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Negotiable Instrument Act

Lecture- 4

 

आहर्ता तथा आहार्यी (Drawer and Drawee)

परिभाषा – वह व्यक्ति जो विनिमय-पत्र अथवा चैक लिखता है, ‘आहर्ता’ या ‘लेखक’ कहलाता है और

जिस व्यक्ति को भुगतान करने का आदेश दिया जाता है, ‘आहार्यी’ अथवा ‘देनदार’ कहलाता है। [धारा 7]

आवश्यकता के समय आहार्यो अथवा देनदार (Drawee in case of Need)- जब किस बिल में अथवा किसी पृष्ठांकन में आहार्यी के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति का नाम भी लिख दिया जाता है जिसके पास धारक भुगतान के लिए जा सकता है (अर्थात् जबकि मूल आहार्यी उसका भुगतान करने में असमर्थ रहता है, तो दूसरे व्यक्ति के पास भुगतान के वास्ते जाया जा सकता है), तो एक-दूसरे व्यक्ति को ‘आवश्यकता के समय आहार्यी’ कहते हैं।

स्वीकर्ता (Acceptor)- जब विनिमय-पत्र का आहार्यी उस विनिमय-पत्र, अथवा यदि उसके एक से अधिक भाग हैं तो किसी एक भाग पर, अपनी सहमति प्रकट करते हुए हस्ताक्षर करने के बाद धारक को या उसकी ओर के किसी अन्य व्यक्ति को सुपुर्द कर दे या अपने हस्ताक्षर की सूचना दे, तो उसे ‘स्वीकर्ता’ कहा जायेगा। [धारा 7]

प्रतिष्ठा के लिए स्वीकर्ता (Acceptor for Honour) –

जब किसी विनिमय-पत्र पर अस्वीकृत अथवा अच्छी प्रतिभूति के लिए आलोकन अथवा प्रमाणन (Noting or Protesting) किया गया हो और अन्य व्यक्ति लेखक अथवा पृष्ठांकक (Drawer or Endorser) की प्रतिष्ठा के लिए स्वीकार करता हो, तो ऐसे व्यक्ति को ‘प्रतिष्ठा के लिए स्वीकर्ता’ कहेंगे। [धारा 7]

अर्थ-धारक (Holder) – किसी विनिमय-साध्य लेख-पत्र, प्रतिज्ञा-पत्र, विनिमय-पत्र अथवा चैक के धारक से अभिप्राय ऐसे किसी भी व्यक्ति से है जो उसे अपने नाम में रखने तथा सम्बन्धित पक्षकारों से देय धन प्राप्त करने का अधिकारी है। जब प्रतिज्ञा-पत्र विनिमय-पत्र अथवा चैक खो जाता है अथवा नष्ट हो जाता है, तो उसका धारक वही व्यक्ति होता है जो ऐसी हानि अथवा विनाश के समय इसका अधिकारी था।

लक्षण (Characteristics)

उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार धारक होने के लिये निम्नलिखित बातों अथवा लक्षणों का होना आवश्यक हैः

(i) आशय- धारक से आशय किसी विनिमय-साध्य लेख-पत्र के धारक से है।

(ii) विलेख को अपने नाम से रखने का अधिकारी होना- धारक वही हो सकता है जिसे लेख-पत्र को अपने

नाम से अपने अधिकार में रखने का अधिकार हो। यह अधिकार उसे प्राप्त-कर्ता (Payee), पृष्ठांकिकी (Endorsee) अथवा वाहक की हैसियत में प्राप्त हो सकता है। उदाहरण के लिए; कोई व्यक्ति जिसके पास अपने नियोक्ता का कोई लेख-पत्र हो उसका धारक नहीं बन सकता। इसी प्रकार चोरी से लेख-पत्र प्राप्त करने वाला उसका धारक नहीं बन सकता।

(iii) धन प्राप्त करने का अधिकारी होना- धारक होने के लिए दूसरी आवश्यकता है कि लेख-पत्र पर अधिकार रखने वाले व्यक्ति को यह अधिकार होना चाहिए कि वह उससे सम्बन्धित पक्षकारों से देय धन प्राप्त करने का अधिकारी हो। अतएव ऐसे व्यक्ति को जो किसी लेख-पत्र को अपने अधिकार में रखते हुए भी उसमें लिखित धनराशि पाने का अधिकार नहीं होता, धारक नहीं बन सकता।

(iv) विलेख के खो जाने पर – विलेख के खो जाने पर विलेख को प्राप्त करने वाला धारक नहीं बन सकता है।

