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PAHUJA LAW ACADEMY

Lecture – 1

Introduction

Mains Questions

 
  1. परिसीमा अधिनियम, 1963 के लक्ष्य एवं उद्देश्यों पर प्रकाश डालियें। क्या आप इस बात से सहमत है कि यह अधिनियम समाज में विश्रान्ति, शान्ति एवं न्याय के लिए है? इसकी प्रकृति की भी समझाइये।
  2.  
    1. वे कौन सी शर्ते एवं परिस्थितियाँ है जिनमें विहित समयावधि के पर्यवसान के बाद भी न्यायालय किसी अपील या आवेदन को ग्रहण कर सकता है?
    2.  

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      Lecture – 1

      Introduction

       

      विधिशास्त्र का यह एक सुस्थापित सिद्धान्त है कि “विधि जागरुक व्यक्तियो की सहायता करती है, सुषुप्त व्यक्तियों की नही” (Vigilantibus ct non donnientibus, jura sub vaniunt) जो व्यक्ति अपने अधिकारो के प्रति सजग है वही न्यायालय से उपचार प्राप्त करने का हकदार है। इसी अवधारणा को ध्यान में रखते हुए परिसीमा विधि बनाई गई है ताकि व्यक्ति एक निर्धारित समय सीमा में अपने अधिकारों के प्रवर्तन के लिए न्यायालय में जा सके। परिसीमा अधिनियम, 1963 का बनाया जाना इसी दिशा में उठाया गया एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

      यह अधिनियम लोकनीति पर आधारित है, अतः इसे इस प्रकार लागू किया जाना चाहिए ताकि लोक नीति के सिद्धान्त अग्रसित हो सकें। (श्रीमती तारावन्ती बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा, ए.आई.आर. 1995 पंजाब एण्ड हरियाणा 32)

      लक्ष्य एवं उद्देश्य

      परिसीमा विधि के मुख्यतया निम्नांकित लक्ष्य एवं उद्देश्य (aims and objects) है।—

      (1) परिसीमा विधि का यह लक्ष्य है कि कोई भी मामला यथासम्भव यथाशीघ्र न्यायालय में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उसमें अनावश्यक विलम्ब किया जाना न्यायोचित नहीं है, क्योंकि विलम्ब न्याय को विफल कर देता है। (Delay defeats the justice)

      (2) अमर्यादित मुकदमेबाजी से समाज में अशान्ति उत्पन्न होने की सम्भावना प्रबल हो जाती है। इससे अव्यवस्था एवं अनिश्चितता को भी बढ़ावा मिलता है। ऐसी स्थिति में परिसीमा विधि शान्ति, निश्चितता एवं व्यवस्था बनाये रखने में सहायक होती है।

      (3) परिसीमा विधि ऐसे व्यक्तियों को उपचार प्रदान करती है जो अपने अधिकारों के प्रति सजग (vigilant) है। यह उन लोगों को निरुत्साहित करती है जो निष्क्रिय एवं आलसी है।

      (4) परिसीमा विधि उन व्यक्तियों को भी राहत प्रदान करती है जो किन्हीं अपरिहार्य कारणों से समय पर न्यायालय में दस्तक नहीं दे पाते हैं। सद्भावी व्यक्तियों को उपचार प्रदान करना इस विधि का लक्ष्य है।

      (5) इस विधि का लक्ष्य ऐसे, व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान करना भी है जो एक लम्बे समय से अपनी सम्पत्ति या अपने किसी अधिकार का उपयोग-उपभोग कर रहे है।

      (6) यह विधि सम्पत्ति विषयक मामलों का शीघ्र निपटारा करने में सहायक बनती। परिणामस्वरूप सम्पत्ति का समाज में परिचालन (circulation) बना रहता है।

      इस प्रकार परिसीमा विधि का मुख्य उद्देश्य मुकदमेबाजी की अनिश्चितता को समाप्त करना, जागरूक व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना तथा आलसी एवं निष्क्रिय व्यक्तियों को निरुत्साहित करना है।

