उपर्युक्त नियम के निम्र अपवाद भी है –

  1. यह कि, अभियुक्त लिखित आवेदन द्वारा आरोपों का संयुक्त विचारण चाहता है और मजिस्ट्रेट की यह राय है की उससे ऐसे व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा तो ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध विरचित सभी या किन्ही आरोपों का विचारण एक सथ कर सकता है|
  2. धारा 219 ,220,221, और 223 के उपबंधो के प्रवर्तन पर ये नियम प्रभाव कर सकता है|

219: इस धारा का उद्देश्य अभियुक्त को अनावश्यक परेशानी और भ्रम से निवृत करना है, क्योकि इसके अधीन एक ही वर्ष मे किये गये एक ही किस्म के तीन अपराधो का आरोप एक सथ लगाया और विचारण किया जा सकता है, जब – (1) अपराध एक ही किस्म के हो, (2) वे संख्या मे तीन से अधिक न हो, और (3) उन्हें बारहमास के अन्दर ही किया गया हो|

कौन से अपराध एक ही किस्म के होते है?- ऐसे अपराध एक ही किस्म के होते है, जब वे भारतीय दंड संहिता की धारा 379 के अधीन दंडनीय अपराध उसी किस्म का अपराध मन गया है, जिस किस्म का उसी संहिता की धारा 380 के अधीन दंडनीय अपराध है| इसी प्रकार, भारतीय दंड संहिता या किसी विशेष या स्थानीय विधि का किसी धारा के अधीन दंडनीय अपराध उसी किस्म का अपराध होता है, जिस किस्म का ऐसे अपराध को करने का प्रयत्न है, यदि वह प्रयत्न अपराध हो |

Image 3

सामान्य सिद्धांत के अपवाद

  1. अभियुक्त व्यक्ति के लिखित आवेदन पर अगर वो संयुक्त विचारण चाहता है- परंतुक 218(1)
  2. एक वर्ष मे किये गये एक ही किस्म के तीन अपराधो का आरोप एक साथ- 219(1)(2)
  3. एक क्रम मे एक से अधिक अपराध एक ही व्यक्ति द्वारा किये गये है- 220(1)
  4. अपराधिक न्यास भंग या बेमानी से संपत्ति के दूर्विनियोग- लेखाओ के मिध्यकरण से सम्बंधित – 220(2)
  5. एक कार्य मे किये गये अलग अपराध-220(3)
  6. एक ही कार्य से मिलकर एक या अधिक अपराध-220(4)
  7. जब संदेहात्मक परिस्थिति है की कौनसा अपराध हुआ है धारा-221(1)+222(2)

आरोपों का संयोजन क्यों

  1. वादों की बहुलता को रोकने के लिए वाद- चंद्र्मल vs u.p राज्य- air-1971 s.c
  2. वादों को सुविधाजनक निपटारे के लिए|

धारा – 219

1 वर्ष – 1 किस्म – 3 अपराध

कब – 1 ही किस्म के 1 से अधिक अपराध हो

  • 12 मास के भीतर किये गये
  • अपराध चाहे एक ही व्यक्ति के विरुद्ध हो या/कई के (अन्य भी)

तब – अभियुक्त पर उनमे से अधिकतम 3 अपराधो के लिए 1 ही विचारण मे-

आरोप लगाया और विचारण किया जा सकता है

धारा – 221:- जब कार्य या कार्यो के कम मे संदेह हो की अभियुक्त ने कौन सा अपराध किया है तब उस पर

  • सभी अपराधो का
  • उनमे से किसी अपराध का दृष्टांत c
  • उनमे से किसी को करने का

 

अनुकपत: आरोप लगाया जा सकेगा

  1. जब व्यक्ति पर एक अपराध का आरोप हो और
  2. साक्ष्य से भिन्न अपराध हो

जिसका अपराध 221(1) मे लगा सकते थे- लगाया नही बिना आरोप लगाये भी साक्ष्यो मे साबित | दर्शित अपराध के लिए दोषसिद्धि की जा सकती है |

question: कब बिना आरोप लगाये , दोषसिद्धि की जा सकती है ?

answer:  221(2) + 222(1)(2)(3)

धारा-222 :

     Image 4

  1. किसी अपराध का आरोप- साबित तथ्यों के आधार पर छोटा बन जाता है | तब छोटे अपराध के लिए बिना आरोप लगाये दोषसिद्धि की जा सकती है- दृष्टांत B
  2. जब अपराध का आरोप हो तब उसके प्रयत्न के लिए बिना आरोप लगाये दोषसिद्धि की जा सकती है |

धारा– 224

Image 5

वापस लेने का प्रभाव :- वापिस लिए गये आरोपों के लिए दोषमुक्ति होगा |

जमानत और बंधपत्रो के बारे मे उपबंध

अध्याय-33 {ss 436-450}   

 

सामान्य :

  1. अध्याय 33 (ss 436-450) जमानत तथा बंधपत्रो के बारे मे है | यह अध्याय सम्पूर्ण नहीं है जमानत सम्बन्धी कुछ अन्य उपबंध निम्न है –
  2. धारा 81
  3. धारा 167(2)
  • धारा 167(2-a)
  1. धारा 389 (1),धारा 389(2)
  2. धारा 169
  3. धारा 170
  • धारा 187(1)
  • धारा 361 का परंतुक
  1. धारा 360
  2. अध्याय-33 निम्न के साथ पठनीय है-
  3. धारा 2 (a)
  4. प्रथम अनुसूची का 5 क स्तंभ
  • प्रारूप संख्या 45 को संशोधन अधि. 25, 2005 द्वारा संशोधित किया गया है| इससे पूर्व संशोधन अधि. 1978 द्वारा द्वितीय अनुसूची मे प्रारूप संख्या 45 से 56 अंतस्थापित किये गये है |
  1. अध्याय 33 की योजना :
  2. जमानत तथा अग्रिम जमानत——————————————————-ss.436-439
  3. उच्चतर न्यायालय के समक्ष उपसंजात होने हेतु बंधपत्र का निष्पादन———s.437-‘a’
  • बंधपत्र की राशि का घटाया जाना—————————————————s.440
  1. अभियुक्त द्वारा तथा प्रतिभूतियो द्वारा बंधपत्र———————————–s.441
  2. प्रतिभूतियो द्वारा घोषणा————————————————————-s.44-‘a’
  3. अभिरक्षा से मुक्ति———————————————————————s 442
  • पर्याप्त जमानत लेने की शक्ति——————————————————s.443
  • प्रतिभूतियो का उन्मोचन————————————————————–s.444
  1. बंधपत्र के स्थान पर निक्षेप———————————————————-s.445
  2. बंधपत्र के समपहरण पर प्रक्रिया————————————————-ss.446r/w449
  3. बंधपत्र का निरसन——————————————————————–s.446-‘a’
  • प्रतिभूति के दिवालिया हो जाने या उसकी मृत्यु पर प्रक्रिया———————s.447
  • अवयस्क से बंधपत्र का निष्पादन नहीं कराया जायेगा—————————-s.448
  • HC याc.o.s.की बंधपत्र के अधीन राशी की वसूली निर्देशित करने की शक्ति-s.450

जमानतीय तथा अजमानतीय अपराध : s.2(a) प्रथम अनुसूची का स्तम्भ 5

  1. जमानत के प्रयोजनों हेतु अपराधो को जमानतीय तथा अजमानतीय वर्गों मे विभाजित किया गया है
  2. धारा 2-A के अनुसार-

“जमानतीय अपराध” से ऐसा अपराध अभिप्रेत है जो

प्रथम अनुसूची मे जमानतीय के रूप मे दिखाया गया

है या तत्समय प्रवृत किसी अन्य विधि द्वारा जमान-

तीय बनाया गया है और “अजमानतीय अपराध” से कोई

अपराध अभिप्रेत है |

  1. प्रथम अनुसूची के 5 वे स्तम्भ में जमानतीय दर्शाए गये है अपराध जमानतीय अपराध कहलाते है किसी अन्य विधि के अंतर्गत जमानतीय बनाये गये अपराध भी जमानतीय अपराध है |

अन्य विधि में 3 वर्ष से कम के कारावास से दंडनीय अपराध जमानतीय अपराध है | दण्ड की मात्रा ही निर्णायक होगी

 

  1. ऐसे अपराध जो जमानतीय नही है वे अजमानतीय अपराध है | जमानतीय अपराध है सामान्यत हल्के अपराध है इसमें साधिकार जमानत दी जाती है | अजमानतीय अपराध साधिकार जमानत योग्य नहीं है “अजमानतीय अपराध” पद एक दोषपूर्ण पद है |