(v) विलेख के खोने तथा नष्ट होते समय अधिकारी होना- यदि कोई विलेख खो जाता है अथवा नष्ट हो जाता है तो उक्त विलेख के खाने अथवा नष्ट होते समय जो भी उसका अधिकारी था उक्त व्यक्ति को ही धारक माना जायेगा।

यथाविधिधारी (Holder in Due Course)

यथाविधिधारी की परिभाषा- यथाविधिधारी से अभिप्राय ऐसे व्यक्ति से है जो प्रतिफल के बदले में, विलेख (लेख-पत्र) में लिखित धन के देय होने से पूर्व और इस विश्वास के लिए पर्याप्त कारण न रखते हुए कि जिस व्यक्ति से उसने अपना अधिकार (Title) प्राप्त किया था उसके अधिकार में कोई दोष विद्यमान था, किसी प्रतिज्ञा-पत्र, विनिमय-पत्र तथा चैक का अधिकारी हो जाता है जो वाहक को देय हो अथवा आदेशानुसार देय हो, तो उसका प्राप्तकर्ता (Payee) अथवा पृष्ठांकिती (Endorsee) यथाविधिकारी हो जाता है। [धारा 9]

लक्षण अथवा आवश्यक बातें (Characteristics)

उपर्युक्त परिभाषा के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यथाविधिधारी होने के लिए निम्नलिखित बातों का होना आवश्यक हैः

(1) प्रतिफल के बदले में (For Consideration) – विलेख (लेख-पत्र) यदि वाहक को देय है तो उसका अधिकारी अथवा यदि आज्ञा पर देय है तो उसका पृष्ठांकिकी अथवा प्राप्तकर्ता बनने के पहले प्रतिफल दे दिया गया होना परम आवश्यक है। उदाहरण के लिए, किसी विलेख को दान के रूप में प्राप्त करने वाला व्यक्ति उसका यथाविधिधारी नहीं बन सकता।

(2) विलेख का अधिकार (Possession)- वाहक को देय विलेख (लेख-पत्र) की दशा में वह उसका धारक अथवा अधिकारी है और आदेश पर देय विलेख की दशा में वह उसका प्राप्तकर्ता अथवा पृष्ठांकिकी है।

(3) परिपक्वता की तिथि से पूर्व (Before the date of Maturity)- भुगतान वाली लिखित तिथि से पूर्व वह उसको प्राप्त हो गया था। उदाहरण के लिए, किसी विनिमय-पत्र की देय तिथि 1 जनवरी, 2005 है जबकि ‘स’ उसे 10 जनवरी, 2005 को प्राप्त करता है। ऐसा स्थिति में वह उसका यथाविधिधारी नहीं बन सकता।

(4) हस्तान्तरण का अधिकार (Title of the Transferor) – उसे इस बात का तनिक भी सन्देह नहीं होना चाहिए कि उस व्यक्ति के अधिकार से, जिससे उसने विलेख प्राप्त किया है, कोई दोष था। उदाहरणट के लिए, ‘अ’, ‘ब’ से एक ऐसा चैक ले लेता है जिसके बारे में वह यह जानता है कि वह चुराया हुआ है। ऐसी स्थिति में ‘अ’ का अधिकार ‘ब’ के अधिकार से श्रेष्ठ नहीं हो सकता।

(5) पूर्ण (Complete)- यथाविधिधारी बनने के लिए यह परम आवश्यक है कि विलेख पूर्ण एवं उचित हो यदि वह अपूर्ण या कटा-फटा या उस पर कुछ मिटाया गया है, तो उसे पूर्ण दशा में नहीं माना जायेगा। यथाविधिधारी बनने के लिए विलेख को पूर्ण दशा में ही लेना चाहिए।

(6) पूर्ण सदभावना (Utmost Good Faith)- यथाविधिधारी बनने के लिए अन्तिम किन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि विलेख पूर्ण सदभावना के साथ प्राप्त करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, विलेख को प्राप्त करने वाले व्यक्ति को यह विश्वास होना चाहिए कि जिस व्यक्ति से वह प्राप्त किया है उस व्यक्ति का विलेख पर अच्छा स्वत्व है।

जब तक यह सिद्ध न कर दिया जाए कि किसी लेख-पत्र का अधिकारी यथाविधिधारी नहीं है, न्यायालय उसे यथाविधिधारी ही मानता है। किन्तु यदि कोई लेख-पत्र किसी अपराध (offence) अथवा कपट अथवा किसी अवैधानिक प्रतिफल के बदले में प्राप्त किया गया है, तो यह सिद्ध करने का भार (Burden of Proof), कि धारक ही उसका यथाविधिधारी है, उसी के ऊपर होता है। [धारा 118]

यथाविधिधारी के विशेष अधिकार

(Special Privileges of Holder in due Course)