      विश्रान्ति, शान्ति एवं न्याय की स्थापना

      जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है—परिसीमा विधि समाज में स्थिरता लाती है, क्योंकि यह पुराने विवादों को हतोत्साहित कर स्वत्व अथवा हक़ों की सुरक्षा करती है। इससे कपट को प्रोत्साहन नहीं मिलता। कपट पर आधारित संव्यवहारों को कभी भी न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

      दूसरी तरफ यह विधि ऐसी मुकदमेबाजी को कम करती है जो अवधिरुद्ध (time barred) हो चुके हैं। इससे समाज में अस्थिरता का भाव नहीं पनपता। इस सम्बन्ध में जॉन वोएट (John Voet) का कहना है कि-परिसीमा विधि इस धारणा को धूमिल करने का प्रयास करती है कि “वादी मर जाता है पर वाद अमर रहता है” दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि परिसीमा विधि इस धारणा को नहीं मानती है कि वाद दायर करने वाला मर जाये, लेकिन वाद कारण (cause of action) बना रहे।

      लार्ड मैकाले का कहना है कि—यह न्यायोचित नहीं है कि कोई व्यक्ति उस प्रोनोट के लिए उत्तरदायी रहे जो उसके पितामह या प्रपितामह आदि के द्वारा निष्पादित किया गया हो। यह सब बातें ऐसी हैं जो समाज में अशांति, असुरक्षा एवं अनिश्चितता का भाव पैदा करती हैं।

      इसीलिए स्टोरी द्वारा यह कहा गया है कि-परिसीमा विधि विश्रान्ति की संविधि (statute of repose) है। यह समाज में स्थिरता, शांति एवं न्याय की पोषक है।

      प्रकृति

      परिसीमा विधि एक प्रक्रियात्मक विधि (procedural law) है। इसे विशेषणात्मक विधि (Adjective law) भी कहा जाता है। यह न्यायिक प्रक्रिया से सम्बन्धित ऐसी विधि है जो भारत के सभी न्यायालयों पर आबद्धकर है।

      यह स्थानीय विधि (lex fori) है। यह स्थान विशेष के अनुसार लोगों के न्यायिक अधिकारों को प्रभावित करती है। इसे देशीय विधि भी कहा जाता है।

      परिसीमा विधि अधिकारों को समाप्त नहीं करती है. केवल उपचारों को बाधित करती है। (The law of limitation bars the remedy and not extinguish right.)

      परिसीमा विधि निम्नांकित सिद्धान्तों पर आधारित है—

      (क) यह विधि “विलम्ब साम्या को विफल करता” (delay defeats the equity) के सिद्धान्त पर आधारित है। इसके अनसार कोई अधिकार या मामला विलम्ब के कारण स्वतः समाप्त हो जाता है।

      (ख) यह विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है कि राज्य के हित में मुकदमेबाजी पर अंकुश आवश्यक है। यदि परिसीमा विधि न हो तो मकदमेबाजी का कभी अन्त नहीं होगा जिससे न केवल अव्यवस्था व्याप्त होगी अपित राजकोष पर व्यय भी बढ़ेगा।

      (ग) परिसीमा विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है कि एक बार समय का जाना। प्रारम्भ हो जाने पर कोई भी पश्चात्वर्ती निर्योग्यता उसे नहीं रोक सकती।

      (घ) यह विधि समाज में स्थिरता, शांति एवं न्याय की स्थापना के सिद्धान्त पर। आधारित है।

      (ङ) परिसीमा का तर्क केवल वादी के विरुद्ध दिया जाता है, प्रतिवादी के विरुद्ध नहीं।

      (च) यह लोक नीति एवं उपयोगिता पर आधारित है।

      (छ) यह विधि किसी अधिकार को समाप्त नहीं करती है, अपितु उसके प्रवर्तन पर रोक लगाती है।

      यहाँ यह उल्लेखनीय है कि परिसीमा विधि को शास्ति के रूप में लागू नहीं किया। जाना चाहिए। (यूनियन ऑफ इंडिया बनाम हेमचन्द्र, ए.आई.आर. 1970 इलाहाबाद 228)