साधिकार जमानत: s 436 r/w 436-A

  1. सामान्य सिद्धांत :
  2. जमानत शब्द परिभाषित नही है सामान्य अर्थो में यह गिरफ्तार तथा निकट व्यक्ति की विधि के अनुसार इस शर्त की रिहाई है की रिहा किया गया व्यक्ति बंधपत्र की शर्तो के अनुसार नियत समय तथा स्थान पर उपसंजात होगा तथा विफलता की स्थिति में बंधपत्र में निद्रिष्ट राशि चुकाने हेतु आबद्ध होगा |
  3. उद्देश्य:
  4. व्यक्तिगत स्वतंत्रता की पुनर्स्थापना
  5. नियत समय तथा स्थान पर उपस्थिति सुनिश्चित करना
  6. अभियुक्त को विधिक प्रक्रिया के अधीन रखना
  7. अपराधो की पुनरावृत्ति टालना
  8. साक्ष्य के साथ छेड़-छाड़ की सम्भावना को टालना
  9. सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना
  • जमानत पर रिहाई सामान्य नियम है जमानत से इनकार मात्र एक अपवाद (मोतीराम प्रति स्टेट बैंक ऑफ़ मध्य प्रदेश 1974 SC ) सभ्य समाज में जमानत से इंकार नहीं किया जा सकता है असभ्य समाज में जमानत की मांग नही की जा सकती | जमानत दो, जेल नहीं यह आधारिक नियम है बालचंद्र प्रति स्टेट बैंक राजस्थान 1977 SC
  1. अजमानतीय अपराध के आरोपी अन्यथा, साधिकार जमानत ले सकता है| विचाराधीन कैदी धारा 436 ‘A’ के अंतर्गत जमानत का अधिकारी है |
  2. अजमानतीय अपराध का आरोपी व्यक्ति न्यायिक या पुलिस विवेक के अधीन जमानत पर रिहा किया जा सकता है |
  3. HC तथा C.O.S. किसी भी अपराध के आरोपी को जमानत पर रिहा कर सकते है
  • संज्ञेय अपराध हेतु गिरफ्तारी की युक्तियुक्त आशंका से ग्रस्त व्यक्ति धारा-438 के अंतर्गत अग्रीम जमानत पर रिहा किया जा सकता है |
  1. धारा-436 के अंतर्गत साधिकार जमानत :
  2. अजमानतीय अपराध के आरोपी से भिन्न व्यक्ति धारा 436 का आशयित लमार्थी है| यह पदावली निम्न व्यक्तियों को आच्छादित करती है |
  • जमानतीय अपराध का आरोपी व्यक्ति
  • ऐसा व्यक्ति जिसके विकट निवारक कार्यवाही संचालित है
  1. धारा 436 के अंतर्गत मजि. या बिना वारंट गिरफ्तारी करने वाला थाना-प्रभारी जमानत पर रिहा करने हेतु बाध्य है | उन्हें कोई विवैकीय शक्ति नहीं है अत: धारा 436 आज्ञापक है|
  • पुलिस अधिकारी या मजि. निजी बंधपत्र पर रिहा किये जाने का अधिकार है ऐसा व्यक्ति जो गिरफ्तारी की तिथि से 7 दिनों के भीतर प्रतिभू उपलब्ध नहीं करा पाता है उसे निर्धन प्रकाल्पित किया जायेगा |
  1. धारा 436(2) के अंतर्गत मजि. इस आधार पर जमानत पर रिहा करने से इन्कार कर सकता है की अभियुक्त बंधपत्र की शर्त के अनुसार उपस्थिति होने में विफल रहा है
  2. विचारधीन बंदी की जमानत पर रिहाई : 436 ‘A’
  3. धारा 436-‘a’ ACT OF 2000 द्वारा अन्त: स्थापित की गयी है | यह धारा वहां लागू नहीं होगी जहाँ अपराध के लिए मृत्युदंड भी दिया जा सकता है
  4. आरोपित अपराध हेतु देय अधिकतम कारावास की अवधि निकट रहने वाला विचारधीन कैदी निजी बंधपत्र पर रिहा किया जायेगा
  • लोक अभियोजक को सुनने के बाद कारण अभिलिखित करते हुए –
  • निरोध जारी रखा जा सकेगा या
  • निजी बंधपत्र के स्थान पर जमानत पर रिहा किया जा सकेगा |
  1. आरोपित अपराध हेतु देय अधिकतम कारावास का निरोध भुगतने वाला कैदी जमानत पर रिहा किया जायेगा |
  2. अभियुक्त द्वारा कारित- विलम्ब अवधि अप्वाजिनीय

अजमानतीय अपराध के आरोपी व्यक्ति को जमानत :s 437

  • धारा 437 के अंतर्गत अजमानतीय अपराध का आरोपी बिना वारंट गिरफ्तारी करने वाले थाना-प्रभारी या ऐसे मजिस्ट्रेट द्वारा जिसके समक्ष वह हाज़िर हुआ है या लाया गया है जमानत पर रिहा किया जा सकेगा
  • धारा 437 (1) के अंतर्गत निम्न व्यक्ति जमानत पर रिहा नही किये जायेंगे-
  • ऐसा व्यक्ति जो मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध का दोषी प्रतीत हो रहा है |
  • ऐसा व्यक्ति जो संज्ञेय अपराध का आरोपी है तथा पूर्व दोषसिद्ध रह चुका है |
  • उपरोक्त दोनों वर्गों के व्यक्ति निम्न आधार पर जमानत पर रिहा किये जा सकेंगे-
  1. सोलह वर्ष से कम आयु
  2. बीमार व्यक्ति
  3. क्षीण व्यक्ति
  4. महिला

धारा 437(1) की परिधि मे आने वाला व्यक्ति अन्य किसी विशेष कारण पर भी रिहा किया जा सकता है

 

 

  • धारा 437(1)(2)(6) तथा (7) के अंतर्गत भी जमानत पर रिहा किया जा सकता है आधार निम्न है-
  1. अन्वेषण जांच या विचारण से यह इंगित होना की अभियुक्त ने अजमानतीय अपराध कारित नहीं किया है (s.437(2)
  2. मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय मामले मे साक्ष्य को प्रथम तिथि से 60 दिनों के भीतर विचारण समापन
  3. निर्णय के ल्म्बन के दौरान जमानत यदि न्यायालय की राय से अभियुक्त अजमानतीय अपराध का दोषी नही है |
  • सशर्त जमानत :437
  • निम्न मामलो मे शर्तो के अधीन जमानत दी जायेगी-
  1. जबकि अभियुक्त 7 वर्ष या अधिक तक कारावास से दंडनीय अपराध का आरोपी है
  2. जबकि अभियुक्त i.p.c. के 16 या 17 अध्याय के अंतर्गत अपराध का आरोपी है|
  3. जबकि अभियुक्त उपरोक्त के दुष्प्रेरण,प्रयत्न या आपराधिक षडयंत्र का आरोपी है |
  • आरोपण योग्य शर्ते-
  1. बंधपत्र की शर्तो के अनुसार उपस्थिति
  2. समान अपराध दोहराये नहीं जायेंगे |
  3. ऐसे व्यक्ति के विकट उत्प्रेरणा, धमकी या बचन का प्रयोग नहीं किया जायेगा जो मामले के तथ्यों से परिचित है तथा ऐसे तथ्यों को न्यायालय के समक्ष प्रकट करना चाहता है|
  4. अन्य कोई शर्त { न्याय हित मे आवश्यक }
  • कारणों का अभिलेखन : s. 437 (4)

धारा 437 (1) या (2) के अंतर्गत जमानत पर रिहा करते समय कारण अभिलिखित किये जायेंगे

  • पुन: अभिरक्षा : 437 (5)

जमानत पर रिहा किये गये व्यक्ति को

पुन: अभिरक्षा का आदेश केवल न्यायालय दे सकता है |

  • जमानत के निरसन के आधार
  1. बंधपत्रो की शर्तो के अनुसार उपसंजात होने की विफलता
  2. जमानत पर रिहा करते समय आरोपित की गयी शर्तो का निलंबन
  3. अपराध का दोहराया जाना
  4. साक्ष्य के सथ छेड़-छाड़
  5. पुलिस द्वारा पुछताछ मे असहयोग
  6. अभियुक्त का किसी अन्य अपराध मे वंचित होना
  7. अभियुक्त की जान संकट मे होना
  8. अन्य कोई न्यायोचित कारण
  • उच्च न्यायालय तथा सत्र न्यायालय की जमानत पर रिहा करने की विशेष शक्ति :s 439
  • धारा- 439 hc तथा c.o.s. की विशेष शक्ति प्रावधानित करती है इस धारा के प्रयोजनो हेतु अपराधो का जमानतीय तथा अजमानतीय अपराधो मे वर्गीकरण अर्थहीन हो जाता है| अग्रेतर इस धारा के अंतर्गत किसी भी न्यायालय द्वारा दी गयी जमानत निरस्त की जा सकती है मजि. द्वारा आरोपित शर्तो को भी अपास्त या ***** परिवर्तित किया जा सकता है |
  • hc या c.o.s. किसी भी अपराध के अभिराक्षधीन आरोपी को जमानत पर रिहाई निर्देशित कर सकेंगे |
  • जमानत पर रिहाई निर्देशित करते समय न्यायालय धारा 437 (3) के अनुसार शर्तो का आरोपण भी कर सकेगा
  • जमानत पर रिहाई निर्देशित करने से पूर्व जमानत प्रार्थना-पत्र की सुचना लोक अभियोजक को दी जायेगी | निम्न मामलो मे नोटिस अपेक्षित होगा-
  1. जबकि अपराध c.o.s. द्वारा अनन्यत: विचारणीय हो
  2. जबकि अपराध आजीवन कारावास से दंडनीय हो