जैसा कि पहले वर्णन किया जा चुका है कि यथाविधिधारी ऐसे धारक को कहते हैं जो उस लेख-पत्र को-(अ) प्रतिफल के बदले में; (ब) भुगतान की देय तिथि से पूर्व, (स) पूर्ण सदभावना के साथ बिना इस बात की जानकारी किये हुए कि जिस व्यक्ति से वह लेख-पत्र प्राप्त किया गया है उसके अधिकार (Title) में कोई दोष है; (द) प्राप्त करता है। ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम के अन्तर्गत निम्नलिखित विशेष अधिकार प्राप्त होते हैः

(1) अपूर्ण स्टाम्पयुक्त लेख-पत्र की दशा में (Incase of inchoate stamped Instrument)- जहाँ कोई व्यक्ति हस्ताक्षर करके अपूर्ण स्टाम्पयुक्त लेख-पत्र किसी दूसरे व्यक्ति को दे देता है, तो वह यथाविधिधारी के विरुद्ध यह नहीं कह सकता था कि लेख-पत्र उसके द्वारा दिए गए अधिकारों के अनुसार पूर्ण नहीं किया गया है, बशर्ते यदि स्टाम्प लेख-पत्र की धनराशि के लिए पर्यप्त हो।

उदाहरण के लिए, ‘अ’, ‘ब’ को एक अपूर्ण लेख-पत्र देता है। विलेख पर इतना मुद्रांक है कि उस पर नियमानुसार 600रु. तक की धनराशि लिखी जा सकती है। यहाँ पर ‘ब’ को यह अधिकार है कि वह लेख-पत्र में 600 रु. तक कोई भी धनराशि अंकित कर दे और उसे ‘अ’ से प्राप्त कर ले I यहाँ पर “अ” यह नहीं कह सकता है कि उसने “ब” को केवल 300 रु. की धनराशि लेख – पत्र में अंकित करने का अधिकार दिया था I

(2) पूर्व – पक्षकारों का दायित्व (LIABILITY OF PRIOR PARYIES) – विनिमय – साध्य लेख पत्र का प्रत्येक पूर्व पक्षकार यथाविधिधारी के प्रतिग्रहण उस समय तक उत्तरदायी रहता है जब तक कि लेख पत्र पूर्णरूप से सन्तुष (अर्थात भुगतान) नहीं हो पाता I (धारा 36)

(3) कल्पित अथवा झूठे नाम में आहरित बिल का स्वीकृति (ACCEPTOR OF BILL DRWAN IN FICTITITOUS NAME) – जब कोई विनिमय – पत्र कोई लेखक (DRAWER) के आदेशानुसार किसी कल्पित नाम से देय हो और उसी व्यक्ति द्वारा लेखक के हस्ताक्षर के रूप में पृष्ठाकिंत यथाविधिधारी के विरुद्ध यह नहीं कर सकता कि ऐसा नाम कल्पित थाI (धारा 42)I

उपर्युक्त कथन से यह स्पष्ट हो जाता है कि कल्पित नाम से बिल लिखे जाने पर भी यथाविधिधारी स्वीकृति से बिल का भुगतान पाने का अधिकारी है I उदाहरण के लिए “अ”, “ब” करे नाम से 300 रु. का एक विनिमय पत्र लिखता है तथा “स” उसे स्वीकार कर लेता है I वह “ब” के नाम से ही हस्ताक्षर करके उसे “स” को पृष्ठाकिन्त कर देता है जिसे “स” यथाविधिधारी के रूप में अपने पास रख लेता है। ऐसी दशा में ‘स’ को ‘अ’ से 300 रु. प्राप्त करने का अधिकार होगा। यहाँ पर ‘अ’ यह कहकर अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता है कि विनिमय-पत्र का लेखक एक कल्पित व्यक्ति है।

(4) विनिमय-साध्यता द्वारा (By Negotiation)- जब कोई लेख-पत्र की विनिमय-साध्यता यथाविधिधारॉ को हुई हो, तो उससे सम्बन्धित अन्य पक्षकार अपने दायित्व से इस आधार पर मुक्त नहीं हो सकते कि लेख-पत्र की सुपुर्दगी किसी शर्त से अथवा किसी विशेष प्रयोजन के लिए की गई थी।

(5) धारक द्वारा यथाविधिधारी के अधिकार प्राप्त किया जाना (Holder deriving title from Holder in Due Course)- किसी विनिमय साध्य लेख-पत्र के धारक को, जिसने यथाविधिधारी से उसका अधिकार प्राप्त किया हो, वे सब अधिकार प्राप्त हो जाते हैं जो उस यथाविधिधारी को प्राप्त थे।