      फिर परिसीमा के प्रश्न पर विचार करने का दायित्व न्यायालय का है, चाहे इस सम्बन्ध में कोई आपत्ति नहीं की गई हो। (मुनीर मोहम्मद बनाम नूर मोहम्मद, ए.आई.आर. 2005 राजस्थान 48)

      वे कौन सी शर्ते एवं परिस्थितियाँ हैं जिनमें विहित समयावधि के पर्यवसान के बाद भी न्यायालय किसी अपील या आवेदन को ग्रहण कर सकता है ?

      What are those conditions and circumstances under which an appeal or application may be admitted by the court, even after the expiry of prescribed period of limitation?

      सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 5 अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह इस नियम का अपवाद प्रस्तुत करती है कि—”प्रत्येक अपील या आवेदन विहित कालावधि में संस्थित कर दिया जाना चाहिए, अन्यथा वह खारिज कर दिया जायेगा।” धारा 5 यह कहती है कि, “पर्याप्त कारण” होने पर विलम्ब से संस्थित अपील या आवेदन भी ग्राह्य किया जा सकेगा। धारा 5 का मूल पाठ इस प्रकार है—

      “कोई भी अपील या कोई भी आवेदन जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 21 के उपबन्धों में से किसी के अधीन के आवेदन से भिन्न हो, विहित काल के पश्चात ग्रहण किया जा सकेगा यदि अपीलार्थी या आवेदक न्यायालय का यह समाधान कर दें कि उसके पास ऐसे काल के भीतर अपील या आवेदन संस्थित न करने के लिए पर्याप्त हेतुक था।”

      उपरोक्त व्यवस्था से निम्नांकित बातें स्पष्ट होती है—

      (क) धारा 5 के उपबन्ध वादों पर लागू नहीं होते हैं,

      (ख) ये केवल अपीलों एवं ऐसे आवेदनों पर लागू होते हैं जो आदेश 21 के अधीन आदेशों से भिन्न हो, तथा

      (ग) विलम्ब का कोई अपर्याप्त हेतुक (sufficient cause) होना चाहिए।

      धारा 5 पर्याप्त होने पर विलम्ब को माफ करती है। लेकिन वाद संस्थित किये जाने में किये गये विलम्ब को धारा 5 के अन्तर्गत माफ नहीं किया जा सकता है।

      पर्याप्त कारण

      धारा 5 का लाभ प्राप्त करने के लिए एक महत्त्वपूर्ण शर्त है—विलम्ब का पर्याप्त कारण (sufficient cause) होना। पर्याप्त कारण का निर्धारण प्रत्येक मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। श्रीमती तारावती बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा (ए.आई.आर. 1995 पंजाब एण्ड हरियाणा 32) के मामले में यह कहा गया है कि—”पर्याप्त कारण की कसौटी यह है कि विलम्ब का कारण ऐसा हो जो पक्षकार के नियंत्रण से बाहर रहा हो।”

      ‘मणिबेन देवराज शाह बनाम म्युनिसिपल कॉरपोरेशन, मुम्बई’ (ए.आई.आर. 2012 एस.सी. 1629) के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह प्रतिपादित किया गया है कि-विलम्ब को माफ करने में न्यायालय को उदार दृष्टिकोण रखना चाहिए। पर्याप्त कारण अत्यन्त लचीला शब्द है जिसका अर्थ इस प्रकार लिया जाना चाहिए कि न्याय का उद्देश्यपूर्ण हो जाये।

      (Expression Sufficient Cause is elastic enough to enable courts to apply law in a meaningful manner which serve ends of justice.)