विशेष कारण दर्ज करते हुए नोटिस का परित्याग किया जा सकता है

  • न्यायालय जमानत पर रिहा किये गये व्यक्ति को पुन: अभिरक्षा मे लेने का निर्देश दे सकता है |
  • धारा 439 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपित शर्ते अपास्त या रूप परिवर्तित कर सकता है |
  • न्यायालय मजिस्ट्रेट या पुलिस द्वारा निर्धारित बंधपत्र की राशि का घटाया जाना भी निर्देशित कर सकता है
  • अग्रिम जमानत : s 438
  1. धारा 438 cr.pc अग्रिम जमानत प्रावधानित करती है | यह धारा उत्तरप्रदेश राज्य मे विलुप्त है धारा 438 मे संशोधन अधिनियम 25,2005 द्वारा व्यापक संशोधन किये गये है संशोधन का मुख्य उदेश्य न्यायालय को कुछ कारको पर विचार करना है अंतरिम जमानत की नई व्यवस्था शामिल की गयी है |
  2. धारा 438 का उदेश्य:
  3. किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कराकर उसे अवांछित क्षतियो से बचाना
  4. दंड विधि के दुप्र्योग का निवारण
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा समाज के मध्य संतुलन की स्थापना
  1. आवेदन का आधार :
  2. अजमानतीय अपराध हेतु गिरफ्तारी का युक्तियुक्त विश्वाश करने का कारण |
  3. संभावित गिरफ्तारी विधि के दुप्र्योग द्वारा सम्भाव्य है
  4. सक्षम न्यायालय :
  5. h.c
  6. c.o.s.

उपरोक्त मे से किसी एक न्यायालय मे आवेदन किया जा सकेगा

  • विचारणीय करक :
  1. दोषारोपण की प्रकृति तथा गंभीरता
  2. आवेदक का ***** यह तथ्य सहित की क्या किसी संज्ञेय अपराध हेतु दोषसिद्धि के उपरांत करावासित रहा है |
  • न्याय से पलायन करने की सम्भावना
  1. क्या दोषारोपण का उद्देश्य आवेदक को गिरफ्तार कराकर उसे क्षति पहुँचाना या अपमानित करना है |

उपरोक्त कारको पर विचारोपरांत अग्रिम जमानत हेतु अन्तिरिम आदेश दे सकेगा |

  • न्यूनतम 7 दिनों का नोटिस :
  1. अंतरिम आदेश पारित करने पर, न्यूनतम सात-दिनों को नोटिस तत्काल भेजा जायेगा
  2. नोटिस निम्न को भेजा जायेगा
  3. लोक अभियोजक
  4. p
  • अंतिम सुनवाई के समय आवेदक की उपस्थिति : s 438(1-b)
  1. अंतिम सुनवाई के समय आवेदक की उपस्थिति आवश्यक होगी |
  2. अंतिम आदेश से पूर्व लोक अभियोजक आवेदक की उपस्थिति निर्देशित करने हेतु प्रार्थना-पत्र दे सकता है |
  • शर्तो का आरोपण : s. 438(2)
  • न्यायालय स्वविवेक से उचित शर्ते आरोपित कर सकेगा | शर्तो मे निम्न शर्ते शामिल है-
  1. पुछताछ हेतु पुलिस के समक्ष उपलब्धता
  2. प्रकटीकरण के इच्छुक व्यक्ति को विरत रखने के लिए उत्प्रेरणा, धमकी या वचन का प्रयोग न करना |
  3. न्यायालय की अनुमति के बिना भारत से बहार नही जाया जा सकेगा
  4. धारा 437 (3) के अंतर्गत आरोपण योग्य अन्य कोई शर्त

 

  • उत्तर गिरफ्तारी प्रक्रिया
  1. अग्रिम जमानत इस आशय का निर्देश है की-

“गिरफ्तारी की स्थिति मे अग्रिम जमानत धारक को

जमानत पर रिहा कर दिया जायेगा”

  1. गिरफ्तारी होने पर अभियुक्त को जमानत पर छोड़ दिया जायेगा / बंधपत्र न्यायालय मे जमा किया जायेगा |
  • अन्य उपबंध
  1. अभियुक्त तथा प्रतिभूतियो से बंधपत्र—————————–s.441
  2. प्रतिभूतियो की घोषणा —————————————————S.441-A
  3. प्रतिभूतियो का उन्मोचन————————————————-S.444
  4. बंधपत्र के समपहरण पर प्रक्रिया—————————————S.446
  5. बंधपत्र तथा प्रतिभूतियो के बंधपत्र का निरसन——————–S.446-A
  6. अवयस्क से बंधपत्र निष्पादित नहीं कराया जायेगा—————S.448
  7. धारा-446 के अंतर्गत पारित आदेश से अपील———————S.449

निर्देश और पुनरीक्षण

अध्याय-30 [ss.395-405]

सामान्य :

  1. अध्याय 30 [ss 395-405] सन्दर्भ तथा पुनरीक्षण के बारे मे है |
  2. सन्दर्भ—————————————————————–ss. 394.396
  3. पुनरीक्षण————————————————————–ss. 397.405
  4. सन्दर्भ केवल विधि के प्रशन पर किया जा सकता है तथ्य के प्रश्न पर कोई सन्दर्भ नहीं होगा सन्दर्भ के प्रयोजनो हेतु विधि के प्रश्नों को दो वर्ग मे विभाजित किया जा सक्कता है |
  5. विधि का कोई प्रश्न
  6. विधिमान्यता अंतर्विष्ट करने वाला विधि का कोई प्रश्न

वैधानिकता के प्रश्न पर सन्दर्भ अनिवार्य है| विधि के अन्य किसी प्रश्न पर सन्दर्भ वैवैकीय है | वैकल्पिक सन्दर्भ केवल सत्र न्याया. या महानगर मजि. कर सकते है |

  1. सन्दर्भ सुनने का अनन्य क्षेत्र hc को प्राप्त है यह दांडिक तथा सिविल दोनों पुनरीक्षण मे सत्य है|
  2. सन्दर्भ दो न्याया. के मध्य का विषय है पक्षकारो को सन्दर्भ करने का अधिकार नहीं होता है सन्दर्भ केवल लंबित मामलो मे ही किया जा सकता है

सन्दर्भ का अर्थ :

  1. सन्दर्भ शब्द की वैधानिक परिभाषा उपलब्ध नहीं है | अत: सन्दर्भ शब्द को उसके सामान्य अर्थो मे लिया जाना चाहिए |
  2. सन्दर्भ अपर न्याया. को लंबित प्रकरण मे, विधि के पशन पर संभावित त्रुटी करने से बचाने की एक विधिक युक्ति है| यह दो न्याया. के मध्य का विषय है सन्दर्भ का अधिकार न्याय. मे निहित होता है पक्षकारो ने नहीं |

अनिवार्य सन्दर्भ :

  1. जहाँ न्यायालय का यह समाधान हो गया हो की उसके समक्ष लंबित प्रकरण मे किसी अधि. अध्यादेश या विनिमय या ऐसे अधि. अध्यादेश या विनिमय के किसी उपबंध की वैधानिकता का प्रश्न अंतर्विष्ट है तथा ऐसे प्रश्न का अवधारण लंबित प्रकरण के निस्तारण हेतु आवश्यक है, वहां वह hc के समक्ष सन्दर्भ कर सकेगा |
  2. सन्दर्भ तभी किया जाना चाहिये जबकि न्यायालय की यह राय हो की प्रश्नगत अधि. अध्यादेश या विनिमय या उसका कोई उपबंध अविधिमान्य या अपरिवर्तनीय है किन्तु hc या sc द्वारा तद्विषयक कोई घोषणा नहीं की गयी है |
  3. सन्दर्भ करने वाला न्याया. प्रकरण का अभिकथन करेगा, अपनी राय अंकित करेगा तथा उसे निर्णय हेतु hc को संदर्भित कर देगा |
  4. धारा 395 (1) के प्रयोजनों हेतु विनिमय शब्द का वहीं अर्थ होगा जो साधारण उपखंड अधि. 1897 या किसी राज्य के साधारण उपखंड अधि. मे दिया गया है|