(6) अवैधानिक साधनों अथवा अवैधानिक प्रतिफल के बदले लेख-पत्र प्राप्त किया जाना (Instrument obtained by unlawful means or for unlawful consideration)- यदि कोई विनिमय-साध्य लेख-पत्र खो गया हो, अथवा उसे इसके लेखक (Maker), स्वीकर्ता अथवा धारक से किसी अपराध या कपट के द्वारा, अथवा अवैधानिक प्रतिफल के बदले प्राप्त किया गया हो, तो उसका कोई अधिकारी (possessor) अथवा पृष्ठांकिती, जिसे वह किसी ऐसे व्यक्ति से प्राप्त होता है, जिसने उस लेख-पत्र को इस प्रकार अवैधानिक तरीके से प्राप्त किया हो, तो वह उस पर देय धनराशि को प्राप्त करने का उस समय तक अधिकारी नहीं होगा, जब तक कि वह अधिकारी अथवा पृष्ठांकिती यथाविधिधारी न हो।

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Lecture- 5

पृष्ठांकन अथवा बेचान (म्दकवतेउमदज)

 

परिभाषा (Defination)- जब किसी विनिमय-साध्य लेख-पत्र का लेखक या धारक (Maker or holder) उस पर लेखक की भाँति नहीं वरन् परक्रामण (Negotation) के उद्देश्य से लेख-पत्र की पीठ पर या सम्मुख भाग पर अथवा साथ में संलग्न कागज पर अपने हस्ताक्षर करता है, अथवा उसी उद्देश्य से किसी स्टाम्प लगे हुए ऐसे कागज पर अपने हस्ताक्षर करता है जो बाद में एक विनिमय-साध्य लेख-पत्र के रूप् में पूरा किया जाना हो, तो कहेगे कि उसने उस लेख-पत्र का ‘पृष्ठांकन’ किया और वह स्वयं ‘पृष्ठांकनकर्ता’ कहलाता है।

जिस व्यक्ति के लिए यह पृष्ठांकित किया जाए उसे पृष्ठांकिती (Endorsee) कहते हैं।

पृष्ठांकन के लक्षण (Essentials or Characteristics of Endrosment)

1. पृष्ठांकन लेख-पत्र के लेखक (Maker) अथवा धारक (Holder) अथवा आहर्ता (Drawer) अथवा प्राप्तकर्ता (Payee) द्वारा होना चाहिए।

2. पृष्ठांकन लेख-पत्र की पीठ पर अथवा सम्मुख भाग पर अथवा साथ में संलग्न कागज पर (जिसे Allonge कहते है) होना चाहिए।

3. लेख-पत्र पर पृष्ठांकनकर्ता के हस्ताक्षर होना अनिवार्य है।

4. सुपुर्दगी के पहले लेख-पत्र पूरा हो जाना चाहिए, किन्तु धारा 20 के अनुसार एक अपूर्ण लेख-पत्र का भी पृष्ठांकन किया जा सकता है। बशर्ते उसके ऊपर पर्याप्त स्टाम्प लगा हो।

पृष्ठांकन के प्रकार (Kinds of Endorsement)

1. रिक्त या साधारण या व्यापक पृष्ठांकन (Blank Endrosment)- जब पृष्ठांकनकर्ता लेख-पत्र पर केवल अपने हस्ताक्षर करता है और इस प्रकार जिसके पक्ष में पृष्ठांकन किया गया है, उसका नाम नहीं लिखा जाता तो वह ‘रिक्त पृष्ठांकन’ कहलाता है।

उपर्युक्त प्रकार का लेख-पत्र वाहक को देए होता है, यद्यपि वह मूल रूप् से आदेश पर देय था।

उदाहरण के लिए, ‘अ’, ‘ब’ को 100रु. का चैक देता है ‘ब’ चैक की पीठ पर केवल हस्ताक्षर करके उसे ‘स’ को दे देता है यह रिक्त पृष्ठांकन है।

2. पूर्ण अथवा विशेष पष्ठांकन (Full or Special Endorsment)– जब पृष्ठांकनकर्ता अपने हस्ताक्षर करने के साथ-साथ उसे लेख-पत्र में लिखित धनराशि का किसी विशिष्ट व्यक्ति को अथवा उसके द्वारा आदेशित व्यक्ति को भुगतान किए जाने का निर्देष (Direction) दे देता है, तो वह पूर्ण विशेष पृष्ठांकन कहलाता है। उदाहरण के लिए, राम अथवा उसके आदेशानुसार भुगतान करो (Pay to Ram or order)।