      ऐसे पर्याप्त कारण को सिद्ध करने का भार पक्षकार पर होता है अर्थात् जो पक्षकार धारा 5 का लाभ उठाना चाहता है उसे न्यायालय का यह समाधान करना होगा कि अपील या आवेदन संस्थित करने में हुए विलम्ब का उसके पास पर्याप्त कारण विद्यमान है। (पेरियार ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन बनाम के.सी. कार्थिनिवायिनी, ए.आई.आर. 1995 चेन्नई 102)

      पक्षकार को विलम्ब का पर्याप्त कारण सिद्ध करने के लिए न्यायालय द्वारा समुचित अवसर प्रदान किये जाने की अपेक्षा की जाती है। (सुरेश कुमार बनाम फर्म करवान हसैन, ए.आई.आर. 1996 मध्यप्रदेश 151)

      इस प्रकार कुल मिलाकर सार यह है कि—विलम्ब माफी के लिए किसी पर्याप्त कारण का होना आवश्यक है। (For condonation of delay. There should be good ground for condonation.) (संतोष कुमार अग्निहोत्री बनाम श्रीमती सुन्दरी देवी, ए.आई.आर. 2005 एन.ओ.सी. 23 इलाहाबाद)

      चीफ पोस्ट मास्टर जनरल बनाम लीविंग मीडिया इण्डिया लिमिटेड (ए.आई.आर. 2012 एस.सी. 1506) के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह प्रतिपादित किया गया है कि-विलम्ब माफी का प्रार्थना पत्र केवल तभी स्वीकार किया। जाना चाहिए, जब—

      (i) विलम्ब का युक्तियुक्त स्पष्टीकरण पेश किया गया हो, तथा

      (ii) सद्भावपूर्वक प्रयत्न किये गये हों।

      इसे एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। एक अपील संस्थित करने में तीन दिन का विलम्ब हुआ। अपीलार्थी द्वारा विलम्ब का कारण बताया गया। उसने कहा कि वह अपनी बीमार चाची को देखने अन्य गाँव गया था। शनिवार को वह वापस अपने गाँव लौटा और रविवार को अपील दायर कर दी। इसे विलम्ब का पर्याप्त कारण माना गया और यह कहा गया कि ऐसे मामलों में रोगी का रोग प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया जाना आवश्यक नहीं है। (अमरसिंह सिंघी बनाम देवी कुमारी प्रधान, ए.आई.आर. 2005 एन ओ सी 210 सिक्किम)

      पर्याप्त कारण से सम्बन्धित निम्नांकित महत्त्वपूर्ण न्यायिक निर्णय है—

      बीमारी

      पक्षकार की बीमारी विलम्ब का पर्याप्त कारण है। यदि कोई व्यक्ति न्यायालय का यह समाधान करा देता है कि बीमारी के कारण वह अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ रहा था तो यह धारा 5 के प्रयोजनार्थ एक पर्याप्त कारण होगा। (मंजू बाला बनाम प्रदोष रंजन, ए.आई.आर. 1971, आसाम 97)

      अधिवक्ता की बीमारी भी विलम्ब का पर्याप्त कारण हो सकता है, लेकिन उसके परिवार के किसी सदस्य का बीमार होना पर्याप्त कारण नहीं हो सकता। (राधेश्वर बनाम रुक्मणी, 1942, एन.एल.जे. 311)

      न्याय शुल्क की व्यवस्था नहीं हो पाना

      पूर्ण न्याय शुल्क जमा कराने की राशि की व्यवस्था में हुआ 52 दिन का विलम्ब क्षम्य माना गया। (स्वरूप सिंह बनाम रतनसिंह, एम.आई.आर 2016 पंजाब एण्ड हरियाणा 36)

      कारावास

      किसी व्यक्ति का किसी आपराधिक मामले में कारावास में रहने के कारण समय पर कार्यवाही नहीं कर पाना विलम्ब का पर्याप्त आधार है। (महाराज नारायण बनाम बानजी, 21, पी.आर. 1904)