वैकल्पिक सन्दर्भ : s. 397 (2)

  1. सब न्याया. तथा महानगर मजिस्ट्रेट वैकल्पिक सन्दर्भ कर सकेंगे अन्य कोई न्याया. यह सन्दर्भ नहीं कर सकेंगे |
  2. वैकल्पिक सन्दर्भ उन मामलो मे किया जा सकेगा जो वो धारा 395 (1) की परिधि मे न हो
  3. o.s. या m.m. अपने समक्ष लंबित मामले की सुनवाई मे अदभुत विधि के किसी प्रश्न पर सन्दर्भ कर सकेंगे|

सन्दर्भ के लम्बन के दौरान प्रक्रिया : s. 395 (3)

सन्दर्भ के लम्बन के दौरान, सन्दर्भ करने वाला न्याया. अभियुक्त को या तो जेल भेज देगा या उसे जमानत पर रिहा कर देगा |

उच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार लंबित मामले का निपटारा :s.396(1)

  1. HC सन्दर्भ पर उचित आदेश पारित करेगा |
  2. HC के निर्णय की एक प्रति सन्दर्भ करने वाले न्याय. को भेजी जायेगी सन्दर्भ करने वाला न्याया. तदरूप प्रकरण का निस्तारण करेगा

सन्दर्भ का व्यय :s.396 (2)

सन्दर्भ का व्यय HC के निर्देशानुसार चुकाया जायेगा| सामान्यता सन्दर्भ का व्यय पक्षकारो पर आरोपित किया जाता है कुछ मामलो मे इसे सरकार से भी वसूला जाता है |

पुनरीक्षण (REVISION)

S-397-405

सामान्य

  1. अध्याय-30 (s 395-405) सन्दर्भ तथा पुनरीक्षण के बारे मे है
  2. सन्दर्भ————————————————————ss.395.396
  3. पुनरीक्षण———————————————————ss.397-405
  4. पुनरीक्षण पद संहिता मे परिभाषित नहीं है अत:इसके सामान्य अर्थो मे किया जायेगा | सामान्य अर्थो मे पुनरीक्षण, अपुर्न्याचना योग्य मामलो मे वैवैकीय संशोधन व्यवस्था है
  5. अपर दांडिक न्यायालय के समक्ष संचालित कार्यवाही के अभिलेख आहूत करना तथा उनकी परीक्षा करना पुनरीक्षण का आधार है |
  6. संहिता के अंतर्गत hc तथा c.o.s. को पुनरीक्षण का समवर्ती क्षेत्र प्राप्त है आवेदक, स्वेच्छा से दोनों मे से किसी एक न्याया. मे पुनरीक्षण प्रार्थना पत्र दायर कर सकता है महत्वपूर्ण बात यह है की केवल एक ही पुनरीक्षण- प्रार्थना पत्र विचारणीय होगा
  7. मध्यवर्ती आदेश पुनरीक्षण योग्य नहीं है | 1898 की संहिता की संहिता मे अन्तवर्ती आदेश पुनरीक्षण योग्य थे |
  8. धारा 397 तथा 398 के उदेश्य हेतु मजिस्ट्रेट शब्द व्यापक अर्थ रखता है |मजिस्ट्रेट मे शामिल है न्यायिक तथा कार्यपालक मजिस्ट्रेट चाहे वे मूल तथा अपीलीय क्षेत्र का प्रयोग कर रहे हो (s.397)
  9. पुनरीक्षण क्षेत्र अपीलीय क्षेत्र का अभिन्न भाग है अत: पुनरीक्षण न्याया. को भी सारत: वे शक्तियां प्राप्त है जो अपीलीय न्याया. को प्रदत्त है|
  10. पुनरीक्षण क्षेत्र मे दोषमुक्ति के आदेश को दोषसिद्धि मे परिवर्तित नहीं किया जा सकता है
  11. जहाँ सशक्त न होते हुए भी धारा 397 के अंतर्गत अभिलेख आहूत किया जाता है वहां कार्यवाही शून्य होगी

पुनरीक्षण का क्षेत्र : s.397r/w ss.399,401,402

  1. उच्च न्याया. या सत्र न्यायधीश अपनी स्थानीय क्षेत्रधिकारिता मे स्थित किसी अपर दंड न्यायालय के समक्ष संचालित कार्यवाही के अभिलेख आहूत कर सकता है तथा उसकी परीक्षा कर सकता है |
  2. अभिलेख के आहूत करने तथा उसकी परीक्षा करने का उदेश्य :
  3. अपर दांडिक न्यायालय द्वारा अभिलेखित निष्कर्ष या उसके द्वारा पारित आदेश या दंडादेश की सत्यता, औचित्य तथा वैधानिकता के प्रति समाधान करना |
  4. अपर दांडिक न्याया. के समक्ष संचालित कार्यवाही के प्रति नियमितता के प्रति समाधान करना
  5. अभिलेख आहूत करते समय दिए जाने योग्य निदेश-
  6. दंडादेश या आदेश का निष्पादन स्थगित रहेगा तथा
  7. अभियुक्त को जमानत या निजी बंधपत्र पर रिहा कर दिया जाये, { अभिलेख की परीक्षा के लम्बन के दौरान }
  8. पुनरीक्षण (s.397) तथा आगे जांच का आदेश (s.398) के प्रयोजनों हेतु मजिस्ट्रेट मे न्यायिक तथा कार्यपालक दोनों मजिस्ट्रेट शामिल है ( चाहे वह मूल क्षेत्र का प्रयोग कर रहा हो या अपीलीय क्षेत्र का प्रयोग का रहा हो )
  9. मध्यवर्ती आदेश पुनरीक्षण योग्य नहीं है (s. 397 (2)) केवल एक पुनरीक्षण प्रार्थना पत्र ही किया जा सकता है ( s. 397 (3) r/w 399 (3))
  10. HC की पुनरीक्षण की शक्तियां s. 401 :
  11. पुनरीक्षण न्याया. के रूप मे HC को वे समस्त शक्तियां प्राप्त है जो अपीलीय न्याया. को धारा – 386,389 तथा 390 मे प्राप्त है उसे धारा 307 cr.pc के अंतर्गत c.o.s. की शक्तियां भी प्राप्त होगी
  12. पुनरीक्षण मे, सुनवाई का अवसर दिए बिना अभियुक्त या किसी अन्य व्यक्ति के विकत कोई आदेश पारित नहीं किया जायेगा (s.401(2))
  • पुनरीक्षण मे दोषमुक्ति को दोषसिद्धि मे परिवर्तन नही किया जायेगा
  1. जहाँ अपील हो सकती हो वहां पुनरीक्षण नहीं किया जायेगा (s. 401(4))

जहाँ अपील उपलब्ध न होने के त्रुटिपूर्ण विश्वास के अधीन पुनरीक्षण के स्थान पर अपील प्रस्तुत कर दी गई हो वहां न्यायहित मे आवश्यक होने पर अपील याचिका को पुनरीक्षण पद मानते हुए निस्तारित किया जा सकेगा (s.401(5))

  1. सत्र न्यायधीश का पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार :s.399
  2. पुनरीक्षण न्याया. के रूप मे सत्र न्यायधीश को वे समस्त शक्तियां प्राप्त होगी जो HC को s. 401(1) के अंतर्गत प्राप्त है अत: c.o.s. उन समस्त शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जो अपीलीय न्याया. को धारा 386.389.390.391 मे प्राप्त है
  3. पुनरीक्षण क्षेत्रधिकार मे c.o.s. को ss 401 (2)(3)(4)(5) नही लागू
  • धारा 399(3) निषेधात्मक है यह धारा 397(3) का पुनर्कथन है यह दोनों धाराएँ केवल एक पुनरीक्षण प्रार्थना पत्र की अनुमति देती है
  1. पुनरीक्षण के प्रत्याहरण या अंतरण की HC की शक्ति :s 404
  2. धारा 402 का उदेश्य परस्पर विरोधी निर्णयों की सम्भावना को टालना है |
  3. धारा 402 के अंतर्गत HC की शक्तियां अनन्य है इस धारा मे c.o.s. को शक्ति प्राप्त नहीं है | यह न्यायिक औचित्य पर आधारित है|
  • धारा 402 के अंतर्गत HC-
  • o.s. के समक्ष लंबित पुनरीक्षण प्रार्थना पत्र प्रत्याहरित कर सकता है |