रिक्त पृष्ठांकन को पूर्ण पृष्ठांकन में परिणत करना (Conversion of Endorsement in blank into Endorsement in Full)– रिक्त पृष्ठांकन विनिमय-साध्य लेख-पत्र का धारक अपने नाम से हस्ताक्षर किए बिना पृष्ठांकनकर्ता के हस्ताक्षर के ऊपर किसी अन्य व्यक्ति को पृष्ठांकिती (Endorsee) के रूप में भुगतान करने का निर्देश (Direction) लिखकर रिक्त पृष्ठांकन को पूर्ण पृष्ठांकन में परिणत कर सकता है और धारक का इस प्रकार के पृष्ठांकन के रूप् में कोई दायित्य नहीं रहता।

उदाहरण के लिए, ‘अ’, ‘ब’ को किसी विनिमय-साध्य लेख-पत्र का रिक्त पृष्ठांकन करता है। यहाँ पर ‘ब’, ‘अ’ के हस्ताक्षर के ऊपर यह लिखता है कि इसका भुगतान ‘स’ अथवा उसके आदेशित व्यक्ति को करो। ऐसी स्थिति में ‘ब’ पृष्ठांकनकर्ता के रूप में उत्तरदायी नहीं है।

3. प्रतिबन्धित अथवा सीमित पृष्ठांकन (Rectrictive Endorsement)- किसी विनिमय-साध्य लेख-पत्र का पृष्ठांकन एवं उसकी सुपुर्दगी पृष्ठांकिती को उसका स्वामित्व हस्तान्तरण कर देता है और फिर उसे आगे परक्रामण पर निम्न प्रतिबन्ध लगा दिए जा सकते हैं- (अ) स्पष्ट शब्दों द्वारा आगे के परक्रामण पर रोक लगाकर। उदाहरणार्थ, ‘केवल राम को भुगतान करो’ (Pay to Ram only), अथवा (ब) पृष्ठांकिती को लेख-पत्र का पृष्ठांकन करने का एक एजेण्ट बनाकर, अथवा (स) पृष्ठांकर (Endroser) की ओर से पाने के लिए, अथवा (द) किसी अन्य विशिष्ठ व्यक्ति की ओर से (धन) प्राप्त करने के लिए।

4. शर्त-सहित अथवा सप्रतिबन्ध पृष्ठांकन (Conditional or Qualified Endorsement)- किसी लेख-पत्र का पृष्ठांकन करते समय स्पष्ट शब्दों द्वारा अपने दायित्व को किसी घटना के घटित होने पर निर्भर कर सकता है। ऐसे पृष्ठांकन को शर्त-सहित पृष्ठांकन करते हैं।

(अ) प्रतिज्ञा-पत्र के पक्षकार (Parties to a Promissory Note)

1. लेखक (Maker)- यह व्यक्ति जो कि एक निश्चित व्यक्ति को एक निश्चित धनराशि देने की प्रतिज्ञा करता है, लेखक कहलाता है।

2. लेनदार (Payee)- यह व्यक्ति जिसे प्रतिज्ञा-पत्र देए होता है (अर्थात् जिसके पक्ष में वह लिया जाता है), लेनदार अथवा प्राप्तकर्ता कहलाता है।

3. धारक (Holder)- यह वह व्यक्ति होता है जिसे वैधानिक रूप में प्रतिज्ञा-पत्र को अपने पास रखने तथा भुगतान प्राप्त करने का अधिकार होता है।

4. पृष्ठांकक (Endroser)- अथवा पृष्ठांकनकर्ता- जब प्रतिज्ञा-पत्र का धारक प्रतिज्ञा-पत्र का बेचान दूसरे व्यक्ति के नाम करता है तो वह प्राष्ठांकक अथवा बेचाकर्ता कहलाता है।

5. पृष्ठांकिती (Endorsee)- यह वह व्यक्ति होता है जिसके नाम में प्रतिज्ञा-पत्र का बेचान किया जाता है।

(ब) विनिमय-पत्र के पक्षकार (Parties to a Bill of Exchange)

2. आहार्यी अथवा देनदान (Drawee)– यह वह व्यक्ति होता है जिस पर विनिमय-पत्र लिखा अथवा आहरित किया जाता है।

3. स्वीकर्ता (Acceptor)- यह वह व्यक्ति होता है जो विनिमय-पत्र का देनदार है तथा उस पर अपनी स्वीकृति प्रदान करता है।

4. लेनदार (Payee)- यह वह व्यक्ति होता है जो कि उसकी धनराशि प्राप्त करता है। प्रायः लेखक और लेनदार एक ही व्यक्ति होता है।

5. धारक (Holder)- वह व्यक्ति है जो विनिमय-पत्र का अधिकारी होता है वह या तो मूल आदाता होता है या कोई अन्य व्यक्ति होता है जिसे आदाता ने विनिमय-पत्र पृष्ठांकित कर दिया हो। यदि बिल वाहक को देए है, तो वाहक ही उसका धारक होता है।