      भूल

      विभिन्न प्रकार की भूलों को भी विलम्ब का एक पर्याप्त कारण माना गया है यथा—

      (क) निर्णय की सही प्रतिलिपि तैयार करने में न्यायालय के अधिकारी की भूल,

      (ख) वकालतनाम पर अपीलार्थी के हस्ताक्षर नहीं किया जानाः

      (ग) सद्भावनापूर्वक किसी गलत व्यक्ति द्वारा अपील का संस्थित कर दिया जानाः

      (घ) वकील के क्लर्क द्वारा डायरी में गलत तिथि अंकित कर दिये जाने के कारण अपील का समय पर प्रस्तुत नहीं किया जा सकना;

      (ङ) अधिवक्ता द्वारा भूलवश किसी मामले में गलत राय दे दिया जाना (सेवा समाज संचालक बनाम स्टेट ऑफ केरल, ए.आई.आर. 1972 केरल 184)

      (च) अधिवक्ता की गलत राय से गलत न्यायालय में अपील संस्थित कर दिया जाना (मातीदीन बनाम ए.नारायणन, ए.आई.आर. 1970 एस.सी.1953)

      (छ) अधिवक्ता की परिसीमा की संगणना विषयक सद्भावी भूल: आदि।

      विधि की अज्ञानता

      विधि की अज्ञानता को विलम्ब का पर्याप्त कारण नहीं माना गया है। (पोकरमल बनाम सागरमल, ए.आई.आर. 1972 कलकत्ता 430)

      अशिक्षित एवं पर्दानशीन महिला

      विवाह-विच्छेद की याचिका में पत्नी के अशिक्षित एवं पर्दानशीन होने पर सामचार एवं प्रकाशन द्वारा समन की तामील को दशा में एक-पक्षीय डिक्री को अपास्त कराने हेतु विलम्ब से प्रस्तुत किये गये आवेदन पत्र को ग्राह्य किया गया। यह विलम्ब क्षम्य माना गया। (श्रीमति बल्लवा बनाम श्रीमती शान्तवा, प.आई.आर.1997 एम.सी.35)

      निर्धनता

      निर्धनता के कारण समय पर अपील या आवेदन संस्थित नहीं कर पाना बिलम्ब का पर्याप्त कारण नहीं हो सकता। (बलवन्त बनाम जगजीत, ए.आई.आर. 1974 लाहौर 210)

      सद्भावना से गलत कार्यवाही कर देना

      सद्भावनापूर्वक कोई गलत कार्यवाही कर देना धारा 5 के अन्तर्गत विलम्ब को क्षमा करने का पर्याप्त कारण हो सकता है; जैसे-अपील के स्थान पर वाद या पुनरीक्षण याचिका संस्थित कर देना। (एम.दौरेय्या बनाम श्री बालेश्वर स्वामी, वारु, आई.आर.1966 आन्ध्रप्रदेश 259)

      इसी प्रकार ऐसे और भी अनेक निर्णय है जिनमें विलम्ब के पर्याप्त कारणों पर प्रकाश डाला गया है। एक निष्कासन कार्यवाही में विलम्ब को क्षम्य नहीं किया गया क्योंकि किराया नियन्त्रण अधिनियम के अन्तर्गत प्रतिरक्षा की इजाजत हेतु अनुदत्त समय सीमा में आवेदन नहीं किया गया। (नरेश मोहन बनाम उर्मिला देवी, ए.आई.आर. 2005 दिल्ली 225)

      यहाँ यह उल्लेखनीय है कि विलम्ब को माफ करना या नहीं करना न्यायालय की विवेकाधीन शक्ति के अन्तर्गत है। (कलैक्टर भूमि अवाप्ति कातिजी, ए.आई.आर. 1987 एस.सी.1353)

       

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      Lecture – 1

      Pre Questions

       
      1. भारतीय परिसीमा अधिनियम, 1963 में कुल कितनी धाराएँ है?