HC अपने समक्ष प्रस्तुत किये गये पुनरीक्षण प्रार्थना पत्र को c.o.s. को अंतरित कर सकता है |

अन्य नियम :

  1. सामान्यत: पुनरीक्षण के पक्षकारो को व्यक्तिगत रूप से या प्लीडर के माध्यम से सुनवाई का अधिकार नही होता है| उचित समझने पर पुनरीक्षण न्यायालय पक्षकारो को सुन सकता है (s.403)
  2. महानगर मजिस्ट्रेट द्वारा किये गये विचारण के अभिलेख आहूत किये जाने पर ऐसा मजिस्ट्रेट अभिलेख के साथ निम्न प्रस्तुत कर सकता है-
  3. अपने निर्णय या आदेश के आधारों का कथन
  4. विषय से सम्बंधित साखान तथ्यों का कथन

निर्णय या आदेश को अमान्य या अपास्त करने से पूर्व उपरोक्त से सम्बंधित कथन पर विचार किया जायेगा (s.404)

  1. पुनरीक्षण न्यायालय के निर्णय या आदेश की प्रति धारा 388 के अनुसार अपर न्यायालय को अभिप्रमाणित की जायेगी अपर न्यायालय तदनुसार मामले का निर्णय करेगा (s.405)
  2. अतिरिक्त सत्र न्यायलय अंतरित किये गये पुनरीक्षण के सम्बन्ध मे उन्ही शक्तियों का प्रयोग करेगा जो c.o.s. को प्राप्त है (s.400)

आगे जांच का आदेश :s.398

  1. निम्न मामलो मे पुनरीक्षण न्यायालय आगे जांच आदेशित कर सकेगा-
  2. अभियुक्त का उन्मोचन
  3. परिवाद का निरसन

उन्मोचन आदेश के विकट आगे जांच निर्देशित करने से पूर्व अभियुक्त को सुना जायेगा |

  1. आगे जांच c.j.m. या उसके द्वारा निर्देशित मजिस्ट्रेट द्वारा की जायेगी |

पूर्व-दोषसिद्धि अथवा पूर्व-दोषमुक्ति का सिद्धांत-न्याय प्रशासन का यह एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है की किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार दण्डित न किया जाय | इंग्लिश विशी के एक सूत्र के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को न्यायालय से पूर्व दोषसिद्धि अथवा पूर्व दोषमुक्ति मिल चुकि है, तो न्यायालय मे उसी अपराध केर निमित्त उसका पुन: विचारण नही होगा | यह सिद्धांत इंग्लिश कामन विधि के इस सूत्र पर आधारित है की किसी व्यक्ति को उसी अपराध के लिए दुहरे जोखिम मे न डाला जाय | हाकिन्स नामक एक अंग्रेज़ विधिशास्त्री इस सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कहता है की किसी व्यक्ति को एक ही और उसी अपराध के लिए एक बार से अधिक खतरे मे न डाला जाये | आर. बनाम माइल्स नामक इंग्लिश वाद से इसी सिद्धांत की परिपुष्टि की गई है| संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान का पंद्रहवा संशोधन भी यह उपबंधित करता है “किसी व्यक्ति के प्राण अथवा अंग को एक ही अपराध के लिये दोबारा खतरे मे नही डाला जायेगा |”

भारत मे साधारण खंड अधिनियम, 1897 की धारा 27 के उपबंधो के अनुसार यदि दो या दो से अधिक अधिनियमों के अंतर्गत कोई कार्य अथवा लोप अपराध माना गया है तो अपराधी को किसी एक ही अधिनियम के अंतर्गत अभियोजित और दण्डित किया जायेगा, किसी भी स्थिति मे उसे एक ही अपराध के लिए दो बार दण्डित नही किया जायेगा, अमेरिकी संविधान की भांति भारतीय संविधान मे भी “दुहरी जोखिम” का सिद्धांत स्वीकार किया गया है | संविधान के अनुछेद 20 (2) के अनुसार “किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दण्डित नहीं किया जायेगा |” कुलवंत बनाम मध्य प्रदेश राज्य के मामले मे उच्चतम न्यायालय ने यह अभिमत व्यक्त किया था की “ यदि प्रथम अभियोजन मे किसी व्यक्ति को दण्डित नही किया जा गया है, तो अनुछेद 20 (2) का उपबंध अभियुक्त को अभिरक्षा प्रदान नहीं कर सकता | इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि “दुहरे जोखिम” का सिद्धांत जिस सीमा तक इंग्लिश और अमेरिकी विधि के अंतर्गत स्वीकृत किया गया है, उस सीमा तक यह भारतीय संविधान मे स्वीकार नही किया है| परन्तु यह कहना अक्षरश सही नही है, दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 300 इस विषय पर मील के पत्थर की तरह खड़ी है, क्योकि इसके अंतर्गत एक बार दोषसिद्ध या दोषमुक्ति किये गये व्यक्ति का उसी अपराध के लिए विचारण न किया जाना उपबंधित किया गया है | इस उपबंध के लागू होने की शर्त यह है की प्रथम विचारण किसी न्यायालय द्वारा संपन्न किया गया हो, क्योकि यदि विचारण किसी न्यायालय द्वारा संपन्न किया गया हो, क्योकि यदि विचारण किसी ऐसे न्यायालय द्वारा किया गया है, जो सक्षम न्यायालय नही है, तो इस धारा का लागू होना संभव नही है | इस धारा के उपबंध संविधान के अनुछेद 20(2) द्वारा प्रदत्त अधिकारों के अनुरूप हैं और उसे भी आगे बढ़कर विस्तार-क्षेत्र को व्यापक और समृद्ध बनाते है |

उक्त धारा 300 के अधीन, चूँकि, इंग्लिश कॉमन लॉ का यह सुविख्यात सूत्र समाविष्ट किया गया है की किसी भी व्यक्ति को एक ही बात के लिए एक बार से अधिक नही सताया जाना चाहिये, अत: यदि किसी व्यक्ति का केवल इस आधार पर दूसरी बार के लिए विचारण किया जाता है की पहले वाले विचारण मे कतिपय अभिकथन नहीं किये गये थे , तो इस आधार को मान्यता नहीं दी जा सकती और दुसरे विचारण की अनुमति नहीं दी जा सकती

धारा 300 का विश्लेषण –धारा 300 में निहित मूल सिद्धांत यह है की यदि किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा एक बार विचारित किया जा चुका है और उसे ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्धि या दोषमुक्त किया जा चुका है, तो जब ऐसी दोषसिद्धि या दोषमुक्ति प्रवृत रहती है, उस व्यक्ति को उसी अपराध के लिए पुन: विचारित नहीं किया जायेगा |

उपरोक्त मूल सिद्धांत के प्रयोजनों के लिए धारा 300 के अन्य खंडो के प्रयोजनों के लिए “दोषमुक्ति” पद को धारा 300 के स्पष्टीकरण द्वारा नकरात्मक अर्थो मे स्पष्ट किया गया है की परिवाद का खारिज किया जाना या अभियुक्त का उन्मोचन इस धारा के प्रयोजनों के लिए दोषमुक्ति नही है इस स्पष्टीकरण का हेतु यह है कि परिवाद का खारिज किया जाना या अभियुक्त का उन्मोचन अभियुक्त व्यक्ति की निर्दोषिता के प्रश्न पर अंतिम विनिश्चय नही है |

धारा 300 (1) मे प्रयुक्त “विचारण” शब्द का तात्पर्य आवश्यक रूप से गुण दोष के आधार पर किया गया विचारण नही है | धारा 320 के अधीन किसी अपराध का प्रशमन अथवा धारा 321 के अधीन लोक अभियोजक द्वारा किसी मामले का प्रत्याहरण अभियुक्त की दोषमुक्ति का निर्माण कर सकता है, चाहे भले ही उसका विचारण गुणदोष के आधार पर न किया गया हो | ऐसी दोषमुक्ति उन्ही तथ्यों पर किये गये पश्चातवर्ती परिवाद पर विचारण की रोक लगाती है |