6. पृष्ठांकक (Endorser)- जब विनिमय-पत्र का धारक बिल को किसी अन्य व्यक्ति के नाम पृष्ठांकित कर देता है तो वह पृष्ठांकक हो जाता है।

7. पृष्ठांकिती (Endorsee)– वह व्यक्ति है जिसके नाम में विनिमय-पत्र का पृष्ठांकन किया जाता है।

8. आवश्यकता की दशा में आहार्यी या देनदार (Drawee in case of need)– उपर्युक्त पक्षकारों के अतिरिक्त आहत्र्ता की इच्छा पर एक अन्य व्यक्ति भी सम्मिलित किया जा सकता है जिसे “आवश्यकता की दशा में आहार्यी” कहते हैं। ऐसे व्यक्ति का नाम आहत्र्ता द्वारा या किसी भी पृष्ठांकक द्वारा बिल में इसीलिए लिख दिया जाता है कि आवश्यकता पड़ने पर उस पर पहुँचा जा सके अर्थात् जबकि विनिमय-पत्र पूल आहार्यी द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता या उसका भुगतान नहीं किया जाता। यदि विनिमय-पत्र में ऐसे व्यक्ति का नाम भी लिखा होता है जो जब तक ऐसा व्यक्ति भी अनादरण न कर दे तब तक विनिमय-पत्र अनादरित नहीं समझा जाता।

9. प्रतिष्ठा के लिए स्वीकर्ता (Acceptor for honour)– जब कोई व्यक्ति, मूल अहार्यी द्वारा विनिमय-पत्र को स्वीकार करने से इन्कार करने पर अथवा नोटेरी पब्लिक द्वारा अच्छी जमानत माँगने पर ऐसी जमानत देने से इन्कार कर देने पर, आहत्र्ता या पृष्ठांकिकी की प्रतिष्ठा के लिए उसे स्वीकार कर लेता है, तो उसे ‘प्रतिष्ठा के लिए स्वीकारकत्र्ता’ कहते हैं।

(स) चैक के पक्ष (Parties to a Cheque)

1. लेखक (Drawer)- वह व्यक्ति जो चैक लिखता है।

2. देनदार (Drawee)- वह सदैव बैंक होता है जिस पर चैक लिखा जाता है।

3. लेनदार (Payee)- वह व्यक्ति जिसको भुगतान मिलना है।

4. धारक (Holder)- वह व्यक्ति जो चैक पर कब्जा पाने का अधिकारी है।

5. बेचानकर्ता अथवा पृष्ठांकक (Endorser)- वह व्यक्ति जो चैक को बेचान करता है।

6. पृष्ठांकिकी (Endorsee)- यह वह व्यक्ति होता है जिसके नाम में चैक बेचान किया गया है।

Lecture- 6

पृष्ठांकन अथवा बेचान (म्दकवतेउमदज)

 

परिभाषा (Defination)- जब किसी विनिमय-साध्य लेख-पत्र का लेखक या धारक (Maker or holder) उस पर लेखक की भाँति नहीं वरन् परक्रामण (Negotation) के उद्देश्य से लेख-पत्र की पीठ पर या सम्मुख भाग पर अथवा साथ में संलग्न कागज पर अपने हस्ताक्षर करता है, अथवा उसी उद्देश्य से किसी स्टाम्प लगे हुए ऐसे कागज पर अपने हस्ताक्षर करता है जो बाद में एक विनिमय-साध्य लेख-पत्र के रूप् में पूरा किया जाना हो, तो कहेगे कि उसने उस लेख-पत्र का ‘पृष्ठांकन’ किया और वह स्वयं ‘पृष्ठांकनकर्ता’ कहलाता है।

जिस व्यक्ति के लिए यह पृष्ठांकित किया जाए उसे पृष्ठांकिती (Endorsee) कहते हैं।

पृष्ठांकन के लक्षण (Essentials or Characteristics of Endrosment)

1. पृष्ठांकन लेख-पत्र के लेखक (Maker) अथवा धारक (Holder) अथवा आहर्ता (Drawer) अथवा प्राप्तकर्ता (Payee) द्वारा होना चाहिए।

2. पृष्ठांकन लेख-पत्र की पीठ पर अथवा सम्मुख भाग पर अथवा साथ में संलग्न कागज पर (जिसे Allonge कहते है) होना चाहिए।

3. लेख-पत्र पर पृष्ठांकनकर्ता के हस्ताक्षर होना अनिवार्य है।

4. सुपुर्दगी के पहले लेख-पत्र पूरा हो जाना चाहिए, किन्तु धारा 20 के अनुसार एक अपूर्ण लेख-पत्र का भी पृष्ठांकन किया जा सकता है। बशर्ते उसके ऊपर पर्याप्त स्टाम्प लगा हो।