      (a) 32

      (b) 27

      (c) 35

      (d) 40

       
      1. आधार भूत रुप से परिसीमा विधि का स्वरुप है

      (a) व्यावहारिक विधि

      (b) सैक्षन्तिक विधि

      (c) प्रक्रियात्मक विधि

      (d) (a) और (c) दोनों

       
      1. परिसीमा अधिनियम वादी को विधिक न्यायालय में अपने अधिकारों का प्रवर्तन कराने के लिए कोई कार्यवाही करने हेतु उपचार को समाप्त करती है किन्तु यह प्रतिवादी पर किसी बचाव को प्रस्तुत करने पर कोई प्रतिबन्ध नही लगाती

      (a) एस.एस. सूर्यवंशी बनाम पी.बी. सूर्यवंशी

      (b) लतीफ अहमद बनाम अमतुल रहमान

      (c) अब्दुल्ला बनाम अबदुल्ला

      (d) पी. नारायनी बनाम पी. बीवी

       
      1. परिसीमा अधिनियम, 1963 स्वयं में _____

      (a) पूर्ण एवं व्यापक संहिता

      (b) अपूर्ण एवं व्यापक संहिता

      (c) कठोर एवं व्यापक संहिता

      (d) कोई भी नही

       
      1. परिसीमा की दलील के विरुद्ध ही उठाई जा सकती है।

      (a) वादी

      (b) प्रतिवादी

      (c) (a) और (b) दोनों

      (d) कोई नही

       
      1. आवेदक के अन्तर्गत

      (a) याचिकादाता

      (b) वह व्यक्ति, जिससे या जिसके माध्यम से आवेदन करने का अपना अदिकार व्युत्यत्र होता है।

      (c) वह व्यक्ति, जिसकी सम्पदा का प्रतिनिधित्व आवेदक द्वारा निष्पादक, प्रशासक या अन्य प्रतिनिधि के तौर पर किया जाता है/ आता है।

      (d) उपरोक्त सभी

       
      1. अभियोक्ता को युक्तियुक्त अवधि के पश्चात तभी सुना जाएगा जब वह विलम्ब के लिए समाधानप्रद कारण बतादे।

      (a) Accusatur psot rationable tempus non-est audiendus, nisi so bene de ommissone excusa verit

      (b) Accustor post tempus non-est audiendus

      (c) Accusatur post rationable tempus non-est audiebndus, excusa verit

      (d) (a) or (c) both

       
      1. भारतीय परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 2 के अधीन परिभाषित विनिमय पत्र में सम्मिलित है

      (a) हुण्डी

      (b) चैक

      (c) बन्ध पत्र

      (d) (a) और (b) दोनो ही

       
      1. वादी इसमें

      (a) वह व्यक्ति, जिससे या जिसके माध्यम से वादी वाद लाने का अपना अधिकार व्युत्पत्र करता है

      (b) वह व्यक्ति, जिसकी सम्पदा का प्रतिनिधित्व वादी द्वारा निष्पादक प्रशासक या अन्य प्रतिनिधि के रुप में किया जाता है, सम्मिलित है—

      (c) (a) और (b) दोनो ही

      (d) कोई भी नही

       
      1. विहित काल का तात्पर्य इस अधिनियम के _______ के अनुसार संगठित परिसीमा काल से है।

      (a) उपबन्धों

      (b) अनुसूची

      (c) अपील

      (d) (a) और (b) दोनों

 

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Lecture – 2

परिसीमा अधिनियम, 1963

Mains Questions

 
  1. परिसीमा अधिनियम, 1963 के अर्न्तगत विधिक असमर्थन के आधार पर समय सीमा को प्रभावित करने वाले प्रावधानों का वर्णन कीजिये।
 
  1. परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 6, 7, 8 में निर्योग्यता जिसके कारण यमवधि बढी जाती है, से सम्बन्धित क्या नियम है?
 
  1. जब एक बार समय का चलना प्रारम्भ हो जाता है तब कोई भी पश्चातवर्ती निर्योग्यता उसे नही रोक सकती। इस कथन को समझाइए।
 
  1. परिसीमा काल की संगणना करने में कौन सा समय अपवर्जीत कर दिया जायेगा?
 
  1. अंकिचन के रुप मे वाद लाने हेतु इजाजत में लगे समय का अपवर्जन करें।
 

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Lecture – 2

परिसीमा अधिनियम, 1963

 

परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 6, 7 एवं 8 में निर्योग्यता, जिसके कारण समयावधि बढ़ जाती है, से सम्बन्धित क्या नियम है?