धारा 300 (1) मे समाविष्ट मूल नियम का लाभ प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है की अभियुक्त व्यक्ति यह प्रस्थापित करे की उसका विचारण “सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय” द्वारा  एक अपराध के लिए किया जा चुका है | की सीमा शुल्क कलेक्टर द्वारा किया गया अभिनिर्णय “अभियोजन” नही है और सीमा शुल्क कलेक्टर न्यायालय भी नही है | तथापि सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय पदावली का एक ऐसा संकीर्ण निर्वाचन नहीं किया जाना चाहिये की उससे न्यायालय की प्रतिष्ठा अथवा उसके लक्षण की मान्यता मात्र ही अन्तर्वलित हो, बल्कि उसकी सक्षमता का निर्णय करते समय यह भी विचार किया जाना चाहिये की क्या न्यायालय अन्यथा मामले का विचारण करने के लिए अह्र होते हुए भी विचारण नही कर सकता था, क्यूंकि अधिकारिता के प्रयोग की कुछ पुर्नपल्य शर्तो को पूरा नहीं किया गया | पूर्व दोषमुक्ति के सिद्धांत को लागू करने के लिए यह पर्याप्त नही है की न्यायालय, जिसने अभियुक्त को प्रथम विचारण मे दोषमुक्त कर दिया था, वास्तव मे अधिकारिता से सम्पन्न था और मामले के विचारण के लिए सक्षम था यह भी आवश्यक है की न्यायालय को यह विश्वास था की उसे अधिकारिता प्राप्त थी और वह सक्षम था| उस न्यायालय द्वारा पारित किया गया दोषमुक्त का आदेश, जिसको यह विश्वास है की उसे अपराध का संज्ञान करने के लिए और मामले का विचारण करने के लिए अधिकारिता नही प्राप्त है एक शून्य आदेश है और उसी अपराध का पश्चातवर्ती विचारण दोषमुक्ति के सिद्धांत द्वारा बाधित नहीं है |

रोक अथवा बाधा बन्ने के लिए यह आवश्यक है की द्वितीय अभियोजन और तत्परिनामी दंड एक हो और उसी अपराध के लिए हो, जिस पर एक बार अभियोजन किया गया और दंड दिया जा चुका है | अत: यह आवश्यक है की न केवल दोनों परिवादों के अभिकथनो का विश्लेषण और उनकी तुलना की जाये, बल्कि दोनों संघटको का भी विश्लेषण और उनकी तुलना की जाय और यह देखा जाय की क्या दोनों की पहचान एक जैसी ही है | धारा 300 एक ही अपराध के लिए विचारण को बाधित करता है, विभिन्न अपराधो के विचारनो को नही , जो की एक ही कार्यो के कुलक मे कार्य अथवा लोप से उत्त्पन्न हुए है जहाँ विधायिका ने यह उपबंधित किया हो की एक ही तथ्यों पर दो विभिन्न धाराओं के अधीन कार्यवाहियां की जा सकती है और जहाँ उन धाराओ मे उपबंधित दंड भी एक दुसरे से भिन्न है, वहां यह प्रकट है की उनका आशय दोनों धाराओ को एक दुसरे से भिन्न मानना है| इस तरह के मामले मे धारा 300 नहीं लागू होगी |

धारा 300 पश्चातवर्ती विचारण के वर्जन के रूप मे परिवर्तित होती है| अन्य शब्दों मे धारा 300 मे पूर्व दोषमुक्ति का सिद्धांत समाविष्ट है| यदि एक बार एक व्यक्ति का विचारण अपराध के लिए सक्षम न्यायालय द्वारा किया जा है और ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्धि या दोषमुक्त प्रवर्तन मे बनी रहती है, पूर्व दोषमुक्ति के सिद्धांत को लागू करने के लिए मामले को धारा 300 के क्षेत्र अंतर्गत लाया जाना चहिये | धारा 300 के प्रावधानों को आकर्षित करने के लिए व्यक्ति की या तो दोषमुक्ति या दोषसिद्धि प्रवर्तन मे होनी चहिये , जब उसे उसी अपराध के लिए या तथ्यों के उसी सम्बन्ध पर आधारित भिन्न अपराध के लिए विचारण किये जाने के लिए अनुरोध किया जाता है | यदि धारा 300 की अपेक्षाओ को पूरा किया जाता है , तो पश्चातवर्ती कार्यवाही को स्थगित किया जाना चाहिये |

हरजिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले मे दो मामलो का संयोजन और समेकन, जिसमे एक पुलिस रिपोर्ट पर आधारित था और दूसरा परिवाद पर, अनुज्ञेय नही माना गया, यदि दोनों मामलो मे अभियोजन पक्ष का अभिकथन तात्विक एक दुसरे से भिन्न, परस्पर विरोधी और परस्पर अपवर्जन करने वाला है | ऐसे मामलो का विचारण एक साथ किया जा सकता है, परन्तु उनका समेकन नही हो सकता, अर्थात दोनों ही मामलो मे साक्ष्य पृथकत: अभिलिखित होगा और निस्तारण एक साथ किया जायेगा | यदि ऐसा किया जाता है, तो इससे न तो संविधान के अनुछेद 20(2) का अतिलंघन होता है और न ही इस संहिता की धारा 300 का |

पूर्व-दोषसिद्धि या पूर्व-दोषमुक्ति सिद्धांत का अपवाद-धारा 300 की उपधारा (1) मे पूर्व दोषसिद्धि और पूर्व दोषमुक्ति का जो सिद्धांत समाविष्ट किया गया है, उसके निम्र अपवाद धारा 300 की उपधारा (2) से (6) तक प्रस्तुत किये गये है –

  1. किसी अपराध के लिए दोषमुक्त या दोषसिद्ध किये गये व्यक्ति का विचारण बाद मे राज्य सरकार की सम्मति से किसी ऐसे भिन्न अपराध के लिए किया जा सकता है, जिसके लिए पूर्वगामी विचारण मे उसके विरुद्ध धारा 220 (1) के अधीन पृथक आरोप लगाया जा सकता था | इस प्रकार , यदि धारा 300(1) और (2) को एक साथ मिलकर पढ़ा जाये,तो यह निष्कर्ष निकलता है की यदि किसी व्यक्ति को एक बार दोषसिद्धि या दोषमुक्त कर दिया गया है तो उन्ही तथो के आधार पर उसी अपराध के लिए 300(1) के अनुसार उसका पुन: विचारण या अभियोजन नहीं किया जा सकता | ऐसा उक्त धारा 300 (2) के अधीन राज्य सरकार की संपत्ति से केवल तय किया जा सकता है, जबकि उस व्यक्ति के विरुद्ध कोई ऐसा सुभिन्न अपराध साबित किया जाये, जिसका लिए धारा 220(1) के अधीन औपचारिक विचारण मे पृथक आरोप लगाया जा सके |

इस अपवाद के पीछे एक औचित्य भी है | कल्पना कीजिये किसी व्यक्ति किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध या दोषमुक्त कर दिया गया है | उसके विरुद्ध पूर्वगामी विचारण में से एक पृथक आरोप लगाया जा सकता था, परन्तु वह आरोप नही लगाया गया |

  1. यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसे कार्य से बनने वाले किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गयाहै, जो ऐसे परिणाम पैदा करता है, जो उस कार्य से मिलकर उस अपराध से, जिसके लिए वह सिद्धदोष हुआ, भिन्न कोई अपराध बनाते है , तो उसका ऐसे अंतिम वर्णित अपराध के लिएतत्पश्चात विचारण किया जा सकता है, यदि उस समय, जब वह दोषसिद्ध किया गया था , वे परिणाम हुए नही थे, या उसका होना न्यायालय को ज्ञात नहीं था | यह अपवाद धारा 300 की उपधारा (3) में निविष्ट है| इस निमित्त धारा300 का दृष्टांत (ख) और(घ) सुसंगतउदहारण प्रस्तुत करते है | यदि पूर्वगामी निर्णय दोषमुक्ति का है, तोधारा 300(3) प्रवर्तनीय नहीं है |
  2. यदि कोई व्यक्ति किन्ही कार्यो से बनने वाले किसी अपराध के लिए दोषमुक्त या दोषसिद्ध के न होने पर उन्ही कार्यो से बनने वाले और उसके द्वारा किये गये किसी अन्य अपराध के लिए तत्पश्चात आरोप लगाया और उसका विचारण किया जा सकता है, यदिवह न्यायालय, जिसके द्वारा पहले उसका विचारण किया गया था, उस अपराध के विचारण के लिए सक्षम नही था, जिसके लिए वाद में उस पर आरोप लगाया जाता है | इस अपवाद के स्पष्टीकरण हेतु धारा 300 का दृष्टांत (ड.) और(च) देखनाचाहिए| इन दृष्टान्तो से यह इंगित होता है की इनमे पूर्ववर्ती न्यायालय, चूँकिसक्षमअधिकारिता वाले न्यायालय नहीं थे, अत: उन्ही तथ्यों पर पश्चातवर्ती विचारण धारा 300(4) द्वारा बाधित नहीं है |
  3. यदि किसी व्यक्ति को धरा 258 के अधीन उन्मोचन किया गया है, तो ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध उसी अपराध के लिए पुन: विचारण तब नही किया जा सकता, जबकि उस न्यायालय को, जिसकेद्वारा वह उन्मोचित किया गया था, या अन्य किसी ऐसे न्यायालय की, जिसके प्रथम वर्णित न्यायालय अधीनस्थ है, सम्मति न ले ली गयी हो | यहविश्वास किया गया है की धारा300 (5) का यह उपबंध इस तरह के मामलो में नये अभियोजन के दुरूपयोग के विरुद्ध एक संरक्षा के रूप में हितकारी होगा |