पृष्ठांकन के प्रकार (Kinds of Endorsement)

1. रिक्त या साधारण या व्यापक पृष्ठांकन (Blank Endrosment)- जब पृष्ठांकनकर्ता लेख-पत्र पर केवल अपने हस्ताक्षर करता है और इस प्रकार जिसके पक्ष में पृष्ठांकन किया गया है, उसका नाम नहीं लिखा जाता तो वह ‘रिक्त पृष्ठांकन’ कहलाता है।

उपर्युक्त प्रकार का लेख-पत्र वाहक को देए होता है, यद्यपि वह मूल रूप् से आदेश पर देय था।

उदाहरण के लिए, ‘अ’, ‘ब’ को 100रु. का चैक देता है ‘ब’ चैक की पीठ पर केवल हस्ताक्षर करके उसे ‘स’ को दे देता है यह रिक्त पृष्ठांकन है।

2. पूर्ण अथवा विशेष पष्ठांकन (Full or Special Endorsment)– जब पृष्ठांकनकर्ता अपने हस्ताक्षर करने के साथ-साथ उसे लेख-पत्र में लिखित धनराशि का किसी विशिष्ट व्यक्ति को अथवा उसके द्वारा आदेशित व्यक्ति को भुगतान किए जाने का निर्देष (Direction) दे देता है, तो वह पूर्ण विशेष पृष्ठांकन कहलाता है। उदाहरण के लिए, राम अथवा उसके आदेशानुसार भुगतान करो (Pay to Ram or order)।

रिक्त पृष्ठांकन को पूर्ण पृष्ठांकन में परिणत करना (Conversion of Endorsement in blank into Endorsement in Full)– रिक्त पृष्ठांकन विनिमय-साध्य लेख-पत्र का धारक अपने नाम से हस्ताक्षर किए बिना पृष्ठांकनकर्ता के हस्ताक्षर के ऊपर किसी अन्य व्यक्ति को पृष्ठांकिती (Endorsee) के रूप में भुगतान करने का निर्देश (Direction) लिखकर रिक्त पृष्ठांकन को पूर्ण पृष्ठांकन में परिणत कर सकता है और धारक का इस प्रकार के पृष्ठांकन के रूप् में कोई दायित्य नहीं रहता।

उदाहरण के लिए, ‘अ’, ‘ब’ को किसी विनिमय-साध्य लेख-पत्र का रिक्त पृष्ठांकन करता है। यहाँ पर ‘ब’, ‘अ’ के हस्ताक्षर के ऊपर यह लिखता है कि इसका भुगतान ‘स’ अथवा उसके आदेशित व्यक्ति को करो। ऐसी स्थिति में ‘ब’ पृष्ठांकनकर्ता के रूप में उत्तरदायी नहीं है।

3. प्रतिबन्धित अथवा सीमित पृष्ठांकन (Rectrictive Endorsement)- किसी विनिमय-साध्य लेख-पत्र का पृष्ठांकन एवं उसकी सुपुर्दगी पृष्ठांकिती को उसका स्वामित्व हस्तान्तरण कर देता है और फिर उसे आगे परक्रामण पर निम्न प्रतिबन्ध लगा दिए जा सकते हैं- (अ) स्पष्ट शब्दों द्वारा आगे के परक्रामण पर रोक लगाकर। उदाहरणार्थ, ‘केवल राम को भुगतान करो’ (Pay to Ram only), अथवा (ब) पृष्ठांकिती को लेख-पत्र का पृष्ठांकन करने का एक एजेण्ट बनाकर, अथवा (स) पृष्ठांकर (Endroser) की ओर से पाने के लिए, अथवा (द) किसी अन्य विशिष्ठ व्यक्ति की ओर से (धन) प्राप्त करने के लिए।

4. शर्त-सहित अथवा सप्रतिबन्ध पृष्ठांकन (Conditional or Qualified Endorsement)- किसी लेख-पत्र का पृष्ठांकन करते समय स्पष्ट शब्दों द्वारा अपने दायित्व को किसी घटना के घटित होने पर निर्भर कर सकता है। ऐसे पृष्ठांकन को शर्त-सहित पृष्ठांकन करते हैं।

(अ) प्रतिज्ञा-पत्र के पक्षकार (Parties to a Promissory Note)

1. लेखक (Maker)- यह व्यक्ति जो कि एक निश्चित व्यक्ति को एक निश्चित धनराशि देने की प्रतिज्ञा करता है, लेखक कहलाता है।