What are the various rules as to disability extending time limitation as provided under sections 6, 7 and 8 of the Limitation Act, 1963?

अथवा

परिसीमा अधिनियम, 1963 के अन्तर्गत विधिक असमर्थता के आधार पर समय सीमा को प्रभावित करने वाले प्रावधानों का वर्णन कीजिये।

[Discuss the provisions relating to legal disabilities affecting the period of limitation under the Limitation Act, 1963]

परिसीमा विधि का यह एक सामान्य नियम है कि वाद संस्थित करने अथवा डिक्री के निष्पादन के लिए आवेदन करने के समय वादी अथवा आवेदक का सक्षम होना आवश्यक है। सक्षमता से अभिप्राय ऐसे व्यक्ति के वयस्क और स्वस्थचित्त होने से है। अर्थात् वह अवयस्क, पागल अथवा जड़ नहीं होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति वाद संस्थित करने अथवा आवेदन करने के समय अवयस्क, पागल या जड़ (minor, insane or idiot) है तो इसे विधिक निर्योग्यता (legal disability) माना जायेगा और जब तक ऐसी निर्योग्यता बना रहती है, विहित काल की संगणना नहीं की जायेगी। परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 6, 7 एवं 8 में इसी सम्बन्ध में प्रावधान किया गया है।

विधिक निर्योग्यता

धारा 6 में विधिक निर्योग्यता के बारे में निम्नांकित प्रावधान किये गये है—

जहाँ कोई व्यक्ति वाद संस्थित करने अथवा डिक्री के निष्पादन के लिए आवेदन करने के समय अवयस्क, पागल या जड़ है तो परिसीमा की दृष्टि से विहित काल की संगणना ऐसी निर्योग्यता के समाप्त होने की तारीख से की जायेगी।

उदाहरणार्थ—धन की वसूली के लिए वाद लाने हेतु विहित काल की संगणना 20 अगस्त, 2005 से प्रारम्भ होती है लेकिन उस रोज वादी अवयस्क, पागल या जड़ है और यह स्थिति 15 मार्च, 2006 तक बनी रहती है। ऐसी स्थिति में विहित काल की संगणना 20 अगस्त से न की जाकर 16 मार्च से की जायेगी।

फर्म दुनीचंद बनाम कुलदीप सिंह (ए.आई.आर. 1955 लाहौर 144) के मामले में यह कहा गया है कि धारा 6(1) की प्रयोज्यता के लिए वादी अथवा आवेदक का विहित काल की संगणना किये जाने की प्रारम्भिक तिथि को अवयस्क, पागल या जड होना आवश्यक है।

(2) अब यदि कोई व्यक्ति वाद लाने या आवेदन करने के लिए विहित काल की संगणना के समय किसी एक निर्योग्यता से ग्रस्त है और ऐसी निर्योग्यता के समाप्त होने से पूर्व ही वह किसी दूसरी निर्योग्यता से ग्रस्त हो जाता है तो विहित काल की संगणना पूर्ववर्ती एवं पश्चात्वर्ती सभी निर्योग्यताओं के समाप्त होने के बाद की जायेगी।

उदाहरणार्थ—वाद लाने के लिए विहित काल की संगणना किये जाने के दिन वादी अवयस्क है और वयस्क होने के पूर्व ही वह पागल या जड़ हो जाता है। ऐसी स्थिति में विहित काल की गणना उसके वयस्क एवं स्वस्थचित्त हो जाने पर की जायेगी।

(3) यदि ऐसी निर्योग्यताएँ मृत्युपर्यन्त बनी रहती हैं तब उसका विधिक प्रतिनिधि मृत्यु के पश्चात् उतनी अवधि में वाद संस्थित कर सकेगा या आवेदन कर सकेगा जितनी उसे अन्यथा अनुज्ञात होगी।