5. धारा 300 की कोई बात साधारण खंड अधिनियम 1897 की धारा 26 के या इस संहिता की धारा 188 के उपबंधो पर प्रभाव डालेगी |

Image 1

दांडिक विचारण

सामान्य:

  1. विचारण की वैधानिक परिभाषा नही है सामान्यत: यह सक्षम दांडिक न्यायालय द्वारा संचालित एक ऐसी जांच है जिसका उद्देश्य दांडिक आरोप के प्रति अभियुक्त की दोषित या निर्दोषित का अवधारण करना होता है |
  2. विचारण के प्रयोजनों हेतु अपराधो तथा मामलो का वर्गीकरण-
  3. समन्स मामले : s 2(w)

                    “  समन्स मामला से ऐसा मामला अभिप्रेत है जो   किसी अपराध से सम्बंधित है और जो वारेंट मामला नही है “

  1. वारेंट मामला : s 2 (x)

वारेंट-मामला से ऐसा मामला अभिप्रेत है जो मृत्यु आजीवन  कारावास या दो वर्ष  से अधिक के कारावास से दंडनीय किसी अपराध से सम्बंधित है”

  • मृत्यु आजीवन कारावास या दो वर्ष से अधिक के कारावास से दंडनीय अपराध से सम्बंधित मामला वारंट मामला है| दो वर्ष तक के कारावास या केवल अर्थदंड से दंडनीय अपराध से सम्बंधित मामला, समन्स मामला कहलाता है |
  1. वारेंट मामले अपेक्षाकृत अधिक गंभीर गंभीर होते है इनके विचारण की प्रक्रिया विस्तरित तथा अधिक तकनिकी है समन्स के मामले अपेक्षाकृत सरल तथा कम तकनिकी होती है |
  2. मूल प्रक्रियात्मक अंतर :-

 

  1. वारंट मामले से आरोपण लिखित होगा समन्स मामलो में आरोप का लिखित होना आवश्यक है |
  2. समन्स मामले की भाँती विचारित अपराध को वारेंट मामले की भाति विचारित किया जा सकता है किन्तु वारंट मामलेका समन्स मामले में रूपांतरणकिया जा सकता है
  3. समन्स मामले में, परिवादी की अनुपस्थिति दोषमुक्त का आधार हो सकती है वारंट मामले में परिवादी की अनुपस्थिति उन्मोचन का आधार हो सकती है |

4.वारंट मामले के विचारण की प्रक्रियाये :

  1. जबकिअपराध c.o.sद्वारा अन्न्पत्र विचारणीय हो…………..ch. 18
  2. पुलिस रिपोर्ट पर संसिस्थ मामले को मजिस्ट्रेट द्वारा विचारण ……..ch.19
  • पुलिस रिपोर्ट से अन्यथा संसिथ वारंट मामले का मजी. द्वाराविचारण.ch.19

 

5.समन्स मामले के विचारण की प्रक्रिया :-

  1. सामान्य प्रक्रिया……………………………………………..ch.20
  2. संक्षिप्त विचारण की प्रक्रिया………………………………ch.21

निष्पक्षविचारण की अपेक्षाएं :-

  1. निष्पक्ष विचारण का सम्बन्ध मानवाधिकारों से है प्रतिरक्षा का प्रभावी उपलब्ध कराना निष्पक्ष विचारण की अनिवार्य शर्त है | संहिता के विचारण सम्बन्धी उपबंध निष्पक्ष विचारण के प्रति निदृष्ट है
  2. विचारण की निष्पक्षता नि. के सम्बन्ध में परिक्षण योग्य है-
  3. दोषारोपणकी गंभीरता
  4. विधमान सामाजिक मूल्य
  • समय तथा संशोधन की उपलब्धता
  1. उपलब्ध संसाधनों को गुणवत्ता
  2. अन्य सुसंगत बाते
  3. निष्पक्ष विचारण की मुख्य शर्ते
  4. दोषारोपण पद्धति पर आधारित प्रतिकूलताप्रणाली
  5. निष्पक्षस्वतंत्र तथा सक्षम न्यायधीश
  • सक्षम अधिवक्ताओ द्वारा प्रतिनिधित्व का अधिकार
  1. अभियुक्त के पक्ष में निर्दोषिता की परिकल्पना तथा सिध्भारिता
  2. विचारण के दौरान अभियुक्त के अधिकार
  3. त्वरितविचारण

प्रतिकूलता प्रणाली में अभियोजक या परिवादी आरोप या दोषारोपण करता है वः ऐसे          आक्षेप को स्थापित करता है| तत्पश्चातअभियुक्त से प्रतिरक्षा के लिए कहा जाता है| न्याय एक निष्पक्ष मध्यस्थल की भूमिका में होता है | उसे निर्णित करना होता है कि कौन-सा पक्षविधि के अनुसार अपना प्रकरण स्थापित करने में संकट हुआ है भारत में प्रतिकूलता प्रणाली को    आवश्यक समायोजनो के साथ लागू किया गया है |

भारत के न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक किया गया है विचारण खुले न्याया. में होता है निष्पक्ष विचारण हेतु मामलो का स्थान्तरण किया जा सकता है | न्यायधीश विशेषज्ञ एवं प्रशिक्षित होते है अपील तथा पुनरीक्षण जैसे संशोधन कारी प्रावधान भी है

दोनों पक्ष अधिवक्ता के माध्यम से प्रकरण स्थापित करता है | नियुक्त अभियुक्त राज्य व्यय पर विधिक सहायताप्राप्त कर सकता है

विचारण का स्थान अध्याय -13 द्वारा निर्धरित होता है यह सुविधाजनक जांच या विचारण स्थल उपलब्ध कराताहै|

अभियुक्त के पक्ष में निर्दोषिता की प्रकल्पना की जाती है [कुछ मामले अपवाद हो सकते है] अभियुक्त से स्वयं को निर्दोष दर्शाने की अपेक्षा नही की जा सकती है अभियुक्त की दोषिता युक्तियुक्त संदेह से परे स्थापित करने का भार अभियोजक या परिवादी पर होता है संदेह का लाभ अभियुक्त को प्राप्त होता है वः दोषमुक्ति का अधिकार हो जाता है |

अभियुक्त को अनेक अधिकार प्रत्याभूत किये गये है संक्षेप में वे नि. है

  1. दोषारोपण जानने का अधिकार
  2. उपस्थिति में विचारित किये जाने का अधिकार
  3. उपस्थिति में साक्ष्य लिए जाने का अधिकार
  4. विपक्षी साक्षी से प्रतिरक्षा का अधिकार
  5. अपनी प्रतिरक्षा में साक्ष्य प्रस्तुत करने का अधिकार
  6. सकारण निर्णय का अधिकार
  7. दोहरे दंड के विरुद्ध संरक्षण
  8. त्वरित विचारण का अधिकार
  9. विलंबित विचारण की स्थिति में जमानत का अधिकार अपनी पसंद के अधिवक्ता
  10. नि:शुल्क विधिक सहायता का अधिकार यदि अभियुक्त निर्धन है

वारंट मामलो के विचारण की प्रक्रिया :

  1. धारा 2(x) वारेंट मामले को परिभाषित करती है यह मृत्यु आजीवन कारावास या दो वर्ष से अधिक के कारावास से दंडनीय अपराध से सम्बंधित मामला होता है वारंट मामले अपेक्षाकृत गंभीर मामले होते है इनमे आरोपण लिखित होताहै | वारंट मामलो को समन्स मामलो में रूपांतरित नही किया जा सकता है
  2. वारंट मामले के विचारण की तीन प्रक्रियाये:
  3. सब न्याय. द्वारा वारंट मामलो का विचारण ( जबकि अपराध c.o.s द्वारा अनन्यत: विचारणीय हो )
  4. पु. रिपोर्ट पर संक्षिप्त वारंट मामले का मजी. द्वारा विचारण [ ch. 19 ]

पुलिस रिपोर्ट से अन्यथा संसिस्थ वारंट मामले का मजी. द्वारा विचारण [ ch. 19 ] सब न्यायालय द्वारा अन्य्यस्त विचारणीय अपराध के सम्बन्ध में यह प्रश्न सारहीन होगा की मामला पुलिस रिपोर्ट पर संसिस्थ है या अन्यथा