2. लेनदार (Payee)- यह व्यक्ति जिसे प्रतिज्ञा-पत्र देए होता है (अर्थात् जिसके पक्ष में वह लिया जाता है), लेनदार अथवा प्राप्तकर्ता कहलाता है।

3. धारक (Holder)- यह वह व्यक्ति होता है जिसे वैधानिक रूप में प्रतिज्ञा-पत्र को अपने पास रखने तथा भुगतान प्राप्त करने का अधिकार होता है।

4. पृष्ठांकक (Endroser)- अथवा पृष्ठांकनकर्ता- जब प्रतिज्ञा-पत्र का धारक प्रतिज्ञा-पत्र का बेचान दूसरे व्यक्ति के नाम करता है तो वह प्राष्ठांकक अथवा बेचाकर्ता कहलाता है।

5. पृष्ठांकिती (Endorsee)- यह वह व्यक्ति होता है जिसके नाम में प्रतिज्ञा-पत्र का बेचान किया जाता है।

(ब) विनिमय-पत्र के पक्षकार (Parties to a Bill of Exchange)

2. आहार्यी अथवा देनदान (Drawee)– यह वह व्यक्ति होता है जिस पर विनिमय-पत्र लिखा अथवा आहरित किया जाता है।

3. स्वीकर्ता (Acceptor)- यह वह व्यक्ति होता है जो विनिमय-पत्र का देनदार है तथा उस पर अपनी स्वीकृति प्रदान करता है।

4. लेनदार (Payee)- यह वह व्यक्ति होता है जो कि उसकी धनराशि प्राप्त करता है। प्रायः लेखक और लेनदार एक ही व्यक्ति होता है।

5. धारक (Holder)- वह व्यक्ति है जो विनिमय-पत्र का अधिकारी होता है वह या तो मूल आदाता होता है या कोई अन्य व्यक्ति होता है जिसे आदाता ने विनिमय-पत्र पृष्ठांकित कर दिया हो। यदि बिल वाहक को देए है, तो वाहक ही उसका धारक होता है।

6. पृष्ठांकक (Endorser)- जब विनिमय-पत्र का धारक बिल को किसी अन्य व्यक्ति के नाम पृष्ठांकित कर देता है तो वह पृष्ठांकक हो जाता है।

7. पृष्ठांकिती (Endorsee)– वह व्यक्ति है जिसके नाम में विनिमय-पत्र का पृष्ठांकन किया जाता है।

8. आवश्यकता की दशा में आहार्यी या देनदार (Drawee in case of need)– उपर्युक्त पक्षकारों के अतिरिक्त आहत्र्ता की इच्छा पर एक अन्य व्यक्ति भी सम्मिलित किया जा सकता है जिसे “आवश्यकता की दशा में आहार्यी” कहते हैं। ऐसे व्यक्ति का नाम आहत्र्ता द्वारा या किसी भी पृष्ठांकक द्वारा बिल में इसीलिए लिख दिया जाता है कि आवश्यकता पड़ने पर उस पर पहुँचा जा सके अर्थात् जबकि विनिमय-पत्र पूल आहार्यी द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता या उसका भुगतान नहीं किया जाता। यदि विनिमय-पत्र में ऐसे व्यक्ति का नाम भी लिखा होता है जो जब तक ऐसा व्यक्ति भी अनादरण न कर दे तब तक विनिमय-पत्र अनादरित नहीं समझा जाता।

9. प्रतिष्ठा के लिए स्वीकर्ता (Acceptor for honour)– जब कोई व्यक्ति, मूल अहार्यी द्वारा विनिमय-पत्र को स्वीकार करने से इन्कार करने पर अथवा नोटेरी पब्लिक द्वारा अच्छी जमानत माँगने पर ऐसी जमानत देने से इन्कार कर देने पर, आहत्र्ता या पृष्ठांकिकी की प्रतिष्ठा के लिए उसे स्वीकार कर लेता है, तो उसे ‘प्रतिष्ठा के लिए स्वीकारकत्र्ता’ कहते हैं।

(स) चैक के पक्ष (Parties to a Cheque)

1. लेखक (Drawer)- वह व्यक्ति जो चैक लिखता है।

2. देनदार (Drawee)- वह सदैव बैंक होता है जिस पर चैक लिखा जाता है।

3. लेनदार (Payee)- वह व्यक्ति जिसको भुगतान मिलना है।

4. धारक (Holder)- वह व्यक्ति जो चैक पर कब्जा पाने का अधिकारी है।

5. बेचानकर्ता अथवा पृष्ठांकक (Endorser)- वह व्यक्ति जो चैक को बेचान करता है।

6. पृष्ठांकिकी (Endorsee)- यह वह व्यक्ति होता है जिसके नाम में चैक बेचान किया गया है।

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