उदाहरणार्थ—किसी अवयस्क व्यक्ति की वाद लाने से पहले ही मृत्यु हो जाती है। ऐसी दशा में उसकी ओर से उसके विधिक प्रतिनिधि द्वारा वाद लान के लिए विहित काल की संगणना अवयस्क की मृत्यु के बाद से की जायेगी। (रामलियाह बनाम ब्रह्ममियाह, ए.आई.आर. 1930 चेन्नई 821)

(4) जब किसी व्यक्ति की निर्योग्यता समाप्त होने से पूर्व ही मृत्यु हो जाती है और मृत्यु के समय उसका विधिक प्रतिनिधि भी किसी निर्योग्यता से ग्रस्त है तब विहित काल की संगणना ऐसे विधिक प्रतिनिधि की निर्योग्यता समाप्त होने के पश्चात् से की जायेगी। (लक्ष्मणदास बनाम सुन्दर, 59, आई.सी.678)

(5) इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति की निर्योग्यता समाप्त होने के पश्चात् किन्तु वाद संस्थित करने वा आवेदन करने के लिए विहित कालावधि से पूर्व हो जाती है तो उसका विधिक प्रतिनिधि उतनी कालावधि के भीतर वाट ला सकेगा या आवेदन कर सकेगा जितनी कालावधि के भीतर मृत्यु नहीं होने की दशा में वाद लाया जा सकता था या आवेदन किया जा सकता था।

कई व्यक्तियों में से एक की निर्योग्यता

अधिनियम की धारा 7 में धारा 6 की अनुपूरक व्यवस्था की गई है। इसके अनुसार जहाँ वाद संस्थित करने या डिक्री के निष्पादन के लिए आवेदन करने के लिए संयुक्त रूप से हकदार कई व्यक्तियों में से कोई एक किसी निर्योग्यता से ग्रस्त हो और उस व्यक्ति की सहमति के बिना उन्मोचन दिया जा सकता हो, वहाँ उन सभी व्यक्तियों के विरुद्ध समय का जाना प्रारम्भ हो जायेगा;

लेकिन जहाँ नियोग्यता से ग्रस्त व्यक्ति की सहमति के बिना उन्मोचन नहीं दिया जा सकता हो, वहाँ किसी के भी विरुद्ध समय का जाना तब तक प्रारम्भ न होगा, जब तक कि—

(क) उनमें से कोई एक अन्यों की सहमति के बिना उन्मोचन देने के लिए समर्थ न हो जाये; अथवा

(ख) ऐसी निर्योग्यता का अन्त न हो जाये।

इस प्रकार धारा 7 निर्योग्य व्यक्ति की सहमति के बिना उन्मोचन दिये जाने की विधिक क्षमता के बारे में प्रावधान करती है। ऐसा सामान्यतः भागीदारों अथवा संयुक्त हिन्दू कुटुम्ब के कर्ता के मामलों में होता है। इन्हें अन्य डिक्रीधारियों की सहमति के बिना डिक्रीकृत राशि को वसूल करने का अधिकार होता है।

‘लालाराम बनाम रामस्वरूप’ (ए.आई.आर. 1964 इलाहाबाद 495) के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि-मिताक्षारा सयुक्त हिन्दू परिवार का कर्ता या प्रबन्धक अन्य सदस्यों की सहमति के बिना उन्मोचन देने के लिए सक्षम माना गया है। उसका यह विवक्षित प्राधिकार है और सभी सदस्य उससे आबद्ध होते है चाहे वे अवयस्क ही क्यों न हों। अतः ऐसे मामलों में परिवार के सभी सदस्यों का समय का जाना प्रारम्भ हो जाता है।”

इसी प्रकार भोलानन्द बनाम पदमानन्द (6सी.डब्ल्यू.एन. 348) के मामले में यह कहा गया है कि नैसर्गिक अथवा वैधानिक सरक्षक अवयस्क व्यक्तियों की ओर से विधिमान्य उन्मोचन दे सकता है। अत: ऐसे मामलों में अवयस्क व्यक्तियों के वयस्क होने की प्रतीक्षा किया जाना आवश्यक नहीं है।

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