  1. सब न्यायालय द्वारा विचारण की प्रक्रिया-मुख्य पक्ष [ sec 225-236 ]
  2. अभियोजन का संचालन [ सब न्यायालय के समक्ष ] लोक अभियोजक करेगा –[ s. 225]
  3. अभियोजन द्वारा प्रकरण का प्रारंभ [ s. 226]
  • कार्यवाही करने के पर्याप्त आधार न होने पर [ s. 227]
  1. लिखित आरोपण [ यदि यह प्रकल्पना करने काआधार है की अपराध सत्र न्यायालय द्वारा अनन्यत: विचारणीय है [ s. 228 ]
  2. आरोप का अभियुक्त को पढकर सुनाया जाना, समझाया जाना तथा उससे यह पुछा जाना की व दोषी होने का अभिवाक करता है या की विचारण का दावा करता है [ s. 228(2) ]
  3. दोषी होने के अभिवाक पर दोषसिद्धि[ s. 229]
  • अभियोजन साक्ष्य हेतु तिथि का नियतिकरण [ यदि धारा 229 के अंतर्गत दोषसिद्धि नही की जाती है या यदि अभियुक्त विचारण का दावा करता है या अभिवाक नही करता है या अभिवाक करने से इंकार करता है [ s.230 ]
  • नियत तिथि पर अभियोजन का साक्ष्य [ s. 231 ] दोषमुक्ति का आदेश [ यदि अभियुक्त द्वारा आरोपित अपराध किये जाने का कोई साक्ष्य नही है ] बचाव पक्ष का साक्ष्य [ s.233 ]
  1. अभियोजन द्वारा प्रकरण का संक्षेपण तथा बचाव पक्ष द्वारा उसका उत्तर
  2. निर्णय [ दोषी पाए जाने पर दोषसिद्धि का या दोषी न पाए जाने पर दोषमुक्ति का ] s. 235
  3. पूर्व दोषसिद्धि के आरोप की जांच तथा उस पर निष्कर्ष [ यदि अभियुक्त पूर्व दोषसिद्धि से इंकार करता है [ s. 236]
  4. धारा 199(2) के अंतर्गत मानहानि के अपराध का विचारण : 237 r/w 244
  5. अध्याय 21 [ s 499- 502 ] मानहानि के अपराध से सम्बंधित है मानहानि के अपराध हेतु संज्ञान केवल पीड़ित के परिवाद पर ही लिया जा सकता है यह नियम कुछ अपवादों के अधीन है |
  6. राष्ट्रपति , उपराष्ट्रपति , राज्यपाल, संघ क्षेत्र के प्रशासक, संघ के मंत्री, या राज्य के मंत्री के विकट मानहानि के अपराध के मामले मे लोक अभियोजन सीधे सब न्याय. के समक्ष परिवाद कर सकेगा | सब न्याया. सीधे संज्ञान ले सकेगा धारा 209 के अंतर्गत सुपुर्द करना आवश्यक नही होगा [ s. 199(2) ]
  • धारा 199(2) की परिधि मे आने वाले मामलो मे c.o.s. धारा 237 r/w धारा 244-250 मे वर्णित प्रक्रिया के अनुसार विचारण करेगा
  1. प्रक्रिया के मुख्य पक्ष :
  • विचारण पुलिस रिपोर्ट से अन्यथा ससिस्थ वारंट मामलो हेतु प्रावधानित विचारण प्रक्रिया के अनुसार होगा [ s. 237(1) ]
  • विचारण गोपनीय होगा [ यदि कोई पक्ष चाहता है या न्याय. उचित समझता है [ s. 237 (2) ]
  • कारण दर्शाने नोटिस [ यदि दोषारोपण का युक्तियुक्त कारण नही था ] था [ s. 237 (3) एंड (4) ]
  • कारण न दर्शाए जाने पर प्रतिकार का आदेश [ s. 237(4) ]
  • प्रतिकार का आदेश अपील योग्य होगा [ hc के समक्ष ] ( s. 237) (8)
  • अर्थदंड की भांति प्रतिकार की वसूली
  • अपील के लामबं के दौरान प्रतिकार का भुगतान स्थगित रहेगा
  • प्रतिकार के आदेश के बावजूद सिविल तथा दांडिक दायित्व से अभियुक्ति नही होगी
  1. धारा 224-250 के मुख्य पक्ष :
  • अभियोजन के साक्ष्य s. 244
  • अभियुक्त का उन्मोचन s. 245
  • उन्मोचन न होने पर प्रक्रिया s. 246
  • बचाव पक्ष का साक्ष्य s. 247
  • दोषसिद्धि या दोषमुक्ति s. 248
  • बिना युक्तियुक्त कारण के दोषारोपण पर प्रतिकर s. 250
  1. पुलिस रिपोर्ट पर संसिस्थ वारंट मामले के विचारण की प्रक्रिया
  2. ऐसे वारंट मामले मे जो c.o.s. द्वारा अनन्यत विचारणीय अपराध से असम्बंधित है, अध्याय 19 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय होंगे | अध्याय 19 मे दो विचारण प्रक्रियाये निर्धारित है-
  • पुलिस रिपोर्ट पर संसिथ्त वारंट मामले के विचारण की प्रक्रिया
  • पुलिस रिपोर्ट से अन्यथा संसिथ्त वारंट मामलो के विचारण की प्रक्रिया
  1. अध्याय-19 के अंतर्गत दो भिन्न विचारण की प्रक्रियाये का आधार यह है की पुलिस रिपोर्ट पर संसिस्थ विचारण के मामले मे मजि. को तत्काल साक्ष्य की सामग्री के आधार पर उन्मोचन करने या आरोप विरचित करने का निर्णय बिना किसी साक्ष्य के लिया जा सकता है पुलिस रिपोर्ट से अन्यथा संसिथ्त वारंट मामले मे तत्काल साक्ष्य लिए बिना ऐसा निर्णय करना संभव न होगा |
  • प्रक्रिया के मुख्य पक्ष
  • धारा 207 का अनुपालन [ s. 238 ]
  • दोषारोपण आधारहीन होने पर उन्मोचन [ s. 239 ]
  • लिखित आरोपण [ यदि यह प्रकल्पना करने के आधार है की अभियुक्त ने अध्याय – 19 के अंतर्गत विचारणीय अपराध किया है तथा मजि. उसके विचारण हेतु तथा उसमे पर्याप्त दंड देने हेतु सक्षम है
  • आरोप अभियुक्त को पढ़कर सुनाया तथा समझाया जायेगा तथा उससे यह पुछा जायेगा की वह दोषी होने का अभिवाक करता है या विचारण होने का दावा करता है [ s. 240(2) ]
  • दोषी होने पर अभिवाक पर दोषसिद्धि
  • अभियोजन का साक्ष्य
  • बचाव का साक्ष्य
  • दोषमुक्ति या दोषसिद्धि का निर्णय
  • बिना युक्ति युक्त कारण के दोषारोपण हेतु प्रतिकार
  1. पुलिस रिपोर्ट से अन्यथा संसिस्थ वारंट मामले का मजि. द्वारा विचारण :s 244-250
  • पुलिस रिपोर्ट से अन्यथा संसिस्थ वारंट- मामले से तात्पर्य-
  • परिवाद पर संसिथ्त
  • पुलिस अधिकारी से भिन्न किसी व्यक्ति की अधिकारी की सुचा पर संसिथ्त या
  • मजि. के निजी ज्ञान पर संसिथ्त मामले से है |
  • प्रक्रिया के मुख्य पक्ष :
  • अभियोजन के साक्ष्य s.244-243
  • उन्मोचन [ यदि दोषसिद्धि की आवश्यकता इंगित करने वाला मामला स्थापित नही हो पता है [ s. 245 ]
  • उन्मोचित न किये जाने पर s. 246
  • बचाव पक्ष का साक्ष्य s.247
  • निर्णय- दोषमुक्ति या दोषसिद्धि s. 248
  • परिवादी की अनुपस्थिति के आधार पर उन्मोचन s. 249

प्रतिकार [ जबकि दोषारोपण बिना किसी युक्तियुक्त आधार के किया गया हो [ s. 250 ]

ABOUT PLA

PLA offers extensive Training Programmes to help you succeed in fiercely competitive examinations like CLAT and other Law entrance exams in India. Our passion is to help you create a successful career in Law.

Who’s Online

There are no users currently online
top
Copyright © 2017. Pahuja Law Academy
Designed & Developed By : Asap Comm Ind
Registration Opens For Judiciary Coaching


X
Free Demo Class Every Sunday - 10 AM & Every Wednesday - 04 PM                                    Free Demo Class Every Sunday - 10 AM & Every Wednesday - 04 PM